<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/2112/hindi-sampadkiya" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>Hindi Sampadkiya - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/2112/rss</link>
                <description>Hindi Sampadkiya RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>क्यों यूपी लोकसभा चुनाव में भरेगा भाजपा की झोली</title>
                                    <description><![CDATA[<p>अब कुछ हफ्तों के बाद ही देश में लोकसभा चुनावों की घोषणा हो जाएगी। पर उत्तर प्रदेश (यूपी) को छोड़कर देश के लगभग सभी राज्यों की लोकसभा सीटों के लिए कांटे की टक्कर होने की संभावना है । लेकिन, उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर नतीजे कुल मिलाकर लगभग तय हैं। यह बात उत्तर प्रदेश के शिखर सियासी नेताओं से लेकर आम इंसान तक को भलीभांति यह पता हैं। कभी जंगलराज, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार से जूझने वाला यूपी अब भारी-भरकम मोटा निवेश भी खींच रहा है।</p>
<p>सात साल पहले तक तो यूपी की गिनती बीमारु राज्यों में होती थी,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138962/why-will-bjp-win-in-up-lok-sabha-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-02/hindi-divas11.jpg" alt=""></a><br /><p>अब कुछ हफ्तों के बाद ही देश में लोकसभा चुनावों की घोषणा हो जाएगी। पर उत्तर प्रदेश (यूपी) को छोड़कर देश के लगभग सभी राज्यों की लोकसभा सीटों के लिए कांटे की टक्कर होने की संभावना है । लेकिन, उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर नतीजे कुल मिलाकर लगभग तय हैं। यह बात उत्तर प्रदेश के शिखर सियासी नेताओं से लेकर आम इंसान तक को भलीभांति यह पता हैं। कभी जंगलराज, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार से जूझने वाला यूपी अब भारी-भरकम मोटा निवेश भी खींच रहा है।</p>
<p>सात साल पहले तक तो यूपी की गिनती बीमारु राज्यों में होती थी,  लोग मजाक में यू.पी. को उल्टा प्रदेश भी कहते थे I लेकिन, आज यूपी की पहचान देश के  खेलों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य के रूप में भी होने लगी है। यूपी आज विकास की असीमित संभावनाओं के प्रदेश के रूप में स्थापित हो चुका है। यूपी देश की जीडीपी में  हिस्सेदारी के मामले में महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे अब नंबर पर है। देश में सर्वाधिक जीएसटी पंजीकृत व्यापारियों की संख्या के मामले में भी आज यूपी अव्वल है। राज्य में डिजिटल लेनदेन में एक साल में तीन गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। यही नहीं राज्य में डीमैट खातों की संख्या में भी सकारात्मक बढ़ोत्तरी हुई है।</p>
<p> आज अगर यूपी में चौतरफा विकास हो रहा है, तो इसका मुख्य श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही जाता है। देश की  यूपी की सियासी अहमियत निर्विवाद है। यहां पर भाजपा का प्रदर्शन लगातार सुधर ही रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी जीत को दोहराया ही नहीं है, वह लगातार विपक्ष की राजनीतिक जमीन को कमजोर भी कर रही है। कभी मंडल औऱ कमंडल  की राजनीति का गढ़ रहा यह प्रदेश मंदिर का घंटा और सख्त कानून व्यवस्था का डंडा एक साथ बजा रहा है। यूपी में आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष के लिए कोई बहुत अवसर नहीं हैं। </p>
<p>योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में यूपी  भाजपा का अभेद्य किला बनकर उभरा है । 2019 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सूबे की 80 में से 64 सीटें अकेले दम पर जीत ली थीं। इसी तरह वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने अकेले दम पर कुल उत्तर प्रदेश विधान सभा की 403 सीटों में से 225 सीटें जीत कर उत्तर प्रदेश की सत्ता में धमाकेदार वापसी की। अपने सहयोगियों के साथ भाजपा की सीटों का आंकड़ा 272 तक पहुंच गया। इस जीत ने योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता को एक प्रकार से प्रतिष्ठित कर दिया। बेशक अब लोकसभा चुनाव में भी यूपी भरेगा भाजपा की झोली। </p>
<p> योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में यूपी का नया फुल फॉर्म भी बताया। वे कहते हैं कि यूपी का मतलब है अनलिमिटेड पोटेंशियल।   बीते दिनों ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2024 के ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के दौरान मुख्यमंत्री योगी के अलावा पीएम मोदी भी लखनऊ में थे। इस दौरान  योगी आदित्यनाथ ने कहा, देश और दुनिया के उद्योग जगत ने हम पर और हमारी नीतियों पर विश्वास जताया। उत्तर प्रदेश को अबतक लगभग 40 लाख करोड़ के निवेश प्राप्त हो चुके हैं</p>
<p>और आते ही चले जा रहे हैं । इन्ही प्रयासों को धरातल पर उतारने का आज उत्सव है। नया उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश से अब उद्यम प्रदेश बनकर भारत के ग्रोथ इंजन के रूप में विकसित उत्तर प्रदेश बनने की ओर अग्रसर है। पिछले 7 वर्षों में यूपी में निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं। </p>
<p>यूपी पर नजर रखने वालों को पता है कि राज्य में निवेश तो आ ही  रहा है। साथ ही सरकार की तरफ से यह भी कोशिशें हो रही हैं ताकि कभी अपनी कपड़ा मिलों और मजदूरों के लिए मशहूर रहे कानपुर को फिर से उसका पुराना गौरव मिल जाए। कानपुर में आईटी सेक्टर के अलावा इलेक्ट्रानिक सामान और आटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े उत्पादों का उत्पादन करने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। कानपुर से देश के उत्तर, पूर्व तथा पश्चिम राज्यों के बाजारों में पहुंचने की सुविधा है। कानपुर में  आटो और आटो पार्ट्स की अनेक इकाइयां खड़ी हो सकती हैं।</p>
<p>चूंकि राज्य  सरकार अपने यहां आने वाले निवेशकों को टैक्स में भी छूट दे रही है, इसलिए कानपुर में निजी क्षेत्र के निवेश का होना तय है। गुस्ताखी माफ, कुछ साल पहले तक किसने सोचा था कि यूपी खेलों के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाने लगेगा। जरा याद करें चीन के हांगझोऊ शहर में हुए एशियाई खेलों को। भारत के पदकों का शतक पूरा कराने में उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों का अहम योगदान रहा है।एशि‍याई खेलों के महाकुंभ में पहली बार यूपी से कुल 36 एथलीटों ने अपनी चमक दिखाई। इन खिलाड़ियों ने सात स्वर्ण, आठ रजत और आठ कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया।</p>
<p>यह पहला मौका था जब यूपी के खि‍लाड़ियों की झोली में इतने सारे पदक आए हों। इससे पहले 2018 के जकार्ता और 2014 के इंचियॉन (दक्षि ‍ण कोरिया) में उत्तर प्रदेश के खि‍लाड़ियों ने 11-11 पदक ही जीते थे। उत्तर प्रदेश की खेल राजधानी के नाम से प्रसिद्ध मेरठ जिले के खि‍लाड़ियों ने सबसे चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है। एशियाई खेलों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 13 एथलीटों ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।</p>
<p>इनमें से छह मेरठ जिले से हैं और चार ने दो स्वर्ण सहित पांच पदक जीते हैं। बेशक, खेलों में यूपी के बढ़ते कदम साफ संकेत हैं कि राज्य को अब विकास का रास्ता मिल गया है। जिस राज्य में खेलों का स्तर सुधर रहा है,समझ लें कि उस राज्य का विकास हो रहा है। जिस यूपी से कुछ साल पहले तक कोई सुकून भरी खबर आती ही नहीं थी वहां से सकारात्मक खबरों का आना सुखद है। यूपी से अब दंगा-फसाद या गैंग वार की खबरें नहीं आती। अब वहां के सरकारी दफ्तरों में काहिल बाबुओं के लिए कोई जगह नहीं बची है।</p>
<p>यूपी की विकास यात्रा से पड़ोसी बिहार को भी सबक लेना होगा। तो अगर यूपी बदल रहा है तो साफ है कि वहां की जनता के चेहरे पर खुशी को पढ़ा जा सकता है। इस बदलाव के पीछे योगी आदित्यनाथ का कुशल नेतृत्व है। बदलता-आगे बढ़ता यूपी अपना फैसला लोकसभा चुनाव के वक्त दे देगा। हालांकि उस नतीजे का सबको पता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/138962/why-will-bjp-win-in-up-lok-sabha-elections</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/138962/why-will-bjp-win-in-up-lok-sabha-elections</guid>
                <pubDate>Tue, 27 Feb 2024 19:39:11 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-02/hindi-divas11.jpg"                         length="173958"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आटा ले लो आटा, मोदी ब्रांड सस्ता आटा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने ' सस्ता आटा,सस्ती दाल ' लांच कर एक नेक काम किया है ।  सरकार की ये जनकल्याणकारी योजना है क्योंकि देश में अब एक तरफ अडानी का फार्च्यून आटा  आम जनता का खून पी रहा है तो दूसरी तरफ अडानी दाल।  ऐसे में अडानी के कान खींचने के बजाय सरकार ने अपनी ही देशी सहकारी संस्थाओं को अडानी के मुकाबले मैदान में उतार दिया या यूं कहिये खुद मैदान में मोर्चा सम्हाल लिया।  खुद प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस ' भारत आटे ' की ब्रांडिंग करने की उदारता दिखाई है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136840/take-flour-modi-brand-cheap-flour"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/bharat-atta-1-1699277113.webp" alt=""></a><br /><p>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने ' सस्ता आटा,सस्ती दाल ' लांच कर एक नेक काम किया है ।  सरकार की ये जनकल्याणकारी योजना है क्योंकि देश में अब एक तरफ अडानी का फार्च्यून आटा  आम जनता का खून पी रहा है तो दूसरी तरफ अडानी दाल।  ऐसे में अडानी के कान खींचने के बजाय सरकार ने अपनी ही देशी सहकारी संस्थाओं को अडानी के मुकाबले मैदान में उतार दिया या यूं कहिये खुद मैदान में मोर्चा सम्हाल लिया।  खुद प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस ' भारत आटे ' की ब्रांडिंग करने की उदारता दिखाई है।</p>
<p>केंद्र सरकार देशभर में 27.50 रुपए प्रति किलो की कीमत पर 'भारत आटा' उपलब्ध कराएगी। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने  6 नवंबर को दिल्ली में आटे के वितरण वाहनों  को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसे 10 किग्रा  और 30 किग्रा  के पैक में उपलब्ध कराया जाएगा। मोदी जी देश  के पहले उदार प्रधानमंत्री हैं जो चीनी पेटीएम से लेकर देशी भारत आटा बेचने तक के लिए अपनी तस्वीर के इस्तेमाल की इजाजत देते हैं। वे पांच किलो मुफ्त अन्न का थैला हो या कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए टीके का प्रमाणपत्र सभी जगह छपने के लिए राजी हो जाते है।  </p>
<p>इतना सहज,सरल और उदार प्रधानमंत्री कम से कम मैंने तो अपने जीवन में अभी तक नहीं देखा। इस समय सचमुच जनता महगाई की मार से सिसक रही है ।  आर्तनाद कर रही है। बाजार पर अडानी और अम्बानी  जी का कब्जा  है। ये दोनों महानुभाव आटा-दाल से लेकर हर माल पर हावी हैं और इनकी चाबी सरकार के पास भी नहीं है। ऐसे में जनता को राहत देने के लिए सरकार ने मोदी ब्रांड   सस्ता भारत आटा और अरहर की दाल बेचने का समानांतर इंतजाम कर सचमुच लोकल्याणकारी काम किया है।</p>
<p>सरकार देश की 80  करोड़ आबादी को पहले से मुफ्त का राशन दे रही है। अब जो शेष 60  करोड़ लोग बचे वे मोदी ब्रांड सस्ता भारत आटा और दाल खरीदकर अपना जीवनयापन आसानी से कर सकते हैं। अपने आपको सच्चा भारतीय साबित करने कि लिए ससताभारत आटा खाने से सस्ता दूसरा क्या रास्ता हो सकता है ? आपको मै इस योजना के बारे में तफ्सील से बताये देता हूँ।  आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़  देशभर में  कोई 2 हजार ठिकानों  पर यह मोदी ब्रांड सस्ता आटा मिलेगा। इसे नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के साथ ही  नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया , सफल, मदर डेयरी और अन्य सहकारी संस्थानों के माध्यम से  बेचा जाएगा।</p>
