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                <title>indian politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>परिसीमन बिल गिरने से  देश को तो  लाभ हुआ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176917/the-country-benefited-from-the-falling-of-the-delimitation-bill"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1399507-womens-reservation-delimitation-opposition.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा  सीट के    सांसदों के वेतन और भत्तों का  खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों  की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर  डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका लाभ कुल मिलाकर </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का होता।  लोकसभा में वर्तमान </span>545 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों के हिसाब से की महिलाओं के </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  प्रतिशत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आरक्षण के हिसाब से </span>205 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटें बढ़तीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सभी </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में </span>2045 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का इजाफा होता। यानी </span>70 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ महिलाओं में से मात्र </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और  विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़  जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">12 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मोदी सरकार  की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में </span>1990 <span lang="hi" xml:lang="hi">में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोकसभा में ही ढ़ह  गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब एनडीए के अपने </span>353 <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब बात सांसदों और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ओपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्थान पर नई पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों में महंगाई भत्ते (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">और महंगाई राहत (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीआर</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">में वृद्धि तो की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> फिर भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है। वे तो  सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय की गारंटी चाहते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया  हो जाएगें,किंतु सासदों और विधायकों की संख्या  उनके  वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने  वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया जाता। यह कहीं गणना  नही होती कि इससे देश पर कितना बोझ  पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिकों की भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष 75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ जहां देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर  इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं। सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भत्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये) और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इन सबको जोड़ दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी (4,000 किलोलीटर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">34 मुफ्त हवाई यात्राएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला  आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार मानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़ से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर एक स्थायी बोझ बन जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राजकोषीय अनुशासन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन सुधार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की बात की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं होते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ एक जवान है जो अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा अनिवार्य  है,  वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक दिन के लिए सांसद या विधायक  बनने  पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है,  उसकी   उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि मिलती है।कोई व्यक्ति  यदि चार बार सांसद  और तीन बार विधायक  बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर  मिलती है। वर्तमान   पंजाब सरकार ने  एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ  एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।    </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां विधायी विस्तार के खर्चों को बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी कटौती करने और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पेंशन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि देश का पैसा सांसदों की सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:37:52 +0530</pubDate>
