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                <title>India news - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वंदे मातरम् पर विवाद: राष्ट्रगीत के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती राजनीत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185453/controversy-over-vande-mataram-politics-cannot-be-bigger-than-respect"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का संकेत दिया। इस आरोप के आधार पर कर्नाटक के मंगलुरु में भाजपा नेता विकास पुत्तूर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई नहीं होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह मामला अभी आरोप और जांच के स्तर पर है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। कांग्रेस की ओर से इस पूरे आरोप को खारिज किया गया है। विवादित दृश्य को लेकर कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी मंच पर लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी लाने का संकेत दे रही थीं, न कि वंदे मातरम् रोकने का। दूसरी ओर भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ते हुए राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लेकिन इस विवाद का एक बड़ा पक्ष केवल 15 अगस्त की घटना तक सीमित नहीं है। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और देश की राजनीति में बहस का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए आज जब राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह समझना भी जरूरी है कि अतीत में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के संबंध में क्या रुख अपनाया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि समय के साथ इसके कुछ अंशों और धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम लीग तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई। 1930 के दशक में यह विषय कांग्रेस के सामने भी आया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1937 में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू अभिलेखागार में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार, 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में थोपने का आरोप लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस को लिखे पत्र में वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ हिस्सों को लेकर चर्चा की। नेहरू ने लिखा कि गीत की ‘आनंदमठ’ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर पैदा हुआ विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। यानी इतिहास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी गीत को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल पर विचार किया और 1937 में यह निर्णय सामने आया कि गीत के उन शुरुआती अंशों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर व्यापक सहमति थी। नेहरू के अपने वक्तव्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने इस विषय पर लंबे विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से आज की राजनीतिक बहस को एक ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस और उसके समर्थक इसे उस समय की सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बताते हैं। इतिहास में दर्ज तथ्यों को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा। इसलिए वंदे मातरम् को केवल एक राजनीतिक दल या विचारधारा से जोड़कर देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रगीत का सम्मान किसी सरकार, पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का हिस्सा है जिसमें असंख्य लोगों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि इसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की अवमानना का आरोप गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आरोप को प्रमाण मान लेने के बजाय निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाती रही है। इसके समर्थन में वह कांग्रेस नेताओं के पुराने बयानों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए 2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ‘सैफ्रन टेररिज्म’ यानी ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने बाद में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के ‘हिंदू आतंकवाद’ संबंधी बयान पर भी विवाद हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने स्वयं को उस शब्दावली से अलग करते हुए कहा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं से यह जरूर स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के बयान समय-समय पर बड़े राजनीतिक विवादों का कारण बने हैं। हालांकि किसी नेता के बयान को पूरे दल की आधिकारिक विचारधारा मान लेना भी उचित नहीं है। राजनीति में बयान आते हैं, उन पर विवाद होता है और कई बार स्वयं दल को सफाई भी देनी पड़ती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् पर वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने की प्रवृत्ति कब समाप्त होगी। भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक दलीलें हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए इससे बड़ा प्रश्न राष्ट्रीय सम्मान का है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के मामले में भी यदि कोई आपत्तिजनक व्यवहार हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप गलत हैं तो यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में न तो किसी नेता को केवल पद के कारण कानून से ऊपर माना जा सकता है और न ही किसी राजनीतिक विरोधी पर बिना प्रमाण आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है।कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी राजनीतिक दल देशभक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं रखता। भारत की आजादी किसी एक परिवार, पार्टी या संगठन की देन नहीं है। करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, बलिदान और त्याग से देश स्वतंत्र हुआ। इसलिए ‘हमने देश आजाद कराया’ जैसी राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठना जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 1937 के निर्णयों और उसके पीछे की परिस्थितियों पर राजनीतिक बहस भी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की आलोचना भी लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम उद्देश्य किसी दल को देशद्रोही साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम् को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर देश की नई पीढ़ी को उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। जो गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभावना जगाता रहा, उसके सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी देश के लोकतांत्रिक संस्कारों के लिए उचित नहीं हो सकती। लेकिन सम्मान के साथ न्याय और तथ्य भी जरूरी हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज शिकायत अब जांच का विषय है। पुलिस और जरूरत पड़ने पर न्यायपालिका यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्या करते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रगीत किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;">        *कांतिलाल मांडोत*</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="WhmR8e"></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 20:08:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>राजनीति में जनता के असली मुद्दे</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की आलोचना की जा सकती है और विपक्ष सरकार के फैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा सकता है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह सरकार को भी अपने निर्णयों का पक्ष रखने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ने लगती है। आज भारतीय राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185148/real-issues-of-public-in-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas5.