<p>देश में इस समय अलग-अलग ब्रांड का आटा 35  से 50  रूपये किलो के भाव से बिक रहा है। जिसकी जैसी हैसियत है ,वो वैसा आटा खरीदता है। मैंने भी अपनी हैसियत कि मुताबिक कल ही सबसे सस्ता 35  रूपये किलो के भाव से दस किलो आटा खरीदा। पहले हम लोग पूरे साल के लिए गेंहूं खरीदकर रखते थे और फिर चक्की पर जाकर गेंहूं पिसवा लाते थे। अब न गेंहूं खरीदकर भंडारण की क्षमता बची है और न चक्की तक जाने का हौसला ,सो मजबूरन अडानी,अम्बानी  आशीर्वाद ब्रांड  आटे पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार बताती है कि मोदी ब्रांड भारत आटा बनाने केलिए ढ़ाई लाख मीट्रिक टन गेहूं काआवंटन विभिन्न सरकारी एजेंसियों को किया गया है।</p>
<p>उपभोक्ता मामलों के विभाग ने भी माना है कि  देश में आटे की औसत कीमत 35 से 50  रुपए किलो है। गेहूं की लगातार बढ़ती कीमत की वजह से त्योहारी सीजन में आटे की कीमत में तेजी को देखते हुए सरकार ने सस्ते दाम पर आटा बेचने का फैसला किया है। हमारी सरकार मॅंहगाई से जूझने कि लिए आजकल सीधे बाजार में बनिया बनकर उतर आती है। ये दुस्साहस का काम है अन्यथा सरकार का काम प्रशासन करना होता है न कि दाल-आटा बेचना ।  पिछले दिनों जब प्याज मंहगी हुई तो सरकार प्याज बेचने लगी थी। दाम बढ़ने से रोकने कि बजाय खुद ही उस जिंस को बेचना ज्यादा आसान काम है। हमारी सरकार हमेशा आसान काम को प्राथमिकता देती है।</p>
<p>प्याज की बढ़ी कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार ₹25 किलो की दर  से प्याज बेच रही है। नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया  और नेफेड ₹25 किलो के भाव  से सस्ती  प्याज पहले से ही बेच रही हैं।<br />नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया  20 राज्यों के 54 शहरों में 457 खुदरा भंडारों  पर कम दाम  पर प्याज बेच रही है। जबकि नेफेड 21 राज्यों के 55 शहरों में 329 खुदरा भंडारों कि माध्यम से घटी ड्रोन  पर प्याज बेच रही है।केंद्रीय भंडार ने भी बीते शुक्रवार से दिल्ली-एनसीआर  में प्याज की खुदरा बिक्री  के अपने  आउटलेट्स से शुरू कर दिए ।  सरकार 60 रुपए प्रति किलो के भाव पर भारत (चने की दाल उपलब्ध करा रही है। अगर आपको ये सस्ता माल नहीं मिल रहा है तो आप बदनसीब हैं।</p>
<p>आपको मालूम ही है कि हमारी केंद्र सरकार सबको साथ लेकर सबका विकास करने के अलावा बेचने में सिद्धहस्त है ।  पिछले दस साल ने देश का जितना सामान बेचने लायक था सीना ठोंक कर बेच डाला। लेकिन देश का दीवाला नहीं निकलने दिया ।  आखिर सरकार सरकारी सम्पदा को बेचे न तो देश की 80 करोड़ आबादी को मुफ्त में पांच किलो अन्न कहाँ से दे ? इसके लिए कोई अडानी,अम्बानी तो अपने खजाने खोलेंगे नहीं ! अडानी-अम्बानी तो खुद व्यापारी है। मिलकर देश में समानांतर सरकार चलते हैं। खुद सरकार को उनके इशारे पर भरतनाट्यम करना पड़ता है ।  वे अपने दम पर दुनिया  को मुठ्ठी में कर लेते हैं। पहले भी कर लेते थे और अब भी कर रहे हैं।</p>
<p>मै तो कहता हूँ कि केंद्रीय चुनाव आयोग [केंचुआ ] भी सरकार की ही तरह उदारता दिखाए और पांच राज्यों के लिए होने वाले चुनावों में मतदान के दिन मतदान केंद्रों के बाहर लगने वाले राजनीतिक दलों के बूथों पर भारत आटा बेचने की व्यवस्था करे। जनता अपना कीमती वोट सर्कार को दे और लौटते में सस्ता आटा साथ लेकर जाए। वैसे भी चुनाव के समय 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की योजना के विस्तार की घोषणा जब आदर्श आचार संहिता का उललंघन नहीं है तो मोदी ब्रांड भारत आटा बेचने से कौन से आदर्श   आचार संहिता का उललंघन हो जाएगा ? यूं तो ये संहितायें होती ही उललंघन करने कि लिए हैं। उस लक्ष्मण रेखा का क्या लाभ जिसे कोई लांघे ही न।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136840/take-flour-modi-brand-cheap-flour</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136840/take-flour-modi-brand-cheap-flour</guid>
                <pubDate>Wed, 08 Nov 2023 10:21:01 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-11/bharat-atta-1-1699277113.webp"                         length="65014"                         type="image/webp"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दम घुटती दिल्ली को कौन बचाएगा ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आजकल मै लोकतंत्र से ज्यादा दिल्ली को लेकर परेशान हूँ,क्योंकि दिन-ब-दिन दिल्ली का दम घुटते देख रहा हूँ ।  दिल्ली कभी खांसती है, कभी खखारती है,कभी बलगम थूकती है,कभी हांफती है। ये दिल्ली देश की राजधानी है ,इसकी ऐसी दशा कम से कम मुझसे तो देखी नहीं जाती। ऐसी  ही हालत  कोविड काल में आम आदमी की  हुई थी। आम आदमी को तो टीकाकरण ने बचा लिया था किन्तु दिल्ली को कौन और कैसे बचाएगा।</p>
<p>वर्षों पहले जब मै चीन गया था तब वहां ऐसी ही दशा मैंने बीजिंग की देखी थी। वहां रात को आसमान से अम्ल की वर्षा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136680/who-will-save-the-suffocating-delhi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/dilli1.jpg" alt=""></a><br /><p>आजकल मै लोकतंत्र से ज्यादा दिल्ली को लेकर परेशान हूँ,क्योंकि दिन-ब-दिन दिल्ली का दम घुटते देख रहा हूँ ।  दिल्ली कभी खांसती है, कभी खखारती है,कभी बलगम थूकती है,कभी हांफती है। ये दिल्ली देश की राजधानी है ,इसकी ऐसी दशा कम से कम मुझसे तो देखी नहीं जाती। ऐसी  ही हालत  कोविड काल में आम आदमी की  हुई थी। आम आदमी को तो टीकाकरण ने बचा लिया था किन्तु दिल्ली को कौन और कैसे बचाएगा।</p>
<p>वर्षों पहले जब मै चीन गया था तब वहां ऐसी ही दशा मैंने बीजिंग की देखी थी। वहां रात को आसमान से अम्ल की वर्षा होती थी ।  सड़क किनारे खड़ी कारों को सुबह पहचानना कठिन होता था क्योंकि कारों पर धूल  की गहरी परत के साथ पानी की बूंदों की ऐसी वर्षा होती थी कि  कारों पर कोलाज बन जाता था। मै तीन दिन बीजिंग में था ,लेकिन मैंने वहां एक दिन भी ढंग से सूरज को मुस्कराते नहीं देखा। सूरज बीजिंग में हमेशा धुंध के नीचे ही दबा सिसकता दिखाई देता था ।  यहां तब भी लोग मास्क लगते थे जब दुनिया में कोविड नहीं था । उस समय मुझे अपनी दिल्ली की बहुत याद आती थी ,क्योंकि दिल्ली भी बीजिंग होती दिखाई देने लगी थी।</p>
<p>दिल्ली केवल आम  आदमी पार्टी की दिल्ली नहीं है। दिल्ली भाजपा और कांग्रेस की भी दिल्ली नहीं है। दिल्ली मुगलों की भी दिल्ली नहीं है,दिल्ली तोमरों की भी दिल्ली नहीं है। दिल्ली पूरे देश की दिल्ली है ।  यहां देश के सभी प्रांतों के लोग रहते है। दिल्ली में देश की आत्मा धड़कती है। कोई एक करोड़ सत्तर लाख लोग दिल्ली की जान हैं और आज इन सभी की जान सांसत में है। आजकल तो दिल्ली हांफने के साथ कांपने भी लगी है। दिल्ली में कभी भी भूकंप के झटके महसूस किये जाने लगते हैं।</p>
<p>दिल्ली की गंभीर हालत को देखते हुए सर्दी शुरू होने से पहले ही  दिल्ली में प्रदूषण गंभीर स्तर पर पहुंच गया। गुरुवार शाम पांच बजे दिल्ली में ऐ क्यों आई 402 दर्ज किया गया। पूर्वानुमान के अनुसार प्रदूषण को बेहद खराब स्तर पर बने रहना था। पांच बजे स्थितियां बिगड़ती देखकर कमिशन फॉर एयर क्वॉलिटी एंड मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और दिल्ली एनसीआर में जी आर ऐ पी  के स्टेज-3 को लागू करने का फैसला ले लिया गया। इसके तहत अब दिल्ली-एनसीआर में निजी निर्माण पर रोक होगी।</p>
<p>दिवाली से पहले लोग रंगाई-पुताई, ड्रिलिंग का काम भी नहीं करवा सकेंगे।जी आर ऐ पी  प्रदूषण से निबटने का ऐसा सिस्टम है जिसमें प्रदूषण का लेवल बढ़ने के साथ बंदिशें अपने आप लागू हो जाती हैं।दिल्ली में जब भी बीमारी बढ़ती है सबसे पहले बच्चों का स्कूल जाना ब्नद हो जाता है करीब 1483 वर्ग किलोमीटर में फैली  दिल्ली जनसंख्या के तौर पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर है। दिल्ली के एक तरफ दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां हाँ तो  पूर्व में  पहले से बीमार यमुना नदी  बहती है । दिल्ली पहले भी  गंगा के मैदान से होकर जाने वाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था और आज भी है ।  </p>
<p>दिल्ली के बिना देश बनता ही नहीं है ।  दिल्ली के बिना मुगल भी अधूरे थे,अंग्रेज भी और आज भाजपा और कांग्रेस के लिए दिल्ली जरूरी है । लेकिन एक बीमार दिल्ली का उपचार करने की फुरसत किसी के पास नहीं है ।  दिल्ली सरकार के दो मंत्री जेल में है।  दिल्ली के मुख्यमंत्री को जेल भेजने की तैयारी है ,लेकिन इसका दिल्ली की गंभीर  रूप से खराब हो चुकी आवो-हवा से कोई लेना देना नहीं है। आम आदमी पार्टी की सरकार को जेल में डालने से यदि दिल्ली का स्वास्थ्य  ठीक हो जाता तो इसे भी बर्दास्त कर लिया जाता ,किन्तु ऐसा कुछ हो नहीं रहा।</p>
<p>दिल्ली की बीमारी कोई नई नहीं है ।  दिल्ली सर्दियां शुरू होने से पहले हर साल बीमार होती है ।  दिल्ली का दम घुटने का एक कारण पराली का धुंआं है तो दूसरा कारण सड़कों पर आयी वाहनों की बाढ़ भी है। दिल्ली कब जहरीली गैसों के चैंबर में तब्दील हो जाये,कोई नहीं जानता ।  दिल्ली में कब दिन में अन्धेरा छा जाये ये भी किसी को पता नहीं है ।  यहां दिन में तारे नजर आना आम बात है। गौतमबुद्ध नगर,गुरुग्राम,गाजियाबाद ,झझर ,फरीदाबाद सबके सब प्रदूषित हो गए हैं। दिल्ली और दिल्ली के आसपास मेरे तमाम प्रियजन और परिजन रहते हैं। मुझे उन सबकी चिंता लगी रहती है। सरकार को भी सभी की चिंता होती है लेकिन सरकार सब कुछ अकेले नहीं कर सकती।</p>
<p>जनता को भी कुछ -कुछ करना होता है जो जनता करती नही।  हमारी जनता सनातनी और धार्मिक है ।  वो करवा चौथ हो या दशहरा बिना पटाखे चलाये रह नहीं सकती भले ही फेंफड़े धुंए से काले पड़ जाएँ ,सिकुड़ जाएँ।  प्रतिबंधों का जनता पर कोई असर नहीं होता। आज की दिल्ली कल की दिल्ली से अलग थी ।  मुगलों की दिल्ली में भी इतना दम नहीं घुटता था जितना आज घुट रहा है । अंग्रेजों की दिल्ली में भी दम तो घुटता था लेकिन आज की तरह नही।।  आज की दिल्ली में तो सब कुछ अपना है ।  </p>
<p>आजादी है, संविधान है,सरकार है लेकिन दम फिर भी घुट रहा है। महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ कही जाने वाली दिल्ली आजकल प्रदूषणप्रस्थ बन चुकी है। मुझे कभी-कभी लगता है कि  दिल्ली का लाल किला नेताओं की तरह बोल नहीं पाता अन्यथा प्रदूषण के घबड़ाकर वो भी अन्यंत्र जाने की मांग   कर बैठता। एक जमाने में हमारा ग्वालियर भी एनसीआर का हिस्सा बनाया जाने वाला था ,लेकिन अच्छा हुआ की हमारे निकम्मे नेताओं की वजह से ऐसा नहीं हुआ,अन्यथा आज हमारे शहर का भी दम दिल्ली की तरह ही घुट रहा होता।</p>
<p> दिल्ली की बीमारी कोई नई नहीं है। हमारे पत्रकार साथी  बताते हैं कि दिल्ली की वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) आम तौर पर जनवरी से सितंबर के बीच 101-200  के  स्तर पर रहती  है,  यह तीन महीनों में बहुत खराब (301-400), गंभीर (401-500) या यहां तक कि खतरनाक (500+) के स्तर में भी हो जाती है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच, तो दिल्ली मरते-मरते बचती है। दिल्ली को अस्थमा है, दिल्ली को नजला है,दिल्ली को ब्रोन्काइट्स है।</p>
<p>दिल्ली के फेंफड़े दागदार है। दिल्ली का दिल फिर भी जैसे -तैसे  धड़क रहा है। कल्पना कीजिये यदि दिल्ली को यूक्रेन और फिलिस्तीन की तरह यदि कभी बारूद का समान करना पड़े तो क्या हाल होगा दिल्ली का। सो प्लीज दिल्ली को बचाइए ,सरकारें तो आती-जातीं रहेंगी किन्तु अगर दिल्ली ही न रही तो फिर क्या होगा ? दूसरे शहरों का क्या होगा ?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136680/who-will-save-the-suffocating-delhi</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136680/who-will-save-the-suffocating-delhi</guid>
