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                <title>Indian economy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian economy RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आरबीआई के लक्ष्य से ऊपर पहुंची खुदरा महंगाई आम आदमी का बजट बिगड़ा खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183358/retail-inflation-reached-above-rbis-target-common-mans-budget-was"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट पर दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.09 प्रतिशत दर्ज की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि गांव और शहर दोनों ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। फल, सब्जियां, दालें, खाद्य तेल, दूध तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने रसोई का खर्च काफी बढ़ा दिया है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए घर का बजट संभालना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि भी रही है। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव हर उस वस्तु पर पड़ता है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता है। किराना, फल-सब्जियां, दवाइयां, कपड़े, निर्माण सामग्री और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी परिवहन खर्च बढ़ने के कारण ऊपर चली जाती हैं। जून महीने में माल ढुलाई से जुड़ी सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.70 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो यह बताती है कि परिवहन लागत अब महंगाई का बड़ा कारण बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात पर निर्भर देश पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक परिस्थितियां बिगड़ने पर घरेलू बाजार में भी पेट्रोल और डीजल महंगे हो जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब सीधे आम नागरिक की जेब पर महसूस किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के लिए नया आधार वर्ष और नई उपभोक्ता टोकरी लागू होने के बाद यह महंगाई का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। नई उपभोक्ता टोकरी में लोगों की वर्तमान जीवनशैली और खर्च के पैटर्न को अधिक वास्तविक रूप से शामिल किया गया है। इससे महंगाई का आकलन पहले की तुलना में अधिक सटीक माना जा रहा है। हालांकि इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि लोगों के दैनिक खर्च में वास्तविक बढ़ोतरी पहले के अनुमान से अधिक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई का सबसे अधिक असर निश्चित आय वाले परिवारों पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित है या जिनकी आय में नियमित वृद्धि नहीं होती, उनके लिए बढ़ती कीमतों के बीच खर्चों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वेतनभोगी कर्मचारी, छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर और पेंशनभोगी सभी इस स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। आवश्यक वस्तुओं पर अधिक खर्च होने के कारण लोग अन्य जरूरतों पर खर्च कम करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास को संतुलित बनाए रखना है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई के लिए 4 प्रतिशत का लक्ष्य निर्धारित किया है और 2 से 6 प्रतिशत के दायरे को स्वीकार्य सीमा माना गया है। हालांकि जून में महंगाई लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन यह अभी भी आरबीआई की निर्धारित ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत से नीचे है। इसके बावजूद लगातार बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय बन सकती है। यदि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बना रहता है तो ब्याज दरों को लेकर आरबीआई को अधिक सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि मानसून सामान्य रहता है, कृषि उत्पादन अच्छा होता है और सरकार समय रहते आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाती है तो खाद्य महंगाई में कुछ राहत मिल सकती है। अच्छी फसल से सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे महंगाई पर नियंत्रण रखना है तो दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति भी बनाए रखनी है। इसके लिए खाद्य आपूर्ति को मजबूत करना, जमाखोरी पर सख्ती, परिवहन व्यवस्था को सुचारु रखना और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होगा। यदि आपूर्ति श्रृंखला मजबूत रहती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक जानकारों का मानना है कि महंगाई केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन स्तर से है। जब खाद्य पदार्थ, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होती हैं तो परिवारों की बचत कम होने लगती है। उपभोक्ता खर्च घटता है और इसका प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है। इसलिए महंगाई पर नियंत्रण केवल सरकार या आरबीआई की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उत्पादन, आपूर्ति और बाजार व्यवस्था के बेहतर समन्वय से ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जून महीने के महंगाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल नई चुनौती का सामना कर रही है। पिछले 17 महीनों में पहली बार आरबीआई का लक्ष्य टूटना यह बताता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। यदि आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में सरकार, रिजर्व बैंक और संबंधित एजेंसियों को समन्वित प्रयास करते हुए महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय करने होंगे, ताकि आम नागरिक को राहत मिल सके और अर्थव्यवस्था संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ती रहे।</div>
