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                <title>political parties - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>political parties RSS Feed</description>
                
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                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जन-गण-मन, अधिनायक जय हे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>हमारे राष्ट्रगान की उक्त पंक्तियों को मैं कभी नहीं भूलता,क्योंकि इसमें भारतीय जनतंत्र की  ,भारतीय गणतंत्र ,की और भारतीय मानसिकता की   जय के साथ-साथ उस अधिनायक की भी जय बोली गयी है जो अदृश्य है। भारतीय जनतंत्र और गणतंत्र के बीच छिपकर बैठा ये अधिकानायक हमेशा बहुमत के रूप में   हमारे सामने प्रकट होता रहता है ।  इसका चेहरा कभी स्त्री  का होता है तो कभी पुरुष का और कभी अर्धनारीश्वर  का। अधिनायक  की पहचान अक्सर संसद में किसी विधेयक पर मत विभाजन के समय होती है ।  वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2024  पर मत विभाजन के समय भी ये</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150739/jan-gan-man-adhinayak-jaya-hey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/images.jpg" alt=""></a><br /><p>हमारे राष्ट्रगान की उक्त पंक्तियों को मैं कभी नहीं भूलता,क्योंकि इसमें भारतीय जनतंत्र की  ,भारतीय गणतंत्र ,की और भारतीय मानसिकता की   जय के साथ-साथ उस अधिनायक की भी जय बोली गयी है जो अदृश्य है। भारतीय जनतंत्र और गणतंत्र के बीच छिपकर बैठा ये अधिकानायक हमेशा बहुमत के रूप में   हमारे सामने प्रकट होता रहता है ।  इसका चेहरा कभी स्त्री  का होता है तो कभी पुरुष का और कभी अर्धनारीश्वर  का। अधिनायक  की पहचान अक्सर संसद में किसी विधेयक पर मत विभाजन के समय होती है ।  वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2024  पर मत विभाजन के समय भी ये अधिनायकत्व खुलकर सामने आया है।</p>
<p>वक्फ बोर्ड  की सम्पत्तियों पर मौजूदा सरकार की नजर शुरू से थी लेकिन उसे कोई मौक़ा नहीं मिल रहा था,किन्तु हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में मिली जीत ने बैशाखी सरकार को इतना हौसला दिया कि वो मुसलमानों की टोपी जमकर उछाले। सरकार ने ऐसा किया भी। वक्फ बोर्ड क़ानून में संशोधन कर अपने लिए बोर्ड में घुसपैठ करने की गुंजायश निकाल ही li।  पूरा विपक्ष मिलकर भी इसे रोक नहीं पाया। रोक भी नहीं सकता था क्योंकि संख्या बल उसके पास नहीं था। अब ये विधेयक राजयसभा में  भी आसानी से पारित होने के बाद क़ानून का रूप ले लेगा। अब विपक्ष इसे न कानून बनने से रोक सकता है और  न इस पर अमल करने से।</p>
<p>लोकसभा में इस विवादास्पद विधेयक पर पूरे 12  घंटे बहस चली ।  मुमकिन है कि आप में से बहुत कुछ ने ये पूरी बहस देखी हो ,लेकिन मैंने इसे पूरा देखा,सुना। इसलिए मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सत्ता के लालच में टीडीपी और जेडीयू जैसे कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने जहां अपना दीन-ईमान बेच दिया वहीं उद्धव ठाकरे की शिव सेना और तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे लोग बिना लाभ-हानि की फ़िक्र किये विधेयक के विरोध में डटे रहे।अब पूरी मोदी सेना विपक्षी सांसदों को काफिर ठहराने पर   लगी है। यानी मुसलमानों का समर्थन करना काफिर होना है और विरोध करना सनातनी होना है।</p>
<p>भारत की आजादी के पहले के और बाद के इतिहास में किसी एक बिरादरी के साथ इस तरह के दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव कभी नहीं हुआ। मुगलों के जमाने में तो ऐसे बर्ताव का सवाल ही नहीं उठता लेकिन अंग्रेजों ने भी ये जुर्रत नहीं की जो आज की जा रही है। सरकार  की रीती,नीति और कार्यक्रम न जाने क्यों अचानक मुसलमान विरोधी हो गए हैं। सरकार अपने कार्यक्रमों और नीतियों के जरिये मुसलमानों को मुसलमान बना देने पर आमादा है। लेकिन ऐसा होगा नहीं।  सरकार के मुस्लिम विरोधी रवैये से मुसलमान  को अपने शुभचिंतक चुनने में पहले के मुकाबले ज्यादा आसानी होगी।</p>
<p>अभी तक राजनीतिक   दलों पर मुसलमानो को तुष्ट करने का आरोप लगता था किन्तु अब मुसलमानों के हाथ में ये मौक़ा आया है की वे अपनी पसंद के राजनीतिक दलों को तुष्ट और पुष्ट करें। मुसलमान  किस दल के साथ रहना चाहते हैं ये तय करने वाले हम और आप कोई नहीं हैं किन्तु हम लोकतंत्र में अधिनायक की पहचान में सबकी मदद कर सकते है।  मुसलमानों की भी और हिन्दुओं की भी। आज से पचास साल पहले हम और इशाक भाई एक साथ एक क्लास में पढ़ते थे,खाते थे,खेलते थे । हमारी माँ और फ़रीदा बेगम में बहुत फर्क नहीं था । दोनों के आंचल की छांव एक जैसी थी ,लेकिन अब सब बदल चुका है।  न इशाक  हमारे साथ और  न फ़रीदा बेगम। सियासत ने सभी को पराया बना दिया है। कोई डर की वजह से पराया हुआ है तो कोई सियासत की वजह से ।</p>
<p>संख्या बल के चलते वक्फ बोर्ड विधेयक राजयसभा में भी आसानी से पारित  होगा,इसलिए वहां इस विधेयक पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। बहुमत के बूटों से अक्लियत का कुचला जाना अकलियत के लोगों की नियति बन चुकी है। फिर भी उम्मीद है कि बी भारत में जैसे हिलमिलकर हम सब  रहते थे वैसे ही आगे भी रहेंगे। नहीं रहेंगे तो सब बर्बाद हो जायेंगे। हमारा भी वही हाल होगा जो किसी जमाने में महाराणा प्रताप का हुआ,छत्रपति शिवाजी का हुआ। छत्तरसाल का हुआ,लक्ष्मीबाई का हुआ। बंटा हुआ समाज कभी देश की ताकत नहीं हो सकता। बंधी हुई मुठ्ठी ही लाख की होती है, खुल गयी तो ये मुठ्ठी ख़ाक की हो जाती है।</p>
<p>मैं न काफिर हूँ  और न मुसलमान ,लेकिन मैं भी उसी तरह सनातनी भारतीय हूँ जिस तरह इस देश के सनातनी मुसलमान हैं। उनका भाग्य बैशाखी लगाकर सरकार चलने वाले तय नहीं कर सकते। किन्तु दुर्भाग्य है कि वे ऐसा कर रहे हैं।</p>
<p>ऐसे मौकों पर मुझे ' मेरे महबूब 'फिल्म का वो  गीत  अक्सर याद आता है जिसे शकील बदायूनी ने लिखा था। -कोई देखे या न देखे ,अल्ला देख  रहा है। ' हमारी सरकार अल्लाह की सरकार नहीं है । वो राममजी की सरकार है इसलिए अल्लाह से डरती नहीं है ।  उसके लिए ईश्वर,अल्लाह तेरो ही नाम नहीं है। वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक से हमारा कुछ बनना और बिगड़ना  नहीं है ।  जिनका बनना और बिगड़ना है ,उन्हें तय करना है कि वे इस मसले पर कैसे अपनी प्रतिक्रिया दें। उनके सामने दोनों विकल्प हैं। वे चाहें तो सरकार के सामने घुटने टेकेन और न चाहें तो सरकार को घुटे टेकने पर विवश करें।</p>
<p> </p>
<p>सरकार को न अदालत रोक सकती है और न अल्ला।  सरकार को केवल और केवल वोट रोक सकता है। जो वोट की ताकत नहीं जानते,वे कुछ नहीं जानते। इस देश में रामजी कि सरकार कभी हिन्दू मंदिरों के न्यासों के घपलों के बारे में कभी गंभीर नहीं हो सकती । कभी ये नहीं कहने वाली कि सौ साल पहले हिन्दू मंदिरों की आय कितनी थी और आज कितनी है ।  सौ साल पहले हिन्दू मंदिरों कि सम्पत्ति कितनी थी और   आज कितनी है ?ये सरकार कभी ये देखना और जानना या रोकना पसंद नहीं करेगी कि हिन्दू मंदिरों के ट्रस्टों कि आड़ में देश के राजे-महाराजाओं ने अपनी कितनी सम्पत्ति कराधान से बचा रखी है ? अकेले ग्वालियर में एक ही राज परिवार के 19  ट्रस्ट इसी तरह से करचोरी के धंधे में  लगे हैं। हरि अनंत ,हरि कथा अनंता ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Apr 2025 16:00:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कैबिनेट मंत्री संजय निषाद का बड़ा बयान: &quot;मुसलमान हमारे भाई, उनकी दशा एससी-एसटी से भी खराब&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>शाहगंज (जौनपुर) –</strong> उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद अपने विवादित बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं। गुरुवार को जौनपुर जिले के शाहगंज में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कई बड़े बयान दिए।</div>
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<div>उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दलों ने निषादों और पिछड़े समाज को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन समुदायों को सम्मान दिया है। उन्होंने आगे कहा कि निषाद समाज इस समर्थन के लिए भाजपा नेतृत्व का आभारी है।</div>