                <pubDate>Sun, 05 Nov 2023 10:44:47 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-11/dilli1.jpg"                         length="7413"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अखिलेश व  नीतीश की कांग्रेस से नाराजगी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में बड़ी जोर-शोर के साथ जिस विपक्षी गठबंधन की नींव पड़ी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पांच राज्यों में  चुनाव के बीच वह दरकती दिख रही है। पहले समाजवादी पार्टी  के प्रमुख अखिलेश यादव ने विपक्षी इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल  इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका को लेकर तल्ख तेवर दिखाए। अब इस एकजुटता की कवायद के कर्णधार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नाराज हैं। दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर पटना की मीटिंग से विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया  गठबंधन का गठन हुआ था।</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136628/akhilesh-and-nitishs-displeasure-with-congress"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में बड़ी जोर-शोर के साथ जिस विपक्षी गठबंधन की नींव पड़ी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पांच राज्यों में  चुनाव के बीच वह दरकती दिख रही है। पहले समाजवादी पार्टी  के प्रमुख अखिलेश यादव ने विपक्षी इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल  इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका को लेकर तल्ख तेवर दिखाए। अब इस एकजुटता की कवायद के कर्णधार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नाराज हैं। दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर पटना की मीटिंग से विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया  गठबंधन का गठन हुआ था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार ने जहां एक ओर कांग्रेस पर सवाल उठाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं खुद को सबको साथ लेकर चलने वाला बताया। नीतीश ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सबको  एकजुट करते हैं। सभी को साथ लेकर चलते हैं। उन्होंने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम लोग सोशलिस्ट हैं। सीपीआई से भी हमारा रिश्ता पुराना है। कम्युनिस्ट सोशलिस्ट को एक होकर आगे चलना है।  दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार भाजपा  से नाता तोड़ने के बाद से विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में जुट गए थे। उन्होंने अलग अलग राज्यों में  जाकर विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात की थी। नीतीश 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा  के खिलाफ विपक्षी दलों को साथ लाने में  सफल भी हुए थे। इसके बाद नीतीश ने जून में पटना में विपक्षी दलों की बैठक बुलाई थी। इस बैठक में कांग्रेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टीएमसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिवसेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आम  आदमी पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजवादी पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डीएमके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेफ्ट समेत 15 दल के नेता शामिल हुए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बैठक के बाद बेंगलुरु में विपक्षी दल के नेता मिले थे। इस बैठक में 20 से ज्यादा दलों के नेता शामिल हुए थे। लेकिन बैठक का नेतृत्व  कांग्रेस ने किया था। यहां तक कि राहुल गांधी ने अचानक बिना चर्चा के गठबंधन का नाम इंडिया  तय कर दिया था। इस पर ममता बनर्जी ने  भी समर्थन दिया था। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार इस नाम के पक्ष में नहीं थे।  इतना ही नहीं नीतीश कुमार बैठक के बाद आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता से पहले ही पटना लौट आए थे। इसके बाद नीतीश कुमार की  नाराजगी की खबरें सामने आई थीं। कहा गया था कि जिस तरह से विपक्ष की बैठक को कांग्रेस ने हाईजैक किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे नीतीश नाराज हैं।  लांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंबई में आयोजित तीसरी बैठक में नीतीश कुमार हिस्सा लेने पहुंचे थे। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंगलुरु और मुंबई में आयोजित हुईं बैठकों के बाद इंडिया  गठबंधन तो बन गया। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों के बंटवारे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयोजक कौन होगा</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा  से मुकाबले के लिए गठबंधन की रणनीति क्या होगी ये तय नहीं हो सका था ।  हाल ही में सीटों के बंटवारे को लेकर जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि 5 राज्यों में चुनाव के बाद इस पर बात होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">गौरतलब है कि विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए पटना से कोलकाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली से चेन्नई एक कर देने वाले नीतीश  कुमार ने कहा है कि आजकल गठबंधन का कोई काम नहीं हो रहा। कांग्रेस पांच राज्यों के चुनाव में व्यस्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने ये भी कहा कि हम सबको एकजुट कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ लेकर चलते हैं। हम लोग सोशलिस्ट हैं। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट को एक होकर आगे  चलना है। अब नीतीश के इस बयान के मीन-मेख निकाले जाने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी  के नेतृ्त्व वाले केंद्र की सत्ता पर  काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को हराने के लिए एक सीट पर एक उम्मीदवार के फॉर्मूले की वकालत करने वाले नीतीश आखिर अचानक इतने तल्ख क्यों हो गए</span>?</p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस बयान के एक दिन पहले ही नीतीश कुमार से जब इंडिया गठबंधन में अनबन को लेकर सवाल  हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्होंने हाथ जोड़ लिए थे। ऐसे समय में जब  उत्तरप्रदेश  में अखिलेश यादव ने 65 सीटों पर चुनाव लड़ने का एकतरफा ऐलान कर अपनी  लकीर खींच दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार के इस बयान के मायने क्या हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन बाबू का ये बयान कहीं हिंदी पट्टी के दो बड़े राज्यों में इंडिया  गठबंधन का रास्ता ब्लॉक हो जाने का संकेत तो नहीं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">नेशनल कॉन्फ्रेंस  के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं है।  हम फिर बैठेंगे और मिलकर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सवाल विपक्षी गठबंधन के भविष्य को लेकर भी उठ रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब सवाल ये भी उठ रहे हैं कि जब इंडिया के घटक दल पहले से ही महागठबंधन में साथ हैं तो फिर समस्या कहां है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा तो ये भी जा रहा  है कि जिस तरह कांग्रेस ने राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश समेत सभी चुनावी राज्यों में और सपा ने उत्तर प्रदेश  में अपनी लकीर खींच दी है। नीतीश कुमार  की रणनीति भी कुछ वैसी ही हो सकती है। दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां बिहार में 14 सीटों पर दावा कर रही हैं। 40 सीटों वाले सूबे  में अगर कांग्रेस-लेफ्ट को उनकी मांग के मुताबिक 14 सीटें दे दी जाएं तो फिर जेडीयू और आरजेडी के लिए 26 सीटें ही बचती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जेडीयू के 16 उम्मीदवार 2019 में जीते थे जबकि आरजेडी 19 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। जेडीयू पिछले चुनाव में जीती सीटों से कम  सीटों पर तैयार नहीं होगी। अब दूसरा पहलू ये भी है कि कांग्रेस 2019 में केवल एक सीट जीत सकी थी और अब दावा 10 पर कर रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और पार्टी महज 19 सीटें ही जीत सकी थी। तब  महागठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत के जादुई आंकड़े से मामूली अंतर से पीछे रह गया था और इसके लिए कांग्रेस के प्रदर्शन को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा था। कहा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव और 2020 के बिहार चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते  हुए नीतीश कुमार कांग्रेस को अधिक सीटें देने के पक्ष में नहीं हैं। नीतीश कुमार के ताजा बयान को कांग्रेस के लिए सख्त संदेश की तरह देखा जा रहा है कि बिहार में उसे उनकी ही माननी पड़ेगी। पहले  अखिलेश और अब नीतीश के बयान को पांच राज्यों के नतीजों के बाद बारगेन पावर बढ़ने की उम्मीद लगाए कांग्रेस के लिए झटके की तरह  देखा जा रहा है। अखिलेश ने तो दो टूक कह दिया है कि राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीत भी जाते हैं तो किसी मुगालते में ना रहें। यहां दाल नहीं गलने वाली।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश  और बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों ही राज्य लोकसभा चुनाव के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। लोकसभा के 543 में से 120 सदस्य इन्हीं दो राज्यों से  चुनकर आते हैं। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश -बिहार के सदस्यों की तादाद कुल सदस्य संख्या के करीब 22 फीसदी पहुंचती है। ऐसे में  सवाल ये भी है कि अपनी खोई जगह वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस इन दो राज्यों में सहयोगी दलों की शर्तें मानेगी या यहां  इंडिया गठबंधन का रास्ता ब्लॉक हो जाएगा</span>?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136628/akhilesh-and-nitishs-displeasure-with-congress</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136628/akhilesh-and-nitishs-displeasure-with-congress</guid>
                <pubDate>Sat, 04 Nov 2023 11:16:06 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-11/hindi-divas16.jpg"                         length="173958"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिटी आफ म्यूजिक का दर्जा किस काम का ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>ग्वालियर का हर निवासी यूनेस्को का कृतज्ञ है कि उसने ' संगीत के तीर्थ ' ग्वालियर को ' सिटी आफ म्यूजिक ' का दर्जा देकर सम्मानित किया,लेकिन मेरे मन में इस ऐलान से कोई हलचल नहीं है। मुझे पता है कि  ग्वालियर सदियों से संगीत  का ही शहर था ,तीर्थ था।,है और कल का पता नहीं रहेगा या नहीं ? बचपन से सुनते आये हैं कि  यहां गधा भी सुर में रेंकता है। नवजात शिशु के रुदन में भी संगीत होता है। दुर्भाग्य ये की ग्वालियर को ये बताने में और  यूनेस्को को ये जानने और मानने में पूरे 78</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136627/what-is-the-use-of-city-of-music-status"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/kila.jpg" alt=""></a><br /><p>ग्वालियर का हर निवासी यूनेस्को का कृतज्ञ है कि उसने ' संगीत के तीर्थ ' ग्वालियर को ' सिटी आफ म्यूजिक ' का दर्जा देकर सम्मानित किया,लेकिन मेरे मन में इस ऐलान से कोई हलचल नहीं है। मुझे पता है कि  ग्वालियर सदियों से संगीत  का ही शहर था ,तीर्थ था।,है और कल का पता नहीं रहेगा या नहीं ? बचपन से सुनते आये हैं कि  यहां गधा भी सुर में रेंकता है। नवजात शिशु के रुदन में भी संगीत होता है। दुर्भाग्य ये की ग्वालियर को ये बताने में और  यूनेस्को को ये जानने और मानने में पूरे 78  साल लग गए कि भारत का एक शहर ग्वालियर संगीत का नगर है।</p>
