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                <title>Supreme Court - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Supreme Court RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>एक ओर यूएपीए में जमानत,दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद का मामला बड़ी पीठ को भेजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179982/on-one-hand-bail-in-uapa-on-the-other-hand"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद सामने आया था। सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह आदेश पारित किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आतंकवाद और यूएपीए यानी गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों में जमानत देने के नियमों पर अहम फ़ैसला सुना दिया। कोर्ट ने दिल्ली दंगे मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले पर सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले में शामिल दो अन्य आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने की अंतरिम जमानत भी दे दी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में फरवरी 2020 में </span>CAA <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने कई लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने दंगों की साज़िश रची थी। उमर खालिद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरजील इमाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी समेत कई लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट से कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत के नियमों पर दोबारा विचार होना चाहिए। उन्होंने हाल के एक फ़ैसले पर सवाल उठाया। इससे पहले न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने नार्को-टेरर मामले में स्येद इफ्तिखार अंदरबी को जमानत देते हुए कहा था कि यूएपीए मामलों में भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जमानत नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। उन्होंने उमर खालिद वाले पुराने फ़ैसले पर संदेह जताया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एसजी राजू ने कहा कि यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में सभी आरोपियों को एक जैसी छूट नहीं दी जा सकती है। हर मामले को अलग-अलग देखना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहरहाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि के ए नजीब वाले पुराने फैसले में दिए गए सिद्धांतों को लेकर अब भ्रम है। खासकर यूएपीए की धारा 43</span>D(<span lang="hi" xml:lang="hi">5) यानी जमानत के सख्त नियम और अनुच्छेद 21 यानी जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तय करना जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि एक बेंच दूसरे बराबर की बेंच के फ़ैसले को आसानी से नहीं बदल सकती। क़ानून में स्पष्टता होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह मुद्दा मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जा रहा है ताकि बड़ी बेंच बने और अंतिम फैसला दे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने के लिए अंतरिम जमानत मिल गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जमानत नहीं मिली है। उनका मामला अब बड़ी बेंच तय करेगी।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच 2020 दिल्ली दंगे के दो आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान आतंकवाद और </span>UAPA <span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों में जमानत को लेकर मतभेद के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अलग-अलग दो-जज की बेंचों के फैसले एक-दूसरे से उलट हैं। केंद्र सरकार ने सवाल उठाया कि क्या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बेल नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद है</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">वाला सिद्धांत आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में भी लागू होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर ट्रायल में देरी हो रही हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का उदाहरण दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और वकील रजत नायर ने कोर्ट में कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">अगर अजमल कसाब 7-8 साल जेल में रहने के बाद बेल मांगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या उसे बेल दे देते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों गवाह हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबूत इकट्ठा करने में समय लगता है। इसी तरह अगर हाफिज सईद पाकिस्तान से आकर ट्रायल में 5 साल जेल में रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या सिर्फ देरी के आधार पर उसे बेल दे देंगे</span>?' <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का कहना है कि हर केस के तथ्यों को देखकर बेल देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि सिर्फ जेल में कितना समय बीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस आधार पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फ़ैसला आने वाले समय में आतंकवाद और यूएपीए से जुड़े सभी जमानत मामलों पर असर डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जमानत क़ानून को और साफ़ करने के लिए बड़े फ़ैसले की तैयारी कर ली है। दो आरोपियों को राहत मिल गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उमर खालिद समेत बड़े सवाल अब बड़ी बेंच के सामने हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य मामले में  सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने  अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने आज जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी।पीठ ने यह भी कहा कि अगर अपीलकर्ता चल रहे मुक़दमे में सहयोग करने में नाकाम रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे दी गई राहत का दुरुपयोग माना जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खास बात यह है कि कोर्ट ने पहले समय-समय पर आदेश जारी किए थे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गवाही देने वाले अहम/सुरक्षित गवाह बिना किसी डर के अपने बयान दर्ज करा सकें (याचिकाकर्ता की रिहाई से पहले)। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की सुनवाई के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने बताया कि हालांकि कुछ अहम/सुरक्षित गवाहों की जांच अभी बाकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके बयान सह-आरोपी की भूमिका से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि याचिकाकर्ता से।