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<div><strong>"रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो निषाद</strong></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150209/cabinet-minister-sanjay-nishads-big-statement-%22muslim-our-brother-worse"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/unnamed-(1)6.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>शाहगंज (जौनपुर) –</strong> उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद अपने विवादित बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं। गुरुवार को जौनपुर जिले के शाहगंज में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कई बड़े बयान दिए।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दलों ने निषादों और पिछड़े समाज को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन समुदायों को सम्मान दिया है। उन्होंने आगे कहा कि निषाद समाज इस समर्थन के लिए भाजपा नेतृत्व का आभारी है।</div>
<div> </div>
<div><strong>"रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो निषाद समाज करेगा विरोध"</strong></div>
<div> </div>
<div>संजय निषाद ने अपने पुराने विवादित बयान को दोहराते हुए कहा कि अगर कानून के रखवाले ही अत्याचार करेंगे, तो निषाद समाज उनका विरोध करेगा।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा, "मैं आज भी अपने बयान पर कायम हूं। अगर कोई दरोगा या पुलिसकर्मी अन्याय करेगा, तो निषाद समाज उसका हाथ-पैर तोड़ देगा। रक्षक अगर भक्षक बन जाएगा, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा।"</div>
<div> </div>
<div>उनका यह बयान कानून-व्यवस्था को लेकर उनकी कट्टर सोच को दर्शाता है, जिससे एक बार फिर राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ सकती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>"मुसलमानों की दशा एससी-एसटी से भी बदतर"</strong></div>
<div> </div>
<div>मुसलमानों की सामाजिक स्थिति पर बोलते हुए संजय निषाद ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि देश में मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से भी खराब है।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा, "मुसलमान, विशेष रूप से जुलाहा समाज, हमारे भाई हैं। लेकिन सपा, कांग्रेस और बसपा ने कभी इन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। ये पार्टियां सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करती रहीं और मुसलमानों को उनके अधिकारों से वंचित रखा।"</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने आगे कहा कि उनकी पार्टी चाहती है कि सभी मुसलमान आर्थिक और शैक्षिक रूप से आगे बढ़ें, उच्च शिक्षा प्राप्त करें, डॉक्टर-इंजीनियर बनें और समाज में सम्मानजनक स्थान हासिल करें।</div>
<div> </div>
<div><strong>"निषाद समाज का सिपाही हूं, राजनीति में आगे क्या होगा, समय बताएगा"</strong></div>
<div> </div>
<div>जब संजय निषाद से यह पूछा गया कि क्या वह भविष्य में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं या केंद्र की राजनीति में कदम रखेंगे, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,</div>
<div> </div>
<div>"मैं निषाद समाज का सिपाही हूं। मेरा उद्देश्य समाज की भलाई के लिए काम करना है। आगे क्या होगा, यह समय बताएगा।"</div>
<div> </div>
<div>उनके इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर अभी खुलकर कुछ नहीं कहना चाहते, लेकिन भविष्य में बड़ी भूमिका की ओर इशारा कर रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>क्या होगा संजय निषाद के इस बयान का असर?</strong></div>
<div> </div>
<div>संजय निषाद के ये बयान एक ओर जहां पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समाज को साधने की कोशिश माने जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके 'हाथ-पैर तोड़ने' वाले बयान से विवाद खड़ा हो सकता है।</div>
<div> </div>
<div>उनकी बयानबाजी से राजनीतिक माहौल गरमाने की संभावना है और विपक्षी दल इसे भाजपा सरकार की 'जंगलराज' वाली राजनीति से जोड़ सकते हैं। अब देखना यह होगा कि उनके इन बयानों पर सरकार और विपक्ष की क्या प्रतिक्रिया आती है।</div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Mar 2025 14:19:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मप्र नौकरशाही के भगवाकरण का श्रीगणेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149985/shri-ganesh-of-saffronisation-of-mp-bureaucracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/bhgwakarn.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव में ऐसे दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिले ,इसलिए मै चौंका भी और मुझे कुछ अटपटा भी लगा।सवाल ये है कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होने का संवैधानिक अधिकार है ? या लोकसेवकों की कोई आचार संहिता भी है जो उन्हें राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शामिल होने से रोकती भी है।  सवाल ये नहीं है कि  प्रशासनिक अधिकारी सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में शामिल हुए,सवाल ये है कि  क्या ऐसा कर उन्होंने कोई नजीर पैदा की है ? सवाल ये भी है कि  लोकसेवकों के इस आचारण का आम जनता पर,और प्रशासनिक कामकाज पर भी कोई असर पडेगा या नहीं ?</p>
<p>जहाँ तक मेरा ज्ञान है कि  लोक सेवा अधिनियम, 2007 (संशोधन, 2009) में जिन नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है, उन्हें नीति संहिता माना जा सकता है।इस नीति संहिता के मुताबिक लोकसेवक को संविधान की प्रस्तावना में आदर्शों के प्रति निष्ठा रखना।तटस्थता, निष्पक्षता बनाए रखना।</p>
<p>किसी राजनीतिक दल के प्रति सार्वजनिक निष्ठा न रखना। यदि किसी दल से लगाव हो तो भी अपने कार्यों पर प्रभाव न पड़ने देना।देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए वंचित समूहों (लिंग, जाति, वर्ग या अन्य कारणों से) के प्रति करुणा का भाव रखते हुए  निर्णयन प्रक्रिया में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता के साथ-साथ उच्चतम सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए।</p>
<p>मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत से लोकसेवक रहे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाएं थीं लेकिन वे कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। एक आईपीएस थे अयोध्यानाथ पाठक ,वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अंधभक्त थे ।  उन्होंने 1983  में महाराज बाड़ा पर एक संगठन की आमसभा में आरएसएस के खिलाफ खुलकर भाषण दिए थे। उनकी इस कार्रवाई पर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था और पाठक जी को सफाई देना पड़ी थी।पाठक जी प्रदेश कि पुलिस महानिदेशक बनर सेवनिवृर्त  हुए लेकिन किसी दल में शामिल नहीं हो पाए।  </p>
<p>एक आईएएस अफसर थे एसके मिश्रा वे बुधनी उपचुनाव के समय  भाजपा की एक चुनाव सभा में कलेक्टर की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने घुटनों के बल बैठे देखे गए तो उनके खिलाफ फौरन कार्रवाई की गयी। एक थीं शशि कर्णावत वे तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगे-पीछे घूमती ही नहीं थीं बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में भी कांग्रेस की बात करतीं थीं,आज उनका आता-पता नहीं है।<br />ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय भी इसी तरह राजनीतिक निष्ठाओं से बंधे लोकसेवक के रूप में चिन्हित किये गए हैं।</p>
<p>इन दोनों के समाने विकल्प था कि  ये दोनों भाजपा के होली मिलन समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते थे ,लेकिन इन दोनों ने ऐसानहीं किया। क्योंकि इन्हें लगा कि  वे कुछ गलत नहीं कर रहे है।  एक तरह से ये गलत है भी नहीं।  किन्तु एक लोकसेवक के नाते इन दोनों का आचरण सवालों के घेरे में तो आता ही है।  मुमकिन है कि  इन दोनों ने सोचा हो की जब केंद्र सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने की छूट दे दी है तो फिर भाजपा के कार्यकक्रमों में शामिल होने से क्या हर्ज है ?</p>