<p>ग्वालियर के लोग विधानसभा चुनावों के शोर-शराबे की वजह से शहर को मिले इस सम्मान का जश्न नहीं मना पाया। दिल्ली में बैठे हमारे कुछ कांग्रेसी मित्र इस सम्मान को प्रायोजित मानते हैं।  कहते हैं कि ये हमारे महाराजाधिराज  ज्योतिरादित्य सिंधिया और युगावतार प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी की वजह से मुमकिन हुआ।मोदी जी के हाल ही में ग्वालियर आने के बाद यूनेस्को ने ये ऐलान जो किया था।  मुमकिन है कि  उनकी धारणा और सूचनाएँ सही हों ,लेकिन मेरा मानना है कि  मात्र यूनेस्को कि दर्जा देने से ग्वालियर  संगीत का नगर नहीं बन जाता।  </p>
<p>ग्वालियर को संगीत का नगर बनाने में राजाओं ,महाराजाओं कि साथ ही कलाकारों और प्रजा  का भी उतना ही योगदान है ,जितना की होना चाहिए। यदि ऐसा न होता तो पंद्रहवीं सदी से शुरू हुई ग्वालियर  की संगीत यात्रा आज समाप्त न हो जाती ।  ग्वालियर की महान संगीत यात्रा तब भी जारी थी और आज भी जारी है। ग्वालियर की संगीत परम्परा कि बारे में मै आपको कोई  इतिहास पढ़ने वाला नहीं हूँ,क्योंकि ये एक गंभीर और गरिष्ठ विषय है। मै तो आपको अपने ग्वालियरी होने कि तजुर्बे की बातें बताना चाहता हूँ ।  </p>
<p>मै उन लोगों में से हूँ जो  ग्वालियर संगीत घराने की उस अंतिम पीढ़ी से मिले हैं  जिससे ग्वालियर का मान कल तक था और आज भी है,भले ही ऐसे लोगों ने ग्वालियर से अपना नेह -नाता तोड़ दिया है। ग्वालियर घराने   के मूर्धन्य गायक पंडित कृष्णराव पंडित मेरे पड़ौसी थे। मैंने उन्हें गाते हुए सुना है ।  उनसे बातें की हैं और महसूस किया है की बीसवीं सदी में ग्वालियर का जो संगीत था उसकी सूरत पंद्रहवी-सोलहवीं सदी में कैसी रही होगी। संगीत  सम्राट का सम्मान राजा  मान सिंह के बजाय तानसेन  को कैसे मिला होगा ?</p>
<p>ग्वालियर का संगीत  भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनेक घरानों में विशिष्ट अपनी तानों,स्वर की शुद्धता और आलाप की वजह से विशिष्ट रहा है ।जिन लोगों ने पंडित भीमसेन जोशी को गाते हुए सुना होगा वे इस बात को आसानी से समझ सकते है। पंडित जी केवल कुछ समय केलिए ग्वालियर  संगीत की इस विशेषता को हासिल करने पुणे से भागकर ग्वालियर आये थे। पंडित भीमसेन जोशी ग्वालियर के इस उपकार को ताउम्र नहीं भूले।</p>
<p>लेकिन ग्वालियर संगीत घराने की बागडोर जिन हाथों में थी वे एक के बाद एक ग्वालियर को भूल गए। वे अब ग्वालियर के अतिथि हैं। उन्हें ग्वालियर की इसी संगीत परम्परा के कारण देश और दुनिया में सम्मान,यश-कीर्ति और लक्ष्मी मिली है।<br />ग्वालियर की सुदीर्घ संगीत परम्परा आज भी जनता की थाती नहीं बन पायी है। ग्वालियर का संगीत कल भी राज्याश्रित था और आज भी है। कल भी संगीत सम्राट तानसेन को राजा मानसिंह से लेकर मुगल बादशाह अकबर का आश्रय मिला हुआ था और आज भी तानसेन समारोह को सरकार ही आयोजित करती है।</p>
<p>ग्वालियर के स्थापित किराना घराने के जीवित कलाकार इस समरोह   में आने के लिए भी सरकार से पारश्रमिक लेते हैं। सरकार यदि मदद न करे तो ग्वालियर का संगीत दम तोड़ दे। ग्वालियर के संगीत  को जीवित रखने की छोटी-छोटी कोशिशें संगीत के विश्व-विद्यालय और महाविद्यालयों में ही नहीं महरानीलक्ष्मी बाई  का अंतिम संस्कार करने वाली गंगादास महाराज की बड़ी शाला में भी नियमित संगीत सभाओं के आयोजन के जरिये होती है। लेकिन ये कब तक जारी रह पाएगी ?    <br />ग्वालियर का संगीत घराना तानसेन से चलकर उमेश कम्पू वाले तक आ पहुंचा है।</p>
<p>आज ग्वालियर घराना 07  हिस्सों में बाँट चुका है। आधी सदी पहले जब मै ग्वालियर आया था तब ग्वालियर घराने की विशेषताओं के बारे में रत्ती भर नहीं जानता था। मुझे पंडित कृष्णराव पंडित ने बताया कि ग्वालियर  घराने में कोई सात-आठ बातों पर ध्यान दिया गया । जैसे   ध्रुपद अंग के ख्याल ,  जोरदार तथा खुली आवाज , बहलावा से विस्तार ,  गमक का प्रयोग ,  सीधी तथा सपाट तानों का विशेष प्रयोग ,  लयकारी और कभी – कभी लड़न्त ,  ठुमरी के स्थान पर तराना गायन और इन सभी की  तैयारी पर विशेष बल दिया जाता है। पंडित जी अब नहीं है।  उनकी पौत्री मीता पंडित अब इस घराने की ध्वज वाहक है।  वादन में उस्ताद अमजद अली साहब की दूसरी पीढ़ी अमान और अयान खान सरोद बजा रहे हैं। लेकिन उनका रिश्ता ग्वालियर से अब नाम का है।</p>
<p>ग्वालियर को संगीत नगरी की पहचान  देने के लिए ग्वालियर नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजना ने करोड़ों रूपये खर्च करके संगीत सम्राट तानसेन की भौंडी प्रतिमाएं लगा दीं है।  चौराहों को वाद्य यंत्रों की अनुकृतियों से सजा दिया है। सरकार ने संगीत का विश्व विद्यालय खोल दिया है लेकिन इस सबसे ग्वालियर का संगीत नगरी होना प्रमाणित नहीं होता। ग्वालियर में ध्रुपद  कला केंद्र भी है। कला गुरु भी है।  लेकिन गुरु-शिष्य परम्परा दम तोड़ रही है क्योंकि संगीत साधकों को संगीत रोजी और रोटी देने की गारंटी आजतक नहीं बन पाया है।</p>
<p>ग्वालियर के निर्जीव दुर्ग,ऐतिहासिक इमारतें संगीत की परम्परा के यशस्वी  होने की गवाही तो दे सकतीं हैं किन्तु वास्तव में ग्वालियर का संगीत तभी चर स्थायी हो सकता है जब सरकार के साथ-साथ संगीत के उस्ताद वापस ग्वालियर लौटें । संगीत की सेवा करें ।  वे संगीत से बहुत मेवा कमा   चुके। अब उन्हें ग्वालियर  के संगीत के प्रति अपनी कृतग्यता भी ज्ञापित करना चाहिए। यूनेस्को द्वारा दिया गया सम्मान तभी ग्वालियर को संगीत नगरी होने के गौरव का अहसास करा सकता है ,अन्यथा नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136627/what-is-the-use-of-city-of-music-status</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136627/what-is-the-use-of-city-of-music-status</guid>
                <pubDate>Sat, 04 Nov 2023 11:14:22 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-11/kila.jpg"                         length="20645"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>घरेलू राजनीति का कड़वा चौथ</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश भर में महिलाएं आज अपने जीवनसाथी की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रख रहीं है लेकिन घरेलू राजनीति में आज का दिन कड़वा चौथ का दिन साबित हो रहा है।  लोकतंत्र के दीर्घायु होने के लिए कोई राजनीतिक दल व्रत रखने के लिए तैयार नहीं है।  राजनीति में लोकतंत्र के प्रति व्रती कोई नहीं बनना चाहता। लोकतांत्र कल मरता हो तो आज मर जाए।<br />बात महाराष्ट्र से शुरू करता हूँ ।  </p>
<p>हर मामले में महँ माने जाने वाले महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा आरक्ष्ण को लेकर आग लगी हुई है ।  दल विशेष के जनप्रतिनिधियों के घर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136491/bitter-chauth-of-domestic-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/marathaa.jpg" alt=""></a><br /><p>देश भर में महिलाएं आज अपने जीवनसाथी की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रख रहीं है लेकिन घरेलू राजनीति में आज का दिन कड़वा चौथ का दिन साबित हो रहा है।  लोकतंत्र के दीर्घायु होने के लिए कोई राजनीतिक दल व्रत रखने के लिए तैयार नहीं है।  राजनीति में लोकतंत्र के प्रति व्रती कोई नहीं बनना चाहता। लोकतांत्र कल मरता हो तो आज मर जाए।<br />बात महाराष्ट्र से शुरू करता हूँ ।  </p>
<p>हर मामले में महँ माने जाने वाले महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा आरक्ष्ण को लेकर आग लगी हुई है ।  दल विशेष के जनप्रतिनिधियों के घर जलाये जा रहे है ।  सार्वजनिक समपत्ति को नुक्सान पहुंचाया जा रहा है और सरकार मूकदर्शक बनकर खड़ी हुई है।  किसी की समझ में नहीं आ रहा की इस आंदोलन के अचानक उग्र होने के पीछे कौन है और सरकार का इस आंदोलन को लेकर रवैया क्या है ? मराठा आरक्षण आंदोलन से आखिर किसका फायदा और किसका नुक्सान होनी वाला है।</p>
<p>महाराष्ट्र अनेक समाज सुधारकों, बुद्धिजीवियों,योद्धाओं के लिए जाना जाता है ।  इतिहास में महाराज शिवाजी, से लेकर डॉ भीमराव आंबेडकर, ज्योति बा फुले तक यहीं से आते हैं ,लेकिन यहीं अब आरक्षण को लेकर आग लगी है और आग तब लगी है जब महाराष्ट्र में डबल इंजन की सरकार है। जाहिर है या तो सरकार नाकाम साबित  हो रही है या फिर सरकार का इस आंदोलन को परोक्ष समर्थन है ताकि सरकार के आंतरिक गठजोड़ की खामियों और प्रशासनिक नाकामियों पर पर्दा डाला जा सके।</p>
<p>महाराष्ट्र की राजनीति आजकल तोड़फोड़ की राजनीति है। सत्तारूढ़ भाजपा ने सत्ता में बने रहने के लिए पहले शिवसेना को तोड़ा और बाद में एनसीपी को  और जो ईंट-रोड़े मिले उसने अपना सरकारी घर बना लिया। लेकिन ये ईंट-रोड़े कब कमजोर साबित हो जायेंगे ,ये महाराष्ट्र में कोई नहीं जानता। भाजपा को येन-केन महाराष्ट्र में अपनी सरकार चाहिए। महाराष्ट्र में पहले जिस शिवसेना केमुख्यमंत्री के नेतृत्व में महाराष्ट्र अगाडी गठबंधन की सरकार चल रही थी वो भी ईंट और रोड़े की ही सरकार थी।  </p>
<p>उसमें भी कांग्रेस और कांग्रेस से अलग  एनसीपी के अलावा भाजपा की अनन्य सहयोगी रही शिवसेना थी । मराठा आरक्षण आंदोलन  तब भी था लेकिन आज की तरह उग्र नहीं था। आज इस आंदोलन को कोई तो है जो परदे के पीछे से ताकत दे रहा है । कोशिश कर रहा है की महाराष्ट्र की राजनीति में बवाल हो।</p>
<p>महाराष्ट्र में मराठा अगड़े हैं या पिछड़े ये सब जानते है।  उनकी माली दशा कैसी है ये भी किसी से छिपी नहीं है ।  सत्ता में मराठाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग भी जाने-पहचाने हैं ,इन सबके रहते आरक्षण का मुद्दा अब तक ज़िंदा क्यों है ,इसकी समीक्षा की जाना चाहिए। सवाल ये है कि अपने आपको मराठा कहने वाले महाराष्ट्र के तमाम नेता इस मुद्दे पर अपना रुख साफ़ क्यों नहीं करते ,क्यों अपने समाज को बिखरते देख रहे हैं ?।</p>
<p>महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार में भी मराठा है ,उसके पहले की सरकार में भी में  थे और जब सूबे में अकेले कांग्रेस की सरकार होती थी तब भी मराठा सत्ता में सर्वोपरि थे ,तब मराठों को आरक्षण देने   की मांग   इतनी बलवती क्यों नहीं थी? अब क्यों है ? मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि मराठा आरक्षण आंदोलन अवसरवादी आंदोलन है ।  देश के दूसरे हिस्सों में भी इसी तरह के आंदोलन होते रहे है। कभी जाटों के,कभी गुर्जरों के।</p>
<p>सभी राज्यों में तत्कालीन सरकारों ने आरक्षण के इस मुद्दे को केंद्र के पाले में डाल रखा है ।  आरक्षण की तमाम मांगों के संदर्भ में सरकारें और राजनितिक दल सुप्रीम कोर्ट में मामलों को लटकाये बैठे हैं । निर्णय लेने की हिम्मत किसी में नहीं है। न न्यायपालिका में और न संसद में इस मुद्दे को लेकर चाहे राजनीतिक दल हों या आरएसएस जैसे संगठन हमेशा रंग बदलते रहते हैं। कभी आरक्षण का समर्थन करते हैं तो कभी विरोध।</p>
<p>जातीय समूह इस हकीकत को समझे बिना राजनीति के हाथों का खिलौना   बने हुए हैं महाराष्ट्र में भी और दूसरे राज्यों में भी। आरक्षण की मांग कब पिटारी में बंद हो जाती है और कब बाहर आ जाती है खुद मांग करने वालों को पता नहीं चलता।<br />महाराष्ट्र पर वापस लौटते हैं।  मराठा आरक्षण आंदोलन की उग्रता के पीछे कभी-कभी मुझे जातीय जनगणना का ताजातरीन मुद्दा भी दिखाई देता है ।  बिहार  सरकार ने ये मुद्दा पैदा किया है और कांग्रेस इस मुद्दे को ले उडी है ।  </p>
<p>कांग्रेस ने घोषणा कर दी है कि देश में जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं या आगे बनेंगीं इन राज्यों में जातीय जनगणना कराई जाएगी ।  जातीय जनगणना के मुद्दे पर भाजपा भ्रमित  है ।  भाजपा इस मुद्दे को समाज केलिए विभाजनकारी मानती है लेकिन आरक्षण के मुद्दे पर फिर गुलाटी मार जाती है। इस मुद्दे पर भाजपा महाराष्ट्र में भी उलझ है और महाराष्ट्र के बाहर पूरे राष्ट्र में भी ।  </p>
