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                <title>sanatani - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>अर्थतंत्र की ताकत और विज्ञान की भूमिका राष्ट्र के विकास के लिए सर्वोपरि</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में वैश्विक प्रगति और आर्थिक स्रोत तंत्र के लिए आधुनिक तथा वैज्ञानिक शिक्षा जरूर अत्यंत आवश्यक है। हमे केवल आधुनिक विचारधारा शिक्षा पद्धति पर निर्भर न रहकर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और सनातन संस्कृति के धरातल से जुड़ना होगा।  तब जाकर सनातनी सांस्कृतिक,विचारधारा एवं आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति का संतुलन  यथोचित तरीके से हो पाएगा । </div>
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<div style="text-align:justify;">भारत का सांस्कृतिक, सनातनी, वैदिक इतिहास सदैव गौरवपूर्ण रहा है। वेदों पुराणों और सनातनीं संस्कारों में इतनी शक्ति है कि भारतीय संस्कृति अनंत काल तक कभी नष्ट नहीं हो सकती है। भारतीय संस्कृति का लचीलापन एवं व्यापक ग्राह्यता इतनी विशाल है कि इस</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154126/the-strength-of-the-economy-and-the-role-of-science"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में वैश्विक प्रगति और आर्थिक स्रोत तंत्र के लिए आधुनिक तथा वैज्ञानिक शिक्षा जरूर अत्यंत आवश्यक है। हमे केवल आधुनिक विचारधारा शिक्षा पद्धति पर निर्भर न रहकर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और सनातन संस्कृति के धरातल से जुड़ना होगा।  तब जाकर सनातनी सांस्कृतिक,विचारधारा एवं आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति का संतुलन  यथोचित तरीके से हो पाएगा । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का सांस्कृतिक, सनातनी, वैदिक इतिहास सदैव गौरवपूर्ण रहा है। वेदों पुराणों और सनातनीं संस्कारों में इतनी शक्ति है कि भारतीय संस्कृति अनंत काल तक कभी नष्ट नहीं हो सकती है। भारतीय संस्कृति का लचीलापन एवं व्यापक ग्राह्यता इतनी विशाल है कि इस सभ्यता ने कई सभ्यताओं को अपने में समाहित कर एक विशाल धर्मनिरपेक्ष वातावरण तैयार किया है और वट वृक्ष की तरह अपनी शाखाएं वैश्विक स्तर पर प्रचारित, प्रसारित की है। यह वैदिक अध्यात्म योग और संस्कृति का ही प्रतिफल है कि भारत के नागरिक विश्व में चहुंओर निवास कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि भारत को अपनी संस्कृति आध्यात्मिक तथा संस्कारों के आत्म बल के दम पर विश्व का नेतृत्व करना होगा एवं विश्व गुरु बनने की प्रक्रिया में नए नए सोपान निर्मित करने होंगे । प्रारंभ से ही शांति तथा मानवता को लेकर भारत में अपनी विकास यात्रा प्रारंभ की है आध्यात्मिक चिंतन और सनातनी इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत विश्व शांति की बहाली के लिए विश्व को मार्गदर्शन देने का हौसला तथा क्षमता दोनों रखता है। अब यह समय आ चुका है कि भारत को विश्व का मार्गदर्शी प्रणेता बन जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिंदगी का कैनवास जन्म से लेकर मृत्यु तक समुद्र की तरह विराट और गहराई लिए हुए होता है। जीवन में वयक्तिक, पारिवारिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विकास की संभावनाओं के साथ मनुष्य अपना जीवन प्रारंभ कर विकास तथा ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। बशर्ते उसके व्यक्तित्व में जीवन के प्रति जीजिविषा, संघर्ष करने की क्षमता, आत्म विश्वासके घटक मौजूद हों। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐतिहासिक तौर पर भारतीय विकास  की सांस्कृतिक संरचना एवं संस्कार के मूलभूत तत्वों को लेकर दुनिया में अभूतपूर्व रही है। वैसे भी भारतवर्ष सभ्यता से लेकर संस्कृति के मामले में वैभवशाली इतिहास को समेटे हुए हैं। विकास और प्रगति के सोपान को एक दिन,वर्ष या दशक में रेखांकित नहीं किया जा सकता, यह एक निरंतर, सतत एवं समय के साथ चलने वाली क्रिया की प्रतिक्रिया है। प्रकृति सभ्यता तथा मानव जीवन में परिवर्तन एक अकाट्य सत्य और शाश्वत अभिक्रिया है। व्यक्ति के जीवन तथा समाज या देश में विकास के संदर्भ में एवं घटकों को प्रारंभ से आदमी का धन उपार्जन, गरीबी भुखमरी से लड़ाई भूतकाल की कुरीतियों की विडंबना से संघर्ष का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">किसी भी राष्ट्र के राजा, सम्राट या राष्ट्र प्रमुख की अपनी क्षमता ,शक्ति, ऊर्जा