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                <title>indian constitution - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>indian constitution RSS Feed</description>
                
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                <title>अधिकारों की तुलना में कर्तव्य और जिम्मेदारियां के प्रति हम ज्यादा अनभिग्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176919/we-are-more-ignorant-of-duties-and-responsibilities-than-rights"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/dgkdjgbvax1605352666.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना और कार्यों में जीवित रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> आज हम जिस दौर में खड़े हैं, वहाँ एक ओर जनसंख्या का विस्तार, स्त्री-पुरुष अनुपात की जटिलता और शिक्षा का असमान वितरण दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर अधिकारों के प्रति तीव्र आग्रह और जिम्मेदारियों के प्रति अपेक्षाकृत शिथिल उदासीनता भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह विडंबना ही है कि जिस देश ने विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् और कर्तव्य ही धर्म है जैसे विचार दिए, उसी समाज में आज अधिकारों की माँग तो प्रमुखता से अंगीकार और स्वीकार करने की चाहत रखता है, परंतु कर्तव्यों और जिम्मेदारियां के निर्वहन में परिपक्वता का अभाव एवं दुराग्रह दिखाई देता है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत की जनसंख्या, जो अब विश्व में शीर्षतम जनसंख्या वाले देशों में शामिल है, यहां केवल संख्या का विषय नहीं बल्कि गुणवत्ता का प्रश्न भी है यह गुणवत्ता शिक्षा, सामाजिक समझ और संवैधानिक चेतना, जागरूकता पर आधारित होती है। जब हम स्त्री-पुरुष अनुपात की बात करते हैं, तो यह केवल आंकड़ों का संतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता का संकेतक है। किंतु जब तक दोनों ही वर्ग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समान रूप से नहीं समझेंगे, तब तक वास्तविक प्रगति अधूरी और दिवा-स्वप्न ही रहेगी। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">शिक्षा इस पूरे विमर्श का केंद्र बिंदु है, क्योंकि शिक्षित समाज ही अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है, परंतु भारत में शिक्षा का प्रसार अभी भी समरूप नहीं है।ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, तथा विभिन्न आर्थिक वर्गों के बीच एक गहरी और बड़ी खाई मौजूद है। परिणामस्वरूप, एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक हो रहा है, परंतु कर्तव्यों के प्रति उसकी समझ अभी भी सीमित संकुचित है। भारतीय संविधान, जो नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उसी के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी स्पष्ट व्याख्या करता है, किंतु व्यवहारिक जीवन में अधिकारों की चर्चा अधिक होती है और कर्तव्यों की उपेक्षा। महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” परंतु आधुनिक समाज में यह विचार धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला गया है। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना में जीवित रहते हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत में कानूनों की कमी नहीं है सड़क सुरक्षा से लेकर महिला संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण से लेकर शिक्षा के अधिकार तक हर क्षेत्र में स्पष्ट नियम बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन तभी संभव है जब नागरिक स्वयं जिम्मेदारी का परिचय दें। उदाहरण के लिए, सड़क पर यातायात नियमों का उल्लंघन केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन की कमी का संकेत है।