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                <title>indian democracy - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>परिसीमन बिल गिरने से  देश को तो  लाभ हुआ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176917/the-country-benefited-from-the-falling-of-the-delimitation-bill"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1399507-womens-reservation-delimitation-opposition.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा  सीट के    सांसदों के वेतन और भत्तों का  खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों  की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर  डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका लाभ कुल मिलाकर </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का होता।  लोकसभा में वर्तमान </span>545 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों के हिसाब से की महिलाओं के </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  प्रतिशत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आरक्षण के हिसाब से </span>205 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटें बढ़तीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सभी </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में </span>2045 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का इजाफा होता। यानी </span>70 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ महिलाओं में से मात्र </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और  विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़  जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">12 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मोदी सरकार  की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में </span>1990 <span lang="hi" xml:lang="hi">में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोकसभा में ही ढ़ह  गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब एनडीए के अपने </span>353 <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब बात सांसदों और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ओपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्थान पर नई पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों में महंगाई भत्ते (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">और महंगाई राहत (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीआर</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">में वृद्धि तो की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> फिर भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है। वे तो  सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय की गारंटी चाहते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया  हो जाएगें,किंतु सासदों और विधायकों की संख्या  उनके  वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने  वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया जाता। यह कहीं गणना  नही होती कि इससे देश पर कितना बोझ  पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिकों की भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष 75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ जहां देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर  इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं। सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भत्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये) और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इन सबको जोड़ दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी (4,000 किलोलीटर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">34 मुफ्त हवाई यात्राएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला  आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार मानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़ से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर एक स्थायी बोझ बन जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राजकोषीय अनुशासन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन सुधार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की बात की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं होते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ एक जवान है जो अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा अनिवार्य  है,  वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक दिन के लिए सांसद या विधायक  बनने  पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है,  उसकी   उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि मिलती है।कोई व्यक्ति  यदि चार बार सांसद  और तीन बार विधायक  बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर  मिलती है। वर्तमान   पंजाब सरकार ने  एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ  एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।    </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां विधायी विस्तार के खर्चों को बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी कटौती करने और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पेंशन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि देश का पैसा सांसदों की सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:37:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>अनिवार्य मतदान जन जागरूकता की आवश्यकता और लोकतंत्र की सुदृढ़ता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है जहां जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। जब नागरिक मतदान करते हैं तब वे अपने भविष्य की दिशा तय करते हैं और शासन व्यवस्था को आकार देते हैं। इसके बावजूद यह एक गंभीर सच्चाई है कि देश में बड़ी संख्या में लोग मतदान से दूर रहते हैं। यही कारण है कि अनिवार्य मतदान और जन जागरूकता की आवश्यकता आज अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गई है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में यह स्पष्ट रूप से देखा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176446/compulsory-voting-need-for-public-awareness-and-strengthening-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/vote.