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखते हुए कि कुछ सह-आरोपियों को ज़मानत मिल चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि मुक़दमे के पूरा होने में समय लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हिरासत में पहले ही बिताई जा चुकी अवधि को ध्यान में रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को ज़मानत दे दी। ज़मानत बांड संबंधित </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत की संतुष्टि के अनुसार जमा करने का निर्देश दिया गया। उक्त अदालत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता की संबंधित पुलिस थाने में उपस्थिति सुनिश्चित करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी मर्ज़ी के अनुसार शर्तें लगाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके वकील के अनुरोध पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत से वर्चुअली (सह-आरोपियों की तरह) पेश होने की अनुमति मांगने की भी छूट दी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुरोध पर अदालत द्वारा कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बड़ी साज़िश का मास्टरमाइंड विभिन्न आतंकवादी संगठनों के बड़े नेता थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें लश्कर-ए-तैयबा (</span>LeT), <span lang="hi" xml:lang="hi">हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन (</span>HM), <span lang="hi" xml:lang="hi">अल-बद्र और पाकिस्तान में मौजूद अन्य संगठन शामिल थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चार्जशीट में आगे आरोप लगाया गया है कि यह साज़िश अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद रची गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी आतंकवाद की घटनाओं को फिर से भड़काना था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य एजेंसी के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवादी समूह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान में मौजूद अपने मददगारों और नेताओं के साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद अपने ओवर-ग्राउंड वर्करों (</span>OGWs) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सहयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसानी से प्रभावित होने वाले स्थानीय युवाओं को अपने प्रभाव में लेने और उन्हें कट्टरपंथी बनाने में शामिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि उन्हें आतंकवाद की घटनाओं में शामिल होने के लिए भर्ती और प्रशिक्षित किया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">STF <span lang="hi" xml:lang="hi">ने बताया कि यह गैंग केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सचिवालय सुरक्षा बल और  ब राइफल्स की भर्ती परीक्षाओं में धांधली कर रहा था. आरोपियों ने ऑनलाइन परीक्षा सिस्टम को तकनीकी तरीके से प्रभावित कर उम्मीदवारों तक सही जवाब पहुंचाने की व्यवस्था बना रखी थी. बताया गया कि प्रत्येक उम्मीदवार से परीक्षा पास कराने के लिए करीब 4 लाख रुपये वसूले जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सीधे </span>SSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के सर्वर को हैक नहीं किया था. इसके बजाय परीक्षा केंद्र पर प्रॉक्सी सर्वर इंस्टॉल किया गया था. स्क्रीन शेयरिंग एप्लिकेशन के जरिए प्रश्नपत्र बाहर बैठे सॉल्वरों तक पहुंचाया जाता था. वहां से सवाल हल कर उम्मीदवारों को सही जवाब भेजे जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस ने बताया कि अरुण कुमार तकनीकी काम संभालता था और वही प्रॉक्सी सर्वर सिस्टम को ऑपरेट करता था. </span>STF <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है. एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इसी तरीके का इस्तेमाल अन्य भर्ती परीक्षाओं में भी किया गया था.</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 21:29:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नोएडा हिंसा मामला: 'हाईकोर्ट जाइए, यहां पहले ही 93000 केस लंबित'</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178831/noida-violence-case-go-to-high-court-already-93000-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/noida-1778235469797.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए और जमानत की मांग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं। शीर्ष कोर्ट ने केशव आनंद नाम के व्यक्ति की याचिका पर पुलिस अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा की एक कोर्ट ने पहले तीन महिलाओं आकृति चौधरी, मनीषा चौहान और सृष्टि गुप्ता की शर्तों के साथ पुलिस रिमांड की अनुमति दी थी। इन पर 13 अप्रैल के औद्योगिक मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जांच के दौरान उनके वकीलों को मौजूद रहने की अनुमति होगी। आकृति चौधरी और सृष्टि गुप्ता दोनों दिल्ली की रहने वाली हैं और उनकी उम्र 20 के आसपास है।चौधरी ने दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर किया है, जबकि मनीषा नोएडा की एक औद्योगिक इकाई में काम करती हैं।पुलिस ने हिरासत के लिए दायर आवेदन में कहा था कि आरोपियों के घर से अहम साक्ष्य मिलने की पूरी संभावना है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा में पिछले महीने फैक्टरी मजदूरों का विरोध प्रदर्शन वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुआ था। अधिकारियों के अनुसार, कई औद्योगिक इकाइयों के मजदूर लंबे समय से वेतन संशोधन की मांग को लेकर इकट्ठा हुए और नारेबाजी की। हालांकि, यह प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गया क्योंकि कुछ लोगों ने कथित तौर पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, पत्थर फेंके और एक वाहन में आग लगा दी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 22:22:26 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता: समीक्षा याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति और ब्याज वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकते। शीर्ष अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की समीक्षा याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एनएचएआई ने 4 फरवरी, 2025 के फैसले की समीक्षा मांगी थी। इस फैसले में कहा गया था कि 2019 का निर्णय पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा। 2019 के फैसले में एनएचएआई अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के किसानों को मुआवजा और ब्याज देने की बात थी।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174306/constitutional-guarantee-of-fair-compensation-cannot-be-diluted-review-petition"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/sc.