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                <title>congress rahul gandhi - Swatantra Prabhat</title>
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                <title> अप्रकाशित किताब, बड़े दावे और खाली हाथ राहुल गांधी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">संसदीय मर्यादा बनाम राहुल गांधी की राजनीति</span>]</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">आरोपों का शोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्यों की कमी: संसद में राहुल गांधी बेबस</span>]</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">2 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">का दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक और तीखे और दुर्भाग्यपूर्ण टकराव के रूप में दर्ज हो गया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सामान्यतः सरकार की नीतियों पर गंभीर और मर्यादित विमर्श का अवसर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दिन राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तथ्यपरक दृढ़ता की भेंट चढ़ गई। लोकसभा का वातावरण अचानक उग्र हो उठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्कों की जगह शोर ने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168117/from-education-to-self-reliance"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/अप्रकाशित-किताब, बड़े-दावे-और-खाली-हाथ-राहुल-गांधी.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">संसदीय मर्यादा बनाम राहुल गांधी की राजनीति</span>]</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">आरोपों का शोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्यों की कमी: संसद में राहुल गांधी बेबस</span>]</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">2 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">का दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक और तीखे और दुर्भाग्यपूर्ण टकराव के रूप में दर्ज हो गया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सामान्यतः सरकार की नीतियों पर गंभीर और मर्यादित विमर्श का अवसर होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दिन राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तथ्यपरक दृढ़ता की भेंट चढ़ गई। लोकसभा का वातावरण अचानक उग्र हो उठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्कों की जगह शोर ने ले ली और संसद की गरिमा एक बार फिर कठघरे में खड़ी दिखाई दी। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डोकलाम और गलवान का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनका तरीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका स्रोत और उनकी प्रस्तुति ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आ गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राहुल गांधी ने अपने भाषण में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की कथित अप्रकाशित किताब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का हवाला देते हुए यह सनसनीखेज दावा कर दिया कि चार चीनी टैंक भारतीय सीमा में घुसे थे और डोकलाम की एक रणनीतिक रिज पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने इसे सीधे-सीधे मोदी सरकार की विफलता करार दिया और चुनौती भरे लहजे में सवाल उछाला कि सरकार “सच से डर क्यों रही है</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">पहली नजर में यह आरोप चौंकाने वाला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जैसे ही उसके स्रोत की सच्चाई सामने आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा तर्क खोखला और आधारहीन नजर आने लगा। संसद कोई मंच नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां अप्रमाणित और अप्रकाशित स्रोतों के सहारे गंभीर आरोप उछाल दिए जाएं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं से राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे। संसद के नियम </span>349 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत किसी भी अप्रकाशित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्यापित या अप्रमाणिक स्रोत से उद्धरण देना सख्त रूप से निषिद्ध है। जनरल नरवणे की किताब न तो प्रकाशित हुई थी और न ही उसे किसी आधिकारिक प्रक्रिया के तहत संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। इसके बावजूद राहुल गांधी ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कारवां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मैगजीन के एक लेख को आधार बनाकर पूरे सदन को गुमराह करने का प्रयास किया। यह केवल संसदीय नियमों का उल्लंघन नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय पर घोर गैर-जिम्मेदाराना रवैये का भी परिचायक था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पर बिना किसी हिचक के कड़ा और स्पष्ट ऐतराज जताया। शांत लेकिन सधे हुए शब्दों में उन्होंने सवाल किया कि राहुल गांधी आखिर किस किताब का उल्लेख कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे न उन्होंने स्वयं देखा है और न ही संसद के पास उसका कोई आधिकारिक संज्ञान है। राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि यदि जनरल नरवणे के पास कोई नई या गंभीर जानकारी होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह संवैधानिक मर्यादाओं के तहत सीधे सरकार को अवगत कराते। उन्होंने यह भी दोहराया कि नरवणे ने कभी अपनी किताब के प्रकाशन को लेकर किसी तरह की कानूनी लड़ाई नहीं लड़ी। रक्षा मंत्री का यह तर्कपूर्ण जवाब न सिर्फ संसदीय नियमों पर आधारित था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राहुल गांधी के पूरे राजनीतिक नैरेटिव की बुनियाद को ही हिला देने वाला साबित हुआ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह का हस्तक्षेप राहुल गांधी के लिए और अधिक असहज साबित हुआ। अमित शाह ने साफ शब्दों में कहा कि जिस लेख का हवाला दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी उसी अप्रकाशित किताब पर आधारित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे संसद में उद्धृत करने की अनुमति नहीं है। उन्होंने राहुल गांधी से सीधा सवाल किया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के बीच अचानक चीन का मुद्दा उठाने का उद्देश्य क्या है। यह संकेत स्पष्ट था कि मामला राष्ट्रहित से अधिक राजनीतिक लाभ का था। भाजपा सांसदों की नारेबाजी और स्पीकर ओम बिरला की बार-बार चेतावनियों के बीच सदन की कार्यवाही लगातार बाधित होती रही।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राहुल गांधी का रवैया इस पूरे घटनाक्रम में उनके पुराने राजनीतिक पैटर्न को ही दोहराता दिखा। नियमों की अनदेखी करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद खड़ा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुद को अकेला सच बोलने वाला दिखाना और जब जवाब मिले तो हंगामे का सहारा लेना—यह कोई नया तरीका नहीं था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत-चीन संबंधों पर चर्चा नहीं हो सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि असल फर्क चर्चा और अफवाह के बीच होता है। भाजपा ने तुरंत जनरल नरवणे का पुराना बयान सामने रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “न एक इंच जमीन गई है।” यह राहुल के दावों पर सीधा और निर्णायक प्रहार था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पूरी बहस इस बात को उजागर करती है कि राहुल गांधी किस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक हथियार बना लेते हैं। गलवान में शहीद हुए </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">जवानों का बलिदान पूरे देश के लिए पीड़ा का विषय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बिना ठोस प्रमाण उस मुद्दे को बार-बार उठाना न तो संवेदनशीलता है और न ही जिम्मेदार विपक्ष का आचरण। राजनाथ सिंह ने सही कहा कि सेना की प्रतिष्ठा और देश की सुरक्षा पर सवाल उठाने के दूरगामी परिणाम होते हैं। ऐसे बयान सेना का मनोबल गिराते हैं और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनाथ सिंह ने तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया कि चीन की ओर से कोई नई घुसपैठ नहीं हुई है और मोदी सरकार ने एलएसी पर मजबूत स्थिति बनाई है। इसके विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राहुल गांधी के आरोप अटकलों और अप्रमाणित बातों पर आधारित थे। कांग्रेस की राजनीति अब सरकार-विरोध तक सीमित नजर आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे उससे राष्ट्रीय हित को नुकसान ही क्यों न पहुंचे। सदन के बाहर राहुल गांधी का यह कहना कि प्रधानमंत्री जवाब देने से भाग गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल उनकी अपनी संसदीय विफलता को ही उजागर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बहस के दौरान उनके पास कोई ठोस तथ्य मौजूद नहीं था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिन के अंत में लोकसभा की कार्यवाही भले ही स्थगित हो गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी थी। राहुल गांधी का पूरा प्रयास धराशायी हो गया। न केवल उनके आरोप खारिज हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनकी राजनीतिक रणनीति भी कठघरे में आ खड़ी हुई। इसके विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनाथ सिंह ने संयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्य और दृढ़ता के साथ सरकार का पक्ष रखा और यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर सरकार किसी भी झूठे या अप्रमाणित आरोप के आगे झुकने वाली नहीं है। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र की उस मजबूती को रेखांकित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्य और सत्य अंततः हावी रहते हैं। संसद अफवाहों का अखाड़ा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जिम्मेदार और मर्यादित बहस का मंच है—और यही इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा और स्पष्ट संदेश है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Feb 2026 18:50:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>राहुल तुम केवल गुंडे हो नेता नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पहचानने में भाजपा भूल कर गई। भाजपा ने तो राहुल गांधी को कठिन  परिश्रम  के बाद 'राजनीति का  पप्पू'  बनाया था ,लेकिन राहुल गाँधी  तो राजनीति के गुंडे बन गये।  