<p>जातीय जनगणना के मुद्दे के सामने राम मंदिर में रामलला कीप्राण-प्रतिष्ठा का महकदार धुंआ भी असर करने वाला नहीं है।भाजपा के पास राम नाम लेने के अलावा और कोई मुद्दा है भी नही।  भाजपा के तरकस के तमाम तीर निकल चुके हैं यानी इस्तेमाल किये जा चुके हैं। मुमकिन है की आरएसएस और भाजपा की प्रयोगशाला से मराठा आरक्षण और जातीय जनगणना जैसे ज्वलंत मुद्दों की काट के लिए कोई नया मुददा बनाया जा रहा हो !</p>
<p>लेकिन फिलहाल मुद्दा महाराष्ट्र को धधकती आग से बचने का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यदि ये आग और फैली तो तय मानिये की देश का एक समृद्ध राज्य भी बर्बाद हो जाएग ।  मणिपुर जैसा छोटा राज्य हम पहले ही बर्बाद कर चुके हैं। आइये राष्ट्र को बचाएं,महाराष्ट्र को बचाएं ,आग को फैलने से रोकें ।  आग बुझाएं।  मराठा आंदोलन के चक्कर में मै आज मध्यप्रदेश के लावा आज जन्में दूसरे प्रदेशों को उनकी स्थापना दिवस कि बधाई देना भी भूल गया था। आज जन्मा मध्यप्रदेश तमाम अलाओं  -बलाओं से दूर रहे। यही कामना है</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136491/bitter-chauth-of-domestic-politics</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136491/bitter-chauth-of-domestic-politics</guid>
                <pubDate>Wed, 01 Nov 2023 14:40:52 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-11/marathaa.jpg"                         length="27502"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली से दिमनी तक मुन्ना ही मुन्ना  </title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मध्यप्रदेश </strong>की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती और गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा के बाद आज आपको  देश के एक ऐसे नाकाम कृषि मंत्री का किस्सा बताता हूँ जो मोदी सरकार की नाक नीची कराने के लिए हमेशा याद किया जायेगा ।  केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रधानमंत्री ने इसी नाकामी की सजा देते हुए मप्र विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चम्ब्ल वापस भेज दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जहाँ नामांकन पत्र भरने के बाद चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं जाते वहीं केंद्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के लिए उनका</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136480/munna-hi-munna-from-delhi-to-dimni"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/muna3.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मध्यप्रदेश </strong>की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती और गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा के बाद आज आपको  देश के एक ऐसे नाकाम कृषि मंत्री का किस्सा बताता हूँ जो मोदी सरकार की नाक नीची कराने के लिए हमेशा याद किया जायेगा ।  केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रधानमंत्री ने इसी नाकामी की सजा देते हुए मप्र विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चम्ब्ल वापस भेज दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जहाँ नामांकन पत्र भरने के बाद चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं जाते वहीं केंद्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के लिए उनका विधानसभा क्षेत्र रात-दिन चिंता का विषय  बना रहता है।</p>
<p>राजनीति में ठीक 40  साल पहले ग्वालियर नगर निगम के पार्षद का चुनाव लड़कर कदम रखने वाले नरेंद्र सिंह तोमर को चालीस साल बाद एक बार फिर विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतारा गया है। वे मुरैना जिले की दिमनी सीट से भाजपा के प्रत्याशी है ।  मजे की बात ये है कि वे भाजपा चुनाव अभियान समिति के प्रमुख भी हैं और पार्टी के स्टार प्रचारक भी।  मोदी जी ने अपनी इस तलवार से सुई का काम लेने का प्रयोग किया है क्योंकि उनकी ये तलवार  दो साल पहले देश में हुए किसान आंदोलन के समय मौथरी साबित हुई थी। मोदी सरकार को जितना नीचा कभी संसद के दोनों सदनों में नहीं देखना पड़ा था, उससे ज्यादा नीचा इस किसान आंदोलन को समाप्त कराने में असफल रहे कृषि मंत्री नरेंद्र</p>
<p>सिंह तोमर की वजह से तीन किसान विधेयक वापस लेने की वजह से देखना पड़ा था। मध्य्प्रदेश विधानसभा के चुनावी रण में उतारे गए तीन केंद्रीय मंत्रियों और सात सांसदों में से नरेंद्र सिंह तोमर अकेले ऐसे हैं जिनके लिए अपना विधानसभा क्षेत्र छोड़ना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है ।  मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह विधानसभा क्षेत्र अपने बेटों और कार्यकर्ताओं के भरोसे छोड़ना न नरेंद्र सिंह तोमर के लिए आसान है और न प्रह्लाद पटेल के लिये । फग्गन सिंह कुलस्ते के लिए तो बिलकुल नहीं। पार्टी के राष्ट्रिय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की भी यही दशा है ।</p>
<p> विजयवर्गीय इंदौर शहर से चुनाव लड़ रहे हैं। वे भी कहने को पार्टी की तलवार हैं लेकिन उनका इस्तेमाल सुई की ही तरह किया जा रहा है। विजयवर्गीय को उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय की जगह चुनाव लड़ने के लिए विवश किया गया है<br />भाजपा के राज में मध्य्प्रदेश ऐसा अजब प्रदेश बन गया है जहां बेटे अपने बाप के लिए जनता से वोटों की भिक्षा मांग रहे हैं। जबकि होना उलटा था ।  इन सभी को अपने बेटों के लिए जनता से वोट मांगना थे,लेकिन मोदी जी हैं तो सब कुछ मुमकिन है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और उनके हनुमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अकेले नरेंद्र  सिंह तोमर ,प्रह्लाद पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते की पीठ पर बस्ते नहीं लादे बल्कि 73  साल की श्रीमती माया सिंह और 81  साल के नागेंद्र सिंह और जयंत मलैया को भी भजन करने की उम्र में चुनावी समर  में उतार दिय। ये सभी उम्र दराज नेता अपने बेटों के सहारे हैं।</p>
<p>चम्ब्ल के औरेठी गांव में जन्मे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का नसीब हमेशा से अच्छा रहा ।  वे 1983  में पार्षद का चुनाव लड़े और जीते। उन्हें नसीब से भाजुमो के अध्यक्ष पद से लेकर पार्टी की मप्र इकाई के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी मिली ।  वे 1998  में विधायक बने और 2003  में प्रदेश में भाजपा की सरकार  बनते ही मंत्री भी बने ।  उन्हें 2009  में निर्विरोध राज्य सभा भेजा गया। वे 2009  में ही मुरैना से लोकसभा के लिए चुने गये ।  </p>
<p>2014  में वे ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव लड़कर जीते । 2019  में उन्हें दोबारा मुरैना से लोकसभा चुनाव लड़ाया और जिताया गया । तोमर को पिछले दस साल में केंद्र में एक छोड़ दस विभागों में काम करने का मौक़ा मिला लेकिन इतने होनहार और काबिल  नेता को मोदी जी ने   अचानक विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली सी दिमनी भेज दिया । कारण मै आपको बता ही चुका हूँ। मोदी जी अपने अपमान का हिसाब पूरा कर रहे हैं।</p>
<p>नरेंद्र सिंह तोमर को उनके प्रशंसक मुन्ना के नाम से पुकारते है।  जैसा मैंने पूर्व के लेखों में बताया था की ग्वालियर चंबल की भाजपाई  राजनीति में अन्ना,मुन्ना और गन्ना तीन प्रमुख युवा तुर्क हैं ।  गन्ना यानि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा  को पार्टी ने विधानसभा का टिकिट नहीं दिया।  </p>
<p>गन्ना यानि मप्र के गृहमंत्री डॉ नरोत्तम  मिश्रा  दत्या से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। और मुन्ना को भी दिमनी में फंसा दिया है। भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है की मुन्ना भैया इस बार भी इस अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण होकर बाहर आएंगे लेकिन मुन्ना भैया के आसपास के लोगों को मुन्ना भैया के भविष्य को लेकर चिंता  है। हालांकि मुन्ना भैया के दोनों होनहार बेटे सपरिवार दिमनी में मोर्चा सम्हाले हुए हैं। उन्हें हाथ के साथ हाथी ने भी घेर रखा है।</p>
<p>मुन्ना के समथकों का मानना है कि यदि मुन्ना भैया जीते और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो वे प्रदेश के मुख्यमनत्री होंगे,और न जीते तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बनाये जायेंगे।  मुमकिन है कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें तीसरी बार मुरैना से ही लोकसभा का चुनाव लड़ने को कह दिया जाये।  आखिर मुन्ना संघ परिवार का आर्शीवाद प्राप्त नेता जो हैं। कहने का मतलब मुन्ना अभी खाली बैठने वाले नहीं है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136480/munna-hi-munna-from-delhi-to-dimni</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136480/munna-hi-munna-from-delhi-to-dimni</guid>
                <pubDate>Tue, 31 Oct 2023 17:30:44 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/muna3.jpg"                         length="64905"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वोटों की फसल पर किसका हक, कौन कटेगा फसल ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>भारतीय किसान </strong>ही नहीं बल्कि भारतीय खिलाड़ी भी अभिनंदन के पात्र हैं। ये दोनों देश का अभिमान बढ़ाने के लिए लगातार काम करते है।  क्रिकेट के विश्व कप में भारतीय खिलाड़ी भारतीय विपक्ष की तरह लगातार विजय पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। आज का दिन भारतीय क्रिकेटरों को बधाई देने का दिन है। लेकिन क्रिकेटरों की उपलब्धि का आनंद देश ले नहीं पा रहा,क्योंकि जब वे जीत पर जीत दर्ज करा हैं तभी देश के पांच राज्यों में वोटों की फसल काटने का मौसम आ गया है। नेताओं में इस लहलहाती फसल को काटने की होड़ लगी है लेकिन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136385/whose-right-will-be-reaped-on-the-crop-of-votes"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/whatsapp-image-2023-10-30-at-12.01.43-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>भारतीय किसान </strong>ही नहीं बल्कि भारतीय खिलाड़ी भी अभिनंदन के पात्र हैं। ये दोनों देश का अभिमान बढ़ाने के लिए लगातार काम करते है।  क्रिकेट के विश्व कप में भारतीय खिलाड़ी भारतीय विपक्ष की तरह लगातार विजय पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। आज का दिन भारतीय क्रिकेटरों को बधाई देने का दिन है। लेकिन क्रिकेटरों की उपलब्धि का आनंद देश ले नहीं पा रहा,क्योंकि जब वे जीत पर जीत दर्ज करा हैं तभी देश के पांच राज्यों में वोटों की फसल काटने का मौसम आ गया है। नेताओं में इस लहलहाती फसल को काटने की होड़ लगी है लेकिन खेतों में उतरने का साहस केवल कांग्रेस के राहुल गांधी ही दिखा पाए हैं।</p>
<p>देश के जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं उनमें  से केवल एक मध्यप्रदेश में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार है। ये सरकार भी जनादेश की सरकार नहीं है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है ।  तेलंगाना में कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकार नहीं है और मिजोरम में भाजपा के मित्रों की  जो सरकार है उसके मुख्यमंत्री माननीय प्रधानमंत्री जी के साथ मंच साझा नहीं करना चाहते।</p>
<p>लेकिन वोटों की फसल सभी पांच राज्यों में लहलहा रही है। इस फसल को काटने के लिए नेताओं के हाथों में आश्वासनों के हासिये हैं ,दरातियाँ  हैं। लेकिन खेतों में कूदने का साहस नहीं है ।  सब खेत की मेंड़ों पर खड़े-खड़े फसल को हथियाना चाहते हैं। अपने दो दिवसीय दौरे के तहत छत्तीसगढ़ पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रविवार को रायपुर के कटिया गांव का दौरा किय।  राहुल गांधी ने यहां के किसानों के साथ मिलकर धान की कटाई की और उनसे बातचीत भी की।</p>