<div style="text-align:justify;">    <strong>  <em>कांतिलाल मांडोत</em></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 19:57:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सीमा पर अविश्वास, बाज़ार में विश्वास — कितना उचित?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>  </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है। भारत सरकार द्वारा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चार चीनी-लिंक्ड पावर उपकरण कंपनियों</span>  (<span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी भारत में विनिर्माण इकाइयाँ हैं) को</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में दो वर्ष के लिए बोली लगाने की अनुमति ऐसा ही एक निर्णय है। इसे महज़ व्यापारिक उदारीकरण मानना भूल होगी। यह उस द्वंद्व का प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक ओर आर्थिक विकास की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का अटल दायित्व। गलवान की रक्तरंजित स्मृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182830/distrust-at-the-border-trust-in-the-market-%E2%80%93-how"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है। भारत सरकार द्वारा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चार चीनी-लिंक्ड पावर उपकरण कंपनियों</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी भारत में विनिर्माण इकाइयाँ हैं) को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में दो वर्ष के लिए बोली लगाने की अनुमति ऐसा ही एक निर्णय है। इसे महज़ व्यापारिक उदारीकरण मानना भूल होगी। यह उस द्वंद्व का प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक ओर आर्थिक विकास की आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का अटल दायित्व। गलवान की रक्तरंजित स्मृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना में अंकित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वी लद्दाख की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूर्ण डी-एस्केलेशन अभी बाकी है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और दोनों देशों के बीच विश्वास अब भी अधूरा है। फिर भी आर्थिक आवश्यकताओं ने संवाद के द्वार फिर खटखटाए हैं। प्रश्न केवल चीनी कंपनियों की वापसी का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि क्या भारत इसे अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप नियंत्रित कर पाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या आर्थिक आवश्यकता धीरे-धीरे रणनीतिक निर्भरता में बदल जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर बड़े राष्ट्रीय निर्णय के पीछे आर्थिक यथार्थ की कठोर परत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत ऊर्जा संक्रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च गति रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट सिटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित अवसंरचना और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के निर्णायक दौर में है। इनके लिए भारी निवेश के साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र निष्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धी लागत आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर कई चीनी कंपनियाँ कम समय और लागत में विशाल परियोजनाएँ पूरी करने में सक्षम हैं। दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमी कंपनियाँ अपेक्षाकृत महँगी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि भारतीय उद्योग अभी सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर नहीं हैं। ऐसे में सस्ता और सक्षम विकल्प आकर्षित करता है। किंतु इतिहास चेतावनी देता है कि आज का आर्थिक लाभ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि दूरदृष्टि न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कल रणनीतिक स्वतंत्रता पर बोझ बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं आर्थिक आवश्यकता और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे कठिन टकराव सामने आता है। सुरक्षा एजेंसियों की आशंकाएँ पूर्वाग्रह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वैश्विक अनुभवों पर आधारित हैं। अनेक चीनी कंपनियों और उनकी सरकार के निकट संबंधों को लेकर कई देश चिंता जता चुके हैं। यदि ऐसी कंपनियों की पहुँच बिजली ग्रिड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरसंचार नेटवर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेलवे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंदरगाह और डिजिटल अवसंरचना जैसे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो डेटा संग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर निगरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संभावित बैकडोर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लॉजिस्टिक नियंत्रण के जोखिम बढ़ जाते हैं। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि डेटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल नेटवर्क और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं पर भी लड़े जाते हैं। ऐसे में प्रश्न यही है कि क्या औपचारिक सुरक्षा जाँच और कागजी मंजूरियाँ इन अदृश्य खतरों से देश की रक्षा कर पाएँगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या यही ढील भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे महँगी कीमत बन जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि जब विश्व आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भारत एक अलग द्वंद्व से गुजर रहा है। आज विश्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">चीन प्लस वन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीति के तहत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में चीन पर निर्भरता घटाकर भारत जैसे देशों की ओर आशा से देख रहा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु इसी समय भारत चीनी कंपनियों के लिए नए आर्थिक द्वार खोल रहा है। यह हमारी दोहरी वास्तविकता को उजागर करता है। एक ओर आत्मनिर्भर भारत का संकल्प है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर वैश्विक उत्पादन व्यवस्था की जटिलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पूर्ण आर्थिक पृथक्करण व्यवहारिक नहीं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित स्पष्ट शर्तों के बिना यह खुलापन तकनीकी निर्भरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी नियंत्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक दबाव और ऋण-जाल जैसी चुनौतियाँ बढ़ा सकता है। इसलिए निवेश का स्वागत तभी उचित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह भारत को सशक्त बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भर नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट है कि इस चुनौती का उत्तर न अतिवादी विरोध में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न बिना शर्त स्वीकार्यता में। भारत को विवेकपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रित और राष्ट्रीय सुरक्षा-आधारित सहयोग की नीति अपनानी होगी। चीनी कंपनियों की भागीदारी केवल गैर-संवेदनशील क्षेत्रों तक सीमित रहे। प्रत्येक परियोजना में डेटा लोकलाइजेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौद्योगिकी हस्तांतरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानीय सामग्री और भारतीय साझेदारी सुनिश्चित हो तथा हर चरण में कठोर साइबर सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। साथ ही घरेलू उद्योगों को अनुसंधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वित्तीय सहयोग और तकनीकी प्रोत्साहन मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि दीर्घकाल में भारत बाहरी तकनीकी निर्भरता से मुक्त हो सके। यदि सस्ती परियोजनाओं के आकर्षण में इन सुरक्षा उपायों की अनदेखी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आज का आर्थिक लाभ कल की रणनीतिक कमजोरी बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय की कूटनीतिक गूँज भी इसके आर्थिक प्रभावों जितनी दूरगामी है। लद्दाख में सैन्य और राजनयिक वार्ताएँ जारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु विश्वास की पुनर्स्थापना अब भी अधूरी है। ऐसे समय में चीनी कंपनियों की वापसी का संदेश केवल बीजिंग ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरा विश्व देख रहा है। इसे एक ओर संतुलित और नियंत्रित सहयोग की नीति माना जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर यह आशंका भी है कि भारत अनजाने में अपने रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी को आर्थिक अवसर दे रहा है। परिपक्व कूटनीति का अर्थ स्थायी शत्रुता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित संवाद है। किंतु यह तभी सार्थक होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसकी नींव समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शिता और पारस्परिक उत्तरदायित्व पर टिकी हो। आर्थिक संबंध किसी भी स्थिति में ऐसी निर्भरता में न बदलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भविष्य में भारत की निर्णय-स्वतंत्रता को प्रभावित करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविक कसौटी चीनी कंपनियों की वापसी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदृष्टि और नीति-परिपक्वता है। न भावनात्मक चीन-विरोध आर्थिक उन्नति का आधार बन सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए सुरक्षा संबंधी आशंकाओं की उपेक्षा की जा सकती है। भारत को ऐसा संतुलन स्थापित करना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मनिर्भरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ें। विवेकपूर्ण संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अटूट सुरक्षा-सतर्कता और स्वदेशी क्षमता निर्माण ही सशक्त भारत की नींव हैं। यदि भारत यह संतुलन साध लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सीमित छूट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल आर्थिक आवश्यकता का प्रतीक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस परिपक्व राष्ट्र की पहचान बनेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वैश्विक अवसरों का स्वागत करते हुए अपनी संप्रभुता की रक्षा भी करता है। अंततः इतिहास सम्मान उन्हीं राष्ट्रों को देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्षणिक लाभ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दूरदृष्टि से अपना भविष्य गढ़ते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 21:53:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी की 12 वर्षों की सत्ता और आम आदमी: वादे, बदलाव और ज़मीनी हकीकत</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181933/modis-12-years-in-power-and-common-mans-promises-change"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(3).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला। स्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण शौचालय कवरेज को तेज़ी से बढ़ाया। आयुष्मान भारत योजना ने 5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा गरीब परिवारों तक पहुंचाया। जनधन खातों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया और कोविड काल में डीबीटी से करोड़ों लोगों को सीधी मदद मिली। </p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी लाभ के लिए बिचौलियों पर निर्भरता घटी। बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट का दायरा बढ़ा, जिससे UPI आज छोटे दुकानदार से लेकर ठेले वाले तक इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
<p><br />                हम बात करें इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल भारत की तो इसमें भी प्रगति हुई है और कई सुधार अभी भी बाकी हैं। सड़क, रेल, हवाई अड्डे और एक्सप्रेसवे के निर्माण में तेज़ी आई। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, अटल टनल, और नए वंदे भारत ट्रेनें आम यात्रियों के सफर को तेज़ और सुरक्षित बनाने की कोशिश हैं। डिजिटल इंडिया के तहत इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच गांवों तक बढ़ी। इससे शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं मोबाइल पर आ गईं।</p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका फायदा समय की बचत और लागत में कमी के रूप में दिखा। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी इंटरनेट की गुणवत्ता और बिजली की आपूर्ति असमान बनी हुई है। हालांकि कर और अर्थव्यवस्था में बदलाव तो हुआ है लेकिन महंगाई के कारण अभी उतनी राहत महसूस नहीं हुई है । GST लागू होने से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एकजुट हुई। छोटे व्यापारियों के लिए शुरू में जटिलता बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे फाइलिंग आसान हुई। नोटबंदी 2016 का मकसद काला धन और नकली नोट पर चोट था, लेकिन इसका तत्काल असर छोटे कारोबार और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा। महंगाई, बेरोजगारी और निजी निवेश की रफ्तार आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता बनी रही। कोरोना के बाद रिकवरी तेज़ रही, लेकिन असंगठित क्षेत्र में रोज़गार और आय अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं आई है।</p>
<p><br /> राजनीतिक संवाद और छवि की बात की जाये तो इसमें मोदी सरकार का कोई जोड़ नहीं है। मोदी की सरकार ने सीधे संवाद पर ज़ोर दिया। मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिए प्रधानमंत्री खुद जनता से जुड़े रहे। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केंद्र में रहा। विरोधियों का आरोप रहा कि आलोचना को जगह कम मिली और मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा। आम आदमी के लिए इसका असर यह हुआ कि सरकार की योजनाओं की जानकारी तेज़ी से पहुंची, लेकिन विपरीत राय और स्थानीय समस्याएं कई बार राष्ट्रीय बहस में जगह नहीं बना पाईं।</p>