टीशर्ट वाले गुंडे। राहुल ने तो संसद  के मकर द्वार पर भाजपा की सारंगी को ही बजा दी।अब राहुल के  खिलाफ संसद मार्ग थाने में प्राथिमिकी लिखाई जा चुकी है। राहुल अब जाओ और अपनी गिरफ्तारी के लिए तैयारी करो। इधर संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होगा और उधर तुम्हारी गिरफ्तारी होगी। देखते हैं कौन माई का लाल तुम्हे जेल जाने से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147083/rahul-you-are-just-a-goon-not-a-leader"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/dhkkaa-mukki-1.jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पहचानने में भाजपा भूल कर गई। भाजपा ने तो राहुल गांधी को कठिन  परिश्रम  के बाद 'राजनीति का  पप्पू'  बनाया था ,लेकिन राहुल गाँधी  तो राजनीति के गुंडे बन गये।  टीशर्ट वाले गुंडे। राहुल ने तो संसद  के मकर द्वार पर भाजपा की सारंगी को ही बजा दी।अब राहुल के  खिलाफ संसद मार्ग थाने में प्राथिमिकी लिखाई जा चुकी है। राहुल अब जाओ और अपनी गिरफ्तारी के लिए तैयारी करो। इधर संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होगा और उधर तुम्हारी गिरफ्तारी होगी। देखते हैं कौन माई का लाल तुम्हे जेल जाने से रोकता है ?</p>
<p>राहुल को हम सब और तमाम दुनिया एक भद्र युवा संसद और कांग्रेस का नेता समझते हैं ,लेकिन भाजपा को ऐसा कोई भ्रम नहीं है। भाजपा राहुल को शुरू से पप्पू बनाती और समझती रही लेकिन जब राहुल ने आम चुनाव में भाजपा का अश्वमेघ का घोड़ा पकड़ कर 400  पार करने से पहले ही बाँध लिया तो  भाजपा सकते में आ गई। बामुश्किल भाजपा ने छह माह राम-राम कहकर काटे हैं और संसद का शीत सत्र समाप्त होते-होते तक राहुल को पप्पू से गुंडा बना ही दिया। अब संसद नहीं बल्कि संसद मार्ग थाने की पुलिस और बाद में अदालत तय करेगी कि राहुल गाँधी पप्पू हैं या गुंडे।</p>
<p>मजे की बात देखिये कि मणिपुर में सैकड़ों निरीह लोगों के नरसंहार पर भी जिन प्रधानमंत्री जी की नींद नहीं टूटी उन प्रधानमंत्री जी ने राहुल गांधी द्वारा कथित रूप से दिए गए धक्के में जख्मी हुए भाजपा संसद प्रताप सारंगी की खैरखबर मोबाईल कर ली । सारंगी ने मीडिया के समाने प्रधानमंत्री जी से संवाद का बाकायदा ऑडियो रिकार्ड कराया यानि प्रधानमंत्री जी से मोबाईल का आडियो खोलकर बात की। काश प्रधानमंत्री जी की ऐसी ही कृपा देश के दुसरे पीड़ितों पर भी हो जाये। भाजपा के प्रताप सारंगी राजनीति में आने से पहले न पप्पू थे और न गुंडे ।  वे तो केवल भाजपा की सारंगी बजाते थे। उन्होंने ग्राहम को नहीं मारा। उनकी ग्राहम के हत्यारे बजरंगी पहलवान से भी कोई दोस्ती नहीं थी।</p>
<p>मुझे जितना गर्व देश की संसद पर नहीं है, उससे ज्यादा गर्व देश के संसद मार्ग थाने पर है ।  संसद मार्ग थाने की पुलिस ने लोकसभा में प्रतिपक्ष  के नेता राहुल गांधी के खिलाफ तमाम उन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है जो आमतौर पर किसी गुंडे या मवाली के खिलाफ इस्तेमाल की जाती है। राहुल के खिलाफ धारा 115: स्वेच्छा से चोट पहुंचानाधारा 117: गंभीर चोट पहुंचाना,धारा 125: जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना ,धारा 131: आपराधिक बल का प्रयोग,धारा 351: आपराधिक धमकी देने और धारा 3(5): सामान्य उद्देश्य से काम करने का मामला दर्ज किया है। अब यदि संसद मार्ग थाने ने इस मामले में राहुल गांधी की गिरफ्तारी न की तो पुलिस के साथ दिल्ली पुलिस के मुखिया की भी नाक काट जाएगी।भाजपा  सांसद अनुराग ठाकुर, बांसुरी स्‍वराज और अन्‍य नेताओं ने संसद मार्ग थाने में शिकायत दर्ज  कराई। यानि सारंगी और बांसुरी समवेत सुर में बज रहीं है।</p>
<p>मकर द्वार पर धक्का-मुक्की के मामले में चूंकि भाजपा थाने गयी तो कांग्रेस भी थाने गयी ।  लेकिन पुलिस ने कांग्रेस की शिकायत पर कोई मामला दर्ज नहीं किया ,लेवल शिकायत ले ली। हमारे देश की पुलिस अक्सर ऐसा ही करती है।   कांग्रेस की शिकायत में कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ धक्‍का-मुक्‍की की  शिकायत गई,  दिल्‍ली पुलिस  ने कहा कि कांग्रेस की शिकायत की फिलहाल जांच की जा रही है. जांच पूरी होने के बाद उचित कदम उठाया जाएगा।हमरे देश कि  पुलिस का उचित कदम तभी उठता है जब उससे ऐसा कदम उठाने के लिए कहा जाये।</p>
<p>दरअसल इस फसाद की जड़ में तो केंद्रीय गृहमंत्री माननीय अमित शाह और माननीय डॉ भीमराव अम्बेडकर साहब हैं ,इसलिए कायदे से तो इन दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कराया जाना चाहिए था। क्योंकि न अमित शाह साहब डॉ अम्बेडकर साहब के बारे में कोई टिप्पणी करते और न कांग्रेस इसके विरोध में कोई मार्च निकालती। कांग्रेस ने अमित शाह की ओर बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर पर की गई टिप्पणी के विरोध में संसद भवन परिसर में प्रदर्शन किया।</p>
<p>कांग्रेस सांसदों ने सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले अम्बेडकर की प्रतिमा से लेकर मकर द्वार तक मार्च किया। इसी मार्च के बाद धक्का-मुक्की का दिसंबर आ गया। संसद भवन के ‘मकर द्वार’ के निकट सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्य एक दूसरे के सामने आ गए और जमकर नारेबाजी की।ये काम पहले संसद के भीतर हो चुका था लेकिनजब विपक्ष मार्च कर रहा था तो  सत्तापक्ष हाथ पर हाथ धरकर क्यों बैठता ?<br />नगालैंड की बीजेपी सदस्य फान्गनॉन कोन्याक ने तो आरोप लगाया कि वह जब संसद के मकर द्वार के पास अन्य सांसदों के साथ प्रदर्शन कर रही थीं तभी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी उनके समीप आ गये और उन पर चिल्लाने लगे। कोन्याक ने आसन की अनुमति से अपनी बात रखी और यह आरोप लगाया।</p>