<p>मुझे लगता है कि  भाजपा की प्रदेश सरकार ग्वालियर के इन दोनों दुस्साहसी लिकसेवकों के आचरण के लिए इन्हें दण्डित करने के बजाय पुरस्कृत करेगी। इन दोनों ने पूरे प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक नजीर पेश की है। अब मुमकिन है कि  हर जिले में आपको प्रशासनिक अफसर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में भगवा दुपट्टा डाले नजर आने लगें। शैक्षणिक संस्थानों में तो भवकरण अब पुरानी बात हो गयी है ,केवल एक प्रशासन इससे बचा था जो इस होली पर खुद भगवा हो गया।</p>
<p>वर्तमान समय में सिविल सेवकों के लिए आचार मानकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-309 के तह्ठत सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स में उल्लिख़ित आचरण नियमों के आधार पर किया जाता है। इस पर एक कानून की आवश्यकता को समझकर ही भारत सरकार द्वारा सिविल सर्विस स्टैंडर्ड्स, परफॉरमेन्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल,2010 को लाया गया, जिसमें सिविल सेवकों को बहुआयामी ढंग से कार्यकुशल बनाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।लेकिन अब ये तमाम प्रावधान मुझे निरर्थक होते दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p>मै ग्वालियर जिले  की कलेक्टर और ग्वालियर नगर निगम के आयुक्त को बधाई तो नहीं दूंगा किन्तु उनके दुस्साहस को सलाम जरूर करूंगा ।  मुझे प्रतीक्षा रहेगी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन के भावी व्यवहार और निर्णय की किए  वे अपने मातहतों के भगवाकरण को लेकर संज्ञान लेते हैं या इसकी अनदेखी करते हैं ? वैसे मुख्य सचिव को अभी तक तो किसी ने मैदान में विचरते देखा नहीं है।</p>
<p>मेरा अनुभव है कि  तमाम लोकसेवकों के मन में एक अतृप्त कामना होती है नेतागिरी करने की ।  वे अनपढ़ नेताओं के सामने जब अपने  आपको निरीह अवस्था में पाते हैं ,तब उन्हें लगता है कि  क्या ही अच्छा होकि वे खुद राजनीती में आ जाएँ।  जो दुस्साहसी हैं वे नौकरी छोड़कर राजनीती में आ ही जाते हैं और जो संकोची हैं वे सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं।  मप्र के एक पूर्व मंत्री पटवारी थे,नौकरी छोड़कर राजनीति में आये थे ।</p>
<p> डॉ भगीरथ प्रसाद ,सरदार सिंह डंगस  जैसे अनेक आईएएस अफसरों ने बाद में राजनीति की ही शरण ली ही और विधानसभाओं तथा संसद तक में पहुंचे। श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय ने भी सरकार के सामने अपनी रूचि का प्रदर्शन कर दिया है। अब आपको ,सबको इंतजार करना पड़ेगा इन दोनों को राजनेता के रूप में ढलते देखने का।  हमारी शुभकामनायें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 13:19:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रक्रियाओं को और मजबूती के लिए राजनीतिक दलों के   नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong> प्रयागराज। </strong>निर्वाचन आयोग ने कानूनी ढांचे के भीतर चुनावी प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों के अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया।</div>
<div>  </div>
<div>भारत निर्वाचन आयोग ने सभी राष्ट्रीय और राज्यीय राजनीतिक दलों से 30 अप्रैल, 2025 तक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ), जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) या मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (सीईओ), जैसा भी मामला हो, के स्तर पर किसी भी अनसुलझे मुद्दे के लिए सुझाव आमंत्रित किए हैं। आज राजनीतिक दलों को जारी एक व्यक्तिगत पत्र में, आयोग स्थापित कानून के अनुसार चुनावी प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए आपसी सहमति से निर्धारित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149806/election-commission-invited-leaders-of-political-parties-to-negotiate-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/img-20250311-wa0103.jpg" alt=""></a><br /><div><strong> प्रयागराज। </strong>निर्वाचन आयोग ने कानूनी ढांचे के भीतर चुनावी प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों के अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया।</div>
<div> </div>
<div>भारत निर्वाचन आयोग ने सभी राष्ट्रीय और राज्यीय राजनीतिक दलों से 30 अप्रैल, 2025 तक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ), जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) या मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (सीईओ), जैसा भी मामला हो, के स्तर पर किसी भी अनसुलझे मुद्दे के लिए सुझाव आमंत्रित किए हैं। आज राजनीतिक दलों को जारी एक व्यक्तिगत पत्र में, आयोग स्थापित कानून के अनुसार चुनावी प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए आपसी सहमति से निर्धारित सुविधाजनक समय पर राजनीतिक दलों के अध्यक्षों और वरिष्ठ सदस्यों के साथ बातचीत करने पर भी विचार कर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>इससे पहले, पिछले सप्ताह हुए सम्मेलन के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक् ज्ञानेश कुमार ने सभी राज्यों/संघ राज्य-क्षेत्रों के सीईओ, डीईओ और ईआरओ को राजनीतिक दलों के साथ नियमित बातचीत करने, ऐसी बैठकों में प्राप्त सुझावों को पहले से मौजूद कानूनी ढांचे के भीतर ही समाधान करने और आयोग को कार्रवाई रिपोर्ट 31 मार्च, 2025 तक प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। आयोग ने राजनीतिक दलों से विकेंद्रीकृत रूप से संबद्ध रखने के इस तंत्र का सक्रिय रूप से उपयोग करने का भी आग्रह किया।</div>
<div> </div>
<div>राजनीतिक दल संविधान और चुनावी प्रक्रियाओं के सभी पहलुओं को कवर करने वाले सांविधिक ढांचे के अनुसार आयोग द्वारा पहचाने गए 28 हितधारकों में से एक प्रमुख हितधारक हैं। आयोग ने राजनीतिक दलों को लिखे अपने पत्र में इस बात पर भी ध्यान दिलाया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और 1951; निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960; निर्वाचनों का संचालन नियम, 1961; माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों और आयोग द्वारा समय-समय पर जारी अनुदेशों, मैनुअलों और हैंडबुकों (आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध) से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक विकेंद्रीकृत, सुदृढ़ और पारदर्शी कानूनी ढांचे का निर्माण हुआ है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/149806/election-commission-invited-leaders-of-political-parties-to-negotiate-to</link>
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                <pubDate>Wed, 12 Mar 2025 13:00:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सन्यास लेने से क्यों डरते हैं हमारे नेता ?</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="aju">
<div class="aCi">  </div>
</div>
<div class="gs">
<div>
<div class="aHl">ऑस्ट्रेलिया के धाकड़ बल्लेबाज स्टीव स्मिथ ने वनडे क्रिकेट से संन्यास लेकर सभी को चौंका दिया। दुनिया के तमाम क्रिकेटर स्मिथ की तरह ही क्रिकेट से एक तय समय के बाद खुद सन्यास लेने का सार्वजनिक ऐलान करते हैं ,लेकिन दुनिया में खासतौर पर  भारत में ऐसे बहुत कम नेता हैं जो स्वेच्छा से राजनीति से सन्यास लेने का ऐलान करते हों। भारतीय परम्परा  में तो सन्यास जीवन  की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है। सन्यास की सनातन  परम्परा सामंतकाल में भी थी लेकिन लोकतंत्र में इसका परित्याग कार दिया। अकेली राजनीति ऐसी है जिसमें  आश्रम व्यवस्था लागू नहीं होती । यानि न</div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149536/why-are-our-leaders-afraid-to-retire"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download.png" alt=""></a><br /><div class="aju">
<div class="aCi"> </div>
</div>
<div class="gs">
<div>
