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                <title>rising prices - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>बढ़ती महंगाई और मध्यम वर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक</span></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185515/rising-inflation-and-the-middle-class"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/rajeev-shukla.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक क्रय शक्ति कम होती जा रही है? कागज पर वेतन में बढ़ोतरी दिखाई दे सकती है, रोजगार के नए अवसरों और आर्थिक विकास की तस्वीर भी सामने रखी जा सकती है, लेकिन परिवार का वास्तविक बजट किसी सरकारी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि रसोई, स्कूल की फीस, बिजली के बिल, किराये, ईंधन, इलाज और रोजमर्रा के खर्च से तय होता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">जब इन खर्चों की रफ्तार आय की वृद्धि से तेज हो जाती है तो व्यक्ति को महसूस होने लगता है कि उसकी कमाई बढ़ने के बावजूद उसका जीवन आसान नहीं हुआ। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी आय का बड़ा हिस्सा अनिवार्य खर्चों में चला जाता है। मकान का किराया या होम लोन की किस्त, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा, परिवहन, बिजली-पानी, मोबाइल-इंटरनेट, घरेलू सामान और सामाजिक जिम्मेदारियां—इनमें से अधिकांश खर्च ऐसे हैं जिन्हें आसानी से कम नहीं किया जा सकता। मान लीजिए किसी परिवार की मासिक आय में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, लेकिन इसी अवधि में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य आवश्यक सेवाओं का खर्च उससे अधिक बढ़ जाता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">तब वास्तविक जीवन में उस परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बजाय और दबाव में आ सकती है। यही कारण है कि केवल वेतन या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने को आर्थिक खुशहाली का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि आय बढ़ने के बाद नागरिक कितनी वस्तुएं और सेवाएं खरीद पा रहा है और उसके पास भविष्य के लिए कितनी बचत बच रही है। महंगाई का असली चेहरा रसोई से दिखाई देता है। महंगाई के आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आम नागरिक महंगाई को आंकड़ों में नहीं, बाजार में महसूस करता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महीने की शुरुआत में बनाया गया घरेलू बजट महीने के अंत तक अक्सर बिगड़ जाता है। सब्जियां, दाल, दूध, फल, खाद्य तेल, गैस, परिवहन और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर परिवार की जेब पर पड़ता है। मध्यम वर्ग की कठिनाई यह भी है कि वह गरीबों के लिए उपलब्ध अनेक सरकारी सहायता योजनाओं का स्वाभाविक लाभार्थी नहीं होता और दूसरी ओर उसकी आय इतनी अधिक भी नहीं होती कि वह लगातार बढ़ती निजी सेवाओं की कीमतों को आसानी से वहन कर सके। वह दो आर्थिक दबावों के बीच खड़ा दिखाई देता है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">मध्यम वर्ग के बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य का हिस्सा लगातार महत्वपूर्ण होता गया है। माता-पिता बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते </span></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">हैं। इसके लिए स्कूल फीस, किताबें, परिवहन, कोचिंग और उच्च शिक्षा पर बड़ी रकम खर्च होती है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में बढ़ता निजी खर्च परिवार की बचत को प्रभावित करता है। बीमारी केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रह जाती, बल्कि कई बार आर्थिक संकट भी बन जाती है। यही वजह