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                <description>journalism RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष पत्रकारिता की वैश्विक चुनौतिया</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष 3 मई को मनाया जाता है और यह दिन लोकतंत्र की उस मूल भावना को उजागर करता है, जिसमें नागरिकों को स्वतंत्र रूप से जानकारी प्राप्त करने और अपनी बात रखने का अधिकार होता है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस 1991 के विंडहोक घोषणा पत्र से प्रेरित है, जिसने स्वतंत्र और बहुलतावादी मीडिया की आवश्यकता को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।आज जब हम 2026 के वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति अत्यंत चिंताजनक और डरावनी प्रतीत होती है। वैश्विक सूचकांक के आंकड़े</div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178001/global-challenges-to-freedom-of-expression-and-impartial-journalism"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa0163.jpg" alt=""></a><br /><div>
<div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष 3 मई को मनाया जाता है और यह दिन लोकतंत्र की उस मूल भावना को उजागर करता है, जिसमें नागरिकों को स्वतंत्र रूप से जानकारी प्राप्त करने और अपनी बात रखने का अधिकार होता है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस 1991 के विंडहोक घोषणा पत्र से प्रेरित है, जिसने स्वतंत्र और बहुलतावादी मीडिया की आवश्यकता को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।आज जब हम 2026 के वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति अत्यंत चिंताजनक और डरावनी प्रतीत होती है। वैश्विक सूचकांक के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि दुनिया के 180 देशों में से आधे से अधिक देशों में प्रेस की स्थिति या तो बहुत कठिन है या फिर बेहद गंभीर श्रेणी में जा चुकी है। यह जानकर हृदय कांप उठता है कि विश्व की 1 प्रतिशत से भी कम आबादी आज उन क्षेत्रों में निवास कर रही है जहाँ प्रेस को वास्तव में स्वतंत्र और सुरक्षित माना जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले 25 वर्षों का इतिहास गवाह है कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर दबाव निरंतर बढ़ा है और पत्रकारों के काम करने की गुंजाइश संकुचित हुई है। पत्रकारिता आज एक ऐसा पेशा बन गया है जहाँ सच बोलने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। वर्ष 2025 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में 129 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की निर्मम हत्या कर दी गई, जो अब तक का सबसे बड़ा और विचलित करने वाला आंकड़ा है। यह संख्या केवल एक डेटा नहीं है, बल्कि उन आवाजों की खामोशी है जो समाज की विसंगतियों पर प्रहार कर रही थीं। सन 2000 से लेकर अब तक लगभग 1795 पत्रकारों ने अपने कर्तव्य की वेदी पर प्राण न्यौछावर किए हैं, जो इस पेशे के बढ़ते जोखिमों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हिंसा के साथ-साथ कानूनी उत्पीड़न भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मार्ग में एक बड़ी बाधा बनकर उभरा है। 2026 के आंकड़ों के अनुसार विश्व भर की जेलों में लगभग 330 पत्रकार बंद हैं, जिनमें से 61 प्रतिशत पत्रकारों पर राष्ट्रविरोधी होने या देश की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसे संगीन आरोप मढ़े गए हैं। विडंबना यह है कि जिन कानूनों का निर्माण राष्ट्र की सुरक्षा के लिए किया गया था, उनका उपयोग अक्सर उन लोगों को चुप कराने के लिए किया जा रहा है जो सत्ता की खामियों को उजागर करने का साहस करते हैं। पत्रकारिता को अपराध की तरह देखे जाने की यह प्रवृत्ति किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है। इससे भी अधिक चिंता का विषय वह न्यायहीनता है जो पत्रकारों के खिलाफ होने वाले अपराधों में व्याप्त है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों की हत्या के लगभग 86 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को कभी