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                <title>रिकॉर्ड मतदान, बदलता भारत — लोकतंत्र अब जनता की मुट्ठी में</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175691/record-turnout-is-changing-india-%E2%80%93-democracy-now-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही विश्वास जोड़ रहा था—लोकतंत्र को और मजबूत करने का विश्वास। शाम तक आंकड़ों ने बता दिया कि जनता ने केवल मतदान नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव आयोग के अनुसार मतदान समाप्ति से एक घंटे पहले (शाम </span>5 <span lang="hi" xml:lang="hi">बजे तक) के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र की नई ताकत का ऐलान करने वाले हैं—असम में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत और पुडुचेरी में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान। ये केवल संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस जागते भारत की तस्वीर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब राजनीति को दूर से देखना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अपनी मुट्ठी में लेना चाहता है। लगभग </span>5.3 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ मतदाताओं की इस भागीदारी ने साफ कर दिया कि जनता अब भाषणों और नारों के पीछे चलने वाली भीड़ नहीं रही। वह सवाल करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाब मांगती है और अपने वोट से बता रही है कि सत्ता का असली मालिक नागरिक है। यही वजह है कि ये चुनाव केवल तीन राज्यों की घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा बन गए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम में इस बार का चुनाव कई अर्थों में ऐतिहासिक रहा। </span>126 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले राज्य में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। </span>2023 <span lang="hi" xml:lang="hi">के परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच यह पहला चुनाव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए लोगों की भागीदारी भी बढ़ी। भाजपा-एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्ता बचाने में जुटा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कांग्रेस और अन्य दल वापसी की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि मतदाता दलों से अधिक अपने मुद्दों पर केंद्रित दिखा। भूमि अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमा सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और विकास जैसे सवाल लोगों को बूथ तक ले आए। डलगांव जैसे क्षेत्रों में </span>94 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक मतदान ने बता दिया कि असम अब केवल सरकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना भविष्य चुन रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम की जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी राजनीतिक चेतना भी दिखा दी। पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुसपैठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाई तनाव और अवसरों की कमी से लंबे समय तक जूझते रहे इस राज्य ने साफ कर दिया कि अब उसे केवल वादे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठोस जवाब चाहिए। गांवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ी इलाकों और सीमा से लगे क्षेत्रों में जिस तरह महिलाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्ग और युवा मतदान के लिए निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की ताकत शहरों तक सीमित नहीं है। असम ने यह भी दिखाया कि पूर्वोत्तर अब राष्ट्रीय राजनीति का किनारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसकी दिशा तय करने वाली मजबूत आवाज बन चुका है। वहां की जनता ने बता दिया कि लोकतंत्र सबसे मजबूत तब होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सबसे दूर बैठा नागरिक भी अपने वोट की कीमत समझने लगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में तस्वीर अलग थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संदेश उतना ही मजबूत। </span>140 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों पर हुए चुनाव में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। यह आंकड़ा असम और पुडुचेरी से कम जरूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक केरल में यह भागीदारी अपने आप में असाधारण है। एलडीएफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूडीएफ और भाजपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। पलक्कड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोझीकोड और कई जिलों में </span>80 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता ने खुलकर अपनी राय दी। यहां मतदाता केवल दल नहीं देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों और भविष्य की दिशा को भी परखता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वहां लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक संस्कृति बन चुका है। बारिश के बावजूद बूथों पर लगी लंबी कतारों ने बता दिया कि यहां का नागरिक मतदान को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानता है। बड़ी संख्या में महिलाएं और पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदान के लिए पहुंचे। युवाओं ने बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी शिक्षा और बेहतर अवसरों के सवाल उठाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि महिलाओं ने स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी। केरल के मतदाता ने साफ कर दिया कि अब राजनीति केवल विचारधारा तक सीमित नहीं रहेगी। जनता का विश्वास उसी दल को मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन चुनावों में अगर किसी ने पूरे देश को सबसे ज्यादा चौंकाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह पुडुचेरी था। केवल </span>9.