<p>उन्होंने कहा कि वह इस घटना को बहुत ही दुखी मन से बयान कर रही हैं। सभापति जगदीप धनखड़ ने सदन में व्यवस्था बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि वह भाजपा की शिकायत पर गौर कर रहे हैं।संसद भवन परिसर में हुई हाथापाई को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष  अध्यक्ष ओम बिरला ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी सांसद को संसद भवन के किसी भी गेट पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति न दी जाए। यानि पहले जंतर- मंतर पर विरोध प्रदर्शन बंद कराये गए और अब संसद के सभी दरवाजों को प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। इससे निश्चित ही हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा।</p>
<p>संसद के मकर द्वार पर हुई कथित धक्का-मुक्की ने इतिहास रच दिया है।  अब राहुल गांधी बैठे -बैठाये हीरो कहिये  या खलनायक बनने जा रहे हैं। भाजपाजन राहुल के पुतले जलाने लगे  है और कांग्रेस राहुल बाबा को हीरो बनाने में लगी है। आपको याद होगा कि  भाजपा पहले से ही राहुल की टीशर्ट और उनकी बहन  प्रियका के फिलिस्तीन झोले से आतंकित थी और अब राहुल ने अपने टोलों का पावर भी कथित रूप से दिखा दिया है। मुझे लगता  है कि  मकर द्वार काण्ड को देखते हुए जब भी देश में एक साथ चुनाव होंगे तब टिकट  वितरण में राहुल जैसे टीशर्ट पहनने वाले और  टोले बनाने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। पुलिस के अलावा अब देश की जनता को भी तय करना है कि  राहुल गाँधी गुंडे हैं या पप्पू या विपक्ष के नेता या देश  के भावी भाग्यविधाता ? मै तो कुछ भी तय नहीं कर पा रहा फ़िलहाल।</p>
<p><strong>राकेश अचल </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2024 16:43:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजघरानों की ' दुखती रग 'पर राहुल गाँधी का हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[<p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अच्छे आदमी नहीं हैं ।  अच्छे आदमी इसलिए इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे दूसरों  की 'दुखती रग' पर हाथ रख देते है।  इस बार उन्होंने गुलाम भारत के उन  राजघरानों के बारे में लिख दिया जो आजाद भारत में भी अपने आपको राजा-महाराजा समझते हैं। हालाँकि हैं नहीं और अब उनके लिए दोबारा राजपाट मिलने की भी कोई संभावना भी  नहीं है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने व्यापार और बाजार परिदृश्य पर विचार प्रस्तुत करते हुए लेख लिखा जो एक अंग्रेजी  अखबार में छपा। ये अखबार किसी जमाने में कांग्रेस का प्रबल विरोधी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146051/rahul-gandhis-hand-on-the-sore-spot-of-royal-families"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/राजघरानों-की-&#039;-दुखती-रग-&#039;पर-राहुल-गाँधी-का-हाथ.jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अच्छे आदमी नहीं हैं ।  अच्छे आदमी इसलिए इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे दूसरों  की 'दुखती रग' पर हाथ रख देते है।  इस बार उन्होंने गुलाम भारत के उन  राजघरानों के बारे में लिख दिया जो आजाद भारत में भी अपने आपको राजा-महाराजा समझते हैं। हालाँकि हैं नहीं और अब उनके लिए दोबारा राजपाट मिलने की भी कोई संभावना भी  नहीं है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने व्यापार और बाजार परिदृश्य पर विचार प्रस्तुत करते हुए लेख लिखा जो एक अंग्रेजी  अखबार में छपा। ये अखबार किसी जमाने में कांग्रेस का प्रबल विरोधी अखबार था। अखबार का नाम है ' इंडियन एक्सप्रेस।</p>
<p>राहुल के लेख में  उन्होंने एकाधिकार और नफरत फैलाने वालों पर निशाना साधा। उन्होंने शाही परिवारों को भी निशाने पर लिया।  राहुल गाँधी का लेख पढ़ते ही राजघरानों के लोगों को आग सी लग गयी। राजस्थान की उप  मुख्यमंत्री दिया कुमारी ने राहुल गांधी के लेख की आलोचना की। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झाँसी की रानी के साथ कथित गद्दारी का कलंक लिए घूमने वाले ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के मौजूदा चश्मों चिराग केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने  भी राहुल गांधी की टिप्पणी पर अपनी नाराजगी जताई।</p>
<p>आपको अतीत में ले जाना चाहता हूँ।  हमने पढ़ा है तो आपने भी पढ़ा ही होगा कि भारत में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हिन्दुस्तान में हिन्दू राजा-महाराजाओं , नवाबों की रियासतें हुआ करतीं थी।  यानि जैसे आज आजाद राष्ट्र में एक महाराष्ट्र है वैसे ही गुलाम भारत में एक -दो नहीं बल्कि  पूरी 565 रियासतें थीं।यानि 565  हिंदुस्तान। ये सब स्वतंत्र होकर भी परतंत्र थे लेकिन मजे में थे। अंग्रेजों के साथ  अधिकांश राजघरानों की संधियां थी।कुछ की तो मुगलों से भी संधियां रहीं।   अंग्रेज इन्हें इनाम-इकराम और बड़े -बड़े तमगे भी दिया करते थे, लेकिन इनमें  से बहुत से राजघराने थे जो अंग्रेजों से लगातार मुठभेड़ें भी लेते रहते थे ,लेकिन उनकी ये मुठभेड़ें निजी नफा-नुक्सान को लेकर हुआ करतीं थीं।</p>
