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                <title>Indian economy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian economy RSS Feed</description>
                
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                <title>युद्ध और टैरिफ के तूफान में भी भारत की अर्थव्यवस्था का बजा डंका</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186989/indias-economy-continues-to-thrive-even-in-the-storm-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-09/1002217491.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का प्रदर्शन किया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और नीतिगत स्थिरता का बड़ा संकेत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग 7 प्रतिशत के अनुमान से भी बेहतर रहा। वैश्विक स्तर पर जब अनेक अर्थव्यवस्थाएं युद्ध, महंगाई, ऊर्जा संकट और व्यापारिक तनाव से जूझ रही हैं, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस गति से आगे बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की इस आर्थिक तस्वीर को केवल बाजार की स्वाभाविक ताकत के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे सरकार की लगातार बनाई गई आर्थिक रणनीति और उस रणनीति को जमीन पर लागू करने की कार्यप्रणाली भी महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विकास का आधार केवल तत्काल राहत या उपभोग को नहीं बनाया, बल्कि बुनियादी ढांचे, सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा, रक्षा, विनिर्माण और डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगातार निवेश बढ़ाने पर जोर दिया है। यही पूंजीगत खर्च आज आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहली तिमाही में सरकार के पूंजीगत खर्च में 18.6 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि सरकार आर्थिक दबाव के समय भी विकास खर्च को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाने की नीति पर कायम है। सरकार का यह दृष्टिकोण अर्थव्यवस्था के लिए दोहरा लाभ पैदा करता है। एक ओर बड़े स्तर पर निर्माण और आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं से रोजगार और कारोबार को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी ओर सड़क, रेलवे, बिजली, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक ढांचे में सुधार से आने वाले वर्षों की आर्थिक क्षमता मजबूत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में सरकारी निवेश का असर निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर भी दिखाई देता है। जब सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करती है तो उससे सीमेंट, स्टील, मशीनरी, परिवहन, निर्माण और अनेक दूसरे क्षेत्रों में मांग पैदा होती है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसा घूमता है और निजी क्षेत्र को भी विस्तार का अवसर मिलता है। यही कारण है कि वर्तमान आर्थिक वृद्धि को केवल सरकारी खर्च से जोड़ना उचित नहीं होगा। सरकार द्वारा तैयार किया गया वातावरण निजी निवेश और उपभोग दोनों के लिए आधार तैयार कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम लोगों की खपत भी आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। पिछले वर्ष जीएसटी और आयकर से संबंधित राहतों के कारण लोगों के हाथ में खर्च करने योग्य आय बढ़ी। महंगाई की चुनौतियों के बावजूद उपभोक्ता मांग में अपेक्षित कमजोरी नहीं आई। इसका असर यात्री वाहनों की बिक्री में दिखाई दिया, जहां पहली तिमाही में 25.6 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि घरेलू बाजार में उपभोक्ता विश्वास अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिजली की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बिजली की मांग की वृद्धि दर 1.9 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत तक पहुंचना औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने का संकेत माना जा सकता है। जब उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्माण और घरेलू खपत में गतिविधियां बढ़ती हैं तो ऊर्जा की मांग भी बढ़ती है। इसलिए बिजली की मांग का यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की व्यापक गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;">सकल मूल्य वर्धित यानी जीवीए के आंकड़े भी भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती को रेखांकित करते हैं। पहली तिमाही में वास्तविक जीवीए वृद्धि 8.2 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 7.1 प्रतिशत थी। वहीं नॉमिनल जीवीए वृद्धि 11.5 प्रतिशत दर्ज की गई। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि भी 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 10.3 प्रतिशत हुई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों का विस्तार केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेवा क्षेत्र की मजबूती भी भारत की आर्थिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई 58.6 तक पहुंचना बताता है कि सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। भारत लंबे समय से सेवा क्षेत्र की अपनी क्षमता के लिए दुनिया में पहचान रखता है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, डिजिटल सेवाओं, संचार, व्यापार और अन्य सेवा क्षेत्रों का विस्तार भारतीय अर्थव्यवस्था को लगातार नया आधार दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक गतिविधियों को सामान्य बनाए रखने पर लगातार जोर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा और खाद्य बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आया। बाद में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा और समुद्री व्यापार तथा तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं पैदा हुईं। ऐसे समय में किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आयात लागत और महंगाई को नियंत्रित रखना बड़ी चुनौती होती है। भारत ने ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने के लिए नीतिगत स्तर पर संतुलन साधने की कोशिश की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में आया। भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकियों ने यह आशंका पैदा की कि इसका भारतीय निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। लेकिन भारत ने अपनी आर्थिक रणनीति को केवल किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं रखा। निर्यात बाजारों के विविधीकरण, घरेलू मांग को मजबूत करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विनिर्माण को प्रोत्साहन देने की दिशा में सरकार की नीतियां इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की आर्थिक नीति में आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करना है। सरकार ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ विदेशी निवेश आकर्षित करने, विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और रणनीतिक क्षेत्रों में देश की निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, मोबाइल निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में लगातार क्षमता निर्माण इसी सोच का हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता चाहती हैं। यदि भारत इस अवसर को पूरी तरह भुना पाता है तो आने वाले वर्षों में विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र में उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके लिए सरकार की नीतिगत स्थिरता, तेज निर्णय लेने की क्षमता और परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी समझना जरूरी है कि 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि उत्सव का विषय जरूर है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता। भारत के सामने रोजगार सृजन, ग्रामीण मांग, महंगाई, निर्यात प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए सरकार के सामने आगे भी यही चुनौती रहेगी कि आर्थिक वृद्धि को अधिक व्यापक बनाया जाए और उसका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी वर्तमान आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था ने बाहरी दबावों के सामने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। युद्ध हो, तेल संकट हो, वैश्विक व्यापार में तनाव हो या टैरिफ का दबाव—भारत की आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह पटरी से नहीं उतरीं। इसके पीछे मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता सरकारी पूंजीगत खर्च, सेवा क्षेत्र की क्षमता, सुधारों की निरंतरता और आर्थिक प्रबंधन का महत्वपूर्ण योगदान है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज विश्व शक्ति बनने की दिशा में केवल सामरिक या राजनीतिक आधार पर नहीं बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति किसी भी राष्ट्र की वैश्विक स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि इसी आर्थिक क्षमता का संकेत देती है। सरकार ने जिस तरह बुनियादी ढांचे, सउत्पादन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, निवेश और घरेलू मांग को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की है, उसका परिणाम आर्थिक आंकड़ों में दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने संकटों के बीच अपनी गति बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है और आगे भी अनेक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। लेकिन यदि सरकार इसी तरह वित्तीय अनुशासन, पूंजीगत निवेश, नीतिगत स्थिरता और आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन बनाए रखती है तो भारत की विकास यात्रा और तेज हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि भारत के लिए केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस आर्थिक आत्मविश्वास का संकेत है जिसके आधार पर भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका और मजबूत कर रहा है। युद्ध और टैरिफ के दबाव के बावजूद अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार बताती है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा है। सरकार की कार्यप्रणाली और आर्थिक नीतियों की असली परीक्षा भी यही है कि संकट चाहे कितना बड़ा हो, विकास की गति को थमने न दिया जाए। फिलहाल जीडीपी के आंकड़े यही संदेश दे रहे हैं कि भारत की आर्थिक गाड़ी न केवल चल रही है, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी अपनी रफ्तार बनाए हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>         *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 17:00:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बढ़ती महंगाई और मध्यम वर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक</span></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185515/rising-inflation-and-the-middle-class"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/rajeev-shukla.