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                <title>china - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>हमसे तेल खरीदना बंद नहीं करेगा भारत…ट्रंप के दावे पर रूस का जवाब</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;">रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, यह दावा सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं. लावरोव ने कहा कि रूस और भारत के बीच हुए तेल समझौतों पर कोई खतरा नहीं है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>भारत भी इस मुद्दे पर बयान दे चुका</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">लावरोव का यह बयान उस समय आया जब भारत की ओर से भी इस मुद्दे पर सफाई दी गई. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि भारत अपनी जरूरत के मुताबिक, अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदेगा. उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन को स्थिर रखने के लिए भारत स्रोतों</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169281/india-will-not-stop-buying-oil-from-us%E2%80%A6-russias-response"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/trump.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, यह दावा सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं. लावरोव ने कहा कि रूस और भारत के बीच हुए तेल समझौतों पर कोई खतरा नहीं है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>भारत भी इस मुद्दे पर बयान दे चुका</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">लावरोव का यह बयान उस समय आया जब भारत की ओर से भी इस मुद्दे पर सफाई दी गई. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि भारत अपनी जरूरत के मुताबिक, अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदेगा. उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन को स्थिर रखने के लिए भारत स्रोतों में विविधता लाता रहेगा. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी कहा कि 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है. उन्होंने यह भी कहा कि रूस के साथ भारत के सभी समझौते पहले की तरह जारी हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत पर 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया था, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा था. बाद में यह टैरिफ वापस ले लिया गया. हालांकि अमेरिका ने चेतावनी दी कि अगर भारत ने सीधे या परोक्ष रूप से रूसी तेल की खरीद दोबारा शुरू की, तो 25% टैरिफ फिर से लगाया जा सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;">रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत से रूसी तेल खरीद को लेकर बयान दिया है. उन्होंने कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, यह दावा सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं. ट्रंप के अलावा किसी और ने ऐसा नहीं कहा है. लावरोव के मुताबिक, रूस और भारत के बीच हुए तेल और अन्य समझौते पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन पर कोई खतरा नहीं है.</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले हफ्ते ट्रंप ने भारत के साथ एक फ्रेमवर्क व्यापार समझौते की घोषणा की थी. उसी दौरान उन्होंने दावा किया कि भारत ने रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने पर सहमति जताई है. अमेरिका का आरोप है कि रूस तेल बेचकर जो पैसा कमाता है, उसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में करता है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाए</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह भारत और ब्रिक्स देशों के साथ रूस के व्यापार, निवेश और सैन्य सहयोग को रोकने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका टैरिफ, प्रतिबंध और दबाव वाले कदमों के जरिए दुनियाभर में दबदबा बनाए रखना चाहता है, लावरोव ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के आने के बाद यह नीति और खुलकर दिख रही है.</p>]]>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 23:01:17 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Bangladesh Election 2026: ऑब्जर्वर लिस्ट से भारत गायब, चीन-पाकिस्तान की मौजूदगी पर उठे सवाल</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ढाका।</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><br />बांग्लादेश में 2026 में होने वाले आम चुनावों को लेकर जारी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों (International Observers) की सूची ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। इस सूची में पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं, लेकिन भारत का नाम नदारद है। भारत-बांग्लादेश के लंबे समय से चले आ रहे करीबी संबंधों के बावजूद यह अनुपस्थिति कूटनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग की ओर से जारी सूची के अनुसार, पाकिस्तान से 8, चीन से 3, तुर्किए से 13, श्रीलंका से 11 और जापान, दक्षिण कोरिया, रूस सहित कई देशों के</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169276/india-missing-from-bangladesh-election-2026-observer-list-questions-raised"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/bangladesh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ढाका।</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><br />बांग्लादेश में 2026 में होने वाले आम चुनावों को लेकर जारी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों (International Observers) की सूची ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। इस सूची में पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं, लेकिन भारत का नाम नदारद है। भारत-बांग्लादेश के लंबे समय से चले आ रहे करीबी संबंधों के बावजूद यह अनुपस्थिति कूटनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग की ओर से जारी सूची के अनुसार, पाकिस्तान से 8, चीन से 3, तुर्किए से 13, श्रीलंका से 11 और जापान, दक्षिण कोरिया, रूस सहित कई देशों के प्रतिनिधि ढाका पहुंच रहे हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ का एक विशेष मिशन भी चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करेगा। हालांकि, पड़ोसी और प्रमुख सहयोगी देश भारत को इस सूची में जगह नहीं मिली है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>यूनुस सरकार के बाद बदले रिश्ते?</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">शेख हसीना सरकार के पतन के बाद गठित यूनुस सरकार के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव देखा गया है। सीमा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में मजबूत सहयोग के बावजूद हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने रिश्तों में ठंडापन ला दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत को ऑब्जर्वर सूची से बाहर रखना इसी बदले हुए समीकरण का संकेत हो सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>चीन-पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">सूची में पाकिस्तान और चीन की मौजूदगी को केवल औपचारिकता नहीं माना जा रहा है। चीन बांग्लादेश का बड़ा निवेशक है, जबकि पाकिस्तान की भागीदारी को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के नजरिए से देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम ढाका की विदेश नीति में संतुलन साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>राजनीतिक तटस्थता दिखाने की कोशिश?</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि पूर्व सरकार भारत के करीब थी। विपक्ष अक्सर “भारत-समर्थक” होने का मुद्दा उठाता रहा है। ऐसे माहौल में भारत को पर्यवेक्षक सूची से बाहर रखना सरकार की ओर से चुनाव प्रक्रिया को “भारत-प्रभाव से मुक्त” दिखाने का प्रयास माना जा रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कूटनीतिक संकेत या संयोग?</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह फैसला महज संयोग नहीं हो सकता। दक्षिण एशिया में हर कूटनीतिक कदम का एक संदेश होता है। भारत की अनुपस्थिति यह संकेत दे सकती है कि ढाका अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्वतंत्र पहचान और संतुलित नीति को मजबूत करना चाहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि भारत को सूची से बाहर रखने पर आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया आएगी या नहीं। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बयानों से ही यह तय होगा कि यह कदम रणनीतिक बदलाव है या केवल एक अस्थायी राजनीतिक फैसला।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इतना तय है कि बांग्लादेश का यह चुनाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा भी तय कर सकता है।</p>]]>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 22:22:07 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
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            <item>
