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                <title>America - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>भारत रूस 75 वर्ष की कूटनीतिक यात्रा और अमेरिका की नई सुरक्षा रणनीति</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत और रूस पूर्व सोवियत संघ के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ है।एक ऐसा पड़ाव जो गौरव, संघर्ष, विश्वास और ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरा है। 1950 और 1960 के दशक में सोवियत संघ की मदद से भारत में भारी उद्योग, स्टील प्लांट, मशीन टूल्स, परमाणु ऊर्जा तथा बड़े बिजली संयंत्रों की नींव रखी गई। 1971 की भारत सोवियत मैत्री संधि ने दोनों देशों को रणनीतिक साझेदारियों के स्वर्ण युग में प्रवेश कराया। इन सात दशकों में न तो विश्वास डगमगाया और न ही नीतियों में अस्त-व्यस्तता आई।यही कारण है कि मास्को और दिल्ली की दोस्ती आज भी उतनी ही मजबूत</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163202/india-russia-75-years-of-diplomatic-journey-and-americas-new"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/download3.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत और रूस पूर्व सोवियत संघ के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ है।एक ऐसा पड़ाव जो गौरव, संघर्ष, विश्वास और ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरा है। 1950 और 1960 के दशक में सोवियत संघ की मदद से भारत में भारी उद्योग, स्टील प्लांट, मशीन टूल्स, परमाणु ऊर्जा तथा बड़े बिजली संयंत्रों की नींव रखी गई। 1971 की भारत सोवियत मैत्री संधि ने दोनों देशों को रणनीतिक साझेदारियों के स्वर्ण युग में प्रवेश कराया। इन सात दशकों में न तो विश्वास डगमगाया और न ही नीतियों में अस्त-व्यस्तता आई।यही कारण है कि मास्को और दिल्ली की दोस्ती आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी उस दौर में थी, जब दुनिया द्विध्रुवीय शक्ति-संतुलन से संचालित होती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रूस ने भारत को सैन्य रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने में असाधारण भूमिका निभाई। आज भी भारतीय सेनाओं के लगभग 60% हथियार रूसी तकनीक से निर्मित हैं।मिग -21 से लेकर सुखोई30एमकेआई टी 90 टैंक, ब्रह्मोस मिसाइल और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम तक। यह संबंध सिर्फ सौदेबाज़ी नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित दीर्घकालिक कूटनीति का उदाहरण है।इसी परिप्रेक्ष्य में, वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप ने अमेरिका की नई रणनीतियों को भी प्रभावित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की भारत यात्रा के तुरंत बाद अमेरिका ने अपनी नई नेशनल सेक्युरिटी स्ट्रेटेजी जारी की, जिसने दुनिया के शक्ति-संतुलन पर गहरा संदेश दिया है। 33 पन्नों के इस दस्तावेज़ ने अमेरिकी प्राथमिकताओं, साझेदारियों और चुनौतियों का नया खाका पेश किया है। यह नई रणनीति क्या संकेत देती है और भारत रूस संबंधों की 75 वर्ष की यात्रा के संदर्भ में इसका क्या महत्व है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>भारत रूस संबंध 75 वर्ष</strong></div>
<div style="text-align:justify;">विश्वास और रणनीतिक स्थिरता की अनूठी मिसाल है।भारत और रूस के रिश्ते सिर्फ कूटनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने समय की कसौटी पर खुद को बार-बार सिद्ध किया है।सोवियत संघ की तकनीकी और औद्योगिक सहायता 1950–60 के दशक में यूएसएसआर ने भारत को भारी उद्योगों का बुनियादी ढांचा दिया। भिलाई और बोकारो स्टील प्लांट, मशीन टूल्स फैक्ट्रियां, पावर प्लांट, अंतरिक्ष कार्यक्रम आदि इन सभी में रूसी सहयोग का गहरा प्रभाव रहा।यह वही समय था जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी और नवस्वतंत्र भारत को एक ऐसे सहयोगी की जरूरत थी, जो विकास के हर मोर्चे पर साथ खड़ा रह सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1971 की अभूतपूर्व मैत्री संधि सार्थक सिद्द हुई।भारत-सोवियत मैत्री, सहयोग और पारस्परिक सहायता संधि ने दोनों देशों के बीच ऐसी सामरिक समझ पैदा की, जिसने 1971 के युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई। यह संधि सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास का सबसे ठोस प्रमाण थी। सैन्य शक्ति का स्तंभ भारत की रक्षा क्षमता का बड़ा हिस्सा रूस से मिला। मिग -21 ने भारत की वायु शक्ति की रीढ़ मजबूत की।</div>
<div style="text-align:justify;">सुखोई 30 एमकेआईआज भी भारत का सबसे भरोसेमंद फाइटर रहा है।ब्रह्मोस मिसाइल ने भारत को सुपरसोनिक हथियारों की श्रेणी में अग्रणी बनाया।एस-400 सिस्टम भारत की वायु सुरक्षा का नया कवच बना।रूस की यह सैन्य सहायता किसी भी तत्कालिक सौदे की तरह नहीं थी, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी पर आधारित थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत  अमेरिका की द्विपक्षीय  सौदेबाजी में उस समय विरोधाभास देखने को मिला है,तब अमेरिका के रास्ट्रपति ट्रम्प ने भारत की आयात निर्यात प्रणाली को प्रभावित कर  उस पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाई गई थी।अमेरिका को भारत की आवश्यकता क्यों है?वैश्विक भू-राजनीति में यह स्पष्ट है कि आज अमेरिका के लिए भारत उतना ही जरूरी है जितना भारत के लिए अमेरिका।चीन अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीन का उभार अमेरिका के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती बन चुका है। एशिया प्रशांत से हिंद प्रशांत तक चीन की आक्रामक नीतियों ने अमेरिका को ऐसे साझेदारों की तलाश में धकेला है, जिनके पास जनशक्ति, भौगोलिक स्थिति और सैन्य क्षमता तीनों हों।भारत इस संदर्भ में स्वाभाविक रूप से सबसे उपयुक्त साझेदार है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और वैश्विक नेतृत्व की पुनर्स्थापना का प्रयास आज के परिपेक्ष्य में अहम भागीदारी निभा रहा है।पुतिन की भारत यात्रा के तुरंत बाद अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी की गई नेशनल सिक्युरिटी  स्ट्रेटेजी कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इस दस्तावेज़ ने अमेरिकी कूटनीति और सामरिक प्राथमिकताओं को नए ढंग से परिभाषित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व का पुनर्स्थापन</strong></div>
<div style="text-align:justify;">दस्तावेज़ का मुख्य उद्देश्य यह स्थापित करता है कि अमेरिका अपने निकटतम भौगोलिक क्षेत्र पश्चिमी गोलार्ध में अपने प्रभाव को पुनर्स्थापित करेगा। लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में बढ़ते चीनी प्रभाव को चुनौती देना भविष्य प्रभावित करने की सम्भावना है। इस बीच नशीले पदार्थों, अवैध प्रवास और संगठित अपराध पर नियंत्रण जरूरी है।आर्थिक सहयोग को रणनीतिक सुरक्षा से जोड़ना उचित होगा।यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका अब वैश्विक स्तर पर छिटपुट नीतियों के बजाय क्षेत्रीय सुदृढ़ता पर जोर देगा।एनएसएस में पहली बार यूरोप पर इतने स्पष्ट और कड़े शब्दों में टिप्पणी की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यूरोपीय देशों की बढ़ती निर्भरता के कई कारण हो सकते है। रक्षा खर्च में कमी,रूस और चीन के साथ स्वतंत्र समीकरण, और अमेरिका इन मुद्दों को अपने सामरिक हितों के विपरीत मानता है।33 पन्नों के दस्तावेज़ में भारत, रूस और चीन तीनों को विशेष स्थान दिया गया है, लेकिन तीनों के संदर्भ अलग-अलग हैं।अमेरिका ने भारत को प्रमुख लोकतांत्रिक शक्ति ,हिंद–प्रशांत क्षेत्र में स्वाभाविक साझेदार और तकनीकी और आर्थिक क्षमता वाला राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया है।यह संदेश है कि अमेरिका भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी को महत्वपूर्ण मानता है, चाहे भारत रूस के साथ अपने संबंध कैसे भी बनाए रखे।एनएसएस में रूस को रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी सैन्य शक्ति वाला आक्रामक राष्ट्र के रूप में वर्णित किया गया है।लेकिन साथ ही यह भी माना गया है कि रूस को पूरी तरह अलग-थलग करना लंबे समय में संभव नहीं।दस्तावेज़ में चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिस्पर्धी आर्थिक और सैन्य चुनौती करार दिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका की पूरी  रणनीति चीन-निरोध पर केंद्रित है। भारत की भूमिका और महत्व बढ़ा है।एनएसएस का संदेश स्पष्ट है कि अमेरिका भारत को सिर्फ साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व के एक स्तंभ के रूप में देखता है।लोकतंत्र जनसंख्या भौगोलिक स्थिति भारत रूस संबंधों का ऐतिहासिक पक्ष इन चारों वजहों से भारत विश्व राजनीति में संतुलनकारी शक्ति बन चुका है। रूस भारत संबंध अमेरिका को स्वीकार नही है।नई रणनीति में अमेरिका यह मानकर चल रहा है कि भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक हैं और अमेरिका इन्हें बदल नहीं सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए अमेरिका भारत पर दबाव डालने के बजाय उसके साथ सहयोग बढ़ाने की नीति अपना रहा है।चीन के खिलाफ भारत निर्णायक मुड़ में है।अमेरिका की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व यह है कि चीन को संतुलित करने में भारत अब अपरिहार्य है। भारत रूस की 75 वर्ष पुरानी दोस्ती ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की स्थिति को मजबूत किया है। यह संबंध विश्वास, सहयोग और साझा हितों पर आधारित है।दूसरी ओर, अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति यह दर्शाती है कि दुनिया एक नए शक्ति संतुलन की ओर बढ़ रही है, जहाँ भारत रूस का पुराना सहयोगी अमेरिका का नया रणनीतिक साझेदार चीन का भू-क्षेत्रीय संतुलनकर्ता तीनों भूमिकाओं में निर्णायक महत्व रखता है।आज भारत के पास वह क्षमता और सामर्थ्य है, जहाँ वह वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन सकता है। अमेरिका, रूस और चीन तीनों शक्तियाँ इसे स्वीकार कर चुकी हैं।इस प्रकार भारत रूस संबंधों की 75वीं वर्षगांठ और अमेरिका की नई रणनीति दोनों मिलकर दुनिया को यह संदेश देते हैं कि आने वाला दशक भारत-केंद्रित कूटनीति का दशक होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Dec 2025 17:29:18 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारत–चीन-अमेरिकी संबंध, परिस्थिति-जन्य वैश्विक कुटनीति का नया दौर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>  </strong>भारत और चीन के रिश्ते कितने दूरगामी हैं, यह प्रश्न आज एशिया ही नहीं पूरी वैश्विक राजनीति की धुरी बन चुका है। चीन से दोस्ती भारत के लिए कोई नई बात नहीं है; यह इतिहास की धारा में कई उतार-चढ़ावों से होकर गुज़री है। 