<p>वोटों की फसल काटने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी समय से पहले छत्तीसगढ़ जा चुके हैं। लेकिन अब जब उनकी जरूरत छत्तीसगढ़ भाजपा को है तब वे गुजरात में हैं। मोदी जी ने छग समेत दूसरे सभी राज्यों में फसल काटने की जिमेवारी अब अपनी टीम को सौंप दी है।</p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य ये है कि इन नेताओं को राहुल गांधी की तरह खेतों में उतरना और हंसिया चलना नहीं आता। पिछले दस साल में सरकारी पार्टी के नेता जमीन से कट कर हवा-हवाई हो चुके है। वे पगड़ियां बंधवाते हैं लेकिन खुद बाँध नहीं पाते ।  वे किसानों,मजूरों के मन की  बात सुनने के बजाय अपने मन की बात सुनाते हैं वो भी खेतों पर जाए बिना। वे जरूरत पड़ने पर खेतों को ,किसानों को ,मजूरों को  अपने पास बुलाने  का माद्दा रखते हैं।</p>
<p>किसान जब दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे तब उनसे बात करने के बजाय  सरकार ने किसानों को कच्छ के तम्बुओं में बुला लिया था। सफाई कर्मियों से बात करने के लिए कोई गटर तक नहीं गया बल्कि सफाई कर्मी  ही नेताओं के घर बुला लिए गए। राजनीतिक दल जब भी सत्ता में आते हैं,अगले मौसम के लिए वोटों की फसलें बोते हैं ,लेकिन हर बार फसल मन माफिक नहीं आती।  </p>
<p>मध्यप्रदेश और छग में भाजपा ने लगातार तीन बार वोटों की फसलें काटी थीं लेकिन 2018  में ये फसल कांग्रेस के हिस्से में आयी। 2020  में मध्यप्रदेश में वोटों की कटी-कटाई फसल से लदी बैलगाड़ियां भाजपा ने बीच रस्ते में लूट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया लेकिन अबकी भाजपा के लिए मध्य्प्रदेश की फसल बचाना कठिन हो रहा है।  </p>
<p>राजस्थान और छग की फसलों के बारे में तो सोचने में भी भाजपा के नेताओं को पसीना आ रहा है। मध्यप्रदेश में वोटों की लहलहाती फसल देखकर ललचा रहे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तो नौकरशाही को ही हड़काने पर आमादा है। वे भूल गए कि विनाश काल में सबसे पहले बुद्धि व्यक्ति से विपरीत  कार्य कराती है।</p>
<p>भारत के तमाम किसान अभी ऐसे किसी  डिजटल प्लेटफार्म पर नहीं हैं जहां नेताओं की लिखी पोस्ट को वे पढ़ सकें ।  राहुल गांधी इसीलिए जो बात एक्स पर लिखते हैं उसे बताने किसानों के बीच खेतों तक भी जा रहे है। हालाँकि उनका खेतों में हसिया लेकर उतरना और धान काटना लगान फिल्म के सीन जैसा लगता है लेकिन उसमें असलियत दिखाई देती है। नए दौर की सियासत में अभिनय एक अनिवार्य कौशल है।  </p>
<p>मोदी जी का इस मामले में कोई मुकाबला नहीं था लेकिन अब राहुल गांधी भी उनसे इक्कीस साबित हो रहे है।  वोटों की फसल काटने के लिए यदि अभिनय से ही काम चलना है तो फिर मोदी जी और उनकी टीम का तो बड़ा गर्क होता दिखाई दे रहा है। केवल मध्य्प्रदेश में उनके पास एक अभिनेता शिवराज सिंह चौहान है। लेकिन एक बेचारा क्या कर सकता है ?<br />देश का सौभाग्य है कि देश के पास लेम्प पोस्ट के नीचे पढ़कर प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने वाले लाल बहादुर शास्त्री के बाद ऐसा दूसरा व्यक्ति प्रधानमंत्री है जो चाय बेचता था। लेकिन चाय बेचने का अनुभव ज्यादा काम नहीं आया।  </p>
<p>चाय का एक सत्र ही ठीक चला । दूसरे सत्र में चाय की मिठास गायब होने लगी और अब तीसरे सत्र में कोई चाय पर चर्चा ही नहीं करता। स्टेशन पर चाय बेचने वाला जन-जन का प्रिय वयक्ति अब बड़े-बड़े सेठों के साथ  मिलाकर ' स्टारबक्स ' जैसी ब्रांडेड चाय के कारोबार में उतर गया दिखाई दे रहा है। उसके ऊपर चाय के साथ न जाने क्या-क्या बेचने का आरोप है ,लेकिन एक का भी जबाब जनता के बीच नहीं आया। बेचारे के पास अब पुरानी ड्रेस तक नहीं रही जो अक्सर चाय बेचने वाले पहना करते थे। जिनसे उनकी पहचान थी।</p>
<p>इस बार मुकाबला खेतों-खिलाहनों के किसानों और मंदिरों में घंटा बजाने वाली भीड़ के बीच है। अब देखना है कि वोटर   मंदिर पाकर फ़िदा होते हैं या कांग्रेसी पंजीरी खाकर। आयुष्मान योजना के पांच लाख रूपये के स्वास्थ्य बीमा को चुनते हैं या राजस्थान के 25  लाख रूपये के स्वास्थ्य बीमा को। लोग इस बार डिब्बा बजायेंगे या डिब्बा गोल करेंगे ये कहना कठिन है। विसंगति ये है कि सरकारी पार्टी के नेताओं का साथ ईडी और सीबीआई के हथियार भी नहीं दे रहे है। केरल में हुया दुर्भाग्यपूर्ण विस्फोट भी एनआईए के काम करने के पहले ही फुस्स हो गया।  </p>
<p>विस्फोट करने वाला खुद सामने आ गया। इसलिए विस्फोट का दोष आईएनडीआईऐ [इंडिया] के सिर नहीं मढ़ा जा सका। उमा भर्ती के हिमालय गमन ने नारी शक्ति वंदना की हकीकत उजागर कर दी। बहरहाल धान के खेतों से भीनी-भीनी खुशबू उठ रही है।  आगामी 3  दिसंबर तक धान काटकर गोदामों तक पहुँच जाएगी।किसके हिस्से में क्या आया ,जल्द पता चल जाएगा। अभी तो ' तेल देखिये और तेल की धार' देखिये। पूर्बिया हवा पछाह तक आती है या नहीं ?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136385/whose-right-will-be-reaped-on-the-crop-of-votes</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136385/whose-right-will-be-reaped-on-the-crop-of-votes</guid>
                <pubDate>Mon, 30 Oct 2023 12:03:00 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/whatsapp-image-2023-10-30-at-12.01.43-pm.jpeg"                         length="169979"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चुनिए उसे जो प्याज दिलाये</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज बात न हमास की और न विधानसभा चुनाव की ,क्योंकि आज का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है प्याज ।  प्याज जिसके बिना रसोईघर की रौनक ही चली जाती है।  भारत में प्याज अचानक ही टमाटर की तर्ज पर सुर्ख हो चला है ।  मुझे कल प्याज 70  रूपये किक्लो मिला और साथ ही चेतावनी भी कि -भाई साहब और ले  लो वरना ये 100  रूपये किलो में  भी नसीब होने वाला नहीं है। प्याज ने  भी मौक़ा  देखकर चौका मारने की कोशिश की है क्योंकिइस वक्त पूरा देश और दुनिया हमास-इजराइल जंग औरभारत  विधानसभा चुनावों में मशगूल है।  </p>
<p>कहने को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136326/choose-the-one-who-gives-you-the-onion"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/whatsapp-image-2023-10-29-at-12.00.18-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p>आज बात न हमास की और न विधानसभा चुनाव की ,क्योंकि आज का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है प्याज ।  प्याज जिसके बिना रसोईघर की रौनक ही चली जाती है।  भारत में प्याज अचानक ही टमाटर की तर्ज पर सुर्ख हो चला है ।  मुझे कल प्याज 70  रूपये किक्लो मिला और साथ ही चेतावनी भी कि -भाई साहब और ले  लो वरना ये 100  रूपये किलो में  भी नसीब होने वाला नहीं है। प्याज ने  भी मौक़ा  देखकर चौका मारने की कोशिश की है क्योंकिइस वक्त पूरा देश और दुनिया हमास-इजराइल जंग औरभारत  विधानसभा चुनावों में मशगूल है।  </p>
<p>कहने को प्याज़ एक वनस्पति है लेकिन  प्याज एक सहायक सब्जी भी है,मसाला  भी है और आयुर्वेद  की दवा भी ।  ये कटे या छिले अच्छे से अच्छे आदमी को रुला देती है । और जब इसके भाव आसमान छूने की कोशिश करते हैं तब तो हिन्दू हो या मुसलमान ,सिख हो या ईसाई सब तिलमिला जाते हैं ये अकेली ऐसी कंद है जो कभी-कभी सरकार भी हिला देती है।  प्याज ने कभी भी ये नहीं देखा कि सरकार किस पार्टी की है । सरकार किसी भी दल की हो ,प्याज हमेशा अपनी हरकत से बाज नहीं आती।</p>
<p>भारत में महाराष्ट्र  प्याज़ की पसंदीदा जमीन है ।  प्याज की सबसे ज्यादा खेती उसी महाराष्ट्र में होती है जहाँ एक नहीं दो-दो शिव सेनाएं हैं।  महाराष्ट्र वाले  साल मे दो बार प्याज़ की फ़सल लेते  है। प्याज की पहली फसल  नवम्बर में और दूसरी मई के महीने में  होती है। ऐसे में आजकल प्याज मंहगी नहीं होना चाहिए, लेकिन हो रही है ।  अर्थात इसके पीछे कोई साजिश है।  कोई राष्ट्रद्रोही शक्ति सत्तारूढ़ भाजपा को नीचा दिखाने के लिए प्याज का भाव बढ़ाने का नीच काम कर रही है। वरना हमारे यहां तो इतना प्याज होता है कि हम प्याज का  कई देशों को निर्यात करते है।  हमारे अनेक पड़ौसी मुल्क जैसे  नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, हमारी भारतीय प्याज पर ही पलते है।</p>
<p>महाराष्ट्र प्याज के मामले में अपनी दादागीरी न दिखाए इसलिए भारत में  प्याज़  कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल मध्य प्रदेश में भी पैदा होती है और देश की जनता की सेवा करती है। प्याज और सरकार के बीच ' डाल-डाल,पात-पात ' का खेल चलता है। प्याज वाले दाम बढ़ाते हैं तो सरकार प्याज के  निर्यात पर लगने वाला कर  बढ़ा देती है। अभी महाराष्ट्र के नासिक में स्थित देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में पिछले बीस दिनों में प्रति क्विंटल प्याज का औसत दाम 1370 रुपये से बढ़कर 2421 रुपये पर पहुंच गया है।  </p>
<p>केंद्र सरकार ने फौरन प्याज की क़ीमतों पर लगाम लगाने के लिए प्याज के निर्यात पर 40 फ़ीसद निर्यात कर लगा दिया है। 'सबको साथ लेकर सबका विकास ' करने वाली हमारी मोदी सरकार ने इसके साथ ही   साल 2023-24 के लिए अपने प्याज के स्टॉक को तीन लाख टन से बढ़ाकर पांच लाख टन करने का फ़ैसला किया है। हमारे  सूत्र बता रहे हैं कि जनता को प्याज न रुला पाए इसलिए सरकार ने पहले ही तीन लाख टन प्याज ख़रीद कर रख ली थी।अब सरकार किसानों से दो लाख टन प्याज ख़रीदेगी।</p>
<p>सरकार के लिए प्याज हो या टमाटर हमेशा समस्या पैदा करते ही रहते है।  सवाल ये है कि सरकार देश को हिन्दू  राष्ट्र बनाने के महा अभियान में जुटे या टमाटर-प्याज को लेकर उलझी रहे। एक तरफ केंद्र सरकार प्याज की बढ़ती क़ीमतों को थामने की कोशिश कर रही है. दूसरी किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।  जाहिर है कि प्याज दरअसल  केवल प्याज नहीं है बल्कि सियासत का एक  रासायनिक औजार भी है। जो चलता है तो सबको रुलाता है ।  </p>
<p>जनता को भी और सरकार को भी। हमारी सरकारी  पार्टी वैसे  भी पांच  राज्यों  के विधानसभा चुनावों में खून  के आंसू   रो रही है ।  कांग्रेस  जनता को गारंटी  पर गारंटी  दिए  जा  रही है ।  छग  में राहुल गाँधी  कह  आये  कि उनकी<br />पार्टी केजी  से पीजी  तक  मुफ्त  शिक्षा  देगी। गनीमतहै कि अभी किसी भी राजनीतिक दल ने मतदाताओं  को मुफ्त में प्याज-टमाटर देने  की गारंटी नहीं दी है ।  </p>
<p>कल को कोई राजनीतिक ऐसा  कर भी दे  तो हैरानी  नहीं होना चाहिए। दुनिया में आलू  के बाद प्याज-टमाटर ही ऐसी चीज है जो हर जगह पायी  और खाई  जाती है । आपको जानकार हैरानी होगी  कि दुनिया  में  1,789 हजार हेक्टर क्षेत्रफल में 25,387 हजार मी. टन प्याज का उत्पादन होता है। भारत में  287 हजार हेक्टर क्षेत्रफल में  2450 हजार टन प्याज पैदा होता है।</p>
<p>हमारी नानी  को प्याज की गंध  से सख्त  नफरत  थी  लेकिन वे किसी को प्याज खाने  से रोकती  नहीं थीं।  वे बताती थी कि-' प्याज केवल प्याज नहीं है बल्कि गुणों की खान है।  नानी के मुताबिक़  प्याज का उपयोग सब्जी, मसाले, सलाद तथा अचार तैयार करने के लिए किया जाता है। हमारे नाना  वैद्य  थे ,वे कहते  थे  कि-' प्याज में में आयरन, कैल्शियम, तथा विटामिन ‘सी’ पाया जाता है। प्याज  तासीर  से तीखा, तेज, बलवर्धक, कामोत्तेजक, स्वादवर्धक, क्षुधावर्धक तथा महिलाओं में रक्त वर्धक होता है।</p>
<p>पित्तरोग, शरीर दर्द, फोड़ा, खूनी बवासीर, तिल्ली रोग, रतौंधी, नेत्रदाह, मलेरिया, कान दर्द तथा पुल्टिस के रूप में लाभदायक है। अनिद्रा निवारक (बच्चों में), फिट (चक्कर) में सुंघाने के लिए उपयोगी। कीड़ों के काटने से उत्पन्न जलन को शान्त करता है।' लेकिन सियासत वाले हमेशा जनता के सर पर प्याज काटते  आये हैं ।</p>
