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                <title>Rajya Sabha - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>राज्यसभा के रास्ते नीतीश कुमार का वानप्रस्थ गमन!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172602/nitish-kumars-last-journey-through-rajya-sabha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/nitish-kumar-5-march-2026-.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा राज्यसभा का नामांकन भरने से  यह बात स्पष्ट हो गयी है कि बिहार की राजनीति से एक युग का अब अवसान होने जा रहा है। बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से यदि किसी एक नेता का सबसे अधिक प्रभाव रहा है, तो वह नाम है नीतीश कुमार। वर्ष 2005 से लेकर अब तक बिहार की सत्ता का केंद्र लगभग लगातार उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। अलग-अलग गठबंधनों, बदलते राजनीतिक समीकरणों और कई चुनावी उतार-चढ़ावों के बावजूद उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अपनी पकड़ बनाए रखी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में नीतीश के द्वारा मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का ऐलान बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव के रुप में देखा जा रहा है। अगर देखा जाए लगभग साढ़े तीन दशकों तक बिहार की राजनीति दो नामों के इर्द-गिर्द भूमती रही, ये दो नाम हैं लालू प्रसाद यादव और नीतीश। इन दोनों नेताओं ने न केवल बिहार की सत्ता को आकार दिया, बल्कि राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा भी तय की। अब जब दोनों ही नेता सक्रिय राजनीति से दूर हो रहे हैं, तब बिहार एक नए दौर के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1990 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, तब बिहार की राजनीति में एक नई सामाजिक चेतना का उदय हुआ। लालू ने 'सामाजिक न्याय' को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक आंदोलन का रूप दिया। पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को उन्होंने केंद्र में रखा। लंबे समय से सत्ता के गलियारों से दूर रहे वर्गों को उन्होंने राजनीतिक पहचान और आवाज दी। सत्ता की भाषा बदली, राजनीतिक चेहरे बदले और शासन के केंद्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई धारा दिखाई देने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें कोई दोमत नहीं है कि जेपी आंदोलन से निकले नेताओं की एक पूरी पीढ़ी ने पिछले तीन दशकों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी। इस पीढ़ी में पुरानी पीड़ी के पीछे हटने का अर्थ है कि बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं को अवसर मिलेगा। इन सबके बीच अगर बात नीतीश की की जाए तो, बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं रही है, बल्कि वे लंबे समय तक राज्य की राजनीति के सर्वमान्य नेता रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोग भी उन्हें स्वीकार करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गठबंधन की राजनीति में कई बार वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने गठबंधन धर्म निभाया और राजनीतिक संतुलन बनाए रखा। उनकी खास पहचान उनकी सामाजिक योजनाओं और प्रशासनिक छवि से बनी। खास तौर पर महिलाओं के बीच उनकी पकड़ काफी मजबूत रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं का समर्थन एनडीए की जीत का एक बड़ा कारण माना गया था। इसी कारण जब तक वह बिहार की राजनीति में सक्रिय थे, तब तक विपक्षी दलों के लिए उन्हें सीधे चुनौती देना आसान नहीं था। हालांकि, इसी दौर में बिहार की छवि पर कई सवाल भी उठे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई और 'जंगलराज' जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए। विकास की रफ्तार धीमी पड़ने और उद्योगों के बंद होने से बिहार की अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई। राज्य से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ और बिहार प्रवासी मजदूरों के प्रदेश के रूप में पहचाना जाने लगा। चीनी मिलों, जूट फैक्ट्रियों और कई छोटे उद्योगों के बंद होने से रोजगार के अवसर घटते गए। इस दौर में बिहार की पहचान सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ-साथ पिछड़ेपन और आर्थिक संकट से भी जुड़ने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2005 में बिहार की राजनीति ने एक बड़ा मोड़ लिया जब नीतीश कुमार सत्ता में आए। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की शुरुआत भी थी। नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय की राजनीति को विकास और प्रशासनिक सुधारों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी और बिहार में सड़कों तथा पुलों का व्यापक जाल बिछाया। राज्य के दूरदराज इलाकों को राजधानी पटना से बेहतर तरीके से जोड़ने का प्रयास किया गया। एक समय ऐसा था जब बिहार के कई जिलों से पटना पहुंचने में पूरा दिन लग जाता था, लेकिन सड़क नेटवर्क के विस्तार के बाद यात्रा का समय काफी कम हो गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह बदलाव केवल भौतिक संरचना का नहीं था, बल्कि राज्य की मानसिकत्ता और विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम था। नीतीश कुमार ने शासन को अधिक प्रशासनिक रूप देने की कोशिश की और कानून-व्यवस्था को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया। उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई कई योजनाओं ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला। छात्राओं के लिए साइकिल योजना ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नया बदलाव लाया। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने से स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन कदमों ने बिहार की सामाजिक संरचना को धीरे-धीरे बदलने में भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार की छवि 'सुशासन बाबू' के रूप में स्थापित हुई। उन्होंने प्रशासनिक सुधार, कानून-व्यवस्था और बुनियादी विकास को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उनके शासनकाल में बिहार की छवि धीरे-धीरे बदलने लगी। रष्ट्रीय स्तर पर भी बिहार को विकास के नए प्रयासों के संदर्भ में चर्चा मिलने लगी। विहार के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा। बिहार में सड़कों, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में जो बदलाव हुए, उससे राज्य में परिवर्तन आया। मगर भूलना नहीं चाहिए कि राजनीति में बदलाव हमेशा अनिश्चितता लेकर आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश के संभावित फैसले से भी बिहार की राजनीति में कई नए सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या जदयू अपनी पुरानी ताकत बनाए रख पाएगी? क्या भाजपा बिहार में अपना मुख्यमंत्री चनाएगी ? क्या नई पीढ़ी के नेताओं को मौका मिलेगा ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका निभाएंगे ? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि कुमार का यह फैसला केवल एक व्यक्ति के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह बिहार की राजनीति के एक लंबे अध्याय के समापन और एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें नीतीश का राज्यसभा जाना सिर्फ पद का बदलाव नहीं है; यह करीब 5 दशक लंबी राजनीतिक यात्रा का एक नया अध्याय भी हो सकता है। हाल ही में नीतीश कुमार ने खुद कहा है कि अपनी लंबी राजनीतिक जिंदगी में वे बिहार विधानसभा के सदस्य, विधान परिषद के सदस्य और लोकसभा के सांसद रह चुके हैं। अब वे राज्यसभा में भी सेवा देना चाहते हैं। और उसके बाद अगर उन्हें केंद्र सरकार में कोई भूमिका मिली, तो बिहार की राजनीति का यह बड़ा चेहरा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिख सकता है। राजनीति में समय के साथ भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी छाया लंबे समय तक बनी रहती है। नीतीश भी ऐसे ही नेताआ में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका चाहे समाप्त हो जाए, लेकिन बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मौजूदगी