<p><br /> अलग हम इसकी ज़मीनी हकीकत जानें और यह पता करें कि क्या बदला? तो 12 साल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार सीधे नागरिक तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। पहले जहां फाइलों और दफ्तरों में काम अटकता था, अब ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स से काम होता है। गरीबों के लिए रसोई गैस, शौचालय, बिजली और बैंक खाता पहले से ज्यादा सुलभ हुए हैं। दूसरी तरफ, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय और शिक्षा-स्वास्थ्य की गुणवत्ता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती हैं। मध्यम वर्ग टैक्स और जीवनयापन की लागत को लेकर दबाव महसूस करता है। ग्रामीण भारत में कृषि पर निर्भरता और मौसम की मार अब भी जीवन को अनिश्चित रखती है।</p>
<p>मोदी की 12 साल की सत्ता ने आम आदमी की ज़िंदगी में बुनियादी सुविधाओं और डिजिटल पहुंच के मामले में ठोस बदलाव लाए हैं। योजनाओं का लाभ पहले से ज्यादा पारदर्शी हुआ है। लेकिन रोज़गार, महंगाई और असमानता जैसे संरचनात्मक मुद्दे बने हुए हैं। आम आदमी के लिए यह कार्यकाल सुविधाओं में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव दोनों का मिश्रण रहा है। 2026 की सियासत इस बात पर टिकी होगी कि क्या सरकार इन बदलावों को स्थायी रोज़गार और आय में बदल पाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:41:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बढ़ती कीमतों से बिगड़ी मध्यवर्गीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मानवी अहंकार के परिणाम स्वरूप अमेरिका ईरान इजरायल और यूक्रेन रूस युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों के दाम लगभग विश्व के हर देश में बढ़ गए हैं। इसी परिपेक्ष में भारत में भी बढ़ते पेट्रोल डीजल के दामों के करण भारतीय मध्यम वर्गीय अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना बृहद रूप में प्रभावित हुई है । विश्व स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों और शक्ति-संघर्षों का सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-पूर्व में इजरायल से जुड़े संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180351/middle-class-socio-economic-system-deteriorated-due-to-rising-prices"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानवी अहंकार के परिणाम स्वरूप अमेरिका ईरान इजरायल और यूक्रेन रूस युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों के दाम लगभग विश्व के हर देश में बढ़ गए हैं। इसी परिपेक्ष में भारत में भी बढ़ते पेट्रोल डीजल के दामों के करण भारतीय मध्यम वर्गीय अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना बृहद रूप में प्रभावित हुई है । विश्व स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों और शक्ति-संघर्षों का सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-पूर्व में इजरायल से जुड़े संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि ने लगभग प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों ने विशेष रूप से भारतीय मध्यम वर्ग की आर्थिक और सामाजिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने के साधन नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ हैं। परिवहन, कृषि, उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र लगभग सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर निर्भर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डीजल की कीमतों में वृद्धि का सबसे अधिक प्रभाव परिवहन क्षेत्र पर पड़ता है। देश में अधिकांश माल ढुलाई ट्रकों के माध्यम से होती है। जब डीजल महंगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि खाद्यान्न, फल-सब्जियां, दूध, दालें, निर्माण सामग्री और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें स्वतः बढ़ने लगती हैं। व्यापारी अतिरिक्त लागत का भार अंततः उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं। इस प्रकार महंगाई का एक ऐसा चक्र प्रारंभ हो जाता है, जिससे सामान्य नागरिक बच नहीं पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मध्यम वर्ग पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों ने उसकी मासिक आय और व्यय के संतुलन को और बिगाड़ दिया है। जिन परिवारों के पास निजी वाहन हैं, उनके लिए कार्यालय, विद्यालय और अन्य आवश्यक यात्राओं का खर्च बढ़ गया है। वहीं रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप परिवारों को अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच समझौता करना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई का सामाजिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं है। जब आय स्थिर हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए, तो परिवारों में तनाव बढ़ने लगता है। आर्थिक दबाव पारिवारिक संबंधों, सामाजिक सहभागिता और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। मध्यम वर्ग, जो समाज की स्थिरता और विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, स्वयं असुरक्षा और भविष्य की चिंताओं से घिर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि क्षेत्र भी इससे प्रभावित हुआ है। डीजल से चलने वाले पंप, ट्रैक्टर और कृषि यंत्रों की लागत बढ़ने से खेती महंगी हो गई है। उत्पादन लागत बढ़ने पर किसान अपनी उपज का उचित मूल्य चाहते हैं, जिससे बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस प्रकार महंगाई का प्रभाव खेत से लेकर थाली तक दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्थशास्त्री लंबे समय से कहते रहे हैं कि ऊर्जा की कीमतें किसी भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक होती हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने अनेक अवसरों पर ऊर्जा सुरक्षा को आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक बताया था। वहीं अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भी विकास को केवल आय वृद्धि नहीं बल्कि जीवन-स्तर की गुणवत्ता से जोड़कर देखा है। यदि बढ़ती महंगाई लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को प्रभावित करती है, तो विकास का वास्तविक लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि वैश्विक स्तर पर युद्ध और संघर्ष की राजनीति के स्थान पर संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में और अधिक प्रयास करने होंगे। सौर ऊर्जा, जैव ईंधन और विद्युत वाहनों को बढ़ावा देकर पेट्रोलियम पर निर्भरता कम की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ती पेट्रोलियम कीमतें केवल आर्थिक समस्या नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक स्थिरता और जीवन की गुणवत्ता से भी जुड़ी हुई हैं। युद्धों और वैश्विक तनावों की कीमत अंततः आम नागरिक चुकाता है। इसलिए विश्व शांति, ऊर्जा सुरक्षा और संतुलित आर्थिक नीतियां ही मध्यम वर्ग को राहत प्रदान कर सकती हैं। जब तक पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक महंगाई का दबाव भारतीय मध्यम वर्ग की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करता रहेगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:43:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जल्दी शुरू हो सकते हैं प्लास्टिक के नोट</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>संवाददाता सचिन बाजपेई </strong></p>