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख मतदाताओं वाले इस छोटे केंद्र शासित प्रदेश में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने लोकतंत्र की नई मिसाल कायम कर दी। </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले पुडुचेरी में एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस-डीएमके गठबंधन और अन्य दलों के बीच मुकाबला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबसे बड़ी जीत जनता की भागीदारी की रही। कराईकल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुडुचेरी और आसपास के इलाकों में सुबह से शाम तक मतदान केंद्रों पर भीड़ उमड़ी रही। स्थानीय रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी सुविधाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास और स्वायत्तता जैसे मुद्दों ने लोगों को बूथ तक पहुंचाया। इस छोटे प्रदेश ने पूरे देश को बता दिया कि लोकतंत्र की ताकत आबादी से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिकों की जागरूकता से तय होती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी के चुनावों ने भारत को एक बड़ा संदेश दिया है। चुनाव आयोग की तैयारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़ी सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईवीएम पर बढ़ा भरोसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अभियान और सोशल मीडिया से बढ़ी जागरूकता ने मतदान को जन-आंदोलन बना दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत का मतदाता अब बदल चुका है। वह चुप रहने वाला नागरिक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने अधिकारों और भविष्य के प्रति सजग प्रहरी बन गया है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को नतीजे आएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें बनेंगी और समीकरण बदलेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी जीत पहले ही सामने आ चुकी है। वह जीत है जनता का यह विश्वास कि उसकी उंगली पर लगी स्याही केवल निशान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 18:12:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शंकराचार्य के अपमान से बुद्धिजीवी लोग भाजपा को सबक सिखाना चाहते हैं - अखिलेश यादव </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> सपा प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि पूजनीय शंकराचार्य जी का जबसे अपमान हुआ है, बहुत सारे बुद्धिजीवी लोग भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाना चाहते हैं, उस दिशा में कोई भी हमारा साथ देगा तो हम लोग उसका साथ देंगे। अखिलेश यादव आज कानपुर के नौबस्ता गल्ला मंडी में स्व. रंजन सिंह यादव उर्फ लाला पहलवान के यहां श्रद्धांजलि एवं शोक संवेदना प्रकट करने आए थे।</p>
<div style="text-align:justify;">सपा प्रमुख ने पत्रकारों से कहा कि जैसे बीबीसी संस्था चलती है वैसे पत्रकारों की संस्था बनाने का काम करेंगे जिले जिले में, जिससे आप किसी पर निर्भर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175528/intellectuals-want-to-teach-a-lesson-to-bjp-by-insulting"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001810442.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> सपा प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि पूजनीय शंकराचार्य जी का जबसे अपमान हुआ है, बहुत सारे बुद्धिजीवी लोग भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाना चाहते हैं, उस दिशा में कोई भी हमारा साथ देगा तो हम लोग उसका साथ देंगे। अखिलेश यादव आज कानपुर के नौबस्ता गल्ला मंडी में स्व. रंजन सिंह यादव उर्फ लाला पहलवान के यहां श्रद्धांजलि एवं शोक संवेदना प्रकट करने आए थे।</p>
<div style="text-align:justify;">सपा प्रमुख ने पत्रकारों से कहा कि जैसे बीबीसी संस्था चलती है वैसे पत्रकारों की संस्था बनाने का काम करेंगे जिले जिले में, जिससे आप किसी पर निर्भर न हो, आप स्वतंत्र रहो। उन्होंने कहा कि "मुख्यमंत्री जी अपने ही संसद का मजाक उड़ा रहे हैं। अभी तक तो पता था कि वनस्पति से स्ट्रेस हटाते हैं लेकिन अब पता चला उनके सांसद ही उनका स्ट्रेस दूर करते हैं।"</div>