<div class="aHl">ऑस्ट्रेलिया के धाकड़ बल्लेबाज स्टीव स्मिथ ने वनडे क्रिकेट से संन्यास लेकर सभी को चौंका दिया। दुनिया के तमाम क्रिकेटर स्मिथ की तरह ही क्रिकेट से एक तय समय के बाद खुद सन्यास लेने का सार्वजनिक ऐलान करते हैं ,लेकिन दुनिया में खासतौर पर  भारत में ऐसे बहुत कम नेता हैं जो स्वेच्छा से राजनीति से सन्यास लेने का ऐलान करते हों। भारतीय परम्परा  में तो सन्यास जीवन  की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है। सन्यास की सनातन  परम्परा सामंतकाल में भी थी लेकिन लोकतंत्र में इसका परित्याग कार दिया। अकेली राजनीति ऐसी है जिसमें  आश्रम व्यवस्था लागू नहीं होती । यानि न नेता ब्रम्हचर्य का पालन करता है ,न गृहस्थ रहना चाहता है और न वानप्रस्थ में जाना चाहता है ,सन्यास लेना तो बहुत दूर की बात   है। राजनीति में जब कोई सन्यास नहीं लेता तो उसे मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया जाता है।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">मैंने जब से होश  सम्हाला है तभी से राजनीति में सक्रिय बहुत कम लोगों को राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा करते देखा है ,उलटे सन्यास ले चुके लोग राजनीति  में घुसपैठ करते जरूर देखे हैं और इस समय तो राजनीति में सन्यासियों की पौ -बारह है।वे केंद्र में भी मंत्री हैं और मुख्यमंत्री भी।  खिलाडियों में सन्यास लेना आम बात  है लेकिन राजनीति में सन्यास लेना ख़ास घटना मानी जाती है। नेताओं को उनकी अपनी पार्टियां जबरन हाशिये पर डाल देतीं हैं क्योंकि वे खिलाड़ियों की तरह खेल भावना से राजनीयति से सन्यास नहीं  लेते। किसी भी दल में सन्यासी न हों ऐसी बात नहीं है ,लेकिन उनकी संख्या न के बराबर है।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">नानाजी देशमुख या कामराज या ज्योति बसु जैसे बहुत कम नेता हुए हैं जिन्होंने स्वेच्छा से सन्यास लिया हो । सवाल ये है कि आखिर राजनीति में ऐसा क्या है जो नेता उससे सन्यास नहीं लेना नहीं चाहते ? इस विषय पर न किसी ने शोध किया है और न पीएचडी की उपाधि  हासिल की है ,क्योंकि इस विषय पर शोध करने की न फुरसत है और न इजाजत। मान लीजिये इजाजत मिल भी जाए तो गाइड नहीं मिलेगा। क्योंकि विषय ही अछूत है।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">राजनीति से सन्यास लेने वाले भारत के प्रमुख नेताओं पर यदि आपको निबंध लिखने के लिए कह दिया जाये तो आप मुश्किल से एक-दो पृष्ठ ही लिख पाएंगे,क्योंकि राजनीति से ससम्मान सन्यास लेने वाले हैं  ही गिने चुने। देश के पहले प्रधानमंत्री से लेकर आज के प्रधानमंत्री तक किसी ने राजनीति से सन्यास लेने के बारे में कार्ययोजना बनाना तो दूर, कभी सोचा तक नहीं। इस मामले में हर विचारधारा के नेता एक जैसा सोचते है।  राजनीति में व्यक्ति जीवन पर्यन्त सक्रिय रहना चाहता है। कुर्सी के बिना जीवित रहना किसी भी नेता के लिए असम्भव काम है। भारतीय राजनीति में कोई सन्यास नहीं लेता लेकिन शारीरिक अस्वस्थता की वजह से उसे घर बैठना पड़े तो अलग बात है। मिसाल के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">दुनिया में राजनीति ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ  सन्यास का न कोई लिखित विधान है और न कोई विवादास्पद इतिहास। राजनीति में कोई औरंगजेब भी तो नहीं है जिसने कम से कम पचास साल शासन किया हो।हमारे सनातन में तो राजा- महाराजा  अपने जीते जी अपने उत्तराधिकारी की न सिर्फ घोषणा कर देते थे बल्कि उनका राज्याभिषेक भी करा देते थे। राजनीति में नेता अपना उत्तर्राधिकारी तो घोषत करते हैं लेकिन खुद सन्यास नहीं लेते। हमारी संसद और विधानसभाओं  में पिता-पुत्र ,पति-पत्नी,भाई-भाई साथ -साथ मिल जायेंगे। राजनीति  से नेताओं को सन्यास केवल मृत्यु ही दिलाती है। मुमकिन है कि मै गलत होऊं ,लेकिन मैंने तो अपनी स्मृति में अपवादों को छोड़ किसी को औपचारिक रूप से सन्यास लेते नहीं देखा। आपने देखा हो तो जरूर बताएं।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">मौजूदा राजनीति  में हमारे तमाम नेता  80  पार कर चुके हैं लेकिन राजनीति छोड़ने को तैयार नहीं हैं ,ये भी पता नहीं चल पता कि राजीति ने नेताओं को पकड़ रखा है या नेताओं ने राजनीति को ? अब कांग्रेस से ही शुरू कीजिये। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हो या ,श्रीमती सोनिया गाँधी सन्यास के बारे में कोई योजना अभी तक नहीं बना पायीं हैं। भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का भी राजनीति से सन्यास से कोई इरादा नहीं है।  एनसीपी  के शरद पंवार हर बार, आखरी बार कहते हैं और हर बार राजनीति से चिपके दिखाई देते हैं।  राजद के लालू प्रसाद जी ने अपनी पत्नी और बेटे -बेटियों को भी स्थापित कर दिया लेकिन सन्यास की घोषणा नहीं की।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl"> बहन मायावती तो किसी आश्रम में रहीं ही नहीं  इसलिए  उनके सन्यास  आश्रम में जाने का सवाल ही नहीं उठता। सन्यास की उम्र तो बहन ममता बनर्जी की भी हो गयी है लेकिन वे भी इस बारे में शायद सोच नहीं पायी हैं। नीतीश कुमार भी सन्यासी नहीं बनना चाहते। समाजवादियों में भी कोई सन्यासी हो तो आप बताइये ?  वाम पंथियों में एक ज्योति बासु अपवाद रहे,उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से राजनीति से सन्यास लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था ,अन्यथा वामपंथी भी आजन्म नेता होते हैं  और मरते समय तक पोलित ब्यूरो सम्हालने का हौसला रखते हैं।</div>
<div class="aHl"> </div>
<div class="aHl">मुझे लगता है कि राजनीति में सन्यास शब्द से चिढ़ने वाले ,सन्यास को फालतू की चीज मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। किसी दल में कोई ऐसा नेता नहीं  है जो   स्मिथ  की तरह ,सचिन तेंदुलकर ,कपिल देव् की तरह अपने सक्रिय जीवन से सन्यास लेने की घोषणा कर अपने चाहने वालों को चौंकाए। अमेरिका में जो वाइडन साहब 80  पार कर भी सन्यासी नहीं बने ,वे तो ईसाई हैं ,उनके यहां शायद सन्यास की व्यवस्था नहीं है। वहां शायद रिटायरमेंट चलता हो लेकिन हम भारतियों की जीवन  शैली में सन्यास एक खास व्यवस्था है लेकिन हमारे नेता सन्यास के नाम से ही बिदक जाते हैं। आपको यकीन न हो तो अपने क्षेत्र के किसी विधायक,संसद,मंत्री या प्रधानमंत्री से रजनीति से सन्यास लेने के बारे में प्रश्न करके देख लीजिये ? हकीकत समझ जायेंगे।</div>
<div></div>
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<div class="a3s aiL"></div>
</div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Mar 2025 15:25:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>कुर्सी का काला खेल, संगीत का उजला मेल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी मानो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दो परस्पर विरोधी धाराओं का अखाड़ा है—एक ओर वह जो सत्ता की पिपासा में अपने कंठ को फाड़कर चीखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर वह जो अपने सुरों की मल्हार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूह को अमृतपान कराता है। राजनीति वह दलदल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ साज़िशों की बेलें विषवृक्ष बनकर लहराती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठबंधनों का सौदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अवसर मिलते ही विश्वसनीयता को तिलांजलि दे दी जाती है। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत एक ऐसी निर्झरिणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोभ-मोह की मर्यादाओं से परे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी छल-प्रपंच के हृदयों को सुरों की अटूट डोर में बाँध देती है। न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148926/black-game-of-black-game-music"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी मानो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दो परस्पर विरोधी धाराओं का अखाड़ा है—एक ओर वह जो सत्ता की पिपासा में अपने कंठ को फाड़कर चीखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर वह जो अपने सुरों की मल्हार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूह को अमृतपान कराता है। राजनीति वह दलदल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ साज़िशों की बेलें विषवृक्ष बनकर लहराती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठबंधनों का सौदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अवसर मिलते ही विश्वसनीयता को तिलांजलि दे दी जाती है। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत एक ऐसी निर्झरिणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोभ-मोह की मर्यादाओं से परे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी छल-प्रपंच के हृदयों को सुरों की अटूट डोर में बाँध देती है। न विश्वासघात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न छलावा—बस एक ऐसी रागिनी जो आत्मा को मधुर आलिंगन में भर लेती है। किंतु विधि का यह कटु सत्य है कि सत्ता का भूत जब किसी पर सवार होता है कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भाई-भाई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छुरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">घोंप</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सुरों का सच्चा साधक अपने शिष्य को स्वर-सिंधु में डुबोकर उसे अनंत ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का असली मज़ा तो उसकी बेशर्मी में छुपा है। कल जो एक दरबार में चरणों में लोट रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज दूसरे की चप्पलें चूमते नज़र आते हैं। कोई </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> भाई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बनकर पीठ में खंजर मारता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई मुलायम की चौखट छोड़कर मोदी के डेरे में ठुमके लगाता है। यहाँ न गुरु-शिष्य की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई पवित्र रिश्ता—बस सौदेबाज़ी की सुई टनटनाती रहती है। मगर संगीत की दुनिया में ऐसा कहाँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ उस्ताद चट्टान-सा अडिग खड़ा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और शागिर्द उसकी छाँव में पनपता-चमकता है। उस्ताद कोई ढोंगी बाबा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गले में तावीज़ टाँगे घूमे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो सुरों का जादूगर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऐसी माला गूँथता है कि सीधे ऊपरवाले के दरबार में पहुँच जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का ढोल ऐसा बेसुरा कि मज़हब के नाम पर चिंगारियाँ भड़काए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी राख से अपनी गंदी दुकान चलाए। किसी शानदार निशानी को अपने हिसाब से रंग दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी बुलंद छाया को ज़मीन में मिलाने की साज़िश रचो—ये सब इनके घटिया तमाशे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस भीड़ को ठगने का धंधा। मगर ज़रा संगीत की तरफ़ आँख उठाकर दिखाओ! किसी उस्ताद की शहनाई को मज़हब की तलवार से चीरो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी सितार की झंकार को हिंदू-मुसलमान की कसौटी पर कसो—है हिम्मत तो करो! तानसेन की रागिनियों में आग की लपटें सुलगाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसखान की बाँसुरी छीनकर उसकी धुन को कुचल दो—सुरों का ज़ोर नहीं टूटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारी गर्दन की अकड़ ज़रूर धूल चाटेगी। आत्मा को अमर का ख़िताब दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर रूह को जूतों तले रौंदने की गुस्ताख़ी करो—किसी रानी के जज़्बे को गंदे लफ़्ज़ों से तोलो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर मियाँ की तोड़ी की लय को तोड़ने का दुस्साहस करके दिखाओ!</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये कुर्सी के दीवाने हरियाली को अपने झंडे की ओट में ढाँपते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनहरे रंग को अपनी चादर में लपेटकर नचाते हैं। मगर इस खुले आसमान में ये रंग आज़ाद लहराते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें कौन अपनी गंदी मुट्ठी में क़ैद कर लेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">चाँद को अपने मज़हब का बंधक बनाने की ख़्वाहिश पालो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूरज को अपनी खेती का ढोंगी नौकर बनाओ—मगर ये दोनों तो सबके साथी हैं। चाँद कभी ईद का हमनवाज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी करवा चौथ का साक्षी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सूरज कभी संक्रांति का मेहमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी गुरु का चमकता चेहरा—इनके सामने तुम्हारी सारी चालें बेमानी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस हवा में फुसफुसाती रह जाती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी का असली मज़ा तो जुगलबंदी में छुपा है। कोई स्वर की मिठास बिखेरे या कोई गायक की गहराई से रूह को थामे—दोनों मिलकर दिल को लट्टू कर देते हैं। चाहे कोई पंडित तान छेड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे कोई खान धुन उड़ाए—सुरों की दुनिया में ऊँच-नीच का झमेला कहाँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सितार की तारें हों या तबले की थाप—जब साथ में गूँजते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मुँह से बस </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वाह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-वाह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ही फूटता है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रैना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बीती जाए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi">—ये</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> मियाँ की तोड़ी का ऐसा जादू है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे कुर्सी का कोई पहलवान अपनी भैंस की ताकत से भी नहीं मिटा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह की ताज़गी हो मियाँ की तोड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या बारिश की बूँदों में मेघ मल्हार—ये ज़िंदगी के सुर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रग-रग में बसते हैं। शिवरंजनी की चुलबुली शरारत हो या यमन की रूहानी सैर—हर साज़ में एक ही रंग समाता है। मालकौंस की धुन बजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मन हरि के पीछे नाचने को बेकरार हो जाए। चाहे सरोद की गहरी आवाज़ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे शहनाई की सीधी आत्मा तक की पुकार—सब एक ही राग में डूबते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वो है देस का राग। ये राग न कुर्सी की चापलूसी का गुलाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न वोटों की ठेकेदारी का भिखारी। ये तो बस यूँ ही बहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे बादल बिना किसी रोक-टोक के बरसते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब ज़रा राजनीति के ढोल को देखो—शोर मचाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिल्ल-पों करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर सुर की एक लकीर भी न पकड़ सके। कुर्सी के नीचे से ज़मीन खिसक जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये सारे बादशाह मुँह के बल धड़ाम से गिर पड़ते हैं। मगर संगीत</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वो तो ज़मीन पर कदम जमाकर आसमान को भी सलाम ठोकने पर मजबूर कर देता है। एक तरफ़ कुर्सी का तमाशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ मज़हब के नाम पर तलवारें लहराई जाती हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरफ़ सुरों का जहान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ दिलों के किवाड़ खुलते हैं। अब फैसला तुम्हारे हाथ—कुर्सी की कर्कश चीखों में कान फोड़ोगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या सुरों के सुकून में गोते लगाओगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जहाँ राजनीति की चिल्लाहट थम जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ संगीत का आलाप गूँज उठता है—और वो कभी थमने का नाम नहीं लेता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Feb 2025 17:31:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>मुफ्त की रेवड़ियों पर सुप्रीम टिप्पणी