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                <title>dahej pratha - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180674/now-this-picture-should-be-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी अपेक्षित सम्मान और अवसरों से काफी दूर दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में सुधार तो हुआ है, किंतु वह इतना व्यापक नहीं है कि समाज को संतोष हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि शिक्षा का प्रसार होगा तो समाज की कुरीतियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ेंगी और बेटी को बोझ नहीं, अवसर माना जाएगा। कुछ क्षेत्रों में प्रगति अवश्य हुई है, किंतु धरातल पर तस्वीर अभी भी अधूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण  के अनुसार देश में 10 वर्ष या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर लगभग 46.4 प्रतिशत तक पहुँचा है, जो पहले 41 प्रतिशत था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सुधार उत्साहजनक है, किंतु इसका अर्थ यह भी है कि आधी से अधिक महिलाएँ अभी भी दस वर्ष की बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।  शिक्षा के क्षेत्र में असमानता का एक कारण बाल विवाह, गरीबी, सामाजिक रूढ़ियाँ तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी हैं। अनेक परिवार आज भी पुत्र की शिक्षा को निवेश और पुत्री की शिक्षा को व्यय मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही सोच आगे चलकर दहेज जैसी कुप्रथा को जन्म देती और इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा और आधुनिकता के दावों के बीच दहेज का दानव आज भी जीवित है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में दहेज निषेध अधिनियम के अंतर्गत 15,489 मामले दर्ज किए गए तथा दहेज से संबंधित घटनाओं में 6,156 महिलाओं की मृत्यु हुई। अर्थात प्रतिदिन लगभग 17 महिलाओं ने दहेज की कीमत अपने जीवन से चुकाई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की व्यापक तस्वीर भी चिंता उत्पन्न करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2023 में देशभर में महिलाओं के विरुद्ध लगभग 4.48 लाख अपराध दर्ज किए गए। इनमें सबसे बड़ी संख्या पति अथवा रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के मामलों की रही, जो कुल अपराधों का लगभग 30 प्रतिशत है। यह स्थिति केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है; यह उन लाखों बेटियों, बहनों और माताओं की पीड़ा का दस्तावेज है जो आज भी भेदभाव, हिंसा और असमानता का सामना कर रही हैं। समाज सुधारिका सावित्रीबाई फुले ने कहा था यदि तुम शिक्षित हो जाओगे तो तुम्हें अपने अधिकारों का ज्ञान होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है कि किसी समाज की प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की प्रगति से किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी कहा था यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित होता है, किंतु यदि आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी स्त्रियों का सम्मान करना नहीं सीखा, वह कभी महान नहीं बन सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि बालिका शिक्षा को सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसरों से जोड़ा जाए। जब तक बेटी को परिवार की उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा, जब तक विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम समझा जाएगा, तब तक दहेज की मानसिकता समाप्त नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि एक ओर हम महिला सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाते हैं, महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, दूसरी ओर कन्या के जन्म पर चिंता और विवाह के समय दहेज की चर्चा अभी भी अनेक घरों में सामान्य बात मानी जाती है। यह दोहरा सामाजिक चरित्र हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की है। विद्यालयों में लैंगिक समानता के संस्कार, परिवारों में बेटियों के प्रति समान व्यवहार, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, दहेज लेने-देने वालों का सामाजिक बहिष्कार तथा पंचायत स्तर तक जनजागरण अभियान ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यदि हम सचमुच विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि बालिका शिक्षा, स्त्री सम्मान और दहेज उन्मूलन केवल महिला मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस दिन हर बेटी निर्भय होकर शिक्षा प्राप्त करेगी, अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकेगी और विवाह दहेज नहीं बल्कि समानता, सम्मान और प्रेम पर आधारित होगा, उसी दिन हम सच्चे अर्थों में आधुनिक, प्रगतिशील और सभ्य समाज कहलाने के अधिकारी होंगे। अब समय की आवश्यकता यह है  कि हम केवल परिवर्तन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि स्वयं परिवर्तन बनें। क्योंकि बेटी का सम्मान ही समाज का सम्मान है, और स्त्री की प्रगति ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:49:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>नुक्कड नाटक के मध्यम से दहेज प्रथा को लेकर किया गया जागरूक </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>पिहानी हरदोई - </strong>राजकीय महाविद्यालय  द्वारा  संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा गोद लिए गए गांव संतरहा में कार्यक्रम अधिकारी डॉ लक्ष्मी नारायण के निर्देशन में चल रहे राष्ट्रीय सेवा योजना के  दिन रात्रि के विशेष शिविर के छठे दिन दिनांक 01/03/2025 में आज प्रातः 6.00 बजे  पुनः योग एवं ध्यान सत्र का आयोजन हुआ जिसमें स्वयंसेवकों को  अनुराग आर्य द्वारा योगाभ्यास और ध्यान  करने का अभ्यास कराया गया।</div>