है कि मध्यम वर्ग के लिए महंगाई का अर्थ केवल खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ना नहीं है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास महंगे होते हैं तो भविष्य की सुरक्षा भी महंगी हो जाती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;"> भारत में मध्यम वर्ग की आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण आधार बचत रही है। लेकिन जब आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्च में चला जाता है तो बचत के लिए उपलब्ध रकम घटने लगती है। बचत कम होने का अर्थ केवल आज की सुविधा कम होना नहीं है। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बच्चों की उच्च शिक्षा, घर खरीदना, सेवानिवृत्ति, अचानक आने वाला स्वास्थ्य खर्च या किसी आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यदि किसी परिवार की आय बढ़ती रहे लेकिन उसकी बचत लगातार घटती जाए तो यह आर्थिक मजबूती का संकेत नहीं, बल्कि सावधानी का संकेत है। महंगे मकान, शिक्षा, वाहन और दूसरी आवश्यकताओं के कारण ऋण आज मध्यम वर्ग की आर्थिक जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऋण अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब मासिक आय का बड़ा हिस्सा ईएमआई में जाने लगे तो परिवार की आर्थिक स्वतंत्रता कम होने लगती है। ऐसे परिवारों के लिए ब्याज दरों में बदलाव, नौकरी का संकट या अचानक चिकित्सा खर्च बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि परिवारों की ऋण-निर्भरता कितनी बढ़ रही है और उनकी बचत कितनी सुरक्षित है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">क्या केवल महंगाई को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है?</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यहां सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। महंगाई पर नियंत्रण केवल कीमतें स्थिर रखने का विषय नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, वेतन वृद्धि, उत्पादकता, कर व्यवस्था, आवास की लागत, स्वास्थ्य और शिक्षा की उपलब्धता—ये सभी मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।</span></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 18:44:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सोना ले  जा रे, चांदी ले जा रे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>दुनिया में सोना और चांदी हिरणी की तरह कुलांचें भर रहा है। कुलांचे इसलिए भर रहा है क्योंकि दुनिया का वातावरण कुलांचें भरने के अनुरूप है। यदि सोना और चांदी जैसी धातुएं कुलांचें भरतीं हैं तो समझ जाइये कि विश्वव्यापी मंदी आपके घर के बाहर दस्तक दे रही है। जो समझदार हैं वे इस दस्तक को पहचानते हैं ,वे संकटकाल के लिए सोना और चांदी जैसी धातुएं ख़रीदकर रख लेते  है। संकट काल में एक सोना और चंडी ही है जो आपकी मदद कर सकता है।</p>
<p>आठवें दशक के आरम्भ में एक फिल्म आयी थी ' मेरा गांव-मेरा देश '।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149946/gold-take-me-and-take-silver"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/gold3.jpg" alt=""></a><br /><p>दुनिया में सोना और चांदी हिरणी की तरह कुलांचें भर रहा है। कुलांचे इसलिए भर रहा है क्योंकि दुनिया का वातावरण कुलांचें भरने के अनुरूप है। यदि सोना और चांदी जैसी धातुएं कुलांचें भरतीं हैं तो समझ जाइये कि विश्वव्यापी मंदी आपके घर के बाहर दस्तक दे रही है। जो समझदार हैं वे इस दस्तक को पहचानते हैं ,वे संकटकाल के लिए सोना और चांदी जैसी धातुएं ख़रीदकर रख लेते  है। संकट काल में एक सोना और चंडी ही है जो आपकी मदद कर सकता है।</p>
