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                <title>karnataka high court - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वंदे मातरम् पर विवाद: राष्ट्रगीत के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती राजनीत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185453/controversy-over-vande-mataram-politics-cannot-be-bigger-than-respect"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का संकेत दिया। इस आरोप के आधार पर कर्नाटक के मंगलुरु में भाजपा नेता विकास पुत्तूर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई नहीं होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह मामला अभी आरोप और जांच के स्तर पर है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। कांग्रेस की ओर से इस पूरे आरोप को खारिज किया गया है। विवादित दृश्य को लेकर कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी मंच पर लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी लाने का संकेत दे रही थीं, न कि वंदे मातरम् रोकने का। दूसरी ओर भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ते हुए राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लेकिन इस विवाद का एक बड़ा पक्ष केवल 15 अगस्त की घटना तक सीमित नहीं है। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और देश की राजनीति में बहस का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए आज जब राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह समझना भी जरूरी है कि अतीत में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के संबंध में क्या रुख अपनाया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि समय के साथ इसके कुछ अंशों और धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम लीग तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई। 1930 के दशक में यह विषय कांग्रेस के सामने भी आया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1937 में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू अभिलेखागार में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार, 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में थोपने का आरोप लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस को लिखे पत्र में वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ हिस्सों को लेकर चर्चा की। नेहरू ने लिखा कि गीत की ‘आनंदमठ’ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर पैदा हुआ विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। यानी इतिहास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी गीत को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल पर विचार किया और 1937 में यह निर्णय सामने आया कि गीत के उन शुरुआती अंशों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर व्यापक सहमति थी। नेहरू के अपने वक्तव्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने इस विषय पर लंबे विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से आज की राजनीतिक बहस को एक ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस और उसके समर्थक इसे उस समय की सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बताते हैं। इतिहास में दर्ज तथ्यों को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा। इसलिए वंदे मातरम् को केवल एक राजनीतिक दल या विचारधारा से जोड़कर देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रगीत का सम्मान किसी सरकार, पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का हिस्सा है जिसमें असंख्य लोगों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि इसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की अवमानना का आरोप गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आरोप को प्रमाण मान लेने के बजाय निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाती रही है। इसके समर्थन में वह कांग्रेस नेताओं के पुराने बयानों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए 2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ‘सैफ्रन टेररिज्म’ यानी ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने बाद में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के ‘हिंदू आतंकवाद’ संबंधी बयान पर भी विवाद हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने स्वयं को उस शब्दावली से अलग करते हुए कहा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं से यह जरूर स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के बयान समय-समय पर बड़े राजनीतिक विवादों का कारण बने हैं। हालांकि किसी नेता के बयान को पूरे दल की आधिकारिक विचारधारा मान लेना भी उचित नहीं है। राजनीति में बयान आते हैं, उन पर विवाद होता है और कई बार स्वयं दल को सफाई भी देनी पड़ती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् पर वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने की प्रवृत्ति कब समाप्त होगी। भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक दलीलें हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए इससे बड़ा प्रश्न राष्ट्रीय सम्मान का है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के मामले में भी यदि कोई आपत्तिजनक व्यवहार हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप गलत हैं तो यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में न तो किसी नेता को केवल पद के कारण कानून से ऊपर माना जा सकता है और न ही किसी राजनीतिक विरोधी पर बिना प्रमाण आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है।कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी राजनीतिक दल देशभक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं रखता। भारत की आजादी किसी एक परिवार, पार्टी या संगठन की देन नहीं है। करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, बलिदान और त्याग से देश स्वतंत्र हुआ। इसलिए ‘हमने देश आजाद कराया’ जैसी राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठना जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 1937 के निर्णयों और उसके पीछे की परिस्थितियों पर राजनीतिक बहस भी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की आलोचना भी लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम उद्देश्य किसी दल को देशद्रोही साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम् को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर देश की नई पीढ़ी को उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। जो गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभावना जगाता रहा, उसके सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी देश के लोकतांत्रिक संस्कारों के लिए उचित नहीं हो सकती। लेकिन सम्मान के साथ न्याय और तथ्य भी जरूरी हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज शिकायत अब जांच का विषय है। पुलिस और जरूरत पड़ने पर न्यायपालिका यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्या करते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रगीत किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;">        *कांतिलाल मांडोत*</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="WhmR8e"></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 20:08:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मद्रास हाईकोर्ट में रिश्वत के आरोपों पर बड़ी कार्रवाई: 50 लाख रुपये लेने के मामले की सतर्कता जांच के आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;"><strong>चेन्नई।</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">Madras High Court ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता पर जज को रिश्वत देने के नाम पर 50 लाख रुपये लेने के गंभीर आरोपों के मामले में सतर्कता जांच के आदेश दिए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति निरमल कुमार ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया और प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) द्वारा दायर प्रतिवेदन के आधार पर सामने आया। संगठन ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल से यह कहकर 50 लाख रुपये लिए कि यह राशि जज को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169754/madras-high-court-takes-major-action-on-bribery-charges-orders"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/justice-m.-nirmal-kumar.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;"><strong>चेन्नई।</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">Madras High Court ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता पर जज को रिश्वत देने के नाम पर 50 लाख रुपये लेने के गंभीर आरोपों के मामले में सतर्कता जांच के आदेश दिए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति निरमल कुमार ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया और प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) द्वारा दायर प्रतिवेदन के आधार पर सामने आया। संगठन ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल से यह कहकर 50 लाख रुपये लिए कि यह राशि जज को देकर अनुकूल आदेश पारित कराया जाएगा। आरोप है कि धनराशि लेने के बावजूद कोई आदेश पारित नहीं हुआ।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;">न्यायालय का रुख</h3>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति निरमल कुमार ने अपने आदेश में कहा कि लगाए गए आरोप “विशिष्ट और गंभीर प्रकृति” के हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मामले को हाईकोर्ट की सतर्कता शाखा को सौंपना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आधार पर उन्होंने:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>स्वयं को सुनवाई से अलग किया,</p>
</li>
<li>
<p>मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया,</p>
</li>
<li>
<p>तथा उचित पीठ गठित कर जांच कराने की सिफारिश की।</p>
</li>
</ul>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;"><strong>किस याचिका से जुड़ा है मामला</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यह विवाद एन. गणेश अग्रवाल द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका से जुड़ा है। अग्रवाल ने:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>Central Bureau of Investigation (CBI) मामलों की विशेष अदालत द्वारा उनकी आरोपमुक्ति याचिका खारिज किए जाने,</p>