इसी प्रकार, महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकते जब तक समाज में लैंगिक संवेदनशीलता और सम्मान की भावना विकसित न हो। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में भी यह स्पष्ट है कि अधिकारों की माँग के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है।जहाँ महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं, वहीं समाज के सभी वर्गों को उनके प्रति सम्मान और सहयोग का कर्तव्य निभाना होगा। शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद यदि नैतिक शिक्षा और नागरिकता के मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो केवल डिग्रीधारी नागरिक तैयार होंगे, जागरूक और जिम्मेदार कर्तव्य निस्ट नागरिक नहीं। आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अधिकारों की आवाज़ को मजबूत किया है,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> लेकिन कई बार यह जागरूकता एकतरफा हो जाती है, जहाँ केवल अधिकारों की बात होती है और जिम्मेदारियों की चर्चा गौण हो जाती है। यही असंतुलन समाज में तनाव और गहरे हरेअसंतोष को जन्म देता है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में प्रारंभ से ही नागरिक कर्तव्यों पर बल दिया जाए, परिवार और समाज में जिम्मेदारी की भावना को विकसित किया जाए, और शासन स्तर पर भी जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाया जाए कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> जब तक आम नागरिक स्वयं कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक कोई भी व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक ही सर्वोच्च शक्ति हैं, और उनकी परिपक्वता ही राष्ट्र की दिशा और दशा तय करती है। इसलिए यह सही समय आत्ममंथन का है क्या हम केवल अपने अधिकारों के लिए सजग हैं, या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> यदि इस प्रश्न का उत्तर पूर्ण ईमानदारी और सजगता  से खोजा जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमें अभी लंबा सफर तय करना है। जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी के समन्वय से ही वह दिन आएगा जब भारत केवल अधिकारों के प्रति नहीं, बल्कि कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से परिपक्व राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा जिससे विकास की गति को सदैव सशक्त बल मिलेगा और विकास की संभावना चारों दिशाओं में व्याप्त होगी ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:47:29 +0530</pubDate>
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                <title>कांपती धरती और हांफता सूर्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p>म्यांमार में धरती काँपी तो डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मौत का शिकार हो गए और हजारों लोग घायल हो गए ,दूसरी  तरफ दुनिया ने 29  मार्च को साल के पहले सूर्यग्रहण का सामना किया ।  कहीं सूरज हांफता नजर आया तो कहीं इसके दर्शन नहीं हुए। भारत में सूर्यग्रहण नजर नहीं आया,आता भी कैसे ,यहां तो सूर्य को ग्रहण लगे एक दशक से जायदा बीत चुका है। प्रकृति में हो रही इस हलचल के बारे में हम कुछ सोच नहीं पा रहे हैं ,क्योंकि हमारे सामने जेरे बहस दूसरे मुद्दे हैं।</p>
<p>भूकंप को पुरबिया भू-डोल कहते है।  दो फीसदी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150558/shivering-earth-and-panting-sun"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/bhokamp-1.jpg" alt=""></a><br /><p>म्यांमार में धरती काँपी तो डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मौत का शिकार हो गए और हजारों लोग घायल हो गए ,दूसरी  तरफ दुनिया ने 29  मार्च को साल के पहले सूर्यग्रहण का सामना किया ।  कहीं सूरज हांफता नजर आया तो कहीं इसके दर्शन नहीं हुए। भारत में सूर्यग्रहण नजर नहीं आया,आता भी कैसे ,यहां तो सूर्य को ग्रहण लगे एक दशक से जायदा बीत चुका है। प्रकृति में हो रही इस हलचल के बारे में हम कुछ सोच नहीं पा रहे हैं ,क्योंकि हमारे सामने जेरे बहस दूसरे मुद्दे हैं।</p>