<p>आजकल लोग अखबार कम पढ़ते हैं लेकिन सोशल मीडिया ज्यादा देखते हैं इसीलिए राहुल गाँधी ने भी अपने  ' एक्स ' के पन्ने पर पर अपना लेख साझा करते हुए लिखा कि अपना भारत चुनें निष्पक्ष खेल या एकाधिकार? नौकरियां या कुलीनतंत्र? योग्यता या रिश्ते? नवाचार या डरा-धमकाना? बहुतों के लिए धन या कुछ चुनिंदा लोगों के लिए? मैं इस बारे में लिख रहा हूं कि व्यापार के लिए एक नया समझौता सिर्फ एक विकल्प नहीं है, यह भारत का भविष्य है।<br />आपने शायद राहुल का लेख न पढ़ा हो इसलिए मैं उनके लेख के कुछ अंश यहां साझा करता हूँ।  उन्होंने लिखा कि - ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को चुप करा दिया  था।</p>
<p>यह अपने व्यापारिक कौशल से नहीं, बल्कि अपने दबदबे से चुप कराया गया था। कंपनी ने हमारे अधिक लचीले महाराजाओं और नवाबों के साथ साझेदारी करके, रिश्वत देकर और धमकाकर भारत का गला घोंटा। इसने हमारे बैंकिंग, नौकरशाही और सूचना नेटवर्क को नियंत्रित किया। हमने अपनी आजादी किसी अन्य राष्ट्र से नहीं खोई; हमने इसे एक एकाधिकारवादी निगम से खो दीया जिसने एक जबरदस्ती तंत्र चलाया। अब इस लेख में कितनी हकीकत है और कितना अफ़साना ये पाठकों को तय करना है ,लेकिन मुझे लगता है कि  राहुल ने एक बार फिर उस सामंतवादी  समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया है जो हमेशा राजसत्ता के इर्दगिर्द मंडराता रहता है। कल भी मंडराता था और आज भी मंडरा रहा है।  उसके लिए दल ज्यादा महत्व नहीं रखते। यानि राजघरानों को राजसत्ता के आसपास ही रहना ह।  फिर चाहे वो सत्ता कांग्रेस की हो,भाजपा की हो, गठबंधन की हो या बैशाखियों वाली हो।</p>
<p>राहुल गांधी के लेख की कुछ पंक्तियों ने  देश के तमाम  राजशाही परिवारों को नाराज कर दिया।  राजघरनों के लिए मशहूर  राजस्थान के   जयपुर के पूर्व शाही परिवार की सदस्य और राजस्थान की उप मुख्यमंत्री दिया  कुमारी ने भी  अपने एक्स हैंडल से राहुल गांधी पर निशाना साधा।  राजकुमारी दीया कुमारी ने लिखा कि मैं संपादकीय में राहुल गांधी की ओर से भारत के पूर्व शाही परिवारों को बदनाम करने के प्रयास की कड़ी निंदा करती हूं। उनका कहना है  कि एकजुट भारत का सपना भारत के पूर्व शाही परिवारों के अत्यधिक बलिदान के कारण ही संभव हो सका। ऐतिहासिक तथ्यों की अधूरी व्याख्या के आधार पर किए गए निराधार आरोप पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं।</p>
<p>राहुल गाँधी के लेख से सबसे ज्यादा आहत हुए उनके पुराने दोस्त और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिय। सिंधिया जिस परिवार से आते हैं उसके ऊपर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ प्रथम स्वतांत्रता आंदोलन के समय ' गद्दारी ' करने का आरोप लगाया गया था,जो आज भी लोकधारणा में ज़िंदा है। सिंधिया परिवार इस आरोप से इतना लज्जित था कि  पिछले डेढ़ सौ साल में इस परिवार का कोई सदस्य रानी लक्ष्मी बाई की ग्वालियर स्थित समाधि पर नहीं गया था,खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी नहीं गए थे,लेकिन 2020  में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें भी रानी झाँसी को वीरांगना स्वीकार कर उनकी समाधि पर शीश नवाने के लिए विवश कर दिया था।</p>
<p>राहुल के लेख पर बिफरते हुए सिंधिया  ने लिखा कि नफरत फैलाने वालों को भारतीय गौरव और इतिहास पर व्याख्यान देने का कोई अधिकार नहीं है। राहुल गांधी का भारत की समृद्ध विरासत के बारे में अज्ञान और उसका औपनिवेशिक मानसिकता सभी सीमाओं को पार कर गई है। सिंधिया ने आगे कहा कि यदि आप राष्ट्र को 'उन्नत' करने का दावा करते हैं, तो भारत माता का अपमान करना बंद करें और महादजी सिंधिया, युवराज बीर तिकेंद्रजीत, कित्तूर चेन्नम्मा और रानी वेल्लु नचियार जैसे सच्चे भारतीय नायकों के बारे में जानें, जिन्होंने हमारी आजादी के लिए कड़ा संघर्ष किया।<br />राहुल और सिंधिया लेख भी लिखते हैं ये मुझे पता नहीं था,किन्तु राहुल के लेख पर उफनते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लिखा कि -'अपने स्वयं के विशेषाधिकार के बारे में आपकी चयनात्मक स्मृतिलोप उन लोगों के लिए एक अपमान है जो वास्तव में विपरीत परिस्थितियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p>आपका असंगति केवल कांग्रेस के एजेंडे को और अधिक उजागर करती है - राहुल गांधी आत्मनिर्भर भारत के कोई चैंपियन नहीं हैं; वह केवल एक पुराने अधिकार का उत्पाद हैं। भारत की विरासत की शुरुआत या अंत 'गांधी' उपनाम से नहीं होती है। केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही हमारे वास्तविक योद्धाओं की कहानियों का अंततः जश्न मनाया जा रहा है। भारत के इतिहास का सम्मान करें, या उसके लिए बोलने का दिखावा न करें।<br />राहुल गाँधी को ये लेख लिखने की और पुराने राजघरानेों को निशाने पार रखने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ,ये मेरी समझ में नहीं आया। उन्होंने ये लेख खुद लिखा या किसी से लिखवाया ये वे जाने, किन्तु उन्होंने इस मुद्दे का सामन्यीकरण कर उन राजघरनों के लोगों को भी आहत किया जो अंग्रेज परस्त नहीं थे ,मुग़ल परस्त नहीं थे। खैर दुखती रग तो दुखती रग है।</p>