1954 में नेहरू और झोऊ एनलाई के बीच “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा उभरा था, जब भारत 1947 में और चीन 1949 में स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। दोनों देशों ने उभरती शीतयुद्ध राजनीति में तटस्थता और एशियाई एकता का सपना देखा था, किंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस सपने को अफसाना बना दिया और विश्वास की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161261/india-china-us-relations-a-new-era-of-situational-global-diplomacy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download-(1)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> </strong>भारत और चीन के रिश्ते कितने दूरगामी हैं, यह प्रश्न आज एशिया ही नहीं पूरी वैश्विक राजनीति की धुरी बन चुका है। चीन से दोस्ती भारत के लिए कोई नई बात नहीं है; यह इतिहास की धारा में कई उतार-चढ़ावों से होकर गुज़री है। 1954 में नेहरू और झोऊ एनलाई के बीच “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा उभरा था, जब भारत 1947 में और चीन 1949 में स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। दोनों देशों ने उभरती शीतयुद्ध राजनीति में तटस्थता और एशियाई एकता का सपना देखा था, किंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस सपने को अफसाना बना दिया और विश्वास की दीवारें इतनी ऊँची खड़ी हुईं कि उसकी गूँज आज भी सीमा के पहाड़ों तक सुनाई देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1962 के बाद चीन ने लद्दाख और हिमाचल के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण बढ़ाया, अक्साई चिन पर कब्ज़ा किया, और गलवान से डोकलाम तक हर दशक में कभी खुली तो कभी निहित झड़पें होती रहीं। अप्रैल 2020 के बाद एल ए सी पर चीन की आक्रामक तैनाती ने भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ क्वाड साझेदारी मज़बूत करने की ओर धकेला, और यही अमेरिकी असहजता का मूल भी है—क्योंकि वाशिंगटन चाहता है कि भारत उसका पूर्ण सामरिक मित्र बने, परंतु भारत अपनी स्वायत्त विदेश नीति छोड़ने को तैयार नहीं है।<br /><br />सितंबर 2025 में शंघाई सहयोग संगठन  की 25वीं बैठक ने अचानक एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात लंबी खाई को पाटने की कोशिशों से भर उठी। दोनों देशों ने सामरिक तनाव कम कर व्यापार, पर्यटन, निवेश, डिजिटल कनेक्टिविटी और ऊर्जा गलियारों में सहयोग बढ़ाने की रूपरेखा तैयार की। चीन को भी अहसास है कि अमेरिका की टैरिफ नीति और निर्यात प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है और भारत एक विशाल बाज़ार के रूप में उसके लिए रणनीतिक राहत बन सकता है। दूसरी ओर भारत समझता है कि चीन से टकराव स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि सीमा विवाद के बावजूद 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, और आर्थिक वास्तविकता दोनों को एक-दूसरे से जोड़े बिना नहीं रख सकती।<br /><br />उधर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच हालिया महीनों में बढ़ती निकटता ने एशिया में शक्ति संतुलन को नई दिशा दे दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से हुई बैठकों ने दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को पुनर्जीवित कर दिया है। पाकिस्तान द्वारा अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदने की नई योजनाएँ और वाशिंगटन द्वारा पाकिस्तान को ‘क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोगी’ का दर्जा देने से भारत की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह वही अमेरिका है जिसने 1999 के कारगिल युद्ध और 1971 के बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान की हिफ़ाज़त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, इसलिए भारत जानता है कि शक्ति संतुलन का कोई भी समीकरण स्थायी नहीं होता। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल चीन और रूस के विरुद्ध अपनी पश्चिमी एशिया रणनीति के हिस्से के रूप में करेगा, और भारत-अमेरिका मित्रता भी केवल साझा हितों पर आधारित है, स्थायी भावनाओं पर नहीं।<br /><br />भारतीय दृष्टिकोण से, आज की कूटनीति का सच यह है कि जितना अविश्वसनीय अमेरिका है, उतना ही अविश्वसनीय चीन भी। दोनों देशों का इतिहास भारत के प्रति अवसरवादी रहा है। यही कारण है कि भारत की विदेश नीति ‘बहुध्रुवीयता’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित है—जहाँ भारत न तो चीन के ब्लॉक में पूरी तरह शामिल होगा, न अमेरिका के प्रभाव में आएगा। एससीओ  सम्मेलन में में भारत-चीन की नज़दीकी और ब्रिक्स -प्लस ढांचे में नए आर्थिक सहयोग की संभावनाएँ यह संकेत देती हैं कि एशिया अपनी शर्तों पर अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की स्थिति बना रहा है। चीन-रूस-भारत त्रिकोण अमेरिका,नाटो  चिंताओं का मुख्य कारण है, क्योंकि यह त्रिकोण ऊर्जा, रक्षा, तकनीक, और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर पश्चिमी देशों के दबदबे को कम कर सकता है।<br /> </p>
<p style="text-align:justify;">चीन के लिए, भारत-अमेरिका निकटता रणनीतिक दबाव बढ़ाती है, जबकि भारत-चीन तालमेल उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और इंडो-पैसिफिक में बेहतर स्थिति दे सकता है। भारत के लिए, चीन से संबंध सुधरने का अर्थ है LAC पर तनाव में कमी, व्यापार में निर्भरता नियंत्रित करना और वैश्विक महंगाई व सप्लाई-चेन संकट से बचाव। जबकि अमेरिका इस पूरे बदलते परिदृश्य को एशिया में अपने प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है, और यह चिंता सिर्फ सामरिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है, क्योंकि अमेरिकी उद्योग चीन-भारत सहयोग को अपने बाज़ार हितों के विपरीत मानते हैं।<br /><br />इन बदलते समीकरणों के बीच सवाल यही है कि क्या भारत-चीन का सहयोग अमेरिका के खिलाफ प्रभावी रणनीतिक विकल्प बन सकता है? सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु जैसा कुछ नहीं होता; केवल स्थायी हित होते हैं। भारत और चीन जब अपने हितों के आधार पर एक-दूसरे के करीब आते हैं तो यह एशिया को अधिक स्वायत्त और बहुध्रुवीय बनाता है, परंतु सीमा विवाद, ताईवान-दक्षिण चीन सागर तनाव, और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ जैसे कारक भारत को पूरी तरह निश्चिंत नहीं होने देते। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी सामरिक स्वतंत्रता बनाए रखे।</p>
<p style="text-align:justify;">शंघाई सम्मेलन का यह नया समीकरण आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत की राजनीति को पुनः परिभाषित कर सकता है। भारत और चीन जब साझा आर्थिक हितों, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापारिक गलियारों पर साथ खड़े होते हैं, तो यह अमेरिका की टैरिफ रणनीति और एशियाई राजनीति की धुरी को भी बदल देता है। भविष्य बताएगा कि यह सहयोग स्थायी रणनीति बनता है या एक और अस्थायी कूटनीतिक अध्याय। किंतु इतना स्पष्ट है कि भारत-चीन की नई राह यदि टिकाऊ साबित होती है, तो एशिया की शक्ति संतुलन रेखाएं बदल जाएंगी और अमेरिका का प्रभाव सीमित होगा और यदि यह राह फिर बाधित होती है, तो भारत को अपनी सुरक्षा और आर्थिक नीति में नए विकल्प तलाशने होंगे। यही अंतरराष्ट्रीय संबंधों का शाश्वत सत्य है कि विश्व राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है न स्थाई दुश्मन केवल स्थाई हित होते हैं, और भारत उसी हित-नीति पर आगे बढ़ रहा है।<br /><br /><br /></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<div>
<div> </div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Nov 2025 16:27:02 +0530</pubDate>
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                <title>गाजा में घातक इजराइली हमलों के बाद 235 की मौत,  प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना और तेज़ होंगे अटैक</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>  राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद- </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक कार्यालय एवं आवास ‘व्हाइट हाउस' ने कहा कि हमला करने से पहले उससे सलाह ली गई है और उसने इजराइल के फैसले का समर्थन किया। ‘व्हाइट हाउस' ने फिर से युद्ध जैसी स्थिति के लिए हमास को जिम्मेदार ठहराया। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता ब्रायन ह्यूजेस ने कहा कि चरमपंथी समूह ‘‘युद्धविराम को बढ़ाने के लिए बंधकों को रिहा कर सकता था, लेकिन उसने इनकार कर दिया और युद्ध को चुना।'' मिस्र और कतर के साथ मध्यस्थता प्रयासों का नेतृत्व कर रहे अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ ने पहले ही आगाह किया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150007/after-the-deadly-israeli-attacks-in-gaza-235-killed-netanyahu"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(4)4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong> राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद- </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक कार्यालय एवं आवास ‘व्हाइट हाउस' ने कहा कि हमला करने से पहले उससे सलाह ली गई है और उसने इजराइल के फैसले का समर्थन किया। ‘व्हाइट हाउस' ने फिर से युद्ध जैसी स्थिति के लिए हमास को जिम्मेदार ठहराया। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता ब्रायन ह्यूजेस ने कहा कि चरमपंथी समूह ‘‘युद्धविराम को बढ़ाने के लिए बंधकों को रिहा कर सकता था, लेकिन उसने इनकार कर दिया और युद्ध को चुना।'' मिस्र और कतर के साथ मध्यस्थता प्रयासों का नेतृत्व कर रहे अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ ने पहले ही आगाह किया था कि हमास को जीवित बंधकों को तुरंत रिहा करना चाहिए ‘‘या फिर भारी कीमत चुकानी होगी।'' नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा, ‘‘इजराइल अब सैन्य ताकत बढ़ाकर हमास के खिलाफ कार्रवाई करेगा।''</p>
<p><strong>गाज़ा-</strong> इजराइल ने मंगलवार सुबह गाजा पट्टी क्षेत्र में हमास के ठिकानों को निशाना बनाते हुए सिलसिलेवार हवाई हमले किए। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि हमले में कम से कम 235 लोगों की मौत हो गई। मध्य गाजा स्थित अल-अक्सा मार्टर अस्पताल आधारित मंत्रालय के प्रवक्ता खलील देगरान ने मंगलवार सुबह अद्यतन आंकड़े उपलब्ध कराए। कहा जा रहा है जनवरी में युद्धविराम के प्रभावी होने के बाद से यह गाजा में अब तक का सबसे भीषणतम हमला है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि युद्धविराम को बढ़ाने के लिए वार्ता में कोई खास प्रगति नहीं होने के कारण उन्होंने हमले का आदेश दिया।</p>