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक क्रय शक्ति कम होती जा रही है? कागज पर वेतन में बढ़ोतरी दिखाई दे सकती है, रोजगार के नए अवसरों और आर्थिक विकास की तस्वीर भी सामने रखी जा सकती है, लेकिन परिवार का वास्तविक बजट किसी सरकारी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि रसोई, स्कूल की फीस, बिजली के बिल, किराये, ईंधन, इलाज और रोजमर्रा के खर्च से तय होता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">जब इन खर्चों की रफ्तार आय की वृद्धि से तेज हो जाती है तो व्यक्ति को महसूस होने लगता है कि उसकी कमाई बढ़ने के बावजूद उसका जीवन आसान नहीं हुआ। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी आय का बड़ा हिस्सा अनिवार्य खर्चों में चला जाता है। मकान का किराया या होम लोन की किस्त, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा, परिवहन, बिजली-पानी, मोबाइल-इंटरनेट, घरेलू सामान और सामाजिक जिम्मेदारियां—इनमें से अधिकांश खर्च ऐसे हैं जिन्हें आसानी से कम नहीं किया जा सकता। मान लीजिए किसी परिवार की मासिक आय में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, लेकिन इसी अवधि में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य आवश्यक सेवाओं का खर्च उससे अधिक बढ़ जाता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">तब वास्तविक जीवन में उस परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बजाय और दबाव में आ सकती है। यही कारण है कि केवल वेतन या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने को आर्थिक खुशहाली का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि आय बढ़ने के बाद नागरिक कितनी वस्तुएं और सेवाएं खरीद पा रहा है और उसके पास भविष्य के लिए कितनी बचत बच रही है। महंगाई का असली चेहरा रसोई से दिखाई देता है। महंगाई के आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आम नागरिक महंगाई को आंकड़ों में नहीं, बाजार में महसूस करता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महीने की शुरुआत में बनाया गया घरेलू बजट महीने के अंत तक अक्सर बिगड़ जाता है। सब्जियां, दाल, दूध, फल, खाद्य तेल, गैस, परिवहन और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर परिवार की जेब पर पड़ता है। मध्यम वर्ग की कठिनाई यह भी है कि वह गरीबों के लिए उपलब्ध अनेक सरकारी सहायता योजनाओं का स्वाभाविक लाभार्थी नहीं होता और दूसरी ओर उसकी आय इतनी अधिक भी नहीं होती कि वह लगातार बढ़ती निजी सेवाओं की कीमतों को आसानी से वहन कर सके। वह दो आर्थिक दबावों के बीच खड़ा दिखाई देता है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">मध्यम वर्ग के बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य का हिस्सा लगातार महत्वपूर्ण होता गया है। माता-पिता बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते </span></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">हैं। इसके लिए स्कूल फीस, किताबें, परिवहन, कोचिंग और उच्च शिक्षा पर बड़ी रकम खर्च होती है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में बढ़ता निजी खर्च परिवार की बचत को प्रभावित करता है। बीमारी केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रह जाती, बल्कि कई बार आर्थिक संकट भी बन जाती है। यही वजह है कि मध्यम वर्ग के लिए महंगाई का अर्थ केवल खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ना नहीं है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास महंगे होते हैं तो भविष्य की सुरक्षा भी महंगी हो जाती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;"> भारत में मध्यम वर्ग की आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण आधार बचत रही है। लेकिन जब आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्च में चला जाता है तो बचत के लिए उपलब्ध रकम घटने लगती है। बचत कम होने का अर्थ केवल आज की सुविधा कम होना नहीं है। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बच्चों की उच्च शिक्षा, घर खरीदना, सेवानिवृत्ति, अचानक आने वाला स्वास्थ्य खर्च या किसी आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यदि किसी परिवार की आय बढ़ती रहे लेकिन उसकी बचत लगातार घटती जाए तो यह आर्थिक मजबूती का संकेत नहीं, बल्कि सावधानी का संकेत है। महंगे मकान, शिक्षा, वाहन और दूसरी आवश्यकताओं के कारण ऋण आज मध्यम वर्ग की आर्थिक जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऋण अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब मासिक आय का बड़ा हिस्सा ईएमआई में जाने लगे तो परिवार की आर्थिक स्वतंत्रता कम होने लगती है। ऐसे परिवारों के लिए ब्याज दरों में बदलाव, नौकरी का संकट या अचानक चिकित्सा खर्च बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि परिवारों की ऋण-निर्भरता कितनी बढ़ रही है और उनकी बचत कितनी सुरक्षित है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">क्या केवल महंगाई को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है?</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यहां सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। महंगाई पर नियंत्रण केवल कीमतें स्थिर रखने का विषय नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, वेतन वृद्धि, उत्पादकता, कर व्यवस्था, आवास की लागत, स्वास्थ्य और शिक्षा की उपलब्धता—ये सभी मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।</span></div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 18:44:23 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्वतन्त्रता का दिवस सुहाना, विकृतियों से मुक्त बने भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पन्द्रह अगस्त केवल ध्वजारोहण करने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करने का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि जिस स्वतंत्रता के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उस स्वतंत्रता को हमने कितना सार्थक बनाया है और विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें अभी कितना आगे जाना है। वर्ष 1947 में देश राजनीतिक पराधीनता से मुक्त हुआ था, लेकिन स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब भारत सामाजिक विकृतियों, आर्थिक विषमता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संकीर्णता, बेरोजगारी, हिंसा और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से भी मुक्त हो।</div>
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<div style="text-align:justify;">गुलामी की पीड़ा को वही</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185285/happy-independence-day-india-should-be-free-from-distortions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/10021511681.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पन्द्रह अगस्त केवल ध्वजारोहण करने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करने का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि जिस स्वतंत्रता के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उस स्वतंत्रता को हमने कितना सार्थक बनाया है और विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें अभी कितना आगे जाना है। वर्ष 1947 में देश राजनीतिक पराधीनता से मुक्त हुआ था, लेकिन स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब भारत सामाजिक विकृतियों, आर्थिक विषमता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संकीर्णता, बेरोजगारी, हिंसा और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से भी मुक्त हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुलामी की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने पराधीनता का जीवन देखा हो। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल सत्ता परिवर्तन के लिए संघर्ष नहीं किया था। उनके सामने एक ऐसे भारत का सपना था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन जी सके, न्याय सबको मिले, अवसर सबके लिए उपलब्ध हों और राष्ट्र अपनी पहचान तथा आत्मसम्मान के साथ विश्व में खड़ा हो। इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल अतीत का गौरवगान नहीं करना चाहिए, बल्कि वर्तमान की उपलब्धियों और कमियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के बाद भारत ने अनेक क्षेत्रों में ऐसी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिन पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए। जिस देश को आजादी के समय गरीबी, अशिक्षा, खाद्यान्न संकट, कमजोर औद्योगिक आधार और सीमित संसाधनों जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, वही भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न के लिए बाहरी निर्भरता से बाहर निकाला। सिंचाई, उर्वरक, कृषि अनुसंधान और आधुनिक तकनीक ने भारतीय कृषि को नई शक्ति दी। आज भारत कृषि उत्पादन के साथ-साथ डेयरी, मत्स्य और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">औद्योगिक विकास ने भी स्वतंत्र भारत की तस्वीर बदली है। आज देश में इस्पात, ऑटोमोबाइल, दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और अनेक आधुनिक उद्योगों का व्यापक विस्तार हुआ है। बड़े-बड़े बांध, बिजली परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे नेटवर्क, बंदरगाह, हवाई अड्डे और महानगरों की आधुनिक परिवहन व्यवस्था देश की विकास यात्रा के प्रमाण हैं। कभी जिन वस्तुओं और तकनीकों के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, उनमें से अनेक का निर्माण आज देश में हो रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अंतरिक्ष यात्रा तो स्वतंत्रता के बाद की सबसे प्रेरणादायक उपलब्धियों में से एक है। सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम आज उपग्रह प्रक्षेपण, दूरसंचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, कृषि निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान से लेकर चंद्रमा तथा मंगल तक पहुंच चुका है। चंद्रयान अभियानों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को विश्व के सामने स्थापित किया। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का नया परिचय दिया। आदित्य-एल1 जैसे मिशन भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का प्रमाण हैं। अब भारत केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला देश नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाला राष्ट्र है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विज्ञान और तकनीक के साथ डिजिटल क्षेत्र में भी भारत ने असाधारण परिवर्तन देखा है। मोबाइल संचार, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं ने सामान्य नागरिक के जीवन को प्रभावित किया है। गांवों तक इंटरनेट और बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ी है। डिजिटल भुगतान ने आर्थिक लेन-देन की संस्कृति बदल दी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और आधुनिक विनिर्माण जैसे नए क्षेत्रों में भारत अपनी क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत केवल परंपरा का देश नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाने वाला राष्ट्र भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश की सुरक्षा के क्षेत्र में भी स्वतंत्र भारत ने लंबी यात्रा तय की है। 1962, 1965 और 1971 के युद्धों से लेकर कारगिल तक भारतीय सेनाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया है। आज भारत की थल सेना, वायु सेना और नौसेना अत्याधुनिक तकनीक तथा स्वदेशी सैन्य उपकरणों से अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। स्वदेशी लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल प्रणालियां, युद्धपोत, पनडुब्बियां और विभिन्न रक्षा उपकरण भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को मजबूत कर रहे हैं। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व मंच पर भारत की बढ़ती साख भी स्वतंत्रता के बाद की उपलब्धियों का महत्वपूर्ण अध्याय है। भारत आज अनेक वैश्विक मंचों पर अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखता है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, वैश्विक स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे विषयों पर भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। विश्व के अनेक देश भारत को एक बड़े बाजार के साथ-साथ जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में देखते हैं। भारतीय मूल के लोग भी दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी प्रतिभा से भारत की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इन उपलब्धियों के बीच यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचा है? क्या हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या प्रत्येक युवा को उसकी क्षमता के अनुरूप रोजगार और अवसर मिल रहे हैं? क्या गांव और शहर के बीच सुविधाओं का अंतर कम हुआ है? क्या महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित हुआ है? क्या भ्रष्टाचार, अपराध और सामाजिक भेदभाव से हम पूरी तरह मुक्त हो पाए हैं? इन प्रश्नों से आंखें मूंदना स्वतंत्रता दिवस की भावना के साथ न्याय नहीं होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकसित राष्ट्र केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं बनता। विकसित राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसके नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से होती है। शिक्षा उसकी पहली आधारशिला है। ऐसा शिक्षा तंत्र चाहिए जो केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी न बनाए, बल्कि वैज्ञानिक सोच, चरित्र, संवेदनशीलता, अनुशासन और राष्ट्रबोध से संपन्न नागरिक तैयार करे। स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें आर्थिक स्थिति किसी व्यक्ति के उपचार में बाधा न बने। गांवों में भी गुणवत्तापूर्ण अस्पताल, विद्यालय, इंटरनेट, परिवहन और रोजगार के अवसर उपलब्ध हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक विकास के साथ रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देना होगा। भारत की युवा आबादी हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यही शक्ति तभी राष्ट्रनिर्माण में बदल सकती है जब युवाओं को कौशल, शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलें। केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहने के बजाय उद्यमिता, स्टार्टअप, विनिर्माण, कृषि आधारित उद्योग, पर्यटन, सेवा क्षेत्र और नई तकनीकों में व्यापक अवसर पैदा करने होंगे। युवाओं को नौकरी खोजने वाला ही नहीं, रोजगार देने वाला बनने की दिशा में भी प्रेरित करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकसित भारत का एक महत्वपूर्ण आधार सामाजिक समरसता है। जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति देश की शक्ति को कमजोर करती है। विविधता भारत की पहचान है, लेकिन विविधता का अर्थ विभाजन नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी राष्ट्रीय चेतना विकसित करनी होगी जिसमें व्यक्ति अपनी भाषा, परंपरा और क्षेत्रीय पहचान पर गर्व करे, लेकिन सबसे पहले स्वयं को भारतीय माने। सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज को स्थायी खांचों में बांटना नहीं, बल्कि वंचित व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साम्प्रदायिक सद्भाव भी राष्ट्र की प्रगति की अनिवार्य शर्त है। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, उसे राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक वैमनस्य का हथियार नहीं बनने देना चाहिए। भारत की शक्ति उसकी बहुलता में है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च और अन्य आस्था-स्थल तभी सुरक्षित रहेंगे, जब समाज में परस्पर सम्मान और विश्वास कायम रहेगा। किसी भी प्रकार की हिंसा, घृणा और अफवाह विकास की राह को रोकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार और राजनीतिक स्वार्थ से मुक्ति भी विकसित भारत के लिए आवश्यक है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसका मूल उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही की व्यवस्था है। राजनीतिक दलों और नेताओं को अपने आचरण से ऐसी मिसाल प्रस्तुत करनी होगी, जिससे आने वाली पीढ़ियां सार्वजनिक जीवन को सम्मान और सेवा का क्षेत्र समझें। राजनीति में विचार, सिद्धांत, त्याग और राष्ट्रहित की पुनर्स्थापना आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं की भूमिका इस परिवर्तन में सबसे महत्वपूर्ण है। युवा केवल विरोध, आंदोलन या सोशल मीडिया की बहस तक सीमित न रहें। वे विज्ञान, शिक्षा, खेल, कृषि, उद्यमिता, प्रशासन, सेना, तकनीक और सामाजिक सेवा हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का उपयोग करें। नशे, हिंसा, अंधानुकरण और डिजिटल माध्यमों के दुरुपयोग से स्वयं को बचाते हुए वे राष्ट्र के निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। जिस देश के युवाओं में अनुशासन, परिश्रम, ईमानदारी और नवाचार की भावना जाग जाती है, उस देश को आगे बढ़ने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल विकसित भारत का सपना देखने की नहीं, बल्कि उसके लिए राष्ट्रीय संकल्प लेने की है। हमें ऐसा भारत बनाना है जिसमें किसान समृद्ध हो, श्रमिक सम्मानित हो, युवा सक्षम हो, महिला सुरक्षित और आत्मनिर्भर हो, बच्चे शिक्षित हों, बुजुर्ग सम्मान के साथ जीवन जीएं और गरीब व्यक्ति विकास की मुख्यधारा से बाहर न रहे। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ नैतिक रूप से भी मजबूत हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। जब तक व्यक्ति अज्ञान, भय, नशे, गरीबी, भेदभाव और अन्याय से मुक्त नहीं होता, तब तक स्वतंत्रता की यात्रा अधूरी है। इसलिए इस पन्द्रह अगस्त को तिरंगे के सामने हमें केवल देशभक्ति के नारे नहीं लगाने हैं, बल्कि अपने भीतर कर्तव्यबोध जगाना है। हमें यह संकल्प लेना है कि हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझेंगे, कानून का सम्मान करेंगे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करेंगे, प्रकृति को बचाएंगे, सामाजिक सद्भाव बनाए रखेंगे और अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी से योगदान देंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें आजाद भारत सौंपा था। अब विकसित, समृद्ध, सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ, आत्मनिर्भर और संस्कारवान भारत अगली पीढ़ी को सौंपना हमारी जिम्मेदारी है। पन्द्रह अगस्त तभी वास्तव में सुहाना बनेगा, जब तिरंगे की ऊंचाई के साथ हमारे चरित्र की ऊंचाई भी बढ़ेगी। राष्ट्र केवल सरकारों से नहीं बनता, राष्ट्र नागरिकों के चरित्र, श्रम और संकल्प से बनता है। इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर हमारा संकल्प स्पष्ट होना चाहिए कि हम भारत को केवल विकसित अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विकसित चेतना वाला राष्ट्र बनाएंगे। यही स्वतंत्रता के अमृत पर्व की सच्ची सार्थकता होगी और यही उन अनगिनत बलिदानियों के प्रति हमारी वास्तविक श्रद्धांजलि भी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 19:19:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>आजादी का अमृत और आम आदमी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ला</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज पर खड़ा है। तिरंगा हर तरफ दिखाई दे रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देशभक्ति के गीत वातावरण में गूंज रहे हैं और आजादी के संघर्ष की स्मृतियां फिर से हमारे सामने हैं। इन </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">  वर्षों में भारत ने निस्संदेह लंबा सफर तय किया है। कभी खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाला देश आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक भारत ने अपनी क्षमता का परिचय दिया है। सड़क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंकिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं ने करोड़ों लोगों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185281/the-elixir-of-freedom-and-the-common-man"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/images3.