                <title>पेंटागन रिपोर्ट में चीन के खतरनाक मंसूबों का खुलासा </title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">अमेरिका की रक्षा विभाग पेंटागन ने अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. इसके मुताबिक, चीन भारत को पड़ोसी देशों के जरिए घेरने की नई योजना बना रहा ह। पेंटागन की यह रिपोर्ट की मायनों में ध्यान देने योग्य है कि चीन अपनी आर्मी को भारत के करीब तैनात करने की कोशिश कर रहा है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लिए भारत के करीब चार पड़ोसी देशों में बेस बनाने की तैयारी हो रही है. यह चार देश बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार हैं, जहां अतिरिक्त सैन्य सुविधाएं या लॉजिस्टिक्स बेस बनाए जाएंगे. इससे जल, थल और नभ सेनाओं की</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/164368/pentagon-report-reveals-chinas-dangerous-intentions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/download-(1)4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">अमेरिका की रक्षा विभाग पेंटागन ने अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. इसके मुताबिक, चीन भारत को पड़ोसी देशों के जरिए घेरने की नई योजना बना रहा ह। पेंटागन की यह रिपोर्ट की मायनों में ध्यान देने योग्य है कि चीन अपनी आर्मी को भारत के करीब तैनात करने की कोशिश कर रहा है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लिए भारत के करीब चार पड़ोसी देशों में बेस बनाने की तैयारी हो रही है. यह चार देश बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार हैं, जहां अतिरिक्त सैन्य सुविधाएं या लॉजिस्टिक्स बेस बनाए जाएंगे. इससे जल, थल और नभ सेनाओं की ताकत बढ़ेगी. लंबी दूरी तक सेना की पहुंच बढ़ेगी और समुद्री रास्ते सुरक्षित होंगे। यह स्थिति भारत के लिए खतरा है। 
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता हो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन, भारत और अमेरिका के रिश्तों में लगातार बदलती परिस्थितियां क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक संतुलन के लिए अहम हैं. हाल ही में अमेरिकी युद्ध विभाग की एक रिपोर्ट ने चीन-भारत संबंधों और अमेरिका-भारत रणनीतिक जुड़ाव को लेकर नई जानकारी पेश की है, जो भविष्य की कूटनीति और क्षेत्रीय संतुलन को समझने में महत्वपूर्ण है. अमेरिकी युद्ध विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, चीन संभवतः एलएसी पर तनाव कम होने का अवसर लेकर भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करना चाहता है. साथ ही, चीन यह भी चाहता है कि अमेरिका और भारत के संबंध और अधिक मजबूत न हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में चीन के बढ़ते दावों और रणनीतिक रुख का खुलासा हुआ है. इसमें कहा गया है कि चीन ने अब भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपनी ‘कोर इंटरेस्ट’ की सूची में शामिल कर लिया है, जिसका मतलब है कि इस मामले पर बीजिंग किसी भी तरह की बातचीत या समझौते के लिए तैयार नहीं है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि चीन ने ताइवान, साउथ चाइना सी में समुद्री विवाद और जापान के सेनकाकू द्वीपों को भी अपने प्रमुख हितों में शामिल किया है. चीनी नेतृत्व का मानना है कि इन क्षेत्रों पर नियंत्रण और एकीकरण चीन के ‘महान राष्ट्र पुनरुत्थान’ के लक्ष्य के लिए अनिवार्य है, जिसे 2049 तक पूरा करना है. इसके अलावा, चीन अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और संप्रभुता की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और इस पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट में भारत-चीन संबंधों और एलएसी के हालात पर भी प्रकाश डाला गया है. अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने एलएसी पर शेष गतिरोध वाले क्षेत्रों से सैनिकों को हटाने पर समझौता किया था, जो ब्रिक्स समिट के दो दिन पहले राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के दौरान हुआ. इस मुलाकात के बाद मासिक उच्च स्तरीय बैठकों की शुरुआत हुई, जिनमें सीमा प्रबंधन, द्विपक्षीय सहयोग और यात्रा, वीजा, शिक्षा और मीडिया के आदान-प्रदान जैसे कदम शामिल थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन एलएसी पर तनाव कम करने की कोशिश करेगा ताकि द्विपक्षीय रिश्ते स्थिर हों और अमेरिका-भारत के संबंध और मजबूत न हो पाएं, लेकिन भारत चीन के इरादों को लेकर सतर्क रहेगा और दोनों पक्षों में अविश्वास बना रहेगा. कुल मिलाकर, चीन का कड़ा रुख और ‘कोर इंटरेस्ट’ की प्राथमिकता भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्टूबर 2024 में भारतीय नेतृत्व ने चीन के साथ एक समझौते की घोषणा और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी चिनफिंग और नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय बैठक के बाद मासिक उच्च स्तरीय बैठकें शुरू हुईं, जिसमें सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय सहयोग के अगले कदमों पर चर्चा हुई, जैसे कि सीधी उड़ानें, वीजा सुविधा और शिक्षा तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में आदान-प्रदान. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत चीन की मंशा और कार्यवाहियों को लेकर सतर्क है और आपसी अविश्वास और अनसुलझे मुद्दे दोनों देशों के संबंधों में सीमाएं डालते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीन की राष्ट्रीय रणनीति 2049 तक ‘चीनी राष्ट्र का बड़ा पुनरुत्थान’ हासिल करने की है. इसके लिए चीन ने अपनी प्रभाव-क्षमता और वैश्विक सेना को मजबूत किया है, ताकि देश की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके. रिपोर्ट में चीन के तीन मुख्य हितों को भी रेखांकित किया गया है. इसमें पहला- सीसीपी का नियंत्रण बनाए रखना. दूसरा- आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और तीसरा- संप्रभुता और क्षेत्रीय दावों की रक्षा और विस्तार करना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) की हालिया रिपोर्ट में चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य और अंतरिक्ष क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग पर भी प्रकाश डाला गया है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने पाकिस्तान में संभावित सैन्य अड्डा स्थापित करने पर विचार किया है. अमेरिकी युद्ध विभाग ने मंगलवार को संसद में प्रस्तुत अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘चीन गणराज्य से संबंधित सैन्य और सुरक्षा घटनाक्रम’ में बताया कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) अतिरिक्त सैन्य आधार और सुविधाएं स्थापित करने की सक्रिय योजना बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, ये नए सैन्य ठिकाने थलसेना, नौसेना और वायुसेना सभी की मदद करेंगे. पाकिस्तान उन देशों में से एक है, जहाँ चीन ने इस तरह के संभावित अड्डे लगाने पर विचार किया है. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि चीन ने विश्वभर में कई देशों में अड्डा स्थापित करने की संभावना पर ध्यान दिया है, जिनमें अंगोला, बांग्लादेश, बर्मा, क्यूबा, इंडोनेशिया, केन्या, मोजाम्बिक, नामीबिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, ताजिकिस्तान, थाईलैंड, तंजानिया, संयुक्त अरब अमीरात और वनुआतु शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पीएलए मुख्य रूप से मलक्का जलडमरूमध्य, हॉर्मूज जलडमरूमध्य और अफ्रीका तथा मध्य एशिया में समुद्री मार्गों पर अपना सैन्य प्रभाव स्थापित करने में रुचि रखती है. रिपोर्ट में चीन के तीन प्रमुख लड़ाकू विमानों का भी जिक्र है, जिनमें पांचवीं पीढ़ी का एफसी-31, चौथी पीढ़ी का जे-10सी मल्टीरोल विमान, और चीन-पाकिस्तान के संयुक्त उत्पादन का जेएफ-17 हल्का लड़ाकू विमान शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त, चीन ने काइहोंग और विंग लूंग ड्रोन कई देशों को सप्लाई किए हैं, जिनमें अल्जीरिया, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, इराक, मोरक्को, म्यांमार, पाकिस्तान, सर्बिया और यूएई शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 तक चीन ने पाकिस्तान को 20 जे-10सी लड़ाकू विमान उपलब्ध करवा दिए हैं, जिससे दोनों देशों के सैन्य संबंध और अधिक गहरे हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पेंटागन की यह रिपोर्ट भारत को चीन के साथ दोस्ती में हर कदम फूंक कर रखने की हिदायत है। चीन का पिछला अतीत भी भारत को सावधानी बरतने की सीख देता है। अब यह भारत के नीति निर्धारकों की जिम्मेदारी है कि वह इन सारे वैश्विक हालात को कैसे अनुकूल बनाते हैं।</div>
</div>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Dec 2025 17:09:41 +0530</pubDate>
