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                <title>new education policy - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>शिक्षा, रोजगार में अब फैसलों का समय</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए एक बड़ी ताकत हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बशर्ते उसके युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार के पर्याप्त अवसर और अपनी प्रतिभा को निखारने का अनुकूल वातावरण मिले। यदि ऐसा नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही युवा शक्ति निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष का कारण भी बन सकती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत के पास कितने युवा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि देश अपने युवाओं के भविष्य को किस दिशा में ले जाना चाहता है। अब</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184608/now-is-the-time-for-decisions-in-education-and-employment"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए एक बड़ी ताकत हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बशर्ते उसके युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार के पर्याप्त अवसर और अपनी प्रतिभा को निखारने का अनुकूल वातावरण मिले। यदि ऐसा नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही युवा शक्ति निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष का कारण भी बन सकती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत के पास कितने युवा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि देश अपने युवाओं के भविष्य को किस दिशा में ले जाना चाहता है। अब समय वो आ गया है जब बच्चे अपनी शिक्षा और रोजगार के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिये हैं। हाल ही के दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा छात्रों द्वारा किया गया आंदोलन इसका प्रमाण है जिसमें सरकार को झुकना पड़ा और छात्रों की मांगे माननी पड़ी। आज हम युवा छात्रों के भविष्य की योजनाओं का दिखावा नहीं कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें अपने कार्यों को जमीन पर उतारना होगा। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव हुए हैं। नई शिक्षा नीति लागू की गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल विकास पर जोर दिया गया और डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ। इन प्रयासों का उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख बनाना था। फिर भी जमीनी स्तर पर अनेक चुनौतियां बनी हुई हैं। लाखों छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण शिक्षा और उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं के बीच बढ़ती दूरी है। आज भी अनेक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का तरीका पुराने ढर्रे पर आधारित है। छात्रों को परीक्षा पास करने की तैयारी तो कराई जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें व्यावहारिक कौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्या-समाधान की क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संचार कौशल और तकनीकी दक्षता विकसित करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। परिणामस्वरूप डिग्री तो हाथ में आ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन रोजगार पाने के लिए आवश्यक योग्यता अधूरी रह जाती है। रोजगार का प्रश्न केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है। हर वर्ष करोड़ों युवा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सीमित रिक्तियों के कारण अधिकांश युवाओं को सफलता नहीं मिल पाती। कई बार भर्ती प्रक्रियाओं में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा रद्द होने या अन्य प्रशासनिक समस्याओं के कारण युवाओं की निराशा और बढ़ जाती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि सरकारी भर्तियों को समयबद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जाए। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वहां भी कौशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव और बदलती तकनीकों के अनुरूप योग्यता की मांग लगातार बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीकों ने रोजगार के स्वरूप को तेजी से बदला है। आने वाले वर्षों में केवल पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त नहीं होगी। युवाओं को नई तकनीकों के साथ स्वयं को लगातार अपडेट करना होगा। कौशल विकास आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। यदि किसी युवा के पास व्यावहारिक कौशल है तो उसके लिए रोजगार या स्वरोजगार के अवसर अधिक हो सकते हैं। सरकार और निजी संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रमों का लाभ तभी मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उनकी गुणवत्ता बेहतर हो और उनका सीधा संबंध उद्योगों की जरूरतों से हो। ग्रामीण भारत के युवाओं की स्थिति पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। गांवों में आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल संसाधनों और करियर मार्गदर्शन का अभाव दिखाई देता है। प्रतिभा की कमी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अवसरों की असमानता बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि ग्रामीण युवाओं को समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार भी इस चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज बड़ी संख्या में युवतियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कार्यस्थलों पर उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। सुरक्षित कार्य वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान अवसर और परिवार तथा समाज का सहयोग महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है। स्टार्टअप संस्कृति ने युवाओं के सामने नए अवसर खोले हैं। आज अनेक युवा नौकरी तलाशने के बजाय रोजगार देने वाले उद्यमी बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह सकारात्मक परिवर्तन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए वित्तीय सहायता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच जैसी सुविधाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है। लगातार प्रतियोगिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार की चिंता और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव कई युवाओं को तनाव और अवसाद की ओर धकेल सकता है। इसलिए शिक्षा संस्थानों और कार्यस्थलों पर परामर्श सेवाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना समय की मांग है। भारत यदि वर्ष </span>2047<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा ही होंगे। इसके लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार सृजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगों के साथ बेहतर समन्वय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शी भर्ती प्रणाली और उद्यमिता को प्रोत्साहन जैसे कदमों को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। युवाओं को भी बदलते समय के साथ स्वयं को तैयार करना होगा। केवल एक डिग्री पर निर्भर रहने के बजाय नई तकनीकों को सीखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा और संचार कौशल विकसित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल दक्षता बढ़ाना और आजीवन सीखने की आदत अपनाना आवश्यक है। भविष्य उन्हीं का होगा जो लगातार सीखने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने के लिए तैयार रहेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार और युवा—ये तीनों विषय अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि शिक्षा गुणवत्तापूर्ण होगी तो रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि युवाओं को सम्मानजनक अवसर मिलेंगे तो देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति भी तेज होगी। आज आवश्यकता केवल चर्चा की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ठोस और समयबद्ध फैसलों की है। आने वाले वर्षों में भारत की दिशा और दशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने युवाओं की क्षमता को किस प्रकार पहचानता और उसे अवसरों में बदलता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>आपका शहर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 20:41:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>हिंदी विरोध को बनाना चाहते हैं सत्ता बचाने का हथियार </title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र अगर तमिलनाडु में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149338/want-to-make-hindi-opposition-to-the-weapon-to-save"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><div>देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र अगर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति लागू करता है, तो उसे 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन 2000 करोड़ क्या अगर केंद्र 10000 करोड़ रुपये भी देती है, तो हम नई शिक्षा नीति नहीं लागू करेंगे। राज्य सरकार हिंदी को लागू करने की अनुमति नहीं देगी और तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा करेगी। डीएमके सरकार का दावा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। साथ ही स्टालिन ने आरोप लगाया कि 25 से अधिक उत्तर भारतीय भाषाओं को हिंदी और संस्कृत के प्रभुत्व के कारण नुकसान हुआ है।</div>
<div> </div>
<div>उनका दावा है कि यदि तमिलनाडु तीन-भाषा नीति को स्वीकार कर लेता है, तो तमिल को नजरअंदाज कर दिया जाएगा और भविष्य में संस्कृत का दबदबा रहेगा। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सीएम स्टालिन ने अपने पत्र में कहा कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मैथिली, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी और अवधी जैसी भाषाओं को हिंदी के प्रभुत्व ने खत्म कर दिया है। केंद्र का कहना है कि एनईपी के जरिये किसी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जा रही है। किसी भी राज्य या समुदाय पर कोई भी भाषा थोपने का सवाल ही नहीं उठता।</div>
<div> </div>
<div>एनईपी 2020 भाषायी स्वतंत्रता के सिद्धांत को कायम रखता है और यह सुनिशित करता है कि छात्र अपनी पसंद की भाषा में सीखना जारी रखें। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में वर्ष 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। वे हिंदी को भारतीयों को एकजुट करने वाली भाषा मानते थे।</div>
<div> </div>