<p>इजराइल ने एक वैकल्पिक प्रस्ताव को अपनाया और हमास पर इसे स्वीकार करने का दबाव बनाने के लिए क्षेत्र के 20 लाख फलस्तीनियों को भोजन, ईंधन तथा अन्य सहायता की सभी आवश्यक चीजों की आपूर्ति को रोक दिया। इस बीच, एक इजराइली अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि इजराइल हमास के उग्रवादियों, इसके नेताओं और बुनियादी ढांचों पर हमला कर रहा है तथा हवाई हमलों से परे अभियान को और बढ़ाने की योजना बना रहा है। इजराइल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा कि अगर बंधकों को रिहा नहीं किया गया तो ‘‘गाजा में और बुरी हालत होगी।'' उन्होंने कहा, ‘‘हम तब तक लड़ाई नहीं रोकेंगे जब तक हमारे सभी बंधक घर नहीं पहुंच जाते।''  </p>
<p>रातभर हुए हमलों ने शांति का दौर खत्म कर दिया है और 17 माह से जारी संघर्ष के फिर से शुरू होने की आशंका को बढ़ा दिया है जिसमें 48,000 से ज्यादा फिलीस्तीनी मारे गए थे और गाजा तबाह हो गया। हमास द्वारा बंधक बनाकर रखे गए लगभग 24 इजराइली नागरिकों के भविष्य के बारे में इजराइल के हमलों के कारण संशय की स्थिति पैदा हो गई है जिनके बारे में माना जाता है कि वे अब भी जीवित हैं। हमास ने आरोप लगाया कि नेतन्याहू ने संघर्षविराम समझौते को खत्म कर दिया और बंधकों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। बयान में हमास ने मध्यस्थों से इजराइल को ‘‘समझौते का उल्लंघन करने और उसे खत्म करने के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार ठहराने'' का आह्वान किया। इसने एक बयान में इजराइल की ओर से किए गए हमलों की निंदा की और कहा कि इन हमलों ने बंधकों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है।</p>
<p>दक्षिणी शहर खान यूनिस में ‘एसोसिएटेड प्रेस' के संवाददाताओं ने धमाकों के बाद जगह-जगह धुएं का गुबार देखा। घायल लोगों को एंबुलेंस से नासिर अस्पताल ले जाया गया जहां मरीज फर्श पर पड़े थे और दर्द से तड़प रहे थे। एक छोटे लड़के के सिर पर पट्टी बंधी हुई थी, जबकि एक स्वास्थ्यकर्मी यह जांच रहा था कि उसे कहीं और तो चोट नहीं आई है। हाथ में गंभीर चोट आने से एक लड़की भी दर्द से चिल्ला रही थी। कई फलस्तीनियों ने कहा कि जब फरवरी की शुरुआत में संघर्षविराम के दूसरे चरण पर वार्ता निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो पाई तभी उन्हें युद्ध फिर से शुरू होने की आशंका लग रही थी।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 15:43:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हवाई हमलों में कम से कम 53 लोगों की मौत, यमन पर अमेरिका ने फिर बरपाया कहर</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वास्थ्य मंत्रालय- </strong>यमन में हूती विद्रोहियों को निशाना बनाकर अमेरिकी द्वारा किए गए हवाई हमलों में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई और करीब 100 लोग घायल हो गए। हूती विद्रोहियों द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह जानकारी दी। अमेरिका के इन हमलों ने बाद ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने भी हमलों की धमकी दी है जिससे यमन में तनाव और बढ़ने की आशंका है। हूती विद्रोहियों द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अमेरिकी हमलों में पांच महिलाओं और दो बच्चों समेत कम से कम 53 लोग मारे गए हैं तथा राजधानी सना एवं सऊदी अरब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149956/at-least-53-people-killed-in-air-strikes-america-again"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(16)2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वास्थ्य मंत्रालय- </strong>यमन में हूती विद्रोहियों को निशाना बनाकर अमेरिकी द्वारा किए गए हवाई हमलों में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई और करीब 100 लोग घायल हो गए। हूती विद्रोहियों द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह जानकारी दी। अमेरिका के इन हमलों ने बाद ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने भी हमलों की धमकी दी है जिससे यमन में तनाव और बढ़ने की आशंका है। हूती विद्रोहियों द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अमेरिकी हमलों में पांच महिलाओं और दो बच्चों समेत कम से कम 53 लोग मारे गए हैं तथा राजधानी सना एवं सऊदी अरब की सीमा पर विद्रोहियों के गढ़ सादा समेत अन्य प्रांतों में लगभग 100 लोग घायल हो गए हैं।</p>
<p><strong>अमेरिकी सैनिक-</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को यमन में हूती विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों पर सिलसिलेवार हवाई हमलों का आदेश दिया था। ट्रंप ने चेतावनी दी कि ईरान समर्थित हूती विद्रोही अहम समुद्री गलियारे पर आने-जाने वाले मालवाहक पोतों पर जब तक अपने हमले बंद नहीं कर देते, तब तक वह ‘‘पूरी ताकत से'' हमले जारी रखेंगे। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक ‘पोस्ट' में कहा था, ‘‘हमारे बहादुर सैनिक अमेरिकी जलमार्गों, वायु और नौसेना संपत्तियों की रक्षा करने तथा नौवहन की स्वतंत्रता को बहाल करने के लिए आतंकवादियों के ठिकानों, उनके आकाओं और मिसाइल रक्षा तंत्र पर हवाई हमले कर रहे हैं।''</p>
<p>रुबियो ने कहा कि हूती विद्रोहियों के कुछ केंद्रों को नष्ट कर दिया गया है। रविवार रात प्रसारित भाषण में विद्रोहियों के नेता अब्दुल-मलिक अल-हूती ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘हम तनाव बढ़ाए जाने का जवाब तनाव बढ़ाकर देंगे।'' अल-हूती ने कहा, ‘‘हम अमेरिकी दुश्मन को हमलों, मिसाइल हमलों से और उसके विमानवाहक पोतों, उसके युद्धपोतों को निशाना बनाकर जवाब देंगे।'' हूती मीडिया कार्यालय के उप प्रमुख नसरुद्दीन आमेर ने कहा कि हवाई हमले उन्हें रोक नहीं पाएंगे और वे अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करेंगे। विद्रोहियों के एक अन्य प्रवक्ता मोहम्मद अब्दुलसलाम ने ‘एक्स' पर अपने पोस्ट में ट्रंप के इस दावे को ‘‘झूठा और भ्रामक'' बताया कि हूती अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को खतरा पहुंचाते हैं। </p>
<p>उन्होंने कहा था, ‘‘कोई भी आतंकी ताकत अमेरिकी वाणिज्यिक और नौसैनिक पोतों को दुनिया के जलमार्गों पर स्वतंत्र रूप से आने-जाने से नहीं रोक पाएगी।'' ट्रंप ने ईरान को भी चेतावनी दी कि वह विद्रोही संगठन का समर्थन बंद कर दे, अन्यथा उसे उसके कृत्यों के लिए ‘‘पूरी तरह से जवाबदेह'' ठहराया जाएगा। हूती विद्रोहियों ने शनिवार शाम को सना और सादा में शनिवार तथा रविवार को हवाई हमले होने की सूचना दी। उन्होंने रविवार तड़के होदीदा, बायदा और मारिब प्रांतों में भी हवाई हमले होने की जानकारी दी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने रविवार को ‘CBS' टीवी चैनल से कहा, ‘‘हम इन लोगों को यह नियंत्रित करने नहीं देंगे कि कौन से पोत गुजर सकते हैं और कौन से नहीं।''</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 15:13:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> अमेरिका में मेडिकल हेलीकॉप्टर क्रैश,  फिर उड़ान हादसा सवार सभी लोगों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मेडिसन काउंटी-</strong>    अमेरिका के मिसिसिपी में सोमवार को एक मेडिकल परिवहन हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से उसके एक पायलट और दो अस्पताल कर्मियों की मौत हो गई। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिसिसिपी मेडिकल सेंटर' के प्रवक्ता ने विमान में सवार सभी लोगों की मौत की पुष्टि की। यूनिवर्सिटी ने पहले दिए गए एक बयान में कहा कि मेडिसन काउंटी में जिस समय यह दुर्घटना हुई उस वक्त‘एयरकेयर हेलीकॉप्टर' (चिकित्सा के कार्य में इस्तेमाल होने वाला हेलीकॉप्टर) में किसी मरीज को नहीं ले जाया जा रहा था।</p>
<p><strong>संघीय विमानन प्रशासन- </strong>हादसे में जान गंवाने वाले तीनों लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149788/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/crash-1741670561.webp" alt=""></a><br /><p><strong>मेडिसन काउंटी-</strong>  अमेरिका के मिसिसिपी में सोमवार को एक मेडिकल परिवहन हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से उसके एक पायलट और दो अस्पताल कर्मियों की मौत हो गई। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिसिसिपी मेडिकल सेंटर' के प्रवक्ता ने विमान में सवार सभी लोगों की मौत की पुष्टि की। यूनिवर्सिटी ने पहले दिए गए एक बयान में कहा कि मेडिसन काउंटी में जिस समय यह दुर्घटना हुई उस वक्त‘एयरकेयर हेलीकॉप्टर' (चिकित्सा के कार्य में इस्तेमाल होने वाला हेलीकॉप्टर) में किसी मरीज को नहीं ले जाया जा रहा था।</p>
<p><strong>संघीय विमानन प्रशासन- </strong>हादसे में जान गंवाने वाले तीनों लोगों के परिवारों को सूचित कर दिया गया है, लेकिन अधिकारियों ने गोपनीयता के कारण नाम जारी नहीं किए। यूनिवर्सिटी ने दुर्घटना का कोई कारण नहीं बताया। टेलीविजन स्टेशन ‘डब्ल्यूएपीटी' ने बताया कि संघीय विमानन प्रशासन के अधिकारी दुर्घटनास्थल के लिए रवाना हो गए हैं। मिसिसिपी के गवर्नर टेट रीव्स ने ‘फेसबुक' पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘यह दुखद घटना मिसिसिपी के चिकित्सा से जुड़े कर्मियों द्वारा उठाए जाने वाले जोखिमों की याद दिलाती है। हमारा राज्य इन नायकों के बलिदान को कभी नहीं भूलेगा।''  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Mar 2025 15:41:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कनाडा के नए PM मार्क कार्नी का ट्रंप को कड़ा संदेश- कहा, &quot;तंग करने वाले को हम छोड़ते नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मार्क कार्नी- </strong> कनाडा की सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी ने ‘बैंक ऑफ कनाडा' के पूर्व प्रमुख मार्क कार्नी को अपना नेता चुना है और अब वह देश के नए प्रधानमंत्री होंगे। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब कनाडा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार युद्ध और विलय की धमकियों का सामना कर रहा है। कार्नी (59) प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का स्थान लेंगे जिन्होंने जनवरी में पद से इस्तीफा देने की घोषणा की थी लेकिन अगला प्रधानमंत्री चुने जाने तक वह पद पर बने हुए हैं। कार्नी को 85.9 प्रतिशत वोट मिले हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा, ‘‘हमने यह लड़ाई शुरू नहीं</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149732/canadian-new-pm-mark-carney-of-canadas-new-message-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(33).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मार्क कार्नी- </strong> कनाडा की सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी ने ‘बैंक ऑफ कनाडा' के पूर्व प्रमुख मार्क कार्नी को अपना नेता चुना है और अब वह देश के नए प्रधानमंत्री होंगे। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब कनाडा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार युद्ध और विलय की धमकियों का सामना कर रहा है। कार्नी (59) प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का स्थान लेंगे जिन्होंने जनवरी में पद से इस्तीफा देने की घोषणा की थी लेकिन अगला प्रधानमंत्री चुने जाने तक वह पद पर बने हुए हैं। कार्नी को 85.9 प्रतिशत वोट मिले हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा, ‘‘हमने यह लड़ाई शुरू नहीं की लेकिन जब कोई तंग करता है तो कनाडावासी उसे छोड़ते भी नहीं हैं।'' कार्नी ने यह भी कहा, ‘‘अमेरिकी हमारे संसाधन, हमारा पानी, हमारी ज़मीन, हमारा देश चाहते हैं। ज़रा सोचिए। अगर वे सफल हो गए तो वे हमारी जीवन शैली को नष्ट कर देंगे।'' उन्होंने कहा, "अमेरिका कनाडा नहीं है और कनाडा कभी भी किसी भी तरह से, आकार या रूप में अमेरिका का हिस्सा नहीं होगा।" कनाडा फिलहाल खाद्य और आवास की कीमतों में वृद्धि व आव्रजन की समस्या सहित कई चुनौतियों का सामना कर रहा है और इन कारणों से ट्रूडो की लोकप्रियता घट गई है।</p>