सजा नहीं मिलती। यह न्याय की विफलता न केवल अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है बल्कि क्षेत्र में कार्यरत अन्य पत्रकारों के मन में भी भय का संचार करती है। जब सच के पहरेदारों को लगने लगता है कि उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है और उनके हत्यारे खुलेआम घूम सकते हैं, तो वे आत्म-सेंसरशिप का रास्ता चुनने को मजबूर हो जाते हैं, जो अंततः लोकतंत्र की मृत्यु की शुरुआत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रेस की स्वतंत्रता पर केवल भौतिक हमला ही एकमात्र खतरा नहीं है, बल्कि आज के दौर में इसके स्वरूप बदल गए हैं। कई देशों में मानहानि और आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग एक सुनियोजित हथियार की तरह किया जा रहा है। इसके साथ ही आर्थिक दबावों के जरिए मीडिया संस्थानों की रीढ़ तोड़ने का प्रयास किया जाता है। विज्ञापन और वित्तीय संसाधनों के वितरण में पक्षपात करके उन संस्थानों को पुरस्कृत किया जाता है जो सत्ता के सुर में सुर मिलाते हैं, जबकि आलोचनात्मक रुख अपनाने वाले संस्थानों को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया जाता है। इस बदलती दुनिया में डिजिटल युग ने जहाँ सूचना के प्रसार को पंख दिए हैं, वहीं पत्रकारों के लिए नई और जटिल चुनौतियां भी पैदा की हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार और गलत जानकारियों का जाल इतनी तेजी से फैलता है कि तथ्य और झूठ के बीच का अंतर मिटने लगता है। इसके साथ ही ऑनलाइन ट्रोलिंग, साइबर हमले और अवैध डिजिटल निगरानी ने पत्रकारों के निजी और पेशेवर जीवन को असुरक्षित बना दिया है। विशेष रूप से महिला पत्रकारों को ऑनलाइन माध्यमों पर जिस तरह के अपमान और धमकियों का सामना करना पड़ता है, वह अत्यंत निंदनीय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से जुड़ी रिपोर्टिंग का है, जो आज के समय में सबसे जोखिम भरे क्षेत्रों में से एक बन चुका है। पिछले 15 वर्षों में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़ी खबरें कवर करने वाले कम से कम 749 पत्रकारों पर जानलेवा हमले हुए हैं। 2019 से 2023 के बीच इस तरह के हमलों में 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि जब पत्रकार भू-माफियाओं, अवैध खनन और कॉर्पोरेट जगत के भ्रष्टाचार पर कलम चलाते हैं, तो उन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। यूनेस्को और द गार्जियन जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें इस भयावह वास्तविकता की पुष्टि करती हैं। यह तथ्य हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में उस सच को सुनने के लिए तैयार हैं जो हमारे अस्तित्व और प्रकृति की रक्षा से जुड़ा है। प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा केवल मीडिया घरानों या पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है। एक स्वतंत्र मीडिया भ्रष्टाचार की परतों को खोलता है, सरकारी नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जनता को सही और सटीक जानकारी मिले ताकि वे एक जागरूक नागरिक के रूप में अपने निर्णय ले सकें। इसके विपरीत जब मीडिया को सरकारी या कॉर्पोरेट नियंत्रण में ले लिया जाता है, तो जनता तक केवल वही सूचनाएं पहुँचती हैं जो एक खास एजेंडे को पुष्ट करती हैं। इससे समाज में भ्रम और अविश्वास की स्थिति उत्पन्न होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वाशिंगटन पोस्ट और स्टेटिस्टा जैसे मंचों से प्राप्त डेटा यह संकेत देता है कि प्रेस की आजादी में गिरावट का प्रभाव केवल कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है। भारत सहित दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देशों में भी प्रेस स्वतंत्रता के सूचकांक में गिरावट देखी गई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर असहमति के स्वरों के प्रति सहिष्णुता कम होती जा रही है। प्रेस की स्वतंत्रता दरअसल लोकतंत्र का वह दर्पण है जिसमें समाज अपनी असलियत देखता है। यदि इस दर्पण पर धूल जमा दी जाए या इसे धुंधला कर दिया जाए, तो समाज अपनी कमजोरियों को कभी सुधार नहीं