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है जहां जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। जब नागरिक मतदान करते हैं तब वे अपने भविष्य की दिशा तय करते हैं और शासन व्यवस्था को आकार देते हैं। इसके बावजूद यह एक गंभीर सच्चाई है कि देश में बड़ी संख्या में लोग मतदान से दूर रहते हैं। यही कारण है कि अनिवार्य मतदान और जन जागरूकता की आवश्यकता आज अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि यह किसी एक दल का विषय नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का विषय है। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस निर्णय को राजनीति के तराजू पर न तौला जाए बल्कि इसे देशहित में देखा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विपक्ष श्रेय लेना चाहता है तो वह ले सकता है लेकिन महिलाओं के अधिकारों को रोका नहीं जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण लोकतंत्र की भावना को मजबूत करने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर कई विपक्षी नेताओं ने इस विषय पर शंका और विरोध प्रकट किया। प्रियंका वाड्रा ने इसे राजनीतिक दृष्टि से प्रेरित बताया जबकि अखिलेश यादव ने इसे केवल नारे तक सीमित बताया। इसी प्रकार कपिल सिब्बल ने भी सरकार की मंशा पर प्रश्न उठाए। लोकतंत्र में प्रश्न उठाना आवश्यक है लेकिन हर विषय पर बिना ठोस आधार के विरोध करना उचित नहीं है। जब कोई निर्णय व्यापक जनहित से जुड़ा हो तो उसका समर्थन किया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहीं पर अनिवार्य मतदान का महत्व सामने आता है। यदि प्रत्येक नागरिक के लिए मतदान करना अनिवार्य हो जाए तो लोकतंत्र और अधिक सशक्त हो सकता है। इससे नागरिकों में अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। लोग केवल दर्शक बनकर नहीं रहेंगे बल्कि सक्रिय भागीदार बनेंगे। इससे शासन व्यवस्था अधिक प्रतिनिधिक और संतुलित बनेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में यह देखा गया है कि कई बार शिक्षित वर्ग भी मतदान के प्रति उदासीन रहता है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की भागीदारी अधिक होती है। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं बल्कि सोच की भी है। इसलिए आवश्यक है कि समाज के हर वर्ग तक यह संदेश पहुंचे कि मतदान केवल अधिकार नहीं बल्कि कर्तव्य भी है। जब तक यह भावना विकसित नहीं होगी तब तक लोकतंत्र की जड़ें पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाएंगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अनिवार्य मतदान लागू करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। विद्यालयों महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से लोगों को यह समझाना होगा कि उनका एक मत कितना महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति यह समझेगा कि उसका मत देश की दिशा तय कर सकता है तब वह स्वेच्छा से मतदान के लिए प्रेरित होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मतदान प्रक्रिया सरल और सुगम हो। मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि किसी भी नागरिक को मतदान करने में कठिनाई न हो। पारदर्शिता और निष्पक्षता भी उतनी ही आवश्यक है क्योंकि जब लोगों का विश्वास चुनाव प्रक्रिया में बना रहेगा तब ही वे अधिक संख्या में भाग लेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक सशक्त विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाता है और नीतियों में सुधार लाने में मदद करता है। लेकिन जब विपक्ष हर विषय पर केवल विरोध करता है तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। जनता यह समझने लगती है कि विरोध तर्क पर आधारित नहीं बल्कि राजनीति से प्रेरित है। इसलिए विपक्ष को चाहिए कि वह रचनात्मक भूमिका निभाए और जहां आवश्यक हो वहां समर्थन भी दे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे विषय केवल राजनीतिक मुद्दे नहीं हैं बल्कि सामाजिक परिवर्तन के माध्यम भी हैं। यदि इन पर सहमति बनती है तो यह देश के लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाएगा। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह संदेश कि यह लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए वास्तव में सार्थक है क्योंकि लोकतंत्र में सामूहिक निर्णय ही सबसे प्रभावी होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अनिवार्य मतदान इस पूरी प्रक्रिया को नई दिशा दे सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि हर नागरिक अपनी भूमिका निभाए और लोकतंत्र केवल कुछ लोगों तक सीमित न रह जाए। इससे सरकारों को भी जनता की वास्तविक इच्छाओं के अनुसार काम करना पड़ेगा क्योंकि हर मत महत्वपूर्ण होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं है बल्कि यह कर्तव्यों का भी समुच्चय है। यदि नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेंगे तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा। इसलिए यह समय है कि अनिवार्य मतदान जैसे विचारों पर गंभीरता से विचार किया जाए और जन जागरूकता को व्यापक स्तर पर बढ़ाया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष को भी यह समझना चाहिए कि बेवजह विरोध करना लोकतंत्र के हित में नहीं है। यदि कोई निर्णय देश और समाज के लिए लाभकारी है तो उसका समर्थन किया जाना चाहिए। स्वस्थ बहस और रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र की पहचान है लेकिन केवल विरोध करना उचित नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब हर नागरिक जागरूक होगा और अपने मताधिकार का उपयोग करेगा तब ही भारत का लोकतंत्र वास्तव में सशक्त और जीवंत बन पाएगा। अनिवार्य मतदान और जन जागरूकता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:18:40 +0530</pubDate>