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति और ब्याज वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकते। शीर्ष अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की समीक्षा याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एनएचएआई ने 4 फरवरी, 2025 के फैसले की समीक्षा मांगी थी। इस फैसले में कहा गया था कि 2019 का निर्णय पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा। 2019 के फैसले में एनएचएआई अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के किसानों को मुआवजा और ब्याज देने की बात थी। पीठ ने कहा कि भूस्वामियों को देय ब्याज भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार नौ फीसदी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एनएचएआई अधिनियम के पांच फीसदी की सीमा के अनुसार नहीं होगा। एनएचएआई ने दावा किया था कि वित्तीय देनदारी 29,000 करोड़ रुपये होगी। पहले यह राशि 100 करोड़ रुपये बताई गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वित्तीय देनदारी का अनुमान समीक्षा का वैध आधार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, पीठ ने कहा कि उसके पिछले निर्णयों को सीमित स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यह निर्णय के दायरे और प्रभाव की सुसंगत समझ सुनिश्चित करने के लिए है। यह निर्विवाद है कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के भूस्वामी क्षतिपूर्ति और ब्याज के हकदार हैं। ये उचित मुआवजे का हिस्सा हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 20:51:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'हरियाणा पुलिस ने 4 साल की बच्ची के रेप केस में आरोपी को बचाने की कोशिश की': सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी बनाई</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज गुरुग्राम में 4 साल की बच्ची के रेप के मामले में जांच को भटकाने के लिए हरियाणा पुलिस को कड़ी फटकार लगाई, और जांच अपने हाथ में लेने के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनाई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने अपराध की गंभीरता को कम करने की कोशिश की।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा (पाक्सो) एक्ट की धारा 6 के तहत 'गंभीर यौन हमला' के अपराध का संकेत देने वाले शुरुआती सबूत मौजूद थे, फिर भी पुलिस ने FIR सिर्फ धारा 10 के तहत 'गंभीर यौन हमला' के लिए दर्ज</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174304/haryana-police-tried-to-save-the-accused-in-the-rape"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज गुरुग्राम में 4 साल की बच्ची के रेप के मामले में जांच को भटकाने के लिए हरियाणा पुलिस को कड़ी फटकार लगाई, और जांच अपने हाथ में लेने के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनाई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने अपराध की गंभीरता को कम करने की कोशिश की।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा (पाक्सो) एक्ट की धारा 6 के तहत 'गंभीर यौन हमला' के अपराध का संकेत देने वाले शुरुआती सबूत मौजूद थे, फिर भी पुलिस ने FIR सिर्फ धारा 10 के तहत 'गंभीर यौन हमला' के लिए दर्ज की, जो कि एक कम गंभीर अपराध है।कोर्ट ने कहा, "यह एक ऐसा साफ मामला है, जिसमें पुलिस ने आरोपी को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है।"</p>
<p style="text-align:justify;">"कमिश्नर से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक, पूरी पुलिस फोर्स ने यह साबित करने की हर कोशिश की कि बच्ची के पास कोई सबूत नहीं है या उसके माता-पिता की बातों में कोई दम नहीं है। रिकॉर्ड में इस बात की कोई गुंजाइश नहीं है कि पाक्सो की धारा 6 के तहत कोई अपराध नहीं हुआ था। हालांकि, पुलिस ने FIR दर्ज की, लेकिन कुछ अज्ञात कारणों से अपराध को धारा 10 के तहत कम गंभीर बना दिया।"</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक एसआईटी का गठन किया है, जिसमें हरियाणा कैडर की आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया गया है।सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया है कि जल्द से जल्द एसआईटी को नोटिफाई किया जाए और गुरुग्राम पुलिस को गुरुवार तक जांच से जुड़े दस्तावेज एसआईटी को सौंपने का निर्देश दिया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 20:49:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Haryana: हरियाणा में बीजेपी विधायक को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई याचिका, देखें पूरी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>Haryana News: हरियाणा के जींद जिले की उचाना विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक देवेंद्र अत्री को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने वोटों की दोबारा गिनती (री-काउंटिंग) पर रोक लगाने की मांग की थी।</p>
<p><strong>32 वोटों से जीते थे देवेंद्र अत्री</strong></p>
<p>गौरतलब है कि 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में देवेंद्र अत्री ने कांग्रेस प्रत्याशी बृजेंद्र सिंह को महज 32 वोटों के अंतर से हराया था। बेहद करीबी मुकाबले के चलते चुनाव परिणाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।</p>
<p><strong>कांग्रेस प्रत्याशी ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168213/haryana-big-blow-to-bjp-mla-in-haryana-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/haryana-it-raid-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>Haryana News: हरियाणा के जींद जिले की उचाना विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक देवेंद्र अत्री को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने वोटों की दोबारा गिनती (री-काउंटिंग) पर रोक लगाने की मांग की थी।</p>
<p><strong>32 वोटों से जीते थे देवेंद्र अत्री</strong></p>
<p>गौरतलब है कि 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में देवेंद्र अत्री ने कांग्रेस प्रत्याशी बृजेंद्र सिंह को महज 32 वोटों के अंतर से हराया था। बेहद करीबी मुकाबले के चलते चुनाव परिणाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।</p>
<p><strong>कांग्रेस प्रत्याशी ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती</strong></p>
<p>चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस नेता बृजेंद्र सिंह ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर वोटों की दोबारा गिनती की मांग की थी। उन्होंने मतगणना प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका जताई थी।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट की कार्यवाही रोकने पहुंचे थे सुप्रीम कोर्ट</strong></p>