<div>
<div><strong>नई दिल्ली,</strong> रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) जल्द ही प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोट जारी करने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकता है। कागजी नोटों की बढ़ती मांग, मुद्रण लागत में तेज वृद्धि और जल्द खराब होने वाली करेंसी को ध्यान में रखते हुए आरबीआई एक दशक पुरानी योजना को पुनर्जीवित कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, जल्द ही 10 और 20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है।</div>
<div>  </div>
<div><strong>आरबीआई की योजना और पृष्ठभूमि</strong></div>
<div>आरबीआई के पिछले दो बोर्ड मीटिंग्स (पटना और मुंबई) में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई</div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180346/plastic-notes-may-be-introduced-soon"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/plastic-notes.webp" alt=""></a><br /><p><strong>संवाददाता सचिन बाजपेई </strong></p>
<div>
<div><strong>नई दिल्ली,</strong> रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) जल्द ही प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोट जारी करने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकता है। कागजी नोटों की बढ़ती मांग, मुद्रण लागत में तेज वृद्धि और जल्द खराब होने वाली करेंसी को ध्यान में रखते हुए आरबीआई एक दशक पुरानी योजना को पुनर्जीवित कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, जल्द ही 10 और 20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है।</div>
<div> </div>
<div><strong>आरबीआई की योजना और पृष्ठभूमि</strong></div>
<div>आरबीआई के पिछले दो बोर्ड मीटिंग्स (पटना और मुंबई) में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई है। प्रमुख मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरबीआई एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा करने वाला है, जिसमें पॉलीमर नोटों को आम जनता के बीच परीक्षण के लिए जारी किया जाएगा। यह योजना 2012 में शुरू की गई थी, जब पांच शहरों में 10 के पॉलीमर नोटों का पायलट चलाया गया था। लेकिन उस समय एटीएम मशीनें इन मोटे नोटों को हैंडल नहीं कर पाती थीं, जिसके कारण योजना रोक दी गई। अब तकनीकी प्रगति के साथ यह समस्या हल हो चुकी है।</div>
<div> </div>
<div><strong>क्यों ला रहा है आरबीआई प्लास्टिक नोट?</strong></div>
<div>-बढ़ती करेंसी डिमांड: डिजिटल पेमेंट्स के बावजूद भौतिक करेंसी की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में करेंसी इन सर्कुलेशन 42.86 ट्रिलियन के करीब पहुंच गई है, जो पिछले साल की तुलना में 11.5% अधिक है।</div>
<div>-मुद्रण लागत का बोझ:वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने पर 6,373 करोड़ खर्च हुए। कागजी नोट जल्दी गंदे और फट जाते हैं, जिससे हर साल अरबों नोट वापस लिए जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>टिकाऊपन: </strong>पॉलीमर नोट कागजी नोटों की तुलना में 3-4 गुना अधिक टिकाऊ होते हैं। ये पानी, गंदगी और फटने से ज्यादा सुरक्षित रहते हैं।</div>
<div><strong>जालसाजी रोकथाम:</strong> पॉलीमर नोटों में बेहतर सिक्योरिटी फीचर्स लगाए जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों को बनाना और मुश्किल हो जाएगा।</div>
<div>पॉलीमर नोट क्या हैं?</div>
<div>पॉलीमर नोट प्लास्टिक जैव-आधारित पॉलीप्रोपाइलीन या समान सामग्री से बने होते हैं। दुनिया भर में 60 से ज्यादा देश (ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन आदि) पहले से इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। ये नोट लंबे समय तक चलते हैं, जिससे लंबे समय में सरकार और आरबीआई को लागत बचत होती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>चरणबद्ध रणनीति</strong></div>
<div>आरबीआई तुरंत सभी नोटों को प्लास्टिक में बदलने की योजना नहीं बना रहा है। पहले चरण में छोटे मूल्यवर्ग (₹10 और ₹20) के नोटों का पायलट लॉन्च होगा। पायलट की सफलता के बाद ही बड़े नोटों पर विचार किया जाएगा। एटीएम और मुद्रण प्रक्रिया को भी अपडेट किया जाएगा।</div>
<div> </div>
<div><strong>विशेषज्ञों की राय</strong></div>
<div>विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। हालांकि, शुरुआती चरण में जनता को नई नोटों की आदत डालने और सप्लाई चेन में बदलाव की चुनौतियां भी होंगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के नेतृत्व में यह पहल करेंसी मैनेजमेंट को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।अभी देखना बाकी है कि पायलट प्रोजेक्ट कब शुरू होता है और आम लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती है। अगर सब ठीक रहा तो आने वाले समय में आपके बटुए में प्लास्टिक के नोट भी दिख सकते हैं।</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:38:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Repo Rate Cut: RBI ने आम आदमी को दी बड़ी राहत, रेपो रेट में की इतनी कटौती </title>
                                    <description><![CDATA[<p>Repo Rate Cut: रतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती का एलान किया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने रेपो रेट को 25 बेसिस प्वाइंट घटाकर 5.25% कर दिया।</p>
<p>इस फैसले से होम लोन, पर्सनल लोन और अन्य ऋणों की EMI कम होने की संभावना बढ़ गई है, जिससे आम लोगों पर वित्तीय बोझ घटेगा। रेपो रेट में कटौती से अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक असर देखने को मिलेगा, क्योंकि सस्ते लोन से मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p>RBI ने अपनी नीतिगत रुख को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/162585/repo-rate-cut-rbi-gave-big-relief-to-the-common"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/repo-rate-cut.jpg" alt=""></a><br /><p>Repo Rate Cut: रतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती का एलान किया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने रेपो रेट को 25 बेसिस प्वाइंट घटाकर 5.25% कर दिया।</p>