ज़रुरी </title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश में आज एक प्रचलन चलने लगा है कि चुनाव के समय कुछ ऐसी घोषणा की जाए जो जनता को सीधे जोड़े। क्यों कि पुराने चुनावी वादों पर राजनैतिक दल अपना विश्वास खो चुके हैं और जब वह चुनाव के समय बेरोजगारी, महंगाई कम करने शिक्षा अच्छी और सस्ती करने और विकास के वादे करते हैं तो जनता समझ जाती है कि चुनाव चल रहा है और चुनाव होने के बाद ये सब वादे फुस्स हो जाएंगे। इसलिए राजनैतिक दलों ने इसके लिए एक नया हथियार निकाला है कि जनता को नकद प्रलोभन दो, जैसे फ्री बस यात्रा, फ्री बिजली,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148610/supreme-comment-on-free-revolts%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img_20250213_133010.jpg" alt=""></a><br /><div>देश में आज एक प्रचलन चलने लगा है कि चुनाव के समय कुछ ऐसी घोषणा की जाए जो जनता को सीधे जोड़े। क्यों कि पुराने चुनावी वादों पर राजनैतिक दल अपना विश्वास खो चुके हैं और जब वह चुनाव के समय बेरोजगारी, महंगाई कम करने शिक्षा अच्छी और सस्ती करने और विकास के वादे करते हैं तो जनता समझ जाती है कि चुनाव चल रहा है और चुनाव होने के बाद ये सब वादे फुस्स हो जाएंगे। इसलिए राजनैतिक दलों ने इसके लिए एक नया हथियार निकाला है कि जनता को नकद प्रलोभन दो, जैसे फ्री बस यात्रा, फ्री बिजली, खातों में बिना काम के सीधे रकम, फ्री खाद्यान्न इत्यादि इत्यादि। यह प्रचलन पिछले दो दशकों से काफी चल रहा है और शुरू में जिन लोगों ने इसका विरोध किया था आज वह लोग भी इसी पर चलते नजर आ रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>इन सबके बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मुफ्त की रेवड़ियों को लेकर एक हिदायत देते हुए टिप्पणी की है कि इस पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि यह समाज के लिए बहुत ही घातक है और यदि ऐसा ही चलता रहा तो लोग काम करना बंद कर देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण पेश करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र में किसानों को खेतों में काम करने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। जब व्यक्ति को बिना काम किए खाद्यान्न मिल रहा है। और घर की औरतों के खाते में पैसा ट्रांसफर हो रहा है तो वह काम क्यों करेगा।</div>
<div> </div>
<div>काम वह करेगा जिसे अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए पैसे की आवश्यकता होगी और वह पैसा काम से ही मिलेगा। फ्री की इन योजनाओं का क्रम वैसे तो समय-समय पर राजनैतिक दल चलाते रहे हैं। लेकिन दिल्ली में केजरीवाल ने इसका उपयोग बहुत ही वृहद स्तर पर किया था। इसमें 200 यूनिट तक बिजली फ्री, पानी फ्री, महिलाओं को बस में यात्रा फ्री।</div>
<div> </div>
<div>इसके बाद केंद्र सरकार ने भी कोरोना काल में एक योजना लागू की थी जो कि एक बहुत ही बड़ी योजना है और वह है गरीबों के लिए खाद्यान्न योजना इस योजना में सरकार गरीब परिवार को गेहूं, चावल, तेल,नमक,चना आदि मुफ्त उपलब्ध करा रही है। हालांकि इस योजना में कुछ अपात्र लोगों ने लाभ उठाया है लेकिन सरकार अब इस पर निगरानी रख रही है। यह योजना कोरोना के समय इसलिए लागू की गई थी क्योंकि उस समय रोज कमाने खाने वाले लोगों के पास काम नहीं बचा था और वह इधर-उधर भटक रहे थे।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन अब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी योजना जिस पर केंद्र सरकार करोड़ों का बजट खर्च करती है यह अब बंद कैसे होगी। क्यों कि लोगों की आदत अब फ्री की बन चुकी है। और इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चिंता जाहिर की है। किसी मुफ्त योजना को आसानी से लागू किया जा सकता है लेकिन उसको बंद करने का मतलब सीधे राजनैतिक नुकसान से जुड़ जाता है।</div>
<div> </div>
<div>महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और दिल्ली में गरीब महिलाओं के खातों में सीधे धनराशि पहुंचाने की भी घोषणा की गई थी। यदि इतना बजट हम किसी कार्य योजना के लिए रखें और उसको रोजगार से सीधे जोड़ दें तो शायद समाज के लिए ज्यादा असरदार हो सकता है। लेकिन हमने अपने राजनैतिक लाभ साधने के लिए इस तरह के वादे करने शुरू कर दिए हैं। जो कि भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। ऐसा हम ही नहीं कह रहे वो सभी राजनैतिक दल भी पहले कहते थे जो इसका विरोध करते थे लेकिन आज सभी इसके पक्षधर हो गये हैं।</div>
<div> </div>
<div>मुफ्त योजना पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। क्यों कि यदि हमने इस पर लगाम नहीं लगाया तो इसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे। क्यों कि इसमें सबसे बुरा असर मध्यम वर्ग पर पड़ता है। फ्री की योजनाओं का जितना बजट होता है उससे हम तमाम जन-उपयोगी योजनाओं को आगे बढ़ा सकते हैं। महंगाई पर काबू कर सकते हैं, लोगों को अच्छी शिक्षा अच्छी स्वास्थ्य सेवा दे सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें उन्होंने कहा था कि इन मुफ्त की योजनाओं से ज्यादा जरुरी है कि लोगों को काम मिले और अन्य ऐसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों जो कि आवश्यक होती हैं।‌ इस पर सरकार को अवश्य मंथन करना चाहिए। देश में तमाम ऐसे मुद्दे आज़ भी ज्वलंत समस्या बनकर खड़े हैं जिस पर काम होना चाहिए। बेरोजगारी है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता, शिक्षा के क्षेत्र में अभी हमें और भी अधिक सुधार की आवश्यकता है, खासकर निचले स्तर पर।</div>
<div> </div>
<div>स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमने बहुत तरक्की की है लेकिन हम सफल तब ही माने जाएंगे जब समाज के अंतिम पायदान के व्यक्ति को भी हम अच्छी स्वास्थ्य सेवा दे सकें। लोगों को पक्के आवास दिलाने में हमने पिछले समय में निसंदेह बहुत अच्छा कार्य किया है लेकिन अभी भी हमारे सामने एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो कि अपने मकान के लिए प्रयास कर रही है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2025 17:55:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>मजबूत नेताओं से कमजोर होता विपक्ष </title>
                                    <description><![CDATA[<div>किसी भी दल व संगठन की मजबूती के लिए उसके नेतृत्व का मजबूत होना जरूरी है। यहां हम विपक्ष की बात कर रहे हैं जो मजबूत घटक दलों के होने के बाद भी कमजोर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में जो एनडीए का गठबंधन है उसमें भाजपा बहुत ही मजबूत दल है और उसके सहयोगी दल छोटे हैं लेकिन जब उन छोटे दलों को भाजपा का साथ मिलता है तो वह मजबूत बन जाते हैं।</div>
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<div>वहीं यदि हम देश के विपक्ष को देखें तो इसमें सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी है लेकिन उसके साथ जो सहयोगी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148559/opposition-weakened-by-strong-leaders%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img_20250212_113800.jpg" alt=""></a><br /><div>किसी भी दल व संगठन की मजबूती के लिए उसके नेतृत्व का मजबूत होना जरूरी है। यहां हम विपक्ष की बात कर रहे हैं जो मजबूत घटक दलों के होने के बाद भी कमजोर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में जो एनडीए का गठबंधन है उसमें भाजपा बहुत ही मजबूत दल है और उसके सहयोगी दल छोटे हैं लेकिन जब उन छोटे दलों को भाजपा का साथ मिलता है तो वह मजबूत बन जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>वहीं यदि हम देश के विपक्ष को देखें तो इसमें सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी है लेकिन उसके साथ जो सहयोगी दल हैं वो अपने क्षेत्र में मजबूत हैं और यही कारण है कि वह न तो किसी से झुकना पसंद करते हैं और न ही किसी का आगे बढ़ना पसंद करते हैं और यहां बात उठती है विपक्षी संगठन के नेतृत्व की इसमें न तो कांग्रेस पीछे रहना चाहती और न ही अन्य दल।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस चाहती है कि जिन क्षेत्रों में वह कमजोर है वहां सहयोगियों के द्वारा उसे बढ़ने का मौका मिले जब कि अन्य क्षेत्रीय दल चाहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर अन्य राज्यों में बढ़ने का मौका मिले। बस इसी खींचतान में विपक्ष चुनाव दर चुनाव पीछे होता जा रहा है। कांग्रेस का जनाधार हिंदीभाषी राज्यों से लगभग खिसक चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यदि हम बात करें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड की तो यहां कांग्रेस बैशाखियों पर निर्भर है। जब कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने उसको बहुत पीछे कर दिया है। कुल मिलाकर विपक्ष में सब अपना अपना हित साधने में लगे हैं लेकिन किसी भी हित होता नहीं दिख रहा है। यहीं यदि थोड़ा सा विचार परिवर्तन हो जिसमें सब एक दूसरे का हित साधते दिखें तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए वीपी सिंह के नेतृत्व में जब जनता दल बना था तब उसका केवल एक उद्देश्य था और वह था कांग्रेस को सत्ता से दूर करना। इसके अलावा किसी नेता या किसी क्षेत्रीय दल का कोई दूसरा उद्देश्य नहीं था। जनता दल में अपने अपने क्षेत्र के सभी कद्दावर नेता थे जो किसी पहचान के मोहताज नहीं थे।</div>