आगे भी चर्चा और प्रभाव का विषय बनी रहेगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें 2020 के बाद एनडीए में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। सीटों की संख्या साफ दिखा रही थी कि भाजपा के पास ज्यादा विधायक हैं, फिर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे। आखिर ऐसा क्यों? इसके 2 मुख्य कारण अक्सर बताए जाते हैं। पहला कारण उनकी सामाजिक आधार है। बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों और महिला मतदाताओं से बहुत मजबूत जुड़ाव बनाया है। शराबबंदी जैसी नीतियां और महिलाओं के लिए कल्याण योजनाओं ने उन्हें एक भरोसेमंद और विश्वसनीय नेता की छवि दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 साल की उम्र में स्वास्थ्य कारणों से नीतीश कुमार अब कम मेहनत वाला रोल चुनना चाहते हैं। ऐसे में राज्यसभा उनके लिए एक सम्मानजनक और महत्वपूर्ण मंच हो सकता है। लेकिन बात यहां सिर्फ पद बदलने की नहीं है। यह पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश भी हो सकती है। चर्चा है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार जल्द ही सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं और उन्हें राज्य सरकार में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 18:53:38 +0530</pubDate>
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                <title>औरंगजेब  के बाद अब तुगलक की बारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>'कहते हैं कि जब-' सूप  तो सूप, छलनी भी बोल उठे ' तो समझिये कि संकेत अच्छे नहीं हैं। सत्तारूढ़ दल में मुस्लिम शासकों के खिलाफ छाया युद्ध में अब औरंगजेब के बाद मोहम्मद बिन तुगलक  की एन्ट्री हो गयी है।भाजपा सांसद   दिनेश शर्मा ने अपने तुगलक लेन आवास की नेमप्लेट बदलकर स्वामी विवेकानंद मार्ग कर ली है। उनके इस कदम पर राजनीति शुरू हो गई है। यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि ऐसे नामों को बदलने का दिल्ली में भी सही समय आ गया है।</p>
<p>मोहम्मद बिन तुगलक के बारे   में जानने से पहले दिनेश शर्मा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149669/after-aurangzeb-now-tughlaqs-turn"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/tuglk3.webp" alt=""></a><br /><p>'कहते हैं कि जब-' सूप  तो सूप, छलनी भी बोल उठे ' तो समझिये कि संकेत अच्छे नहीं हैं। सत्तारूढ़ दल में मुस्लिम शासकों के खिलाफ छाया युद्ध में अब औरंगजेब के बाद मोहम्मद बिन तुगलक  की एन्ट्री हो गयी है।भाजपा सांसद   दिनेश शर्मा ने अपने तुगलक लेन आवास की नेमप्लेट बदलकर स्वामी विवेकानंद मार्ग कर ली है। उनके इस कदम पर राजनीति शुरू हो गई है। यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि ऐसे नामों को बदलने का दिल्ली में भी सही समय आ गया है।</p>
<p>मोहम्मद बिन तुगलक के बारे   में जानने से पहले दिनेश शर्मा के बारे में जान लीजिये ।  पंडित जी उसी लखनऊ के हैं और उत्तर प्रदेश से ही  राजयसभा के लिए  चुने गए हैं। लखनऊ  से कभी भाजपा के संस्थापक अटल बिहारी बाजपेयी सांसद हुआ करते थे ।  पंडित जी राजनीति में आने से पहले प्रोफेसर थे,फिर महापौर बने ,विधायक बने, उप्र के उप मुख्यमंत्री बने और अब सांसद हैं। एक जमाने में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने दिनेश शर्मा को महापौर बनाने के लिए जनता से वोट मांगे थे। यही दिनेश  शर्मा जी अब उस रास्ते पर निकल पड़े हैं जिस पर अटल जी कभी नहीं चले।</p>
<p>आइये अब मोहम्मद बिन तुगलक के बारे में जान लेते हैं। तुगलक क्रूर औरंगजेब से भी पुराना मुगल शासक था ।  गयासुद्दीन   तुगलक के इस पढ़े लिखे  बेटे ने 1325  से 1351  तक दिल्ली के तख्त   पर राज किया और अपने जमाने में क्रूरता की ,सनक की अनेक इबारतें लिखीं। तुगलक को पढ़ने बैठिये तो आपको एक उपन्यास जैसा मजा आ जायेगा। 20  मार्च 1351  में कालकवलित हुए तुगलक के नाम पर दिल्ली में युगों से एक सड़क है। अब इसी सड़क के विरोध के बहाने तुगलक 674  साल बाद एक बार फिर जेरे बहस है। तुगलक के सनकी फैसलों की वजह से एक मुहावरा ही बन गया ,जिसे ' तुगलकी फरमान ' कहा जाता है। तुगलक के बारे में यदि आपको ज्यादा जानना है तो इतिहास की कोई किताब खरीद लीजिये।</p>