<p>इस फैसले से होम लोन, पर्सनल लोन और अन्य ऋणों की EMI कम होने की संभावना बढ़ गई है, जिससे आम लोगों पर वित्तीय बोझ घटेगा। रेपो रेट में कटौती से अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक असर देखने को मिलेगा, क्योंकि सस्ते लोन से मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p>RBI ने अपनी नीतिगत रुख को 'तटस्थ' बनाए रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में लगातार सुधार जारी है, वहीं शहरी मांग भी मजबूत बनी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि गैर-खाद्य वस्तुओं की मांग, बैंक लोन और उच्च क्षमता उपयोग में वृद्धि के कारण निजी निवेश में तेजी बनी हुई है।</p>
<h4><strong>GDP विकास का अनुमान बढ़ाया</strong></h4>
<p>भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के पूर्वानुमान को संशोधित कर 7.3% कर दिया है, जबकि पहले यह 6.8% था। वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही के लिए विकास दर का अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 7.0% किया गया है। चौथी तिमाही के लिए भी पूर्वानुमान 6.2% से बढ़ाकर 6.5% कर दिया गया। वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही का अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 6.7% और दूसरी तिमाही का 6.8% रहने का अनुमान लगाया गया है।</p>
<h4><strong>साल 2025 में कितनी बार घटा रेपो रेट</strong></h4>
<p>RBI ने साल 2025 में अब तक चार बार रेपो रेट में कटौती की है। फरवरी में ब्याज दर को 6.5% से घटाकर 6.25% किया गया। अप्रैल में 0.25% की कटौती, जून में 0.50% की कटौती और अब दिसंबर में 0.25% की कटौती के साथ MPC ने इस साल कुल तीन बार ब्याज दरों में 1.25% की कमी की है। यह कटौती लगभग पांच साल बाद की गई है, जो आर्थिक सुस्ती को दूर करने और निवेश व मांग को बढ़ावा देने की कोशिश का हिस्सा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Dec 2025 14:02:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत दो वर्षों में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनेगा - मुख्यमंत्री </title>
                                    <description><![CDATA[आईआईटी कानपुर ने टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ दिया है ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154426/india-will-become-the-third-economy-in-the-world-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/1001127529.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>17वीं शताब्दी में ग्लोबल जीडीपी में भारत का पहला योगदान था </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<p style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज आईआईटी कानपुर में कहा कि आज हम दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था हैं लेकिन दो वर्षों में हमें तीसरी अर्थव्यवस्था बनना हैं और इसके बाद दूसरी अर्थव्यवस्था बनकर भारत को आत्मनिर्भर देश बनना है। मुख्यमंत्री आज आईआईटी कानपुर में आयोजित समन्वय - 25 कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।</p>
<div style="text-align:justify;"> मुख्यमंत्री ने कहा कि आईआईटी कानपुर के समन्वय के इस विज़न को मैं धन्यवाद देता हूं जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी समेत तीन विषयों पर चर्चा होगी। और हमें इसके डर से बाहर निकलते हुए इसके साथ आगे बढ़ना है ताकि हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग अपनी कामयाबी में कर सकें। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब हम भारत की बात करते हैं तो कुछ को लगता था कि क्या भारत ऐसा कर सकता है। लेकिन पिछले वर्षों में हमने करके दुनिया को दिखाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 17वीं शताब्दी में लगभग 300 वर्ष पहले ग्लोबल जीडीपी में भारत का हिस्सा नंबर एक पर था। एक सदी के बाद हम नंबर दो पर पहुंच गए और भारत नंबर दो पर आ गया। 1947 आते आते ग्लोबल जीडीपी में भारत का कंट्रीब्यूशन 2 फीसदी का रह गया। उन्होंने कहा कि पिछले 11 वर्षों में बहुत कुछ बदला है। आज दुनियां की हम चौथी अर्थव्यवस्था हैं।दो वर्षों में हमें तीसरी अर्थव्यवस्था बनना है और दूसरी अर्थव्यवस्था बनकर हम आत्मनिर्भर भारत बनाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-09/1001127528.jpg" alt="1001127528" width="1001" height="650"></img></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> योगी आदित्यनाथ ने कहा कि टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में हमने बहुत तरक्की की है। हमारे सामने जो चुनौतियां हैं उस पर हमें विचार करना होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि आईआईटी कानपुर का गौरवशाली इतिहास रहा है। आईआईटी कानपुर ने टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ दिया है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल से पहले संस्थानों से हमारा समन्वय नहीं था। लेकिन कोविड काल ने हमारी आंखें खोल दीं।कोविड काल में आईआईटी कानपुर द्वारा तैयार किए गए डायग्राम हमलोग देखते थे और वह प्रधानमंत्री के पास भी जाते थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  मुख्यमंत्री ने कहा कि यहां पर जो डिफेंस कारिडोर बना है उसमें भी आईआईटी कानपुर बहुत सपोर्ट कर रहा है। कार्यक्रम में प्रदेश के एमएसएमई मंत्री राकेश सचान, टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज के हेरिक बिन, आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रोफेसर मनींद्र अग्रवाल, आईआईटी कानपुर के उपनिदेशक प्रोफेसर ब्रजभूषण के अतरिक्त कई उद्योगों के प्रतिनिधि, आईआईटी कानपुर के पूर्व व वर्तमान छात्र भी उपस्थित थे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Sep 2025 15:00:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>IMF में भारत की भूमिका अब निर्णायक और सशक्त</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय अर्थव्यवस्था की पहचान अब केवल घरेलू सीमाओं तक ही सीमित नहीं रही। जब डॉ. उर्जित पटेल, जिन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में अपनी दूरदर्शिता और वित्तीय स्थिरता के लिए ख्याति अर्जित की, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत का कार्यकारी निदेशक बनने के लिए नियुक्त हुए, तब यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक पहचान को एक नई दिशा देने वाला क्षण था। उनके कार्यकाल के दौरान मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण और वित्तीय नीतियों की स्पष्ट दिशा ने उन्हें उस योग्य स्थान