पाएगा। अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम उन साहसी पत्रकारों को श्रद्धांजलि दें जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान देकर सच की मशाल को जलाए रखा। यह दिन सरकारों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे प्रेस की आजादी के प्रति अपनी संवैधानिक और नैतिक प्रतिबद्धताओं को फिर से परिभाषित करें। यह आवश्यक है कि ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और न्याय प्रणाली को इतना मजबूत बनाया जाए कि पत्रकारों के खिलाफ अपराध करने वाला कोई भी व्यक्ति कानून की पकड़ से बाहर न रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना किसी एक समूह का दायित्व नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें यह समझना होगा कि यदि आज हम पत्रकारों की आवाज दबाने वाली शक्तियों के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, तो भविष्य में हमारी अपनी आवाज भी छीन ली जाएगी। लोकतंत्र की जीवंतता के लिए यह अनिवार्य है कि प्रेस बिना किसी डर या प्रलोभन के अपना कार्य कर सके। जब तक दुनिया में एक भी पत्रकार को सच बोलने के लिए जेल भेजा जाएगा या उसकी हत्या की जाएगी, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा रहेगा। प्रेस की आजादी की मशाल को प्रज्वलित रखना ही इस दिवस की सार्थकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे समाज में सांस ले सकें जहाँ सूचना पर किसी का एकाधिकार न हो और सच बोलने का साहस करने वालों को सम्मान मिले, न कि सजा।</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 18:07:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ख़जनी:पत्रकारिता समाज और लोकतंत्र की सशक्त कड़ी: राजू प्रसाद श्रीवास्तव</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>खजनी, गोरखपुर। </strong>पत्रकारिता केवल सूचना प्रसार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य भी करती है। राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी राजू प्रसाद श्रीवास्तव ने क्षेत्रीय पत्रकार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमल पटेल से बातचीत के दौरान यह विचार व्यक्त किए।</div>
<div>  </div>
<div>श्री श्रीवास्तव ने कहा कि आज मीडिया बहुत सशक्त, स्वतंत्र और प्रभावकारी हो गया है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन यह दर्जा समाज ने ही इसे प्रदान किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य प्रशासन और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149937/raju-prasad-srivastava-a-strong-link-between-the-social-society"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/p-3.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>खजनी, गोरखपुर। </strong>पत्रकारिता केवल सूचना प्रसार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य भी करती है। राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी राजू प्रसाद श्रीवास्तव ने क्षेत्रीय पत्रकार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमल पटेल से बातचीत के दौरान यह विचार व्यक्त किए।</div>
<div> </div>
<div>श्री श्रीवास्तव ने कहा कि आज मीडिया बहुत सशक्त, स्वतंत्र और प्रभावकारी हो गया है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन यह दर्जा समाज ने ही इसे प्रदान किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य प्रशासन और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाना होना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div><strong>स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की अहम भूमिका</strong></div>
<div>पत्रकारिता के इतिहास को याद करते हुए श्री श्रीवास्तव ने कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य देश को स्वतंत्रता दिलाना था। उस दौर में पत्रकारिता ने न केवल लोगों को जागरूक किया, बल्कि उन्हें आजादी के आंदोलन से भी जोड़ा। इसी तरह, आज भी पत्रकारिता को सामाजिक सरोकारों और जनहित के मुद्दों को उठाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div><strong>इंटरनेट और सूचना का अधिकार बना वरदान, लेकिन दुरुपयोग पर चिंता</strong></div>