<p>भूकंप को पुरबिया भू-डोल कहते है।  दो फीसदी से ज्यादा लोग इसे ' अर्थक्वेक ' कहते हैं क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती या हिंदी बोलने में तकलीफ होती है। लेकिन बहस का मुद्दा भाषा नहीं आपदा है।  म्यांमार में आए भूकंप से हुयी तबाही हृदयविदारक है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है कहना कठिनहै। हम क्या, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि ये भूकंप क्यों आया या ये सूर्यग्रहण क्यों लगा ? इस बारे में विज्ञान की अपनी परिभाषाएं हैं और इन्हीं पर हम भरोसा करते आये है। हमारे पास भूकंप की आहट सुनने की मशीने है।  भूकंप की तीव्रता को झेलने वाली तकनीक  भी है ,किन्तु  सब असफल साबित होती है। जनहानि भी करता है भूकंप और धनहानि भी।</p>
<p>म्यांमार में शुक्रवार आए तेज भूकंप से भीषण तबाही हुई है. इस आपदा से अब तक 140 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 700 से ज्यादा घायल बताए जा रहे हैं। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 7.7 रही।  जिसका असर पड़ोसी देश थाईलैंड में भी देखने को मिला है।  राजधानी बैंकॉक की एक 30 मंजिला निर्माणाधीन इमारत भूकंप के झटके से जमींदोज हो गई जिसमें 8 लोगों मौत हो चुकी है. इसके अलावा 100 ज्यादा लोगों के इमारत के मलबे में दबे होने की आशंका है। इस भूडोल की वजह से हमने बहुमंजिला इमारत पर बने स्विमिंग पूल को जाम की तरह छलकते  देखा है। इस आपदा के शिकार लोगों के प्रति हमारी हार्दिक सवेदना है। आखिर म्यांमार हमारा पड़ौसी मुल्क है ,ये बात और है कि  म्यांमार के रोहिंगिया मुसलमानों से हमारी सरकार हमेशा   परेशान रहती है।</p>
<p>अब बात करें सूर्यग्रहण की।  वर्ष 2025 का पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को आंशिक रूप में होगा। नासा के अनुसार यह आंशिक सूर्य ग्रहण यूरोप, एशिया, अफ्रीका, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका तथा आर्कटिक के कुछ क्षेत्रों में देखा जा सकेगा। भारत में यह नहीं दिखाई दिया  क्योंकि इस दौरान चंद्रमा की छाया भारतीय उपमहाद्वीप तक नहीं पहुंचेगी।सूर्य और चन्द्रमा और धरती के बीच ये छाया युद्ध आज का नहीं है।  बहुत पुराना है।  हमारे पास तो इसे लेकर बाकायदा दंतकथाएं हैं ,आख्यान हैं। और कहावतें भी। हम सनातनी लोग हैं। आज भी इन दंतकथाओं से बाहर नहीं आये हैं और न आना चाहते हैं ,क्योंकि इन्हीं में सुख है।</p>
<p>कहावतों की बात करें तो भारत में ग्रहण केवल सूर्य या चन्द्रमा को ही परेशान नहीं करता बल्कि राजनीति को,धर्म को,अर्थव्यवस्था को और आम नागरिकों को भी परेशान करता है।  आजकल भारत भूकंप से महफूज है लेकिन सियासी सूर्यग्रहण से अपने आपको नहं बचा सका।  भारत की समरसता,धर्मनिरपेक्षता ,सम्प्रभुता, सभी को ग्रहण लगा है साम्प्रदायिकता का,संकीर्णता का ,धर्मान्धता का। हमारे पास पहले ये सब चीजें  नहीं थी ।  ये सियासी ग्रहण का ही उत्पाद हैं और अब इनका असर  दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि भांग पूरे कुएं  में घुल चुकी है। सूर्यग्रहण हो या चंद्र ग्रहण सभी को प्रभावित करता है। वो हिन्दूमुस्लमान नहीं देखता ,लेकिन हमारी धर्मान्धता की सत्ता तो  हिन्दू-मुसलमान की बैशाखियों पर ही टिकी है।</p>