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                <title>लोकतंत्र की पुनर्रचना: आरक्षण, परिसीमन और भारत का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175829/reconstruction-of-democracy-reservation-delimitation-and-the-future-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/celebrating-indian-democracy-and-leadership.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने के लिए सचमुच तत्पर है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह प्रश्न महिला आरक्षण और परिसीमन के उस संयुक्त विमर्श से उभरा है, जो आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है। इसे समझने के लिए पहले उस स्थिति को देखना आवश्यक है जो दशकों से बनी हुई है। स्वतंत्रता के पश्चात जब प्रथम लोकसभा गठित हुई, तब उसमें केवल बाईस महिला सदस्य थीं। यह संख्या तब से अत्यंत धीमी गति से बढ़ी है। 17वीं लोकसभा में यह लगभग 15% के आसपास ही पहुँची। राज्य विधानसभाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ अनेक राज्यों में महिला विधायकों का औसत दस प्रतिशत से भी कम है। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का सत्र बुलाया बुलाया है। इस दौरान संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी है। सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 हो जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से संसद ने वह ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन पारित किया जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत लोकसभा और समस्त राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई अर्थात तैंतीस प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। यह आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा, जिसका अर्थ यह है कि सामाजिक न्याय की दोहरी परत इस व्यवस्था में समाहित है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह बताता है कि जब किसी विधायिका में महिलाओं की भागीदारी तीस प्रतिशत के आसपास पहुँचती है, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल कल्याण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर नीति-निर्माण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है। रवांडा जैसे देश, जहाँ संसद में महिलाओं की भागीदारी साठ प्रतिशत से अधिक है, इसके जीवंत उदाहरण हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">किंतु इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद पक्ष इसका कार्यान्वयन है। यह स्पष्ट किया गया है कि यह आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा, बल्कि इसे आगामी जनगणना और उसके पश्चात होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू किया जाएगा। वर्तमान संकेतों के अनुसार इसे वर्ष दो हजार उनतीस के आम चुनाव तक लागू करने की योजना है। इस विलंब ने अनेक राजनीतिक दलों और महिला संगठनों में असंतोष उत्पन्न किया है। उनका तर्क है कि जो अधिकार न्यायसंगत है और जिसकी आवश्यकता स्वीकार की जा चुकी है, उसे किसी तकनीकी प्रक्रिया के अधीन क्यों बनाया जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">परिसीमन की प्रक्रिया स्वयं में एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील विषय है। इसका सरल अर्थ है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, ताकि प्रत्येक प्रतिनिधि लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे और लोकतंत्र की मूल भावना एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य सुनिश्चित हो सके। भारत में अंतिम व्यापक परिसीमन उन्नीस सौ इकहत्तर की जनगणना के आधार पर किया गया था। उसके बाद यह प्रक्रिया इस उद्देश्य से स्थगित कर दी गई कि यदि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में सीटें बढ़ाई गईं, तो परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों को राजनीतिक हानि उठानी पड़ेगी। यह स्थगन एक नैतिक निर्णय था, किंतु अब जब पाँच दशक से अधिक समय बीत चुका है और जनसंख्या का वितरण नाटकीय रूप से बदल चुका है, तो परिसीमन की अनिवार्यता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान जनसंख्या आँकड़ों पर दृष्टि डालें तो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग पच्चीस करोड़ से अधिक है, बिहार की लगभग तेरह करोड़, जबकि केरल की जनसंख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ और तमिलनाडु की लगभग साढ़े सात करोड़ है। यदि परिसीमन पूर्णतः जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों को संसद में अनेक अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत घट सकती है। दक्षिण के राज्यों का तर्क यह है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, राज्य की नीतियों का अनुपालन किया और अब उन्हें इसी अनुपालन के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ रहा है। यह केवल संख्याओं का विवाद नहीं है यह उस संघीय भावना का प्रश्न है जिसके आधार पर भारत का ताना-बाना बुना गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस संकट से निपटने के लिए एक प्रस्ताव यह आया है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जाए। वर्तमान में लोकसभा में पाँच सौ तैंतालीस निर्वाचित सीटें हैं। परिसीमन के बाद यह संख्या आठ सौ या इससे भी अधिक तक जा सकती है। इस वृद्धि का तर्क यह है कि यदि सीटों की कुल संख्या बढ़ाई जाए, तो किसी भी राज्य की वर्तमान सीटें घटाए बिना नई जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। इससे दक्षिण भारत के राज्यों की आशंका कुछ हद तक कम हो सकती है। किंतु इसके साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या आठ सौ या उससे अधिक सदस्यों वाली संसद प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है, क्या विधायी विमर्श की गुणवत्ता बनी रह सकती है और क्या नई संसद भवन इतनी बड़ी संख्या को समायोजित करने में सक्षम होगा। नए संसद भवन में एक हजार से अधिक सदस्यों की बैठने की व्यवस्था इस दिशा में एक दूरदर्शी तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण और सीट-वृद्धि का यह संयोजन भारतीय दलीय राजनीति के भीतर भी गहरे परिवर्तन उत्पन्न करेगा। प्रत्येक दल को अपनी एक-तिहाई सीटें महिला प्रत्याशियों के लिए सुनिश्चित करनी होंगी। यह व्यवस्था उन महिलाओं के लिए अवसर का द्वार खोलेगी जो प्रतिभावान हैं, सक्रिय हैं, किंतु दलीय संरचना के भीतर टिकट पाने में असमर्थ रही हैं। साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि दल