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                <title>vrindavan - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे की चोरी नहीं होने देंगे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा विवाद की तरह वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोपों पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि वह चढ़ावे में गड़बड़ी नहीं होने देगा। अदालत ने साफ़ कहा कि भक्तों द्वारा दिया गया एक-एक रुपया सीधे मंदिर के खजाने में जाना चाहिए और किसी भी सेवायत या अन्य व्यक्ति को दान की राशि सीधे नहीं लेने दिया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन समिति को निर्देश दिया कि वह चढ़ावे के लिए पूरी तरह पारदर्शी व्यवस्था लागू करे और यह सुनिश्चित करे कि सभी दान या तो मंदिर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186511/banke-bihari-will-not-allow-theft-of-temple-offerings"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/images6.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा विवाद की तरह वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोपों पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि वह चढ़ावे में गड़बड़ी नहीं होने देगा। अदालत ने साफ़ कहा कि भक्तों द्वारा दिया गया एक-एक रुपया सीधे मंदिर के खजाने में जाना चाहिए और किसी भी सेवायत या अन्य व्यक्ति को दान की राशि सीधे नहीं लेने दिया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन समिति को निर्देश दिया कि वह चढ़ावे के लिए पूरी तरह पारदर्शी व्यवस्था लागू करे और यह सुनिश्चित करे कि सभी दान या तो मंदिर के अधिकृत दानपात्रों (डोनेशन बॉक्स) के ज़रिए जमा हों या फिर ऑनलाइन माध्यम से सीधे मंदिर के खाते में पहुंचें। वृंदावन स्थित प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन और कथित वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह टिप्पणी की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, 'इस बात में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि भक्तों द्वारा दिया गया हर एक पैसा केवल मंदिर के दानपात्र या ऑनलाइन माध्यम से सीधे मंदिर के खजाने में जमा हो। यदि कोई सेवायत या अन्य व्यक्ति इसमें बाधा डालता है तो अदालत इसे गंभीरता से देखेगी।' बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि मंदिर प्रबंधन समिति ऐसी व्यवस्था बनाए जिससे दान की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी तरह की गड़बड़ी या दुरुपयोग की संभावना खत्म हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान एक पक्ष की ओर से कहा गया कि मंदिर के कुछ भंडारी और सेवायत भक्तों से सीधे नकद राशि लेते हैं और यह उनके पारंपरिक अधिकार का हिस्सा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि किसी भी सेवायत को यह अधिकार नहीं है कि वह भगवान के नाम पर दिया गया दान पहले खुद ले ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले पूरा चढ़ावा मंदिर के खजाने में जाएगा। इसके बाद यदि किसी सेवायत को नियमों के अनुसार कोई हिस्सा मिलना है तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत मिलेगा। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, 'कोई पुजारी या सेवायत भगवान की संपत्ति पर पहले से अधिकार नहीं जता सकता।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि मंदिर प्रबंधन समिति मंदिर की निधि का इस्तेमाल संपत्तियां खरीदने जैसे कार्यों में कर रही है। उन्होंने अदालत से कहा कि यह साफ़ होना चाहिए कि समिति को मंदिर के पैसे से संपत्ति खरीदने का अधिकार है या नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर प्रबंधन से जुड़े कानून और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवाल अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि यदि मंदिर के विकास के लिए अस्पताल, सुविधाएं या अन्य सार्वजनिक व्यवस्था बनानी हो तो