<p>ट्रंप की ओर से कनाडा पर शुल्क लगाए जाने और कनाडा को 51वां अमेरिकी राज्य बनाने की बातों से भी देश में ट्रूडो के प्रति नाराजगी है। कुछ लोग अमेरिका की अपनी यात्राएं रद्द कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग अमेरिकी सामान खरीदने से बच रहे हैं। उम्मीद है कि कार्नी देश में जल्द ही चुनाव करवाएंगे। या तो वह चुनाव की घोषणा करेंगे या फिर संसद में विपक्षी दल इस महीने के अंत में अविश्वास प्रस्ताव लाकर चुनाव करवाने के लिए सरकार को मजबूर कर सकते हैं।  </p>
<p>कार्नी ‘बैंक ऑफ कनाडा' के पूर्व प्रमुख हैं और ‘बैंक ऑफ इंग्लैंड' में अहम पद पर सेवाएं दे चुके हैं, माना जाता है कि इन अहम पदों पर रहने के कारण वह देश को आर्थिक चुनौतियों से बाहर निकालने में सफल रहेंगे। कार्नी ने कहा, ‘‘कोई है जो हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।'' उन्होंने कहा, ‘‘ जैसा कि हम जानते हैं डोनाल्ड ट्रंप ने हमारे द्वारा बनाए गए उत्पादों, हमारे द्वारा बेची जाने वाली वस्तुओं और हमारे जीवनयापन के साधनों पर अनुचित शुल्क लगा दिए हैं। वह कनाडाई परिवारों, श्रमिकों और व्यवसायों पर हमला कर रहे हैं लेकिन हम उन्हें सफल नहीं होने दे सकते।'' कार्नी ने कहा कि कनाडा तब तक जवाबी शुल्क लागू रखेगा जब तक "अमेरिकी इसे जारी रखता है।"</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Mar 2025 15:20:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अफीम युद्ध से फेंटानिल युद्ध तक</title>
                                    <description><![CDATA[<div>जब से डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की सत्ता पर फिर से काबिज हुए हैं। उनका व्यवहार पूरी दुनिया के प्रति ऐसा हो गया है जैसे कि वो मालिक है और बाकि सब उसके आदेश का पालन करने वाले नौकर, कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बता देना, कभी  ग्रीनलैंड के बहाने डेनमार्क को धमकाना, कभी भारत सहित दूसरे देशों के प्रवासियों को बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड वापिस उनके देश फैंक जाना, कभी युक्रेन के राष्ट्रपति को खुलेआम अतंरराष्ट्रीय प्रैस के सामने धमकाना और बेइज्जत करना, कभी ट्रेड टैरिफ रेट के जरिए अन्य देशों पर दबाव बनाने की कोशिश करना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149670/from-opium-war-to-puffed-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(26).jpg" alt=""></a><br /><div>जब से डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की सत्ता पर फिर से काबिज हुए हैं। उनका व्यवहार पूरी दुनिया के प्रति ऐसा हो गया है जैसे कि वो मालिक है और बाकि सब उसके आदेश का पालन करने वाले नौकर, कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बता देना, कभी  ग्रीनलैंड के बहाने डेनमार्क को धमकाना, कभी भारत सहित दूसरे देशों के प्रवासियों को बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड वापिस उनके देश फैंक जाना, कभी युक्रेन के राष्ट्रपति को खुलेआम अतंरराष्ट्रीय प्रैस के सामने धमकाना और बेइज्जत करना, कभी ट्रेड टैरिफ रेट के जरिए अन्य देशों पर दबाव बनाने की कोशिश करना के अलावा अन्य और भी बहुत से मुद्दे हैं जिनको लेकर ट्रंप पर विश्व को अपनी ताकत का एहसास करवाने की सनक सी सवार दिखाई देती है।</div>
<div> </div>
<div>बेशक अन्य देश अपने अपने हिसाब से उसको उत्तर दे रहें हैं परन्तु कही ना कही ट्रंप की खुद को श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। अपने ही देश के पूर्व राष्ट्रपति को अंतर्राष्ट्रीय प्रैस के सामने बेवाकूफ कहना उसके अहंकार को साफ-साफ  दर्शा रहा है। अब ट्रंप के अहंकार का सामना चीन से हुआ है। निसंदेह चीन हमारा दुश्मन देश है। अपनी विस्तारवादी नीति के तहत उसका अपना हर पड़ोसी से विवाद है। भारत की भी उसने बहुत सी भूमि कब्जा रखी है परन्तु यह भी सच है आज अमेरिका जिन तीन देशों से सबसे ज्यादा खौफजदा है उनमें भारत के अलावा चीन और रूस हैं।</div>
<div> </div>
<div>अमेरिका यह जानता है एशिया कि यह तिकड़ी एक होकर यदि उसके सामने खड़ी हो गई तो अमेरिका की बदमाशी का अंत होते देर नही लगेगी। एक बात सभी जानते है कि भारत का सच्चा दोस्त यदि कोई है तो वो रूस है अमेरिका भारत का दोस्त कभी नही हो सकता। अमेरिका भारत के हक में कभी सयुंक्त राष्ट्र महासंघ में विटो का इस्तेमाल नही करेगा जैसा कि रूस भारतीय हितों की रक्षा के लिए समय समय पर करता रहा है। अमेरिका भारत को रक्षा उपकरणों के बड़े बाजार के तौर पर देखता है। ट्रंप ने भारत, चीन और ब्राजील को सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देश करार दे दिया है।</div>
<div> </div>
<div>ट्रंप का कहना है कि उनका प्रशासन अमेरिका फर्स्ट यानी अमेरिका पहले की नीति पर काम करेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा है कि जो देश अमेरिका पर जितना टैरिफ लगाएगा, उसके बदले में अमेरिका भी 2 अप्रैल से उस देश पर उतना ही टैरिफ लगाएगा। ट्रंप के इस एलान ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। चीन जो पहले ही ट्रंप के टैरिफ से जूझ रहा है, उसने अमेरिका को धमकी दे डाली है।</div>
<div> </div>
<div>चीन के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में लिखा है कि अगर अमेरिका युद्ध ही चाहता है, फिर चाहे वो टैरिफ युद्ध हो या फिर व्यापार युद्ध या किसी भी तरह का युद्ध तो हम तैयार हैं और अंत तक इस लड़ाई को लड़ेंगे। अमेरिका को चेतावनी देते हुए लिखा कि फेंटानिल का मुद्दा बनाकर अमेरिका चीन से आने वाले सामान पर टैरिफ बढ़ा रहा है। ऐसे में अपने हितों को सुरक्षित रखना हमारा अधिकार है। अमेरिका के फेंटानिल संकट के लिए न अमेरिका और न ही कोई और जिम्मेदार है।</div>
<div> </div>
<div>इसके बावजूद मानवता और अमेरिका के प्रति समर्थन जताते हुए हमने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाए। इसके बावजूद हमारी कोशिशों को मानने के बजाय अमेरिका, हम पर ही आरोप लगा रहा है और चीन को ही टैरिफ बढ़ाने के नाम पर ब्लैकमेल कर रहा है। वे हम पर उनकी मदद के लिए दबाव बना रहे हैं। इस तरह से अमेरिका की परेशानी हल नहीं होगी और इससे हमारे द्विपक्षीय संबंध और सहयोग भी कमजोर होगा। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि धमकी देकर हमें डराया नहीं जा सकता। दबाव या धमकी चीन से डील करने का सही तरीका नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>जो भी चीन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। अगर अमेरिका सच में फेंटानिल समस्या से निपटना चाहता है तो सही तरीका ये है कि चीन से बात करे और एक दूसरे को पूरा सम्मान दें। फेंटानिल की अवैध तस्करी हर साल अमेरिका के करोड़ों डॉलर और हजारों नागरिक निगल जाती है। फेंटानिल, कोकीन और हिरोइन के तरह एक मादक पदार्थ है परन्तु यह कोकीन-हिरोइन के उल्ट पूर्ण रूप से केमिकल्स से बनने वाला सिंथेटिक ड्रग है।</div>
<div> </div>
<div>इसकी तस्करी अमेरिका में मैक्सिको, कोलम्बिया और कनाडा से होते है परन्तु इस ड्रग को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कैमिकल्स भारी मात्रा में चीन बनाता है और चीन अवैध रूप से इन कैमिकल्स को मेक्सिको आदि देशों में पहुंचाता है, जहां ड्रग माफिया इन कैमिकल्स से फेंटानिल तैयार कर अमेरिका पहुंचाते है। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका में फेंटानिल का कारोबार चीन ही चला रहा है। चीन ने अमेरिका में फेंटानिल युद्ध वैसे ही आरंभ किया है जैसे ब्रिटेन ने 19वी शताब्दी में चीन में अफीम युद्ध का आगाज किया था।</div>
<div> </div>
<div>जिसके कारण चीन को हांगकांग और मोटी रकम हर्जाने के तौर पर ब्रिटेन को सौंपनी पड़ी थी। ट्रंप ड्रग कार्टेल को आतंकवादी संगठन कह चुके हैं। यदि ट्रंप सरकार कोई ऐसा कानून बना देती है जिसमें ड्रग कार्टेलों को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाए, तब सरकार की कार्टेलों के बारे में सैन्य खुफिया जानकारी एकत्र करने और इन समूहों को कोई भी भौतिक सहायता प्रदान करने वाले लोगों पर मुकदमा चलाने की क्षमता बढ़ जाएगी। इससे अमेरिकी सरकार के लिए कार्टेलों के खिलाफ सीधे सैन्य हस्तक्षेप का आदेश देना राजनीतिक रूप से आसान हो जाएगा।</div>
<div> </div>
<div>उदाहरण के तौर पर ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया गया। इसके प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी को एक साल से भी कम समय बाद अमेरिकी ड्रोन हमले में मार दिया गया था। वैसे ड्रग माफिया को आतंकवादी करार देना अमेरिका के लिए आसान नही होगा क्योंकि इसका अमेरिकी नागरिकों पर भी असर पड़ेगा। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Mar 2025 15:18:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>अवैध विदेशियों के मामलों में भारत को अमेरिका से सीख लेनी चाहिए </title>
                                    <description><![CDATA[<div>  भारत, एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से इसका एक बहुत बड़ा भूभाग स्मार्ट फैंसिंग रहित है, विशाल खुला समुद्री क्षेत्र है तथा कुछ स्थानों पर नदी के खुले किनारे हैं। ये वो स्थान है जो अवैध रूप से भारत में घुसने वाले विदेशियों को अवसर प्रदान करते हैं। भारत की संस्कृति ही कुछ ऐसी है कि काम में रूचि रखने वाले गरीबों के लिए अर्थ उपार्जन के अवसर अन्य देशों की तुलना में यहां सहज रूप से मिल ही जाते हैं । क्योंकि भारतीय न सिर्फ सहिष्णु होते हैं अपितु उनमें गरीबों के प्रति</div>