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                <title>भारत–चीन-अमेरिकी संबंध, परिस्थिति-जन्य वैश्विक कुटनीति का नया दौर</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>  </strong>भारत और चीन के रिश्ते कितने दूरगामी हैं, यह प्रश्न आज एशिया ही नहीं पूरी वैश्विक राजनीति की धुरी बन चुका है। चीन से दोस्ती भारत के लिए कोई नई बात नहीं है; यह इतिहास की धारा में कई उतार-चढ़ावों से होकर गुज़री है। 1954 में नेहरू और झोऊ एनलाई के बीच “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा उभरा था, जब भारत 1947 में और चीन 1949 में स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। दोनों देशों ने उभरती शीतयुद्ध राजनीति में तटस्थता और एशियाई एकता का सपना देखा था, किंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस सपने को अफसाना बना दिया और विश्वास की</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161261/india-china-us-relations-a-new-era-of-situational-global-diplomacy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download-(1)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> </strong>भारत और चीन के रिश्ते कितने दूरगामी हैं, यह प्रश्न आज एशिया ही नहीं पूरी वैश्विक राजनीति की धुरी बन चुका है। चीन से दोस्ती भारत के लिए कोई नई बात नहीं है; यह इतिहास की धारा में कई उतार-चढ़ावों से होकर गुज़री है। 1954 में नेहरू और झोऊ एनलाई के बीच “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा उभरा था, जब भारत 1947 में और चीन 1949 में स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। दोनों देशों ने उभरती शीतयुद्ध राजनीति में तटस्थता और एशियाई एकता का सपना देखा था, किंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस सपने को अफसाना बना दिया और विश्वास की दीवारें इतनी ऊँची खड़ी हुईं कि उसकी गूँज आज भी सीमा के पहाड़ों तक सुनाई देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1962 के बाद चीन ने लद्दाख और हिमाचल के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण बढ़ाया, अक्साई चिन पर कब्ज़ा किया, और गलवान से डोकलाम तक हर दशक में कभी खुली तो कभी निहित झड़पें होती रहीं। अप्रैल 2020 के बाद एल ए सी पर चीन की आक्रामक तैनाती ने भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ क्वाड साझेदारी मज़बूत करने की ओर धकेला, और यही अमेरिकी असहजता का मूल भी है—क्योंकि वाशिंगटन चाहता है कि भारत उसका पूर्ण सामरिक मित्र बने, परंतु भारत अपनी स्वायत्त विदेश नीति छोड़ने को तैयार नहीं है।<br /><br />सितंबर 2025 में शंघाई सहयोग संगठन  की 25वीं बैठक ने अचानक एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात लंबी खाई को पाटने की कोशिशों से भर उठी। दोनों देशों ने सामरिक तनाव कम कर व्यापार, पर्यटन, निवेश, डिजिटल कनेक्टिविटी और ऊर्जा गलियारों में सहयोग बढ़ाने की रूपरेखा तैयार की। चीन को भी अहसास है कि अमेरिका की टैरिफ नीति और निर्यात प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है और भारत एक विशाल बाज़ार के रूप में उसके लिए रणनीतिक राहत बन सकता है। दूसरी ओर भारत समझता है कि चीन से टकराव स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि सीमा विवाद के बावजूद 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, और आर्थिक वास्तविकता दोनों को एक-दूसरे से जोड़े बिना नहीं रख सकती।<br /><br />उधर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच हालिया महीनों में बढ़ती निकटता ने एशिया में शक्ति संतुलन को नई दिशा दे दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से हुई बैठकों ने दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को पुनर्जीवित कर दिया है। पाकिस्तान द्वारा अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदने की नई योजनाएँ और वाशिंगटन द्वारा पाकिस्तान को ‘क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोगी’ का दर्जा देने से भारत की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह वही अमेरिका है जिसने 1999 के कारगिल युद्ध और 1971 के बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान की हिफ़ाज़त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, इसलिए भारत जानता है कि शक्ति संतुलन का कोई भी समीकरण स्थायी नहीं होता। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल चीन और रूस के विरुद्ध अपनी पश्चिमी एशिया रणनीति के हिस्से के रूप में करेगा, और भारत-अमेरिका मित्रता भी केवल साझा हितों पर आधारित है, स्थायी भावनाओं पर नहीं।<br /><br />भारतीय दृष्टिकोण से, आज की कूटनीति का सच यह है कि जितना अविश्वसनीय अमेरिका है, उतना ही अविश्वसनीय चीन भी। दोनों देशों का इतिहास भारत के प्रति अवसरवादी रहा है। यही कारण है कि भारत की विदेश नीति ‘बहुध्रुवीयता’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित है—जहाँ भारत न तो चीन के ब्लॉक में पूरी तरह शामिल होगा, न अमेरिका के प्रभाव में आएगा। एससीओ  सम्मेलन में में भारत-चीन की नज़दीकी और ब्रिक्स -प्लस ढांचे में नए आर्थिक सहयोग की संभावनाएँ यह संकेत देती हैं कि एशिया अपनी शर्तों पर अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की स्थिति बना रहा है। चीन-रूस-भारत त्रिकोण अमेरिका,नाटो  चिंताओं का मुख्य कारण है, क्योंकि यह त्रिकोण ऊर्जा, रक्षा, तकनीक, और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर पश्चिमी देशों के दबदबे को कम कर सकता है।<br /> </p>
<p style="text-align:justify;">चीन के लिए, भारत-अमेरिका निकटता रणनीतिक दबाव बढ़ाती है, जबकि भारत-चीन तालमेल उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और इंडो-पैसिफिक में बेहतर स्थिति दे सकता है। भारत के लिए, चीन से संबंध सुधरने का अर्थ है LAC पर तनाव में कमी, व्यापार में निर्भरता नियंत्रित करना और वैश्विक महंगाई व सप्लाई-चेन संकट से बचाव। जबकि अमेरिका इस पूरे बदलते परिदृश्य को एशिया में अपने प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है, और यह चिंता सिर्फ सामरिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है, क्योंकि अमेरिकी उद्योग चीन-भारत सहयोग को अपने बाज़ार हितों के विपरीत मानते हैं।<br /><br />इन बदलते समीकरणों के बीच सवाल यही है कि क्या भारत-चीन का सहयोग अमेरिका के खिलाफ प्रभावी रणनीतिक विकल्प बन सकता है? सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु जैसा कुछ नहीं होता; केवल स्थायी हित होते हैं। भारत और चीन जब अपने हितों के आधार पर एक-दूसरे के करीब आते हैं तो यह एशिया को अधिक स्वायत्त और बहुध्रुवीय बनाता है, परंतु सीमा विवाद, ताईवान-दक्षिण चीन सागर तनाव, और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ जैसे कारक भारत को पूरी तरह निश्चिंत नहीं होने देते। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी सामरिक स्वतंत्रता बनाए रखे।</p>
<p style="text-align:justify;">शंघाई सम्मेलन का यह नया समीकरण आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत की राजनीति को पुनः परिभाषित कर सकता है। भारत और चीन जब साझा आर्थिक हितों, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापारिक गलियारों पर साथ खड़े होते हैं, तो यह अमेरिका की टैरिफ रणनीति और एशियाई राजनीति की धुरी को भी बदल देता है। भविष्य बताएगा कि यह सहयोग स्थायी रणनीति बनता है या एक और अस्थायी कूटनीतिक अध्याय। किंतु इतना स्पष्ट है कि भारत-चीन की नई राह यदि टिकाऊ साबित होती है, तो एशिया की शक्ति संतुलन रेखाएं बदल जाएंगी और अमेरिका का प्रभाव सीमित होगा और यदि यह राह फिर बाधित होती है, तो भारत को अपनी सुरक्षा और आर्थिक नीति में नए विकल्प तलाशने होंगे। यही अंतरराष्ट्रीय संबंधों का शाश्वत सत्य है कि विश्व राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है न स्थाई दुश्मन केवल स्थाई हित होते हैं, और भारत उसी हित-नीति पर आगे बढ़ रहा है।<br /><br /><br /></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<div>
<div> </div>
</div>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Nov 2025 16:27:02 +0530</pubDate>
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                <title>भारत, रूस, चीन और ब्राज़ील एक प्लेटफॉर्म पर</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">यह बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार  राष्ट्रपति पद की ताजपोषी के साथ-साथ डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनी विदेश नीति के तहत अंधाधुंध आयात टैरिफ लगाकर भारत रूस और चीन को नाराज कर लिया है। भारत पर आज से 50%  टैरिफ लागू कर दिया गया है अब भारत अमेरिका के विकल्प के रूप में नया बाजार तलाश करने और रूस तथा चीन से गहरे गढ़ जोड़ बनाने में लगा हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">(स्वतंत्रता के बाद से अविश्वसनीय चीन पर भारत ने अब भरोसा जताना शुरू किया है चीन के विदेश</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154172/india-russia-china-and-brazil-on-a-platform"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/download-(4).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">यह बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार  राष्ट्रपति पद की ताजपोषी के साथ-साथ डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनी विदेश नीति के तहत अंधाधुंध आयात टैरिफ लगाकर भारत रूस और चीन को नाराज कर लिया है। भारत पर आज से 50%  टैरिफ लागू कर दिया गया है अब भारत अमेरिका के विकल्प के रूप में नया बाजार तलाश करने और रूस तथा चीन से गहरे गढ़ जोड़ बनाने में लगा हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">(स्वतंत्रता के बाद से अविश्वसनीय चीन पर भारत ने अब भरोसा जताना शुरू किया है चीन के विदेश मंत्री के भारत में व्यापारिक के लिए यात्रा पर उनका स्वागत किया गया । भारत के प्रधानमंत्री बहुत जल्द चीन की यात्रा पर जाने वाले वाले हैं और चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करने की योजना बना रहे हैं। ब्राज़ील पर भी अमेरिका ने 40 से 50% आयात शुल्क आरोपित कर दिया है ब्राजील ने अमेरिका से बात करने की बजाय भारत के राष्ट्रपति नरेंद्र मोदी से बात करना उचित समझा। ब्राज़ील भी अमेरिका से व्यापारिक मुद्दों पर काफी खफा नजर आ रहा है। इस तरह भारत रूस चीन और ब्राजील एक प्लेटफार्म पर खड़े नजर आ रहे हैं। निश्चित तौर पर एशिया और दक्षिण एशिया डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की नीतियों के विरोध में आ चुका है।)