और उसके विवेक से उस राष्ट्र की प्रगति विशाल या न्यूनतम होती देखी गई है। भूतकाल में कई संघर्षशील एवं उत्साह से लबरेज यात्रियों के वृतांत हमारी नजरों में आए हैं यथा कोलंबस और वास्कोडिगामा जैसे अत्यंत ऊर्जावान संघर्षशील और साहसिक यात्रियों द्वारा लगभग नामुमकिन रास्तों की खोज कर एक मिसाल कायम की है। नेपोलियन का एक बड़ा सूत्र वाक्य था कुछ भी असंभव नहीं है। बिस्मार्क जर्मनी के एक ऐसे सम्राट रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है की उनके हाथों में दो गेंद तथा 3 गेंदें हवा में होती थी, यूरोप का जादूगर भी कहलाता था, पूर्व से ही समुद्रगुप्त ,कनिष्क, सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, शेरशाह सूरी जैसे शासकों का अदम्य आत्मविश्वास एवं संघर्ष करने की क्षमता के फल स्वरुप भी भारत आज इस स्वरूप में विद्यमान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी किसी भी राष्ट्र में सदैव विकास वैभव और आर्थिक तंत्र को मजबूत करने की संभावनाएं अवस्थित रहती हैं। भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए भारत में गरीबी, भुखमरी ,बाढ़ तथा अन्य विभीषिका सदैव आती जाती रहती हैं। विशाल जनसंख्या के होने के कारण भारत में ही भारत की बड़ी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है और केवल भारत के कुछ नागरिकों को ही सारी जीवन की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, बाकी लोग इन सुविधाओं से वंचित भी हैं। हमारा देश स्वतंत्रता के बाद से ही आवाज की कमी भूख गरीबी भ्रष्टाचार काला धन हवाला कुपोषण बेरोजगारी की बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद ऐतिहासिक तौर पर देश सांस्कृतिक वैचारिक और संस्कारी ग्रुप से सदैव समृद्ध रहा है और धार्मिक रूप से भी देश में ज्ञान की जड़े बहुत गहराई तक हैं। भारत को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करने के लिए वेद, पुराण, उपनिषद, गीता ,रामायण ,महाभारत महा ग्रंथों की पृष्ठभूमि बड़ी ही शक्तिशाली है। भारत में अनेक विदेशी आक्रमणों को झेल कर उन्हें आत्मसात किया है किंतु हमारी संस्कृत पाली एवं प्राकृत भाषा अन्य भाषाओं के साथ आज भी समृद्ध है। भारत में अनेक भाषा क्षेत्र एवं बोलियां हैं किंतु हिंदी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, मराठी ,असमिया भाषाएं उसी तरह पल्लवित पुष्पित हो रही हैं जैसे की संस्कृत और प्राकृत पाली भाषा होती रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के नागरिकों की भौतिकवादी सुविधा के लिए भी हमने वतानुकुलित यंत्र ,वायुयान तेज चलने वाली ट्रेनें और वायुमंडल में अनेक ऐसे तथ्यों को जो आज तक छुपे हुए थे उजागर कर अपने महत्व के लिए इसका उपयोग करना शुरू किया है। यह कहावत आशाओं पर आकाश टिका हुआ है और आकाश का कोई अंत नहीं यानी मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है मनुष्य पर सही प्रतीत होती है।इसी तरह प्रगति और विकास का भी कोई अंत या अनंत नहीं है। भारत देश में वैश्विक स्तर पर राजनैतिक सामाजिक वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर काफी प्रगति की एवं विश्व में योग अध्यात्म दर्शन का लोहा भी मनवाया है। मनुष्य की अभिलाषा का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है, मनुष्य मूल रूप से अत्यंत महत्वकांक्षी,लोलुप एवं इच्छाओं का दास हुआ करता ह।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 17:23:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]></dc:creator>
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                <title>सनातनी होना गौरव-गर्व की बात।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>वेद तथा सनातनी ग्रंथों से मानव जीवन परिष्कृत होता है और सदाचार तथा वैदिक धर्म का ज्ञान मानव धर्मार्थ की खोज में एक यज्ञ की तरह हैl भारतीय ऋग्वेद, अथर्ववेद और अनेक वेदों में इतनी शक्ति ऊर्जा और अर्थ छुपा हुआ है कि उसका अध्ययन मनन और चिंतन करने से भारत विश्व गुरु बनने की क्षमता रखता है। भारत की योग विद्या पूरे विश्व में अमेरिका सहित यूरोप में अपनाई गई है। यह अलग बात है कि कुछ देशों के प्रशासको द्वारा अपनी सनक एवं विस्तार वादी मानसिकता के कारण यूक्रेन में युद्ध की स्थिति बन कर पूरे विश्व में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149027/being-eternal-is-a-matter-of-pride"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(2)5.jpg" alt=""></a><br /><div>वेद तथा सनातनी ग्रंथों से मानव जीवन परिष्कृत होता है और सदाचार तथा वैदिक धर्म का ज्ञान मानव धर्मार्थ की खोज में एक यज्ञ की तरह हैl भारतीय ऋग्वेद, अथर्ववेद और अनेक वेदों में इतनी शक्ति ऊर्जा और अर्थ छुपा हुआ है कि उसका अध्ययन मनन और चिंतन करने से भारत विश्व गुरु बनने की क्षमता रखता है। भारत की योग विद्या पूरे विश्व में अमेरिका सहित यूरोप में अपनाई गई है। यह अलग बात है कि कुछ देशों के प्रशासको द्वारा अपनी सनक एवं विस्तार वादी मानसिकता के कारण यूक्रेन में युद्ध की स्थिति बन कर पूरे विश्व में वैश्विक युद्ध की संभावनाएं बन गई हैं।</div>