<div> </div>
<div>भारत</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149192/india-should-learn-from-america-in-cases-of-illegal-foreigners%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(4).jpg" alt=""></a><br /><div> भारत, एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से इसका एक बहुत बड़ा भूभाग स्मार्ट फैंसिंग रहित है, विशाल खुला समुद्री क्षेत्र है तथा कुछ स्थानों पर नदी के खुले किनारे हैं। ये वो स्थान है जो अवैध रूप से भारत में घुसने वाले विदेशियों को अवसर प्रदान करते हैं। भारत की संस्कृति ही कुछ ऐसी है कि काम में रूचि रखने वाले गरीबों के लिए अर्थ उपार्जन के अवसर अन्य देशों की तुलना में यहां सहज रूप से मिल ही जाते हैं । क्योंकि भारतीय न सिर्फ सहिष्णु होते हैं अपितु उनमें गरीबों के प्रति सहायता, दया एवं करूणा कूट- कूट कर भरी हुई रहती है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में शायद इसीलिए जगह-जगह पर आरामगाह/रात्रि विश्राम कक्ष,अन्नपूर्णा क्षेत्र,आश्रम खुले हुए हैं जहां बहुत कम टोकन राशि पर या निशुल्क भोजन और आवास की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है वो भी जाति, धर्म, भाषा, लिंग के भेदभाव बिना। दान-पुण्य में विश्वास रखने वाले भारतीयों का एक वर्ग  इन स्थानों के लिए खुले मन से सेवा और आर्थिक मदद करता है। किन्तु इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकारों के चाहने के बाबजूद भी भारत से भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचारी कोई न कोई रास्ता भ्रष्टाचार के लिए इजात कर ही लेते हैं।</div>
<div> </div>
<div>इसी बुराई के कारण घुसपैठियों का अवैध रूप से न सिर्फ भारत मे घुसना आसान हो जाता है अपितु भारत में रहने के लिए आवश्यक दस्तावेज (आधार कार्ड, वोटर आई कार्ड, राशन कार्ड आदि) बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं होता है।कई विदेशियों को समय-समय पर इन नकली दस्तावेजों के साथ पकड़ा भी गया है।भारतीयों का इस तरह का व्यवहार ही दुनिया भर के घुसपैठियों को भारत में अवैध रूप से घुसने के लिए आकर्षित करता है। भारत में अवैध रूप से कितने विदेशी लोग रह रहे हैं, इसका सही- सही आंकड़ा कोई नहीं जानता।</div>
<div> </div>
<div>किन्तु अनुमान लगाया जा रहा है कि इनकी  संख्या लाखों में है।इन अवैध रूप से रह रहे विदेशीयों में एक वर्ग ऐसा भी है जो भारत में मौका मिलते ही आतंक वादी गतिविधियों को अंजाम देता हैं या नारकोटिक्स ड्रग तथा हथियार आदि की तस्करी जैसे  गैर कानूनी धंधे में संलग्न रहता है, नकली करेंसी प्रिंट कर चलन में लाता है तथा खुफिया रुप से भारत की सैन्य गतिविधियों की जानकारी भारत के दुश्मनों तक पहुंचाता है। ऐसी भी शंका व्यक्त की जा रही है कि इन्होंने मतदाता तथा आधारकार्ड जैसे पहचान पत्र ग़लत तरीके से प्राप्त कर लिये है जिसकी मदद से चुनाव परिणाम को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वोटर कार्ड की शक्ति इन्हें राजनीतिक पार्टियों की शरण प्राप्त करने में मदद करती है। हाल ही में सिने स्टार सैफ अली खान के साथ घटी चाकू बाजी की घटना के बाद अब तो अपराधिक गतिविधियों में भी इनका हाथ प्रमाणिक रूप से सामने आने लगा है।</div>
<div> </div>
<div>इस तथ्य से भी शायद ही कोई इंकार करे कि अवैध रूप से विदेशियों का भारत में रहना  सिर्फ देश की सुरक्षा के लिहाज से खतरा मात्र नहीं है, अपितु आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय  हैं क्योंकि ये अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिक न सिर्फ भारत के नागरिकों का हक मारते हैं, अपितु देश के संसाधनों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के अवसर, और सब्सिडी वाली सुविधाएं आदि। </div>
<div> </div>
<div> भारत में रह रहे अवैध  विदेशी नागरिकों में मुख्य रूप से बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी आदि देशों के लोग का शामिल होना सामने आया है। ऐसा देखा गया है कि इनमें से कई लोग वैध वीजा पर भारत आते हैं, लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने पर अपने देश वापिस जाने की वजह भारत में ही रुक जाते हैं। वहीं कुछ लोग बिना किसी वैध दस्तावेज के खुली सीमाओं के जरिए अवैध रूप से घुसपैठ कर भारत में प्रवेश करते हैं तथा विभिन्न असंवैधानिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं।</div>
<div> </div>
<div>भारत में घुसपैठियों की समस्या पूर्वोत्तर सीमावर्ती राज्यों के साथ पश्चिम बंगाल, असम, दिल्ली, मुंबई, और केरल जैसे बड़े महानगरों में ज्यादा गंभीर है , किन्तु ऐसा नहीं है कि इन्होंने अन्य राज्यों में अपना ठिकाना न बनाया हो।हर राज्यों में ये अपने मददगार खोज ही लेते हैं।एनआरसी   के तहत अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान कुछ राज्यों में आरंभ भी हुई है, किन्तु कुछ राजनीतिक कारणों के चलते पूरे देश में 'अवैध विदेशी खोजों अभियान' प्राथमिकता के  आधार पर आरंभ नहीं हो सका है। मेरी दृष्टि में यह स्थिति देश के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि इनकी उपस्थिति  भारत की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से जायज़ नहीं ठहराईं जा सकती।</div>
<div> </div>
<div>हम सब इस घटना से वाकिफ ही है कि भारत के प्रधानमंत्री के अमेरिकी राष्ट्रपति से अच्छे संबंध हैं, दोनों देशों के मध्य भी संबंध अच्छे ही है फिर भी अमेरिका ने अपने देश और देशवासियों के हितों को प्राथमिकता देते हुए भारत के नागरिक जो अमेरिका में गैरकानूनी तरीके से रह रहे थे एक अपराधी की तरह वापिस कर दिया। निश्चित रूप से इन भारतीयों ने गैरकानूनी रास्ता अपना कर भारत की छवि को नुक्सान पहुंचाया है। अतः भारत को भी अमेरिका की तरह अपने देश में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों को चुन-चुनकर बाहर निकालने की कार्रवाई सुनिश्चित करना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>तथा राष्ट्र हित मे पार्टी पोलिटिक्स से उपर उठकर सभी राजनीतिक दलों को सरकार के इस अभियान में सहयोग देना चाहिए। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब विपक्षी पार्टियां सरकार पर विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के लिए दबाव डालें। घुसपैठ रोकने के लिए यदि भारत को लगता है उसके कानून पर्याप्त नहीं हैं तो उसमें आवश्यक सुधार किये जाना चाहिए , साथ ही यदि सीमाओं को और अभेद्य बनाये जाने की जरूरत है,तो अविलंब इस पर काम शुरू होना चाहिए। घुसपैठ रोकने के लिए सार्वजनिक जागरूकता जैसे कदम उठाने की भी आवश्यकता है, ताकि कोई भारतीय विदेशियों की सहायता न करें और न ही पनाह देने पर विचार करे।मेरा ऐसा मानना है कि भारत को अपनी सुरक्षा और संप्रभुता बनाए रखने के लिए संतुलित और प्रभावी नीति अपनानी होगी, ताकि मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बना रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Mar 2025 15:48:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रूस के लिए संजीवनी: ट्रंप की शांति नीति या रणनीतिक चाल?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में भारी उथल-पुथल देखी जा रही है। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर उनकी नई रणनीति सुर्खियों में बनी हुई है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की पर रूस के साथ ज़मीन की अदला-बदली को लेकर समझौता करने का दबाव डाला है। यह खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े बदलावों की ओर संकेत कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां अमेरिका की नई विदेश नीति पूरी तरह से बदली हुई नजर आ रही है। ज़ेलेंस्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब तक रूस के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148609/sanjeevani-trumps-peace-policy-or-strategic-moves-for-russia"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(4)1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में भारी उथल-पुथल देखी जा रही है। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर उनकी नई रणनीति सुर्खियों में बनी हुई है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की पर रूस के साथ ज़मीन की अदला-बदली को लेकर समझौता करने का दबाव डाला है। यह खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े बदलावों की ओर संकेत कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां अमेरिका की नई विदेश नीति पूरी तरह से बदली हुई नजर आ रही है। ज़ेलेंस्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब तक रूस के किसी भी क्षेत्रीय दावे को सख्ती से खारिज करते रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब दबाव में आते हुए इस मुद्दे पर विचार करने को मजबूर हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल यूक्रेन की संप्रभुता के लिए एक बड़ा झटका होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यूरोप और अमेरिका के संबंधों पर भी दूरगामी असर डालेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप प्रशासन ने सत्ता में आते ही यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अब अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा और दूसरे देशों के युद्धों में खुद को झोंकने की नीति से पीछे हटेगा। उनका मानना है कि यूक्रेन को दी जा रही सैन्य और आर्थिक सहायता अमेरिका के संसाधनों पर भारी बोझ डाल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसका कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं है। यही कारण है कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्द समाप्त करने के पक्षधर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले ही इसके लिए यूक्रेन को कुछ कठिन फैसले क्यों न लेने पड़ें। ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ज़ेलेंस्की दोनों से बातचीत की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया है कि यदि यूक्रेन शांति चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे रूस के साथ बातचीत कर कुछ क्षेत्रीय रियायतें देने के लिए तैयार रहना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूक्रेन के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। ज़ेलेंस्की शुरू से ही रूस के खिलाफ अडिग रुख अपनाए हुए थे और पश्चिमी देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष रूप से अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">से लगातार समर्थन की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन ट्रंप की नई विदेश नीति उनके लिए एक बड़ा झटका साबित हो रही है। यदि अमेरिका ने यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता पर कटौती कर दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे युद्ध में रूस के खिलाफ अकेले खड़ा रहना पड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता को देखते हुए बेहद कठिन होगा। इस फैसले से यूरोपीय देशों में भी चिंता बढ़ गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे अब तक अमेरिका के साथ मिलकर यूक्रेन का समर्थन कर रहे थे। अगर अमेरिका पीछे हटता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यूरोप पर भी इसका भारी असर पड़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और नाटो की सुरक्षा नीति में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका की नई विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ट्रंप प्रशासन ने यूक्रेन से दुर्लभ खनिज और महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी की मांग की है। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप प्रशासन ने इस तरह की मांग रखी हो। इससे पहले भी उनके कार्यकाल में यह आरोप लगे थे कि उन्होंने यूक्रेन पर दबाव डालकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से जुड़ी जानकारी मांगी थी। इस बार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप चाहते हैं कि यूक्रेन अमेरिका को उन दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति करे जो रक्षा और तकनीकी उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे खनिज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका उपयोग उच्च तकनीक वाली सैन्य प्रणालियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा भंडारण में किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह मांग दर्शाती है कि अमेरिका अब यूक्रेन को केवल सैन्य सहायता देने के बदले उससे अपनी आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने की अपेक्षा कर रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए ट्रंप की रणनीति घरेलू राजनीतिक कारणों से भी प्रेरित हो सकती है। वे अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे अमेरिका को अनावश्यक युद्धों से बाहर निकाल रहे हैं और देश के संसाधनों को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। उनकी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत वे अमेरिकी करदाताओं के पैसे को विदेशी युद्धों में झोंकने के बजाय घरेलू विकास पर खर्च करना चाहते हैं। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी इस नीति की आलोचना भी हो रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका ने यूक्रेन का समर्थन कम किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इससे रूस और अन्य तानाशाही प्रवृत्ति वाले देशों को आक्रामक होने का अवसर मिल सकता है। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है और अमेरिका की विश्व स्तर पर नेतृत्व की भूमिका कमजोर हो सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप और नाटो देशों में भी इस नीति को लेकर गहरी चिंता है। अगर अमेरिका अपने सहयोग से पीछे हटता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल यूक्रेन बल्कि पूरे यूरोप के लिए खतरा बन सकता है। नाटो के कई सदस्य देश मानते हैं कि ट्रंप की नीति से रूस को और बल मिलेगा और वह भविष्य में अन्य देशों के खिलाफ भी आक्रामक रुख अपना सकता है। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन भी इस स्थिति का लाभ उठा सकता है और ताइवान जैसे मुद्दों पर अधिक आक्रामक रणनीति अपना सकता है। ट्रंप की नीति से अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश भी असमंजस में आ गए हैं कि क्या वे अब भी अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रह सकते हैं या उन्हें अपनी स्वतंत्र सुरक्षा नीति बनानी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रंप के पुनः राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका की नवगठित रणनीति ने ज़ेलेंस्की को एक जटिल और चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में ला खड़ा किया है। अब यह अत्यंत रोचक होगा कि वे इस नए परिदृश्य में किस प्रकार अपनी कूटनीतिक कुशलता का परिचय देते हैं और क्या वे रूस के साथ किसी संभावित समझौते के लिए तैयार होंगे। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका की रूस-यूक्रेन नीति किस दिशा में विकसित होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यूरोप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और शेष विश्व पर इसके व्यापक और दीर्घकालिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2025 17:52:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>  घर छोड़ के मत जाओ कही घर न मिलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div>अपने व अपने परिवार के लिये जीविकोपार्जन की तलाश में बाहर निकलना अथवा अप्रवासी बनना प्रकृति का बनाया एक ऐसा चक्र है जिससे पृथ्वी का शायद कोई भी प्राणी अछूता नहीं। रोज़ी रोटी की तलाश में सभी प्राणियों को अपने अपने घरों से निकलकर बाहर जाना ही होता है। चूँकि प्रकृति ने मानव को अतिरिक्त सोच बुद्धि व योग्यता से नवाज़ा है इसलिये वह अपने अप्रवासन का रास्ता अपनी आर्थिक हैसियत,अपनी भविष्य की मनोकमनायें,कमाई का स्तर सुविधाजनक राज्य, देश व ठिकाने आदि बहुत कुछ देखकर तय करता है।</div>
<div>  </div>
<div>गत पांच दशकों से अमेरिका,कनाडा व ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत के अप्रवासियों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148364/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/indian-imagrants.jpg" alt=""></a><br /><div>अपने व अपने परिवार के लिये जीविकोपार्जन की तलाश में बाहर निकलना अथवा अप्रवासी बनना प्रकृति का बनाया एक ऐसा चक्र है जिससे पृथ्वी का शायद कोई भी प्राणी अछूता नहीं। रोज़ी रोटी की तलाश में सभी प्राणियों को अपने अपने घरों से निकलकर बाहर जाना ही होता है। चूँकि प्रकृति ने मानव को अतिरिक्त सोच बुद्धि व योग्यता से नवाज़ा है इसलिये वह अपने अप्रवासन का रास्ता अपनी आर्थिक हैसियत,अपनी भविष्य की मनोकमनायें,कमाई का स्तर सुविधाजनक राज्य, देश व ठिकाने आदि बहुत कुछ देखकर तय करता है।</div>
<div> </div>
<div>गत पांच दशकों से अमेरिका,कनाडा व ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत के अप्रवासियों के लिये आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। रोज़गार के अतिरिक्त भारतीय मुद्रा के मुक़ाबले डॉलर्स की कीमतों में भारी अंतर,सुरक्षित,साफ़ सुथरा,वातावरण,शुद्धता,ईमानदारी,भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण,सामाजिक सुरक्षा,बच्चों की शिक्षा व बुज़ुर्गों की सुरक्षा जैसी अनेक बातें भारतीयों को इन देशों में आने के लिये आकर्षित करती हैं। </div>
<div> </div>
<div> अप्रवासन करने वालों में एक वर्ग जो उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक,शोधार्थी,इंजीनियर्स,डॉक्टर्स,स्पेस वैज्ञानिक आदि जैसे क्षेत्रों से जुड़ा होता है। ऐसे प्रतिभाशाली लोगों के लिये तो लगभग पूरी दुनिया के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं। दूसरा वर्ग शिक्षा हासिल करने की ग़रज़ से या शिक्षा हासिल करने के बहाने इन देशों में जाता है और वहीँ का होकर रह जाता है। और तीसरा वर्ग पैसों के बल पर इन देशों में जाना चाहता है।</div>
<div> </div>
<div>और यही वर्ग आसानी से विदेश भेजने वाले एजेंटों के जाल में फंसकर कबूतरबाज़ी या डंकी रुट का शिकार हो जाता है। ऐसे कई लोग जहाँ संपन्न परिवारों के होते हैं वहीं अनेक ऐसे भी होते हैं जिन्होंने अपने घर का सोना,ज़मीन आदि बेचकर या गिरवी रखकर एजेंटों को मुंह मांगी रक़म दी होती है।</div>
<div> </div>
<div> <img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-02/indians-in-us-army-plane.jpg" alt="indians in us army plane" width="768" height="511"></img>यहां उस वर्ग का उल्लेख करना भी बेहद ज़रूरी है जो सत्ता में या तो शीर्ष पदों पर है या जिसके ऊँचे रसूख़ हैं या फिर उच्चाधिकारी वर्ग यहाँ तक कि वह वर्ग भी जोकि देश के युवाओं को "मेक इन इण्डिया " और रोज़गार मांगो मत बल्कि रोज़गार दो,यहाँ तक कि शिक्षित लोगों के पकोड़ा बेचने को भी रोज़गार मानता है ऐसे अनेक लोगों के बच्चे या तो विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं या फिर वहां बड़े व्यवसाय कर रहे हैं। कई 'राष्ट्रभक्त महामनवों ' की संतानें तो विदेशी नागरिकता तक लिये बैठी हैं।                </div>
<div> </div>
<div>बहरहाल, अतिवाद की ओर तेज़ी से बढ़ते विश्व में अमेरिका ने एक बार फिर अतिविवादित व्यक्ति डोनाल्ड ट्रंप को अपना राष्ट्रपति चुन लिया है। उनके आलोचक ट्रम्प को एक नस्लवादी, कट्टरपंथी तथा एक स्त्री-द्वेषी और एक विदूषक के रूप में देखते हैं। सच पूछिये तो ऐसे व्यक्ति का पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनने का विचार ही शांतिप्रिय दुनिया के लिये चिंता पैदा करने तथा दुनिया की नींद हराम करने के लिए पर्याप्त है। ट्रंप जहाँ कई देशों को अपनी 'गिद्ध दृष्टि' से देख रहे हैं वहीं ट्रंप प्रशासन द्वारा ब्राज़ील, ग्वाटेमाला, पेरू और होंडुरास के लोगों को भी  'अवैध ' बताकर अमेरिकी सैन्य विमान से ही उनके देश वापस भेजा गया है।</div>
<div> </div>
<div>भारत भी उन्हीं दुर्भाग्यशाली देशों में एक है जिसके 'अवैध' बताये जा रहे 104 अमेरिकी प्रवासी अमेरिकी मालवाहक सैन्य विमान में भरकर बड़ी ही अपमानजनक स्थिति में वापस भारत लाये जा चुके हैं। ख़बर यह भी है कि इसी तरह के 487 भारतीयों की एक और खेप अमेरिका किसी भी समय भारत वापस भेज सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस समय अमेरिका में लगभग 7. 25 लाख लोग ऐसे रह रहे हैं जिनको 'अवैध प्रवासी' के रूप में चिन्हित किया जा चुका है। इस तरह के लगभग 1700 'अवैध प्रवासी' भारतीयों को अमेरिका में हिरासत में लेकर उन्हें डिटेंशन सेंटर में भी डाला जा चुका है। </div>
<div> </div>
<div>वीज़ा,इमिग्रेशन,नागरिकता आदि देने या इनसे सम्बंधित क़ानून बनाने का हर देश का अपना अधिकार है। परन्तु ट्रंप की वापसी के बाद जिस अपमानजनक तरीक़े से भारतीय युवाओं को निकला जा रहा है और सरकार द्वारा उसपर लीपा पोती की जा रही है और भारतीय युवाओं के अपमान को लेकर कोई शिकायत अमेरिका के समक्ष दर्ज नहीं कराई जा रही है उसे लेकर भारतीय युवाओं में निराशा ज़रूर है। ख़ासतौर से इस बात के मद्दे नज़र कि प्रधान मंत्री मोदी अपने को ट्रंप का दोस्त बताते हैं।</div>
<div> </div>
