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                            <item>
                <title>सोशल मीडिया का शोर और लोकतंत्र की खामोशी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ला</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की आवाज सुनी जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता से सवाल पूछे जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहमति का सम्मान हो और नागरिकों को सही जानकारी के आधार पर अपना निर्णय लेने का अवसर मिले। लेकिन डिजिटल युग में लोकतंत्र के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। आज हमारे पास संवाद के साधन पहले से कहीं अधिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन क्या संवाद की गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यही वह सवाल है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत में सोशल मीडिया</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184955/noise-of-social-media-and-silence-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/rajeev1.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ला</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की आवाज सुनी जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता से सवाल पूछे जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहमति का सम्मान हो और नागरिकों को सही जानकारी के आधार पर अपना निर्णय लेने का अवसर मिले। लेकिन डिजिटल युग में लोकतंत्र के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। आज हमारे पास संवाद के साधन पहले से कहीं अधिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन क्या संवाद की गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यही वह सवाल है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत में सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन या व्यक्तिगत संपर्क का माध्यम नहीं रह गया है। यह राजनीतिक विमर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनावी प्रचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक आंदोलनों और जनमत निर्माण का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> डाटा रिपोर्ट के अनुसार जनवरी </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> में भारत में लगभग </span>80.6<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता और लगभग </span>49.1<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ सोशल मीडिया यूजर आइडेंटिटीज थीं।  इतनी बड़ी डिजिटल आबादी के बीच सोशल मीडिया पर कही गई बात का असर घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज और अंततः राजनीति तक पहुंचना स्वाभाविक है। समस्या सोशल मीडिया के अस्तित्व में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सूचना की जगह शोर लेने लगता है और तर्क की जगह उत्तेजना। जब हर व्यक्ति बन गया है अपना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूज चैनल</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया ने सूचना पर पुराने पहरे तोड़े हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> पहले किसी घटना को जनता तक पहुंचने के लिए अखबार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेडियो या टेलीविजन की जरूरत होती थी। आज मोबाइल फोन रखने वाला लगभग हर व्यक्ति सूचना का निर्माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसारक और टिप्पणीकार बन सकता है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। किसी गांव की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सकता है। किसी पीड़ित की आवाज लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। सरकार की किसी नीति पर तत्काल प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। पत्रकारों और नागरिकों को सत्ता से सवाल पूछने के नए माध्यम मिले हैं। लेकिन इसी शक्ति का दूसरा पक्ष भी है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब हर व्यक्ति बिना सत्यापन के किसी सूचना को आगे बढ़ाने लगे तो सूचना और अफवाह के बीच की सीमा समाप्त होने लगती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> किसी पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़ दिया जाता है। किसी वीडियो का संदर्भ बदल दिया जाता है। आधा सच पूरे झूठ से अधिक प्रभावशाली बना दिया जाता है। और सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब झूठ तेजी से फैलता है और सच उसके पीछे भागता रह जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधा सच है लोकतांत्रिक समाज में असहमति स्वाभाविक है। सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए और विपक्ष की आलोचना भी। समस्या आलोचना में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस आलोचना को प्रभावित करने