<div>  </div>
<div>इस अवसर पर  स्वयंसेवकों ने विभिन्न प्रकार के योगासन तथा  साधना के तरीके सीखे । तत्पश्चात   स्वयं सेवकों ने दहेज प्रथा और उसके दुष्प्रभाव के बारे में ग्रामीण लोगों को जागरूक करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149173/aware-of-the-medium-to-dowry-system-of-nukkad-drama%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/unnamed-(4).jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पिहानी हरदोई - </strong>राजकीय महाविद्यालय  द्वारा  संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा गोद लिए गए गांव संतरहा में कार्यक्रम अधिकारी डॉ लक्ष्मी नारायण के निर्देशन में चल रहे राष्ट्रीय सेवा योजना के  दिन रात्रि के विशेष शिविर के छठे दिन दिनांक 01/03/2025 में आज प्रातः 6.00 बजे  पुनः योग एवं ध्यान सत्र का आयोजन हुआ जिसमें स्वयंसेवकों को  अनुराग आर्य द्वारा योगाभ्यास और ध्यान  करने का अभ्यास कराया गया।</div>
<div> </div>
<div>इस अवसर पर  स्वयंसेवकों ने विभिन्न प्रकार के योगासन तथा  साधना के तरीके सीखे । तत्पश्चात   स्वयं सेवकों ने दहेज प्रथा और उसके दुष्प्रभाव के बारे में ग्रामीण लोगों को जागरूक करने के लिए एक नुक्कड़ नाटक खेला  और दहेज के विरोध में नारे लगाए  उसकी उपयोगिता के लिए लोगों को जागरूक किया । जिस के लिए हजारों की संख्या में  ग्रामीण   लोगों ने दहेज न लेने और न देने की शपथ  ली  उसके बाद सभी स्वयंसेवक वापस सामुदायिक भवन पर उपस्थित होकर भोजन किए  शिविर के द्वितीय सत्र मेंमुख्य वक्ता डॉ कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने 'युवाओं में स्मार्टफोन एडिक्शन की समस्या ' विषयक व्याख्यान दिया।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने बताया कि स्मार्टफोन हमारा एक मित्र है लेकीन उसका ज्यादा इस्तमाल हमें स्मार्टफोन एडिक्शन की ओर ले जाता  है, जो हमारी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। कुछ लोगों को इसकी लत लग जाती है, जिसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।  स्मार्टफोन के ज्यादा इस्तेमाल से कई व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं हो सकती हैं। इसके लक्षणों को पहचानना और इस लत पर काबू पाना बेहद जरूरी है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग कोई भी इसके शिकार हो सकते है l</div>
<div> </div>
<div>स्मार्टफोन एडिक्शन से  लोग अपने व्यवहार पर से नियंत्रण खो बैठते हैं और सहनशीलता की भावना भी खो देते हैं। सरल शब्दों में कहें तो इससे  हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ जाती है। मानसिक समस्याओं की बात करें तो फोन के ज्यादा इस्तेमाल से चिंता, अवसाद, अनिद्रा, रिश्तों में तनाव, पढ़ाई में व्यवधान और काम पर प्रदर्शन में कमी आ सकती है।</div>
<div> </div>
<div>स्‍टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्‍टडी के मुताबिक इस वक्‍त दुनिया में 44 फीसदी लोग सोशल मीडिया एडिक्‍शन के शिकार हैं. सोशल मीडिया की बढ़ती लत का सीधा रिश्‍ता वास्‍तविक जिंदगी में बढ़ रहे अकेलेपन और आइसोलेशन से है. इंसानों के बीच रिअल कनेक्‍ट नहीं है और सोशल मीडिया कनेक्‍शन का एक भ्रम पैदा कर रहा है। दरअसल इसके पीछे जिम्मेदार डोपामाइन हार्मोन है। इस हार्मोन के रिलीज होने के बाद खुशी की एक क्षणिक भावना पैदा होती है। यह डोपामाइन रिलीज एक पल या उससे कम समय में होता है। कुल मिलाकर हम इस हार्मोन का असंतुलित उपयोग कर रहे हैं। </div>
<div> </div>
<div>स्मार्टफोन की लत से छुटकारा पाने के कुछ खास टिप्स भी उन्होंने दिए। उन्होंने बताया कि सबसे पहले खुद पर कंट्रोल करना सीखें। स्मार्टफोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक  उपकरणों से खुद को दूर करने की कोशिश करें। आप अपना ज्यादातर समय परिवार या दोस्तों के साथ बिताते हैं तो यह आपको कुछ समय के लिए मोबाइल से दूर रखेगा।</div>
<div> </div>
<div>जरूरत पड़ने पर फोन का इस्तेमाल करें। नहीं तो जितना हो सके फोन का इस्तेमाल करने से बचे</div>
<div>पूरे दिन ऑनलाइन रहने के बजाय काम के लिए जरूरत पड़ने पर ही ऑनलाइन रहेंl</div>
<div>टहलने जाएं या कुछ ऐसा करें जिसमें आपको आनंद  मिले   , डॉ दयाल शरण, अनुराग आर्य एवं कर्मचारी, व  सभी स्वयंसेवक  उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Mar 2025 13:41:07 +0530</pubDate>
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