<p>हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई को रोकने के लिए देवेंद्र अत्री ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की थी। अत्री की मांग थी कि जब तक सुप्रीम कोर्ट फैसला न दे, तब तक हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई जाए।</p>
<p><strong>सुप्रीम कोर्ट ने SLP खारिज की</strong></p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने देवेंद्र अत्री की स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अब वोटों की दोबारा गिनती पर रोक लगाने का रास्ता साफ तौर पर बंद हो गया है।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट को अगली तारीख तय करने की छूट</strong></p>
<p>सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय करने के लिए स्वतंत्र हो गया है। माना जा रहा है कि जल्द ही इस याचिका पर आगे की सुनवाई हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 12:23:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Haryana: हरियाणा सरकार का बड़ा ऐलान, CET पास युवाओं को मिलेंगे 9000 रुपये प्रतिमाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p>Haryana News: हरियाणा सरकार ने राज्य के युवाओं के लिए एक अहम राहत भरी घोषणा की है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा है कि कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) पास करने के बाद भी यदि उम्मीदवार को एक साल के भीतर सरकारी नौकरी नहीं मिलती है, तो सरकार उसे दो साल तक 9,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता देगी।</p><p><strong>बेरोजगार CET पास उम्मीदवारों को मिलेगा लाभ</strong></p><p>यह योजना उन युवाओं के लिए लागू होगी, जो CET परीक्षा पास कर लेते हैं, लेकिन चयन प्रक्रिया के बावजूद समय पर नौकरी हासिल नहीं कर पाते। सरकार का उद्देश्य ऐसे उम्मीदवारों को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/165406/haryana-haryana-governments-big-announcement-cet-pass-youth-will-get"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/haryana-cet.jpg" alt=""></a><br /><p>Haryana News: हरियाणा सरकार ने राज्य के युवाओं के लिए एक अहम राहत भरी घोषणा की है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा है कि कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) पास करने के बाद भी यदि उम्मीदवार को एक साल के भीतर सरकारी नौकरी नहीं मिलती है, तो सरकार उसे दो साल तक 9,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता देगी।</p><p><strong>बेरोजगार CET पास उम्मीदवारों को मिलेगा लाभ</strong></p><p>यह योजना उन युवाओं के लिए लागू होगी, जो CET परीक्षा पास कर लेते हैं, लेकिन चयन प्रक्रिया के बावजूद समय पर नौकरी हासिल नहीं कर पाते। सरकार का उद्देश्य ऐसे उम्मीदवारों को आर्थिक सहारा देना है, ताकि वे आगे की तैयारी कर सकें और बेरोजगारी के दबाव से राहत पा सकें।</p><p><strong>ग्रुप C और D भर्तियों के लिए होती है CET परीक्षा</strong></p><p>हरियाणा में ग्रुप C और ग्रुप D की सरकारी नौकरियों की भर्ती के लिए हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (HSSC) द्वारा CET परीक्षा आयोजित की जाती है। यह परीक्षा सरकारी भर्तियों की प्रक्रिया का पहला और अनिवार्य चरण है।</p><p>मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए कहा गया, “अगर CET पास उम्मीदवार को नौकरी नहीं मिलती है, तो सरकार उसे 2 साल तक 9,000 रुपये प्रति माह देगी।”</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 07 Jan 2026 12:08:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टूटे रिश्तों को दुष्कर्म बताने की आदत चिंताजनक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अपराध की गंभीरता कम होती है।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने नाकाम या टूटे रिश्तों को दुष्कर्म या अन्य अपराध का रूप दिए जाने को परेशान करने वाली आदत बताते हुए कहा कि ऐसे मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल चिंता की बात है। ऐसे ही दुष्कर्म के एक आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर खराब रिश्ते को दुष्कर्म का जुर्म बताना न सिर्फ अपराध की गंभीरता को कम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक लगाता है और गंभीर अन्याय करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161679/the-habit-of-terming-broken-relationships-as-rape-is-worrying"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/सुप्रीम-कोर्ट1.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने नाकाम या टूटे रिश्तों को दुष्कर्म या अन्य अपराध का रूप दिए जाने को परेशान करने वाली आदत बताते हुए कहा कि ऐसे मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल चिंता की बात है। ऐसे ही दुष्कर्म के एक आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर खराब रिश्ते को दुष्कर्म का जुर्म बताना न सिर्फ अपराध की गंभीरता को कम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक लगाता है और गंभीर अन्याय करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (</span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> नवंबर) को एक वकील के खिलाफ रेप का केस खारिज कर दिया। उस पर शादी का झूठा झांसा देकर एक महिला के साथ बार-बार रेप करने का आरोप था। यह देखते हुए कि सेक्स सहमति से हुआ था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शादी के किसी झूठे वादे से प्रभावित नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट ने महिला के आरोपों को झूठा पाया और यह सहमति से बने रिश्ते के बाद में खराब होने का एक क्लासिक उदाहरण है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-11/images-(1).jpg" alt="images (1)" width="275" height="183"></img></strong></span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म का अपराध सबसे गंभीर किस्म का है और इसे सिर्फ उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहां असल में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबरदस्ती या बिना सहमति के यौन हिंसा हुई हो।