<p>हम आजादी हासिल करने के बाद ' नौ दिन चले लेकिन केवल अढ़ाई कोस ' ही चल पाए। हमारे साथ ,हमारे पहले,हमारे बाद आजाद हुए देश कहीं के कहीं पहुँच गए किन्तु हम जहाँ थे ,वहां से भी पीछे जाते नजर आ रहे हैं।  जो साम्प्रदायिकता,धर्मान्धता आजादी के समय हुए विभाजन के बाद समाप्त हो जाना चाहिए थी ,वो आज भी ज़िंदा है।  कुछ मुठ्ठीभर लोग हैं सियासत में जो आजादी के बाद पकिस्तान की तर्ज पर भारत को हिंदुस्तान बनाना चाहते थे ,उस समय जब जंगे आजादी लड़ी जा रही थी ,तब वे बिलों में थे । आज वे सब बिलों से बाहर आ चुके हैं और एक बार फिर पाकिस्तान के मुकाबले हिन्दुओं का हिंदुस्तान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि हमें चीन जैसा मजबूत और अमेरिका जैसा महान बनना था।  </p>
<p>भारत के संविधान ने किसी को कोशिश करने से नहीं रोका ,इसलिए देश में पहली बार सड़कों पर ईद की नमाज पढ़ने पर पासपोर्ट छीनने की धमकियां दी जा रहीं है।  नवरात्रि पर माँस बिक्री के इंतजाम किये जा रहे है।  कब्रें और मस्जिदों को खोदने की मुहीम तो अब  पुरानी पड़ गयी है। धरती के नीचे से आने वाला भूकंप तो तबाही करके शांत हो जाता है।  प्रकृतितिक आपदा पर  पीड़ित देश को दुनिया भर   से राहत भी मिल जाती है किन्तु धर्मान्धता और संकीर्णता के भूकंप के शिकार देश को दुनिया इमदाद नहीं करती । दुनिया तमाशा देखती है ।  हमारी कूपमंडूकता पर हंसती है। लेकिन हमारे ऊपर इन सबका कोई असर नहीं पड़ता। हम अपने पांवों पर कुल्हाड़ियाँ  चलने में ही बुद्धिमत्ता समझते हैं।</p>
<p>हमारे पड़ौसी हमसे बिदके हुए हैं। नेपाल से हमारे रिश्ते खराब हैं। बांग्लादेश अब चीन का बगलगीर हो रहा है। बांग्लादेश के  यूसुफ़ साहब चीन की मेहमानी का मजा ले रहे हैं। हमने तो उन्हें लिफ्ट दी नहीं  ।  पाकिस्तान से तो हमारे सदियों पुराने खराब रिश्ते हैं। इन रिश्तों को जब पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं सुधार पाए तो पंडित   नरेंद्र मोदी की क्या बिसात ? हमारे प्रधानमंत्री ने दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा बनाये हैं। अब हमारे हाथों में न शांति कपोत है और न निर्गुटता का कोई अस्त्र।</p>
<p>हमारी लड़ाई हमसे ही है। इसलिए हमें किसी नए दुश्मन की जरूरत नहीं है। हम आपस में ही लड़-खप मरेंगे। हमारे पास इसका फुलप्रूफ इंतजाम है। हमने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। अब भगवान ने भी हमारी मदद करने से इंकार कर दिया है।  भगवान कहते हैं कि  जब हमारा काम धीरेन्द्र शास्त्री जैसे बकलोल कर सकते हैं ,तो हमारा क्या काम तुम्हारे  अंगने में ?</p>
<p>बहरहाल आज मैंने भी बकलोल ही की है लेकिन मेरी बकलोल आपको सोचने के लिए मजबूर कर सकती है।  मुमकिन है मुझसे दूर भी कड़े,लेकिन मैं तो मुसलमान नहीं हूँ जो अपना मुल्क छोड़कर कहीं और चला जाऊं । मुसलमान भी होता तो मुल्क नहीं छोड़ता ।  किसी मुसलमान ने भी इतनी तकलीफों कि बावजूद हिंदुस्तान नहीं छोड़ा है। हिंदुस्तान छोड़ने वाले तो माल्या हैं ,मोदी हैं ,जो हिन्दू हैं मुसलमान नहीं।  मैं आपसे कल फिर मिलूंगा ,किसी नए मजमून के साथ। खुदाहाफिज़।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Mar 2025 14:59:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>धर्मनिरपेक्षता देश की रक्त प्रवाहिका।</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>(संदर्भ भारत)</strong><br />धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र को सशक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण एवं शाश्वत सिद्धांत हैl धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीति का मूल आधार तत्व हैl जिसमें राजनीतिक दलों को भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका अंतर्निहित हैl धर्मनिरपेक्षता धार्मिक उग्रवाद का बड़ा विरोधी भाव हैl इसमें धर्म के प्रति विद्वेष का भाव नहीं होता है, बल्कि सभी धर्मों का समान आदर किया जाता है।इस आधुनिक काल में धर्मनिरपेक्षता सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत में प्रस्तुत सर्वाधिक जटिल शब्दों में एक है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ पाश्चात्य तथा भारतीय संदर्भ में अलग-अलग हैl</p>