<div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि इलेक्शन कमीशन रहित होगा तो न्याय होगा। इलेक्शन कमिशन भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है। कानपुर के किडनी कांड पर चर्चा करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि"अभी कुछ दिन पहले कोडीन भाई आए थे कालीन भाई के बाद, अब सुनने में आया है किडनी भाई। कहीं ऐसा न हो ओटीटी पर गांजा गंज भी बन जाए।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सपा प्रमुख ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने हमारी विदेश नीति चौपट कर दी है। एक बार को लग रहा था भारत विश्व गुरु होगा लेकिन इधर पाकिस्तान अपनी फॉरेन पॉलिसी को मजबूत कर रहा है।"जो जोश और उत्साह दिखाई दे रहा है यह बता रहा है कि जनता बदलाव चाहती है। बदलाव के साथ-साथ बुरे दिन जाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि"गरीब को न ही इलाज मिल रहा है न समय पर इलाज मिल रहा है, उसका परिणाम है कि उन्हें दर दर भटकना पड़ रहा है। समाजवादी सरकार आएगी तो उनका फ्री इलाज होगा।"PDA से घबराकर बीजेपी वालों को समझ नहीं आ रहा कि क्या करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">PDA के लोग एकजुट हो गए हैं, अधिकार और सम्मान मांग रहे हैं। अखिलेश यादव ने कहा कि बाबा साहब की प्रतिमाओं को सबसे ज्यादा किसी ने तोड़ा तो बीजेपी ने।"PDA प्रहरी ने एक व्यक्ति पकड़ा जिसका वोट बीजेपी के लोग कटवा रहे थे। बीजेपी के लोगों ने दस्तखत न करने वाले से नकली दस्तखत करवाए, लेकिन इलेक्शन कमीशन ने कोई भी कार्रवाई नहीं करी।"शिक्षामित्रों को कोई भी न्याय दिला सकता है तो समाजवादी लोग हैं।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश में जो फिल्म बनी थी एक वो रिलीज होने से पहले ही फ्लॉप हो गई। अब एक नए किरदार आए हैं धुआं-धर, हर दिन उत्तर प्रदेश में गांजा पकड़ा जा रहा है। सड़कों पर गड्ढों पर चर्चा करते हुए अखिलेश ने कहा कि"जब मुख्यमंत्री जी खुद ही इंजीनियर बन जाएंगे, जब सरकार ही कमीशन लेगी तो सड़क की गुणवत्ता कैसे रहेगी।</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 19:15:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा के रास्ते नीतीश कुमार का वानप्रस्थ गमन!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172602/nitish-kumars-last-journey-through-rajya-sabha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/nitish-kumar-5-march-2026-.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा राज्यसभा का नामांकन भरने से  यह बात स्पष्ट हो गयी है कि बिहार की राजनीति से एक युग का अब अवसान होने जा रहा है। बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से यदि किसी एक नेता का सबसे अधिक प्रभाव रहा है, तो वह नाम है नीतीश कुमार। वर्ष 2005 से लेकर अब तक बिहार की सत्ता का केंद्र लगभग लगातार उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। अलग-अलग गठबंधनों, बदलते राजनीतिक समीकरणों और कई चुनावी उतार-चढ़ावों के बावजूद उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अपनी पकड़ बनाए रखी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में नीतीश के द्वारा मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का ऐलान बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव के रुप में देखा जा रहा है। अगर देखा जाए लगभग साढ़े तीन दशकों तक बिहार की राजनीति दो नामों के इर्द-गिर्द भूमती रही, ये दो नाम हैं लालू प्रसाद यादव और नीतीश। इन दोनों नेताओं ने न केवल बिहार की सत्ता को आकार दिया, बल्कि राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा भी तय की। अब जब दोनों ही नेता सक्रिय राजनीति से दूर हो रहे हैं, तब बिहार एक नए दौर के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1990 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, तब बिहार की राजनीति में एक नई सामाजिक चेतना का उदय हुआ। लालू ने 'सामाजिक न्याय' को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक आंदोलन का रूप दिया। पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को उन्होंने केंद्र में रखा। लंबे समय से सत्ता के गलियारों से दूर रहे वर्गों को उन्होंने राजनीतिक पहचान और आवाज दी। सत्ता की भाषा बदली, राजनीतिक चेहरे बदले और शासन के केंद्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई धारा दिखाई देने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें कोई दोमत नहीं है कि जेपी आंदोलन से निकले नेताओं की एक पूरी पीढ़ी ने पिछले तीन दशकों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी। इस पीढ़ी में पुरानी पीड़ी के पीछे हटने का अर्थ है कि बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं को अवसर मिलेगा। इन सबके बीच अगर बात नीतीश की की जाए तो, बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं रही है, बल्कि वे लंबे समय तक राज्य की राजनीति के सर्वमान्य नेता रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोग भी उन्हें स्वीकार करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गठबंधन की राजनीति में कई बार वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने गठबंधन धर्म निभाया और राजनीतिक संतुलन बनाए रखा। उनकी खास पहचान उनकी सामाजिक योजनाओं और प्रशासनिक छवि से बनी। खास तौर पर महिलाओं के बीच उनकी पकड़ काफी मजबूत रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं का समर्थन एनडीए की जीत का एक बड़ा कारण माना गया था। इसी कारण जब तक वह बिहार की राजनीति में सक्रिय थे, तब तक विपक्षी दलों के लिए उन्हें सीधे चुनौती देना आसान नहीं था। हालांकि, इसी दौर में बिहार की छवि पर कई सवाल भी उठे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई और 'जंगलराज' जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए। विकास की रफ्तार धीमी पड़ने और उद्योगों के बंद होने से बिहार की अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई। राज्य से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ और बिहार प्रवासी मजदूरों के प्रदेश के रूप में पहचाना जाने लगा। चीनी मिलों, जूट फैक्ट्रियों और कई छोटे उद्योगों के बंद होने से रोजगार के अवसर घटते गए। इस दौर में बिहार की पहचान सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ-साथ पिछड़ेपन और आर्थिक संकट से भी जुड़ने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2005 में बिहार की राजनीति ने एक बड़ा मोड़ लिया जब नीतीश कुमार सत्ता में आए। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की शुरुआत भी थी। नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय की राजनीति को विकास और प्रशासनिक सुधारों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी और बिहार में सड़कों तथा पुलों का व्यापक जाल बिछाया। राज्य के दूरदराज इलाकों को राजधानी पटना से बेहतर तरीके से जोड़ने का प्रयास किया गया। एक समय ऐसा था जब बिहार के कई जिलों से पटना पहुंचने में पूरा दिन लग जाता था, लेकिन सड़क नेटवर्क के विस्तार के बाद यात्रा का समय काफी कम हो गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह बदलाव केवल भौतिक संरचना का नहीं था, बल्कि राज्य की मानसिकत्ता और विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम था। नीतीश कुमार ने शासन को अधिक प्रशासनिक रूप देने की कोशिश की और कानून-व्यवस्था को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया। उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई कई योजनाओं ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला। छात्राओं के लिए साइकिल योजना ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नया बदलाव लाया। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने से स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन कदमों ने बिहार की सामाजिक संरचना को धीरे-धीरे बदलने में भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार की छवि 'सुशासन बाबू' के रूप में स्थापित हुई। उन्होंने प्रशासनिक सुधार, कानून-व्यवस्था और बुनियादी विकास को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उनके शासनकाल में बिहार की छवि धीरे-धीरे बदलने लगी। रष्ट्रीय स्तर पर भी बिहार को विकास के नए प्रयासों के संदर्भ में चर्चा मिलने लगी। विहार के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा। बिहार में सड़कों, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में जो बदलाव हुए, उससे राज्य में परिवर्तन आया। मगर भूलना नहीं चाहिए कि राजनीति में बदलाव हमेशा अनिश्चितता लेकर आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश के संभावित फैसले से भी बिहार की राजनीति में कई नए सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या जदयू अपनी पुरानी ताकत बनाए रख पाएगी? क्या भाजपा बिहार में अपना मुख्यमंत्री चनाएगी ? क्या नई पीढ़ी के नेताओं को मौका मिलेगा ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका निभाएंगे ? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि कुमार का यह फैसला केवल एक व्यक्ति के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह बिहार की राजनीति के एक लंबे अध्याय के समापन और एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें नीतीश का राज्यसभा जाना सिर्फ पद का बदलाव नहीं है; यह करीब 5 दशक लंबी राजनीतिक यात्रा का एक नया अध्याय भी हो सकता है। हाल ही में नीतीश कुमार ने खुद कहा है कि अपनी लंबी राजनीतिक जिंदगी में वे बिहार विधानसभा के सदस्य, विधान परिषद के सदस्य और लोकसभा के सांसद रह चुके हैं। अब वे राज्यसभा में भी सेवा देना चाहते हैं। और उसके बाद अगर उन्हें केंद्र सरकार में कोई भूमिका मिली, तो बिहार की राजनीति का यह बड़ा चेहरा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिख सकता है। राजनीति में समय के साथ भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी छाया लंबे समय तक बनी रहती है। नीतीश भी ऐसे ही नेताआ में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका चाहे समाप्त हो जाए, लेकिन बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मौजूदगी आगे भी चर्चा और प्रभाव का विषय बनी रहेगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें 2020 के बाद एनडीए में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। सीटों की संख्या साफ दिखा रही थी कि भाजपा के पास ज्यादा विधायक हैं, फिर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे। आखिर ऐसा क्यों? इसके 2 मुख्य कारण अक्सर बताए जाते हैं। पहला कारण उनकी सामाजिक आधार है। बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों और महिला मतदाताओं से बहुत मजबूत जुड़ाव बनाया है। शराबबंदी जैसी नीतियां और महिलाओं के लिए कल्याण योजनाओं ने उन्हें एक भरोसेमंद और विश्वसनीय नेता की छवि दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 साल की उम्र में स्वास्थ्य कारणों से नीतीश कुमार अब कम मेहनत वाला रोल चुनना चाहते हैं। ऐसे में राज्यसभा उनके लिए एक सम्मानजनक और महत्वपूर्ण मंच हो सकता है। लेकिन बात यहां सिर्फ पद बदलने की नहीं है। यह पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश भी हो सकती है। चर्चा है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार जल्द ही सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं और उन्हें राज्य सरकार में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 18:53:38 +0530</pubDate>