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक अच्छे रिश्ते के दौरान बने शारीरिक संबंधों को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए जहां भरोसा टूटा हो और इज्जत का उल्लंघन हुआ हो। कोर्ट ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस कोर्ट ने कई मौकों पर इस परेशान करने वाली आदत पर ध्यान दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें नाकाम या टूटे हुए रिश्तों को अपराध का रंग दे दिया जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट ने कहा कि ऐसे समाज में जहां शादी का गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां यह आम बात है कि एक महिला इस विश्वास के आधार पर सेक्सुअल रिलेशनशिप के लिए सहमति दे देती है कि इससे कानूनी और सामाजिक रूप से स्वीकृत शादी होगी। ऐसे हालात में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी सहमति शर्तों पर होती है और शादी के वादे पर आधारित होती है। कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित हो जाता है कि वादा झूठा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत नीयत से किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और शादी करने का कोई असली इरादा नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सिर्फ महिला का शोषण करने के लिए था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऐसी सहमति को गलत माना जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए </span>IPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा </span>376<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत सुरक्षा मिलती है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह नियम तभी लागू किया जा सकता है जब इसके सपोर्ट में भरोसेमंद सबूत और ठोस तथ्य हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि सिर्फ आरोपों या अंदाज़ों पर।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">शीर्ष कोर्ट ने एक शख्स की अपील पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की। इस शख्स ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मार्च</span>, 2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें छत्रपति संभाजीनगर में अगस्त </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले में दुष्कर्म का आरोप पूरी तरह शिकायतकर्ता महिला के इस दावे पर टिका है कि आदमी ने शादी का झूठा भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें लगता है कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने प्रतिवादी महिला को सिर्फ शारीरिक सुख के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लंबा समय है। पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे मामलों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सही चलते रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक निकटता को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें इस बात का एहसास है कि हमारे देश में शादी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे में कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए जहां भरोसा तोड़ा गया हो और इज्जत को ठेस पहुंचाई गई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि पहले के भारतीय दंड संहिता की धारा </span>376 (<span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्कर्म के लिए सजा) का सुरक्षा का दायरा असल में परेशान लोगों के लिए सिर्फ एक औपचारिकता बनकर न रह जाए। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सिद्धांत का इस्तेमाल भरोसेमंद सबूतों और ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि बिना सबूत वाले आरोपों या नैतिक अंदाजों पर।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट ने कहा कि रिस्पॉन्डेंट नंबर-</span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> का फिजिकल इंटिमेसी का फैसला सिर्फ शादी के वादे की वजह से नहीं था। कोर्ट ने महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें कहा गया था कि “जब तक यह नहीं दिखाया जा सकता कि फिजिकल रिश्ता सिर्फ शादी के वादे की वजह से था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे फिजिकल रिश्ते से सीधा संबंध हो और उस पर किसी और बात का असर न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि गलतफहमी की वजह से सहमति खराब हुई थी।”</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि प्राथमिकी को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि पार्टियों के बीच रिश्ता असल में आपसी सहमति से बना था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जिन कामों की शिकायत की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उस समय अपनी मर्जी से बने रिश्ते के दायरे में हुए थे। प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करते हुए पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे मामलों में अभियोजन जारी रखना कोर्ट मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसा होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभियोजन के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक महिला ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी और बाद में एलिमनी/मेंटेनेंस की मांग करते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। इसी सिलसिले में वह अपीलकर्ता शख्स से मिली जो वकील है। समय के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके बीच करीबी रिश्ता बन गया। महिला का कहना था कि संबंधित व्यक्ति ने उससे शादी की इच्छा जताई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन तब शादीशुदा जीवन में परेशानियों के कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने प्रस्ताव ठुकरा दिया। बाद में महिला गर्भवर्ती हो गई। उसका गर्भपात करा दिया गया। बाद में महिला ने शादी के लिए दबाव बनाया लेकिन तब अपीलकर्ता ने इससे इंकार कर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/161679/the-habit-of-terming-broken-relationships-as-rape-is-worrying</link>
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                <pubDate>Tue, 25 Nov 2025 21:15:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'आपराधिक कानून बदला लेने का जरिया नहीं हो सकते'; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- निजी फायदे के लिए सिस्टम का दुरुपयोग न हो</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी फायदे के लिए या बदला लेने का जरिया नहीं बन सकते। कोर्ट ने उस प्रवृत्ति की निंदा की जिसमें कुछ लोग अपने निजी फायदे के लिए न्यायिक प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने गुवाहाटी के एक कारोबारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा </span>420 (<span lang="hi" xml:lang="hi">धोखाधड़ी) और धारा </span>406 (<span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसा तोड़ने का अपराध) के तहत दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए ये बातें कहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखते हुए कि हाल के वर्षों में कुछ</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161673/criminal-laws-cannot-be-a-means-of-revenge-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/सुप्रीम-कोर्ट.