<p>मै वापस आता हूँ भाजपा की बिना   मुद्दों की राजनीति की और।  भाजपा में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास   मोदी जी से लेकर दिनेश शर्मा तक बिना मुद्दों की राजनीति करते है। वो इसलिए करते हैं क्योंकि  मुद्दों पर राजनीति   करना आसान नहीं होता है ,लेकिन बिना मुद्दों के सुर्खियां बटोरना और असल मुद्दों को इन सुर्ख़ियों के नीचे दफन कर देना होता आसान होता है।</p>
<p>भाजपा नेता आसान काम पहले करते हैं। भाजपा मुस्लिम शासकों को न मरने देती है और न जनता को चैन से बैठने देती है। बेचारा औरंगजेब कब्र से बाहर निकालकर पीटा जा रहा है। अभी वो अध्याय समाप्त भी नहीं हुआ था कि पंडित  दिनेश शर्मा जी तुगलक को कब्र से बाहर निकाल लाये। मतलब भाजपा मुर्दों को भी चैन से सोने नहीं दे रही। कल पता नहीं कौन सा मुर्दा कब्र से बाहर निकाल लाये भाजपा।</p>
<p>मुसलमान शासकों को हौवा बनाकर सियासत  करने वाली भाजपा को मेरा एक ही मश्विरा है की उसे रोज-रोज का मुस्लिम विरोध करने की बजाय एक बार में किस्सा समाप्त कर देना चाहिए ।  देश में मुस्लिम शासकों की नाम से जितने गांव,शहर ,गली-मुहल्ले हैं उन सबके नाम एक झटके में एक विधान बनाकर बदल देना चाहिए /कम से कम जहाँ डबल इंजिन की सरकारें हैं ,वहां तो ये काम आसानी से हो सकता है। दूसरें भारत में जितने भी कब्रस्तान हैं उनके ऊपर बुलडोजर चलकर वहां बागीचे बना देना चाहिए , न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। किन्तु मुश्किल ये है कि भाजपा ये भी नहीं कर सकती। क्योंकि यदि ऐसा कर दिया गया तो विरोधी भाजपा नेताओं की तुलना ही औरंगजेब और तुगलक से किये बिना नहीं मानेगे।</p>
<p>इतिहास   गवाह है कि जिस किसी भू-भाग में इतिहास पर धूल डालने की कोशिश की गयी है  वहां का न वर्तमान समृद्ध हो पाया है और न भविष्य उज्ज्वल हुआ है।  इतिहास ही ज्ञान का असल स्रोत माना जाता है।  इतिहास ही यदि नींव  में नहीं है   है तो कैसा वर्तमान और कैसा भविष्य ? मुझे मध्यकाल के किसी भी मुगल शासक से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन मै उनके होने को भी ख़ारिज नहीं करती।</p>
<p>मै उनसे घृणा भी नहीं करता ।  मै नहीं कह सकता कि इस मुल्क को बनाने में केवल आज की शासकों का योगदान है और अतीत  के किसी भी शासक का कोई योगदान नहीं है। यदि भाजपा की ये धारणा है तो उसे  सबसे पहले अंग्रेजों के ज़माने   की गुलामी के चिन्ह  समाप्त करने से पहले मुग़लों    के और मुगलों से पहले जो भी शासक रहे हैं उनके अवशेष या चिन्ह समाप्त करना चाहिए। विस्मिल्लाह दिल्ली में बनी क़ुतुब मीनार तोड़कर किया जा सकता है।  कहते हैं कि क़ुतुब मीनार किसी मुगल शासक कुतबुद्दीन ऐबक ने बनाई थी। उसके नाम से भी दिल्ली में बहुत कुछ है।</p>
<p>पाठकों को और हिंदुस्तान की लोगों को ये तय करना है कि मुल्क में क्या रहे और क्या न रहे ?  ये तय करने वाले भाजपाई कौन होते हैं ?? उन्हें तो देश बनाने का मौक़ा जुम्मा-जुम्मा दस साल पहले मिला है और उसमें भी उन्होंने जो हिंदुस्तान बनाया है वो दरका हुआ,डरा  हुआ एक सशंकित हिंदुस्तान बना है। जिसमें सरकार शहरों ,स्टेशनों,सड़कों की नाम बदलने से ही फारिग नहीं हो पायी है।मुझे तो हैरानी होती है कि जो घ्रणित और घटिया काम पूर्व प्रधानमंत्री  अटल बिहारी वाजपेयी ने नहीं किया वो घटिया और घ्रणित काम अटल जी के शिष्य दिनेश शर्मा कर गुजरे।</p>
<p>तुगलक लेन का नाम हालाँकि अभी बदला नहीं है लेकिन यदि बदल भी जाये तो तुगलक इतिहास से गायब नहीं हो सकते। तुगलक क्या कोई भी गायब नहीं हो सकता। इसलिए बेहतर है कि/ भाजपा और भाजपाई अपना मुस्लिम प्रेम [घृणा ] बंद करें और ये मुल्क जैसा बना था उसे वैसा ही बना रहने दें ।  हिंदुस्तान /भारत /इंडिया जैसा था खूबसूरत है। उसे विकृत मत कीजिये। जय श्रीराम</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 09 Mar 2025 15:13:30 +0530</pubDate>
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