<div>उन्होंने कहा कि  आज की क्रांति में इलेक्ट्रॉनिक दौर है ,इसमे  डिजिटल के माध्यम  लोगो  को तत्कलीन सूचना का आदान प्रदान  हो रहा है ,</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/149937/raju-prasad-srivastava-a-strong-link-between-the-social-society</link>
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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 13:25:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पत्रकारिता के नाम पर ठगी करने वाले जुएव गाजी पर महिला से 5 लाख ठगी का आरोप.</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>शाहजहांपुर/</strong>उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को बदनाम और छवि धूमिल करने वाले तथा कथित पत्रकार गिरोह बनाकर आजकल लोगों को गुमराह करके अपनी दुकानें चला रहे हैं. ऐसे तथाकथित पत्रकार महिलाओं के साथ साथ युवाओं को झांसा देकर उन्हें अपने जाल में फंसा कर उनका जीवन बर्बाद कर रहे हैं. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सामने आया है, जहां हरदोई जनपद के रहने वाले तथा कथित पत्रकार जुएव गाजी जो कि अपने आपको R हिंदुस्तान टीवी न्यूज़, पंचशील की अवधारणा पेपर का प्रधान संपादक बताकर महिलाओं, युवाओं के साथ-साथ युवतियों का भी मानसिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149510/juve-ghazi-who-cheated-in-the-name-of-journalism-accused"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi-divas18.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>शाहजहांपुर/</strong>उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को बदनाम और छवि धूमिल करने वाले तथा कथित पत्रकार गिरोह बनाकर आजकल लोगों को गुमराह करके अपनी दुकानें चला रहे हैं. ऐसे तथाकथित पत्रकार महिलाओं के साथ साथ युवाओं को झांसा देकर उन्हें अपने जाल में फंसा कर उनका जीवन बर्बाद कर रहे हैं. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सामने आया है, जहां हरदोई जनपद के रहने वाले तथा कथित पत्रकार जुएव गाजी जो कि अपने आपको R हिंदुस्तान टीवी न्यूज़, पंचशील की अवधारणा पेपर का प्रधान संपादक बताकर महिलाओं, युवाओं के साथ-साथ युवतियों का भी मानसिक और शारीरिक शोषण करने में जुटा हुआ है।</div>
<div> </div>
<div>शाहजहांपुर महानगर की ही रहने वाली ऐसी ही एक महिला इस तथाकथित पत्रकार के झांसी में आ गई और जुएव गाजी के कहने पर उसके चैनल में पार्टनरी के तौर पर लगभग 5 लाख रुपए का इन्वेस्टमेंट कर दिया. जब उपरोक्त तथा कथित पत्रकार द्वारा महिला को ठगी का एहसास हुआ तो महिला ने संबंधित थाने में प्रार्थना पत्र देकर मुकदमा दर्ज करवाने के साथ-साथ अपना पैसा वापस दिलवाने या फिर खरीदे गए सामान को वापस कराने की गुहार लगाई है।</div>
<div> </div>
<div>सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक हरदोई जनपद का रहने वाला उपरोक्त तथा कथित पत्रकार लोगों को अपने चैनल और पेपर में पार्टनर बनाने का लालच देकर उनसे मोटी रकम वसूल कर नए पार्टनर की तलाश में निकल जाता है. इसके साथ ही चैनल और पेपर से जोड़ने और पत्रकार बनाने के नाम पर पूरा गैंग संचालित कर बड़े पैमाने पर ठगी करने में जुटा हुआ है. इस तथाकथित पत्रकार का जाल सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि राजस्थान महाराष्ट्र बिहार जैसे अन्य प्रदेशों में भी फैला हुआ है. पत्रकार बनाने के नाम पर 5000 से लेकर 30000 तक की ठगी की जाती है. जिन्हें चैनल की माइक आईडी और फ्री की रेवड़ी दिलाने का प्रलोभन दिया जाता है।</div>
<div> </div>