<p> राहुल के लेख के जबाब में सिंधिया ने भी राहुल की दुखती रग छूने की कोशिश की है, बावजूद इसके एक हकीकत ये है कि  पुराने पांच सैकड़ा से ज्यादा  राजघरानों में से मिर्ची केवल जयपुर और ग्वालियर के राजघराने को लगी। ग्वालियर  में तो सिंधिया राजघराने के मुखिया तो आज भी ग्वालियर के चौराहों पर सिंधिया राजघराने के प्रतीक चिन्हों की जालियां लगवाने के लिए स्मार्ट सिटी का ही नहीं बल्कि दूसरें मदों का पैसा भी पानी की तरह खर्च करा रहे हैं ताकि उनका ऐश्वर्य ज़िंदा बना रहे। वैसे आपको बता दूँ की हमारे सिंधिया शासकों कि पास अंग्रेजों द्वारा दी गयी तमाम उपाधियों में से नाइट ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया,कैसर-ए-हिंद पदक,चीन युद्ध पदक और रॉयल विक्टोरियन ऑर्डर का नाइट ग्रैंड क्रॉस प्रमुख था।<br /><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 Nov 2024 16:31:59 +0530</pubDate>
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                <title>गठबंधन धर्म की लाज  फिर खतरे में</title>
                                    <description><![CDATA[<p>करवा प्रधान महिलाओं के देश में गठबंधन की लम्बी उम्र के लिए कोई व्रत करने वाला नजर नहीं आ रहा है।  केंद्र की सत्ता से भाजपा को हटाने के लिए एकजुट हुए तमाम राजनीतिक दल एक बार फिर अपनी-अपनी ढपली बजाते नजर आ रहे है।  महाराष्ट्र और झारखण्ड विधानसभा के साथ ही तमाम विधानसभाओं और लोकसभा के उपचुनावों को लेकर गठबंधन की गांठें शिथिल होती दिखाई दे रहीं हैं। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए एनडीए गठबंधन ने अपनी तमाम सीटों का न सिर्फ बँटवारा कर लिया है बल्कि उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है ,जबकि आईएनडीआईए गठबंधन अभी बैठकों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145667/the-honor-of-the-coalition-religion-is-again-in-danger"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/gathbandhn-1.webp" alt=""></a><br /><p>करवा प्रधान महिलाओं के देश में गठबंधन की लम्बी उम्र के लिए कोई व्रत करने वाला नजर नहीं आ रहा है।  केंद्र की सत्ता से भाजपा को हटाने के लिए एकजुट हुए तमाम राजनीतिक दल एक बार फिर अपनी-अपनी ढपली बजाते नजर आ रहे है।  महाराष्ट्र और झारखण्ड विधानसभा के साथ ही तमाम विधानसभाओं और लोकसभा के उपचुनावों को लेकर गठबंधन की गांठें शिथिल होती दिखाई दे रहीं हैं। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए एनडीए गठबंधन ने अपनी तमाम सीटों का न सिर्फ बँटवारा कर लिया है बल्कि उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है ,जबकि आईएनडीआईए गठबंधन अभी बैठकों से ही फारिग नहीं हो पाया है।</p>
<p> महाराष्ट्र में भी कमोवेश यही हालात हैं। सीटों के बंटवारे  और प्रत्याशियों कोई घोषणा में हो रही देर इंडिया गठबंधन को भारी पड़  सकती है ,ये जानते हुए भी हर क्षेत्रीय दल कांग्रेस से सौदेबाजी करने में लगा है। हकीकत ये है कि देश में आज ऐसा कोई क्षेत्रीय दल नहीं है जो कांग्रेस को साथ लिए  बिना भाजपा को चुनौती दे सके।  सौदेबाजी में कांग्रेस का कम लेकिन क्षेत्रीय दलों का ज्यादा नुक्सान होने वाला है। देश की राजनीति में अब भाजपा कोई किंवदंती नहीं बल्कि एक हकीकत है। भाजपा का एजेंडा भले ही आपको या मुझे रास न आये किन्तु ये सच है कि  उसने बीते एक दशक में सत्ता में टिके रहना सीख लिया है।</p>
<p>धीरे-धीरे ही सही लेकिन अब भाजपा की स्थिति मजबूत हुई है और सत्ता के दरबार में भाजपा ने जिस तरह से अपने आपको अंगद के पैर की तरह स्थापित किया है ,उसे कोई चुनौती  नहीं दे पा रहा है। अलबत्ता आम चुनावों में सबने मिलकर भाजपा की सत्ता को हिलाने की अभिनव कोशिश की थी। गनीमत है कि  बिहार विधानसभा की 4 सीटों के लिए हो रहे उपचुनाव में आईएनडीआईए गठबंधन के बीच सीटों का बँटवारा सौहार्दपूर्ण तरीके  से हो गया ।  यहां 3 सीटें राजद और एक सीट माकपा [ माले ] को मिली है। कांग्रेस के लिए मप्र में कोई समस्या पहले से ही नहीं थी ,लेकिन महाराष्ट्र में सीटों का बंटवारा अभी तक अधर में है।</p>
<p>महाराष्ट्र में महाराष्ट्र विकास अगाडी की गाडी सीटों के बंटवारे को लेकर आगे ही नहीं बढ़ रही  है ।  शिवसेना [ ठाकरे ] गुट और कांग्रेस में बात बन नहीं रही है और ऐसा लगता है कि  ये गठबंधन बिखर जाएगा,लेकिन यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस को तो कोई नुक्सान नहीं होने वाला लेकिन उद्धव ठाकरे की फजीहत हो जाएगी।  शरद पंवार साहब की एनसीपी भी अकेले दम पर भाजपा को रोकने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में इन तीनों प्रमुख घटकों को हिकमत अमली से फैसला करना पडेगा। अब ये महाराष्ट्र विकास अगाडी को तय करना है की वे अपने और महाराष्ट्र के हित में झुकते हैं या नहीं ?</p>
<p>महाराष्ट्र जैसी ही दशा उत्तर प्रदेश विधानसभा की 10  सीटों के लिए होने वाले उपचुनावों को लेकर है ।  यहां कांग्रेस कम से कम 5  सीटें चाहती है और समाजवादी पार्टी शायद इसके लिए राजी नहीं है /आपको याद है कि  कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन के चलते ही आम चुनावों के दौरान भाजपा के अश्व्मेद्घ को उत्तर प्रदेश में रोका जा सका था ,अन्यथा न सिर्फ खुद के लिए 370  सीटें हासिल करती अपितु 400  पार भी कर लेती तो कोई हैरानी न होती।</p>