<div> </div>
<div>सभी ने मेहनत थी किसी को नहीं पता था कि कौन क्या बनेगा, किसका क्या भविष्य होगा। और जब परिणाम सामने आया तो कांग्रेस के पसीने छूट गए। जनता दल से कांग्रेस को पूरे देश में चारों खाने चित कर दिया। जब कांग्रेस सरकार से हट गई और जनता दल को जब सरकार बनाने का मौका मिला उसके बाद तय हुआ कि कौन क्या पद सम्हालेगा। लेकिन आज की विपक्ष की स्थिति अलग है कोई भी किसी को बढ़ना नहीं देखना चाहता।</div>
<div> </div>
<div>विपक्षी खेमे में चाहे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो, बंगाल में ममता बनर्जी हों या महाराष्ट्र में एनसीपी, शिवसेना उद्धव गुट का गठबंधन हो या दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी हो सभी अपने क्षेत्र के भारी भरकम दल हैं। और ये ऐसे राजनैतिक दल बन चुके हैं जो कम कीमत पर कांग्रेस से समझौता नहीं कर सकते जब कि कांग्रेस अकेले कुछ भी नहीं कर सकती। दिल्ली का चुनाव देखने के बाद तो स्थिति यह बन चुकी है कि विपक्ष भारतीय जनता पार्टी से नहीं अपने आप से ही लड़ रहा है।</div>
<div> </div>
<div>किसी को किसी पर विश्वास नहीं है। सब केवल अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। सरकार बने न बने पार्टी रुपी दुकान तो चल ही रही है। केजरीवाल पूरे देश में राजनीति करना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में विस्तार करना चाहती है।</div>
<div> </div>
<div> दिल्ली के मतदाताओं ने इस चुनाव में जो निर्णय दिया है उसमें एक बहुत गहरी सोच छिपी है। लेकिन शायद इस सोच को राजनैतिक दल न समझ सकें। केजरीवाल सत्ता से दूर क्यों हुए ? इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन प्रमुख कारण है कि आप जनता को बेवकूफ समझना बंद कीजिए। आप पूरे देश में कांग्रेस से गठबंधन कर रहे हैं और जब दिल्ली और पंजाब की बात आती है तो आप अकेले चुनाव में चले जाते हैं। यह क्या संदेश देता है, क्या जनता आपके मतलब को नहीं समझ पायेगी। गठबंधन करना है तो पूरी तरह से कीजिए अन्यथा गठबंधन का नाटक बंद कीजिए।</div>
<div> </div>
<div>लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी को सर्वाधिक सीट सौंपी और वहीं उपचुनाव में जनता ने सब कुछ भारतीय जनता पार्टी को दे दिया। ऐसा क्यों इसके उत्तर भी समाजवादी पार्टी को खोजने होंगे। एक अयोध्या की जीत को आप देश की जीत नहीं मान सकते। किसी क्षेत्र में मिली जीत वहां का एक स्थानीय कारण भी हो सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:38:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धार्मिक उन्माद का धर्मनिरपेक्षता से संतुलन,नियंत्रण। </title>
                                    <description><![CDATA[<div>धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र को सशक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण संवेदनशील एवं शाश्वत सिद्धांत हैl धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीति का मूल आधार तत्व कहैl जिसमें राजनीतिक दलों को भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका अंतर्निहित हैl धर्मनिरपेक्षता धार्मिक उग्रवाद का बड़ा विरोधी भाव हैl पर भारत में धर्मनिरपेक्षता संविधान की लकीरों तक सीमित होकर रह गया हैl मणिपुर और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में धर्म विशेष के आपसी झगड़ों के कारण धर्मनिरपेक्षता की आत्मा को गहरी चोट लगी है और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक अस्तित्व में प्रश्नचिन्ह लगने लगा हैl</div>
<div>  </div>
<div>धर्मनिरपेक्षता एक व्यापक अवधारणा है इसमें धर्म के प्रति विद्वेष का भाव नहीं होता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148556/balance-of-religious-frenzy-with-secularism%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(32).jpg" alt=""></a><br /><div>धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र को सशक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण संवेदनशील एवं शाश्वत सिद्धांत हैl धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीति का मूल आधार तत्व कहैl जिसमें राजनीतिक दलों को भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका अंतर्निहित हैl धर्मनिरपेक्षता धार्मिक उग्रवाद का बड़ा विरोधी भाव हैl पर भारत में धर्मनिरपेक्षता संविधान की लकीरों तक सीमित होकर रह गया हैl मणिपुर और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में धर्म विशेष के आपसी झगड़ों के कारण धर्मनिरपेक्षता की आत्मा को गहरी चोट लगी है और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक अस्तित्व में प्रश्नचिन्ह लगने लगा हैl</div>
<div> </div>
<div>धर्मनिरपेक्षता एक व्यापक अवधारणा है इसमें धर्म के प्रति विद्वेष का भाव नहीं होता है, बल्कि सभी धर्मों का समान आदर किया जाता है।इस आधुनिक काल में धर्मनिरपेक्षता सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत में प्रस्तुत सर्वाधिक जटिल शब्दों में एक है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ पाश्चात्य तथा भारतीय संदर्भ में अलग-अलग हैl भारतीय धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य समाज में विभिन्न धार्मिक मतों का अस्तित्व मूल्यों को बनाए रखने सभी मतों का विकास और समृद्धि करने की स्वतंत्रता का तथा साथ ही साथ सभी धर्मों के प्रति एक समान आदर तथा सहिष्णुता विकसित करना भी हैl</div>
<div> </div>
<div>पश्चिमी संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है जहां धर्म और राज्यों का एक दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करना तथा व्यक्तियों और उसके अधिकारों को केंद्रीय महत्व दिया जाना शामिल है। यद्यपि भारतीय धर्मनिरपेक्षता मैं पश्चिमी भाव तो शामिल हैं साथ-साथ कुछ अन्य भाव भी शामिल किए गए हैंl धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति समाज या राष्ट्र अभाव होता है, जो किसी विशेष धर्म या अन्य धर्मों की तुलना में पक्षपात नहीं करता हैl</div>
<div> </div>
<div>भारतीय संदर्भ धर्मनिरपेक्षता की आजादी के बाद बड़ी स्वच्छ एवं स्वस्थ सार्वभौमिक परंपरा रही है।इसमें किसी व्यक्ति से धर्म और संप्रदाय के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता हैl प्रत्येक नागरिक को इसके अंतर्गत स्वतंत्रता प्राप्त होती है कि वह अपनी इच्छा अनुसार किसी भी धर्म को अपनाएं एवं किसी भी व्यक्ति के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करें, भारत में धर्म और राजनीति को एक दूसरे से अलग तथा पृथक रखने की हमेशा कोशिश की गई हैl भारत में राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है, यहां राज्य की नजर में सब एक समान हैl</div>
<div> </div>
<div>भारत में धर्मनिरपेक्षता में सभी धर्मों को समानता का दर्जा प्रदान किया गया है। सभी धर्मों के नागरिकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी धर्मों के नागरिकों को समान आदर व इज्जत से व्यवहार करेंl भारतीय धर्मनिरपेक्षता राज्य के सभी धर्मों को विकास का समान अवसर देती है, इस प्रकार यह माना जा सकता है कि धर्मनिरपेक्षता सर्वधर्म समभाव पर विशेष महत्व देकर उस पर केंद्रित करती हैl धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत तर्क और विवेक की प्रधानता होती है, सभी व्यक्ति को सब कुछ कहने और विचार करने की स्वतंत्रता होने के साथ-साथ वैज्ञानिक आविष्कारों को भी पूर्ण अधिकार के साथ प्रोत्साहित भी किया जाता हैl</div>