<div>उपरोक्त तथाकथित पत्रकार द्वारा महानगर की एक महिला से लगभग 5 लख रुपए की ठगी पार्टनर बनने के नाम पर की गई. जब उपरोक्त महिला ने अपना पैसा वापस मांगा या फिर सामान देने को कहा तो उपरोक्त तथा कथित पत्रकार जुएव गाजी और उसके एक तथाकथित पार्टनर द्वारा महिला के साथ अभद्रता करते हुए गाली गलौज कर जान से मारने की धमकी देते हुए पत्रकारिता का रौब दिखाकर भविष्य में अपने पैसे भूल जाने की धमकी दी गई। हालांकि महिला द्वारा थानाध्यक्ष आरसी मिशन पर प्रार्थना पत्र देकर उपरोक्त तथा कथित पत्रकारों से युवाओं को बचाने और सुरक्षित करने के साथ पत्रकारिता के नाम पर ठगी करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही करने और पत्रकारिता जैसे पवित्र पैसे को कलंकित करने वाले लोगों को सबक सिखाने की गुहार लगाई गई है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Mar 2025 12:28:17 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जंजीरों  में जकड़ी भारतीयों की अस्मिता</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पिछले 45 साल की अपनी पत्रकारिता की यात्रा में मैंने पहले कभी ऐसे मंजर नहीं देखे जैसे 5 फरवरी  को देखना पड़े ।  जंजीरों में जकड़े 105 भारतीयों  को जंजीरों से जकड़े हुए अमरीकी सैन्य विमान से उतरते देखना 2014  के बाद मिली भारत को असली आबादी के बाद का सबसे खौफनाक और अपमानजनक मंजर  था। किसी देश में अवैध प्रवास सचमुच एक अपराध है। हम क्या सारी दुनिया में इसे घुसपैठ कहा जाता है ,लेकिन  क्या   किसी और देश ने  भारतीय  घुसपैठियों  को इतना  बेआबरू  कर  अपने  देश से निकला  है ?</p>
<p>घुसपैठ अकेले अमेरिका की समस्या नहीं है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148212/the-identity-of-indians-covered-in-chains"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/hthkdi.webp" alt=""></a><br /><p>पिछले 45 साल की अपनी पत्रकारिता की यात्रा में मैंने पहले कभी ऐसे मंजर नहीं देखे जैसे 5 फरवरी  को देखना पड़े ।  जंजीरों में जकड़े 105 भारतीयों  को जंजीरों से जकड़े हुए अमरीकी सैन्य विमान से उतरते देखना 2014  के बाद मिली भारत को असली आबादी के बाद का सबसे खौफनाक और अपमानजनक मंजर  था। किसी देश में अवैध प्रवास सचमुच एक अपराध है। हम क्या सारी दुनिया में इसे घुसपैठ कहा जाता है ,लेकिन  क्या   किसी और देश ने  भारतीय  घुसपैठियों  को इतना  बेआबरू  कर  अपने  देश से निकला  है ?</p>
<p>घुसपैठ अकेले अमेरिका की समस्या नहीं है। ये एक विश्वव्यापी समस्या है और इस समस्या से हर देश अपने तरीके से निबटता भी है। ये बात और है कि भारत में घुसपैठ से निबटना भारत सरकार को वैसे नहीं आता ,जैसे अमेरिका को आता है।  अमेरिका में निजाम बदलने के एक पखवाड़े के बाद ही ट्रम्प प्रशासन ने भारतीय घुसपैठिओं की पहली खेप का निर्वासन कर उन्हें  कैदियों के रूप में भारत भेज दिया। अमेरिका में अवैध भारीय प्रवासियों की वास्तविक संख्या 2  लाख बताई  जाती है ,लेकिन 18  हजार तो बाकायदा अमेरिका की जेलों में पड़े हुए है।  इतने घुसपैठिये तो भारत में भी बांग्लादेश और म्यांमार के नहीं होंगे।</p>
<p>अमेरिका ने भारतीय घुसपैठियों को निर्वासित कर दिया इस पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती किन्तु उन्हें जिस तरह युद्धबन्दियों की तरह हथकड़ियों में जकड़ कर भारत भेजा गया ,वो भी सैन्य विमान से ,ये आपत्तिजनक है। खेद है कि  भारत ने इसको लेकर अपनी आपत्ति दर्ज नहीं कराई। भारत अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए अपना विमान भेज सकता था। भारत ने अपने नागरिकों को अतीत में यूक्रेन और सीरिया से निकालने के लिए अपने विमान ही नहीं बल्कि अपने मंत्री तक भेजे हैं। लेकिन अमेरिका में अपने ही लोगों को लेने जाने से भारत डर गय। भारत मैक्सिको की तरह अमेरिका का विरोध भी दर्ज नहीं करा पाया ,अमेरिकी विमान को रोकना तो दूर की बात है।  </p>
<p>भारत में बांग्लादेशी हिन्दुओं पर अत्याचार के विरोध में धरना-प्रदर्शन करने वाले हिन्दू संगठन इस समय भूमिगत हैं जबकि अमेरिका के केलिफोर्निया में ही लोगों ने अमरीकी आव्रजननीति का विरोध किया। भारत में अमेरिका के कदम के खिलाफ किसी ने कोई विरोध नहीं किया। उलटे देश के प्रधानमंत्री ने उसी दिन गंगा में डुबकी लगाईं जिस दिन अमेरिका ने निर्वासित भारतीयों की पहली खेप भारत भेजी।  दुर्भाग्य की बात ये है कि  भारत सरकार ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में डूबने से बचाने   के लिए अमेरिका के सैन्य विमान को दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतारने के बजाय अमृतसर भेज दिया।</p>