वाली गलत सूचना में है। आज किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के बारे में एक छोटा-सा वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। लेकिन उस वीडियो का पूरा संदर्भ कितने लोग तलाशते हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गलत सूचना का प्रभाव केवल यह नहीं कि कोई व्यक्ति गलत तथ्य जान लेता है। इससे समाज में अविश्वास पैदा हो सकता है। एक समुदाय दूसरे समुदाय को संदेह की नजर से देखने लग सकता है। राजनीतिक विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल सकता है और सार्वजनिक बहस नीतियों से हटकर व्यक्तियों के चरित्र पर पहुंच सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर कितनी बातें कही जा रही हैं। असली सवाल यह है कि उनमें से कितनी बातें तथ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्क और जिम्मेदारी पर आधारित हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">वायरल</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">होना सत्य होने का प्रमाण नहीं हमने एक खतरनाक मानसिकता विकसित कर ली है—जो बात ज्यादा वायरल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ज्यादा महत्वपूर्ण मान लेना। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन लोकप्रियता और सत्यता दो अलग-अलग चीजें हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम लोकतांत्रिक सत्यापन प्रणाली नहीं है। वह सामान्यतः यह तय नहीं करता कि कौन-सी बात तथ्यात्मक रूप से सही है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उपयोगकर्ता की रुचि और सहभागिता के आधार पर सामग्री को आगे बढ़ाता है। परिणाम यह हो सकता है कि उत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनात्मक या विवादित सामग्री शांत और तथ्यात्मक जानकारी की तुलना में अधिक ध्यान खींचे। यहीं लोकतंत्र की परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि लोकतंत्र को केवल बोलने वाले नागरिक नहीं चाहिए। लोकतंत्र को सूचित नागरिक चाहिए। राजनीति में सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया की ताकत को बहुत पहले पहचान लिया था। अब चुनावी राजनीति केवल मैदान में होने वाली रैलियों तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संदेश तैयार किए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीडियो बनाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थकों के नेटवर्क सक्रिय किए जाते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर जनमत बनाने की कोशिश होती है। हाल के घटनाक्रम भी बताते हैं कि राजनीतिक संवाद में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिजिटल रणनीति में </span>Instagram <span lang="hi" xml:lang="hi">और युवा-केंद्रित सामग्री पर विशेष जोर की रिपोर्ट सामने आई है। यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल उस मंच पर पहुंचना चाहते हैं जहां करोड़ों मतदाता मौजूद हैं। लेकिन यहां राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यदि सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम बनाया गया और तथ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादा तथा पारदर्शिता को पीछे छोड़ दिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकतांत्रिक संवाद धीरे-धीरे प्रचार युद्ध में बदल सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 22:23:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संवाद संस्कृति:बच्चों को गलत निर्णय लेने से रोक सकती है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;">हाल ही में दिल्ली के एक 16 वर्षीय किशोर द्वारा आत्महत्या की दुखद घटना समाज में संवादहीनता की बढ़ती समस्या की ओर गंभीर संकेत देती है। यदि शिक्षक, माता-पिता या परिवार के सदस्य बच्चों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनें और संवाद का खुला वातावरण बनाएं, तो ऐसी अनेक घटनाओं को रोकना संभव है। बाल मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि बच्चों की भावनाओं, दुविधाओं और आंतरिक संघर्षों को समझने के लिए संवाद संस्कृति अत्यंत आवश्यक है।</div>
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<div style="text-align:justify;">बच्चे अत्यंत संवेदनशील होते हैं। वे अनेक अच्छे-बुरे अनुभव चाहकर भी अक्सर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। भय, संकोच या डांट की आशंका के</div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161265/communication-culture-can-prevent-children-from-taking-wrong-decisions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/hindi-divas31.