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की आलोचना की जा सकती है और विपक्ष सरकार के फैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा सकता है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह सरकार को भी अपने निर्णयों का पक्ष रखने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ने लगती है। आज भारतीय राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों को उतनी प्राथमिकता दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी प्राथमिकता वे एक-दूसरे पर आरोप लगाने को देते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनावी राजनीति में आरोप लगना कोई नई बात नहीं है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक बहस का अधिकांश हिस्सा इस बात पर खर्च होने लगे कि किस नेता ने किस पर क्या आरोप लगाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसने किस बयान का जवाब दिया और किसने किसे कठघरे में खड़ा किया। ऐसे वातावरण में महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसानों की आय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे कारोबार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून-व्यवस्था और न्याय में देरी जैसे मुद्दे अक्सर राजनीतिक शोर में दब जाते हैं। एक आम नागरिक के लिए राजनीति का महत्व संसद या विधानसभा की बहसों से कहीं अधिक उसके रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देता है। परिवार का बजट बिगड़ता है तो उसे महंगाई की चिंता होती है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा नौकरी की तलाश करता है तो उसके लिए रोजगार सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। किसान को फसल का उचित मूल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंचाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौसम और बाजार की चिंता रहती है। व्यापारी के लिए कारोबार की लागत और नियमों की सरलता महत्वपूर्ण होती है। गरीब परिवार के लिए बेहतर सरकारी अस्पताल और स्कूल किसी भी राजनीतिक भाषण से अधिक मायने रखते हैं। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या उनकी राजनीतिक भाषा जनता की इन समस्याओं को पर्याप्त स्थान दे रही है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या चुनावी घोषणाओं के बाद भी उन वादों की लगातार समीक्षा होती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या संसद और विधानसभाओं में उन विषयों पर उतनी गंभीर चर्चा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी राजनीतिक आरोपों पर</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जवाब संतोषजनक नहीं है तो यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। आरोप जरूरी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रमाण और समाधान उससे भी जरूरी विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। यदि किसी सरकारी योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति या निर्णय में खामी दिखाई देती है तो विपक्ष को उसे सामने लाना चाहिए। भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक लापरवाही या किसी गंभीर अनियमितता का संदेह हो तो जांच की मांग भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन आरोप और प्रमाण में अंतर होता है। राजनीति में किसी आरोप को बार-बार दोहराना उसे स्वतः सत्य नहीं बना देता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोपों की जांच संस्थाओं को करनी होती है और दोष या निर्दोष होने का फैसला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। इसी तरह सरकार को भी विपक्ष के हर सवाल को राजनीतिक षड्यंत्र बताकर खारिज करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र में स्वस्थ व्यवस्था वही होगी जहां आरोप के साथ प्रमाण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोध के साथ वैकल्पिक नीति और आलोचना के साथ समाधान प्रस्तुत किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसद केवल राजनीतिक मुकाबले का मंच नहीं</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी मंच है। वहां सरकार की नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानूनों की समीक्षा होनी चाहिए और जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। संसद में राजनीतिक असहमति होना जरूरी है। लेकिन असहमति और गतिरोध में फर्क है। सरकार यदि विपक्ष की बात नहीं सुनती तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। दूसरी ओर विपक्ष यदि हर विषय को विरोध का अवसर बना दे और चर्चा की संभावना ही समाप्त कर दे तो उससे भी जनता का नुकसान होता है। जनता ने अपने प्रतिनिधियों को केवल नारे लगाने के लिए नहीं चुना है। उनसे अपेक्षा है कि वे कानून बनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की समीक्षा करें और जनता की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाएं। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सदन में बिताया गया समय केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष की जीत-हार तय नहीं करता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका सीधा संबंध देश के करोड़ों नागरिकों के भविष्य से होता है। भारत दुनिया की बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। ऐसे में रोजगार का सवाल केवल आर्थिक मुद्दा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता का भी विषय है। हर साल बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए परीक्षा की पारदर्शिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में राजनीतिक बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि किस सरकार ने कितनी नौकरियां देने का दावा किया। असली सवाल यह होना चाहिए कि स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार कितने पैदा हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवाओं की आय कितनी बढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी क्षेत्र में अवसर कैसे बढ़ेंगे और कौशल प्रशिक्षण को वास्तविक रोजगार से कैसे जोड़ा जाएगा। यदि राजनीतिक दल इस विषय पर ठोस और मापने योग्य योजनाएं सामने रखें तो यह लोकतांत्रिक बहस को एक नई दिशा दे सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 17:13:23 +0530</pubDate>
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                <title>छात्रों को प्रधानमंत्री की माफी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन छात्रों को माफ कर दिया है जिन्होंने जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया था। यह एक बहुत बड़ी बात है कि देश के प्रधानमंत्री पर जिन छात्रों ने गन्दी गन्दी गलियों का प्रयोग किया हो और उन्हें माफ़ कर दिया जाये। शायद प्रधानमंत्री ने उन्हें सुधरने का एक मौका दिया है। सार्वजनिक स्थान पर कैमरे के सामने इस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग दंडनीय है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस तरह की भाषा को सहन नहीं किया जा सकता है। प्रशासन की तरफ़ से इस तरह के छात्रों की पहचान करके उन पर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184455/prime-ministers-apology-to-students"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन छात्रों को माफ कर दिया है जिन्होंने जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया था। यह एक बहुत बड़ी बात है कि देश के प्रधानमंत्री पर जिन छात्रों ने गन्दी गन्दी गलियों का प्रयोग किया हो और उन्हें माफ़ कर दिया जाये। शायद प्रधानमंत्री ने उन्हें सुधरने का एक मौका दिया है। सार्वजनिक स्थान पर कैमरे के सामने