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                <title>National Education Policy 2020 - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>National Education Policy 2020 RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>शहरों की बसाहट के पीछे विलुप्त होती मूल ग्रामीण संस्कृती</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने कहा है कि अनियोजित शहरीकरण आर्थिक अवसर तो देता है,लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों का संतुलित विकास नहीं किया जाए तो सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण अपरिहार्य हो जाता है। भारत में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का भी परिवर्तन है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारंपरिक रीति-रिवाज कमजोर पड़ रहे हैं और लोककलाएँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183432/the-original-rural-culture-is-disappearing-behind-the-settlement-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने कहा है कि अनियोजित शहरीकरण आर्थिक अवसर तो देता है,लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों का संतुलित विकास नहीं किया जाए तो सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण अपरिहार्य हो जाता है। भारत में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का भी परिवर्तन है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारंपरिक रीति-रिवाज कमजोर पड़ रहे हैं और लोककलाएँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर कहा है, "भारत का विकास तभी संभव है जब गाँवों का विकास होगा।" उनकी 'आत्मनिर्भर भारत', 'डिजिटल इंडिया', 'स्मार्ट विलेज' और 'वाइब्रेंट विलेज' जैसी अवधारणाएँ इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों को आधुनिक सुविधाएँ मिलें, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे।<br /></p><p style="text-align:justify;">पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने "पूरा मॉडल" जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधा उपलब्ध करने की बात कही में स्पष्ट कहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शहर जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ ताकि लोगों को पलायन के लिए विवश न होना पड़े। उनका विश्वास था कि यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक गाँवों तक पहुँचेगी, तो भारत का संतुलित विकास संभव होगा।<br /></p><p style="text-align:justify;">भारत को सदियों से गाँवों का देश कहा जाता रहा है। गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता की जीवंत प्रयोगशाला रहे हैं। कभी गाँवों की चौपालें संवाद का केंद्र थीं, खेत-खलिहान जीवन का आधार थे, लोकगीत और लोकनृत्य संस्कृति की पहचान थे, और आपसी सहयोग जीवन की सबसे बड़ी पूँजी था। किंतु पिछले कुछ दशकों में तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण और आर्थिक अवसरों की तलाश ने ग्रामीण संस्कृति की जड़ों को कमजोर कर दिया है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों का लगातार विस्तार गाँवों की जमीन ही नहीं, उनकी आत्मा को भी अपने भीतर समेटता जा रहा है। महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।" यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यदि गाँव अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देंगे, तो भारत की मौलिक पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाएगी। प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी सार्थक है जब वह आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को भी समान महत्व दे। केवल शहरों में विकास केंद्रित होने से असमानता बढ़ती है और ग्रामीण समाज अपनी मौलिकता खोने लगता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि "मजबूत गाँव ही मजबूत भारत की नींव हैं।" यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि केवल महानगरों का विकास किसी राष्ट्र को समृद्ध नहीं बना सकता।ग्रामीण संस्कृति केवल खेती तक सीमित नहीं है। यह लोकभाषाओं, लोकसंगीत, हस्तशिल्प, पारंपरिक कृषि ज्ञान, सामुदायिक जीवन, प्रकृति के प्रति सम्मान और मानवीय संबंधों की संस्कृति है। जब गाँव शहरों में बदलते हैं, तब खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल उग आते हैं। तालाब मिट जाते हैं, चौपालें समाप्त हो जाती हैं और बच्चों के खेल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो जाते हैं। अर्थशास्त्री ई. एफ. शूमाकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "स्माल इस ब्यूटीफुल" में लिखा था कि विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को अधिक मानवीय बनाना होना चाहिए। यदि विकास मनुष्य को उसकी संस्कृति और प्रकृति से दूर कर दे, तो वह अधूरा विकास है।<br /></p><p style="text-align:justify;">विकास और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित किया जाने की नितांत आवश्यकता है । गाँवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, इंटरनेट, उद्योग, कृषि प्रसंस्करण, कुटीर उद्योग, पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ। साथ ही लोककलाओं, लोकभाषाओं, लोकपर्वों और पारंपरिक ज्ञान को विद्यालयों और सामाजिक जीवन में सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020-21 भी भारतीय भाषाओं, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर विशेष बल देती है। यदि शिक्षा अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगी, तो नई पीढ़ी आधुनिक भी बनेगी और अपनी सांस्कृतिक पहचान भी नहीं भूलेगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">आज अनेक गाँव शहरों के विस्तार में समाहित होकर अपनी पहचान खो चुके हैं। वहाँ अब खेतों की जगह कॉलोनियाँ हैं, बैलगाड़ियों की जगह वाहनों की भीड़ है, और लोकगीतों की जगह शोरगुल ने ले ली है। आधुनिकता का विरोध नहीं किया जा सकता, लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना भी नहीं होना चाहिए। अंततः यह समझना होगा कि शहर किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति हो सकते हैं, लेकिन गाँव उसकी सांस्कृतिक चेतना हैं। यदि आर्थिक विकास की दौड़ में ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आधुनिक तो होंगी, किंतु अपनी पहचान से अनभिज्ञ रह जाएँगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">इसलिए आवश्यक है कि विकास की प्रत्येक योजना में ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। शहरों का विस्तार हो, पर गाँवों की आत्मा सुरक्षित रहे। यही संतुलित विकास भारत को आर्थिक रूप से समृद्ध, सांस्कृतिक रूप से सशक्त और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण राष्ट्र बनाएगा। आखिरकार, जिस देश के गाँव जीवित रहते हैं, वही देश अपनी सभ्यता को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाता है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 21:56:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कछुए की तरह रेंग रहा है राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का सपना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय शिक्षा नीति (</span>NEP) 2020<span lang="hi" xml:lang="hi">  को लागू हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान </span>5+3+3+4<span lang="hi" xml:lang="hi">  की नई संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहु-विषयी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक प्रशिक्षण और निरंतर मूल्यांकन जैसे सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधारभूत चुनौतियाँ—शिक्षक कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और धनराशि की कमी—अभी भी शिक्षा व्यवस्था को जकड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति का वास्तविक रूपांतरण अभी भी दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi">  का मूल उद्देश्य रट्टा-आधारित शिक्षा को समाप्त कर</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177673/the-dream-of-national-education-policy-2020-is-crawling-like"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-29-at-10.07.24.