<p>भारत -अमेरिका संबंधों के बारे में एक दिन पहले संसद में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को कोसने वाले देश के प्रधानमंत्री ने देश को नहीं बताया की देश आजाद होने के बाद 1947  से 2013  तक अमेरिका ने कितने भारतीय प्रवासियों को कैदियों की तरह अपने सैन्य विमान में भरकर भारी भेजा ? मुझे लगता है कि  भारत का इस घटना से जितना अपमान वैश्विक जगत में 5  फरवरी 2025  को हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ।  </p>
<p>न अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में ,न डॉ मनमोहन सिंह के जमाने में और न नेहरू,इंदिरा और मिस्टर क्लीन राजीव गाँधी के जमाने में। उस जमाने में प्रधानमंत्री शतुरमुर्ग की तरह न रेत में सर छिपाते थे और न मोदी जी की तरह गंगा में डुबकी लगाते थे। बराबरी से बात करते थे।  बेहतर होता कि  मोदी जी अमेरिका की इस कार्रवाई के विरोध में अपनी 13  फरवरी से प्रस्तावित यात्रा ही रद्द कर देते। लेकिन इसके लिए साहस चाहिए ,भारतीय स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प चाहिए। मोदी कि पास सातवां बड़ा थोड़े ही है।</p>
<p>आपको बता दे कि  अमेरिका में अल सल्वाडोर के 7.5 लाख, भारत के 7.25 लाख, ग्वाटेमाला के 6.75 लाख और होंडूरास के 5.25 लाख अवैध प्रवासी रहते हैं। अमेरिका में फ्लोरिडा, टेक्सॉस, न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, मैसाच्युएट्स , मैरीलैंड और कैलिफोर्नियां ऐसे शहर हैं, जहां सबसे ज्यादा अवैध प्रवासी रह रहे हैं। अमेरिका में शायद ही कोई चीनी नागरिक अवैध रूप से रहता हो ,जबकि चीन भारत से आबादी के मामले में पीछे है।लेकिन चीन इस मामले में शायद भारत से ज्यादा सतर्क है। अमेरिका घुसपैठियों के मामले में कितना सख्त है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि  घुसपैठियों की तलाश का काम सेना से कराया  जा रहा है ।  अमेरिका में भारतीय घुसपैठियों की तलाश के लिए गुरुद्वारों तक की तलाशी ली गयी है।</p>
<p>मुझे नहीं लगता कि  भारत के मौजूदा नेतृत्व में इतनी तथा है जो वो भारतीयों के निर्वासन के मुद्दे पर अमेरिका से सीधा मुकाबला कर सके। यदि भारत ने समय रहते अपना रवैया  न बदला तो आप देखेंगे कि  आने वाले दिनों में हर दिन देश के किसी न किसी हवाई अड्डे पर अमेरिका का कोई न कोई सैन्य विमान निर्वासित भारतीयों की खेप लेकर उतरता दिखाई देगा।</p>
<p>2014  के बाद आजाद हुए अंधभक्त इस तरह के अपमानजनक मंजर देखना चाहते हैं तो शौक से देखें, लेकिन शेष देश को अमेरिका की इस कार्रवाई के बारे में  अपने देश की सरकार को  विवश करना चाहिए।  इस समय देश की इंदिरा गाँधी जैसे नेतृत्व की जरूरत है जो अमेरिका की आँख  में आंख डालकर बात कर सके और अवैध प्रवासन के मुद्दे को मानवीय आधार पर सुलझाने का हौसला दिखा सके।</p>
<p> अमेरिका से वापस आए भारतीय लोगों को बेड़ियों से जकड़ कर लाया गया।  अमेरिकी सरकार की ओर से ऐसे सलूक पर मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल ने कहा है कि मामले को लेकर वो विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात करेंगे। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर जिस तरह से ठंडी प्रतिक्रिया दी है उससे बात बनने वाली नहीं है ।  कांग्रेस  को इस मुद्दे पर सड़कों पर लड़ाई लड़ना चाहिए। भारत से ज्यादा बड़ा कलेजा तो कोलंबिया का है ।  अमेरिका ने जब कोलंबिया के अवैध प्रवासियों को अमेरिकी सेना के विमान से उनके देश वापस भेजने की घोषणा की तो कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेड्रो ने इसका विरोध किया।</p>
<p>सैन्य विमानों में जबरन लोगों को बैठाकर दूसरे देश की ज़मीन पर उतरने को संप्रभुता से जोड़कर भी देखा जाता है।  इसी वजह से मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने इस मुद्दे को लेकर बड़ा बयान दिया था लेकिन भारत को अमेरिका के सैन्य विमान का भारत की जमीन पर उतरना समप्रभुता पर हमला नहीं लगता। हे राम !</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Feb 2025 16:54:24 +0530</pubDate>
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