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;">हाल ही में दिल्ली के एक 16 वर्षीय किशोर द्वारा आत्महत्या की दुखद घटना समाज में संवादहीनता की बढ़ती समस्या की ओर गंभीर संकेत देती है। यदि शिक्षक, माता-पिता या परिवार के सदस्य बच्चों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनें और संवाद का खुला वातावरण बनाएं, तो ऐसी अनेक घटनाओं को रोकना संभव है। बाल मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि बच्चों की भावनाओं, दुविधाओं और आंतरिक संघर्षों को समझने के लिए संवाद संस्कृति अत्यंत आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चे अत्यंत संवेदनशील होते हैं। वे अनेक अच्छे-बुरे अनुभव चाहकर भी अक्सर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। भय, संकोच या डांट की आशंका के कारण वे अपने मन की बात छुपा लेते हैं। ऐसे में परिवार और शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जहाँ वे बिना डर, झिझक या मूल्यांकन की चिंता के अपनी समस्या, गलती, पीड़ा या अनुभव स्वतंत्र रूप से साझा कर सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ध्यान रखने योग्य बात है कि बच्चे ‘उपदेश’ से कम और ‘पर्यावरण’ से अधिक सीखते हैं। यदि घर में संवाद को एक नियमित आदत के रूप में अपनाया जाए, परिवार के सदस्य एक-दूसरे की बात ध्यानपूर्वक सुनें, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से अपना सुख-दुख आगे बढ़कर साझा करने लगते हैं। घर में प्रतिदिन 10–15 मिनट का “फैमिली-टाइम” बच्चों में विश्वास, सुरक्षा और आत्मीयता की भावना विकसित करने में अत्यंत प्रभावी हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब बच्चा कुछ बताता है, तो तुरंत प्रतिक्रियाएँ देना,जैसे “तुमने ही किया होगा”, “यह तो गलत है”, “ऐसा क्यों किया?”-उसके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। बेहतर है कि बच्चों को धैर्यपूर्वक अपनी बात पूरी करने दें। इससे उनमें निष्पक्ष संवाद, भरोसा और खुलापन बढ़ता है। जो बड़े हैं, मार्गदर्शक की भूमिका में हैं, उन्हें ‘पहले सहानुभूति, फिर सलाह’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। सामान्यतः भावनात्मक समर्थन के बाद दिया गया मार्गदर्शन अधिक प्रभावी और स्वीकार्य होता है। इससे बच्चा सच बोलने में सहजता महसूस करता है और परिवार पर उसका भरोसा मजबूत होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों की निजता का सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चा जो भी व्यक्तिगत बात साझा करता है, उसे परिवारजनों, रिश्तेदारों या दोस्तों के बीच चर्चा या मज़ाक का विषय न बनाएं। बच्चे की बातों की गोपनीयता बनाए रखना ही विश्वास की वास्तविक नींव है। जब बच्चा देखता है कि उसकी निजी भावनाएँ सुरक्षित हैं, तो वह आगे भी परिवार के साथ खुलकर संवाद करना सीखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिर्फ गलतियों पर ध्यान देने से संवाद कमजोर होता है; इसलिए आवश्यक है कि ईमानदारी, साहस, प्रयास, मित्रता, सत्य बोलने जैसी सकारात्मक बातों पर तुरंत प्रशंसा दी जाए। सराहना बच्चे की आत्मछवि को मजबूत बनाती है और भविष्य में भी संवाद के लिए प्रेरित करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के डिजिटल युग में संवाद की आवश्यकता और बढ़ गई है, क्योंकि मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल गैजेट्स बच्चों के जीवन में गहराई से प्रवेश कर चुके हैं। माता-पिता को सहज शैली में समय-समय पर पूछना चाहिए-“क्या ऑनलाइन कुछ उलझन भरा देखा?”, “किसी का बुरा बोलना या मैसेज परेशान करता है क्या?”, “स्कूल में किसी दोस्त या शिक्षक ने कुछ ऐसा कहा जो तुम्हें अच्छा या बुरा लगा हो?” ऐसे सौम्य प्रश्न बच्चों को बाहरी दुनिया के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को साझा करने के लिए प्रेरित करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वस्तुतः संवाद एक ऐसा पुल (ब्रिज) है जो माता-पिता और बच्चों के बीच प्रेम, सुरक्षा, भरोसा और पारदर्शिता को मजबूत करता है। जब हर बच्चा यह विश्वास पूर्वक कह सके-“मम्मी-पापा, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है…”-तब समझिए कि संवाद संस्कृति ने अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभा दी है। अतः आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं की रोकथाम में परिवार, शिक्षक और मित्रों के बीच विकसित संवाद-संस्कृति सबसे बड़ा, सबसे प्रभावी और सबसे मानवीय अस्त्र है।</div>