<div> </div>
<div>भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता से विविधता में एकता को बल मिलता हैl हालांकि कुछ राजनीतिक दलों ने समय-समय पर भारतीय धर्मनिरपेक्षता को सत्ता प्राप्त करने हेतु कमजोर करने की कोशिश की है, यह हमारी जिम्मेदारी तो है ही साथ ही आम जनता, राजनीतिक दलों,मीडिया एवं सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की महती जिम्मेदारी है कि भारतीय संविधान के अनुरूप धर्मनिरपेक्षता का राजनीतिक, सामाजिक जीवन में पालन करें, जिससे हमारे देश का लोकतंत्र और अधिक सुदृढ़ होकर विश्व के लिए एक आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करेंl</div>
<div> </div>
<div>आजादी के पूर्व तथा आजादी के पश्चात महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री आदि नेताओं का धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास थाl स्वतंत्रता के पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन से पहले ही सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन ने धर्मनिरपेक्षता का मार्ग प्रशस्त कर दिया था,और स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्मनिरपेक्षता की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई गई है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति को समानता स्वतंत्रता व न्याय जैसे मानव अधिकार प्राप्त हैंl और इन अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता को माना गया है, इसके अभाव में राज्य में समानता व धर्म निरपेक्षता की स्थापना नहीं की जा सकती हैl भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता ही रही है, विविधता में एकता का मूल मंत्र ही धर्मनिरपेक्षता का हैl भारत में अल्पसंख्यक भी इसी देश के निवासी हैं और इनको विश्वास दिलाने तथा इनकी रक्षा करने का मार्ग प्रशस्त धर्मनिरपेक्षता के अस्त्र के रूप में किया गया हैl भारत देश निरंतर विकास के सोपान की तरफ अग्रसर है और एक वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में प्रशस्त भी है।</div>
<div> </div>
<div>इन परिस्थितियों में विश्व के समक्ष धर्मनिरपेक्ष था की एकता का आदर्श स्थापित करने की परम आवश्यकता हैl भारतीय संविधान की प्रस्तावना के 42 वें संशोधन 1976 के अंतर्गत पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया है, जिसका मतलब राज्य सभी मतों को समान रूप से रक्षा करेगा एवं स्वयं भी किसी मत को राज्य के धर्म के रूप में नहीं अपनाएगाl भारत का संविधान हमें विश्वास दिलाता है कि उसके साथ धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगाl भारत का संविधान पूर्ण रूप से भारतीय जनमानस की व्यक्तिगत, जातिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए ही निर्मित किया गया हैl न्यायपालिका तथा कार्यपालिका इस हेतु संपूर्ण रुप से प्रतिबद्ध भी हैंl</div>
<div> </div>
<div>किंतु भारतीय संदर्भ में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीतिक दलों पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, वही लोग अपने स्वार्थ पर राजनीति के लिए मुद्दों को चुनावी हथियार बनाते हैं जिसका शिकार आम जनता को होना पड़ता है । इसके कारण समाज का माहौल बिगड़ जाता हैl यह संपूर्ण रूप से एक चिंता का विषय है ।भारत में स्वतंत्रता के बाद से लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत बड़े ही मजबूत रहे हैं और इसकी स्वस्थ परंपरा भी भारत देश में रही है। इसे हमेशा मजबूत एवं शाश्वत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में प्रतीत होती हैl</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:31:46 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>एक पूर्वांचली पड़ा धन कुबेरों पर भारी, पूर्वांचल की एक अपील ने उखाड़ फेंकी बीजेपी उम्मीदवार के बदजुबानी की चर्नी</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div>अब दिल्ली में पूर्वांचल की पैठ लगातार बढ़ती जा रही हैं जो कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अब पूर्वांचल को विशेष स्थान देने पर मजबूर कर दिया है। पूर्वांचली अभी तक तो तमाम राजनीतिक दलों में बटे हुए थे जिसका फायदा सभी राजनीतिक दल उठाते रहते थे लेकिन इस दिल्ली चुनाव ने पूर्वांचलियों को आपस ने एकजुट होकर अपनी महती भूमिका का एहसास सभी राजनीतिक दलों को कराया है।</div>
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<div>हमारे विशेष संवाददाता से विधान सभा पटेल नगर के पूर्वांचल और कांग्रेस दल के वरिष्ठ नेता आर के मिश्रा ने वार्तालाप में बताया कि पूर्वांचल के लोग अगर अपने गांव</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148368/an-appeal-from-a-heavy-purvanchal-on-the-dhan-kubera"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img-20250130-wa0417-(1).jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
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<div>अब दिल्ली में पूर्वांचल की पैठ लगातार बढ़ती जा रही हैं जो कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अब पूर्वांचल को विशेष स्थान देने पर मजबूर कर दिया है। पूर्वांचली अभी तक तो तमाम राजनीतिक दलों में बटे हुए थे जिसका फायदा सभी राजनीतिक दल उठाते रहते थे लेकिन इस दिल्ली चुनाव ने पूर्वांचलियों को आपस ने एकजुट होकर अपनी महती भूमिका का एहसास सभी राजनीतिक दलों को कराया है।</div>
<div> </div>
<div>हमारे विशेष संवाददाता से विधान सभा पटेल नगर के पूर्वांचल और कांग्रेस दल के वरिष्ठ नेता आर के मिश्रा ने वार्तालाप में बताया कि पूर्वांचल के लोग अगर अपने गांव घर से 1000- 2000 किलो मीटर दूर दिल्ली आए है तो मात्र अपने मान सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा को सम्मानजनक तरीके से बचाए रखने के लिए आए है।</div>
<div> </div>
<div>वे दिल्ली में मेहनत, मजदूरी, बुद्धि विवेक, संवैधानिक पदों से जो भी पैसा कमाते है उसमें से अपने खर्चे को निकालने के बाद जो पैसा बचता है उसे अपने गांव घर इसलिए भेज देते है जिससे हमारे सामाजिक मान मर्यादा को नुकसान न हो सके और सामाजिक प्रतिष्ठा बची रहे।आज दिल्ली में पूर्वांचलियों की एक अलग पहचान है और समाज का नेतृत्व करने वालों की आज कमी नहीं है और आज हर पूर्वांचली अपने आपको अपने समाज के बीच सुरक्षित महसूस कर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>आपने देखा होगा पटेल नगर में आज बीजेपी के हारने का मात्र एक ही कारण रहा जो सीधे तौर पर आज देखा जा रहा है।आपको शायद मालूम होगा कि बीजेपी उम्मीदवार राज कुमार आनंद ने एक पूर्वांचली और समाज सेवक एस के चौबे को धमकाते हुए चर्नी उखाड़ने की धमकी दे दी जिसको लेकर चौबे गंभीर हो गया और उसकी एक अपील ने बीजेपी प्रत्याशी राजकुमार आनंद की ही चर्नी उखाड़ दी। आज पटेल नगर विधान सभा में एस के चौबे किसी पहचान का मोहताज नहीं है ।</div>
<div> </div>
<div>एस के चौबे भले ही पूर्वांचली है लेकिन उसे कभी किसी जाति धर्म, क्षेत्रवाद या पक्षपात पूर्ण काम करते हुए समाज नहीं देख सकता और ना ही कोई कह सकता है। हमें चौबे पर गर्व होता है कि हमारे समाज का वह इकलौता व्यक्ति जिसने हर समाज को अपने साथ खड़ा कर लिया है और किसी विधायक पार्षद से कम उसकी हैसियत भी नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>आज समाज को एस के चौबे के साथ खड़ा देखकर बहुत खुशी होती है जिसने हमारे समाज का नाम दिल्ली के पटेल नगर में बढ़ाया है जिसका परिणाम रहा कि उसकी चर्नी उखाड़ने वालों की ही चर्नी उखड़ गई। मै पूर्वांचलियों की इसी एकजुटता को और मजबूत बनाए रखने के लिए प्रभु से प्रार्थना करता हूं। मै बोला था कि एक प्रभावशाली पूर्वांचली को धमकाना बीजेपी उम्मीदवार को भारी पड़ेगा और हुआ भी वहीं जो मै बोला था। अगर राजनीति करनी है तो पूर्वांचलियों को आदर देना ही होगा।</div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 17:10:32 +0530</pubDate>
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