<div>यहाँ तक कि उनके पिछले चुनाव में अमेरिका जाकर 'अबकी बार ट्रंप सरकार ' का नारा भी लगवाते हैं ? ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आख़िर ट्रंप ने भी उस दोस्ती की लाज क्यों नहीं रखी? क्यों हमारे युवाओं के हाथों में हथकड़ी  पैरों में बेड़ियाँ व ज़ंजीरें मुंह पर मास्क आदि लगाकर सैन्य विमान में बिठाकर बड़ी ही कष्टदायक स्थिति में उन्हें भारत भेजा गया ? क्या वजह थी कि जिस तरह रूस-यूक्रेन जंग के कारण यूक्रेन से वापस आने वाले युवाओं के लिये ऑपरेशन गंगा चलाया गया था और मंत्रियों द्वारा विमान में घुसकर उनका स्वागत किया गया था उसी तरह भारत अपने विमान भेजकर उन तथाकथित 'अवैध अप्रवासियों' को वापस क्यों नहीं बुलाता ?</div>
<div> </div>
<div>ख़ासकर यह सवाल इसलिये और भी पूछा जा रहा है कि जब कोलंबिया के कथित अवैध प्रवासियों को अमेरिकी सैन्य विमान द्वारा कोलंबिया वापस भेजने की घोषणा की गई तो कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेड्रो द्वारा इसका सख़्त विरोध किया गया। उसी समय राष्ट्रपति पेड्रो ने कहा कि वो अपने नागरिकों की 'गरिमा' को बरक़रार रखना चाहते हैं। इसके फ़ौरन कोलंबिया वायु सेना के दो विमान अमेरिका गए और वो अपने नागरिकों को ससम्मान लेकर राजधानी बोगोटा वापस पहुंचे। क्या भारत अपने नागरिकों के सम्मान के लिये ऐसा नहीं कर सकता था ?</div>
<div> </div>
<div>आज जब अमेरिकी डॉलर का मूल्य 87.79 ,कनाडा डॉलर का मूल्य 61.31 एवं ऑस्ट्रेलिया डॉलर का 54.97 रुपये है ऐसे में इन देशों में काम की तलाश में कौन जाना नहीं चाहेगा ? वैसे भी जब भारत सरकार स्वयं यह कह कर अपनी पीठ थपथपाये  कि हम भारत के 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन दे रहे हैं इसी से साफ़ हो जाता है कि इस सरकार ने आम लोगों को किस स्थिति में पहुंचा दिया है। यहाँ तक कि 'रेवड़ी आवंटन ' तो अब भारत के मुख्य चुनावी एजेंडे में शामिल हो चुका है।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे में प्रतिभाओं का पालयन तो हो ही रहा है साथ ही आम आदमी भी चाहे अपनी ज़मीन,सोना,मकान आदि गिरवी रखकर या बेचकर इन देशों में जाना चाहते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि उनका व उनके परिवार का भविष्य भारत में सुरक्षित नहीं। देश में आर्थिक अनिश्चितता का जो वातावरण है उससे वे वाक़िफ़ हैं तभी विदेशी एजेंटों के झांसे में आकर विदेश यात्रा हेतु कई ग़लत व ग़ैर क़ानूनी क़दम उठा लेते हैं। इनमें कई लोगों को तो अवैध तरीक़े से सीमा पार करने हेतु जंगलों व ख़तरनाक समुद्री रास्तों से गुज़रना होता है।</div>
<div> </div>
<div>कई युवा तो अपनी जान भी गँवा बैठते हैं। लिहाज़ा जहाँ भारत को विश्व की महाशक्ति बनने का सपना दिखाने वालों की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपने देश में ही अधिक से अधिक ऐसे अवसर उपलब्ध करायें ताकि पलायन पर नियंत्रण किया जा सके और इसतरह के अपमान से युवाओं को बचाया जा सके। दूसरी तरफ़ युवाओं को भी भारत में ही रहकर हर सरकारों पर रोज़गार के अवसर उपलब्ध करने का दबाव बनाना चाहिये। साथ ही संतोष व मान सम्मान का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिये। डॉ बशीर बद्र साहब ने ठीक ही कहा है कि-<em>'भीगी हुई आँखों का ये मनज़र न मिलेगा'। घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा।।</em></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 16:59:01 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title> अमेरिका द्वारा प्रवासी भारतीयों का अपमान नाकाबिले बर्दाश्त और घोर निंदनीय - डा विजय शंकर तिवारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>अम्बेडकरनगर। </strong>अमेरिका द्वारा अवैध प्रवासियों को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर अमानवीय व्यवहार करते हुए भारत भेजना घोर निंदनीय है और भारत के राष्ट्रीय गौरव का अपमान है जो 146 करोड़ देशवासियों को नाकाबिले बर्दाश्त और घोर निंदनीय है जिसके लिए ट्रंप प्रशासन की जितनी भी निंदा की जाय कम है उप्र कांग्रेस के पीसीसी सदस्य और जिला कांग्रेस मीडिया प्रभारी डा विजय शंकर तिवारी ने जिला प्रशासन को राष्ट्रपति को संबोधित चार सूत्रीय ज्ञापन सौंपते हुए यह आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को ट्रंप सरकार द्वारा भारत के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली इस बेड़ी हथकड़ी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148319/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/,,1,,,.....,,,.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>अम्बेडकरनगर। </strong>अमेरिका द्वारा अवैध प्रवासियों को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर अमानवीय व्यवहार करते हुए भारत भेजना घोर निंदनीय है और भारत के राष्ट्रीय गौरव का अपमान है जो 146 करोड़ देशवासियों को नाकाबिले बर्दाश्त और घोर निंदनीय है जिसके लिए ट्रंप प्रशासन की जितनी भी निंदा की जाय कम है उप्र कांग्रेस के पीसीसी सदस्य और जिला कांग्रेस मीडिया प्रभारी डा विजय शंकर तिवारी ने जिला प्रशासन को राष्ट्रपति को संबोधित चार सूत्रीय ज्ञापन सौंपते हुए यह आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को ट्रंप सरकार द्वारा भारत के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली इस बेड़ी हथकड़ी डिपोर्ट कार्यवाही पर सख्त आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी लेकिन केंद्र सरकार की अक्षमता और खामोशी दुर्भाग्यपूर्ण तथा अमेरिका का दुस्साहस अक्षम्य है।</div>
<div> </div>
<div>जिला कांग्रेस मीडिया प्रभारी डा विजय शंकर तिवारी ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष  मल्लिकार्जुन खड़गे , कांग्रेस महासचिव और संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल तथा उप्र कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के आवाहन पर देशव्यापी कार्यक्रम के तहत आज जिला कांग्रेस कमेटी के तत्वावधान में जनपद के कांग्रेसजनों ने अमेरिका की के इस भारत-विरोधी कदम की निंदा करते हुए महामहिम राष्ट्रपति को संबोधित चार सूत्रीय ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा तथा भाजपा मोदी सरकार शर्म करो के नारे लगाए।</div>
<div> </div>
<div>जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष राम कुमार पाल ने कहा कि केंद्र सरकार को अवैध प्रवासियों की आवाजाही को रोकने के लिए और ऐसे अवैध गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त एजेंसियों और व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कानून बनाना चाहिये जिससे कि इस तरह के राष्ट्रीय अपमान की नौबत ही नहीं आये </div>
<div>उप्र कांग्रेस सोशल मीडिया महासचिव संजय तिवारी ने कहा कि इतिहास और पुराने आंकड़ों के पीछे छुपनेवाली सरकार हर चुनाव में घुसपैठियों को भगाने का खोखला नारा देती है और प्रवासी भारतीयों के मानवाधिकार हनन पर उल्टा अपने उन्हीं देशवासियों को दोषी करार दे रही जो अपना घर-बार बेंच कर रोजी रोटी कमाने का सपना लिए डंकी रूट से अमेरिका गये जाहिर है कि भारत के विदेश नीति का जनाजा  भाजपा सरकार ने निकाल दिया।</div>
<div> </div>
<div>वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुखी लाल वर्मा, पीसीसी सदस्य जिला उपाध्यक्ष गुलाम रसूल छोटू, जिला उपाध्यक्ष रवीश शुक्ला और उप्र युवा कांग्रेस महासचिव विशाल वर्मा ने भी प्रदर्शन को संबोधित करते हुए अमेरिकी कार्रवाई पर घोर आपत्ति जताई।प्रमुख रूप से जिला अल्पसंख्यक कांग्रेस अध्यक्ष हाजी मो सलीम, सुनील कुमार गौड़ आदि मौजूद रहे।</div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Feb 2025 18:36:18 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>हम तेरे मुल्क में आए हैं मुसाफिर की तरह ! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>  डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका की सत्ता मे काबिज होने के तुरंत बाद ही जिस तरह हाथ बांधकर 104 भारतीयों को अमेरिका से देश निकाला कर भारत भेज दिया गया वह न सिर्फ शर्मनाक है वरन अमेरिका में आप्रवासियों के योगदान को भुला एक गैर जिम्मेदाराना हरकत भी है। हालांकि यह पहले से ही तय माना जा रहा था कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में वापसी से न सिर्फ अमेरिका की राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आयेगा, बल्कि उनकी नीतियों का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ेगा, जिससे भारत भी अछूता नहीं रहने वाला</div>
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<div>सत्ता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148283/we-have-come-to-your-country-like-a-traveler-%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(17).jpg" alt=""></a><br /><div> डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका की सत्ता मे काबिज होने के तुरंत बाद ही जिस तरह हाथ बांधकर 104 भारतीयों को अमेरिका से देश निकाला कर भारत भेज दिया गया वह न सिर्फ शर्मनाक है वरन अमेरिका में आप्रवासियों के योगदान को भुला एक गैर जिम्मेदाराना हरकत भी है। हालांकि यह पहले से ही तय माना जा रहा था कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में वापसी से न सिर्फ अमेरिका की राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आयेगा, बल्कि उनकी नीतियों का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ेगा, जिससे भारत भी अछूता नहीं रहने वाला है।</div>
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<div>सत्ता संभालने के साथ ही ट्रंप ने अपने देश में रह रहे अवैध प्रवासियों को निकालना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में अवैध भारतीय अप्रवासियों को लेकर अमेरिकी सैन्य विमान भारत आया है। ट्रंप प्रशासन की ओर से पदभार संभालने के बाद देश के प्रवासियों पर यह पहली कार्रवाई है। अमेरिका से अवैध रुप से प्रवेश करने वाले 104 लोग भारत पहुंचे है।</div>
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<div>अमेरिका से निर्वासित लोगों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग शामिल हैं, जिनमें से सबसे कम उम्र का बच्चा केवल 4 वर्ष का है और गुजराततत से है। पंजाब के 30, हरियाणा के 33, चंडीगढ़ के 2, गुजरात के 33, उत्तर प्रदेश के 3 व महाराष्ट्र के 3 लोग शामिल हैं। इनमें 48 लोग ऐसे हैं, जिनकी उम्र 25 वर्ष से कम है। अमेरिका से अवैध प्रवासियों की वापसी से भारत की चिंताएं बढ़ना स्वभाविक है, क्योंकि वहां काफी संख्या में अवैध तरीके से भारतीय प्रवासी रह रहे हैं।</div>
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<div>हालांकि इसमें भारत के लिए कुछ करने को ज्यादा नहीं है, क्योंकि अवैध रूप से प्रवेश करने बालों का समर्थन नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत, भारतीय नागरिकों को वैध तरीके से वापस लेने को तैयार है। अमेरिका में अवैध तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों को वापस लेने का विदेश मंत्री का बयान दूसरे देश की संप्रभुता का सम्मान करने के साथ कूटनीतिक दूरदर्शिता का भी परिचायक है। </div>