<p>आठवें दशक के आरम्भ में एक फिल्म आयी थी ' मेरा गांव-मेरा देश '।   इसी फिल्म का एक गीत था-<br />सोना ले जा रे चाँदी ले जा रे, ओ पैसा ले जा रे ओ दिल कैसे दे दू मै जोगी के बड़ी बदनामी होगी<br />अब दुनिया में योगी की बदनामी तो जो होना थी  ,वो हो ही चुकी है ।  जोगी राज में पहली बार होली पर मस्जिदों को कपडे से ढाँका गया।  लेकिन बात सोने-चांदी की हो रही है। समय सोना और चांदी के भावों में बढ़ोतरी हो रही है. इस कारण दोनों के भावों एक बार फिर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं. विशेषज्ञों  के अनुसार मार्केट में दोनों कीमती धातुओं की मांग पहले के मुकाबले  दो गुना हो गई है।</p>
<p>महंगी धातुओं के दाम तभी बढ़ते हैं जब दुनिया में मंदी की आहटें सुनाई देने लगती हैं। जाहिर है कि इस बार भी सोना-चांदी यही संकेत दे रहा है।  दुनिया ने २० वीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अनेक अवसरों पर विश्वव्यापी मंदी का सामना किया है ,1928  से 1934  की मंदी  हो या 1982 ,1991  और 2008  की विश्वव्यापी मंदी ने दुनिया की कमर तोड़ दी थी और इससे उबरने में वर्षों लग  जाते हैं। मंदी के दौर में वे देश और वे लोग ही टिक पाए जिनके पास सोना और चांदी थी ।</p>
<p>दुनिया में जब-जब मंदी आती है तब-तब फांसीवाद बढ़ता है ,दुनिया युद्ध की आग में झुलसने लगती है। इस समय दुनिया में अनेक देशों में युद्ध चल रहे हैं।  रूस यूक्रेन से लड़ रहा है। इस्राइल फिलिस्तीन और लेबनान से लड़ रहे हैं। अमेरिका हो या रूस या भारत या चीन  सभी देशों में फांसीवाद और पूंजीवाद बढ़ता जा रहा है। मंदी आती है तो अपने पीछे बर्बादी लेकर आती है। औद्योगिक विकास रुक जाता है ,बेरोजगारी बढ़ती है। कृषि उत्पादन घटता है। बैंक दीवालिया होने लगते  हैं। हमारा इतिहास बताता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दुनिया में करोड़ों लोगों कीनौकरी चलाई गयी था। मंदी अपने साथ शस्त्रों की होड़ लेकर आती है।</p>
<p> भारतीय परिवार हमेशा से संस्कृति से बंधे रहे हैं और चीनी परिवारों का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा है। और सबसे बड़ी वजह यही है कि ये दोनों देश सोना खपत करने वाले देशों में अकसर अव्वल रहते हैं। एक बार फिर से चीन और भारत सोना खपत करने वाले देशों में टॉप-2 स्थान में रहे हैं।आपको हर घर में तोला-दो तोला सोना तो आसानीसे मिल जाएगा।चीन  में दो साल पहले 630  तन सोना खप गया जबकि इस मामले में भारत दूसरे स्थान पर रहा। भारत में 575  टन तक सोना खप गया था।</p>
<p>सोने की खपत के मामले में दुनिया पर दादागिरी करने वाले अमेरिका का का नंबर तीसरा है। स्वर्ण के प्रति हमारा आकर्षण सनातनी है।  त्रेता में रामचंद्र के बनवास के समय भी सीता  जी ने जिस हिरण की मांग की थी वो भी सोने का ही था। आज भी हर विवाह में सोना-चांदी का आभूषण अनिवार्य है। सगाई भी सोने कि अंगूठी पहनकर होती है।</p>
<p>सोना शक्ति का प्रतीक है। हितोपदेश की कथाओं में कहा गया है की यदि पोटली में रखकर सोना टांग दिया जाये तो चूहा  बार-बर छलांग लगा सकता है। इसलिए मै कहता हूँ की दुनिया मंदी के गर्त में जाती दिखाई दे रही है। ऐसे में आप सोना-चांदी खरीदने का मौक़ा हाथ से न जाने दें।</p>
<p>1980  में जब मेरी शादी हुई थी तब सोने का भाव शायद 1300  रुपया प्रति 10  ग्राम था और जब मेरी बेटी की शादी 2005  में हुई तब सोने का भाव 6000  रूपये  प्रति 10  ग्राम के आसपास था। आज यही सोना 90  हजार रूपये तोला [ 10  ग्राम ] होने को आतुर है ।  यानी दुनिया में पिछले सौ साल में राजनीती में, समाज में ,चरित्र में गिरावट आयी लेकिन सोना  और चांदी लगातार ऊपर की और उठते रहे। तो जाइये ! जितना सोना-चांदी खरीद सकते हैं ,जाकर खरीद लीजिये ,क्योंकि कोई भी सरकार मंदी के दौर में आपकी मदद नहीं कर सकती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 14:04:17 +0530</pubDate>
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