उसके लिए धन कहां से आएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान मंदिर में पहले हुई भगदड़ का भी जिक्र किया गया। याचिकाकर्ताओं ने सुझाव दिया कि श्रद्धालुओं की भीड़ नियंत्रित करने के लिए ऑनलाइन बुकिंग या टिकट आधारित दर्शन व्यवस्था लागू की जा सकती है, जैसा कोविड-19 के दौरान किया गया था। उन्होंने कहा कि इससे श्रद्धालुओं की सुरक्षा बेहतर होगी और अव्यवस्था से बचा जा सकेगा। अदालत ने इस सुझाव पर संबंधित पक्ष से जवाब दाखिल करने को कहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद पिछले वर्ष तब बढ़ा था, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 लागू कर मंदिर के प्रशासन को नई कानूनी व्यवस्था के तहत लाने का फैसला किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया हर दान पहले मंदिर के अधिकृत खजाने में जमा होगा। अदालत का मानना है कि इससे चढ़ावे के उपयोग में पारदर्शिता आएगी, वित्तीय गड़बड़ियों पर रोक लगेगी और मंदिर प्रशासन अधिक जवाबदेह बनेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 21:20:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>युवाओं में प्रेरणा के पुरोधा है श्री प्रेमानंद जी महाराज </title>
                                    <description><![CDATA[प्रेमानंद जी महाराज जन्मोत्सव 2026: वृंदावन में भक्ति की दिव्य लहरें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173669/shri-premanand-ji-maharaj-is-the-pioneer-of-inspiration-among"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(19).jpeg" alt=""></a><br /><h6><strong>राधे राधे! </strong>आज वृंदावन धाम में राधा-नाम की मधुर धुन गूंज रही है। लाखों भक्तों के हृदय में एक ही नाम है – श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज। 19 मार्च  को उनके पावन जन्मोत्सव का मुख्य दिन मनाया गया। श्री हित राधा केली कुंज (वराह घाट, परिक्रमा मार्ग, वृंदावन) में 13 मार्च से 19 मार्च तक चला यह 7 दिवसीय भव्य उत्सव अब समाप्त हो चुका है, लेकिन भक्ति की लहरें अभी भी पूरे ब्रज में गूंज रही हैं।</h6>
<p>यह सिर्फ एक संत का जन्मदिन नहीं, बल्कि राधारानी के अनन्य भक्त और सरल भक्ति के प्रतीक का उत्सव है, जिसने लाखों लोगों के जीवन को राधा-नाम से जोड़ दिया है।</p>
<p><span style="background-color:rgb(241,196,15);"><strong>प्रेमानंद जी महाराज युवाओं के प्रेरणा पुरोधा</strong></span></p>
<p>पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (जिन्हें प्रेमानंद महाराज या प्रेमानंद जी महाराज के नाम से जाना जाता है) का जन्म 30 मार्च 1969 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल ब्लॉक के अखरी गांव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। वे अंग्रेजी तिथि के बजाय हिंदू पंचांग (विक्रम संवत) के अनुसार चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा/पंचमी के आसपास अपना जन्मोत्सव मनाते हैं, इसी कारण उत्सव मार्च के मध्य (13-19 मार्च) मनाया जाता है। बचपन से ही भक्ति की ज्वाला उनके मन में जल रही थी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर त्याग दिया और वृंदावन धाम आकर राधा वल्लभ संप्रदाय की शरण में समर्पित हो गए। गुरु कृपा से वे प्रेमानंद गोविंद शरण बने और आज राधा केली कुंज के प्रमुख रसिक संत के रूप में पूरे देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं। </p>
<p><strong>2026 जन्मोत्सव: भव्य आयोजन और उत्साह</strong></p>
<p>इस वर्ष जन्मोत्सव 13 मार्च से 19 मार्च 2026 तक धूमधाम से मनाया गया। राधा केली कुंज को फूलों, रंगोली और दिव्य सजावट से सजाया गया। रोजाना विशेष दर्शन, राधा-नाम संकीर्तन, भजन-कीर्तन, सत्संग और प्रसादी वितरण का कार्यक्रम रहा। 19 मार्च को मुख्य उत्सव के दिन भक्तों ने महाराज जी को फूलों की मालाएं चढ़ाईं, आरती उतारी और राधे-राधे का जयघोष किया।</p>
<p><strong>महाराज जी की सरलता और संदेश क्यों इतने लोकप्रिय?</strong></p>