किन महिलाओं को आगे लाएँगे, क्या वे वास्तव में स्वतंत्र और सशक्त नेत्रियाँ होंगी, या केवल परिवारवाद के विस्तार के रूप में उन्हें मैदान में उतारा जाएगा। पंचायत स्तर का अनुभव इस संदर्भ में मिश्रित रहा है। एक ओर लाखों महिला प्रतिनिधियों ने ग्रामीण प्रशासन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, पेयजल, स्वच्छता और विद्यालयों के विषय में निर्णय लिए हैं; तो दूसरी ओर अनेक स्थानों पर परिवार के पुरुष सदस्य ही वास्तविक निर्णय-कर्ता बने रहे और महिला प्रतिनिधि केवल प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित रहीं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं को वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलना चाहिए। संसदीय समितियों में, मंत्रिमंडल में, नीति-निर्माण के हर स्तर पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। आरक्षण द्वार खोलता है, किंतु उस द्वार से होकर जो यात्रा होती है, वह वातावरण, व्यवस्था और सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए इस आरक्षण के भीतर उनकी पर्याप्त भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी, यह प्रश्न अभी विमर्श की प्रतीक्षा में है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत इस समय एक ऐसे ऐतिहासिक सन्धिकाल पर खड़ा है, जहाँ से दो मार्ग जाते हैं। एक मार्ग वह है जहाँ यह सारी व्यवस्था महिला आरक्षण, परिसीमन, सीट-वृद्धि - एक समग्र, संतुलित और संवेदनशील ढंग से लागू होती है और भारतीय लोकतंत्र वास्तव में अधिक समावेशी, अधिक प्रतिनिधिक और अधिक न्यायपूर्ण बनता है। दूसरा मार्ग वह है जहाँ ये प्रावधान केवल कागजी रह जाते हैं, क्षेत्रीय असंतुलन और सामाजिक विभाजन गहरे होते हैं और एक ऐतिहासिक अवसर व्यर्थ चला जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परिपक्वता इसी में प्रकट होगी कि वह इन जटिलताओं के बीच संतुलन साध सके, संघीय भावना की रक्षा करते हुए महिलाओं को वास्तविक सत्ता-भागीदारी दे सके और यह सुनिश्चित कर सके कि प्रतिनिधित्व केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि न बनकर सामाजिक परिवर्तन का सेतु बने। यह बहस केवल एक अधिनियम या एक प्रक्रिया की बहस नहीं है - यह उस प्रश्न की बहस है कि भारत किस लोकतंत्र का निर्माण करना चाहता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:45:22 +0530</pubDate>
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                <title>रिकॉर्ड मतदान, बदलता भारत — लोकतंत्र अब जनता की मुट्ठी में</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175691/record-turnout-is-changing-india-%E2%80%93-democracy-now-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही विश्वास जोड़ रहा था—लोकतंत्र को और मजबूत करने का विश्वास। शाम तक आंकड़ों ने बता दिया कि जनता ने केवल मतदान नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव आयोग के अनुसार मतदान समाप्ति से एक घंटे पहले (शाम </span>5 <span lang="hi" xml:lang="hi">बजे तक) के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र की नई ताकत का ऐलान करने वाले हैं—असम में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत और पुडुचेरी में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान। ये केवल संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस जागते भारत की तस्वीर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब राजनीति को दूर से देखना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अपनी मुट्ठी में लेना चाहता है। लगभग </span>5.3 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ मतदाताओं की इस भागीदारी ने साफ कर दिया कि जनता अब भाषणों और नारों के पीछे चलने वाली भीड़ नहीं रही। वह सवाल करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाब मांगती है और अपने वोट से बता रही है कि सत्ता का असली मालिक नागरिक है। यही वजह है कि ये चुनाव केवल तीन राज्यों की घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा बन गए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम में इस बार का चुनाव कई अर्थों में ऐतिहासिक रहा। </span>126 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले राज्य में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। </span>2023 <span lang="hi" xml:lang="hi">के परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच यह पहला चुनाव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए लोगों की भागीदारी भी बढ़ी। भाजपा-एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्ता बचाने में जुटा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कांग्रेस और अन्य दल वापसी की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि मतदाता दलों से अधिक अपने मुद्दों पर केंद्रित दिखा। भूमि अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमा सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और विकास जैसे सवाल लोगों को बूथ तक ले आए। डलगांव जैसे क्षेत्रों में </span>94 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक मतदान ने बता दिया कि असम अब केवल सरकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना भविष्य चुन रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम की जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी राजनीतिक चेतना भी दिखा दी। पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुसपैठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाई तनाव और अवसरों की कमी से लंबे समय तक जूझते रहे इस राज्य ने साफ कर दिया कि अब उसे केवल वादे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठोस जवाब चाहिए। गांवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ी इलाकों और सीमा से लगे क्षेत्रों में जिस तरह महिलाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्ग और युवा मतदान के लिए निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की ताकत शहरों तक सीमित नहीं है। असम ने यह भी दिखाया कि पूर्वोत्तर अब राष्ट्रीय राजनीति का किनारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसकी दिशा तय करने वाली मजबूत आवाज बन चुका है। वहां की जनता ने बता दिया कि