<p>भारत आज भी प्याज के मामले में चीन   को पछाड़ नहीं पाया है ।  भारत भले   ही इस  मामले में अमेरिका  से आगे  है लेकिन चीन  से पीछे है । प्याज के मामले में हमारा  असल  मुकाबला  चीन  से है इसलिए यदि  देश को चीन  से ज्यादा  ताकतवर  बनाना  है तो चीन  से ज्यादा  प्याज पैदा करना  भारतीय किसानों   का ,राज्य  सरकारों   का पहला  राष्ट्रीय  कर्तव्य  होना चाहिए। दुनिया आज भी 74 लाख  मीट्रिक  टन  प्याज हजम  कर जाती है।  अर्थात राम  नाम  की ही तरह  प्याज नाम  भी सत्य  है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136326/choose-the-one-who-gives-you-the-onion</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136326/choose-the-one-who-gives-you-the-onion</guid>
                <pubDate>Sun, 29 Oct 2023 12:01:02 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/whatsapp-image-2023-10-29-at-12.00.18-pm.jpeg"                         length="91594"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खुद नाच न जाने, कहें -'आंगन टेढ़ा '</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मध्य प्रदेश के गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा की साफगोई का मै कायल हूँ।मेरी तरह बहुत से लोग कायल होंगे।  मै हमेशा से उन्हें ' टिनोपाल मंत्री ' कहता आया हूँ । लकधक में वे मध्यप्रदेश के नारायण दत्त तिवारी भी हैं। उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र में भी साफगोई का मुजाहिरा किया और कहा कि उन्होंने दतिया का चहुमुखी विकास करने के साथ ही हेमामलिनी तक को नचवा दिया ,और क्या चाहिए आपको ?' और ये सच भी है लेकिन अब उन्हें खुद अपने विधानसभा  दतिया का आंगन टेढ़ा दिखाई दे रहा है।</p>
<p>टेढ़े आंगन में कितना नाच पाएंगे ये कहना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136256/if-you-dont-know-how-to-dance-yourself-ask"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/hindi-divas37.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य प्रदेश के गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा की साफगोई का मै कायल हूँ।मेरी तरह बहुत से लोग कायल होंगे।  मै हमेशा से उन्हें ' टिनोपाल मंत्री ' कहता आया हूँ । लकधक में वे मध्यप्रदेश के नारायण दत्त तिवारी भी हैं। उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र में भी साफगोई का मुजाहिरा किया और कहा कि उन्होंने दतिया का चहुमुखी विकास करने के साथ ही हेमामलिनी तक को नचवा दिया ,और क्या चाहिए आपको ?' और ये सच भी है लेकिन अब उन्हें खुद अपने विधानसभा  दतिया का आंगन टेढ़ा दिखाई दे रहा है।</p>
<p>टेढ़े आंगन में कितना नाच पाएंगे ये कहना अभी से मुमकिन नहीं है ? डॉ नरोत्तम मिश्रा भाजपा के छह बार के विधायक होने के नाते एक जिम्मेदार विधायक माने जाते है।  वे अपनी दृढ़ता,वाकपटुता और व्यक्तित्व की बिना पर अनेक बार शिवराज सिंह चौहान सरकार के संकट मोचक भी बने ,मुख्यमंत्री के प्रतिद्वंदी के रूप में भी उभरे और सरकार के प्रवक्ता भी रहे। उन्हें मै राजनीति की पहली सीढ़ी चढ़ने वाले दिन से जानता हूँ इसलिए अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि डॉ नरोत्तम मिश्रा जैसा कोई उत्तम नेता भाजपा के पास दूसरा नहीं है ।  </p>
<p>जो थे उन्हें समय ने हँसिये पर पहुंचा दिया है लेकिन अब बारी खुद डॉ नरोत्तम मिश्रा की है। घबड़ाये हुए डॉ मिश्रा अब सन्निपात  के मरीज नजर आ रहे हैं।एक जमाने में ग्वालियर -चंबल में अनूप मिश्रा,नरेंद्र सिंह और डॉ नरोत्तम मिश्रा को क्रमश :आनन,मुन्ना और गन्ना कहा जाता था।</p>
<p>भाजपा के लकधक नेता और मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा को हार -जीत का अनुभव है ।  वे डबरा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार 1990  में विधायक चुने गए थे ,लेकिन 1993  में हार गये । 1998  में फिर से विधायक चुने गए । 2003   में भी डबरा की जनता ने उन्हें चुना लेकिन उमा भारती  ने प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद मंत्री नहीं बनाया ।  उन्हें मंत्री बनने के लिए दो साल इन्तजार करना पड़ा।  </p>
<p>उन्हें मंत्री बनाया बाबूलाल गौर के मुख्यमंत्रित्वकाल में।  तब से प्रदेश में जब-जब भाजपा की सरकार बनी ,डॉ नरोत्तम मिश्रा को मंत्री पद मिला। इस लिहाज से वे भाजपा की मौजुदा सरकार के वरिष्ठ  मंत्री माने जा सकते हैं। ग्वालियर जिले की डबरा विधानसभा सीट से एक बार चुनाव हार चुके डॉ नरोत्तम मिश्रा दूसरी बार चुनाव हारते इससे पहले ही परिसीमन में डबरा विधानसभा सीट आरक्षित घोषित हो गयी और वे अपना बोरी-बिस्तर लेकर पड़ौस के दतिया जिले की दतिया विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ने जा पहुंचे।</p>
<p>नसीब अच्छा था इसलिए डॉ नरोत्तम मिश्रा 2008  ,2013  और 2018  का विधानसभा चुनाव दतिया से जीतते रहे और भाजपा सरकार में मंत्री बनते रहे ,हालाँकि इस बीच वे 2009  के लोकसभा  चुनाव में गुना संसदीय सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ बलि का बकरा भी बनाये गए ,लेकिन उन्हें अपनी कुर्बानी का समुचित पारितोषक भी मिला।<br />दतिया में हेमामालिनी  को नचवाने का दामभ भरने वाले डॉ नरोत्तम मिश्रा का नसीब अच्छा था जो वे 2008  के विधानसभा चुनाव में'  पेड न्यूज ' की एक शिकायत के बाद अयोग्य ठहराए जाने के बावजूद अदालती लड़ाई लड़ते हुए लगातार चुनाव लड़ते और जीतते रहे।</p>
<p>इस बीच दतिया  का उन्होंने  बहुमुखी विकास भी किया और दतिया को अपनी पुस्तैनी जागीर में भी तब्दील कर लिया। दतिया में डॉ मिश्रा की मर्जी  के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।  नतीजा ये हुआ कि दतिया भाजपा में विद्रोह हो गया और दतिया भाजपा के एक युवा नेता अवधेश नायक भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने उन्हें 2023  के विधानसभा चुनाव के लिए डॉ नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ अपना प्रत्याशी भी बनाया लेकिन बाद में उन्हें मैदान से हटाकर डॉ मिश्रा के खिलाफ उनके चिर प्रतिद्वंदी राजेंद्र भारती को कांग्रेस का प्रत्याशी बना दिया।</p>
<p>भाजपा के इस देदीप्यमान नक्षत्र को हालाँकि 2008  में ग्रहण लग गया था लेकिन डॉ मिश्रा खुश नसीब हैं कि वे अयोग्य ठहराए जाने के बाद भी अब तक योग्य बने हुए हैं और उनके पीछे राहु-केतु की तरह लगे राजेंद्र भारती एक बार फिर से उनके खिलाफ चुनाव मैदान में हैं । राजेंद्र भारती को यदि अवधेश नायक का साथ मिल गया तो र नरोत्तम मिश्रा को इस विधानसभा चुनाव में दिन में तारे नजर आ सकते हैं।</p>
<p>वे भीतर ही भीतर से घबड़ाये हुए हैं किन्तु इस घबड़ाहट को वे बाहर नहीं आने दे रहे। डबरा के विकास में डॉ मिश्रा के योगदान को देखते हुए उन्हें हारना नहीं चाहिए किन्तु उन्होंने डबरा की राजनीति को जिस तरह से अपनी दासी बना लिया है उसे देखकर लगता है कि जनता की अकुलाहट उनका फट्टा पलट सकती है।</p>
<p>दतिया मध्यप्रदेश का छोटे जिलों में से एक है ।  यहां मां बगुलामुखी के मंदिर के तांत्रिक पीठ के अलावा कुछ नहीं है ।  दतिया एक पुरानी जागीर है। दतिया  पहले श्याम सुंदर श्याम की जागीर रही,इस सीट से कांग्रेस छह बार जीती तो भाजपा ५ बार। समाजवादी भी यहां से जीते और निर्दलीय भी। डॉ नरोत्तम मिश्रा ने दतिया को अपनी जागीर बनाया लेकिन उसे पहचान भी दी।</p>
<p>यहां मेडिकल कालेज खुला ,शहर का विकास भी हुआ लेकिन बदले में नव सामंतवाद इतनी तेजी से उभरा की अब यहां के व्यापारियों को ,उद्योगपतियों को यहां तक की आम जनता को भी सांस लेने से पहले डॉ नरोत्तम मिश्रा की इजाजत की जरूरत पड़ती है ।  यहां का प्रशासन और पुलिस मध्यप्रदेश सरकार की नहीं डॉ मिश्रा के इशारों पर नर्तन करती है। लेकिन इस बार डॉ मिश्रा खुद नर्तन करते नजर आ रहे है।  आने वाले तीन सप्ताह में उनका आँगन  सीधा होता है या नहीं ये देखना दिलचस्प हो सकता है।क्या वे इस बार भी हेमामालिनी को अपने लिए नचवा पाएंगे ? आपको भी इस पर नजर रखना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136256/if-you-dont-know-how-to-dance-yourself-ask</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136256/if-you-dont-know-how-to-dance-yourself-ask</guid>
                <pubDate>Fri, 27 Oct 2023 18:03:35 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/hindi-divas37.jpg"                         length="173958"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है</title>
                                    <description><![CDATA[<p>राम आखिर राम हैं।  हमारे ,आपके,सबके राम। अयोध्या के राम,ओरछा के राम। लेकिन राजनीति के राम सबसे अलग है। वे राजनीति में डूबती नौकाओं के उद्धारक है।  उनका नाम लेकर की अक्षम व्यक्ति भी सक्षम बन सकता है। इस धारणा को मै लगातार मजबूत होते हुए देख रहा हूँ।  दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इसीलिए किसी भी सूरत में राम का नाम लेना नहीं छोड़ना चाहती ,और ये अच्छी बात है। क्योंकि इधर राम का नाम लेना छोड़ा और उधर राजनीति में राम नाम सत्य हुआ।</p>
<p>हमारे चिरगांव वाले दद्दा मैथिलीशरण गुप्त थे तो राष्ट्रकवि लेकिन वे राम के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136219/ram-your-character-is-poetry-in-itself"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/ram-mandir.jpg" alt=""></a><br /><p>राम आखिर राम हैं।  हमारे ,आपके,सबके राम। अयोध्या के राम,ओरछा के राम। लेकिन राजनीति के राम सबसे अलग है। वे राजनीति में डूबती नौकाओं के उद्धारक है।  उनका नाम लेकर की अक्षम व्यक्ति भी सक्षम बन सकता है। इस धारणा को मै लगातार मजबूत होते हुए देख रहा हूँ।  दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इसीलिए किसी भी सूरत में राम का नाम लेना नहीं छोड़ना चाहती ,और ये अच्छी बात है। क्योंकि इधर राम का नाम लेना छोड़ा और उधर राजनीति में राम नाम सत्य हुआ।</p>
<p>हमारे चिरगांव वाले दद्दा मैथिलीशरण गुप्त थे तो राष्ट्रकवि लेकिन वे राम के भी अनन्य भक्त थे।वे कहते थे कि -'राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाये सहज सम्भाव्य है '। वे यदि आज ' साकेत ' लिखते तो शायद लिखते कि -' राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई नेता बन जाये सहज सम्भाव्य है ।</p>
<p>राम का अनन्य भक्त होना आसान नहीं है। मै खुद राम जी का अनन्य भक्त हूँ और कभी -कभी सोचता हूँ कि पिछले साथ साल में मैंने जितनी बार राम चरित मानस का वाचन किया है ,उसमें से मै यदि जरा भी कटौती करता तो तो अब तक कम से कम सौ-दो सौ दूसरे ग्रन्थ पढ़ लेता ,लेकिन ये हो न सका।</p>
<p>' ऐसी लागी लगन,पंडित हो गया मगन । लेकिन राम जी की महती कृपा है मेरे ऊपर कि मै नेता नहीं बन पाया। राम जी से सत्तारूढ़ भाजपा की लौ भी खूब लगी है। भाजपा की समावेशी केंद्र सरकार आगामी आम चुनावों से पहले अयोध्या में बन रहे भव्य -दिव्य मंदिर में राम लला विराजमान को पुन: प्राण-प्रतिष्ठित कर देना चाहती  है ।</p>
<p>देश में नयी लोकसभा का गठन होने से पहले राम जी नए मंदिर में विराजमान हो जाएँ इसके  लिए मंदिर के न्यासियों ने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को न्यौता दे दिया है। तमाम संत-महंत चाहते हैं कि राम जी की प्राण-प्रतिष्ठा  का काम प्रधान जी के कर-कमलों से ही हो क्योंकि राम जी का मंदिर उन्हों के प्रयासों का परिणाम है।</p>
<p>राम जी तो वैसे असंख्य भक्तों के मन-मंदिर में युगों-युगों से प्राण प्रतिष्ठित हैं ही लेकिन सियासत के लिए उन्हें एक बार फिर से प्रतिष्ठित किया जाना है। राजनीति का काम ही या तो किसी को प्रतिष्ठित करना है या किसी का मान-मर्दन करना।</p>
<p>इस कलिकाल में राम जी की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए कोई संत,महंत, महामंडलेश्वर,शकंराचार्य करे ये उचित नहीं लगता,चूंकि मंदिर एक राजनीतिक  दल के एजेंडे के तहत बना है इसलिए प्राण-प्रतिष्ठा का काम भी उसी दल के नेता के कर कमलों से होना आवश्यक है। अब किसी को ये बुरा लगे तो लगता रहे । मुझे तो अच्छा  लग रहा है।</p>