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ला</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज पर खड़ा है। तिरंगा हर तरफ दिखाई दे रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देशभक्ति के गीत वातावरण में गूंज रहे हैं और आजादी के संघर्ष की स्मृतियां फिर से हमारे सामने हैं। इन </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में भारत ने निस्संदेह लंबा सफर तय किया है। कभी खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाला देश आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक भारत ने अपनी क्षमता का परिचय दिया है। सड़क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंकिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को बदला है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन भी है। सवाल यह नहीं कि भारत ने कितनी बड़ी इमारतें बनाईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितने किलोमीटर सड़कें बनाई या अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई। असली सवाल यह है कि इन उपलब्धियों का लाभ उस सामान्य नागरिक तक कितना पहुंचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर विकास की पूरी राजनीति खड़ी की जाती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी देश की वास्तविक प्रगति का सबसे विश्वसनीय पैमाना उसकी राजधानी के चमकते रास्ते नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि छोटे शहर के दुकानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव के किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारखाने के मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी तलाशता युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करता परिवार और बीमारी के समय अस्पताल का खर्च उठाने वाला आम आदमी है। यही वह कसौटी है जिस पर आजादी के </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों के सफर को परखना होगा। विकास की चमक और जिंदगी की वास्तविकता भारत में विकास दिखाई देता है। महानगरों में एक्सप्रेसवे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नए हवाई अड्डे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेट्रो रेल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल भुगतान है और आधुनिक कारोबारी केंद्र हैं। छोटे शहर भी बदल रहे हैं। गांवों में सड़क और बिजली की पहुंच पहले की तुलना में बेहतर हुई है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने सूचना को लगभग हर हाथ तक पहुंचा दिया है। लेकिन विकास की यह तस्वीर पूरी कहानी नहीं है। एक तरफ भारत में तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में परिवार आज भी स्थायी और पर्याप्त आय की तलाश में हैं। एक तरफ डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार है और दूसरी तरफ रोजगार की गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित आमदनी और सामाजिक सुरक्षा की चिंता बनी हुई है। यही विरोधाभास आज के भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नागरिक की आर्थिक सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अगर किसी परिवार की आय बढ़ती महंगाई के सामने लगातार कमजोर पड़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च उसके बजट को हिला देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर पढ़ा-लिखा युवा रोजगार के लिए वर्षों इंतजार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल सकल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े उसकी चिंता को समाप्त नहीं कर सकते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आम आदमी के लिए विकास का मतलब क्या है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारों के लिए विकास के अनेक पैमाने हो सकते हैं। सकल घरेलू उत्पाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">औद्योगिक उत्पादन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्यात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी निवेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेलवे परियोजनाएं और डिजिटल लेन-देन—ये सभी विकास की तस्वीर के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। लेकिन आम आदमी के लिए विकास की परिभाषा कहीं सरल है। उसके लिए विकास का अर्थ है—घर में पर्याप्त आमदनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमारी में सस्ता और गुणवत्तापूर्ण इलाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मानजनक जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय तक आसान पहुंच और भविष्य को लेकर भरोसा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक किसान के लिए विकास का अर्थ केवल आधुनिक कृषि तकनीक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसकी उपज का उचित मूल्य और खेती को टिकाऊ बनाने वाली व्यवस्था भी है। एक मजदूर के लिए विकास का अर्थ केवल औद्योगिक परियोजना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नियमित काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक युवा के लिए विकास का अर्थ केवल स्टार्टअप या डिजिटल इंडिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी या व्यवसाय का वास्तविक अवसर है। एक छोटे व्यापारी के लिए विकास का अर्थ केवल बड़े बाजार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऐसा कारोबारी वातावरण है जिसमें वह बिना अनावश्यक दबाव के अपना व्यवसाय चला सके। और एक सामान्य परिवार के लिए विकास का सबसे बड़ा अर्थ है—महीने के अंत में घर का बजट न बिगड़े। आजादी के </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक विशाल युवा आबादी का निर्माण भी है। भारत का युवा वर्ग देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। लेकिन यही युवा वर्ग अगर रोजगार और अवसरों की कमी से निराश होता है तो यही ताकत चुनौती में बदल सकती है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी की तलाश में वर्षों भटकता युवा केवल अपना समय नहीं खोता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी नौकरियां सीमित हैं और निजी क्षेत्र में भी हर नौकरी स्थायी सुरक्षा नहीं देती। </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल बाद सवाल वही है</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">79<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल पहले भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियां तोड़ी थीं। आज हमारे सामने बेड़ियों का स्वरूप अलग है—गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसरों की असमानता और व्यवस्था के प्रति नागरिक का अविश्वास।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनसे लड़ाई किसी एक सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दल या विचारधारा की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जब हम तिरंगे को सलाम करेंगे तो हमें अपनी उपलब्धियों पर गर्व जरूर करना चाहिए। लेकिन गर्व के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि स्वतंत्रता दिवस का अर्थ केवल यह याद करना नहीं कि हम आजाद हुए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका अर्थ यह पूछना भी है कि क्या देश का अंतिम नागरिक अपने जीवन में उस आजादी को महसूस कर पा रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने </span>79 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों में बहुत कुछ हासिल किया है। अब चुनौती यह है कि विकास की चमक और आम आदमी की जिंदगी के बीच की दूरी कम की जाए। जब देश की आर्थिक प्रगति का लाभ शहर से गांव तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग से मजदूर तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक से सामान्य नागरिक तक और सरकारी योजना से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी विकास का दावा वास्तविक अर्थ में सफल माना जाएगा। आजादी का अमृत तभी सार्थक होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसका स्वाद देश के हर नागरिक की जिंदगी में महसूस हो। तिरंगा केवल आसमान में ऊंचा न हो—हर भारतीय का जीवन भी सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसर और सुरक्षा के साथ उतना ही ऊंचा उठे। यही स्वतंत्रता के अगले पड़ाव की सबसे बड़ी परीक्षा है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 19:07:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>संपादकीय पेज के लिए आलेख </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
<div>  </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div>  </div>
<div>  इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं</div>
<div>बेरोजगारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185256/article-for-editorial-page"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img_20260727_151239.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div> </div>
<div> इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी है।</div>
<div>बेरोजगारी </div>
<div> </div>
<div>हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है, जो वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है।आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिस्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है।युवा बेरोजगारी की समस्या चुनौती बनकठभारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक (लगभग 15% से 16% के बीच) है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।</div>
<div> गरीबी की अंतहीन समस्या </div>
<div> </div>
<div>भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। </div>
<div> </div>
<div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है।विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों ($2.15 प्रतिदिन आय) के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ (75 मिलियन) रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग $4.20 प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                                   भुखमरी </strong></div>
<div> </div>
<div>नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को 'गंभीर' श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102 वां है इस के अनुसार 25.8श्रेणी गंभीर प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण 12.0%बाल बौनापन उम्र के हिसाब से कम लंबाई 32.9%बाल कमज़ोरी लंबाई के हिसाब से कम वजन 18.7% रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। </div>