<p>प्रेमानंद जी महाराज की सबसे बड़ी खासियत उनकी सरलता है। कोई आडंबर नहीं, कोई दिखावा नहीं – बस राधा-कृष्ण के प्रेम में डूबे रहना।उनके प्रवचन जटिल शास्त्र नहीं, बल्कि माँ की लोरी जैसे सरल और हृदयस्पर्शी होते हैं। मुख्य संदेश: “राधा नाम ही सब कुछ है। भक्ति में सरलता रखो, प्रेम करो, नाम जपो – यही सच्चा मार्ग है।”वे खुद को राधारानी का दास मानते हैं। उनकी वाणी में वृंदावन की मिट्टी, यमुना की लहरें और रासलीला की मधुरता झलकती है।अमीर-गरीब, युवा-बुजुर्ग सभी के लिए समान प्रेम। उनके दर्शन से हजारों लोग भाव-विभोर होकर रो पड़ते हैं या नाम जपने लगते हैं।आज के युग में जब लोग तनाव और माया में फंसे हैं, महाराज जी की शिक्षाएं जीवन को सरल, सुखी और भक्ति-मय बनाने का मार्ग दिखाती हैं।</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-03/images-(20).jpeg" alt="Premanand Ji Maharaj Birthday 2026: वृंदावन में भक्ति महापर्व, 19 मार्च को मनाया गया जन्मोत्सव | Radha Keli Kunj" width="554" height="554"></img></p>
<p>महाराज जी सिखाते हैं कि असली जन्मदिन वह है जब हम अंदर की माया त्यागकर भक्ति में नया जन्म लें। आज के दिन हम सब प्रार्थना करें:“हे प्रेमानंद जी महाराज! आपकी कृपा से हमारा मन राधा नाम में लगे, जीवन प्रेम और शांति से भरा रहे। राधे राधे!”राधे राधे पूज्य महाराज जी को जन्मोत्सव की कोटि-कोटि शुभकामनाएं। आपकी कृपा सदैव बनी रहे। जय श्री हित राधा केली कुंज! जय प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज! </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 10:42:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[सचिन बाजपेई]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत के विभिन्न राज्यों में होली की अनोखी परंपराएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय संस्कृति में होली एक खास उत्सव है, जो सिर्फ रंगों का ही आकर्षण नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं धार्मिक त्योहार भी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, होली हिंदू नववर्ष की शुरुआत का दिन है। प्राचीन समय से ही भारत में कृषि की प्रधानता रही है, और ऋतु परिवर्तन एवं फसलों की बुआई-कटाई की मान्यताएं हिंदू त्योहारों से जुड़ी हुई हैं। फसल पकने की खुशी में होली मनाने की और रंग खेलने की परंपरा है। जलती हुई अग्नि में नई फसल का कुछ भाग अर्पित करते हैं। दरअसल, जब भी कोई फसल आती है तो उसका कुछ भाग भगवान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149867/unique-traditions-of-holi-in-different-states-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(6)3.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय संस्कृति में होली एक खास उत्सव है, जो सिर्फ रंगों का ही आकर्षण नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं धार्मिक त्योहार भी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, होली हिंदू नववर्ष की शुरुआत का दिन है। प्राचीन समय से ही भारत में कृषि की प्रधानता रही है, और ऋतु परिवर्तन एवं फसलों की बुआई-कटाई की मान्यताएं हिंदू त्योहारों से जुड़ी हुई हैं। फसल पकने की खुशी में होली मनाने की और रंग खेलने की परंपरा है। जलती हुई अग्नि में नई फसल का कुछ भाग अर्पित करते हैं। दरअसल, जब भी कोई फसल आती है तो उसका कुछ भाग भगवान को, प्रकृति को भोग के रूप में चढ़ाया जाता है। पूरे भारतवर्ष में होली धूमधाम से मनाई जाती है और इस त्योहार को लेकर देश के अलग-अलग राज्यों में लोककथाएं एवं परंपराएं प्रचलित हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>बिहार की होली</strong></div>