</div>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Nov 2025 16:34:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डिजिटल युग में प्रयागराज महाकुंभ </title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रत्येक बारह वर्ष बाद महाकुंभ की प्रथा सदियों से चली आ रही है। लेकिन पुराने समय में संसाधनों की कमी थी और बहुत से लोगों का जाना भी मुश्किल हो जाता था। लेकिन वर्तमान वर्ष 2025 का प्रयागराज महाकुंभ एक ऐसे युग में पड़ा है जब न तो संसाधनों की कमी है और न ही प्रचार प्रसार के लिए समय का इंतजार करना पड़ता है। कुंभ में क्या चल रहा है, हर एक क्षण की खबर लगातार सोशल मीडिया से लोगों तक पहुंच रही है। कुंभ स्नान करने जाने के लिए लोगों के पास किसी चीज की कमी नहीं है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147940/prayagraj-mahakumbh-in-the-digital-age%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/h5e0ptdo_mona_625x300_17_january_25.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रत्येक बारह वर्ष बाद महाकुंभ की प्रथा सदियों से चली आ रही है। लेकिन पुराने समय में संसाधनों की कमी थी और बहुत से लोगों का जाना भी मुश्किल हो जाता था। लेकिन वर्तमान वर्ष 2025 का प्रयागराज महाकुंभ एक ऐसे युग में पड़ा है जब न तो संसाधनों की कमी है और न ही प्रचार प्रसार के लिए समय का इंतजार करना पड़ता है। कुंभ में क्या चल रहा है, हर एक क्षण की खबर लगातार सोशल मीडिया से लोगों तक पहुंच रही है। कुंभ स्नान करने जाने के लिए लोगों के पास किसी चीज की कमी नहीं है।</p>
<p>हैलीकोप्टर, हवाई जहाज, ट्रेन, बस और निजी वाहन जिसकी जैसी क्षमता है वह कुंभ स्नान के लिए पहुंच रहा है। लेकिन आज के इस डिजिटल समय ने पिछले समय के भीड़ के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बेहतर प्रबंधन के लिए प्रयागराज महाकुंभ मेला क्षेत्र एक नया जिला बना दिया गया ताकि वहां के अधिकारी सिर्फ मेला क्षेत्र पर ही ध्यान दे सकें। कर्मचारियों की ड्यूटी केवल मेला क्षेत्र में ही रहे। सरकार ने अपनी तरफ से सारी कोशिश की है कि इतनी बेतहाशा भीड़ को सही तरीके से प्रबंधन किया जा सके।</p>
<p>वर्तमान प्रयागराज महाकुंभ में एक अलग बात रही वो है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से खबरों को या कहें लोगों को वायरल करने की। इसमें काफी लोग ऐसे सामने आये जो जमकर सोशल मीडिया का निशाना बने। उनमें चाहे माला बेचने वाली बंजारन मोनालिसा हो, आईआईटी बाबा हो, अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री ममता कुलकर्णी हों या फिर एंकर हर्षा का साध्वी रुप, लोगों में खूब चर्चा का विषय बना। ऐसा लगा कि मानो सोशल मीडिया वाले यूट्यूबर अब कुछ छोड़ेंगे नहीं।</p>
<p>कई यूट्यूबरो को तो बाबाओं ने डांटकर भगाया लेकिन वो कहां मानने वाले ये नहीं तो कोई और आईआईटी बाबा पहले खूब चर्चा का विषय बने। चर्चा भी होनी ही थी भारत में, एक आईआईटियंस बनना लोगों का ख्वाब होता है, लाखों करोड़ों का पैकेज छोड़ बाबा बन जान इतना सरल भी नहीं है। किसी भी चैनल ने आईआईटी बाबा को नहीं छोड़ा होगा और बाबा भी खूब हंस हंस कर लोगों को इंटरव्यू देते रहे। लेकिन समय बदला और वही यूट्यूब वाले आईआईटी बाबा को मानसिक रोगी या नशेड़ी और पता नहीं क्या क्या बताने लगे।</p>
<p>एंकर हर्षा की खूबसूरती के खूब बखान किये गये और उन्हें साध्वी घोषित कर दिया गया। हर्षा ने भी खूब इंटरव्यू दिये और जब अति ज्यादा हो गई तो हर्षा कुंभ छोड़ के चलीं गईं। मोनालिसा नाम की लड़की जो चित्रकूट से माला बेचने के लिए कुंभ में आई थी। लेकिन उसकी नीली आंखों ने यूट्यूबरो का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया गया और उसकी तुलना हॉलीवुड की अभिनेत्री मोनालिसा से की जाने लगी, उसका माला बेचना बंद हो गया वह केवल इंटरव्यू गर्ल बन कर रह गई।</p>
<p>इसके बाद बोलीवुड की बेहतरीन अदाकारा ममता कुलकर्णी जो कि अपने लाइमलाइट जीवन की चकाचौंध को छोड़ने साध्वी बनके कुंभ क्षेत्र में आईं थीं उनका किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर बनना चर्चा का विषय बना रहा। उन्होंने क्यों ऐसा किया, वो उस लाइमलाइट से कैसे बाहर निकलीं यह सब सवाल उनसे होते रहे। कहने का प्रयागराज कुंभ एक मायने में पूरी तरह से सोशल मीडिया की गिरफ्त में रहा। मतलब हमारे देश के सोशल मीडिया को इतनी आज़ादी रही कि वो किसी को भी किसी भी हद तक वायरल कर दे।</p>
<p>शायद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (टीवी चैनल) और प्रिंट मीडिया अखबार किसी के विषय में कुछ कहने और लिखने के लिए पहले बहुत कुछ सोचते होंगे लेकिन सोशल मीडिया ने कुछ भी नहीं सोचा। ममता कुलकर्णी के विषय में तो इतना वायरल हुआ कि उनके अखाड़े में ही उनकी आलोचना शुरू हो गई। कुंभ में सोशल मीडिया के मकड़जाल में एक बात तो खुलकर सामने आई कि शायद आने वाले समय में इसके प्रति कुछ पाबंदियां लागू होंगी। सोशल मीडिया जानकारियां तो दे रहा है लेकिन उसके साथ साथ बहुत कुछ झूठ भी परोस रहा है।</p>
<p>लोगों की निजता को भी उजागर कर रहा है। कोई सुंदर है, कोई आईआईटी करके बाबा बन रहा है या कोई एक्ट्रेस साध्वी बन रही है यह उसकी निजता है। उनकी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उनके लिए परेशानी का सबब बना। सोशल मीडिया ने जिस तरह से कुंभ क्षेत्र में अपने मकड़जाल को फैलाया है इससे आने वाले समय में कुछ पाबंदियों की अपेक्षा है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2025 16:31:34 +0530</pubDate>
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