लोकतंत्र सबसे मजबूत तब होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सबसे दूर बैठा नागरिक भी अपने वोट की कीमत समझने लगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में तस्वीर अलग थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संदेश उतना ही मजबूत। </span>140 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों पर हुए चुनाव में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। यह आंकड़ा असम और पुडुचेरी से कम जरूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक केरल में यह भागीदारी अपने आप में असाधारण है। एलडीएफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूडीएफ और भाजपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। पलक्कड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोझीकोड और कई जिलों में </span>80 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता ने खुलकर अपनी राय दी। यहां मतदाता केवल दल नहीं देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों और भविष्य की दिशा को भी परखता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वहां लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक संस्कृति बन चुका है। बारिश के बावजूद बूथों पर लगी लंबी कतारों ने बता दिया कि यहां का नागरिक मतदान को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानता है। बड़ी संख्या में महिलाएं और पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदान के लिए पहुंचे। युवाओं ने बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी शिक्षा और बेहतर अवसरों के सवाल उठाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि महिलाओं ने स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी। केरल के मतदाता ने साफ कर दिया कि अब राजनीति केवल विचारधारा तक सीमित नहीं रहेगी। जनता का विश्वास उसी दल को मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन चुनावों में अगर किसी ने पूरे देश को सबसे ज्यादा चौंकाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह पुडुचेरी था। केवल </span>9.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख मतदाताओं वाले इस छोटे केंद्र शासित प्रदेश में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने लोकतंत्र की नई मिसाल कायम कर दी। </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले पुडुचेरी में एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस-डीएमके गठबंधन और अन्य दलों के बीच मुकाबला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबसे बड़ी जीत जनता की भागीदारी की रही। कराईकल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुडुचेरी और आसपास के इलाकों में सुबह से शाम तक मतदान केंद्रों पर भीड़ उमड़ी रही। स्थानीय रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी सुविधाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास और स्वायत्तता जैसे मुद्दों ने लोगों को बूथ तक पहुंचाया। इस छोटे प्रदेश ने पूरे देश को बता दिया कि लोकतंत्र की ताकत आबादी से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिकों की जागरूकता से तय होती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी के चुनावों ने भारत को एक बड़ा संदेश दिया है। चुनाव आयोग की तैयारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़ी सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईवीएम पर बढ़ा भरोसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अभियान और सोशल मीडिया से बढ़ी जागरूकता ने मतदान को जन-आंदोलन बना दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत का मतदाता अब बदल चुका है। वह चुप रहने वाला नागरिक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने अधिकारों और भविष्य के प्रति सजग प्रहरी बन गया है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को नतीजे आएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें बनेंगी और समीकरण बदलेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी जीत पहले ही सामने आ चुकी है। वह जीत है जनता का यह विश्वास कि उसकी उंगली पर लगी स्याही केवल निशान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 18:12:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पांच राज्यों के चुनाव में कानून व्यवस्था सबसे बड़ी कसौटी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों ने राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है। पश्चिम बंगाल असम तमिलनाडु केरल और पुडुचेरी में चुनावी गतिविधियां तेज हैं, लेकिन इस बार सबसे अधिक चर्चा कानून व्यवस्था को लेकर हो रही है। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हो पाएंगे या नहीं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सबसे अधिक विवाद और तनाव पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174550/law-and-order-is-the-biggest-criterion-in-the-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260325_1748291.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों ने राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है। पश्चिम बंगाल असम तमिलनाडु केरल और पुडुचेरी में चुनावी गतिविधियां तेज हैं, लेकिन इस बार सबसे अधिक चर्चा कानून व्यवस्था को लेकर हो रही है। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हो पाएंगे या नहीं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सबसे अधिक विवाद और तनाव पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का गंभीर आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि राज्य में प्रशासनिक तंत्र निष्पक्ष नहीं है और मतदाताओं को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है। इन आरोपों के बाद मामला भारत निर्वाचन आयोग तक पहुंच चुका है। यह स्थिति कानून व्यवस्था की दृष्टि से चिंताजनक मानी जा रही है क्योंकि जब सत्तारूढ़ दल पर ही इस प्रकार के आरोप लगते हैं तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर भ्रामक प्रचार करने का आरोप लगाया है। राज्य में पहले भी चुनावों के दौरान हिंसा और तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। इस बार भी पूरक मतदाता सूची को लेकर असमंजस और लाखों नामों पर विचाराधीन स्थिति ने प्रशासनिक चुनौती को और बढ़ा दिया है। स्पष्ट है कि बंगाल में कानून व्यवस्था चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है और इसे संभालना प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पूर्वोत्तर के राज्य असम में भी स्थिति पूरी तरह शांत नहीं कही जा सकती। यहां कांग्रेस और एआईयूडीएफ कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की घटना सामने आई है, जिसने चुनावी माहौल में तनाव का संकेत दिया है। यह घटना दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कभी-कभी टकराव का रूप ले लेती है। हालांकि राज्य में सत्तारूढ़ पक्ष लगातार यह दावा कर रहा है कि कानून व्यवस्था पहले की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन इस तरह की घटनाएं चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखती है, लेकिन यहां भी राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज हैं। नामांकन, रैलियां और जनसंपर्क कार्यक्रमों के बीच प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि कहीं भी अव्यवस्था या टकराव की स्थिति न बने। विभिन्न दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी जरूर तेज है, परंतु अभी तक बड़े स्तर पर हिंसक घटनाओं की खबर नहीं है। यह राज्य परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनावों के लिए जाना जाता है, लेकिन सतर्कता यहां भी जरूरी है क्योंकि चुनावी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दक्षिण भारत के ही केरल में चुनावी प्रक्रिया एक अलग ही स्वरूप में नजर आती है। यहां राजनीतिक चेतना उच्च स्तर की मानी जाती है और मतदाता सक्रिय रूप से भागीदारी करते हैं। इस बार भी बुजुर्गों और दिव्यांग मतदाताओं के लिए घर से मतदान की सुविधा शुरू की गई है, जो लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हालांकि यहां प्रत्यक्ष हिंसा की घटनाएं कम देखने को मिलती हैं, फिर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और वैचारिक टकराव लगातार जारी रहता है। कानून व्यवस्था की दृष्टि से राज्य अपेक्षाकृत संतुलित नजर आता है, लेकिन प्रशासन को पूरी सतर्कता बनाए रखनी होती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पुडुचेरी में चुनावी गतिविधियां सीमित दायरे में होती हैं, लेकिन यहां भी राजनीतिक समीकरण काफी जटिल होते हैं। छोटे क्षेत्रफल के बावजूद यहां गठबंधन राजनीति का प्रभाव अधिक है। कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है, क्योंकि छोटी घटनाएं भी बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं। हालांकि अब तक यहां से किसी बड़ी हिंसक घटना की सूचना नहीं है, लेकिन चुनावी माहौल को देखते हुए सावधानी आवश्यक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन पांचों राज्यों की स्थिति का समग्र विश्लेषण यह बताता है कि जहां एक ओर लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कानून व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आई है। चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं होते, बल्कि यह जनता के विश्वास और प्रशासन की निष्पक्षता की भी परीक्षा होते हैं। यदि मतदाता भयमुक्त होकर मतदान नहीं कर पाएंगे तो चुनाव का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। प्रशासन और भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका इस समय सबसे अहम हो जाती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर मतदाता बिना किसी दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि इन चुनावों में जीत-हार से अधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है। कानून व्यवस्था की स्थिति ही तय करेगी कि यह चुनाव लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक बनेंगे या फिर अव्यवस्था की मिसाल। देश की नजरें इन पांच राज्यों पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न होंगे, जिससे लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 18:43:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>कुर्सी का कोड: क्या ‘ऑपरेशन लोटस’ सत्ता की नई रणनीति है?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र अपनी संरचनात्मक विविधता और राजनीतिक प्रक्रियाओं की जटिलता के लिए जाना जाता है। चुनावों के बाद गठबंधन, पुनर्गठन और सरकारों में परिवर्तन केवल वर्तमान की घटनाएं नहीं हैं बल्कि दशकों से भारतीय राजनीति की स्वाभाविक विशेषताएं रही हैं। इन्हीं परिवर्तनों के बीच एक शब्द समय-समय पर उभरता रहा है, वह है -'ऑपरेशन लोटस'। यह कोई संवैधानिक या आधिकारिक शब्द नहीं बल्कि मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक लोकप्रिय अभिव्यक्ति है जो उन परिस्थितियों को दर्शाती है जहां विधायकों की निष्ठा या इस्तीफों के कारण बहुमत का संतुलन बदल जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दलबदल का इतिहास भारत</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161495/chairs-code-is-operation-lotus-the-new-strategy-of-power"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/hindi-divas37.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र अपनी संरचनात्मक विविधता और राजनीतिक प्रक्रियाओं की जटिलता के लिए जाना जाता है। चुनावों के बाद गठबंधन, पुनर्गठन और सरकारों में परिवर्तन केवल वर्तमान की घटनाएं नहीं हैं बल्कि दशकों से भारतीय राजनीति की स्वाभाविक विशेषताएं रही हैं। इन्हीं परिवर्तनों के बीच एक शब्द समय-समय पर उभरता रहा है, वह है -'ऑपरेशन लोटस'। यह कोई संवैधानिक या आधिकारिक शब्द नहीं बल्कि मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक लोकप्रिय अभिव्यक्ति है जो उन परिस्थितियों को दर्शाती है जहां विधायकों की निष्ठा या इस्तीफों के कारण बहुमत का संतुलन बदल जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दलबदल का इतिहास भारत में पुराना है। 1960 और 1970 के दशक में कई बार ऐसा हुआ कि विधायकों के समूह परिवर्तन से राज्य सरकारें बदलीं और राजनीतिक स्थिरता बाधित हुई। इस अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून लागू किया गया। इसके बावजूद बदलते राजनीतिक समीकरणों की वास्तविकता यह है कि इस्तीफे, पुनर्निर्वाचन और नए राजनीतिक गठजोड़ अभी भी भारतीय राजनीति का हिस्सा बने हुए हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोकतांत्रिक ढांचे में प्रतिनिधियों की भूमिका और उनकी व्यक्तिगत-राजनीतिक मान्यताएं कई बार बड़े परिवर्तन का कारण बन जाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में कई राज्य ऐसे हैं जहां दलबदल या बड़े पैमाने पर इस्तीफों के कारण सरकारें बदलीं और इन उदाहरणों ने राजनीतिक विश्लेषण में 'ऑपरेशन' जैसे शब्दों को जन्म दिया। 