<p>भारतीय धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य समाज में विभिन्न धार्मिक मतों का अस्तित्व मूल्यों को बनाए</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149253/secularism-of-the-countrys-blood-flow"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>(संदर्भ भारत)</strong><br />धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र को सशक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण एवं शाश्वत सिद्धांत हैl धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीति का मूल आधार तत्व हैl जिसमें राजनीतिक दलों को भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका अंतर्निहित हैl धर्मनिरपेक्षता धार्मिक उग्रवाद का बड़ा विरोधी भाव हैl इसमें धर्म के प्रति विद्वेष का भाव नहीं होता है, बल्कि सभी धर्मों का समान आदर किया जाता है।इस आधुनिक काल में धर्मनिरपेक्षता सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत में प्रस्तुत सर्वाधिक जटिल शब्दों में एक है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ पाश्चात्य तथा भारतीय संदर्भ में अलग-अलग हैl</p>
<p>भारतीय धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य समाज में विभिन्न धार्मिक मतों का अस्तित्व मूल्यों को बनाए रखने सभी मतों का विकास और समृद्धि करने की स्वतंत्रता का तथा साथ ही साथ सभी धर्मों के प्रति एक समान आदर तथा सहिष्णुता विकसित करना हैl पश्चिमी संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है जहां धर्म और राज्यों का एक दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करना तथा व्यक्तियों और उसके अधिकारों को केंद्रीय महत्व दिया जाना शामिल है। यद्यपि भारतीय धर्मनिरपेक्षता मैं पश्चिमी भाव तो शामिल हैं साथ-साथ कुछ अन्य भाव भी शामिल किए गए हैंl धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति समाज या राष्ट्र अभाव होता है, जो किसी विशेष धर्म या अन्य धर्मों की तुलना में पक्षपात नहीं करता हैl</p>
<p>भारतीय संदर्भ धर्मनिरपेक्षता की आजादी के बाद बड़ी स्वच्छ एवं स्वस्थ सार्वभौमिक परंपरा रही है।इसमें किसी व्यक्ति से धर्म और संप्रदाय के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता हैl प्रत्येक नागरिक को इसके अंतर्गत स्वतंत्रता प्राप्त होती है कि वह अपनी इच्छा अनुसार किसी भी धर्म को अपनाएं एवं किसी भी व्यक्ति के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करें, भारत में धर्म और राजनीति को एक दूसरे से अलग तथा पृथक रखने की हमेशा कोशिश की गई हैl भारत में राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है, यहां राज्य की नजर में सब एक समान हैl भारत में धर्मनिरपेक्षता में सभी धर्मों को समानता का दर्जा प्रदान किया गया है।</p>
<p>सभी धर्मों के नागरिकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी धर्मों के नागरिकों को समान आदर व इज्जत से व्यवहार करेंl भारतीय धर्मनिरपेक्षता राज्य के सभी धर्मों को विकास का समान अवसर देती है, इस प्रकार यह माना जा सकता है कि धर्मनिरपेक्षता सर्वधर्म समभाव पर विशेष महत्व देकर उस पर केंद्रित करती हैl धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत तर्क और विवेक की प्रधानता होती है, सभी व्यक्ति को सब कुछ कहने और विचार करने की स्वतंत्रता होने के साथ-साथ वैज्ञानिक आविष्कारों को भी पूर्ण अधिकार के साथ प्रोत्साहित भी किया जाता हैl</p>