</li>
<li>
<p>और उनके विरुद्ध दाखिल आरोपपत्र,</p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">को रद्द करने की मांग की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला Metal and Minerals Trading Corporation of India (MMTC) से जुड़ा है।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;"><strong>113 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">एन. गणेश अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2008-09 के दौरान:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>विदेशी मुद्रा (रुपये और डॉलर) के उतार-चढ़ाव में सट्टा लगाया,</p>
</li>
<li>
<p>बायर्स क्रेडिट योजना के तहत की गई खरीद में पर्याप्त सुरक्षा नहीं ली,</p>
</li>
<li>
<p>और आपराधिक साजिश के माध्यम से MMTC को लगभग 113.38 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया।</p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">इसी मामले में उन्हें राहत दिलाने के नाम पर कथित रूप से रिश्वत की मांग किए जाने का आरोप लगाया गया।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;"><strong>मंत्रालय से आया था प्रतिवेदन</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">5 फरवरी को प्रस्तावित सुनवाई से पहले हाईकोर्ट रजिस्ट्री को Ministry of Law and Justice से एक पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें AILAJ का प्रतिवेदन संलग्न था। इसी पत्र के माध्यम से यह मामला औपचारिक रूप से न्यायालय के संज्ञान में आया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवेदन में कहा गया था कि:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>वरिष्ठ अधिवक्ता ने रिश्वत के नाम पर धन लिया,</p>
</li>
<li>
<p>लेकिन न तो आदेश दिलवाया गया,</p>
</li>
<li>
<p>न ही राशि लौटाई गई।</p>
</li>
</ul>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;">अधिवक्ता का पक्ष</h3>
<p style="text-align:justify;">जब अदालत ने संबंधित वरिष्ठ अधिवक्ता से स्पष्टीकरण मांगा, तो उन्होंने:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया,</p>
</li>
<li>
<p>किसी भी तरह की जांच में सहयोग का आश्वासन दिया।</p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">वहीं, विशेष लोक अभियोजक ने दलील दी कि इस तरह के आरोपों पर खुले मंच पर चर्चा करने से न्यायपालिका की गरिमा प्रभावित हो सकती है।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;"><strong>प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांत (Case Law)</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">इस मामले में न्यायालय का रुख पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप माना जा रहा है।</p>
<ol style="text-align:justify;">
<li>
<p><strong>K. Veeraswami बनाम भारत संघ (1991)</strong><br />इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच विशेष सावधानी और संस्थागत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।</p>
</li>
<li>
<p><strong>C. Ravichandran Iyer बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्य (1995)</strong><br />इस मामले में अदालत ने “इन-हाउस प्रक्रिया” को मान्यता दी, जिसके तहत न्यायपालिका अपने स्तर पर आरोपों की प्रारंभिक जांच कर सकती है।</p>
</li>
</ol>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं सिद्धांतों के तहत मद्रास हाईकोर्ट ने मामले को सतर्कता शाखा को सौंपने का निर्णय लिया है।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;"><strong>न्यायिक पारदर्शिता पर प्रभाव</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश न्यायपालिका की निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में अहम कदम है। किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों की स्वतंत्र जांच से जनता का भरोसा मजबूत होता है।</p>
<hr />
<h3 style="text-align:justify;">आगे की प्रक्रिया</h3>
<p style="text-align:justify;">अब इस मामले में:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>हाईकोर्ट की सतर्कता शाखा प्रारंभिक जांच करेगी,</p>
</li>
<li>
<p>अपनी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौंपेगी,</p>
</li>
<li>
<p>रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई तय होगी।</p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">जांच पूरी होने तक मूल याचिका पर सुनवाई स्थगित रहने की संभावना है।</p>
<hr />
<p style="text-align:justify;">यह मामला न केवल एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता से भी संबंधित है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस जांच के निष्कर्षों पर पूरे देश की नजर रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>Source Livelaw</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 21:15:55 +0530</pubDate>
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                <title>देश के किसी भी हिस्से को 'पाकिस्तान' नहीं कह सकते':।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली।</strong> देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने आज कर्नाटक हाई कोर्ट के जज के एक बयान पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग होती है, इसलिए जजों को बोलते हुए सावधान रहना चाहिए। </div>