</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है अमेरिका से व्यापारिक संबंध खराब होने पर भारत को 25% तक नुकसान होने की संभावना है पर भारत के लिए यह एक बड़ा सबक प्रमाणित होगा कि किसी एक पश्चिमी देश पर निर्भर रहना भारत की विदेश नीति के लिए उपयुक्त नहीं होगा। फल स्वरुप उसे ओपन मार्केट पॉलिसी अपना कर सभी देशों से अपना व्यापार और व्यवसाय करने की योजना निर्मित करनी होगी तब जाकर ही भारत तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख सकता है। दूसरी बार डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद रूस यूक्रेन युद्ध के युद्ध को विराम तो नहीं दे पाए किंतु युद्ध की आग को और भड़का दिया है। उधर परमाणु संपन्न देश चीन नॉर्थ कोरिया और रूस की त्रिगुटीय जुगलबंदी ने अमेरिका सहित नाटो यूरोपीय देश और यूक्रेन की नींद उड़ा दी है। उल्लेखनीय की नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया के आपस के कड़वे रिश्ते के बीच अमेरिका का साउथ कोरिया को लेकर काफी हस्तक्षेप है जिसे नॉर्थ कोरिया कई दशक से पसंद नहीं करता आया है ।संयुक्त राष्ट्र संघ और एमनेस्टी इंटरनेशनल की भूमिका निरर्थक हो चुकी है वैसे भी संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की कठपुतली बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या मानवीय संवेदनाओं की आशाएं निर्मूल साबित हो रही हैं। वैश्विक शांति और अमन की कल्पनाओं से परे वैश्विक युद्ध की आशंका में उत्तर कोरिया ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है ताजा ताजा घटनाक्रम में रूस के विदेश मंत्री लावरोव उत्तर कोरिया के दौरे पर जाकर वहां के समकक्ष चोई सांन संग से उत्तर कोरिया के शहर पूर्वी वोंनसान मैं अत्यंत महत्वपूर्ण मीटिंग की है।रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने उत्तरी कोरिया के तानाशाह नेता किम जोंग उन से भी मुलाकात कर रुस को यूक्रेन और अमेरिका के खिलाफ समर्थन देने की बात रखी जवाब में उत्तरी कोरिया के तानाशाह नेता किम जोंग उन ने रूस को अमेरिका यूरोप और यूक्रेन के खिलाफ निशर्त खुला समर्थन देने की घोषणा कर दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौरतलब है कि उत्तरी कोरिया पिछले कई महीनो से मिसाइल का परीक्षण कर साउथ कोरिया अमेरिका तथा यूरोपीय देशों को सीधा-सीधा संदेश दिया है कि साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया के संबंधों के बीच किसी देश के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उत्तर कोरिया की आधिकारिक न्यूज़ एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी के अनुसार दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच अब तनाव बढ़ने लगा हैl उधर उत्तर कोरिया के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम के जवाब में अमेरिका दक्षिण कोरिया व जापान त्रिपक्षीय त्रिपक्षी संधियां और सैनिक अभ्यास का विस्तार तथा फिर से बहाली कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीनों देशों ने उत्तर कोरिया के रूस और चीन को समर्थन देने के और परमाणु परीक्षणों के खिलाफ दक्षिण कोरिया प्रायद्वीप के पास अमेरिकी परमाणु सक्षम बम वर्षको के साथ संयुक्त हवाई अभ्यास किया है। उल्लेखनीय है कि तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों ने एक गंभीर बैठक कर उत्तर कोरिया से क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाली सभी गैर कानूनी गतिविधि बंद करने का आह्वान किया है वैसे भी उत्तर कोरिया अमेरिका के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया और जापान के इस युद्ध अभ्यास को उत्तर कोरिया के खिलाफ होने वाले हमले का पूर्व अभ्यास मानता है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर बड़े हमले की चेतावनी भी दे डाली है। इन परिस्थितियों में विश्व में चल रहे रूस यूक्रेन युद्ध तथा इसराइल हमास लेबनान ईरान युद्ध के अलावा उत्तर कोरिया ने हमले की धमकी देकर एक नये युद्ध का मोर्चा खोल दिया हैl यह तो सर्व विदित है कि उत्तर कोरिया का तानाशाह किम जोंग-उन एक सनकी तानाशाह है और अमेरिका पर परमाणु युद्ध के हमले की गाहे-बगाहे धमकियां भी दिया करता हैl</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया की किसी भी हिमाकत पर उस पर हमला कर सकता हैl उधर रूस यूक्रेन युद्ध को ढाई वर्ष पूरे हो चुके है कई प्रभावशाली प्रयासों के बाद भी युद्ध रुकने  का नाम नहीं ले रहा है रूस के व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के व्लादिमीर जेलेन्स्की हास्य कलाकार होने के बावजूद यूक्रेन के लिए त्रासदी के नायक बन गए हैं। दोनों देशों में हजारों नागरिक एवं सैनिक मारे जा चुके हैं इसके अलावा अरबों डॉलर की संपत्ति का भारी नुकसान भी हुआ है । इसराइल हमास लेबनान तथा ईरान के मध्य युद्ध अपने पूरे शबाब पर हैl इजरायल के आतंकवादी समूह हिज्बुल्लाह के कमांडर याह्या सिंनवार को रॉकेट लांचर से मार देने के बाद इसके जवाब में लेबनान से इजरायल के सिरोसिया शहर में जहां इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का आधिकारिक निवास है रॉकेट लांचर से हमला किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने अपने बयान में बताया की इस तरह के और हमले अभी जारी रहेंगे। पूरा विश्व इस समय विश्व युद्ध की कगार पर है और यदि उत्तर तथा दक्षिण कोरिया के मध्य युद्ध होता है तो निश्चित तौर पर अमेरिका साउथ कोरिया की तरफ से एवं रूस,चीन नॉर्थ कोरिया की तरफ से इस युद्ध में शामिल हो सकते हैं। पूरा विश्व दो भागों में बट गया है एक तरफ रूस,चीन, नॉर्थ कोरिया, पाकिस्तान तथा पश्चिम एशिया के देश होंगे तथा दूसरी तरफ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, इजरायल तथा अन्य देश के युद्ध में शामिल होने की संभावना बलवती हो रही हैl भारत लगातार रूस-यूक्रेन, इसराइल-हमास युद्ध को रोकने के लिए प्रयासरत है और इस प्रयास के अंतर्गत भारत के प्रधानमंत्री ने रूस तथा यूक्रेन की आधिकारिक यात्राएं भी की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के अडियल रवैये के कारण शांति वार्ता संभव नहीं हो पाई, परंतु जैसा पुतिन ने अपने वक्तव्य में बताया की रूस यूक्रेन के साथ युद्ध विराम शांतिपूर्वक तरीके से करना चाहता है पर यूक्रेन इस वार्ता से पीछे हटकर अमेरिका तथा नाटो देशों के दम पर इनकार कर दिया हैl रूस यूक्रेन युद्ध से अमेरिका रूस का बड़ा विरोधी बनकर लगभग 15 साल पीछे जा चुका है एवं उसकी मुद्रा डॉलर की कीमत भी अब वैश्विक स्तर पर काम होते जा रही है। रूस के नुकसान के साथ-साथ अमेरिका को भी काफी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी हैl पुतिन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे हमेशा रूस के लिए और शांति प्रयासों के लिए फिक्रमंद रहते हैं यह यह तथ्य वैश्विक शांति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम भी है। पूरी दुनिया वैश्विक युद्ध के परिणाम से अच्छे तरह से वाकिफ है पूर्व के विश्व युद्ध में जापान के नागाशाकी तथा हिरोशिमा की भयानक मानवीय त्रासदी को हर देश के नागरिक अच्छे से महसूस करते हैं। अतः विश्व युद्ध को हर संभव प्रयासों से  रोका जाना चाहिए अन्यथा विश्व युद्ध मानवता के विकास के लिए एक बडा अवरोध और विनाशक होगी।</div>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 17:20:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पीएम मोदी से मिलने के बाद जिनपिंग ने कहा, ‘ड्रैगन और हाथी अब आ जाएं साथ’</title>
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                        <![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज तियानजिन में 7 साल बाद एक मंच पर मिले। इस दोनों नेताओं के बीच करीब 50 मिनट तक द्विपक्षीय वार्ता हुई। बातचीत में कैलाश मानसरोवर यात्रा, सीमा समझौते, व्यापारिक संबंधों और दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने पर चर्चा की गई। इस दौरान राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर उन्हें खुशी हुई और यह समय है जब “ड्रैगन और हाथी एक साथ आएं।” उन्होंने कहा कि भारत और चीन दुनिया की दो सबसे पुरानी सभ्यताएं और सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। दोनों देश ग्लोबल साउथ</p>...]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154278/after-meeting-pm-modi-jinping-said-dragon-and-elephants-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/पीएम-मोदी-से-मिलने-के-बाद-जिनपिंग-ने-कहा,-‘ड्रैगन-और-हाथी-अब-आ-जाएं-साथ’.jpeg" alt=""></a><br /><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज तियानजिन में 7 साल बाद एक मंच पर मिले। इस दोनों नेताओं के बीच करीब 50 मिनट तक द्विपक्षीय वार्ता हुई। बातचीत में कैलाश मानसरोवर यात्रा, सीमा समझौते, व्यापारिक संबंधों और दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने पर चर्चा की गई। इस दौरान राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर उन्हें खुशी हुई और यह समय है जब “ड्रैगन और हाथी एक साथ आएं।” उन्होंने कहा कि भारत और चीन दुनिया की दो सबसे पुरानी सभ्यताएं और सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। दोनों देश ग्लोबल साउथ के अहम सदस्य हैं और अपने लोगों की भलाई व मानव समाज की प्रगति के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाते हैं।</p>