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                <title>बहुजन समाजवादी पार्टी का अस्तित्व संकट में</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">डॉ भीमराव अंबेडकर का नाम भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ने वाला नाम है। भारतीय समाज की जातिव्यवस्था और सामाजिक असमानता के खिलाफ उनका संघर्ष न केवल प्रेरणादायक रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समाज में समानता और न्याय की नींव रखी। उनके विचार और सिद्धांत आज भी भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। डॉ अंबेडकर ने विशेष रूप से दलितों, अछूतों, मजदूरों और अन्य वंचित वर्गों के उत्थान के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। इसी विचारधारा का प्रतीक बनकर बहुजन समाजवादी पार्टी का गठन हुआ था। परंतु आज यह</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/155108/bahujan-samajwadi-partys-existence-in-crisis"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/news-2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">डॉ भीमराव अंबेडकर का नाम भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ने वाला नाम है। भारतीय समाज की जातिव्यवस्था और सामाजिक असमानता के खिलाफ उनका संघर्ष न केवल प्रेरणादायक रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समाज में समानता और न्याय की नींव रखी। उनके विचार और सिद्धांत आज भी भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। डॉ अंबेडकर ने विशेष रूप से दलितों, अछूतों, मजदूरों और अन्य वंचित वर्गों के उत्थान के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। इसी विचारधारा का प्रतीक बनकर बहुजन समाजवादी पार्टी का गठन हुआ था। परंतु आज यह पार्टी राजनीतिक दृष्टि से विगत की चमक को खोते जा रही है। बहुजन समाजवादी पार्टी का उदय भारतीय राजनीति में एक क्रांतिकारी बदलाव की तरह देखा गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का नारा लेकर यह पार्टी उभरी थी। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के कारण यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी थी। पार्टी के नेता, खासकर मायावती जी, ने समाज के पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और सत्ता के गलियारों में अपनी जगह बनाई। समाज के बहुजन तबके का संघर्ष और उनके हक की लड़ाई इस पार्टी के उद्देश्य का केन्द्र रहा। पार्टी ने अपने गठन काल से ही भारतीय समाज की जड़ों में पैठी जातिगत असमानता के खिलाफ संघर्ष किया और दलितों, पिछड़ों, अर्ध-श्रमिकों और आदिवासियों को राजनीति में भागीदारी दिलाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु समय के साथ-साथ कई बदलाव आए। भारतीय राजनीति में नई पार्टियों का उदय, सत्ता की राजनीति का ध्रुवीकरण, जनता की बदलती प्राथमिकताएं, और पार्टी के अंदरूनी कलह ने इसे कमजोर करना शुरू कर दिया। पहले जहाँ बीएसपी का चुनावी प्रदर्शन एक दमकता हुआ सितारा बनकर उभरता था, आज वही सितारा मंद पड़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में सत्ता का परंपरागत आधार रहने के बावजूद पार्टी को अपने मजबूत किले से बाहर निकलने में कठिनाई हो रही है। खासकर 2014 के बाद, भारतीय जनता पार्टी की तेजी से बढ़ती राजनीतिक पकड़ ने बीएसपी को अस्तित्व संकट में डाल दिया है। पार्टी की विचारधारा, जो कभी समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का प्रमुख आधार थी, अब राजनीतिकरण के शिकंजे में उलझती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में बीएसपी ने लगातार चुनाव हारें हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भागीदारी कमजोर होती जा रही है। इसका एक मुख्य कारण पार्टी की नेतृत्व शैली भी रही है। मायावती जी का व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी पर गहरा रहा है। परंतु समय के साथ उनका प्रभाव कम होता गया और पार्टी का आंतरिक संगठन कमजोर पड़ने लगा। नेतृत्व में नवीन विचारों और युवा वर्ग की भागीदारी का अभाव इस पतन की एक बड़ी वजह बन गया। इसके अलावा, पार्टी की रणनीति भी पुरानी होती गई। जातिगत राजनीति पर आधारित रणनीति अब काम नहीं कर रही है क्योंकि भारतीय समाज धीरे-धीरे बदलाव की ओर अग्रसर हो रहा है। युवा पीढ़ी के लिए विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अधिक प्राथमिकता प्राप्त कर चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बावजूद पार्टी अपने पुराने स्वरूप में ही अड़ी रही, जिससे उसकी प्रासंगिकता समय के साथ घटती गई।सामाजिक दृष्टिकोण से भी बदलाव आया है। दलित समाज ने अब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की नई रणनीतियां अपनाई हैं। वे अब केवल जातिगत आधार पर नहीं बल्कि शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण, और सामाजिक समावेश के आधार पर आगे बढ़ने लगे हैं। बहुजन समाजवादी पार्टी का संदेश, जो एक समय जाति और वर्ग के माध्यम से समाज में बदलाव लाने का प्रतीक था, अब पुराना और अप्रासंगिक होता जा रहा है। इसके विपरीत, अन्य राजनीतिक दल जैसे भाजपा और कांग्रेस ने अधिक व्यापक विचारधारा अपनाई है, जिसमें विकास और राष्ट्रवाद को प्रमुखता दी जा रही है। आर्थिक दृष्टि से भी बीएसपी पिछड़ती जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उसके पास नीतिगत दृष्टिकोण में नवीनता नहीं है। नए-नए सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर पार्टी की राय अस्पष्ट बनी हुई है। आर्थिक विकास, युवाओं के रोजगार, शिक्षा में सुधार, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार जैसे मुद्दों पर पार्टी की