<div> </div>
<div>इसका हल मी भारतीय संस्कृति संस्कारों में छुपा हुआ है उसे बस अपनाने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति आज महावीर तथा बुध के पूरे विश्व में करोड़ों अनुयाई हैं, और दोनों ने श्रम तथा सार्थकता को जीवन में अपनाने को ही महत्व दिया था। सफलता उनके लिए मिथ्या के बराबर ही थीl गुरु नानक देव द्वारा प्रतिपादित सरबत दा भला, हो या महात्मा गांधी का सर्वोदय, ईसा मसीह की करुणा, मोहम्मद साहब, टैगोर का मानवतावाद या नेहरू का अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद जीवन के श्रम तथा सार्थकता की खोज में बड़े महत्वपूर्ण उदाहरण हैl</div>
<div> </div>
<div>व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर देखा जाए तो महज रोजगार की तलाश विवाह संतानोत्पत्ति,बच्चों का भरण पोषण तथा सेवानिवृत्ति ही जीवन नहीं है। इसमें सामुदायिक श्रम और सार्थकता का समावेश होना समीचीन हैl हालांकि इस बात में कोई दो मत नहीं कि पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वहन समाजिक मूलभूत आवश्यकता हैl पर इसके साथ साथ कुछ ऐसा सार्थक श्रम किया जाना चाहिए जो न केवल आत्मिक संतोष का अनुभव प्रदान करें, बल्कि सामाजिक हित और वैश्विक शांति में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दें, और समाज को दिशा देने वाली कोई परिणति समाज के सम्मुख प्रकट होl</div>
<div> </div>
<div>जिससे समाज के लोगों का जीवन परिष्कृत होl इसी संदर्भ में राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, सर सैयद अहमद खान,दयानंद सरस्वती, विवेकानंद ने हमेशा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाकर जीवन में श्रम तथा सार्थकता का महत्व बढ़ाकर सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया था।</div>
<div> </div>
<div>यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि जीवन की असली खोज श्रम सार्थकता की उपलब्धि ना होती और तथाकथित सफलता के शिखर पर व्यक्ति बैठ जाता है और शांत हो जाता,तो सफलता के शिखर पर बैठे बिलगेट, वारेन बुफेट जैसे लोग अपनी अकूत संपत्ति का बड़ा भाग सामाजिक उद्देश्य के लिए दान नहीं करते। सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन चलाकर जल तथा पर्यावरण संरक्षण की बात नहीं करते। कैलाश सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से बाल संरक्षण के अधिकारों का झंडा बुलंद नहीं कर पाते। थॉमस अल्वा एडिसन, आइंस्टीन,मैडम क्यूरी और राइट बंधुओं के श्रम और सार्थकता के प्रयास में ही सफलता का परचम फैलाया है। पर इन सब के पीछे उनकी असाध्य मेहनत और दिमागी सार्थकता ही मुख्य कारक बन कर उन्हें उत्प्रेरित करती रहे है।</div>
<div> </div>
<div>पर दूसरी तरफ यह भी सत्य है कि जीवन में सार्थकता की खोज सफलता के अभाव में संभव नहीं है। क्योंकि श्रम और सार्थकता का महत्व तभी तक है जब तक वह सफल ना हो,परंतु सफलता ही मनुष्य की अंतिम परिणति नहीं होनी चाहिए। अन्यथा जीवन में मानवीय मूल्यों का महत्व नगण्य में होने की संभावना बनी रहती है। अतः श्रम मेहनत और सार्थकता समेकित रूप से मिलकर एक बड़ी सफलता को जन्म देते हैं। श्रम तथा सार्थकता तभी प्राप्त होती है, जब सफलता का आधार प्राप्त हो जाए।</div>
<div> </div>
<div>पर मूलत सफल होना ही पर्याप्त नहीं है। और जीवन की असली खोज निरंतर श्रम तथा सार्थकता है। केवल सफलता आपको अस्थाई तथा तत्कालिक मानसिक शारीरिक सुख प्रदान कर सकती है। पर चिरस्थाई तथा आत्मिक संतोष के लिए उसमें श्रम तथा सार्थकता का समावेश होना अत्यंत आवश्यक होता है। अगर वह समाज के लिए एक आदर्श तथा उपयोगी मार्गदर्शक बन सकता है। इसलिए जीवन में केवल सफलता के पीछे ना जाकर श्रम, मेहनत और सार्थकता अत्यंत आवश्यक पहलू हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Feb 2025 16:48:54 +0530</pubDate>
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