<p>इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए चीन का आभार जताया। उन्होंने कहा कि पिछले साल कजान में हुई मुलाकात के बाद दोनों देशों के रिश्तों को सकारात्मक दिशा मिली है। सीमा पर सैनिकों की वापसी के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना है। सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों के बीच समझौता हुआ है। इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू हो चुकी है और भारत-चीन के बीच डायरेक्ट फ्लाइट भी फिर से शुरू की जा रही है।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि भारत और चीन का सहयोग 2.8 अरब (2.8 बिलियन) लोगों के हित से जुड़ा हुआ है। यह सहयोग पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देश परस्पर विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>]]>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 Aug 2025 22:02:57 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पीएम मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से तियानजिन में की मुलाकात, आपसी सहयोग पर जताया भरोसा</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रविवार को तियानजिन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच रिश्तों को और मजबूत करने पर जोर दिया। पीएम मोदी ने कहा कि पिछले साल कजान में हुई सार्थक बातचीत ने भारत-चीन संबंधों को सकारात्मक दिशा दी है। उन्होंने बताया कि सीमा पर डिसएंगेजमेंट (सैन्य पीछे हटने) के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना है। भारत और चीन के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने सीमा प्रबंधन पर समझौता कर लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ने यह भी कहा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हो गई है</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154276/pm-modi-assured-chinese-president-xi-jinping-to-meet-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/591.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रविवार को तियानजिन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच रिश्तों को और मजबूत करने पर जोर दिया। पीएम मोदी ने कहा कि पिछले साल कजान में हुई सार्थक बातचीत ने भारत-चीन संबंधों को सकारात्मक दिशा दी है। उन्होंने बताया कि सीमा पर डिसएंगेजमेंट (सैन्य पीछे हटने) के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना है। भारत और चीन के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने सीमा प्रबंधन पर समझौता कर लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ने यह भी कहा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हो गई है और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी जल्द शुरू होंगी। उन्होंने बताया कि भारत और चीन के बीच सहयोग 2.8 अरब लोगों के हितों से जुड़ा है और यह पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ रिश्तों को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। पीएम मोदी ने इस अवसर पर चीन को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की सफल अध्यक्षता के लिए बधाई भी दी और एक बार फिर चीन आने के निमंत्रण और इस मुलाकात के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग का धन्यवाद किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी शनिवार शाम तियानजिन पहुंचे, जो उनका सात वर्षों में पहला चीन दौरा है। गौरतलब है कि हाल ही में, दोनों देशों ने लिपुलेख, नाथुला और शिपकी ला जैसे मार्गों के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू किया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी की अगस्त में हुई यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने सीधी उड़ान कनेक्टिविटी को फिर से शुरू करने और वीजा प्रक्रिया को सरल बनाने पर सहमति जताई है।-(PIB)</p>]]>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 Aug 2025 22:01:15 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जब तक मैं अमेरिका का राष्ट्रपति हूं, ताइवान सेफ है' ट्रंप का दावा- जिनपिंग ने किया उनसे वादा।</title>
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                        <![CDATA[<div>
<blockquote class="format1">
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
</blockquote>
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<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनसे वादा किया है कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन ताइवान पर हमला नहीं करेगा. ट्रंप ने यह बयान फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में दिया. उन्होंने कहा, ‘शी जिनपिंग ने मुझे कहा कि जब तक मैं राष्ट्रपति हूं, वो ताइवान पर आक्रमण नहीं करेंगे. मैंने उनका आभार जताया, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन बहुत धैर्यवान है.’</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया जब वे रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की तैयारी कर रहे थे.</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153981/as-long-as-i-am-the-president-of-america-taiwan"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/jinping_trump_news-2025-08-be1472e8957c4edfbe85b9e32e7550cc.webp" alt=""></a><br /><div>
<blockquote class="format1">
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
</blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनसे वादा किया है कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन ताइवान पर हमला नहीं करेगा. ट्रंप ने यह बयान फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में दिया. उन्होंने कहा, ‘शी जिनपिंग ने मुझे कहा कि जब तक मैं राष्ट्रपति हूं, वो ताइवान पर आक्रमण नहीं करेंगे. मैंने उनका आभार जताया, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन बहुत धैर्यवान है.’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया जब वे रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की तैयारी कर रहे थे. ट्रंप और शी की दूसरी कार्यकाल में यह पहली पक्की बातचीत जून में हुई थी. अप्रैल में भी ट्रंप ने दावा किया था कि शी ने उन्हें फोन किया था, हालांकि उन्होंने तारीख नहीं बताई थी. इधर चीन ने अमेरिकी प्रशासन को दोहराया है कि ताइवान मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में सबसे ‘संवेदनशील और अहम’ विषय है. वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंगयू ने कहा, ‘अमेरिका को वन-चाइना पॉलिसी पर कायम रहना चाहिए और ताइवान से जुड़े मामलों को सावधानी से संभालना चाहिए.’</div>
<div style="text-align:justify;">चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसे अपने में मिलाने का संकल्प दोहराता रहा है, भले ही इसके लिए बल प्रयोग क्यों न करना पड़े. दूसरी ओर ताइवान चीन की दावेदारी को सख्ती से खारिज करता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप के बयान पर ताइवान सरकार ने आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) के वरिष्ठ सांसद वांग टिंग-यू ने लिखा, ‘हम अपने बड़े सहयोगी का समर्थन पाकर आभारी हैं. लेकिन सुरक्षा केवल दुश्मन के वादों या दोस्तों की मदद पर निर्भर नहीं हो सकती. अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करना ही सबसे महत्वपूर्ण है.’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका भले ही ताइवान का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी है, लेकिन उसके साथ आधिकारिक राजनयिक रिश्ते नहीं रखता. यही वजह है कि ताइवान अपनी सुरक्षा रणनीति में आत्मनिर्भरता और सहयोगियों दोनों पर जोर दे रहा है. ट्रंप का यह दावा न केवल वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्तों पर असर डाल सकता है, बल्कि ताइवान स्ट्रेट में पहले से मौजूद तनाव को भी नई दिशा दे सकता है.</div>]]>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Aug 2025 12:44:43 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>चीन के भावी विदेश मंत्री हिरासत में, विदेश से लौटते ही पुलिस ने हिरासत में लिया।</title>