<p>भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता से विविधता में एकता को बल मिलता हैl हालांकि कुछ राजनीतिक दलों ने समय-समय पर भारतीय धर्मनिरपेक्षता को सत्ता प्राप्त करने हेतु कमजोर करने की कोशिश की है, यह हमारी जिम्मेदारी तो है ही साथ ही आम जनता, राजनीतिक दलों,मीडिया एवं सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की महती जिम्मेदारी है कि भारतीय संविधान के अनुरूप धर्मनिरपेक्षता का राजनीतिक, सामाजिक जीवन में पालन करें, जिससे हमारे देश का लोकतंत्र और अधिक सुदृढ़ होकर विश्व के लिए एक आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करेंl आजादी के पूर्व तथा आजादी के पश्चात महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री आदि नेताओं का धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास थाl</p>
<p>स्वतंत्रता के पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन से पहले ही सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन ने धर्मनिरपेक्षता का मार्ग प्रशस्त कर दिया था,और स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्मनिरपेक्षता की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई गई है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति को समानता स्वतंत्रता व न्याय जैसे मानव अधिकार प्राप्त हैंl और इन अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता को माना गया है, इसके अभाव में राज्य में समानता व धर्म निरपेक्षता की स्थापना नहीं की जा सकती हैl</p>
<p>भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता ही रही है, विविधता में एकता का मूल मंत्र ही धर्मनिरपेक्षता का हैl भारत में अल्पसंख्यक भी इसी देश के निवासी हैं और इनको विश्वास दिलाने तथा इनकी रक्षा करने का मार्ग प्रशस्त धर्मनिरपेक्षता के अस्त्र के रूप में किया गया हैl भारत देश निरंतर विकास के सोपान की तरफ अग्रसर है और एक वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में प्रशस्त भी है।इन परिस्थितियों में विश्व के समक्ष धर्मनिरपेक्ष था की एकता का आदर्श स्थापित करने की परम आवश्यकता हैl</p>
<p>भारतीय संविधान की प्रस्तावना के 42 वें संशोधन 1976 के अंतर्गत पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया है, जिसका मतलब राज्य सभी मतों को समान रूप से रक्षा करेगा एवं स्वयं भी किसी मत को राज्य के धर्म के रूप में नहीं अपनाएगाl भारत का संविधान हमें विश्वास दिलाता है कि उसके साथ धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगाl भारत का संविधान पूर्ण रूप से भारतीय जनमानस की व्यक्तिगत, जातिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए ही निर्मित किया गया हैl न्यायपालिका तथा कार्यपालिका इस हेतु संपूर्ण रुप से प्रतिबद्ध भी हैंl</p>
<p>किंतु भारतीय संदर्भ में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीतिक दलों पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, वही लोग अपने स्वार्थ पर राजनीति के लिए मुद्दों को चुनावी हथियार बनाते हैं जिसका शिकार आम जनता को होना पड़ता है । इसके कारण समाज का माहौल बिगड़ जाता हैl यह संपूर्ण रूप से एक चिंता का विषय है ।भारत में स्वतंत्रता के बाद से लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत बड़े ही मजबूत रहे हैं और इसकी स्वस्थ परंपरा भी भारत देश में रही है। इसे हमेशा मजबूत एवं शाश्वत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में प्रतीत होती हैl</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 14:29:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>आरएसएस एवं भाजपा को देशद्रोही कहना संविधान विरोधी घृणित मानसिकता : हिंदू विचार मंच पाकुड़िया इकाई</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़/झारखंड:-</strong>भारतीय संस्कृति, धर्म एवं राष्ट्रीय भावना को सदियों से प्रोत्साहित करना क्या देश विरोधी कृत्य है? संस्कृति को किसी देश या राष्ट्र की आत्मा कहा गया है, जो राष्ट्रीयता का आधार है। इसी राष्ट्रीय भावना के आलोक में हिंदू विचार मंच पाकुड़िया इकाई ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे के उस कथन की घोर निंदा की है, जिसमें उन्होंने महाकुंभ में भाजपा नेताओं की डुबकी लगाने की आलोचना करते हुए 27 जनवरी को आरएसएस व भाजपा को देशद्रोही कह दिया।</div>