<p>इतिहास गवाह है ,साक्षी है,चश्मदीद है कि इस देश को लोकतंत्र से ज्यादा राम मंदिर की जरूरत थी ।  ये देश पांच सौ से ज्यादा साल से मंदिर के लिए तरस रहा था। कैकेयी ने तो राम जी को केवल चौदह वर्ष  का वनवास दिया था लेकिन कलियुग के राम तो पांच सौ से ज्यादा साल से बिना मंदिर के रह रहे थे।</p>
<p>ये इस देश में शासन  करने वाले गोरों के लिए भी शर्म की बात थी और कालों के लिए भी। वो तो प्रभु कृपा हुई कि भाजपा सत्ता में आ गयी और राम मंदिर बन गया।  अब जब मंदिर बन गया है तो देश भी बन ही जाएगा। जिस  देश में मंदिर नहीं होते वो देश देश नहीं होते। लोकतंत्र के लिए मंदिर पहली शर्त है और आखरी शर्त भी।हमारे पंत प्रधान ने पहली और आखरी शर्त पूरी कर दी है इसलिए देश को चाहिए कि देश भी उनकी आखरी ख्वाहिश  पूरी कर दे और उन्हें जून   2024 से पहले लोकतंत्र के मंदिर में एक बार यानि  तीसरी  बार प्राण प्रतिष्ठित कर दे।  </p>
<p>हमारे यहां महाराज जीवाजी रॉ सिंधिया के नाम पर विश्व विद्यालय बना तो  परिसर  में महाराज जीवाजी रॉ सिंधिया की प्रतिमा लगायी गयी, मै चाहता हूँ कि इसी तरह राम मंदिर के प्रवेश द्वार  पर या परिसर  में कहीं  प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की एक स्वर्ण प्रतिमा लगाई जाये। आखिर उन्होंने  एक इतिहास  लिखा है वो भी स्वर्ण अक्षरों वाला इतिहास। यदि राम मंदिर के न्यासी  ऐसा  कर सकें  तो ' सोने  में सुहागा ' हो जाये ।</p>
<p>रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ मोदी  जी की भी प्राण प्रतिष्ठा हो जाय।  आजकल  वैसे भी मोदी  जी प्राण और प्रतिष्ठा दोनों  लगातार कम हो रहे हैं। वे हालाँकि विश्व गुरु हैं किन्तु गुरुघंटाल  रूस  और इजराइल  उनकी बात सुन  ही नहीं रहा । बरसाए  जा रहा है बम पर बम  यूक्रेन  और फिलिस्तीन  के ऊपर।</p>
<p>बहरहाल  इस बार देश में 26 जनवरी  से ज्यादा यादगार  22 जनवरी  रहने वाली है ,क्योंकि उस दिन भगवान  राम की नए मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा  होगी ।  26 जनवरी  को तो संविधान  की प्राण- प्रतिष्ठा होती है। वैसे भी हमारे संविधान  के प्राण तो पहले कंठगत  है।  उसकी परवाह  कौन  करता है ।  </p>
<p>परवाह  तो राम जी की कोई जा रही  है और की जाना  चाहिये ।  संविधान  और राम जी में जमीन  -आसमान  का भेद  हैं। इन  दोनों की कोई  तुलना  भी नहीं है।  कलिकाल में राम जी की प्रतिष्ठा के सामने  संविधान की प्रतिष्ठा कहाँ  लगती  है ।  संविधान तो अब धज्जियां  उड़ाने  के काम आता है।  उसकी भी नए  सिरे  से रचना  की जाएगी । ये काम भी मान्यवर मोदी जी ही कर सकते हैं। इसलिए   उन्हें एक मौक़ा और दिया जाना चाहिए।</p>
<p>आपको याद दिला दूँ कि सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के फैसले में अयोध्या में विवादित जगह पर एक ट्रस्ट द्वारा राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।  इसके अलावा अदालत ने केंद्र सरकार को नई मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक पांच एकड़ का जमीन आवंटित करने का निर्देश दिया था।  </p>
<p>अदालत ने फैसला सुनाया था  कि विवादित भूमि की 2.77 एकड़ जमीन जहां 16वीं सदी की ध्वस्त बाबरी मस्जिद थी, वह केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी और फैसले के तीन महीने के भीतर   मंदिर के निर्माण के लिए मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी जाएगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136219/ram-your-character-is-poetry-in-itself</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136219/ram-your-character-is-poetry-in-itself</guid>
                <pubDate>Thu, 26 Oct 2023 17:57:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/ram-mandir.jpg"                         length="65776"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रावण की ओट में सियासत की मजबूरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रामलीला के मंचों से रावण दहन की ओट में सियासी दलों ने जमकर सियासत की और जनता ठगी से खड़ी देखती रह गयी, क्योंकि रामलीलाओं  में न असली राम लड़ रहे थे और न असली रावण जल रहे थे। सब कुछ नकली था। असली थे तो सिर्फ नेताओं के चेहरे और उनके भाषण। जिनमें राम का नाम ले-लेकर अपने विरोधियों की धज्जियां उड़ाई जा रहीं थीं। दिल्ली से पटना तक एक ही माहौल  था। राम और रावण तो केवल निमित्त थे।</p>
<p>दिल्ली में द्वारिका की रामलीला में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक मंच और माइक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136198/political-compulsion-under-the-cover-of-ravana"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/rawan-ji.jpg" alt=""></a><br /><p>रामलीला के मंचों से रावण दहन की ओट में सियासी दलों ने जमकर सियासत की और जनता ठगी से खड़ी देखती रह गयी, क्योंकि रामलीलाओं  में न असली राम लड़ रहे थे और न असली रावण जल रहे थे। सब कुछ नकली था। असली थे तो सिर्फ नेताओं के चेहरे और उनके भाषण। जिनमें राम का नाम ले-लेकर अपने विरोधियों की धज्जियां उड़ाई जा रहीं थीं। दिल्ली से पटना तक एक ही माहौल  था। राम और रावण तो केवल निमित्त थे।</p>
<p>दिल्ली में द्वारिका की रामलीला में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक मंच और माइक का पूरा इस्तेमाल किया।  उन्होंने जनता को विजयादशमी की शुभकामनाओं के साथ ही अपना और अपनी पार्टी का एजेंडा परोस दिया, इंदिरा गाँधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम  के जबाब में अपने दस सूत्रीय कार्यक्रम को परोसा। राम मंदिर और रामलला का जिक्र किया। अब चूंकि प्रधानमंत्री हैं तो कोई उन्हें मंच का दुरूपयोग करने से रोक भी नहीं सकता। मंच के दुरूपयोग को सदुपयोग मान लिया गया।आयोजकों ने भी पूरे मैदान में राम के बजाय मोदी जी के कटआउट लगाकर अपनी मोदी भक्ति का भरपूर मुजाहिरा किया।</p>
<p>देश की आर्थिक  राजधानी मुंबई में भी दिल्ली की तर्ज पर दशहरे पर जमकर राजनीति हुई ।  बाला साहेब की शिवसेना के दोनों गुटों ने एक-दूसरे के प्रति जमकर भड़ास निकाली। जनता रामलीला के बजाय शिवसेना की लीला देखकर दंग रह गया ।शिवसेना का एक धड़ा शिवाजी पार्क  में था तो दूसरा धड़ा आजाद पार्क में। शिवाजी पार्क में उद्वव ठाकरे ने गुजरात के अहमदाबाद में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के स्वागत पर भी सवाल उठाए। उद्धव ठाकरे ने कहा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में पाकिस्तान के क्रिकेटरों का स्वागत फूलों की वर्षा की गई।</p>
<p>गरबा का नृत्य किया गया। ठाकरे ने कहा कि इन दृश्यों को देखने के बाद, उन्हें एक पल के लिए लगा कि पाक खिलाड़ी भाजपा में शामिल हो गए हैं क्या? ठाकरे ने कहा कि मौजूदा सरकार जनरल डायर सरकार है जिसने निर्दोष प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे के गुट विधायकों की अपात्रता मामले का उल्लेख किया। इससे पहले शिवसेना यूबीटी नेता संजय राउत ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अजित पवार और हसन मुश्ररिफ का हवाला देकर बीजेपी पर निशाना साधा।</p>
<p>आजाद मैदान में  शिवसेना प्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री  एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे पर पलटवार किया। शिंदे ने कहा कि मैदान-स्थल महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि विचारधारा और विचार महत्वपूर्ण हैं। शिंदे ने कहा कि उनकी रैली में बाला साहेब के विचार हैं। एकनाथ शिंदे ने कहा कि असली शिवसेना आजाद मैदान में है। उन्होंने कहा कि सत्ता के लिए उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व को धोखा दिया। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि आजाद मैदान आज आजाद शिवसैनिक जुटे हैं।<br /> रवां  के जरिये पटना मे भी पलटिक्स हुई।  </p>
<p>जेडीयू ने मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए अपने पांच प्रत्याशी उतारकर सपा की तरह ही आईएनडीआईए गठबनधन  के साथ घात किया। जम्मो-कश्मीर और काँगड़ा में भी रावण जलाये गए लेकिन वहां सियासत नहीं हो पायी ,हालाँकि कोशिश की गयी । दशहरे  के दिन पूरे देश में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए गए  वहीं बिसरख में  के बजाय शिव जी की पूजा की गयी।</p>
<p>उत्‍तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित सेक्‍टर-1 के पास मौजूद गांव बिसरख को रावण का गांव कहा जाता है.यहां  रावण दहन नहीं किया जाता है, उल्‍टा दशहरे पर रावण को बेटा मानकर याद किया जाता है. यहां की महिलाएं इस दिन रावण की जन्‍मस्‍थली पर बने अष्‍टकोणीय शिवलिंग की पूजा करने आती हैं. मान्यता  है कि यह वही शिवलिंग है जिसकी आराधना कर रावण ने भगवान शिव से वरदान प्राप्‍त किया था।</p>
<p>दशहरे पर भले ही देश भर में राम-रावण युद्ध हो,रावण के पुतले जलाये जाएँ लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुप्रीमो डॉ मोहन भागवत अपनी भागवत बांचते है ।  इस बार भी वे चुप नहीं रहे ,बोले ।  उन्होंने  मणिपुर के मुद्दे पर वो सब कह दिया जो माननीय प्रधानमंत्री कहने   में हिचकते रहे।  </p>
<p>भागवत ने कहा कि -संघ प्रमुख ने कहा कि मणिपुर की वर्तमान स्थिति को देखते हैं तो यह बात ध्यान में आती है कि लगभग एक दशक से शांत मणिपुर में अचानक यह आपसी फूट की आग कैसे लग गई? क्या हिंसा करने वाले लोगों में सीमापार के अतिवादी भी थे? अपने अस्तित्व के भविष्य के प्रति आशंकित मणिपुरी मैतेयी समाज और कुकी समाज के इस आपसी संघर्ष को सांप्रदायिक रूप देने का प्रयास क्यों और किसके द्वारा हुआ।</p>
<p>वर्षों से वहां पर सबकी समदृष्टि से सेवा करने में लगे संघ जैसे संगठन को बिना कारण इसमें घसीटने का प्रयास करने में किसका निहित स्वार्थ है? इस सीमा क्षेत्र में नागाभूमि व मिजोरम के बीच स्थित मणिपुर में ऐसी अशांति व अस्थिरता का लाभ प्राप्त करने में किन विदेशी सत्ताओं को रुचि हो सकती है।</p>
<p>रावण तो श्रीमती सोनिया गांधी ने भी लाल किले के मैदान में जलाया लेकिन उन्होंने वहां कोई राजनीतिक भाषण नहीं दिया। उनकी पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष  मल्लिकार्जुन खड़गे भी वहां थे,चाहते तो वे भी प्रधानमंत्री जी की   तरह ही अपने बीस सूत्रीय कार्यक्रम पर बोल सकते थे,लेकिन वे शायद रावण,राम और जनता को नाराज नहीं करना चाहते थे ,इसलिए राजनीति पर नहीं बोले। धार्मिक मंचों की सुचिता बचने के लिए भी तो एक-दो दल होना चाहिए ,की नहीं ? कांग्रेस ने दशहरे के दिन शुभकामनाओं के साथ ही अपने प्रतिद्वंदियों की गालियां खाईं।  वैसे भी प्रधानमंत्री जी गलियों को स्वास्थ्यवर्द्धक मानते हैं।</p>
<p>देश में पहली बार ऐसा लगा की किसी को रावण से कोई मतलब नहीं है। सभी को अपनी-अपनी राजनीति और छवि की फ़िक्र है ।  फिर चाहे वो भाजपा हो,संघ हो या शिवसेना। कांग्रेस तो जाहिर तौर पर सभी  के लिए रावण है ही।लोकतंत्र में परम्पराओं और धार्मिक आस्थाओं कि मंचों का ऐसा दुरूपयोग आखिर कौन रोकेगा ? इसके लिए तो कोई कानून फिलहाल है नही।  धर्म और राजनीती का कॉम्बो शेक बनाया और बेचा जा रहा है। अब मर्जी है, आपकी की आप इसे पियें या न पियें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/136198/political-compulsion-under-the-cover-of-ravana</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/136198/political-compulsion-under-the-cover-of-ravana</guid>
                <pubDate>Wed, 25 Oct 2023 15:53:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2023-10/rawan-ji.jpg"                         length="19969"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        