इस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग दंडनीय है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस तरह की भाषा को सहन नहीं किया जा सकता है। प्रशासन की तरफ़ से इस तरह के छात्रों की पहचान करके उन पर कार्यवाही करने की तैयारी चल रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी बीच सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक वीडियो आता है जिसमें वह कहते हैं कि मैं इन छात्रों पर कार्यवाही करने के पक्ष में नहीं हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इन्हें एक बार सुधरने का मौका देता हूं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो में कहा कि ये बचपन है और बचपन में गलतियां हो जाती हैं। जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर हुए छात्र आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इस घटना ने देशभर में तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी। एक ओर कई लोगों ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर यह तर्क दिया गया कि युवाओं का आक्रोश परीक्षा व्यवस्था में लगातार हो रही गड़बड़ियों का परिणाम है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा संदेश दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे छात्रों को कठोर दंड देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने उन्हें "भटके हुए बच्चे" बताते हुए समाज से भी क्षमा और संवेदनशीलता का व्यवहार अपनाने की अपील की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री का यह रुख केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद यदि सरकार प्रतिशोध की भावना से बचते हुए संवाद का रास्ता चुनती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत भी माना जा सकता है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी स्पष्ट है कि क्षमा का अर्थ अभद्र भाषा या हिंसक व्यवहार को उचित ठहराना नहीं है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना कि उसकी मर्यादा बनाए रखना। यदि आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी वैध मांगें भी कमजोर पड़ सकती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे प्रकरण में न्यायपालिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचने की बात कही और जिन छात्रों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें राहत देने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार जांच और आवश्यक प्रक्रिया जारी रह सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रधानमंत्री का यह कदम विपक्ष की उस आलोचना का जवाब भी माना जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सरकार पर छात्रों के प्रति कठोर रवैया अपनाने के आरोप लगाए जा रहे थे। वहीं सरकार समर्थकों का मानना है कि क्षमा का संदेश देकर प्रधानमंत्री ने यह दिखाया कि वे युवाओं को विरोधी नहीं बल्कि देश का भविष्य मानते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे घटनाक्रम से छात्रों और छात्र संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है। लोकतांत्रिक आंदोलन तभी प्रभावी बनते हैं जब वे अनुशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथ्यों और मर्यादा के साथ आगे बढ़ें। अपशब्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा या व्यक्तिगत हमले किसी भी जनआंदोलन की नैतिक शक्ति को कम कर देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीट पेपर लीक जैसे मामलों ने लाखों छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाया है। ऐसे में सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल आंदोलनों को नियंत्रित करना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना भी है। यदि सुधार लागू होते हैं और भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी इस पूरे आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य पूरा माना जाएगा। अंततः यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सीख है। सरकार को आलोचना सुनने का धैर्य रखना चाहिए और नागरिकों को विरोध की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। क्षमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और सुधार—यदि ये तीनों साथ चलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकतंत्र और अधिक मजबूत बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान हर परिस्थिति में बना रहे। प्रोटेस्ट होते रहते हैं लेकिन इस तरह की अभद्र भाषा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह इन आंदोलनकारी छात्रों के लिए एक सबक है जिसको सीखना बहुत जरूरी है। हम जिस समाज में रहते हैं वहां इस तरह की अभद्र भाषा का कोई स्थान नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए आगे से ऐसा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 19:55:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख्यधारा की ओर लौटते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184267/steps-back-towards-mainstream"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1200-675-27246097-thumbnail-16x9-naxal-aspera.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का संकेत भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वालों में एक रीजनल कमेटी सदस्य, दो सब-जोनल कमेटी सदस्य, तीन एरिया कमेटी सदस्य, छह पार्टी सदस्य तथा चार दस्ता सदस्य शामिल हैं। इन सभी ने पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष हथियार डालकर हिंसा का रास्ता छोड़ने की घोषणा की। पुलिस के अनुसार अधिकांश नक्सली पश्चिमी सिंहभूम के कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में सक्रिय थे जबकि दो सदस्य लातेहार क्षेत्र में सक्रिय रहे। यह सभी माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं मिसिर बेसरा उर्फ सागर  तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल के नेटवर्क से जुड़े हुए थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल विरोधी अभियानों ने संगठन की कमर तोड़ दी है। लगातार हो रही मुठभेड़ों, गिरफ्तारी और विकास कार्यों के कारण संगठन का जनाधार कमजोर हुआ है। दूसरी ओर संगठन के भीतर शोषण, संसाधनों की कमी, सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और भविष्य की अनिश्चितता ने भी कई नक्सलियों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार की पुनर्वास नीति उन्हें सम्मानजनक जीवन और रोजगार का अवसर उपलब्ध करा रही है, जिससे उनका भरोसा बढ़ा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को राज्य सरकार की नीति के तहत आर्थिक सहायता, आवास, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा समाज की मुख्यधारा में पुनर्वास की सुविधा दी जाएगी। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप राहत भी दी जाती है। यही कारण है कि अब कई नक्सली संगठन छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने का निर्णय ले रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 93 नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसी अवधि में 45 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है जबकि सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में 22 नक्सली मारे गए हैं। ताजा आत्मसमर्पण के बाद इस वर्ष मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या बढ़कर 61 हो गई है। यह दर्शाता है कि सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि पुनर्वास के माध्यम से स्थायी समाधान की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यदि पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा विभिन्न राज्यों की रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 और वर्ष 2026 के दौरान देशभर में लगभग 1,100 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता चुना है। इनमें सबसे अधिक आत्मसमर्पण छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना में हुए हैं। अकेले झारखंड में भी पिछले दो वर्षों के दौरान सौ से अधिक नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं। यह संख्या बताती है कि माओवादी संगठन के भीतर लगातार असंतोष बढ़ रहा है और उसकी भर्ती तथा संचालन क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2025 में घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव लगभग समाप्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने संयुक्त अभियान चलाए। आधुनिक तकनीक, ड्रोन, बेहतर खुफिया तंत्र, विशेष बलों की तैनाती, सड़कों का निर्माण, मोबाइल नेटवर्क का विस्तार और विकास योजनाओं को तेजी से लागू किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन इलाकों में कभी माओवादी संगठन का मजबूत प्रभाव था वहां अब सरकारी योजनाएं पहुंच रही हैं और स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पेयजल और रोजगार की सुविधाएं पहुंची हैं वहां नक्सलवाद स्वतः कमजोर पड़ा है। आदिवासी युवाओं को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिलने से वे हिंसा के रास्ते से दूर हो रहे हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में पूर्व नक्सली सामान्य जीवन अपनाकर खेती, व्यवसाय, नौकरी और अन्य कार्यों से जुड़ रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र तथा झारखंड के कुछ वन क्षेत्रों में माओवादी संगठन की सीमित मौजूदगी बनी हुई है। संगठन के शीर्ष नेता अभी भी नए सदस्यों की भर्ती और गतिविधियों को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए सुरक्षा बलों की सतर्कता और विकास कार्यों की निरंतरता दोनों आवश्यक हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड में हुए इस ताजा आत्मसमर्पण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हिंसा का रास्ता अंततः विनाश की ओर ले जाता है जबकि लोकतंत्र और विकास का रास्ता सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। जो लोग कभी बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने का सपना देखते थे, वे आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर नए जीवन की शुरुआत करना चाहते हैं। यह परिवर्तन केवल सरकार की सफलता नहीं बल्कि उन परिवारों की भी जीत है जो वर्षों से अपने बच्चों को हिंसा से दूर देखना चाहते थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब बंदूक की जगह शिक्षा होगी, बारूद की जगह विकास होगा और भय की जगह विश्वास का वातावरण बनेगा। झारखंड में लगातार बढ़ते आत्मसमर्पण इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। यदि सुरक्षा अभियान, पुनर्वास नीति और विकास कार्य इसी गति से आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की पहचान हिंसा से नहीं बल्कि विकास, शिक्षा और समृद्धि से होगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और देश के लिए सबसे सकारात्मक संदेश होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/184267/steps-back-towards-mainstream</link>
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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:45:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता की नई कसौटी</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ahR" style="text-align:justify;">भारत की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली केवल योग्य अभ्यर्थियों के चयन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अवसर, सामाजिक न्याय और योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। करोड़ों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम, आर्थिक सीमाओं और मानसिक दबाव के बीच इस विश्वास के साथ तैयारी करते हैं कि उनकी सफलता का निर्धारण केवल उनकी प्रतिभा और मेहनत से होगा। यही विश्वास किसी भी परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी पूँजी है। जब प्रश्नपत्र लीक, संगठित नकल, फर्जी अभ्यर्थी, डिजिटल हैकिंग अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तब प्रभावित केवल एक परीक्षा नहीं होती, बल्कि पूरी चयन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184265/new-test-of-credibility-of-examination-system"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/jsfeabiq5bjf20hesscx.png" alt=""></a><br /><div class="ahR" style="text-align:justify;">भारत की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली केवल योग्य अभ्यर्थियों के चयन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अवसर, सामाजिक न्याय और योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। करोड़ों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम, आर्थिक सीमाओं और मानसिक दबाव के बीच इस विश्वास के साथ तैयारी करते हैं कि उनकी सफलता का निर्धारण केवल उनकी प्रतिभा और मेहनत से होगा। यही विश्वास किसी भी परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी पूँजी है। जब प्रश्नपत्र लीक, संगठित नकल, फर्जी अभ्यर्थी, डिजिटल हैकिंग अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तब प्रभावित केवल एक परीक्षा नहीं होती, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। ऐसे में सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम संबंधी कानून में प्रस्तावित संशोधन केवल विधायी परिवर्तन नहीं, बल्कि उस विश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता का आधार होता है।<br /><br />बीते वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने यह स्पष्ट कर दिया कि परीक्षा अपराध अब व्यक्तिगत स्तर की घटनाएँ नहीं रहे। इनका स्वरूप संगठित नेटवर्क, आर्थिक लाभ और तकनीकी संसाधनों से संचालित अपराधों में बदल चुका है। प्रश्नपत्र लीक करने वाले गिरोह, डिजिटल संचार के माध्यम से सूचनाओं का अवैध आदान-प्रदान, अंदरूनी मिलीभगत और साइबर सुरक्षा की कमजोरियाँ मिलकर ऐसी चुनौती उत्पन्न कर रही हैं जिसका प्रभाव लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ता है। वर्षों की तैयारी, परिवार की बचत और युवाओं की आकांक्षाएँ एक क्षण में संदेह के घेरे में आ जाती हैं। सबसे अधिक पीड़ा उस विद्यार्थी को होती है जिसने ईमानदारी और अनुशासन के साथ तैयारी की, जबकि अनुचित साधनों का सहारा लेने वाले लोग व्यवस्था की कमियों का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। यही स्थिति युवाओं के मन में संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर अविश्वास उत्पन्न करती है।<br /><br />प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि परीक्षा अपराधों को साधारण प्रशासनिक त्रुटि के बजाय गंभीर आर्थिक और संगठित अपराध की दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है। कठोर दंड, समयबद्ध जांच, विशेष न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे अपराधों की संभावना को कम करना भी है। यदि किसी मामले की जांच वर्षों तक लंबित रहती है, तो कानून का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। इसके विपरीत समयबद्ध जांच और शीघ्र न्याय न केवल दोषियों को दंडित करता है, बल्कि ईमानदार अभ्यर्थियों का विश्वास भी बनाए रखता है। किसी भी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि अनियमितता सामने आने पर संस्थाएँ कितनी तेजी, निष्पक्षता और पारदर्शिता से प्रतिक्रिया देती हैं।<br /><br />फिर भी केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं होंगे। किसी भी अपराध की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय उसकी संभावना को न्यूनतम करना है। प्रश्नपत्र निर्माण, मुद्रण, सुरक्षित भंडारण, डिजिटल एन्क्रिप्शन, परिवहन, परीक्षा केंद्रों तक वितरण और उत्तरपुस्तिकाओं के प्रबंधन तक प्रत्येक चरण में बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है। आधुनिक साइबर अपराधों का मुकाबला पारंपरिक प्रशासनिक उपायों से नहीं किया जा सकता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, ब्लॉकचेन जैसी सुरक्षित तकनीक, डिजिटल ट्रैकिंग, बहुस्तरीय प्रमाणीकरण और स्वतंत्र साइबर ऑडिट को परीक्षा प्रणाली का नियमित हिस्सा बनाना समय की माँग है। तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की संरक्षक भी बन सकती है।