अनबद्ध और अस्पष्ट नीति ने उसे जनता की प्राथमिकताओं से दूर कर दिया है। जनता अब विकासशील भारत की आकांक्षा रखती है, जहाँ हर नागरिक को समान अवसर मिले, न कि केवल जाति के आधार पर वोट की राजनीति हो। राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश में पहले बीएसपी का प्रभाव इतना था कि वह सरकार बना सकती थी। परंतु अब भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने इसे एक उपेक्षित दल में तब्दील कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गठबंधन राजनीति में भी पार्टी कमजोर होती जा रही है। पहले जहाँ अन्य दल बीएसपी के साथ गठबंधन के लिए उत्सुक रहते थे, आज वही दल इसे नजरअंदाज करने लगे हैं। इससे BSP का जनाधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। इसके साथ ही पार्टी की कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी कम होती जा रही है। राजनीतिक आंदोलन और जन जागरण की बजाय यह केवल चुनावी माहौल में खुद को प्रस्तुत करती नजर आती है। बहुजन समाजवादी पार्टी की विचारधारा, जिसे समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का आदर्श माना जाता था, आज उसके अस्तित्व के संकट में खो जाती दिख रही है। इसे केवल एक पार्टी के रूप में नहीं बल्कि एक आंदोलन के रूप में देखना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु यह आवश्यक है कि BSP खुद को पुनर्परिभाषित करे। उसके लिए आवश्यक है कि वह न केवल दलित राजनीति पर ध्यान केंद्रित करे, बल्कि सभी वंचितों को विकास की मुख्यधारा में लाने की नीति अपनाए। उसे नए राजनीतिक परिदृश्य में स्वयं को ढालने की आवश्यकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, और सामाजिक न्याय के व्यापक मुद्दों को अपनी राजनीति में प्रमुखता देनी होगी। इस दिशा में न केवल नेतृत्व में नए विचारकों का आगमन आवश्यक है, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में भी सुधार की आवश्यकता है। पारदर्शिता, जवाबदेही, और सक्रिय जन संपर्क प्रणाली के माध्यम से पार्टी को पुनर्जीवित किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं को अधिकाधिक पार्टी कार्य में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे न केवल पार्टी को नए विचार दे सकें, बल्कि समाज की बदलती अपेक्षाओं को भी पार्टी की नीति में समाहित कर सकें। यदि बीएसपी अपने आप को केवल जाति आधारित पार्टी के रूप में सीमित रखती है, तो यह निश्चित ही समय के साथ एक राजनीतिक अवशेष बन जाएगी। परंतु यदि यह समाज के समूचे वंचित वर्ग के उत्थान के लिए समग्र और समावेशी नीति अपनाए, तो इसे पुनः जनादेश प्राप्त हो सकता है। समाज की बदलती संरचना और युवाओं की बदलती सोच को समझना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। बीएसपी को चाहिए कि वह अपने अतीत के गौरवशाली संघर्ष को आधुनिक युग के विकासवादी एजेंडे से जोड़े। इससे वह केवल राजनीतिक पुनरुत्थान नहीं करेगा, बल्कि समाज के हर वर्ग में समावेशी और न्यायसंगत परिवर्तन की भावना को भी पुनर्जीवित करेगा। </div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 15 Sep 2025 19:31:08 +0530</pubDate>
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                <title>'बुलडोज़र कार्रवाई ' न्याय नहीं नफ़रत व कुंठा की पराकाष्ठा </title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति का स्वरूप अब बदल चुका है। अब हाथ जोड़कर विनम्रता प्रदर्शित करते नेताओं का युग शायद चला गया। कम से कम आज के दौर के नेताओं के तेवर उनके मुंह से निकलने वाले ज़हरीले शब्द बाणों, उनकी नीयत व कार्यशैली आदि को देखकर तो यही लगता है।</div><div><br /></div><div> ख़ासतौर पर गत एक दशक से जब से दक्षिणपंथी शक्तियों के हाथों में देश की सत्ता आई है तब से केंद्र व अनेक राज्य सरकारों द्वारा कई ऐसे फ़ैसले लिये गये जिनके कारण देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय तर्ज़-ए-सियासत की ख़ूब आलोचना हुई। भारतीय जनता पार्टी शासित विभिन्न</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146336/bulldozer-action-is-not-justice-but-the-height-of-hatred"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/210.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय राजनीति का स्वरूप अब बदल चुका है। अब हाथ जोड़कर विनम्रता प्रदर्शित करते नेताओं का युग शायद चला गया। कम से कम आज के दौर के नेताओं के तेवर उनके मुंह से निकलने वाले ज़हरीले शब्द बाणों, उनकी नीयत व कार्यशैली आदि को देखकर तो यही लगता है।</div><div><br /></div><div> ख़ासतौर पर गत एक दशक से जब से दक्षिणपंथी शक्तियों के हाथों में देश की सत्ता आई है तब से केंद्र व अनेक राज्य सरकारों द्वारा कई ऐसे फ़ैसले लिये गये जिनके कारण देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय तर्ज़-ए-सियासत की ख़ूब आलोचना हुई। भारतीय जनता पार्टी शासित विभिन्न राज्य सरकारों का ऐसा ही एक मनमाना व अमानवीय निर्णय था 'बुलडोज़र न्याय '। </div><div><br /></div><div>हालांकि देश की विभिन्न अदालतों द्वारा पहले भी इस विषय पर संज्ञान लिया जा चुका है। परन्तु पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायलय ने इस सम्बन्ध में नये व सख़्त  दिशा-निर्देश के जारी किये और कहा कि उसका यह आदेश हर राज्य में भेजा जाए और सारे अधिकारियों को इसके बारे में बताया जाए। </div><div><div dir="ltr"><br /></div><div dir="ltr">सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की दो जजों की पीठ ने कहा है कि किसी व्यक्ति के घर या संपत्ति को केवल इसलिए तोड़ना कि वह अपराधी है या उन पर अपराध के आरोप हैं, क़ानून के ख़िलाफ़ है। न्यायालय ने कहा कि घर या कोई जायदाद तोड़ने से पहले कम से कम 15 दिन का नोटिस देना होगा। अगर किसी राज्य के क़ानून में इससे लंबे नोटिस का प्रावधान हो तो उसका पालन करना होगा।