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<div style="text-align:justify;">चीन के भावी विदेश मंत्री लियू जियानचाओ को हिरासत में ले लिया गया है। यह कार्रवाई उनके विदेश दौरे से लौटने के तुरंत बाद की गई है। उन्हें वर्तमान चीनी विदेश मंत्री वांग यी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था। वर्तमान में वह कम्युनिस्ट पार्टी के विदेशी राजनीतिक दलों के साथ संबंधों के समन्वय की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रविवार को बताया कि जियानचाओ को जुलाई के अंत में विदेश यात्रा से बीजिंग लौटने के बाद हिरासत में लिया गया है। हालांकि, चीन ने इस मामले पर पूरी</div></div></div></div></div></div></div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153853/police-detained-the-future-foreign-minister-of-china-as-soon"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/imagemmm.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
<div class="gs">
<div>
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<div>
<div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">चीन के भावी विदेश मंत्री लियू जियानचाओ को हिरासत में ले लिया गया है। यह कार्रवाई उनके विदेश दौरे से लौटने के तुरंत बाद की गई है। उन्हें वर्तमान चीनी विदेश मंत्री वांग यी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था। वर्तमान में वह कम्युनिस्ट पार्टी के विदेशी राजनीतिक दलों के साथ संबंधों के समन्वय की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रविवार को बताया कि जियानचाओ को जुलाई के अंत में विदेश यात्रा से बीजिंग लौटने के बाद हिरासत में लिया गया है। हालांकि, चीन ने इस मामले पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। चीनी सरकार के लिए मीडिया संबंधी प्रश्नों का जवाब देने वाली संस्था राज्य परिषद सूचना कार्यालय और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क विभाग ने इस मामले पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">61 वर्षीय लियू जियानचाओ वर्तमान में कम्युनिस्ट पार्टी के लिए विदेशी राजनीतिक दलों के साथ संबंधों से संबंधित निकाय का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने 2022 में यह पदभार ग्रहण करने के बाद से 20 से अधिक देशों की यात्रा की है और 160 से अधिक देशों के अधिकारियों से मुलाकात की है। उन्होंने चीन के वर्तमान विदेश मंत्री वांग यी का उत्तराधिकारी समझा जाने लगा था। वांग यी ने चीन में कम से कम दो विदेश मंत्रियों के कार्यकाल खत्म होने के पहले ही इस्तीफा देने के कारण मजबूरी में यह पद दोबारा ज्वाइन किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लियू जियानचाओ ने दुनियाभर के कई देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बैठकें की हैं। इनमें अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी शामिल हैं। ऐसे में इन बैठकों के बाद यह कयास लगाए जाने लगे थे कि चीन के इस पूर्व राजदूत और विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रवक्ता को देश का अगला विदेश मंत्री बनाया जा सकता है। यह भी कहा गया था कि चीन इसी कारण से लियू को दुनियाभर के शीर्ष राजनेताओं से मिला रहा है, ताकि वह विदेश मंत्री के पद को संभालने के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाएं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसा माना जा रहा है कि लियू की हिरासत किसी राजनयिक से जुड़ी उच्चतम स्तर की जांच का प्रतीक है। इससे पहले चीन ने 2023 में अपने पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शिष्य क्विन गैंग को भी एक विदेशी महिला के साथ संबंध की अफवाहों के बाद पद से हटा दिया था।</div>
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<div style="text-align:justify;">उत्तरपूर्वी प्रांत जिलिन में जन्मे लियू ने बीजिंग फॉरेन स्टडीज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और विदेश मंत्रालय में अनुवादक के रूप में अपना पहला पद संभालने से पहले ऑक्सफोर्ड से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन किया। उन्होंने ब्रिटेन में चीन के मिशन में और बाद में इंडोनेशिया और फिलीपींस में राजदूत के रूप में कार्य किया है। मंत्रालय के प्रवक्ता के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, वे चीन के हितों का बेबाक बचाव करते हुए हास्यपूर्ण और सहज टिप्पणियों के लिए जाने जाते थे।</div>
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                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Aug 2025 20:27:20 +0530</pubDate>
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                <title>वनतारा के शेर और राजनीति के छावा</title>
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                        <![CDATA[<p>आज आप फिर कहेंगे  कि मै घूम-फिरकर शेरों और छावा पर आ गया ,सवाल ये है कि  मै करूँ  तो करूँ क्या ? मै डोनाल्ड ट्रम्प से चीन के राष्ट्रपति शी  जिन पिंग की तरह पंगा ले नहीं सकत।  नहीं कह सकता की ' टैरिफ वार हो या असली वार हम अंत तक लड़ने को तैयार हैं। शी जिन पिंग ने जो कहा यदि यही बात हमारे विश्वगुरु कहते तो मै उन्हें घी-शक्कर खिलाता,लेकिन उन्होंने तो कुछ कहने के बजाय वनतारा जाना पसंद किया। ये उनका निजी मामला है इसलिए मै कुछ कहना नहीं चाहता। आजकल राजनीति में इतिहास के</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149420/the-lion-of-vantara-and-the-politics-of-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/wntara-1.jpg" alt=""></a><br /><p>आज आप फिर कहेंगे  कि मै घूम-फिरकर शेरों और छावा पर आ गया ,सवाल ये है कि  मै करूँ  तो करूँ क्या ? मै डोनाल्ड ट्रम्प से चीन के राष्ट्रपति शी  जिन पिंग की तरह पंगा ले नहीं सकत।  नहीं कह सकता की ' टैरिफ वार हो या असली वार हम अंत तक लड़ने को तैयार हैं। शी जिन पिंग ने जो कहा यदि यही बात हमारे विश्वगुरु कहते तो मै उन्हें घी-शक्कर खिलाता,लेकिन उन्होंने तो कुछ कहने के बजाय वनतारा जाना पसंद किया। ये उनका निजी मामला है इसलिए मै कुछ कहना नहीं चाहता। आजकल राजनीति में इतिहास के छावा तलाशे जा रहे हैं।  पहले डोनाल्ड ट्रम्प से टकराने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की मुझे राजनीति के छावा लगे  लेकिन अब इस फेहरिश्त में चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग का नाम भी जुड़ गया है।</p>
<p>मामला राष्ट्रीय होकर भी अंतर्राष्ट्रीय हो गया है।  हमारे छावा आजकल ट्रम्प से भिड़ने का साहस जुटाने या दिखने के बजाय अपने गृहराज्य गुजरात में वनतारा के प्रवास पर हैं।  सिंहों की तस्वीरें उतार रहे हैं, सिंह शावकों यानि छावाओं को बोतल से दूध पिला रहे हैं। उनका दिल करुणा से सराबोर है।  वे किसानों से ज्यादा वन्य प्राणियों का ख्याल रखते हैं ,इसीलिए मै उनका हृदयतल से सम्मान करता हूँ। लेकिन ट्रम्प के समाने मुझे अपने नेता का भीगी बिल्ली बनना बिलकुल रास नहीं आता। आपको आता है तो मुझे कुछ नहीं कहना,किन्तु मै तो अपनी बात कर रहा हूँ। मेरी बात सबके मन की बात हो ये जरूरी नहीं। मन की बात ,मन की होती है जन-जन के मन की नहीं होती,ये हम मन की बात के 100  से ज्यादा एपिसोड देखकर जान गए हैं।</p>
<p>आपको पता है कि  इस समय अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  साहब ने सहित युद्ध के बजाय दुनिया को टैरिफ युद्ध की सौगात दी है। ट्रंप  ने कनाडा और मैक्सिको के साथ ही चीन पर ही नहीं हमारे भारत पर  भी अतिरिक्‍त टैरिफ लगाया है. अमेरिका  के इस कदम से चीन आगबबूला हो गया है।  लेकिन हमने अपने आपको आग-बबूला नहीं होने दिया। इधर जैसे ही अमेरिका ने चीन से निर्यात  होने वाले माल  पर  टैरिफ लगाने का ऐलान किया ,उधर बीजिंग की तरफ से भी जवाबी कार्रवाई की गई।  चीन भी अब अमेरिका से आने वाले  होने वाले सामान  पर 10 से 15 फीसद तक का टैरिफ लगाने जा रहा है।  इससे अब दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच ऐलान -ऐ- ट्रेड वॉर शुरू हो गया है।  चीन  ने ट्रंप सरकार को खुले तौर पर युद्ध की भी धमकी दे डाली है।  चीन का कहना है कि अगर अमेरिका युद्ध चाहता है (चाहे वह टैरिफ युद्ध हो, व्यापार युद्ध हो या कोई और युद्ध) तो हम अंत तक लड़ने के लिए तैयार हैं।</p>
<p>दरअसल भारत और चीन में यही फर्क है। चीन का राष्ट्रवाद भारत और अमेरिका के राष्ट्रवाद से अलग है। हम संकट के समय में वनतारा में मन की शांति तलाश करते हैं लेकिन चीन मोर्चाबंदी करता है। हम या तो झूला झूलने में सिद्धहस्त हैं या सिंह शावकों को दूध पिलाने में।  हमें आँखें तरेरना आता ही नहीं। हम आँखें  तरेरते   भी हैं तो ले-देकर नेहरू,इंदिरा,राजीव और राहुल गाँधी पर। क्योंकि हमें पता है कि  हम ट्रम्प  साहब हों या शी जिन  पिंग साहब को आँखें नहीं दिखा सकते ।  उनसे ऑंखें नहीं मिला सकते  ,भले ही दोनों हमें आँखें दिखाएँ, हमारी बांह मरोड़ें या हमारी जमीन पर कब्जा कर लें।</p>
<p>आप हमारे छावा से तो सवाल नहीं कर सकते लेकिन अपने आपसे तो सवाल कर सकते हैं कि  जिस टोन में चीन अमेरिका को जबाब दे रहा है ,हम क्यों नहीं दे पा रहे ? क्या हमने माँ का दूध नहीं पिया ? क्या हम अमेरिका को छठी का दूध याद नहीं दिला सकते ? हमारी आबादी चीन से ज्यादा है। हम चीन  से बड़ा बाजार हैं।  अमेरिका की अर्थव्यवस्था का मेरुदंड हम भारतीय हैं। फिर भी हम शतुरमुर्ग   बने खड़े हैं। आप सवाल कर  सकते  हैं कि  हमने आपको देश का निगेहबान   कहें ,चौकीदार कहें या सेवक कहें इसलिए नहीं चुना कि  आप देश के स्वाभिमान की रक्षा करने के वजाय मोरों के साथ ,सिंह  शावकों के साथ या गाय-बछड़ों के साथ फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहें ।  आपको जेलेंस्की और शी जिन पिंग की तरह काम करना चाहिए था।</p>