<br /><br />इस पूरे विमर्श का एक ऐसा पक्ष भी है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, वह है संस्थागत उत्तरदायित्व। जब भी कोई परीक्षा विवाद सामने आता है, ध्यान प्रायः बाहरी अपराधियों पर केंद्रित हो जाता है, जबकि कई बार प्रशासनिक शिथिलता, अपर्याप्त निगरानी, संविदा आधारित असुरक्षित व्यवस्थाएँ और आंतरिक नियंत्रण की कमी भी उतनी ही जिम्मेदार होती हैं। यदि किसी परीक्षा में गंभीर अनियमितता सिद्ध होती है, तो संबंधित अधिकारियों, सेवा प्रदाताओं और संस्थागत व्यवस्थाओं की स्वतंत्र समीक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए। जवाबदेही केवल दंड का प्रश्न नहीं, बल्कि भविष्य में सुधार की आधारशिला है। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक स्तर पर उत्तरदायित्व स्पष्ट हो, वही दीर्घकालिक विश्वास अर्जित कर सकती है।<br /><br />इसी प्रकार सूचना प्रबंधन भी परीक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। परीक्षा स्थगित होने, निरस्त होने अथवा जांच प्रारंभ होने की स्थिति में अस्पष्टता और अफवाहें विद्यार्थियों की चिंता कई गुना बढ़ा देती हैं। इसलिए पारदर्शी संवाद, नियमित आधिकारिक सूचना, समयबद्ध स्पष्टीकरण और डिजिटल माध्यमों का प्रभावी उपयोग अब सुशासन की अनिवार्य शर्त बन चुके हैं। विश्वास केवल निष्पक्ष परीक्षा से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और स्पष्ट संवाद से भी निर्मित होता है।<br /><br />परीक्षा सुधार की चर्चा केवल प्रश्नपत्रों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती। इसका सीधा संबंध शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार की संरचना और युवाओं की आकांक्षाओं से भी है। आज सीमित रिक्तियों के लिए लाखों अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस असंतुलन ने प्रतियोगी परीक्षाओं को अत्यधिक महत्व दे दिया है, जिसके कारण कोचिंग उद्योग का विस्तार हुआ और सफलता को केवल एक परीक्षा के परिणाम से जोड़कर देखा जाने लगा। यह प्रवृत्ति शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित करती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, कौशल आधारित पाठ्यक्रम, शोध संस्कृति और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण को सुदृढ़ किए बिना परीक्षा प्रणाली पर बढ़ते दबाव को कम नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को विविध अवसर उपलब्ध कराएगी, तो प्रतियोगी परीक्षाओं पर अस्वाभाविक निर्भरता स्वतः घटेगी।<br /><br />तकनीकी आधुनिकीकरण भी अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। प्रश्नपत्रों की डिजिटल ट्रैकिंग, सुरक्षित एन्क्रिप्शन, बायोमेट्रिक सत्यापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी और स्वतंत्र साइबर सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएँ परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ा सकती हैं। इसके साथ ही प्रत्येक परीक्षा के बाद सुरक्षा समीक्षा, जोखिम विश्लेषण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व रिपोर्ट जारी करने की परंपरा विकसित की जानी चाहिए। इससे केवल अनियमितताओं की पहचान ही नहीं होगी, बल्कि भविष्य के लिए सुधारात्मक कदम भी अधिक प्रभावी बनेंगे। तकनीक का उद्देश्य केवल सुविधा प्रदान करना नहीं, बल्कि पारदर्शिता और विश्वास को स्थायी आधार देना भी होना चाहिए।<br /><br />इस पूरे परिदृश्य में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वर्षों की तैयारी, आर्थिक निवेश और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच यदि परीक्षा निरस्त हो जाए या उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठ जाएँ, तो इसका गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में केवल पुनर्परीक्षा की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। समयबद्ध निर्णय, स्पष्ट आधिकारिक सूचना, प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसी व्यवस्थाएँ भी उतनी ही आवश्यक हैं। एक उत्तरदायी परीक्षा प्रणाली वही है जो विद्यार्थियों को केवल परीक्षार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र की मानव पूँजी के रूप में देखे और उनके विश्वास की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।<br /><br />अंततः किसी भी कानून की सफलता उसके प्रावधानों से अधिक उसके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि जांच पेशेवर ढंग से हो, दोषियों को शीघ्र दंड मिले, निर्दोषों के अधिकार सुरक्षित रहें और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, तभी परीक्षा सुधार का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। यह भी आवश्यक है कि हर अनियमितता पर एक समान प्रतिक्रिया देने के बजाय तथ्यों के आधार पर संतुलित निर्णय लिए जाएँ, जिससे ईमानदार अभ्यर्थियों के हित प्रभावित न हों। भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति तभी वास्तविक राष्ट्रीय संपदा बन सकती है, जब प्रत्येक युवा को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता का आधार केवल प्रतिभा, परिश्रम और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा है। यही विश्वास सार्वजनिक परीक्षाओं की सबसे बड़ी पूँजी है और इसी की रक्षा के लिए कानून, तकनीक, प्रशासन, शिक्षा संस्थानों और समाज को समान प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना होगा। तभी ऐसी परीक्षा व्यवस्था का निर्माण संभव होगा जो केवल चयन का माध्यम नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और समान अवसर की सशक्त अभिव्यक्ति बन सके।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:42:54 +0530</pubDate>
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                <title>सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई पहल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण अर्थव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक परिवहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184230/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/plastic-note-news-1780852776668.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण अर्थव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक परिवहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत होलोग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रंग बदलने वाली स्याही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूजीलैंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंगापुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष </span>2013<span lang="hi" xml:lang="hi"> और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण क्षेत्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी खर्च में कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:39:50 +0530</pubDate>