2019 में कर्नाटक एक महत्वपूर्ण उदाहरण है जहां कुछ विधायकों के इस्तीफों से बहुमत का संतुलन बदल गया और राज्य की सरकार में परिवर्तन हुआ। यह घटना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है कि इससे दलबदल कानून, विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याओं पर विस्तृत चर्चा हुई। इसी तरह 2020 में मध्य प्रदेश में एक बड़े समूह के विधायकों के इस्तीफा देने के बाद राज्य का राजनीतिक परिदृश्य अचानक बदल गया और नई सरकार का गठन हुआ। इस घटना ने भी संवैधानिक प्रक्रियाओं और बहुमत परीक्षण पर नए प्रश्न खड़े किए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र में 2022 की घटनाएं भी राजनीतिक पुनर्संरचना का एक उदाहरण बन गईं जहां विधायकों के समूहगत परिवर्तन और नए गठबंधन ने राज्य की सरकार को नया रूप दिया। यह मामला कई महीनों तक सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का केंद्र रहा और इसने दलबदल कानून, व्हिप की वैधता और पार्टी नेतृत्व संबंधी प्रश्नों को नई रोशनी में प्रस्तुत किया। इसके पहले, 2016 में अरुणाचल प्रदेश की घटनाएं भी चर्चा में रहीं, जब विधायकों के पुनर्संरेखण से सरकार बदली और केंद्र-राज्य संबंधों, राष्ट्रपति शासन और न्यायिक हस्तक्षेप पर महत्वपूर्ण निर्णय सामने आए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन घटनाओं को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इन्हें संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिरता के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। सरकारी व्यवस्थाएं लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर होती हैं। जब सरकारें बार-बार बदलती हैं तो विकास परियोजनाओं, नीतियों के कार्यान्वयन और प्रशासनिक निरंतरता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जनता अक्सर यह प्रश्न उठाती है कि ऐसे बदलाव उसके द्वारा दिए गए जनादेश की भावना को किस हद तक प्रभावित करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की अपेक्षा होती है कि चुनी हुई सरकार स्थिर रूप से कार्य करे और उसकी नीतियां दीर्घकालिक दृष्टि से लागू हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो इन सभी घटनाओं की जमीन संविधान और दलबदल विरोधी प्रावधानों में निहित है। दलबदल कानून विधायकों को मनमाने ढंग से पार्टी बदलने से रोकता है, लेकिन इसमें इस्तीफा देने और पुन: चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है। यही वह बिंदु है जहां अनेक बार राजनीतिक दल रणनीतिक रूप से कदम उठाते हैं और बहुमत का संतुलन प्रभावित होता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी दायरे में होती है लेकिन इसकी राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग स्वरूपों में सामने आती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">'ऑपरेशन लोटस' जैसे शब्द भारतीय लोकतंत्र की बदलती प्रकृति के संकेतक मात्र हैं। ये किसी एक दल या विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे परिस्थितियां दर्शाते हैं जब विधायकों के निर्णयों से सत्ता-संतुलन बदल जाता है। एक परिपक्व लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि इन घटनाओं को केवल राजनीतिक रंग में न देखा जाए बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं, न्यायिक व्याख्याओं और प्रशासनिक परिणामों के व्यापक दृष्टिकोण से समझा जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की शक्ति यही है कि वह परिवर्तन और स्थिरता दोनों को साथ लेकर चलता है। राजनीतिक पुनर्संरचना के ये उदाहरण हमें यह सीख देते हैं कि शासन की स्थिरता, विधायी निष्ठा और जनादेश के सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखना भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती और अनिवार्यता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Nov 2025 16:42:10 +0530</pubDate>
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                <title>हमारी संसद :नौ दिन चले अढ़ाई कोस</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारतीय लोकतंत्र सबसे पुराना है।  पुरानी हैं इसकी रिवायतें,लेकिन इसी लोकतंत्र की रक्षा केलिए बनी हमारी संसद आजकल चल नहीं पा रही।  लोकसभा अध्यक्ष हों या राज्य सभा अध्यक्ष वे अपने-अपने सदनों को सुचारु रूप से चलाने में नाकाम साबित हुए है। सरकार और वविपक्ष के बीच का गतिरोध है की टूटने का नाम ही नहीं ले रहा। देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण की चपेट में है और देश की संसद हंगामे में डूबी है। संसद को हंगामे से उबारने की कोई गंभीर कोशिश नजर नहीं आ रही। संसद को देखकर लगता है कि -' नौ दिन चले अढ़ाई कोस'</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146745/our-parliament-lasted-two-and-a-half-days-for-nine"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/हमारी-संसद-नौ-दिन-चले-अढ़ाई-कोस.webp" alt=""></a><br /><p>भारतीय लोकतंत्र सबसे पुराना है।  पुरानी हैं इसकी रिवायतें,लेकिन इसी लोकतंत्र की रक्षा केलिए बनी हमारी संसद आजकल चल नहीं पा रही।  लोकसभा अध्यक्ष हों या राज्य सभा अध्यक्ष वे अपने-अपने सदनों को सुचारु रूप से चलाने में नाकाम साबित हुए है। सरकार और वविपक्ष के बीच का गतिरोध है की टूटने का नाम ही नहीं ले रहा। देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण की चपेट में है और देश की संसद हंगामे में डूबी है। संसद को हंगामे से उबारने की कोई गंभीर कोशिश नजर नहीं आ रही। संसद को देखकर लगता है कि -' नौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली कहावत शायद इसके लिए ही बनी है।</p>