<div> भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था।भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में है। </div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                     भ्रष्टाचार </strong></div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 39 (100 में से) है, जो पिछले वर्ष (2024 में 96वीं रैंक) की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है।डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन (101रैंक)पाकिस्तान (136वीं रैंक), श्रीलंका (107वीं रैंक), और नेपाल (109वीं रैंक) से बेहतर है, लेकिन चीन (76वीं रैंक) और भूटान (18वीं रैंक) से पीछे है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                 गरीब अमीर के बीच खाई </strong></div>
<div> </div>
<div>विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (तीसरा संस्करण) पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है।भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है।देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है।भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है।</div>
<div>जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं; केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान ज़िम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।</div>
<div>                               न्याय बना अन्याय</div>
<div>देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित (पेंडिंग) हैं।अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरणसुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत): लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं।हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय): देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं।जिला और अधीनस्थ अदालतें (निचली अदालतें): कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।</div>
<div>साइबर अपराध </div>
<div>देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल साइबर मामलों में से लगभग 72% से अधिक का उद्देश्य वित्तीय ठगी रहा है महिलाओं के विरुद्ध मामलों में आंशिक (लगभग 1.5%) कमी आई है, जबकि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में लगभग 7.8% की वृद्धि देखी गई है। हत्या के मामलों में लगभग 2.4% की गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि अपहरण और अन्य विवादित मामलों की संख्या में क्षेत्रीय भिन्नता बनी हुई है। वित्तीय गबन और धोखाधड़ी से जुड़े आर्थिक अपराधों में करीब 4.6% की वृद्धि हुई है।</div>
<div>राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट </div>
<div>भारतीयों के राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट के प्रमुख लक्षणों में अनियंत्रित भ्रष्टाचार, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही, नागरिक अनुशासन का अभाव और राष्ट्रहित की तुलना में व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देना शामिल है। समाज में नैतिक मूल्यों और सहिष्णुता की कमी भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।</div>
<div>कभी भारतीय लोगों का राष्ट्रीय चरित्र विविधता में एकता, सहिष्णुता, आतिथ्य-सत्कार, परिवार के प्रति अटूट जुड़ाव और कठिन परिस्थितियों में भी उच्च सहनशक्ति (लचीलेपन) पर आधारित है। यहाँ के समाज में धर्म, आध्यात्मिकता और सामूहिक जीवन की भावना गहराई तक समाई हुई है।लेकिन अब स्थिति भिन्न हो चली है। समाज में नैतिक और सामाजिक पतन की शुरुआत हो गई है। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य और स्वीकृत बात बन गई है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक हैं, लेकिन अपने मूल कर्तव्यों को भूल रहे हैं। विभिन्न समूहों के बीच सहनशीलता घट रही है और असहिष्णुता बढ़ रही है। 'मेरा क्या फायदा' की सोच ने सामूहिक कल्याण और देशभक्ति की भावना को पीछे छोड़ दिया है।सरकारी संपत्तियों, पार्कों और धरोहरों को गंदा करना या नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। यातायात नियमों और सामान्य कानूनों का पालन न करने को शान की बात समझा जाता है। अपराध या दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।</div>
<div>भारत में राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब इतना बढ़ गया है कि पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में सबसे कम समय का उपयोग किया जाता है विपक्ष संसद को अखाड़ा बनाने पर तुला है और सत्ता धारी विपक्ष के साथ सूक्ष्मता आम सहमति बनाने में नाकाम रहे हैं। देश ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर हुए प्रदर्शन में जैनजी के भीतर आक्रोश को देखा वहीं जैनजी के कंधे का इस्तेमाल करने की राजनीति को भी देखा वहीं आंदोलन की आड़ में अराजकता अभद्रता असंयमित गालीबाजी को भी सहन किया। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:13:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वैश्विक द्वंद्व के उपहार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियों में यदि किसी तत्व को रक्त की उपमा दी जाए तो वह निस्संदेह तेल है। विश्व के सभी देशों में भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए हैं इनमें सबसे कम भारत में ही पेट्रोलियम पदार्थों के रेट बढ़ाए गए हैं। यह थोड़ी राहत की बात हो सकती है परंतु भारत की जैसी अर्थव्यवस्था पर निश्चित तौर पर यह बढ़े हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आम जनता पर भारी पड़ सकते हैं। भारत में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने का प्रभाव आम जनता पर हमेशा उनकी जेब पर भारी कटौती किए जाने का अंदेशा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184619/gifts-of-global-conflict"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/s-th.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियों में यदि किसी तत्व को रक्त की उपमा दी जाए तो वह निस्संदेह तेल है। विश्व के सभी देशों में भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए हैं इनमें सबसे कम भारत में ही पेट्रोलियम पदार्थों के रेट बढ़ाए गए हैं। यह थोड़ी राहत की बात हो सकती है परंतु भारत की जैसी अर्थव्यवस्था पर निश्चित तौर पर यह बढ़े हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आम जनता पर भारी पड़ सकते हैं। भारत में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने का प्रभाव आम जनता पर हमेशा उनकी जेब पर भारी कटौती किए जाने का अंदेशा रहता है। भारत एक विकासशील देश है और यहां की अर्थव्यवस्था बहुत ही संवेदनशील एवं परिवर्तनशील है भारत की जनसंख्या वैश्विक देश में अग्रणी मानी जाती है देश में यदि थोड़े से भी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं तो इस पर देश की अर्थव्यवस्था पर भारी परिवर्तन परिलक्षित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पेट्रोलियम पदार्थ केवल वाहनों का ईंधन भर नहीं हैं, बल्कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की गति, उत्पादन, परिवहन, ऊर्जा और व्यापार की आधारशिला हैं। जब तेल की कीमतों में असंतुलित वृद्धि होती है तो उसका प्रभाव केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेतों की मिट्टी से लेकर कारखानों की मशीनों और आम आदमी की रसोई तक महसूस किया जाता है। आज वैश्विक स्तर पर बढ़ती पेट्रोल-डीजल कीमतों ने भारत सहित अनेक देशों की आर्थिक संरचना को झकझोर कर रख दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ओपेक देशों की उत्पादन नीतियां तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर बना दिया। एक समय जो कच्चा तेल 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच उपलब्ध था, वह कई अवसरों पर 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गया। इसका सीधा प्रभाव उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का अर्थ है—देश के आयात बिल में भारी वृद्धि, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और व्यापार घाटे का विस्तार।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि ने परिवहन लागत को तेजी से बढ़ाया। ट्रकों के भाड़े बढ़े तो फल, सब्जी, अनाज, दूध और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी हो गईं। किसान के लिए डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं, बल्कि सिंचाई और कृषि उपकरणों की शक्ति है। डीजल महंगा होने का अर्थ है खेती की लागत बढ़ना। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्पादन महंगा हुआ और महंगाई की दर लगातार ऊपर जाने लगी। आम नागरिक की आय स्थिर रही लेकिन खर्चों में वृद्धि होती गई। मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लिए घरेलू बजट संतुलित करना कठिन हो गया।<br />प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने एक बार कहा था कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें विकासशील देशों के लिए दोहरी चुनौती ह—एक ओर महंगाई बढ़ती है और दूसरी ओर विकास की गति धीमी पड़ती है।<br />         </p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में यही स्थिति आज अनेक देशों में दिखाई देती है। बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ गई। छोटे और मध्यम उद्योग, जो पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा और मंदी से जूझ रहे थे, अब ऊर्जा लागत के दबाव में कमजोर पड़ने लगे हैं।।विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट वैश्विक आर्थिक मंदी को और गहरा कर सकता है। जब परिवहन और उत्पादन महंगा होता है तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। उपभोक्ता कम खरीदारी करते हैं, बाजार की मांग घटती है और उद्योगों का विस्तार रुकने लगता है। यही कारण है कि कई देशों में आर्थिक विकास दर अनुमान से कम रही। यूरोप में गैस और तेल संकट ने ऊर्जा आधारित उद्योगों को प्रभावित किया, जबकि एशियाई देशों में आयात लागत ने आर्थिक संतुलन बिगाड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने कहा था कि यदि उत्पादन और परिवहन महंगे हो जाएं तो बाजार की आत्मा कमजोर पड़ जाती है। आज यह कथन बिल्कुल सटीक प्रतीत होता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल व्यक्तिगत वाहन उपयोग को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि रेल, विमानन, शिपिंग और सार्वजनिक परिवहन की लागत को भी बढ़ाती हैं। विमान कंपनियों ने किराए बढ़ाए, मालवाहक कंपनियों ने अतिरिक्त शुल्क लगाए और इसका भार अंततः उपभोक्ता पर पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार ने समय-समय पर उत्पाद शुल्क में कटौती और राज्यों द्वारा वैट कम करने जैसे कदम उठाए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता ने राहत को सीमित रखा। दूसरी ओर सरकारों के सामने भी चुनौती थी क्योंकि ईंधन पर मिलने वाला कर राजस्व विकास योजनाओं और आधारभूत संरचना निर्माण का महत्वपूर्ण स्रोत है। यदि कर घटाए जाते हैं तो सरकारी आय प्रभावित होती है, और यदि कीमतें बढ़ती हैं तो जनता पर बोझ पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एक जटिल आर्थिक संतुलन बन गया है। ऊर्जा संकट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है। इसलिए विश्व अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत ने सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में कई योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई मंचों पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भारत के भविष्य की आवश्यकता बताया है। उनका मानना है कि यदि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है तो ऊर्जा के क्षेत्र में आयात निर्भरता कम करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि केवल नीतियां बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए, ऊर्जा संरक्षण को जनआंदोलन बनाया जाए और वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों को सस्ता व सुलभ बनाया जाए। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तेल उत्पादक और उपभोक्ता देशों के बीच संतुलित संवाद आवश्यक है, ताकि बाजार में कृत्रिम अस्थिरता कम हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि तेल की बढ़ती धार ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर दिया है। महंगाई, उत्पादन लागत, बेरोजगारी, व्यापार घाटा और आर्थिक असंतुलन जैसी समस्याएं इसी ऊर्जा संकट की परछाईं बनकर उभरी हैं। यदि विश्व को स्थिर और संतुलित आर्थिक विकास की ओर बढ़ना है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, संतुलित नीतियों और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा पेट्रोल-डीजल की यह बढ़ती आग केवल इंजन ही नहीं, अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना को धीरे-धीरे झुलसाती रहेगी।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:07:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत के विकास का अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण, कुछ भी असंभव नहीं </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नेपोलियन का एक बड़ा सूत्र वाक्य था कुछ भी असंभव नहीं है। बिस्मार्क जर्मनी के एक ऐसे सम्राट रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है की उनके हाथों में दो गेंद तथा तीन गेंदें हवा में होती थी, यूरोप का जादूगर भी कहलाता था। पूर्व से ही समुद्रगुप्त ,कनिष्क, सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, शेरशाह सूरी जैसे शासकों का अदम्य आत्मविश्वास एवं संघर्ष करने की क्षमता के फल स्वरुप ही भारत आज इस स्वरूप में विद्यमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिंदगी का कैनवास जन्म से लेकर  जिंदगी के अवसान तक समुद्र की तरह विराट और गहराई लिए हुए होता है। जीवन में वयक्तिक,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183675/economic-view-of-indias-development-nothing-is-impossible"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नेपोलियन का एक बड़ा सूत्र वाक्य था कुछ भी असंभव नहीं है। बिस्मार्क जर्मनी के एक ऐसे सम्राट रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है की उनके हाथों में दो गेंद तथा तीन गेंदें हवा में होती थी, यूरोप का जादूगर भी कहलाता था। पूर्व से ही समुद्रगुप्त ,कनिष्क, सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, शेरशाह सूरी जैसे शासकों का अदम्य आत्मविश्वास एवं संघर्ष करने की क्षमता के फल स्वरुप ही भारत आज इस स्वरूप में विद्यमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिंदगी का कैनवास जन्म से लेकर  जिंदगी के अवसान तक समुद्र की तरह विराट और गहराई लिए हुए होता है। जीवन में वयक्तिक, पारिवारिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विकास की संभावनाओं के साथ मनुष्य अपना जीवन प्रारंभ कर विकास प्रगति तथा ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है,बशर्ते उसके व्यक्तित्व में जीवन के प्रति जीजिविषा, संघर्ष करने की क्षमता, अनंत आत्म विश्वास और संयम के घटक मौजूद हो। ऐतिहासिक तौर पर भारतीय विकास सांस्कृतिक संरचना एवं संस्कार के मूलभूत तत्वों को लेकर दुनिया में अभूतपूर्व रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी भारतवर्ष सभ्यता से लेकर संस्कृति की प्रकृति के मामले में वैभवशाली इतिहास को समेटे हुए हैं। विकास और प्रगति के सोपान को कोई एक दिन वर्ष अथवा दशक में रेखांकित नहीं किया जा सकता, यह एक निरंतर, सतत एवं समय के साथ चलने वाली क्रिया की प्रतिक्रिया है। और प्रकृति सभ्यता तथा मानव जीवन में परिवर्तन एक अकाट्य सत्य और शाश्वत अभिक्रिया है। व्यक्ति के जीवन तथा समाज या देश में विकास के संदर्भ में एवं घटकों को प्रारंभ से आदमी का धन उपार्जन, गरीबी भुखमरी से लड़ाई भूतकाल की कुरीतियों की विडंबना से संघर्ष का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सब से समाज की प्रगति और विकास में राजाओं, सम्राटों की कूटनीति ,राजनीति सर्वोपरि रही है इतिहास से लेकर अब तक मनुष्य देश और विश्व के विकास में राजनैतिक नीति निर्देशक तत्व ही देश को बलवान,शक्तिहीन,भौगोलिक रूप से बड़ा या छोटा बनाते आए हैं। किसी भी राष्ट्र के राजा, सम्राट या राष्ट्र प्रमुख की अपनी क्षमता ,शक्ति, ऊर्जा और उसके विवेक से उस राष्ट्र की प्रगति विशाल या न्यूनतम होती देखी गई है। भूतकाल में कई संघर्षशील एवं उत्साह से लबरेज यात्रियों के वृतांत हमारी नजरों में आए हैं यथा कोलंबस और वास्कोडिगामा जैसे अत्यंत ऊर्जावान संघर्षशील और साहसिक यात्रियों द्वारा लगभग नामुमकिन रास्तों की खोज कर एक मिसाल कायम की है।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी किसी भी राष्ट्र में सदैव विकास वैभव और आर्थिक तंत्र को मजबूत करने की संभावनाएं अवस्थित रहती हैं। भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए भारत में गरीबी, भुखमरी ,बाढ़ तथा अन्य विभीषिका सदैव आती जाती रहती हैं। विशाल जनसंख्या के होने के कारण भारत में ही भारत की बड़ी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है और केवल भारत के कुछ नागरिकों को ही सारी जीवन की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, बाकी लोग इन सुविधाओं से वंचित भी हैं। हमारा देश स्वतंत्रता के बाद से ही आवाज की कमी भूख गरीबी भ्रष्टाचार काला धन हवाला कुपोषण बेरोजगारी की बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद ऐतिहासिक तौर पर देश सांस्कृतिक वैचारिक और संस्कारी ग्रुप से सदैव समृद्ध रहा है और धार्मिक रूप से भी देश में ज्ञान की जड़े बहुत गहराई तक हैं। भारत को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करने के लिए वेद, पुराण, उपनिषद, गीता ,रामायण ,महाभारत महा ग्रंथों की पृष्ठभूमि बड़ी ही शक्तिशाली है। देश में अनेक साधु संत ज्ञानी जिनमें मोहम्मद मूसा कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम चैतन्य, तुलसीदास शंकरदेव जैसे महापुरुषों ने देश के सांस्कृतिक आध्यात्मिक विकास मैं अभूतपूर्व योगदान दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में अनेक विदेशी आक्रमणों को झेल कर उन्हें आत्मसात किया है किंतु हमारी संस्कृत पाली एवं प्राकृत भाषा अन्य भाषाओं के साथ आज भी समृद्ध है। भारत में अनेक भाषा क्षेत्र एवं बोलियां हैं किंतु हिंदी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, मराठी ,असमिया भाषाएं उसी तरह पल्लवित पुष्पित हो रही हैं जैसे की संस्कृत और प्राकृत पाली भाषा होती रही है। भारत में स्वाधीनता के बाद विकास के प्रगति के पथ पर वैज्ञानिक क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास किया और पृथ्वी से लेकर नभ तक हर क्षेत्र में मानव की अतीव उत्कंठा ,जीजिविषा के कारण हमने चांद पर भी अपने वायुयान भेजें हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के नागरिकों की भौतिकवादी सुविधा के लिए भी हमने वतानुकुलित यंत्र ,वायुयान तेज चलने वाली ट्रेनें और वायुमंडल में अनेक ऐसे तथ्यों को जो आज तक छुपे हुए थे उजागर कर अपने महत्व के लिए इसका उपयोग करना शुरू किया है। यह कहावत आशाओं पर आकाश टिका हुआ है और आकाश का कोई अंत नहीं यानी मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है मनुष्य पर सही प्रतीत होती है।इसी तरह प्रगति और विकास का भी कोई अंत या अनंत नहीं है। भारत देश में वैश्विक स्तर पर राजनैतिक सामाजिक वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर काफी प्रगति की एवं विश्व में योग अध्यात्म दर्शन का लोहा भी मनवाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की अभिलाषा का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है, मनुष्य मूल रूप से अत्यंत महत्वकांक्षी,लोलुप एवं इच्छाओं का दास हुआ करता है, ऐसे में पूर्व में किए गए कार्यों को निरंतर सुधार कर उसे नए रूप में प्राप्त करना मनुष्य की अभिलाषा हो सकती है,पर इसके लिए अथक मेहनत संघर्ष आत्मविश्वास एवं संयम की आवश्यकता होगी तभी जाकर हम अपने नए-नए लक्ष्यों को विकास तथा प्रगति के पैमाने पर टटोलकर आगे बढ़ा सकते हैं। पर लक्ष्य की प्राप्ति के साधन जरूर सच्चे ,पवित्र और मानव कल्याण की ओर अग्रेषित होने चाहिए, तब ही विकास प्रगति चाहे वह आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा वैज्ञानिक ही क्यों ना हो सफल हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:32:40 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>आरबीआई के लक्ष्य से ऊपर पहुंची खुदरा महंगाई आम आदमी का बजट बिगड़ा खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183358/retail-inflation-reached-above-rbis-target-common-mans-budget-was"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट पर दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.09 प्रतिशत दर्ज की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि गांव और शहर दोनों ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। फल, सब्जियां, दालें, खाद्य तेल, दूध तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने रसोई का खर्च काफी बढ़ा दिया है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए घर का बजट संभालना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि भी रही है। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव हर उस वस्तु पर पड़ता है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता है। किराना, फल-सब्जियां, दवाइयां, कपड़े, निर्माण सामग्री और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी परिवहन खर्च बढ़ने के कारण ऊपर चली जाती हैं। जून महीने में माल ढुलाई से जुड़ी सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.70 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो यह बताती है कि परिवहन लागत अब महंगाई का बड़ा कारण बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात पर निर्भर देश पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक परिस्थितियां बिगड़ने पर घरेलू बाजार में भी पेट्रोल और डीजल महंगे हो जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब सीधे आम नागरिक की जेब पर महसूस किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के लिए नया आधार वर्ष और नई उपभोक्ता टोकरी लागू होने के बाद यह महंगाई का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। नई उपभोक्ता टोकरी में लोगों की वर्तमान जीवनशैली और खर्च के पैटर्न को अधिक वास्तविक रूप से शामिल किया गया है। इससे महंगाई का आकलन पहले की तुलना में अधिक सटीक माना जा रहा है। हालांकि इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि लोगों के दैनिक खर्च में वास्तविक बढ़ोतरी पहले के अनुमान से अधिक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई का सबसे अधिक असर निश्चित आय वाले परिवारों पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित है या जिनकी आय में नियमित वृद्धि नहीं होती, उनके लिए बढ़ती कीमतों के बीच खर्चों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वेतनभोगी कर्मचारी, छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर और पेंशनभोगी सभी इस स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। आवश्यक वस्तुओं पर अधिक खर्च होने के कारण लोग अन्य जरूरतों पर खर्च कम करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास को संतुलित बनाए रखना है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई के लिए 4 प्रतिशत का लक्ष्य निर्धारित किया है और 2 से 6 प्रतिशत के दायरे को स्वीकार्य सीमा माना गया है। हालांकि जून में महंगाई लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन यह अभी भी आरबीआई की निर्धारित ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत से नीचे है। इसके बावजूद लगातार बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय बन सकती है। यदि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बना रहता है तो ब्याज दरों को लेकर आरबीआई को अधिक सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि मानसून सामान्य रहता है, कृषि उत्पादन अच्छा होता है और सरकार समय रहते आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाती है तो खाद्य महंगाई में कुछ राहत मिल सकती है। अच्छी फसल से सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे महंगाई पर नियंत्रण रखना है तो दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति भी बनाए रखनी है। इसके लिए खाद्य आपूर्ति को मजबूत करना, जमाखोरी पर सख्ती, परिवहन व्यवस्था को सुचारु रखना और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होगा। यदि आपूर्ति श्रृंखला मजबूत रहती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक जानकारों का मानना है कि महंगाई केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन स्तर से है। जब खाद्य पदार्थ, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होती हैं तो परिवारों की बचत कम होने लगती है। उपभोक्ता खर्च घटता है और इसका प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है। इसलिए महंगाई पर नियंत्रण केवल सरकार या आरबीआई की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उत्पादन, आपूर्ति और बाजार व्यवस्था के बेहतर समन्वय से ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जून महीने के महंगाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल नई चुनौती का सामना कर रही है। पिछले 17 महीनों में पहली बार आरबीआई का लक्ष्य टूटना यह बताता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। यदि आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में सरकार, रिजर्व बैंक और संबंधित एजेंसियों को समन्वित प्रयास करते हुए महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय करने होंगे, ताकि आम नागरिक को राहत मिल सके और अर्थव्यवस्था संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ती रहे।</div>
<div style="text-align:justify;">    <strong>  <em>कांतिलाल मांडोत</em></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 19:57:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सीमा पर अविश्वास, बाज़ार में विश्वास — कितना उचित?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>  </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है। भारत सरकार द्वारा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चार चीनी-लिंक्ड पावर उपकरण कंपनियों</span>  (<span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी भारत में विनिर्माण इकाइयाँ हैं) को</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में दो वर्ष के लिए बोली लगाने की अनुमति ऐसा ही एक निर्णय है। इसे महज़ व्यापारिक उदारीकरण मानना भूल होगी। यह उस द्वंद्व का प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक ओर आर्थिक विकास की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का अटल दायित्व। गलवान की रक्तरंजित स्मृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182830/distrust-at-the-border-trust-in-the-market-%E2%80%93-how"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है। भारत सरकार द्वारा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चार चीनी-लिंक्ड पावर उपकरण कंपनियों</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी भारत में विनिर्माण इकाइयाँ हैं) को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में दो वर्ष के लिए बोली लगाने की अनुमति ऐसा ही एक निर्णय है। इसे महज़ व्यापारिक उदारीकरण मानना भूल होगी। यह उस द्वंद्व का प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक ओर आर्थिक विकास की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का अटल दायित्व। गलवान की रक्तरंजित स्मृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना में अंकित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वी लद्दाख की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूर्ण डी-एस्केलेशन अभी बाकी है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और दोनों देशों के बीच विश्वास अब भी अधूरा है। फिर भी आर्थिक आवश्यकताओं ने संवाद के द्वार फिर खटखटाए हैं। प्रश्न केवल चीनी कंपनियों की वापसी का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि क्या भारत इसे अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप नियंत्रित कर पाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या आर्थिक आवश्यकता धीरे-धीरे रणनीतिक निर्भरता में बदल जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर बड़े राष्ट्रीय निर्णय के पीछे आर्थिक यथार्थ की कठोर परत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत ऊर्जा संक्रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च गति रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट सिटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित अवसंरचना और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के निर्णायक दौर में है। इनके लिए भारी निवेश के साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र निष्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धी लागत आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर कई चीनी कंपनियाँ कम समय और लागत में विशाल परियोजनाएँ पूरी करने में सक्षम हैं। दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमी कंपनियाँ अपेक्षाकृत महँगी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि भारतीय उद्योग अभी सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर नहीं हैं। ऐसे में सस्ता और सक्षम विकल्प आकर्षित करता है। किंतु इतिहास चेतावनी देता है कि आज का आर्थिक लाभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि दूरदृष्टि न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कल रणनीतिक स्वतंत्रता पर बोझ बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं आर्थिक आवश्यकता और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे कठिन टकराव सामने आता है। सुरक्षा एजेंसियों की आशंकाएँ पूर्वाग्रह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वैश्विक अनुभवों पर आधारित हैं। अनेक चीनी कंपनियों और उनकी सरकार के निकट संबंधों को लेकर कई देश चिंता जता चुके हैं। यदि ऐसी कंपनियों की पहुँच बिजली ग्रिड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरसंचार नेटवर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेलवे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंदरगाह और डिजिटल अवसंरचना जैसे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो डेटा संग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर निगरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संभावित बैकडोर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लॉजिस्टिक नियंत्रण के जोखिम बढ़ जाते हैं। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि डेटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल नेटवर्क और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं पर भी लड़े जाते हैं। ऐसे में प्रश्न यही है कि क्या औपचारिक सुरक्षा जाँच और कागजी मंजूरियाँ इन अदृश्य खतरों से देश की रक्षा कर पाएँगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या यही ढील भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे महँगी कीमत बन जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि जब विश्व आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भारत एक अलग द्वंद्व से गुजर रहा है। आज विश्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चीन प्लस वन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीति के तहत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में चीन पर निर्भरता घटाकर भारत जैसे देशों की ओर आशा से देख रहा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु इसी समय भारत चीनी कंपनियों के लिए नए आर्थिक द्वार खोल रहा है। यह हमारी दोहरी वास्तविकता को उजागर करता है। एक ओर आत्मनिर्भर भारत का संकल्प है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर वैश्विक उत्पादन व्यवस्था की जटिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पूर्ण आर्थिक पृथक्करण व्यवहारिक नहीं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित स्पष्ट शर्तों के बिना यह खुलापन तकनीकी निर्भरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी नियंत्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक दबाव और ऋण-जाल जैसी चुनौतियाँ बढ़ा सकता है। इसलिए निवेश का स्वागत तभी उचित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह भारत को सशक्त बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भर नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट है कि इस चुनौती का उत्तर न अतिवादी विरोध में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न बिना शर्त स्वीकार्यता में। भारत को विवेकपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रित और राष्ट्रीय सुरक्षा-आधारित सहयोग की नीति अपनानी होगी। चीनी कंपनियों की भागीदारी केवल गैर-संवेदनशील क्षेत्रों तक सीमित रहे। प्रत्येक परियोजना में डेटा लोकलाइजेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौद्योगिकी हस्तांतरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानीय सामग्री और भारतीय साझेदारी सुनिश्चित हो तथा हर चरण में कठोर साइबर सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। साथ ही घरेलू उद्योगों को अनुसंधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वित्तीय सहयोग और तकनीकी प्रोत्साहन मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि दीर्घकाल में भारत बाहरी तकनीकी निर्भरता से मुक्त हो सके। यदि सस्ती परियोजनाओं के आकर्षण में इन सुरक्षा उपायों की अनदेखी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आज का आर्थिक लाभ कल की रणनीतिक कमजोरी बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय की कूटनीतिक गूँज भी इसके आर्थिक प्रभावों जितनी दूरगामी है। लद्दाख में सैन्य और राजनयिक वार्ताएँ जारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु विश्वास की पुनर्स्थापना अब भी अधूरी है। ऐसे समय में चीनी कंपनियों की वापसी का संदेश केवल बीजिंग ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरा विश्व देख रहा है। इसे एक ओर संतुलित और नियंत्रित सहयोग की नीति माना जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर यह आशंका भी है कि भारत अनजाने में अपने रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी को आर्थिक अवसर दे रहा है। परिपक्व कूटनीति का अर्थ स्थायी शत्रुता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित संवाद है। किंतु यह तभी सार्थक होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसकी नींव समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शिता और पारस्परिक उत्तरदायित्व पर टिकी हो। आर्थिक संबंध किसी भी स्थिति में ऐसी निर्भरता में न बदलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भविष्य में भारत की निर्णय-स्वतंत्रता को प्रभावित करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविक कसौटी चीनी कंपनियों की वापसी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदृष्टि और नीति-परिपक्वता है। न भावनात्मक चीन-विरोध आर्थिक उन्नति का आधार बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए सुरक्षा संबंधी आशंकाओं की उपेक्षा की जा सकती है। भारत को ऐसा संतुलन स्थापित करना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मनिर्भरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ें। विवेकपूर्ण संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अटूट सुरक्षा-सतर्कता और स्वदेशी क्षमता निर्माण ही सशक्त भारत की नींव हैं। यदि भारत यह संतुलन साध लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सीमित छूट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल आर्थिक आवश्यकता का प्रतीक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस परिपक्व राष्ट्र की पहचान बनेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वैश्विक अवसरों का स्वागत करते हुए अपनी संप्रभुता की रक्षा भी करता है। अंततः इतिहास सम्मान उन्हीं राष्ट्रों को देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्षणिक लाभ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दूरदृष्टि से अपना भविष्य गढ़ते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182830/distrust-at-the-border-trust-in-the-market-%E2%80%93-how</link>
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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 21:53:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी की 12 वर्षों की सत्ता और आम आदमी: वादे, बदलाव और ज़मीनी हकीकत</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181933/modis-12-years-in-power-and-common-mans-promises-change"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(3).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला। स्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण शौचालय कवरेज को तेज़ी से बढ़ाया। आयुष्मान भारत योजना ने 5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा गरीब परिवारों तक पहुंचाया। जनधन खातों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया और कोविड काल में डीबीटी से करोड़ों लोगों को सीधी मदद मिली। </p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी लाभ के लिए बिचौलियों पर निर्भरता घटी। बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट का दायरा बढ़ा, जिससे UPI आज छोटे दुकानदार से लेकर ठेले वाले तक इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
<p><br />                हम बात करें इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल भारत की तो इसमें भी प्रगति हुई है और कई सुधार अभी भी बाकी हैं। सड़क, रेल, हवाई अड्डे और एक्सप्रेसवे के निर्माण में तेज़ी आई। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, अटल टनल, और नए वंदे भारत ट्रेनें आम यात्रियों के सफर को तेज़ और सुरक्षित बनाने की कोशिश हैं। डिजिटल इंडिया के तहत इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच गांवों तक बढ़ी। इससे शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं मोबाइल पर आ गईं।</p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका फायदा समय की बचत और लागत में कमी के रूप में दिखा। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी इंटरनेट की गुणवत्ता और बिजली की आपूर्ति असमान बनी हुई है। हालांकि कर और अर्थव्यवस्था में बदलाव तो हुआ है लेकिन महंगाई के कारण अभी उतनी राहत महसूस नहीं हुई है । GST लागू होने से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एकजुट हुई। छोटे व्यापारियों के लिए शुरू में जटिलता बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे फाइलिंग आसान हुई। नोटबंदी 2016 का मकसद काला धन और नकली नोट पर चोट था, लेकिन इसका तत्काल असर छोटे कारोबार और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा। महंगाई, बेरोजगारी और निजी निवेश की रफ्तार आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता बनी रही। कोरोना के बाद रिकवरी तेज़ रही, लेकिन असंगठित क्षेत्र में रोज़गार और आय अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं आई है।</p>
<p><br /> राजनीतिक संवाद और छवि की बात की जाये तो इसमें मोदी सरकार का कोई जोड़ नहीं है। मोदी की सरकार ने सीधे संवाद पर ज़ोर दिया। मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिए प्रधानमंत्री खुद जनता से जुड़े रहे। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केंद्र में रहा। विरोधियों का आरोप रहा कि आलोचना को जगह कम मिली और मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा। आम आदमी के लिए इसका असर यह हुआ कि सरकार की योजनाओं की जानकारी तेज़ी से पहुंची, लेकिन विपरीत राय और स्थानीय समस्याएं कई बार राष्ट्रीय बहस में जगह नहीं बना पाईं।</p>
<p><br /> अलग हम इसकी ज़मीनी हकीकत जानें और यह पता करें कि क्या बदला? तो 12 साल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार सीधे नागरिक तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। पहले जहां फाइलों और दफ्तरों में काम अटकता था, अब ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स से काम होता है। गरीबों के लिए रसोई गैस, शौचालय, बिजली और बैंक खाता पहले से ज्यादा सुलभ हुए हैं। दूसरी तरफ, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय और शिक्षा-स्वास्थ्य की गुणवत्ता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती हैं। मध्यम वर्ग टैक्स और जीवनयापन की लागत को लेकर दबाव महसूस करता है। ग्रामीण भारत में कृषि पर निर्भरता और मौसम की मार अब भी जीवन को अनिश्चित रखती है।</p>
<p>मोदी की 12 साल की सत्ता ने आम आदमी की ज़िंदगी में बुनियादी सुविधाओं और डिजिटल पहुंच के मामले में ठोस बदलाव लाए हैं। योजनाओं का लाभ पहले से ज्यादा पारदर्शी हुआ है। लेकिन रोज़गार, महंगाई और असमानता जैसे संरचनात्मक मुद्दे बने हुए हैं। आम आदमी के लिए यह कार्यकाल सुविधाओं में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव दोनों का मिश्रण रहा है। 2026 की सियासत इस बात पर टिकी होगी कि क्या सरकार इन बदलावों को स्थायी रोज़गार और आय में बदल पाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:41:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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