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                <title>आर डी प्रॉपर्टीज के तत्वावधान में लगा श्रद्धालुओं के लिए छठा वार्षिक भंडारा, हजारों भक्तों ने ग्रहण किया प्रसाद</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>गोवर्धन (मथुरा)-दीपक शर्मा </strong></blockquote><p style="text-align:justify;"><br /></p><p style="text-align:justify;"> गुरु पूर्णिमा मेले के पावन अवसर पर गिरिराज धाम गोवर्धन में श्रद्धा, आस्था और सेवा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। लाखों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी गिरिराज महाराज के दर्शन और सप्तकोसीय परिक्रमा के लिए गोवर्धन पहुंच रहे हैं। पूरे परिक्रमा मार्ग पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है और वातावरण "गिरिराज महाराज की जय", "राधे-राधे" तथा भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि से भक्तिमय बना हुआ है।</p><p style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं सेवा संस्थाओं द्वारा भंडारों का आयोजन किया जा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184178/the-sixth-annual-bhandara-for-the-devotees-was-organized-under"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-27-at-20.58.51.jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>गोवर्धन (मथुरा)-दीपक शर्मा </strong></blockquote><p style="text-align:justify;"><br /></p><p style="text-align:justify;"> गुरु पूर्णिमा मेले के पावन अवसर पर गिरिराज धाम गोवर्धन में श्रद्धा, आस्था और सेवा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। लाखों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी गिरिराज महाराज के दर्शन और सप्तकोसीय परिक्रमा के लिए गोवर्धन पहुंच रहे हैं। पूरे परिक्रमा मार्ग पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है और वातावरण "गिरिराज महाराज की जय", "राधे-राधे" तथा भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि से भक्तिमय बना हुआ है।</p><p style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं सेवा संस्थाओं द्वारा भंडारों का आयोजन किया जा रहा है। इन्हीं सेवा कार्यों की श्रृंखला में आर डी प्रॉपर्टीज के तत्वावधान में श्रद्धालुओं के लिए छठे वार्षिक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। इस भंडारे में हजारों की संख्या में परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया और आयोजकों की सेवा भावना की सराहना की।</p><p style="text-align:justify;">भंडारे में श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध एवं सात्विक भोजन की विशेष व्यवस्था की गई। इसके साथ ही भीषण गर्मी और उमस को देखते हुए ठंडा पेयजल, छाछ, शरबत एवं अन्य आवश्यक सामग्री भी निःशुल्क वितरित की गई। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं ने इस सेवा को अत्यंत सराहनीय बताते हुए आयोजकों को धन्यवाद दिया। कई श्रद्धालुओं ने कहा कि लंबी परिक्रमा के दौरान ऐसे भंडारे उन्हें नई ऊर्जा प्रदान करते हैं और सेवा की यह परंपरा ब्रज की पहचान है।</p><p style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-07/whatsapp-image-2026-07-27-at-20.58.50.jpeg" alt="गुरु पूर्णिमा मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं सेवा संस्थाओं द्वारा भंडारों का आयोजन किया जा रहा है।" width="1200" height="800"></img></p><p style="text-align:justify;">आर डी प्रॉपर्टीज के संस्थापक गुड्डा ठाकुर उर्फ सौदान सिंह ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं की सेवा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि पिछले छह वर्षों से लगातार यह विशाल भंडारा आयोजित किया जा रहा है और भविष्य में भी यह सेवा कार्य निरंतर जारी रहेगा। उनका कहना था कि ब्रज की सेवा और गिरिराज महाराज के भक्तों की सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य है।</p><p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि संस्था का उद्देश्य केवल भोजन वितरण करना ही नहीं, बल्कि परिक्रमा करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को सम्मानपूर्वक सेवा प्रदान करना है। इसी भावना के साथ सभी कार्यकर्ता पूरी निष्ठा और समर्पण से दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं। भंडारे में आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु का स्वागत प्रेम और आदर के साथ किया गया।</p><p style="text-align:justify;">इस सेवा कार्य को सफल बनाने में जयवीर चौधरी, नीतू ठाकुर, अजय कौशिक, ठाकुर मुकेश, हेम सिंह ठाकुर, राजेश ठाकुर, छोटू ठाकुर, माधव शर्मा, बीके ठाकुर, गोविंद ठाकुर सहित समस्त ब्रजवासियों का विशेष सहयोग रहा। सभी कार्यकर्ता भोजन वितरण, पेयजल व्यवस्था, छाछ एवं शरबत वितरण तथा श्रद्धालुओं की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में पूरे उत्साह के साथ लगे रहे।</p><p style="text-align:justify;">भंडारे में सुबह से लेकर देर शाम तक श्रद्धालुओं का लगातार आना-जाना लगा रहा। परिक्रमा करने वाले भक्तों ने भोजन प्रसाद ग्रहण करने के बाद आयोजकों को आशीर्वाद दिया और उनकी सेवा भावना की प्रशंसा की। कई श्रद्धालुओं ने कहा कि ब्रज में आने पर उन्हें हर कदम पर सेवा और अपनापन देखने को मिलता है, जो इस भूमि की सबसे बड़ी विशेषता है।</p><p style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा मेले के दौरान प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा, यातायात, चिकित्सा एवं साफ-सफाई की व्यापक व्यवस्थाएं की गई हैं। पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी लगातार परिक्रमा मार्ग पर निगरानी बनाए हुए हैं, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। स्वयंसेवी संस्थाएं भी प्रशासन के साथ मिलकर सेवा कार्यों में सहयोग कर रही हैं।</p><p style="text-align:justify;">ब्रजभूमि में गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और मानवता का भी प्रतीक माना जाता है। यहां आयोजित होने वाले भंडारे समाज में परोपकार और सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं। आर डी प्रॉपर्टीज द्वारा आयोजित छठा वार्षिक भंडारा भी इसी सेवा परंपरा का एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आया है।</p><p style="text-align:justify;">कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने गिरिराज महाराज से सभी श्रद्धालुओं के सुख, समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना की तथा भविष्य में भी इसी प्रकार सेवा कार्यों को निरंतर जारी रखने का संकल्प लिया। श्रद्धालुओं ने भी आयोजकों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि ऐसे सेवा कार्य समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं और इन्हें आगे भी निरंतर जारी रहना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 21:16:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दहेज हत्या के मामले में वांछित आरोपी को, धूमनगंज पुलिस ने रेलवे पुल के पास दबोचा।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दहेज हत्या के एक मामले में फरार चल रहे वांछित आरोपी को धूमनगंज थाना पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुखबिर की सूचना पर की गई कार्रवाई में पुलिस ने आरोपी को सुबेदारगंज रेलवे डाट पुल के पास से पकड़ लिया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी के खिलाफ दर्ज मुकदमे में अग्रिम विधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस के अनुसार, थाना धूमनगंज में दर्ज मु0अ0सं0 241/2026 के तहत धारा 85/80(2) भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) एवं दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 में पंजीकृत दहेज हत्या के मामले में आरोपी शिवम चौरसिया की तलाश की जा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184091/dhumanganj-police-arrested-the-accused-wanted-in-the-dowry-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260724-wa0112.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दहेज हत्या के एक मामले में फरार चल रहे वांछित आरोपी को धूमनगंज थाना पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुखबिर की सूचना पर की गई कार्रवाई में पुलिस ने आरोपी को सुबेदारगंज रेलवे डाट पुल के पास से पकड़ लिया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी के खिलाफ दर्ज मुकदमे में अग्रिम विधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस के अनुसार, थाना धूमनगंज में दर्ज मु0अ0सं0 241/2026 के तहत धारा 85/80(2) भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) एवं दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 में पंजीकृत दहेज हत्या के मामले में आरोपी शिवम चौरसिया की तलाश की जा रही थी। वह घटना के बाद से फरार चल रहा था और पुलिस उसकी गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास कर रही थी।