<p>आपको याद है कि  संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत 25 नवंबर को हुई थी।दोनों सदनों में  4 दिन में सदन की कार्यवाही सिर्फ 40 मिनट चली। हर दिन औसतन दोनों सदन (लोकसभा और राज्यसभा) में करीब 10-10 मिनट तक कामकाज हुआ।अब संसद 2  दिसंबर  के बाद ही बैठेगी। लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष ने अडाणी और संभल मुद्दा उठाया। विपक्षी सांसद कार्यवाही के दौरान लगातार हंगामा करते रहे। स्पीकर ने कई बार उन्हें बिठाने की कोशिश की, मगर विपक्ष शांत नहीं हुआ।</p>
<p>लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा- सहमति-असहमति लोकतंत्र की ताकत है। मैं आशा करता हूं सभी सदस्य सदन को चलने देंगे। देश की जनता संसद के बारे में चिंता व्यक्त कर रही है। सदन सबका है, देश चाहता है संसद चले। लेकिन संसद नहीं चली और  लोकसभा के साथ ही  राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार 2 दिसंबर तक स्थगित कर दी गई।बिरला साहब ने सदन चलाने कि लिए क्या कोशिश की ये किसी को नहीं पता ,क्योंकि उन्होंने शायद कोई कोशिश की ही नहीं। की होती तो उसका कुछ न कुछ नतीजा जरूर निकलता।वे सदन चलने से ज्यादा सदन की कार्रवाई स्थगित करने में दक्ष दिखाई देते हैं। यही बात राज्य सभा में माननीय धनकड़ साहब पर लागू होती है।  </p>
<p>मुझे लगता है कि  संसद हंगामें  की वजह से   नहीं बल्कि सत्तापक्ष की वजह से नहीं चल रहा ।  सत्तापक्ष संसद को चलाना ही नहीं चाहता,यदि सत्तापक्ष की मंशा संसद को चलाने की होती तो सत्तापक्ष दरियादिली दिखाता और विपक्ष जिन मुद्दों पर बहस की मांग कर रहा है ,उन सभी मुद्दों पर बहस करता ,लेकिन ऐसा हो नहीं रहा ।  विपक्ष के सामने सत्ता पक्ष का टेसू अड़कर खड़ा हुआ है। टेसू को कोई समझा-बुझा नहीं पा रह।  सदन चलाने  के लिए जिम्मेदार लोग कायदे-क़ानून से ज्यादा अपनी प्रतिष्ठा को लेकर अड़े हुए हैं, अन्यथा सदन का संचालन करने वाले चाहें तो सदन चल सकता है।</p>
<p> दुर्भाग्य ये है कि  संसद का संचालन पीठासीन अधिकारियों के विवेक से नहीं बल्कि सत्तापक्ष के निर्देशों चालने की कोशिश की जा रही है ,और यही समस्या की असल जड़ है।  संसद जब तक सत्तापक्ष की कठपुतली बनी रहेगी,तब तक इसे चलाना नामुमकिन है।  सत्ता पक्ष को अपनी हठधर्मी आज नहीं तो कल छोड़ना पड़ेगी।  सवाल ये है कि  विपक्ष द्वारा उठाये जाने वाले मुद्दों पर बातचीत करने से कौन सा पहाड़ टूटने वाला है? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुलगांधी  ने बुधवार को संसद के बाहर कहा था कि अडाणी पर अमेरिका में 2 हजार करोड़ की रिश्वत देने का आरोप है। उन्हें जेल में होना चाहिए। मोदी सरकार उन्हें बचा रही है।तो राहुल के इस आरोप पर सरकार को सदन में जबाब देने में क्या परेशानी है।</p>
<p>आखिर सरकार ने सदन से बाहर इस मामले में अपना पक्ष सार्वजनिक किया ही है  न ? मोदी सरकार ने शुक्रवार को इस मामले को लेकर सदन के बाहर सफाई देते हुए  कि अमेरिका द्वारा अभी तक किसी तरह का अनुरोध नहीं किया गया है। सरकार के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अडाणी ग्रुप की कंपनियों के खिलाफ अमेरिका की कार्रवाई में सरकार की किसी भी तरह की कोई भूमिका नहीं है।यही सब तो सरकार को संसद के भीतर कहना है ,लेकिन सरकार ऐसा नहीं कह रही ,क्योंकि इसकी मांग विपक्ष ने की है।</p>
<p>दुर्भाग्य की बात ये है कि  सदन के नेता प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को जो सदन में कहना है वो सब वे आम सभाओं में कह रहे है।  प्रधानमंत्री जी का ये आचरण उनकी अहमन्यता का प्रतीक है। वे सदन के चलते विवादित मुद्दों पर सदन के बाहे बोलकर सदन की अवमानना कर रहे हैं,लेकिन उन्हें समझाये कौन ? सदन के पीठासीन अधिअक्रियों में से किसी में इतना नैतिक  या कानूनी साहस नहीं है कि  वो प्रधानमंत्री को सदन में विवादित मुद्दों पर बोलने के लिए कहे ।  कभी-कभी लगता है कि  सदन के अध्यक्ष सदन के प्रति नहीं बल्कि सरकार के प्रति निष्ठावान हैं। अन्यथा सदन में स्पीकर के लिए चाहे प्रधानमंत्री हो या एक सामान्य संसद सब बराबर हैं।</p>
<p> हैरानी की बात ये है कि  संसद को लेकर सभी पक्षों का आचरण एक जैसा है। इधर संसद स्थगित होती है उधर प्रधानमंत्री हों या विपक्ष के नेता आम सभाएं करने निकल पड़ते हैं और उन्हें जो बातें सदन में करना चाहिए वे ही बातें वे आमसभाओं में करते हैं। प्रधानमंत्री जी भुवनेश्वर में गरज रहे हैं तो राहुल गांधी वायनाड में राज्यसभा में विपक्षी सांसदों की लगातार नारेबाजी के बीच सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा, इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। हम बहुत खराब मिसाल कायम कर रहे हैं। हमारे काम जनता-केंद्रित नहीं हैं। हम अप्रासंगिकता की ओर बढ़ रहे हैं।</p>
<p>गनीमत ये है कि  अभी धनकड़ साहब केवल सदन की कार्रवाई स्थगित कर रहे है। अभी उन्होंने किसी सदस्य को डाटा-फटकारा या निलंबित नहीं किया है ,अन्यथा वे जब चाहे तब ऐसा कर सकते हैं। यही हाल लोकसभा अध्यक्ष माननीय ओम बिरला साहब का है।  वे सदस्यों की आँखों में आँखें  डालकर बात करने के बजाय दिशा निर्देशों के लिए सत्तापक्ष की और कनखियों से ताकते नजर आते हैं। और शायद यह वजह है कि  राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे  धनखड़ साहब को लाजबाब कर देते हैं। धनकड़ साहब  ने खड़गे से कहा कि हमारे संविधान को 75 साल पूरे हो रहे हैं। उम्मीद है आप इसकी मर्यादा रखेंगे। इस पर खड़गे ने जवाब दिया कि इन 75 सालों में मेरा योगदान भी 54 साल का है, तो आप मुझे मत सिखाइए।</p>
<p>आपको बता दें कि   संसद की कार्रवाई पर प्रति घंटे डेढ़ करोड़ रुपया खर्च होता है ,लेकिन ये पैसा जनधन है इसलिए किसी को इसकी बर्बादी की फ़िक्र नहीं है। संसद के सामनेशीतकालीन सत्र के दौरान कुल 16 विधेयक पेश किए जाने हैं। इनमें से 11 विधेयक चर्चा के लिए रखे जाएंगे। जबकि 5 कानून बनने के लिए मंजूरी के लिए रखे जाएंगे। ' वन नेशन, वन इलेक्शन ' के लिए प्रस्तावित विधेयकों का सेट अभी सूची का हिस्सा नहीं है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सरकार इसे सत्र में ला सकती है। लोकसभा से पारित एक अतिरिक्त विधेयक भारतीय वायुयान विधेयक राज्यसभा में मंजूरी के लिए लंबित है।लेकिन ये सब काम तो तब निबटे जब सदन में हंगामा  बंद  हो। सरकार तो लगता है की ये सब काम सदन में आखरी दिन ध्वनिमत से करा ही लेगी ,उसे जनमत की फ़िक्र न पहले  थी और न आगे होगी।</p>
<p><strong> राकेश अचल  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sat, 30 Nov 2024 17:10:23 +0530</pubDate>
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