<p>जो काम हमारे आज के नेता कर रहे हैं वो तो आज के नेताओं की आँख की किरकिरी रहे  नेहरू,गाँधी भी कर चुके हैं। इसीलिए   आपको ऐसा करने से रोका जाना पूर्वाग्रह माना जाएगा ,इसलिए आप शौक से सिंह शावकों को बोतल से दूध पिलाइये ,लेकिन देख लीजिये कि देश की अर्थ व्यवस्था भी अब घोर कुपोषण का शिकार  है।  शेयर बाजार औंधे   मुंह पड़ा हुआ है।  इन्हें भी दूध से बोतल पिलाये जाने की जरूरत है अन्यथा ये दोनों ही दम तोड़  देंगे। जो बात मै अपने आज के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के लिए कह रहा हूँ वो ही बात मै गांधियों से भी कहता बाशर्त कि  वे सत्ता प्रतिष्ठान में होते। वे तो विपक्ष में है।  वे तो बिखरे हुए हैं। असहाय हैं। अमेरका से पंगा नहीं ले सकते। वे तो आपसे ही पंगा लेकर हलाकान हैं।</p>
<p>बहरहाल चूंकि हमारे राष्ट्र नायक ने वनतारा  का प्रमोशन किया है तो मै भी निकट भविष्य में वनतारा  जाकर कुछ दिन वहां बिताऊंगा । अनंत अम्बानी साहब को भी बधाई दूंगा। लेकिन अभी तो मेरी नींद उडी हुई है। सपने में कभी ट्रम्प साहब आते हैं तो कभी जेलेंसिकी। अब तो शी जिन पिंग   साहब भी आने लगे हैं। कल रात ही मेरे सपने में मोदी जी अपने सिंह शावकों को दूध पिलाते नजर आये।</p>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Mar 2025 15:42:43 +0530</pubDate>
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                <title>पित्रोदा जी, देश जानना चाहता है—क्या चीन वाकई मित्र है?</title>
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                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैम पित्रोदा जी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ घोषणा कर दी है—"चीन भारत का शत्रु नहीं है।" अब जब इतनी विलक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावशाली और उच्चकोटि की हस्ती ने यह निर्णय सुना दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें अपने अनुभवों और ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रश्नचिह्न लगाना ही होगा। गलवान घाटी में जो कुछ भी हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह निश्चय ही ‘मैत्रीपूर्ण संवाद’ की एक अनोखी शैली रही होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सैनिकों ने कूटनीतिक सौहार्द दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। अरुणाचल और लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ भी संभवतः ‘संस्कृति और परंपराओं के आदान-प्रदान’ का ही एक अभिनव प्रयास था</span></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148742/pitroda-ji-wants-to-know-the-country-is-china"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/1-prof.-rkjain.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैम पित्रोदा जी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ घोषणा कर दी है—"चीन भारत का शत्रु नहीं है।" अब जब इतनी विलक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावशाली और उच्चकोटि की हस्ती ने यह निर्णय सुना दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें अपने अनुभवों और ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रश्नचिह्न लगाना ही होगा। गलवान घाटी में जो कुछ भी हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह निश्चय ही ‘मैत्रीपूर्ण संवाद’ की एक अनोखी शैली रही होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सैनिकों ने कूटनीतिक सौहार्द दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। अरुणाचल और लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ भी संभवतः ‘संस्कृति और परंपराओं के आदान-प्रदान’ का ही एक अभिनव प्रयास था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां मित्रता को नए आयाम देने के लिए टैंक और लड़ाकू विमानों का उपयोग किया गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>1962 <span lang="hi" xml:lang="hi">का युद्ध</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो मात्र दो पड़ोसी राष्ट्रों द्वारा ‘सीमाओं की कलात्मक पुनर्कल्पना’ का एक प्रयोग था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें चीन ने भारतीय भूभाग पर अधिकार जमाकर यह प्रदर्शित किया कि पड़ोसी होने का अर्थ क्या होता है! यह सब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शायद हमारे ऐतिहासिक तथ्यों की गलत व्याख्या का परिणाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जब एक महान विभूति कह रही है कि चीन शत्रु नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवश्य ही हमें अपने ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ और राष्ट्रभक्ति की परिभाषा पर पुनर्विचार करना चाहिए!</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्रोदा जी जैसे महान चिंतकों की विशिष्टता यही होती है कि वे धरातल की सच्चाई से कोसों दूर रहते हैं और अपनी विचारधारा को राजनीतिक समीकरणों की प्रयोगशाला में गढ़ते हैं। जब सीमा पर हमारे वीर जवान अपने प्राणों की आहुति देकर घुसपैठ रोक रहे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पित्रोदा जी अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठकर ‘वैश्विक नागरिकता’ की कल्पनाओं में खोए रहते हैं। शायद उनके लिए राष्ट्रभक्ति का मोल अब सिर्फ़ ट्विटर पर ‘चीनी स्मार्टफोन’ से किए गए दिखावटी पोस्टों में ही सिमटकर रह गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मगर असली प्रश्न यह है कि यदि चीन हमारा शत्रु नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर शत्रु है कौन</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या वह किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">या वह छात्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शिक्षा और रोजगार की माँग करता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा वह आम नागरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सरकार से प्रश्न पूछने का दुस्साहस करता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना देखिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन लोगों को तो बिना किसी संकोच के ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दे दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चीन के लिए ‘सहानुभूति’ और ‘भाईचारे’ का विशेष आरक्षण रखा जाता है! ऐसा प्रतीत होता है कि देशभक्ति की परिभाषाएँ अब सुविधा और स्वार्थ के तराजू पर तौली जाने लगी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि यही तर्क स्वीकार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अगला उद्घोषणा शायद यह हो कि पाकिस्तान भी हमारा शत्रु नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मात्र एक ‘शरारती नटखट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पड़ोसी’ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी-कभी नटखट हरकतें कर बैठता है! संभवतः भविष्य में इतिहास की किताबों में यह भी लिखा जाए कि </span>26/11 <span lang="hi" xml:lang="hi">का जघन्य आतंकी हमला ‘अतिथि देवो भव’ की भारतीय परंपरा के तहत हुआ था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पुलवामा में हमारे वीर जवानों का बलिदान मात्र ‘आपसी सौहार्द’ की एक दुर्भाग्यपूर्ण भूल-चूक थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अनदेखा कर देना चाहिए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मगर प्रश्न यह है कि यदि चीन और पाकिस्तान हमारे ‘सखा’ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर नेपाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ सतत कूटनीतिक तनाव क्यों बना रहता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों हमारी सद्भावना उन्हीं देशों के लिए आरक्षित है जो हमारी संप्रभुता को चुनौती देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे भूभाग पर अतिक्रमण करते हैं और हमारे वीर सैनिकों के बलिदान का उपहास उड़ाते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह ‘मैत्री’ का नया प्रतिमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें राष्ट्र के सम्मान को तिलांजलि देकर उन ताकतों को मित्र माना जाता है जो भारत की अखंडता पर निरंतर प्रहार करते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर शत्रुता और राष्ट्रहित की परिभाषा पर पुनर्विचार करना ही उचित होगा!</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब एक नया युग प्रारंभ हो चुका है—‘शत्रु के प्रति सहानुभूति और नागरिकों के प्रति कठोरता’ का। हमारी सेना सीमाओं पर अपने प्राणों की आहुति दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन देश के भीतर यदि कोई युवा शासन से प्रश्न पूछने का साहस कर ले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह तुरंत ‘देशद्रोही’ करार दे दिया जाता है। यह कैसा राष्ट्रवाद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश के सम्मान और सुरक्षा से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यापारिक और राजनीतिक समीकरणों से संचालित होता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अब देशभक्ति की परिभाषा भी सत्ता की सुविधा अनुसार बदल दी जाएगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">शायद अब विद्यालयों में ‘राष्ट्रप्रेम’ की शिक्षा को परिवर्तित कर ‘राजनीतिक अनुकूलता’ के नए पाठ पढ़ाए जाने चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि असली देशभक्त वह नहीं जो राष्ट्र की रक्षा के लिए बलिदान दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वह है जो सत्ता के रुख के अनुसार अपने विचारों को मोड़ना जानता हो!