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<div>  हाई कोर्ट के जज ने बेंगलुरू के एक इलाके को पाकिस्तान बता दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि यह बयान देश की संप्रभुता के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि जजों को ऐसी आकस्मिक टिप्पणियों से बचना चाहिए, जो महिलाओं के प्रति द्वेषपूर्ण और</div>
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<div>दरअसल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145122/no-part-of-the-country-can-be-called-pakistan"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-09/supream-court3.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली।</strong> देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने आज कर्नाटक हाई कोर्ट के जज के एक बयान पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग होती है, इसलिए जजों को बोलते हुए सावधान रहना चाहिए। </div>
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<div> हाई कोर्ट के जज ने बेंगलुरू के एक इलाके को पाकिस्तान बता दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि यह बयान देश की संप्रभुता के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि जजों को ऐसी आकस्मिक टिप्पणियों से बचना चाहिए, जो महिलाओं के प्रति द्वेषपूर्ण और किसी भी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण हों।</div>
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<div>दरअसल कर्नाटक हाई कोर्ट के जज ने एक केस की सुनवाई के दौरान बेंगलुरू के मुस्लिम बहुल ‘गोरी पाल्या’ नाम के इलाके को ‘पाकिस्तान’ कह दिया था। हालांकि इसको लेकर उन्होंने बाद में माफी भी मांगी थी लेकिन आज चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने इसको लेकर हाई कोर्ट के जज पर तल्ख टिप्पणी की और कहा कि यह ऐसी टिप्पणी भारत की संप्रभुता के खिलाफ है और कोई भारत के किसी भी हिस्से को पाकिस्तान नहीं कह सकता है।</div>
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<div>इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच कर रही थी, जिसमें सीजेआई चंद्रचूज़ भी शामिल थे। </div>
<div>इसके अलावा बेंच में जस्टिव संजीव खन्ना, जस्टिस भूषण आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ऋषिकेश रॉय शामिल थे। हालांकि हाई कोर्ट के जज द्वारा माफी मांगने का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सराहना भी की और कहा कि यह  न्याय हित में था।</div>
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<div> “आकस्मिक टिप्पणियां व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को इंगित कर सकती हैं,।  खासकर जब उन्हें किसी खास लिंग या समुदाय पर निर्देशित माना जाता है। इसलिए किसी को भी पितृसत्तात्मक या स्त्री-द्वेषी टिप्पणी करने से सावधान रहना चाहिए।”</div>
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<div>सीजेआई ने इस विवादित मुद्दे पर कहा, “हम एक खास लिंग या समुदाय पर टिप्पणियों के बारे में अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं और ऐसी टिप्पणियों को नकारात्मक रूप में समझा जा सकता है। हमें उम्मीद है और भरोसा है कि सभी हितधारकों को सौंपी गई ज़िम्मेदारियों को बिना किसी पूर्वाग्रह और सावधानी के साथ निभाया जाएगा।”</div>
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<div> इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग में जहां न्यायालय की कार्यवाही की व्यापक रिपोर्टिंग होती है। जब स्वप्रेरणा कार्यवाही शुरू हुई तो सीजेआई ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को बताया कि घटना के संबंध में कर्नाटक हाईकोर्ट से रिपोर्ट प्राप्त हुई है। सीजेआई ने रिपोर्ट को AG और SG को उनके अवलोकन के लिए सौंप दिया। एजी ने सुझाव दिया,"मैंने खुद क्लिपिंग देखी है। मैं सोच रहा था कि क्या इसे न्यायिक पक्ष के बजाय चैंबर में उठाया जा सकता है।</div>
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<div>मैंने कर्नाटक के सदस्यों से बात की। अगर कोई बड़ा मुद्दा बनता है तो इसके अन्य परिणाम हो सकते हैं।"एसजी ने कहा कि चूंकि जस्टिस श्रीशानंद ने टिप्पणी के लिए खेद व्यक्त किया है, इसलिए मामले को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि जज ने संकेत दिया कि (1) उनके द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों को सामाजिक संदर्भ में संदर्भ से बाहर उद्धृत किया गया, (2) टिप्पणियां अनजाने में की गई थीं।</div>
<div> </div>
<div>उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समाज के किसी वर्ग को ठेस पहुंचाना नहीं था, (3) यदि किसी व्यक्ति या समाज के किसी वर्ग को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंची हो तो माफ़ी मांगी जाती है। ओपन कोर्ट की कार्यवाही के दौरान हाईकोर्ट जज द्वारा की गई मनगढ़ंत माफ़ी को ध्यान में रखते हुए हम न्याय और न्याय की गरिमा के हित में कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाने पर विचार करते हैं।"</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Sep 2024 17:36:44 +0530</pubDate>
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