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 21:52:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एसडीएम के आदेश के बाद भी दबंगकोटेदार संजय कुमार केखिलाफ नही किया कोई कार्रवाई</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>उप जिलाधिकारी हरैया उमाकांत तिवारी ने पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज को 07 कार्य दिवस के अन्दर ग्राम पंचायत नरहरपुर कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ जांच कर कार्यवाही करने का निर्देश दिया था लेकिन 07 कार्य दिवस बीत जाने के बाद भी राशन वितरण में गड़बड़ी करने वाले कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई है ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  आपको बता दें कि ग्राम पंचायत नरहरपुर के ग्रामीणों ने कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ राशन वितरण में घटतौली करने का आरोप लगाया था । ग्रामीणों की शिकायत पर एडीओ पंचायत कप्तानगंज सुशील कुमार श्रीवास्तव ने सेक्टर प्रभारी अरुण कुमार पटेल</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एडीओ</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184089/despite-sdms-order-no-action-was-taken-against-dabangkotedar-sanjay"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260724-wa0065-(2).jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>उप जिलाधिकारी हरैया उमाकांत तिवारी ने पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज को 07 कार्य दिवस के अन्दर ग्राम पंचायत नरहरपुर कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ जांच कर कार्यवाही करने का निर्देश दिया था लेकिन 07 कार्य दिवस बीत जाने के बाद भी राशन वितरण में गड़बड़ी करने वाले कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> आपको बता दें कि ग्राम पंचायत नरहरपुर के ग्रामीणों ने कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ राशन वितरण में घटतौली करने का आरोप लगाया था । ग्रामीणों की शिकायत पर एडीओ पंचायत कप्तानगंज सुशील कुमार श्रीवास्तव ने सेक्टर प्रभारी अरुण कुमार पटेल व सचिव पंकज सिंह को जांच करके जांच रिपोर्ट प्रेषित करने का निर्देश दिया था ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एडीओ पंचायत के निर्देश पर एडीओ पंचायत को जांच टीम ने जांच कर के जांच रिपोर्ट दिनांक - 12-07-2026 को दिया था एडीओ पंचायत ने जांच रिपोर्ट प्रभारी खण्ड विकास अधिकारी कप्तानगंज कृष्ण कुमार सिंह को दिनांक - 15-07-2026 को दिया था प्रभारी खण्ड विकास अधिकारी ने जांच रिपोर्ट उप जिलाधिकारी हर्रैया उमाकांत तिवारी को दिनांक - 17-07-2026 को अग्रिम कार्यवाही हेतु भेजा था ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उप जिलाधिकारी ने दिनांक - 17-07-2026 को पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज को 07 कार्य दिवस के अन्दर उक्त प्रकरण में की गई कार्यवाही को अवगत कराने का निर्देश था ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एसडीएम के आदेश के 07 दिन बीतने के बाद भी पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज ने कोटेदार संजय कुमार के खिलाफ कोई कार्रवाई नही किया है जिसको लेकर जिले में तरह - तरह की चर्चाएं चल रही है । मीडिया टीम ने फोन के माध्यम से पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज से कई बार फोन किया लेकिन पूर्ति निरीक्षक कप्तानगंज ने न तो मीडिया टीम के फोन को रिसीव किया और न ही मीडिया टीम को पुनः फोन नही किया ।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt">
<div class="hp"> </div>
<div class="eqJbab cZD3Qb"></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 21:50:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नगर निगम की लापरवाही से मेवा लाल की बगिया में खुले नाले में गिरी कार, चालक बाल-बाल बचा।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नगर निगम प्रयागराज की लापरवाही एक बार फिर सामने आई है। नैनी स्थित मेवा लाल की बगिया क्षेत्र में शुक्रवार रात करीब 10:30 बजे एक कार अचानक खुले नाले में जा गिरी। हादसे में चालक बाल-बाल बच गया और किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जिस स्थान पर यह हादसा हुआ वहां नाला लंबे समय से खुला पड़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ दिन पहले भी इसी स्थान पर एक कार नाले में गिर चुकी थी, लेकिन उस घटना के बाद भी नगर निगम ने नाले को ढकने या सुरक्षा</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184087/due-to-the-negligence-of-the-municipal-corporation-the-driver"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260725-wa0103.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नगर निगम प्रयागराज की लापरवाही एक बार फिर सामने आई है। नैनी स्थित मेवा लाल की बगिया क्षेत्र में शुक्रवार रात करीब 10:30 बजे एक कार अचानक खुले नाले में जा गिरी। हादसे में चालक बाल-बाल बच गया और किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जिस स्थान पर यह हादसा हुआ वहां नाला लंबे समय से खुला पड़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ दिन पहले भी इसी स्थान पर एक कार नाले में गिर चुकी थी, लेकिन उस घटना के बाद भी नगर निगम ने नाले को ढकने या सुरक्षा के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की।परिणामस्वरूप शुक्रवार रात फिर एक वाहन दुर्घटना का शिकार हो गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">घटना के बाद आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और चालक को सुरक्षित बाहर निकाला। स्थानीय नागरिकों ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि समय रहते खुले नालों को ढका जाता और सुरक्षा बैरिकेडिंग की जाती, तो इस तरह की घटनाओं से बचा जा सकता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्षेत्रवासियों ने नगर निगम प्रशासन से मांग की है कि खुले नालों को तत्काल ढका जाए, पर्याप्त चेतावनी संकेत और बैरिकेड लगाए जाएं, ताकि भविष्य में इस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं की गई तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
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</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 21:45:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>वांगचुक का अनशन समाप्त</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div class="m_-2093172014009432956WordSection1">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेपर लीक और युवाओं के बढ़ते असंतोष को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन ने हाल के दिनों में राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना दिया है। इस आंदोलन को नई ऊर्जा तब मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi">  दिनों तक चले इस अनशन ने सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और आम जनता का ध्यान छात्रों की मांगों की ओर आकर्षित किया। अब जब सोनम वांगचुक ने सरकार से कुछ आश्वासनों के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह</span></p></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184009/wangchuks-fast-ends"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div class="m_-2093172014009432956WordSection1">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेपर लीक और युवाओं के बढ़ते असंतोष को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन ने हाल के दिनों में राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना दिया है। इस आंदोलन को नई ऊर्जा तब मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों तक चले इस अनशन ने सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और आम जनता का ध्यान छात्रों की मांगों की ओर आकर्षित किया। अब जब सोनम वांगचुक ने सरकार से कुछ आश्वासनों के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इससे छात्र आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा या फिर आंदोलन किसी नए चरण में प्रवेश करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। किसी भी बड़े जन आंदोलन का भविष्य केवल एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं और लोगों का समर्थन कितना व्यापक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अधिक महत्वपूर्ण होता है। सोनम वांगचुक ने अपना अनशन सरकार से बातचीत और कुछ लिखित आश्वासनों के बाद समाप्त किया। बताया गया कि सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने जैसे बिंदुओं पर सहमति जताई। इसके बाद उन्होंने कहा कि यह "भूख का अंत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाबदेही की शुरुआत" है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंदोलन से जुड़े छात्र संगठनों और युवा नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल अनशन समाप्त होने का अर्थ आंदोलन समाप्त होना नहीं है। उनका कहना है कि जब तक परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और उनकी अन्य प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक विरोध जारी रहेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास भी बताता है कि कई आंदोलनों में किसी प्रमुख नेता का अनशन समाप्त होने के बाद भी आंदोलन जारी रहा है। कई बार अनशन केवल सरकार का ध्यान आकर्षित करने का माध्यम होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि असली संघर्ष उसके बाद शुरू होता है। यदि जनता और आंदोलनकारी संगठित रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आंदोलन आगे भी प्रभावी बना रह सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी सच है कि सोनम वांगचुक इस आंदोलन का एक बड़ा नैतिक चेहरा बन चुके थे। उनके अनशन ने पूरे देश में छात्रों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। उनके अनशन समाप्त होने के बाद कुछ लोगों में यह धारणा बन सकती है कि अब सरकार और आंदोलन के बीच संवाद शुरू हो गया है। इससे कुछ प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम हो सकता है और आंदोलन की तीव्रता अस्थायी रूप से घट सकती है। सरकार के लिए भी यह एक अवसर है। यदि वह अपने आश्वासनों को समयबद्ध तरीके से लागू करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाती है और दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आंदोलन धीरे-धीरे शांत हो सकता है। लेकिन यदि वादे केवल आश्वासन बनकर रह जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आंदोलन पहले से अधिक व्यापक रूप ले सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। विभिन्न विपक्षी दल छात्रों के समर्थन में अपनी आवाज उठा रहे हैं और सरकार पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। इससे आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है। इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह केवल एक परीक्षा या एक पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है। यह युवाओं के भविष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन चुका है। यही कारण है कि आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ा और इसमें केवल छात्र ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अभिभावक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षाविद और समाज के अन्य वर्ग भी शामिल होने लगे। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त होने से छात्र आंदोलन खत्म हो जाएगा। अधिक संभावना यही है कि आंदोलन का स्वरूप बदल सकता है। सड़क पर विरोध के साथ-साथ अब वार्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानूनी प्रक्रिया और नीतिगत सुधारों की मांग पर भी अधिक जोर दिया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सरकार और छात्र संगठनों के बीच सार्थक संवाद आगे बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समाधान की संभावना मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि अपेक्षित सुधार नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आंदोलन फिर से तेज हो सकता है। सोनम वांगचुक का भूख हड़ताल समाप्त करना आंदोलन का अंत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक नए चरण की शुरुआत माना जा सकता है। इससे तत्काल आंदोलन की रणनीति में बदलाव संभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन छात्रों की मूल समस्याएं और उनकी मांगें अभी भी कायम हैं। इसलिए आने वाले दिनों में यह सरकार की कार्रवाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद की गंभीरता और सुधारों की गति पर निर्भर करेगा कि यह आंदोलन शांत होता है या फिर और व्यापक रूप लेता है।</span></p>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 16:26:32 +0530</pubDate>
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                <title>गंगा एक्सप्रेसवे पर आम से लदा डीसीएम पलटा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज (रायबरेली)।</strong> गंगा एक्सप्रेसवे पर सेमरी गांव के पास मंगलवार को आम से लदा एक डीसीएम अनियंत्रित होकर पलट गया। हादसे में चालक और परिचालक गंभीर रूप से घायल हो गए। जानकारी के मुताबिक डीसीएम लखनऊ से आम लेकर प्रयागराज जा रहा था। सेमरी गांव के पास अचानक वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया। हादसे में चालक संतोष यादव पुत्र मुन्नालाल, निवासी राजा तालाब, महाराजगंज (वाराणसी) और परिचालक नसरुद्दीन पुत्र सिराजुद्दीन, निवासी बदरपुर, गाजीपुर घायल हो गए।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सूचना मिलते ही पीआरवी-112 के कमांडर मुन्ना सिंह एसआई और चालक मनीष सिंह मौके पर पहुंचे। दोनों घायलों को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183983/dcm-laden-with-mangoes-overturns-on-ganga-expressway"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260722-wa0203.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज (रायबरेली)।</strong> गंगा एक्सप्रेसवे पर सेमरी गांव के पास मंगलवार को आम से लदा एक डीसीएम अनियंत्रित होकर पलट गया। हादसे में चालक और परिचालक गंभीर रूप से घायल हो गए। जानकारी के मुताबिक डीसीएम लखनऊ से आम लेकर प्रयागराज जा रहा था। सेमरी गांव के पास अचानक वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया। हादसे में चालक संतोष यादव पुत्र मुन्नालाल, निवासी राजा तालाब, महाराजगंज (वाराणसी) और परिचालक नसरुद्दीन पुत्र सिराजुद्दीन, निवासी बदरपुर, गाजीपुर घायल हो गए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सूचना मिलते ही पीआरवी-112 के कमांडर मुन्ना सिंह एसआई और चालक मनीष सिंह मौके पर पहुंचे। दोनों घायलों को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल भिजवाया। इसके बाद क्रेन की मदद से पलटे हुए डीसीएम को एक्सप्रेसवे से हटाया गया। वाहन हटने के बाद यातायात सामान्य हो सका।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/183983/dcm-laden-with-mangoes-overturns-on-ganga-expressway</link>
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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 22:54:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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