<p>इन तमाम अटकलों के बीच इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर सरगरमी बढ़ी है. कांग्रेस के आला नेता राहुल गांधी, राजद के तेजस्वी यादव सहित राजद की पूरी टीम रांंची में थी. सीट बंटवारे को लेकर इंडिया गठबंधन में दिनभर मंथन हुआ. फिलहाल सहमति बनी है कि झामुमो के खाते में 41 से 42 सीटें जा सकती है. वहीं, कांग्रेस 28-29 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वहीं वाम दलों को चार सीटें मिल सकती है. माले को बगोदर, निरसा और राजधनवार या सिंदरी मिल सकता है. वहीं सीपीआइ को भी एक सीट देने की चर्चा है. गठबंधन में राजद को पांच से छह सीट देने की तैयारी है।</p>
<p>झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन 81 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ेगा।  हम 81 सीट पर जेएमएम, कांग्रेस और राजद मिलकर चुनाव लड़े थे।  इस गठबंधन में नये सहयोगी भी शामिल हुए. हैं।  अब लेफ्ट पार्टी की भी भूमिका होगी. इस चुनाव में पहले चरण की बातें हुई हैं. 70 सीटों पर कांग्रेस और जेएमएम लड़ेंगे. बचे हुए सीट पर सहयोगी लड़ेंगे. कौन कहां से लड़ेगा, उसका फैसला बाद में होगा।</p>
<p>महाराष्ट्र में सपा हो या उद्धव ठाकरे की शिवसेना या एनसीपी यदि जरा भी हठधर्मी दिखाते हैं तो यहां भाजपा की जीत का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। इंडिया गठबंधन हरियाणा विधानसभा चुनाव में गर्म दूध से जल चुका  है, इसलिए उसे अब महाराष्ट्र और झारखण्ड में छाछ भी फूंक-फूंककर पीना चाहिए। जल्दबाजी में जबान जलने का खतरा बना ही रहेगा। आज की स्थिति में विपक्ष के पाँव अपनी ताकत बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है ,क्योंकि अब  ' मोदी हटाओ 'का नारा तो 2029  में ही लगाया जा सकेगा। विपक्ष यदि अगले आम चुनाव तक एक न रहा तो भाजपा के लिए तमाम क्षेत्रीय दलों को समाप्त करना आसान हो जाएगा। २०२९ अभी बहुत दूर है। इसलिए सभी को आज की बात करना चाहिए, सुनना चाहि।</p>
<p><strong>राकेश अचल </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Oct 2024 17:45:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>इंडी गठबंधन के साथी ही कांग्रेस की कर रहे है फजीहत ! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>मौजूदा दो विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस की फजीहत बढ़ गई है। अब इंडिया गठबंधन के घटक दल कांग्रेस की खटिया खड़ी करने पर उतर आए हैं। आपको बता दें कि लगभग सभी एग्जिट पोल में इस बार हरियाणा में कांग्रेस की भारी बहुमत से विजय की स्पष्ट भविष्यवाणी की गई थी परन्तु जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी कि वहां कौन जीतेगा।एग्जिट पोल के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस को हरियाणा में 10 वर्ष बाद सरकार बनाने का भरोसा था परन्तु परिणाम एग्जिट पोल के विपरीत रहे। इन चुनावों में जहां भाजपा 48 सीटें जीत</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145471/indi-alliance-partners-are-embarrassing-congress-%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/इंडी-गठबंधन-के-साथी-ही-कांग्रेस-की-कर-रहे-है-फजीहत-!.jpg" alt=""></a><br /><div>मौजूदा दो विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस की फजीहत बढ़ गई है। अब इंडिया गठबंधन के घटक दल कांग्रेस की खटिया खड़ी करने पर उतर आए हैं। आपको बता दें कि लगभग सभी एग्जिट पोल में इस बार हरियाणा में कांग्रेस की भारी बहुमत से विजय की स्पष्ट भविष्यवाणी की गई थी परन्तु जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी कि वहां कौन जीतेगा।एग्जिट पोल के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस को हरियाणा में 10 वर्ष बाद सरकार बनाने का भरोसा था परन्तु परिणाम एग्जिट पोल के विपरीत रहे। इन चुनावों में जहां भाजपा 48 सीटें जीत कर तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है, वहीं कांग्रेस 37 सीटों पर ही सिमट गई है।कांग्रेस के कर्ताधर्ता जीत को लेकर इतना आश्वस्त थे कि विजय जलूस के लिए बारात वाले बगगी और घोड़े भी सज-धज के साथ बुकिंग कर दिया गया था लेकिन जैसे ही नतीजे आए कांग्रेस के अरमान आंसुओं में बह गए। </div>
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<div>चुनावों के दौरान भाजपा को सत्ता विरोधी लहर के अलावा कांग्रेस व अन्य दलों द्वारा बेरोजगारी और किसान आंदोलन आदि को लेकर आरोपों का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार, भूमि स्कैंडलों और सरकारी नौकरियों में पक्षपात आदि का मुद्दा उठाया।कांग्रेस में हाल ही के लोकसभा चुनावों में अच्छे प्रदर्शन के चलते अति आत्मविश्वास, मुख्यमंत्री को लेकर कलह, कुमारी शैलजा की नाराजगी के प्रति हाईकमान की उदासीनता और 'आप' तथा अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी गठबंधन न होना कांग्रेस पार्टी के पिछड़ जाने का कारण भी रहा।हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद इंडिया ब्लॉक के सहयोगी अब खुलकर कांग्रेस के विरोध में आ गए हैं. हरियाणा में मंगलवार को चुनाव में मिली हार के बाद जहां कई सहयोगी दलों ने कांग्रेस पर निशाना साधा तो वहीं कांग्रेस को अगले ही दिन दो बड़े झटके भी लगे. पहले तो आम आदमी पार्टी ने साफ कर दिया कि वो दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव में अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे और किसी से गठबंधन नहीं करेंगे.</div>