</div><div dir="ltr"><br /></div><div dir="ltr"> यह नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से देना होगा। इसके साथ ही कथित ग़ैर क़ानूनी ढांचे पर भी इस नोटिस को चिपकाना होगा।  नोटिस पर पहले की तारीख़ न दी जाए। इसके लिए नोटिस की एक कॉपी कलेक्टर/ ज़िला मजिस्ट्रेट को भी ईमेल पर भेजनी होगी। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश में कहा गया है कि नोटिस में ये भी लिखना होगा कि कौन से क़ानून का उल्लंघन हुआ है,इस मामले में सुनवाई कब होगी। और जब सुनवाई हो तो उसका पूरा विवरण भी रिकॉर्ड करना होगा। </div><div dir="ltr"><br /></div><div dir="ltr">न्यायालय के दिशा-निर्देश में यह भी कहा गया है कि सुनवाई करने के बाद अधिकारियों को अपने आदेश में वजह भी बतानी होगी। इसमें ये भी देखना होगा कि किसी संपत्ति का एक हिस्सा ग़ैर क़ानूनी है या पूरी संपत्ति ही ग़ैर क़ानूनी है। न्यायालय के अनुसार यदि तोड़-फोड़ की जगह, जुर्माना या और कोई दंड दिया जा सकता है तो वह दिया जाएगा। और यदि क़ानून में संपत्ति तोड़ने या गिराने के आदेश के ख़िलाफ़ कोर्ट में अपील करने का प्रावधान है तो उसका पालन किया जाना चाहिए।  दिशा-निर्देश के मुताबिक़ अगर ऐसा प्रावधान नहीं भी है, तो आदेश आने के बाद संपत्ति के मालिक/मालकिन को 15 दिन का समय मिलेगा ताकि वे स्वयं ही ग़ैर क़ानूनी ढाँचे को सही कर लें।</div><div dir="ltr"><br /></div><div dir="ltr"> यदि ऐसा नहीं हो, तब ही इसे तोड़ने की कार्रवाई की जा सकती है। 'बुलडोज़र न्याय ' को लेकर आये सर्वोच्च न्यायालय के इन राहत भरे निर्देशों के बाद अब यह माना जा रहा है कि इस महत्वपूर्ण फ़ैसले से बुलडोज़र से की जा रही वि‍ध्‍वंस की ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाइयों पर अब रोक लगेगी। </div></div><div><br /></div><div>ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, हरियाणा जैसे अनेक भाजपा शासित राज्यों में गत एक दशक के दौरान सैकड़ों घरों व व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को बुलडोज़र न्याय के नाम पर ज़मींदोज़ किया जा चुका है। सरकारें व प्रशासन ख़ुद ही न्यायलय की भूमिका अदा करता रहा है। किसी के मकान को इसलिये ध्वस्त कर दिया गया कि वह किसी आरोपी का मकान है। तो किसी मकान या भवन को इसलिये गिरा दिया गया कि वह अनधिकृत निर्माण है,उसके पास नक़्शा व निर्माण की अनुमति नहीं है,आदि।</div><div><br /></div><div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-11/110.jpg" alt="1" width="638" height="433"></img> दरअसल इस तरह की कार्रवाई से पहले मौजूदा सत्ताधीश के तेवर व उनके शब्दों पर यदि ग़ौर करें तो स्वयं ही साफ़ हो जाता है कि सरकार व प्रशासन द्वारा बुलडोज़र कार्रवाई कोई न्याय की मिसाल क़ायम करने के लिये नहीं की जाती थी। बल्कि इसके पीछे साम्प्रदायिक व जातिवादी कुंठा काम कर रही थी। यही वजह है कि पूरे देश में अब तक जितनी भी बुलडोज़र कार्रवाइयां हुई हैं उनमें सबसे अधिक भवनों का ध्वस्तीकरण एक ही समुदाय के लोगों का ही हुआ है। हद तो यह है कि मध्य प्रदेश में एक घटना तो ऐसी भी हुई कि एक आरोपी किसी किराये के मकान में रहता था। परन्तु इस कुंठाग्रस्त सरकार व प्रशासन ने नफ़रत की आग में जलते हुये उस मकान को भी ध्वस्त कर दिया। </div><div><br /></div><div>जहाँ तक अवैध निर्माण बताकर किसी भवन को गिराने का विषय है तो इस सम्बन्ध में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव द्वारा उत्तर प्रदेश विधान सभा में उठाये गये इस सवाल की भी अनदेखी नहीं की जा सकती जिसमें वे कई बार पूछ चुके हैं कि क्या उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री निवास का नक़्शा पारित है ? यदि है तो कहाँ है,किसके पास है,किसने देखा है ? अखिलेश के कहने का मतलब साफ़ है कि जिस भवन में बैठकर लोगों के भवन अवैध बताकर गिरवाये जा रहे हैं वही भवन अवैध रूप से निर्मित है। परन्तु दरअसल बुलडोज़र न्याय के पीछे मक़सद न्याय का हरगिज़ नहीं बल्कि यह कार्रवाई सत्ताधीशों के मुंह से समय समय पर निकलने वाले उनके शब्द बाणों को ही अमल में लाने का एक तरीक़ा है। अन्यथा आज तक इतिहास में किसी मुख्यमंत्री ने 'हम मिट्टी में मिला देंगे, ठोक देंगे,गर्मी उतार देंगे,बक्कल उतार देंगे,बंटेंगे तो कटेंगे  जैसे निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग नहीं किया।   </div><div><br /></div><div>अब जबकि अदालत स्वयं यह कह चुकी है कि - किसी भी सभ्य समाज में बुलडोज़र के ज़रिए इंसाफ़ नहीं होना चाहिए, ऐसे में सत्ताधीशों को भी सोचना पड़ेगा कि वे भी स्वयं को एक सभ्य समाज के सभ्य नेता के रूप में पेश करें। धर्म जाति के अनुसार या इसके मद्देनज़र पक्षपात पूर्ण या विद्वेषपूर्ण फ़ैसले लेना निष्चित रूप से किसी सभ्य समाज के सभ्य नेता की पहचान हरगिज़ नहीं। सर्वोच्च न्यायायलय के फ़ैसले से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि  'बुलडोज़र कार्रवाई ' न्याय के लिये नहीं बल्कि यह नफ़रत व कुंठा की पराकाष्ठा है। </div><div><br /></div><div><strong><span style="font-size:large;">तनवीर जाफ़री </span></strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 Nov 2024 17:28:51 +0530</pubDate>
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