<div>  </div>
<div>ऐतिहासिक तथ्यों, विशेष रूप से एक हजार वर्षों के पराधीन भारत के संदर्भ में, मंच ने स्पष्ट रूप से</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147965/calling-rss-and-bjp-a-traitor-anti-constitution-hateful-mentality"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़/झारखंड:-</strong>भारतीय संस्कृति, धर्म एवं राष्ट्रीय भावना को सदियों से प्रोत्साहित करना क्या देश विरोधी कृत्य है? संस्कृति को किसी देश या राष्ट्र की आत्मा कहा गया है, जो राष्ट्रीयता का आधार है। इसी राष्ट्रीय भावना के आलोक में हिंदू विचार मंच पाकुड़िया इकाई ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे के उस कथन की घोर निंदा की है, जिसमें उन्होंने महाकुंभ में भाजपा नेताओं की डुबकी लगाने की आलोचना करते हुए 27 जनवरी को आरएसएस व भाजपा को देशद्रोही कह दिया।</div>
<div> </div>
<div>ऐतिहासिक तथ्यों, विशेष रूप से एक हजार वर्षों के पराधीन भारत के संदर्भ में, मंच ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति विस्मरण के कारण ही हम भारतीयों का स्वाभिमान नष्ट हुआ। इसी कारण भारत जैसे आध्यात्मिक और महाशक्तिशाली राष्ट्र को स्वाधीन होने में एक हजार साल लगे। जब भारत के महान सपूतों को राष्ट्रीयता का आधार सांस्कृतिक गौरव का भान हुआ, तब अंग्रेजों को आभास हो गया कि अब भारत में सत्ता का सूर्य अस्त होने वाला है – और हुआ भी।</div>
<div> </div>
<div>हिंदू विचार मंच ने आगे कहा कि इन दिनों "इंडिया" गठबंधन, विशेष रूप से कांग्रेस के सांसद एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता, विभिन्न मंचों और कार्यक्रमों के दौरान हिंदू धर्म, संस्कृति, देवी-देवताओं पर तथ्यहीन और निराधार टिप्पणियां कर रहे हैं। मंच का मानना है कि अंग्रेजों ने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को अपार क्षति पहुंचाकर डेढ़ सौ वर्षों तक अखंड राज्य किया, वहीं स्वतंत्र भारत में कांग्रेस सरकारों ने भी सांस्कृतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस ने हिंदुओं को विभिन्न जातियों में बांटते हुए वक्फ बोर्ड सहित शिक्षा, विवाह तथा कई प्रकार की विशेष सुविधाएं मुस्लिमों को प्रदान कर भारत में विषमता फैलाई। अब सत्ता पुनः पाने के प्रयास में हिंदुओं, महाकुंभ, आरएसएस पर अनर्गल टिप्पणियां कर देश का माहौल बिगाड़ने पर तुली हुई है।</div>
<div> </div>
<div>मंच ने जोर देकर कहा है कि भारतीय संविधान को नेहरू, नरसिम्हा राव और श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई बार अपने हित में बदला। वहीं, राहुल गांधी और अन्य नेता आरएसएस तथा भाजपा पर आरोप लगाकर देश की जनता को भ्रमित करते रहे हैं। इसके बाद कांग्रेसी संस्कार के तहत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो स्पष्ट रूप से कह दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। ऐसी स्थिति में भारत के विशाल बहुसंख्यक हिंदुओं को गंभीर चिंतन करना होगा और बिना जातियों में बंटे एकजुट रहना होगा। तभी भारत के साथ हिंदुओं का सम्मान पूरे विश्व में बढ़ेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2025 18:52:26 +0530</pubDate>
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