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<div>वहीं, सपा ने भी यूपी उपचुनाव को लेकर उन सीटों पर भी अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया जिसपर कांग्रेस दावा कर रही थी. हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनाव के लिए बड़ा ऐलान किया है. आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा,'हम दिल्ली (विधानसभा) चुनाव अकेले लड़ेंगे. एक तरफ ओवर कॉन्फिडेंट कांग्रेस है तो दूसरी तरफ अहंकारी भाजपा है. हमने पिछले 10 सालों में दिल्ली में जो किया है, उसके आधार पर हम चुनाव लड़ेंगे। </div>
<div>उधर, शिवसेना ने सामना में लिखा कि हरियाणा की हार से महाराष्ट्र कांग्रेस को भी सीख लेने की जरूरत है. शिवसेना ने कहा कि कांग्रेस ने हरियाणा में आप या अन्य दलों से गठबंधन नहीं किया, जिसके चलते उसे हार का सामना करना पड़ा. जबकि जम्मू-कश्मीर में गठबंधन का फायदा दिखा. शिवसेना ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस को पता है कि जीत को हार में कैसे बदलना है. शिवसेना ने कहा कि हरियाणा की हार कांग्रेस के ओवर कॉन्फिडेंस और राज्य नेतृत्व के अहंकार का नतीजा है. हुड्डा ने नॉन जाट वोटर्स को साथ नहीं लिया, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा। </div>
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<div>जहां तक जम्मू-कश्मीर का संबंध है, कश्मीर में नैशनल कान्फ्रेंस और जम्मू में भाजपा को अधिक सीटें मिली हैं। कश्मीर में नैशनल कान्फ्रेंस (42) तथा सहयोगी कांग्रेस (6) को 48 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला है।</div>
<div>अतीत में कांग्रेस पार्टी का जम्मू क्षेत्र में मजबूत आधार रहा है परन्तु इस बार उसका आधार खिसक गया और वह जम्मू क्षेत्र में एक ही सीट जीत पाई। सबसे बड़ा झटका पी.डी.पी. को लगा है जिसे 3 सीटें ही मिली हैं।</div>
<div>जम्मू-कश्मीर के चुनावों में भाजपा को बड़े करिश्मे की उम्मीद थी परन्तु उसे 29 सीटों पर संतोष करना पड़ा। भाजपा नेताओं का अनुमान था कि कुल 35 के लगभग सीटें आने पर वे 5 नामांकित सीटों और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल हो जाएंगे परन्तु ऐसा नहीं हो रहा।</div>
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<div>सरकार बनाने की कोशिश में पहाड़ी भाषी समुदाय को पिछड़ी जनजाति का दर्जा देने, धारा 370 हटाने और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की समाप्ति तथा पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के विरुद्ध चलाए गए 'आल आऊट' अभियान तथा मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट देने का भी इसे कोई विशेष लाभ नहीं मिला। अलबत्ता जम्मू-कश्मीर में 'आप' को एक सफलता अवश्य मिली है जहां उसका एक उम्मीदवार चुनाव जीत गया है।</div>
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<div>नैकां-कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने पर सरकार बनाने की राह आसान हो गई है और नैशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला ने उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा भी कर दी है।पी.डी.पी. सुप्रीमो महबूबा मुफ्ती ने कांग्रेस और नैशनल कांफ्रैंस की जीत पर कहा है कि "केंद्र को जम्मू-कश्मीर के निर्णायक फैसले से सबक लेना चाहिए और नैकां-कांग्रेस सरकार के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि वे ऐसा करते हैं तो यह विनाशकारी होगा। मैं जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी स्थिर सरकार को वोट देने के लिए बधाई देती हूं।"नैकां सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला ने भी बड़ा दिल दिखाते हुए कहा है कि, "गठबंधन सरकार में पी.डी.पी. को भी शामिल किया जाएगा।"बहरहाल, अब जबकि भाजपा द्वारा हरियाणा में और नैकां कांग्रेस गठबंधन द्वारा जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की कवायद शुरू होने जा रही है, ये चुनाव एक सबक हैं, सभी राजनीतिक दलों के लिए कि एकता में ही बल है और फूट का नतीजा हमेशा हानि में ही निकलता है।</div>
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<div>उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में 2014 में अंतिम बार विधानसभा चुनाव हुए थे जिनमें पी.डी.पी. ने सर्वाधिक 28 सीटें जीती थीं तथा 25 सीटें जीतने वाली भाजपा से गठबंधन करके सरकार बनाई थी जो दोनों पार्टियों के बीच नीतिगत मतभेदों के कारण कायम न रह सकी। 2018 में महबूबा के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र के बाद से ही जम्मू-कश्मीर का प्रशासन बिना चुनी हुई सरकार के उप-राज्यपाल द्वारा ही चलाया जा रहा था।</div>
<div>अंत में एक बात और बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के जलेबी पर बांटे ज्ञान ने भी हरियाणा में कांग्रेस की लुटिया डुबो दी लोगों को अहसास हो गया कि राहुल गांधी लोकजीवन से बहुत दूर है और उन्हें जमीनी चीजों की कोई जानकारी नहीं है। अब जबकि राज्य में नैकां और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने जा रही है, आशा करनी चाहिए कि दोनों पार्टियां मिलकर बेहतर ढंग से राज्य का प्रशासन चलाकर इसे खुशहाली ओर ले जाएंगी।</div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Oct 2024 16:58:14 +0530</pubDate>
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