तक पहुँचाया, जहाँ वे न केवल भारत की आर्थिक नीतियों का प्रतिनिधित्व करेंगे, बल्कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154191/indias-role-in-imf-is-now-decisive-and-empowered"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/news-1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय अर्थव्यवस्था की पहचान अब केवल घरेलू सीमाओं तक ही सीमित नहीं रही। जब डॉ. उर्जित पटेल, जिन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में अपनी दूरदर्शिता और वित्तीय स्थिरता के लिए ख्याति अर्जित की, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत का कार्यकारी निदेशक बनने के लिए नियुक्त हुए, तब यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक पहचान को एक नई दिशा देने वाला क्षण था। उनके कार्यकाल के दौरान मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण और वित्तीय नीतियों की स्पष्ट दिशा ने उन्हें उस योग्य स्थान तक पहुँचाया, जहाँ वे न केवल भारत की आर्थिक नीतियों का प्रतिनिधित्व करेंगे, बल्कि वैश्विक वित्तीय स्थिरता और विकासशील देशों के हितों को भी सुनिश्चित करने में योगदान देंगे। डॉ. पटेल का जन्म 28 अक्टूबर 1963 को नैरोबी, केन्या में हुआ था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके प्रारंभिक वर्ष और शिक्षा ने उन्हें वैश्विक दृष्टिकोण और स्थानीय जरूरतों की समझ प्रदान की। उन्होंने लंदन आर्थिक विद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और येल विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इन अनुभवों ने उन्हें न केवल अंतरराष्ट्रीय वित्त की समझ दी, बल्कि भारत के आर्थिक ढांचे और नीतिगत आवश्यकताओं के लिए आवश्यक दृष्टि भी प्रदान की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनकी यात्रा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में एक अर्थशास्त्री के रूप में शुरू हुई, जहाँ उन्होंने वैश्विक आर्थिक प्रणालियों को गहराई से समझा। इस अनुभव ने उन्हें बाद में भारतीय रिज़र्व बैंक में उप-गवर्नर और फिर गवर्नर के रूप में कार्य करने के लिए तैयार किया। उनके कार्यकाल में भारतीय मौद्रिक नीति ने स्थिरता के साथ विकसित होना सीखा। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि आर्थिक नीतियाँ केवल सांख्यिकीय आंकड़ों या अल्पकालिक लक्ष्यों पर आधारित न हों, बल्कि वे दीर्घकालिक विकास और वित्तीय स्थिरता के लिए उपयुक्त हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. पटेल ने भारतीय रिज़र्व बैंक में रहते हुए कई महत्वपूर्ण सुधारों को लागू किया। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में नवाचार और वित्तीय प्रणाली की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कदम उठाए। उनका दृष्टिकोण यह था कि आर्थिक नीतियाँ केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि देश के वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए बनाई जानी चाहिए। उनके प्रयासों से भारतीय अर्थव्यवस्था ने स्थिरता और विश्वसनीयता दोनों प्राप्त की।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में डॉ. पटेल का कार्यभार केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। यह भूमिका उन्हें वैश्विक आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने, विकासशील देशों की आवश्यकताओं को समझने और वित्तीय स्थिरता के लिए रणनीतियाँ विकसित करने का अवसर प्रदान करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके माध्यम से भारत का दृष्टिकोण वैश्विक मंच पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत होगा, और इसके परिणामस्वरूप भारत की आर्थिक नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में अपनी छाप छोड़ सकेंगी। डॉ. पटेल की नियुक्ति का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह भारत के लिए वैश्विक आर्थिक मंच पर सक्रिय भागीदारी की दिशा में एक निर्णायक कदम है। अब केवल आर्थिक वृद्धि या घरेलू नीतियों के संतुलन तक ही सीमित नहीं रहा। भारत के दृष्टिकोण, उसकी विकास योजनाएँ और उसकी आर्थिक स्थिरता का संदेश अब वैश्विक वित्तीय मंच पर पहुँचाया जाएगा। यह नियुक्ति विकासशील देशों के हितों और वैश्विक वित्तीय स्थिरता के संतुलन को बनाए रखने में भारत की भागीदारी को स्पष्ट करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. पटेल की विशेषज्ञता और अनुभव वैश्विक वित्तीय स्थिरता में योगदान देने के साथ-साथ भारत की भूमिका को भी सशक्त करेंगे। उनके नेतृत्व में, भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी नीतियों को न केवल प्रस्तुत करेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक निर्णयों में सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाएगा। यह भूमिका भारत की अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से मजबूती प्रदान करेगी और विकासशील देशों की आवश्यकताओं को वैश्विक मंच पर उचित मान्यता दिलाने में मदद करेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह समय नए अवसरों और चुनौतियों का है। वैश्विक आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जहाँ तकनीकी नवाचार, वैश्विक व्यापार नीति, और वित्तीय प्रवाह के नए मानदंड तय हो रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं और वित्तीय असंतुलन के दौर से गुजर रही है, डॉ. पटेल की भूमिका भारत के लिए न केवल गौरव की बात है, बल्कि यह नीति निर्माण और आर्थिक स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल भी है। उनके अनुभव और दूरदर्शिता से भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी भूमिका को और सशक्त बना सकता है, जिससे वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की स्थिति और मजबूत होगी। डॉ. पटेल की नियुक्ति यह संकेत भी देती है कि भारतीय विशेषज्ञता और रणनीतिक सोच अंतरराष्ट्रीय मंच पर मान्यता प्राप्त कर रही है। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का विषय नहीं है, बल्कि भारत के आर्थिक और वित्तीय ढांचे की क्षमता और उसकी वैश्विक समझ को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण क्षण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके नेतृत्व में, भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्णयों में केवल एक सदस्य नहीं रहेगा, बल्कि वह वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में सक्रिय और प्रभावशाली योगदानकर्ता के रूप में अपनी जगह बनाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत के कार्यकारी निदेशक के रूप में डॉ. पटेल की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहेगी। यह जिम्मेदारी भारत की नीतियों को वैश्विक मंच पर स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने, विकासशील देशों के दृष्टिकोण को समझने और वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए रणनीतियों का निर्माण करने की भी होगी। उनके अनुभव से यह सुनिश्चित होगा कि भारत की आवाज़ केवल सुनी जाए, बल्कि वैश्विक आर्थिक निर्णयों में उसे उचित महत्व मिले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. पटेल की नियुक्ति का एक और महत्वपूर्ण आयाम यह है कि यह वैश्विक मंच पर भारत की छवि को और सशक्त करती है। यह दिखाता है कि भारत अब न केवल आर्थिक दृष्टि से मजबूत है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है। उनके नेतृत्व में भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी नीति, दृष्टिकोण और आर्थिक योजना को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करेगा, जिससे वैश्विक वित्तीय निर्णयों में भारत की भागीदारी और प्रभाव बढ़ेगा। इस नियुक्ति से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत वैश्विक आर्थिक स्थिरता और विकासशील देशों के हितों के प्रति गंभीर है। डॉ. पटेल के नेतृत्व में, भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में न केवल अपनी आर्थिक नीति का प्रतिनिधित्व करेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन और स्थिरता में योगदान देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह भारत की वैश्विक आर्थिक नीति में एक नई दिशा को दर्शाता है, जो विकासशील देशों की आवश्यकताओं और वैश्विक वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. पटेल की यह यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति और उसकी नीति निर्माण क्षमता की भी मिसाल है। उनके अनुभव, विशेषज्ञता और दूरदर्शिता से यह सुनिश्चित होगा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाए और वैश्विक आर्थिक निर्णयों में अपना स्थान सशक्त बनाए। यह नियुक्ति भारत की आर्थिक स्थिरता, वैश्विक पहचान और विकासशील देशों की आवश्यकताओं को वैश्विक मंच पर उचित महत्व देने का प्रतीक है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह समय नई चुनौतियों और अवसरों का है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैश्विक आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, और ऐसे समय में डॉ. पटेल की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में नियुक्ति भारत के लिए नई उम्मीदों और संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करती है। उनके नेतृत्व में भारत अपनी नीति और दृष्टिकोण को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करेगा, जिससे वैश्विक आर्थिक निर्णयों में भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली होगी। इस प्रकार, डॉ. उर्जित पटेल की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में नियुक्ति न केवल उनके व्यक्तिगत करियर का शिखर है, बल्कि यह भारत की वैश्विक आर्थिक पहचान, उसकी नीति निर्माण क्षमता और विकासशील देशों के हितों की वैश्विक मंच पर सुरक्षा का प्रतीक भी है। उनके अनुभव और दूरदर्शिता से भारत अपनी भूमिका को और सशक्त बनाएगा, और वैश्विक आर्थिक स्थिरता में सक्रिय योगदान देगा। यह नियुक्ति भारत की वैश्विक आर्थिक नीति में एक नया अध्याय खोलती है, जो भविष्य में विकासशील देशों की आवश्यकताओं और वैश्विक वित्तीय स्थिरता को संतुलित करने में मार्गदर्शन करेगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/154191/indias-role-in-imf-is-now-decisive-and-empowered</link>
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                <pubDate>Mon, 01 Sep 2025 18:14:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>10 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनने के लिए भारत तैयार: आईएमएफ चीफ इकोनॉमिस्ट बोले</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></p>
<p><strong>अर्थव्यवस्था</strong> को बेहतर बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है भारत। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गौरिनचास ने भारतीय अर्थव्यवस्था की तारीफ है। उन्होंने कहा कि भारतीय  अर्थव्यवस्था ऐसे समय में तेजी से उभर रही है जब दुनिया मंदी की संभावनाओं का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि भारत 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था छूने की क्षमता रखता है। अगर कुछ ठोस कदम उठाए जाएं तो जल्द ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश पर जोर देना होगा। पियरे-ओलिवियर गौरिनचास ने कहा कि 10 ट्रिलियन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/125085/india-ready-to-become-10-trillion-economy-imf-chief-economist"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2022-10/imf.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></p>
<p><strong>अर्थव्यवस्था</strong> को बेहतर बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है भारत। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गौरिनचास ने भारतीय अर्थव्यवस्था की तारीफ है। उन्होंने कहा कि भारतीय  अर्थव्यवस्था ऐसे समय में तेजी से उभर रही है जब दुनिया मंदी की संभावनाओं का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि भारत 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था छूने की क्षमता रखता है। अगर कुछ ठोस कदम उठाए जाएं तो जल्द ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश पर जोर देना होगा। पियरे-ओलिवियर गौरिनचास ने कहा कि 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का माद्दा भारत में ही है। उन्होंने कहा कि मेरा मतलब है, हमने अतीत में कई देशों को बहुत तेजी से विकास करते हुए देखा है और वास्तव में बहुत तेजी से विकास किया भी है। उन्होंने कहा कि कई देशों के लिए 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना थोड़ा कठिन है लेकिन भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी संभावना है। ऐसा करने के लिए, भारत को कई संरचनात्मक सुधार करने की जरूरत है। </p>
<p><strong>कई देशों के मुक़ाबले में भारत अच्छा कर रहा</strong><br />पियरे-ओलिवियर गौरिनचास ने कहा कि भारत सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसलिए, जब यह वास्तव में 6.8 या 6.1 जैसी ठोस दरों पर बढ़ रहा है, तो यह वास्तव में ध्यान देने योग्य है। ऐसी तस्वीर में जहां अन्य सभी अर्थव्यवस्थाएं और उन्नत अर्थव्यवस्थाएं शायद ही कभी उस गति से बढ़ती हैं, लेकिन भारत  अगर अभी भी अच्छा कर रहा है तो यह अच्छा संकेत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Oct 2022 01:27:31 +0530</pubDate>
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