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी फायदे के लिए या बदला लेने का जरिया नहीं बन सकते। कोर्ट ने उस प्रवृत्ति की निंदा की जिसमें कुछ लोग अपने निजी फायदे के लिए न्यायिक प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने गुवाहाटी के एक कारोबारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा </span>420 (<span lang="hi" xml:lang="hi">धोखाधड़ी) और धारा </span>406 (<span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसा तोड़ने का अपराध) के तहत दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए ये बातें कहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखते हुए कि हाल के वर्षों में कुछ लोग अपने निजी फायदे और अपने गलत इरादों को पूरा करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट को ऐसी प्रवृत्ति के खिलाफ सतर्क रहना होगा और यह पक्का करना होगा कि हमारे समाज के ताने-बाने पर बुरा असर डालने वाले कामों को शुरू में ही खत्म कर दिया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिकायत और सबूतों को देखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कारोबारी इंदर चंद बागरी के खिलाफ धोखाधड़ी और भरोसा तोड़ने के अपराध के लिए कोई आधार नहीं बनता है और शिकायत करने वाले जगदीश प्रसाद बागरी के पास विवादित संपत्ति की सेल डीड को रद्द करने और अपने कॉन्ट्रैक्ट के अधिकारों के उल्लंघन के लिए हर्जाने का दावा करने के लिए सिविल कानून के तहत दूसरे उपाय मौजूद हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपराधिक कानून को निजी बदला लेने की कार्रवाई शुरू करने का मंच नहीं बनना चाहिए। इंदर चंद बागरी पर गलत मंशा का आरोप नहीं लगाया जा सकता इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभियोजन की ओर से उनके खिलाफ लगाए गए आरोप टिक नहीं सकते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने यह देखते हुए कि भरोसा तोड़ने के अपराध और धोखाधड़ी में अंतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धोखाधड़ी के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत या गुमराह करने वाली बात कहने के समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी शुरू से ही आपराधिक मंशा जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं भरोसा तोड़ने के अपराध में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ भरोसा तोड़ने का सबूत ही काफी है। इस तरह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसा तोड़ने के अपराध में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराधी को कानूनी तौर पर संपत्ति सौंपी जाती है और वह बेईमानी से उसका गलत इस्तेमाल करता है। दूसरी ओर धोखाधड़ी के मामले में अपराधी धोखे या बेईमानी से किसी व्यक्ति को संपत्ति देने के लिए उकसाता है। पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी स्थिति में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों अपराध एक साथ नहीं हो सकते क्योंकि दोनों एक दूसरे के उलट हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन बातों और कारणों को देखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी पक्की राय है कि अपील करने वाले-आरोपी (इंदर चंद बागरी) के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रखने से उसे बेवजह परेशान किया जाएगा क्योंकि धारा </span>406<span lang="hi" xml:lang="hi"> या </span>420<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत अपराध के लिए पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता। शिकायत करने वाले ने अपीलकर्ता के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वह इस कोर्ट के सामने उन्हें सही साबित करने में नाकाम रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में शीर्ष कोर्ट ने कारोबारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द करने से इन्कार करने वाले गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे न्यायिक प्रणाली खासकर क्रिमिनल कोर्ट पर बेवजह दबाव पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Nov 2025 21:08:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रपति-राज्यपालों के पास अटके हैं विपक्ष शासित इन राज्यों के 33 विधेयक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि राज्यपाल विधानसभा से पास हुए बिलों को अनंत काल तक अपने पास नहीं लटका सकते। अदालत ने गुरुवार को राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं कर सकती। इसी बीच विपक्षी दलों के शासित राज्यों में कितने विधेयक पेंडिंग इस पर अहम अपडेट सामने आया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जानकारी के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्षी दलों के शासन वाले चार राज्यों में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161207/33-bills-of-these-opposition-ruled-states-are-stuck-with"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/राष्ट्रपति-राज्यपालों-के-पास-अटके-हैं-विपक्ष-शासित-इन-राज्यों-के 33 विधेयक.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि राज्यपाल विधानसभा से पास हुए बिलों को अनंत काल तक अपने पास नहीं लटका सकते। अदालत ने गुरुवार को राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं कर सकती। इसी बीच विपक्षी दलों के शासित राज्यों में कितने विधेयक पेंडिंग इस पर अहम अपडेट सामने आया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जानकारी के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्षी दलों के शासन वाले चार राज्यों में कम से कम </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हैं। इन </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयकों में से </span>19<span lang="hi" xml:lang="hi"> बिल पश्चिम बंगाल विधानसभा से पारित हैं जबकि </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयक कर्नाटक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन तेलंगाना और एक विधेयक केरल विधानसभा से पारित है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वोच्च अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने कहा कि राज्य विधानसभा से पारित कम से कम </span>19<span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयक अब भी राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबित हैं। उन्होंने कहा कि जब कोई विधेयक बिना स्पष्टता के लंबित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी अहमियत खत्म हो जाती है। कर्नाटक विधानसभा से पारित कम से कम </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए लंबित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें मुसलमानों को सिविल कार्यों में ठेके देने के लिए चार फीसदी आरक्षण से जुड़ा विधेयक भी शामिल है। सरकारी सूत्रों ने इस बात का जिक्र किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक के राज्यपाल के पास कोई विधेयक लंबित नहीं है। बताया जा रहा है कि तेलंगाना में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण विधेयक समेत तीन विधेयक लंबित है। कांग्रेस सरकार ने चुनावी वादा पूरा करते हुए </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi"> सितंबर को एक आदेश जारी किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके तहत स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को </span>42<span lang="hi" xml:lang="hi"> फीसदी आरक्षण दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">तमिलनाडु के </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलों को जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने </span>8 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डीम्ड एसेंट</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">दे दी थी। ये बिल अब कानून बन चुके हैं और गजट में प्रकाशित हो चुके हैं। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पश्चिम बंगाल के विधानसभा स्पीकर बिमान बनर्जी ने कहा है कि जब कोई बिल बिना किसी स्पष्टता के अटका रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका महत्व खत्म हो जाता है। तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके पार्टी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ एक राय दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई फैसला नहीं। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बाध्यकारी नहीं है और अदालतों में किसी भी मामले पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Nov 2025 21:13:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली को किया बरी, 18 साल बाद रिहाई का रास्ता साफ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">निठारी हत्याकांड के दोषी ठहराए गए सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने कोली की क्यूरेटिव याचिका स्वीकार कर ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद अब वह जेल से बाहर आ सकेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाकी सभी मामलों में वह पहले ही बरी हो चुके हैं। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने कोली की याचिका पर खुले कोर्ट में सुनवाई की थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159800/supreme-court-acquitted-nithari-case-convict-surendra-koli-paving-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/सुप्रीम-कोर्ट-ने-निठारी-कांड-के-दोषी-सुरेंद्र-कोली-को-किया-बरी,-18-साल-बाद-रिहाई-का-रास्ता-साफ.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">निठारी हत्याकांड के दोषी ठहराए गए सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने कोली की क्यूरेटिव याचिका स्वीकार कर ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद अब वह जेल से बाहर आ सकेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाकी सभी मामलों में वह पहले ही बरी हो चुके हैं। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने कोली की याचिका पर खुले कोर्ट में सुनवाई की थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के </span>2011<span lang="hi" xml:lang="hi"> के फैसले के खिलाफ कोली द्वारा दायर सुधारात्मक याचिका को स्वीकार कर लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें एक मामले में उसकी दोषसिद्धि की पुष्टि की गई थी। कोली ने बारह अन्य मामलों में बाद में बरी होने के आधार पर सुधारात्मक याचिका की मांग की थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस नाथ ने आदेश सुनाते हुए कहा कि कोली को आरोपों से बरी किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के </span>15.02.0211<span lang="hi" xml:lang="hi"> के फैसले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>28.10.2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> के आदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनको वापस ले लिया गया और खारिज कर दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष सुरेंद्र कोली के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने माना कि जांच के दौरान कई गंभीर प्रक्रियागत खामियां रहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके चलते दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उम्रकैद या फांसी नहीं दी जा सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक कि आरोप बिना किसी संदेह के साबित न हों।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोली की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने सेशन कोर्ट के </span>13.02.2009<span lang="hi" xml:lang="hi"> के निर्णय और </span>11.10.2009<span lang="hi" xml:lang="hi"> का निर्णय रद्द कर दिया। कोली को निर्देश दिया गया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल रिहा कर दिया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुरेंद्र कोली ने सुप्रीम कोर्ट में निठारी हत्याकांड के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए सुधारात्मक याचिका दायर की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें तर्क दिया गया कि उसे दोषी ठहराने के लिए जिन साक्ष्यों का इस्तेमाल किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे बाद में उन अन्य मामलों में भी अविश्वसनीय पाए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें उसे बरी कर दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुधारात्मक याचिका पर फैसला सुरक्षित रखते हुए पीठ ने टिप्पणी की थी कि यदि दोषसिद्धि बरकरार रखी जाती है तो एक असामान्य स्थिति उत्पन्न हो जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसे शेष मामलों में बरी कर दिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उन सभी में साक्ष्य एक जैसे थे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निठारी हत्याकांड के अन्य मामलों में उसे और सह-अभियुक्त मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi"> अपीलों को खारिज करने के बाद उसके खिलाफ यह अंतिम दोषसिद्धि है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुरेंद्र कोली </span>2006<span lang="hi" xml:lang="hi"> के नोएडा निठारी कांड में मुख्य आरोपी थे। उस वक्त निठारी गांव में बच्चों के गायब होने और फिर उनके शवों के मिलने से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी। जांच एजेंसियों ने कोली और उनके नियोक्ता मोनिंदर सिंह पंधेर को गिरफ्तार किया था। कोली को कई मामलों में दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा भी सुनाई गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">निठारी गांव में रहने वाले बच्चे वर्ष </span>2004<span lang="hi" xml:lang="hi"> से लापता हो रहे थे। बच्चों के लापता होने की जानकारी उनके परिजन थाना सेक्टर-</span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> पुलिस से लेकर बड़े पुलिस अधिकारियों तक  से कर रहे थे। लेकिन पुलिस गुमशुदगी लिखने के बजाए उन्हें दुत्कार कर भगा देती थी। गायब होने वाले बच्चों में अधिकतर लड़कियां थीं। पायल नाम की एक युवती भी निठारी की पानी की टंकी के पास से लापता हो गई। उसके पिता सेक्टर-</span>19<span lang="hi" xml:lang="hi"> में रह रहे नंदलाल ने डी-</span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> सेक्टर-</span>31<span lang="hi" xml:lang="hi"> कोठी के मालिक व जेसीबी के बड़े डिस्ट्रीब्यूटर मोनिंदर सिंह पंधेर पर बेटी के अपहरण का शक जाहिर करते हुए पुलिस से शिकायत की।