<div>बिहार में होली का सतरंगी मिजाज देखने को मिलता है। मिथिला, भोजपुरी भाषी एवं मगध प्रदेश में होली के अलग-अलग अंदाज हैं। मिथिला क्षेत्र में सहरसा के बनगांव की घुमौर होली ब्रज की तरह ही प्रसिद्ध है। यहां हजारों की संख्या में लोग जुटकर घुमौर होली खेलते हैं। समस्तीपुर में एक विशेष प्रकार की छाता होली खेली जाती है, जिसमें बांस के बड़े-बड़े छाते बनाए जाते हैं। मगध क्षेत्र के पटना सहित नवादा, गया, औरंगाबाद, अरवल और जहानाबाद आदि जगहों पर बुढ़वा होली मनाई जाती है, जो होली के अगले दिन मनाई जाती है। भोजपुर क्षेत्र—आरा, जमुई आदि में धुरखेल होली का चलन है। यहां लोग पहले होलिका दहन की राख से होली खेलते हैं, फिर कादो-माटी की होली, फिर रंगों की होली और अंत में अबीर की होली खेलते हैं। बिहार में होली के पारंपरिक फाग लोकगीत गाए जाते हैं और होलिका दहन के दिन होलिका की अग्नि में कुलदेवी या देवता को बारा चढ़ाने का रिवाज है।</div>
<div> </div>
<div><strong>उत्तर प्रदेश की होली</strong></div>
<div>उत्तर प्रदेश की होली की बात ही निराली है। यहाँ होली की कई छटाएँ देखने को मिलती हैं, जो विदेशों तक प्रसिद्ध हैं। काशी की होली की परंपरा बेहद खास है। यहाँ होली से पहले रंग एकादशी के दिन माता पार्वती की विदाई की परंपरा है। विदाई के लिए आए शिवजी के साथ रंग-गुलाल खेलकर होली का शुभारंभ किया जाता है। मथुरा-वृंदावन की होली कृष्ण और राधा के प्रेम का प्रतीक है। यहां होली की खुमारी 16 दिनों तक छाई रहती है। राधा के गांव बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है, जो विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएँ पुरुषों को लाठियों से मारती हैं और पुरुष उनसे बचते हुए उन पर रंग डालते हैं। प्रयागराज में होली के दिन जुलूस निकालने की परंपरा है।</div>
<div> </div>
<div><strong>मध्य प्रदेश की होली</strong></div>
<div>मध्य प्रदेश की भगोरिया होली झाबुआ और अलीराजपुर में मनाई जाती है। इसमें आदिवासी मेले का आयोजन रंगों और गुलाल के साथ किया जाता है। यह जीवन और प्रेम का उत्सव होता है। इंदौर की रंगपंचमी विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ गेर (एक तरह का जुलूस) निकालने का रिवाज है, जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं और पूरी धरती रंगों से सराबोर हो जाती है। ग्वालियर में सिंधिया राजपरिवार की होली खेली जाती है। निमाड़ अंचल में बड़ी संख्या में गोंड आदिवासी लोग रहते हैं, जो पारंपरिक तरीके से होली मनाते हैं और मेघनाद की पूजा करते हैं। रायसेन जिले में अंगारे वाली होली मनाई जाती है, जिसमें नंगे पाँव अंगारों पर चलने की परंपरा है।</div>
<div> </div>
<div><strong>राजस्थान की होली</strong></div>
<div>राजस्थान में बरसाने और मथुरा-वृंदावन की तरह लट्ठमार और फूलों की होली का प्रचलन है। जोधपुर, जयपुर और उदयपुर में शाही होली खेली जाती है। अजमेर में माली होली और गैर होली मनाई जाती हैं। गैर होली में कम से कम 12 गाँवों के पुरुष अजमेर में इकट्ठा होते हैं और ढोल-नगाड़ों के साथ फाग गाते हैं, जिसका आनंद पूरा शहर लेता है। डोलची होली एक विशिष्ट परंपरा है, जिसमें पुरुष ऊँट की खाल से बने डोलची नामक बर्तन से दूसरे पुरुष पर रंग फेंकते हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>गुजरात की होली</strong></div>
<div>गुजरात में होली का त्योहार धुलेटी के नाम से जाना जाता है। यहाँ मथुरा की तरह 40 दिनों तक होली खेलने की परंपरा है। होली के अगले दिन हांड़ी प्रतियोगिता होती है, जिसमें लोग ऊँचाई पर टंगी हांड़ी तोड़ने का प्रयत्न करते हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>उत्तराखंड की होली</strong></div>
<div>देवों की नगरी उत्तराखंड की होली ब्रज की तरह ही प्रसिद्ध है। यहाँ कुमाऊँ क्षेत्र में दो तरह की होली मनाई जाती है—बैठकी होली और खड़ी होली। बैठकी होली का आयोजन बैठकर किया जाता है, जबकि खड़ी होली में सामूहिक नृत्य के साथ चौराहों और चौबारों में इसे गाया जाता है। इनके अलावा देश के दक्षिण और अन्य राज्यों में भी होली धूमधाम से मनाई जाती है। होली की तरह ही रंगों का यह त्योहार दुनिया के कई अन्य देशों में भी मनाया जाता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Mar 2025 15:23:21 +0530</pubDate>
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