<div>तब ही तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हो गया था। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में तमिलनाडु को मद्रास प्रेसिडेंसी कहा जाता था। तब 1937 में सी. राजगोपालाचारी की सरकार ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, तो तमिलनाडु में इसके खिलाफ तीन साल तक आंदोलन चला। फैसला वापस लेने पर आंदोलन तो खत्म हो गया, पर इसने राज्य में हिंदी विरोध के जो बीज बोए थे, वे जब-तब अंकुरित होने लगते हैं। क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें खाद-पानी मुहैया कराती रहती हैं। तमिलनाडु के स्कूलों में 1967 से दो-भाषा फॉर्मूले (तमिल और अंग्रेजी) का पालन किया जा रहा है।</div>
<div> </div>
<div>त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी वहां क्षेत्रीय पार्टियों के लिए आंख की किरकिरी बनी हुई है। शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने के इस नीति के मकसद के बावजूद ये पार्टियां पुराना राग नहीं छोड़ना चाहतीं। द्रमुक की मौजूदा सरकार पर केंद्र की यह चेतावनी भी बेअसर रही कि जब तक तमिलनाडु एनईपी को पूरी तरह लागू नहीं करेगा, उसे समग्र शिक्षा निधि की 2952 करोड़ रुपए की राशि जारी नहीं की जाएगी। तमिलनाडु सरकार हिंदी के पठन-पाठन के दरवाजे इसलिए बंद रखना चाहती है, क्योंकि उसे लगता है कि एक बार दरवाजे खुले तो राजनीति का रंग-रोगन बदल जाएगा।</div>
<div> </div>
<div>नई शिक्षा नीति हिंदी थोपने के बजाय विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त भाषा सीखने का अवसर दे रही है। हकिकत यह है कि नई शिक्षा नीति में हमने क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया है। यह हर क्षेत्रीय भाषा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नई शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा के उपयोग की सिफारिश को लागू किया गया है। इसमें मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा का विकल्प भी दिया गया है। भाषा नीति का मूल आधार त्रिभाषा फार्मूला है, जिसके अनुसार स्कूली विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य रूप से होना चाहिए। इसके साथ ही तमिल, तेलगू, कनड़, फारसी, संस्कृत और शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर दिया गया है।</div>
<div> </div>
<div>शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की वकालत करने वाला तबका जिसमें देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले अंग्रेजी माध्यम के स्कूल भी हैं, शिक्षा नीति के उस प्रावधान का विरोध करता नजर आया, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के लिए पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा में कराने की बात कही गई है। दुनिया भर के शिक्षाविद यह मानते हैं कि बच्चे का सर्वाधिक प्रारंभिक विकास और सौखने की प्रवृत्ति उसी भाषा में बढ़ती है, जो उसके घर में बोली जाने वाली भाषा होती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी मानना था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती, उनके अनुसार 'गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।'</div>
<div> </div>
<div>केंद्र सरकार भी मातृ भाषा को ज्यादा महत्व दे रही है, मगर जिस प्रकार से हिंदी का विरोध किया जा रहा है, वह अनावश्यक है। ये हकीकत है कि तमिलनाडु की राजनीति हिंदी विरोध के आसपास घूमती रहती थी है। ये बहुत ही सस्ता और इंस्टैंट रिफ्रेशिंग पॉलिटिक्स है। मगर, दूसरे समाज की तरह तमिलनाडु के नौजवानों के लिए भाषा से ज्यादा जरूरत रोजी-रोजगार की है। शायद सत्ताधारी पार्टी के पास उसे लेकर कोई मजबूत ब्लूप्रिंट नहीं है। लिहाजा, भावनात्मक मुद्दों के सहारे 2026 का चुनाव साधने की कोशिशों में जुटी है। सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही हम देश की सांस्कृतिक एकता मजबूत कर सकते हैं। हिंदी बोलने वाले लोग देश के हर कोने में मिल जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>कोई राज्य अगर अपनी मातृभाषा को महत्व देता है, तो उसकी भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। मगर किसी राज्य विशेष का नागरिक दूसरे राज्यों में जाता है, तो हिंदी के बिना उसका काम नहीं चलता। भाषाएं तो एक दूसरे से जुड़ कर ही आगे बढ़ती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर चल रही सियासी बयानबाजी के बीच स्टालिन का विरोध नाहक ही है कि हिंदी से उनकी मातृभाषा नष्ट हो सकती है। दरअसल, उन्होंने अपने स्वर तीखे करते हुए साफ कर दिया है कि वे उन्हीं पुराने आंदोलनों के वशंज है, जिसमें हिंदी को लेकर उपेक्षा का गहरा भाव है।</div>
<div> </div>
<div>स्टालिन यह भूल गए हैं कि हिंदी दिलों को जोड़ने की भाषा है। यह आज भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में समझी और बोली जाती है। इसलिए इस मुद्दे पर राजनीति की बजाय गंभीरता से विचार होना जरूरी है। क्योंकि यह मसला राजनीति से बहुत बड़ा है। आखिरकार यहां सवाल हमारे भविष्य का है, हमारी अगली पीढ़ी का है। और सवाल व्यक्तिगत पसंद नापसंद का भी है। बच्चों को भाषा चुनने की आजादी मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे राजनीतिक लोगों को रोटी सेकने के लिए मुद्दे की तलाश रहती है फिर चाहे राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना ही क्यों न हो। लेकिन यह मानसिकता ठीक नहीं है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Mar 2025 15:08:00 +0530</pubDate>
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