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<div> इस मामले को लेकर संसद में पूरा दिन हंगामा होता रहा। इस अपमान भरे ढंग से भारतीयों को देश भेजे जाने पर कड़ी आपत्ति होना स्वाभाविक है। यह भी कि चाहे भारत ने यह मान लिया था कि वह सूची में दर्ज 18,000 देशवासियों को वापस लेने के लिए तैयार है, जो गैर-कानूनी ढंग से अमरीका में दाखिल हुए थे, परन्तु ट्रम्प प्रशासन की ओर से उन्हें बेइज्जत करके निकालने से देश का अपमान हुआ है। इस संबंध में विदेश मंत्री जय शंकर ने इतना ज़रूर कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित बना रही है कि अमरीका से निकाले जाने वाले भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार न हो।</div>
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<div>विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि बिना दस्तावेज़ों के अमरीका में रह रहे भारतीयों का वहां से बेदखली का मामला नया नहीं है, यह सिलिसला पिछले वर्षों में भी चलता रहा है। वर्ष 2009-2010 तथा 2011 में वहां रह रहे हज़ारों ही भारतीयों को यहां भेजा गया था परन्तु जो ढंग-तरीका इस बार अपनाया गया है, वह बेहद आपत्तिजनक है। अमरीका में दशकों से लगभग 50 लाख भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं। ऐसे समाचार सामने आने से उनके सम्मान को भी ठेस लगना स्वाभाविक  है।</div>
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<div>विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस मामले पर इसलिए निशाने पर लिया है क्योंकि वह डोनाल्ड ट्रम्प की पहली पारी में और अभी भी उनके साथ दोस्ती का दम भरते रहे हैं। आगामी दिनों में वह अमरीका का दौरा कर रहे हैं। उससे पहले डोनाल्ड ट्रम्प इन भारतीयों को इस शर्मनाक तरीके से निकालने से क्या सन्देश दे रहे हैं, यह देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाली बात है। यह भी प्रश्न उठता है कि भारत ने ग्वाटेमाला की भांति अमरीकी सैन्य विमान पर 40 घंटे बंदी बना कर बिठाए गए भारतीयों को इस तरह लाने की इजाजत क्यों दी?</div>
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<div>एक गैर-कानूनी व्यक्ति को निकालने पर अमरीका की सरकार का भारी खर्च ज़रूर होता है परन्तु भारत सरकार को ऐसे ढंग के प्रति सचेत होने की ज़रूरत थी। अमरीका ने अब 15 लाख विदेशियों की सूची तैयार की है, जिसमें से अभी उसने 18 हज़ार भारतीय ही गिनाए हैं, परन्तु पुष्टि किए गए समाचारों के अनुसार इस समय लगभग सवा सात लाख अमरीका में ऐसे भारतीय हैं, जो बिना कागजात के गैर-कानूनी ढंग से रह रहे हैं, जो 'डंकी रूट' द्वारा वहां पहुंचे थे।</div>
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<div>यहां ही बस नहीं, कनाडा, यूरोप और एशिया के अन्य देशों के कई भागों में भी लाखों ही भारतीय गैर-कानूनी ढंग से दाखिल हो कर रह रहे हैं। अक्तूबर 2024 में भी ऐसे भारतीयों को वापिस भेजा गया था, जिसके लिए बाइडन प्रशासन ने चार्टर विमान का इस्तेमाल किया था। एक अनुमान के अनुसार अमरीका में तो विभिन्न देशों से लगभग एक करोड़ प्रवासी गैर-कानूनी ढंग से दाखिल हुए हैं, जिन पर ट्रम्प द्वारा अपनाई गई कड़ी नीति के कारण तलवार लटकनी शुरू हो गई है।</div>
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<div>पिछले वर्षों से हर साल अनुमानित 90 हज़ार से अधिक भारतीय अमरीका में गैर-कानूनी ढंग से दाखिल होते हैं तथा उनमें से ज्यादातर पकड़े भी जाते हैं, जिन्हें वहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बुरी तरह अपमानित किया जाता रहा है। बता देंकि ज्यादातर वही लोग देश से बाहर निकलना चाहते हैं, जो बेरोज़गार हैं, अधिक महत्वाकांक्षी हैं जिन्हें विदेश में बेहतर भविष्य दिखाई देता है। उनकी ऐसी मनोस्थिति का एजेंट अधिक से अधिक लाभ उठाने का यत्न करते हैं।</div>
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<div>वे युवाओं को झूठे प्रलोभन में फंसा कर किसी भी ढंग तरीके से विदेशों में भेजते हैं, वहां उन्हें भटकने के लिए विवश करते हैं। कई वहां पर सफल भी हो जाते हैं, परन्तु ज्यादातर अनिश्चित जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं। अमरीका के सैन्य विमान में लाए गए देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों की दास्तान बेहद दुःख भरी है। ज्यादातर अपने परिवार के सीमित साधन होने के बावजूद किसी न किसी तरह बड़ी राशि खर्च करके विदेशों में जाते हैं। इसलिए कि वह वहां किसी तरह अपना अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें।</div>
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<div>दरअसल, भारत में आज भी अमेरिका में जाकर नौकरी करने का जबरदस्त क्रेज है और इसके चकर में तमाम लोग गिरोहों के जरिए वहां अवैध रूप से पहुंचाए जा रहे हैं। यह बात अलग है ये भारतीय अपनी मेहनत और ईमानदारी से वहां के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। इस घुसपैठ से वहां की कंपनियों को भी बहुत अधिक फायदा मिल रहा है। अमेरिकन कंपनियों को सस्ता श्रम उपलब्ध हो रहा है, क्योंकि कम वेतन में वहां अमेरिका के नागरिक उपलब्ध नहीं  हैं।</div>
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<div>हालांकि बहुत सारे भारतीय 'वर्क परमिट' पर अमेरिका में प्रवेश करते हैं और वह बाद में जब इसकी अवधि समाप्त हो जाती है तो वे अवैध प्रवासी बन जाते हैं। भारतीयों का अमेरिका की अर्थव्यवस्था में काफी ज्यादा योगदान है। लेकिन ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान ही साफ कर दिया था कि उनकी वापसी के साथ ही अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़ा निर्वासन अभियान शुरू होगा। अमेरिका में बिना किसी वैध प्रयोजन के रह रहे लगभग 18,000 अवैध अप्रवासियों के लिए अंतिम निष्कासन आदेश जारी कर दिए गए हैं, जिन्हें किसी भी समय भारत भेजा जा सकता है।</div>
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<div>अमेरिका द्वारा जारी किए गए एच-1बी वीजा ज्यादातर भारतीय लोगों को मिले हैं। ट्रंप ने अक्सर अपने इमीग्रेशन एजेंडे को लागू करने के लिए सेना का इस्तेमाल किया है। उन्होंने अमेरिका की मैक्सिको सीमा पर सेना भेजी है, प्रवासियों को रखने के लिए सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया है और उन्हें अमेरिका से बाहर निकालने के लिए सैन्य विमानों का इस्तेमाल किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका के इमिग्रेशन एंड कस्टम एनफोर्समेंट की सूची के अनुसार ऐसे करीब 20,427 भारतीयों की सूची हैं, जो अवैध प्रवासियों की श्रेणी में आते हैं। इनमें से 17,940 भारतीयों के मूल निवासी होने के पतों का दस्तावेजी सत्यापन भी हो चुका है।</div>
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<div>इन्हें भी अमेरिका से निकालने की कार्यवाही चल रही हैं। एक निजी एजेंसी के अनुसार अमेरिका में करीब 7.25 लाख भारतीय अवैध ढंग से रह रहे हैं। अगर देखा जाए तो अमेरिका से अवैध प्रवासियों को निकाले जाने की बात कोई नई नहीं है। अक्टूबर 2023 से सितंबर 2024 के दौरान 1100 लोगों को चार्टड विमान से भेज चुका है। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में भारत समेत अन्य देशों के चार लाख से भी अधिक अप्रवासी निकाले गए थे।</div>
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<div>अमेरिका अब तक चार छोटे देशों ग्वाटेमाला, होंडुरास, इक्वाडोर और पेरू के अवैध प्रवासियों को निकाल चुका है। भारत पांचवां देश हैं, जहां के अवैध प्रवासियों को निकाला गया है। अमेरिका ने मैक्सिको और कोलंबिया के भी अवैध प्रवासियों को सैन्य विमान में लादकर भेजा था। परंतु इन देशों की सरकारों ने विमान को अपने देशों की सीमा के भीतर उतरने की मंजूरी नहीं दी थी। बाद में इन्हें सीमा पर उतारने की सहमति बन गई थी। अमेरिका में वैध एवं अवैध तरीकों से बसने की इच्छा रखने वालों में भारत के बाद दूसरे पायदान पर चीनी नागरिक हैं।</div>
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<div>इसके बाद अल-साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास, फिलीपींस, मैक्सिको और वियतनाम के प्रवासी हैं। दरअसल अमेरिका अवसरों और उपलब्धियों से भरा देश माना जाता है। इसलिए लोग बेहतर और सुविधाजनक जीवन जीने की दृष्टि से अमेरिका में स्थाई तौर से बसने की लालसा रखते हैं। किंतु अब लगता है अमेरिका में विदेशी प्रवासियों के रास्ते बंद हो रहे हैं। क्योंकि अमेरिका ने जन्मजात नागरिकता पर भी रोक लगाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। ट्रंप द्वारा जन्मजात नागरिकता खत्म करने के आदेश के पहले तक अमेरिका में किसी भी देश के प्रवासी दंपत्ति के जन्मे शिशु को जन्मजात नागरिकता स्वतः मिल जाती थी।</div>
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<div>यह प्रावधान तब भी था, जब उनकी माता अवैध रूप से देश में रह रही हो और पिता भी वैध स्थायी निवासी न हो। ट्रंप द्वारा जन्मजात नागरिकता पर प्रतिबंध के बाद सबसे अधिक परेशानी उन महिलाओं को हो रही है, जो अमेरिका में शरणार्थी या अवैध प्रवासी के रूप में रह रही हैं। ये सवाल उठा रही हैं कि उनकी कोख में पल रहे मासूम शिशु का क्या दोष है? ट्रंप के प्रतिबंधित आदेश के अनुसार वही जन्मजात बच्चे अमेरिकी नागरिकता के पात्र होंगे जिनके माता या पिता अमेरिकी नागरिक हैं।</div>
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<div>हालांकि देखा जाए तो अवैध प्रवासियों के संदर्भ में अमेरिका को अपने गिरेबान में भी झांकने की जरूरत है। क्योंकि चिड़िया भी पंख नहीं भार सकती, का दावा करने वाला देश अवैध तरीके से आने वाले प्रवासियों पर लगाम लगाने में अब तक नाकाम रहा है। इसीलिए अमेरिका को मूलतः अप्रवासियों का देश माना जाता है। </div>
<div>आपको पता रहे कि आज अमेरिका जिस विकास और समृद्धि को प्राप्त कर पूंजीपति व शक्ति-संपन्न राष्ट्र बना दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाए बैठा है, उसकी पृष्ठभूमि में दुनिया के प्रवासियों का ही प्रमुख योगदान है।</div>
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<div>लिहाजा ट्रंप के प्रवासी भारतीयों समेत अन्य प्रवासियों को अमेरिका में ही बसाए रखने के नीति और उपाय बदस्तूर रखने चाहिए, यही अमेरिका के हित में होगा।लेकिन अमेरिकी सत्ताधारी जिस तरह की शर्मनाक व गैर जिम्मेदाराना हरकत कर रहे हैं वह नितान्त गैर जरूरी  है। भारत सरकार को इस मामले में गंभीर कूटनीतिक कदम उठाने चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Feb 2025 16:29:30 +0530</pubDate>
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