</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह विचारणीय है कि जब भारत अपनी सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु कोई ठोस कदम उठाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यही तथाकथित बुद्धिजीवी उसे ‘युद्धोन्माद’ का जामा पहना देते हैं। यदि हमारी सेना सीमा पर सतर्क रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे ‘अनावश्यक आक्रामकता’ का तमगा दे दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु जब चीन अपने सैन्य विस्तार और सामरिक वर्चस्व को बढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे ‘वैश्विक शक्ति संतुलन’ का गौरवशाली नाम दे दिया जाता है। विडंबना यह है कि राष्ट्रभक्ति का यह नया सिद्धांत केवल भारत पर ही लागू होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शत्रु देशों पर नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पित्रोदा जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु देश की जागरूक जनता आपकी इस ‘नवाचारपूर्ण परिभाषा’ को सहज स्वीकार नहीं कर सकती। उन्हें अपने पुरखों और शहीदों ने यही सिखाया है कि जो हमारी सीमाओं पर अतिक्रमण करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे वीरों के रक्त से धरती को लाल करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही हमारा शत्रु है। परंतु अब प्रतीत होता है कि हमें इस मूल सत्य को छोड़कर ‘राजनीतिक सुविधा’ और ‘राजनयिक स्वार्थ’ के तराजू पर तोलकर यह निर्धारित करना होगा कि कौन मित्र है और कौन शत्रु! क्या यही राष्ट्रनीति का नवीन संस्करण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो फिर यह राष्ट्रवाद नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अवसरवादिता की पराकाष्ठा है!</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब अगली बार युद्ध की लपटें आसमान तक उठें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंदूकों की गड़गड़ाहट में किसी वीर सपूत की अंतिम चीख दब जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या किसी मां की आंखों में तिरंगे में लिपटे बेटे के शव को देख आंसू पत्थर बन जाएं—तो ठहरकर एक बार जरूर सोचिएगा। यह धधकता ज्वालामुखी क्या वास्तव में राष्ट्रभक्ति की वेदी पर जलाया गया पवित्र अग्निकुंड है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर यह सिर्फ वैश्विक व्यापार नीति के मोहरों की बिसात पर बिछी कोई रक्तरंजित चाल</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आज देशभक्ति केवल वीरगाथाओं में सिमटकर नहीं रह गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वह सत्ता के गलियारों में लिखी उन नीतियों की मोहताज बन गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी सैनिक की शहादत से अधिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक हितों और राजनीतिक समीकरणों को साधने में व्यस्त हैं। क्या यह युद्ध वास्तव में मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा हेतु लड़ा जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या यह महज किसी आर्थिक और कूटनीतिक स्वार्थ का खूनी तांडव है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी कोई रणबांकुरा अपने प्राणों की आहुति दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी किसी मां की कोख सूनी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी किसी बहन की राखी इंतजार में रह जाए—तब केवल शोक और गर्व में मत डूबिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि गहरी दृष्टि से देखिए कि यह बलिदान वाकई मातृभूमि की रक्षा के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर किसी छिपे हुए षड्यंत्र की अनकही पटकथा का एक और अध्याय</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आज राष्ट्रभक्ति की कसौटी रणभूमि में बहे रक्त से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सत्ता की चौखट पर लिखे निर्णयों से तय हो रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि राष्ट्र की जागरूक जनता अपनी दृष्टि को तीव्र करे और भली-भांति समझे कि कौन वास्तव में देशहित में चिंतन कर रहा है और कौन राष्ट्रवाद का मुखौटा ओढ़कर अपने स्वार्थपूर्ण एजेंडे को साधने में जुटा है। इतिहास साक्षी है कि जब तक जनमानस निर्भीक होकर सत्ता से प्रश्न करता रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक सत्य को कुचला नहीं जा सकेगा और राष्ट्र की अस्मिता पर कोई आंच नहीं आएगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब हमें यह निर्णायक फैसला करना होगा—क्या हम अपने स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए अडिग रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर ‘वैश्विक नागरिकता’ के भ्रामक मायाजाल में फंसकर अपने गौरवशाली अस्तित्व को तिलांजलि दे देंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">और हां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्रोदा जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगला बयान देने से पहले कृपया यह भी स्पष्ट कर दीजिए कि ‘देशद्रोह’ की नई परिभाषा क्या होगी—ताकि राष्ट्र के जागरूक नागरिक यह जान सकें कि अब सत्य कहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष चिंतन करना और सत्ता से प्रश्न पूछना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें से क्या अगली साजिश के तहत अपराध घोषित किया जाने वाला है!</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन "अरिजीत"</span></strong><strong>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़वानी (मप्र)</span></strong></p>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Feb 2025 23:29:02 +0530</pubDate>
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                <title>किरेन रीजीजू ने राहुल गांधी के बयान पर कहा-  देश का अपमान नहीं सहेंगे</title>
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                        <![CDATA[<p><strong>नई दिल्लीः </strong>संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने सोमवार को आरोप लगाया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चीन के प्रवक्ता से भी ज्यादा पड़ोसी देश की तारीफ की। </p>
<p>रीजीजू ने दावा किया, "भारत की संसद के अंदर उन्हें जिस तरह से चीन का गुणगान किया ऐसा मैंने कभी नहीं सुना था।" उन्होंने कहा कि 1959 और 1962 में चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा किया उसके लिए राहुल गांधी को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उनके ही परिवार के पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। </p>
<p>उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भाग लेते हुए यह भी</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148180/kiren-rijiju-said-on-rahul-gandhis-statement-will-not-bear"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(7).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्लीः </strong>संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने सोमवार को आरोप लगाया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चीन के प्रवक्ता से भी ज्यादा पड़ोसी देश की तारीफ की। </p>
<p>रीजीजू ने दावा किया, "भारत की संसद के अंदर उन्हें जिस तरह से चीन का गुणगान किया ऐसा मैंने कभी नहीं सुना था।" उन्होंने कहा कि 1959 और 1962 में चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा किया उसके लिए राहुल गांधी को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उनके ही परिवार के पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। </p>
<p>उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भाग लेते हुए यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने सदन के अंदर जो बातें की हैं उन्हें सत्यापित करना चाहिए, अन्यथा आसान को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सदन के भीतर चीन के प्रवक्ता से भी ज्यादा चीन की तारीफ की है। </p>
<p>रीजीजू ने कहा, “यह भारत की संसद है और इस संसद में हम देश का अपमान नहीं सह सकते।” चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस संसद शशिकांत सेंथिल ने कहा कि राहुल गांधी ने देश के भविष्य के दृष्टिकोण सामने रखा है और देश का युवा यही चाहता है। निर्दलीय सांसद विशाल पाटिल ने कहा कि यह सपनों का नहीं, संघर्ष का भारत बनता जा रहा है। </p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Feb 2025 18:00:39 +0530</pubDate>
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