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस ने कार्रवाई के बजाय नंदलाल को ही बेटी से देह व्यापार करने का आरोप लगाते हुए भगा दिया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने मामले की रिपोर्ट दर्ज करने के निर्देश देकर सीओ स्तर के अधिकारी को प्रगति आख्या के साथ कोर्ट में बुलाया। इसके बाद उसी साल </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर को अधिकारियों ने कोठी मालिक मोनिंदर सिंह व नौकर सुरेन्द्र कोली से पूछताछ की लेकिन रात में ही दबाव के चलते उन्हें छोड़ दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Nov 2025 22:06:58 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में ग्रीन पटाखे बनाने की मंजूरी, बिक्री पर कही ये बात</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>दिल्ली-एनसीआर </strong>में पटाखों (ग्रीन) के निर्माण को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नरमी दिखाई है. सर्वोच्च अदालत ने एनसीआर क्षेत्र में ग्रीन पटाखों के निर्माण की मंजूरी दी है. हालांकि यह साफ कर दिया है कि जबतक यह अदालत अनुमति नहीं देगी तब तक निर्मित किए गए पटाखों की बिक्री नही की जा सकती है. केंद्र सरकार से अदालत ने कहा है कि वह सभी पक्षों से बात कर दिल्ली-एनसीआर में इस मसले पर समाधान निकाले।</p>
<p><br />सीजेआई बीआर गवई के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि उल्लंघन करने वाले लोगों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाने चाहिए. हम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/155977/supreme-court-said-this-on-sale-of-green-firecrackers-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/supream-court.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>दिल्ली-एनसीआर </strong>में पटाखों (ग्रीन) के निर्माण को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नरमी दिखाई है. सर्वोच्च अदालत ने एनसीआर क्षेत्र में ग्रीन पटाखों के निर्माण की मंजूरी दी है. हालांकि यह साफ कर दिया है कि जबतक यह अदालत अनुमति नहीं देगी तब तक निर्मित किए गए पटाखों की बिक्री नही की जा सकती है. केंद्र सरकार से अदालत ने कहा है कि वह सभी पक्षों से बात कर दिल्ली-एनसीआर में इस मसले पर समाधान निकाले।</p>
<p><br />सीजेआई बीआर गवई के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि उल्लंघन करने वाले लोगों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाने चाहिए. हम अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से अनुरोध करते हैं कि वे सभी हितधारकों को साथ लेकर एक व्यावहारिक समाधान लेकर आएँ जिसे सभी स्वीकार करें<strong>।</strong><br />केंद्र की तरफ से पेश एडीशनल सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने 10 दिन दिये जाने की मांग की, जिस पर सुनवाई की अगली तारीख 8 अक्टूबर तय कर दी गई।</p>
<p><strong>सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध पर कही ये बात</strong><br />सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि यह स्पष्ट किया गया है कि पूर्ण प्रतिबंध के आदेश के बावजूद, प्रतिबंध लागू नहीं हो सका. साथ ही आदेश में दर्ज किया कि बिहार राज्य की तरह, जहाँ खनन पर प्रतिबंध था, वहां भी अवैध खनन माफियाओं को बढ़ावा मिला<strong>।</strong><br />इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है. इसलिए ASG को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को सूचित करना चाहिए कि सभी हितधारकों को शामिल किया जाए।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उन पटाखा निर्माताओं को अनुमति दी जाती है, जिनके पास PESO और NEERI द्वारा प्रमाणित हरित पटाखे हैं. हालांकि यह निर्माता द्वारा इस न्यायालय के समक्ष यह वचनबद्धता प्रस्तुत करने के अधीन होगा कि निषिद्ध क्षेत्रों में कोई बिक्री नहीं की जाएगी।</p>
<p>याद रहे कि वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के चलते दिल्ली में पटाखों के निर्माण, भंडारण और बिक्री पर पूर्ण पाबंदी है. ऐसी ही रोक एनसीआर के दूसरे शहरों के लिए यूपी और हरियाणा सरकार ने लगाई है.</p>
<p><strong>याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से की थी ये मांग</strong><br />फायरवर्क ट्रेडर्स एसोसिएशन, इंडिक कलेक्टिव और हरियाणा फायरवर्क मैन्युफैक्चरर्स नाम की संस्थाओं ने इसे चुनौती दी है. उनकी दलील है कि कई पटाखा कारोबारियों के पास 2027-28 तक का वैध लाइसेंस था, लेकिन अदालत के पिछले आदेशों के कारण उन्हें रद्द किया जा रहा है.</p>
<p>याचिकाकर्ताओं ने यह मांग भी रखी है कि उन्हें ग्रीन पटाखों के उत्पादन और बिक्री की अनुमति दी जाए. इसके लिए जो भी मानक तय किए जाएंगे, वह उसका पालन करेंगे.</p>
<p>याद रहे कि गत 12 सितंबर को पिछली सुनवाई में सीजेआई ने कहा था कि केवल दिल्ली के लिए ही पटाखों पर रोक का आदेश क्यों है? कोर्ट ने कहा था कि पूरे देश के लिए एक समान नीति होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने पटाखा कारोबारियों की याचिका पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से जवाब दाखिल करने को कहा था.</p>
<p><strong>पेश हुई सीएक्यूएम की रिपोर्ट </strong><br />आज सीएक्यूएम की रिपोर्ट बेंच के समक्ष पेश की गई. इसमें बताया गया था कि नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) ने अदालत के पुराने आदेशों के आधार पर कम प्रदूषण करने वाले ग्रीन पटाखों का फॉर्मूला बनाया है.</p>
<p>पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (पीईएसओ) ने इस फॉर्मूले का पालन करने वाले उत्पादकों को लाइसेंस दिया है. लाइसेंस प्राप्त उत्पादकों को पिछले साल क्यूआर कोड दिए गए थे, लेकिन यह देखा गया कि इसका दुरुपयोग हुआ है. क्यूआर कोड दूसरे निर्माताओं को भी बेचा गया.</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 22:03:34 +0530</pubDate>
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