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय शिक्षा नीति (</span>NEP) 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> को लागू हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान </span>5+3+3+4<span lang="hi" xml:lang="hi"> की नई संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहु-विषयी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक प्रशिक्षण और निरंतर मूल्यांकन जैसे सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधारभूत चुनौतियाँ—शिक्षक कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और धनराशि की कमी—अभी भी शिक्षा व्यवस्था को जकड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति का वास्तविक रूपांतरण अभी भी दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> का मूल उद्देश्य रट्टा-आधारित शिक्षा को समाप्त कर कौशल-उन्मुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लचीली और समावेशी शिक्षा प्रणाली विकसित करना था। नीति में सार्वजनिक शिक्षा पर जीडीपी का </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत व्यय करने का लक्ष्य रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक यह आंकड़ा अभी भी लगभग </span>2.9-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत के आसपास ही है। इससे बुनियादी ढांचा विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक क्षमता निर्माण और डिजिटल विस्तार प्रभावित हो रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देशभर में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। संसद में प्रस्तुत आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राथमिक स्तर पर लाखों पद खाली हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर रिक्तियां और बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में यह समस्या और गंभीर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षक-छात्र अनुपात प्रभावित हो रहा है। कई शिक्षक अनुबंधित या अपर्याप्त प्रशिक्षित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">की नई शिक्षण पद्धतियों—अनुभव-आधारित सीखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्या-समाधान का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक है। ग्रामीण स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोगशालाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तकालय और स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी डिजिटल डिवाइड को बढ़ा रही है। </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">में बहु-भाषी शिक्षा और मातृभाषा में शिक्षण पर जोर दिया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पाठ्यपुस्तकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षित शिक्षकों और क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखते हुए मानकीकरण की चुनौती बनी हुई है। कई राज्यों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर दक्षिण भारत में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन-भाषा फॉर्मूला और कुछ प्रावधानों पर विरोध या आंशिक स्वीकार्यता देखी जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा में भी चुनौतियाँ समान हैं। लचीले प्रवेश-निकास विकल्प </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रेडिट बैंक और बहु-विषयी पाठ्यक्रमों को लागू करने में संसाधनों और शिक्षक प्रशिक्षण की कमी बाधक बन रही है। डिजिटल कनेक्टिविटी और उपकरणों की उपलब्धता ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक नहीं पहुंच पा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित होते हैं</span>, NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> को चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है। </span>2026-27<span lang="hi" xml:lang="hi"> के बजट में शिक्षा क्षेत्र को महत्वपूर्ण बढ़ोतरी दी गई है—बुनियादी शिक्षा के लिए </span>77,622<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माध्यमिक शिक्षा के लिए </span>22,167<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये (</span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत वृद्धि) और उच्च शिक्षा के लिए </span>6,591<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। व्यावसायिक शिक्षा पर फोकस बढ़ाते हुए </span>UP <span lang="hi" xml:lang="hi">बोर्ड ने </span>2026-27<span lang="hi" xml:lang="hi"> सत्र से कक्षा </span>9<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> में व्यावसायिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्किल डेवलपमेंट लक्ष्य से मेल खाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाल ही में लखनऊ में आयोजित एजुकेशन कॉन्क्लेव </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योगी मॉडल</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरसी (</span>FLN), <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन</span>, AI <span lang="hi" xml:lang="hi">और एडटेक के उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरंतर मूल्यांकन और शिक्षक सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। राज्य सरकार स्मार्ट स्कूलों का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल और अभ्युदय कोचिंग जैसी पहलों पर काम कर रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी</span>, UP <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी शिक्षक रिक्तियां (लगभग </span>1.93<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से अधिक)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल मर्जर की प्रक्रिया और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी चर्चा में रहती है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में नामांकन अभी कम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दर्शाता है कि जागरूकता और बुनियादी ढांचे पर और काम की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">के छठे वर्ष में हम एक मोड़ पर खड़े हैं। जहां नीति की दिशा सही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं क्रियान्वयन की गति और गुणवत्ता बढ़ाना अनिवार्य है। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होगा। सरकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षाविदों और समाज को मिलकर इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा क्रांति</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को वास्तविकता बनाने की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा राष्ट्र का भविष्य है। नई शिक्षा नीति </span>2020 <span lang="hi" xml:lang="hi">को मात्र नीति-पत्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जन-आंदोलन बनाना होगा। बजट बढ़ोतरी और राज्य-स्तरीय पहलें सराहनीय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव तभी दिखेगा जब हर स्कूल में योग्य शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित बुनियादी ढांचा और छात्र-केंद्रित वातावरण उपलब्ध होगा। समय अब प्रतीक्षा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:22:04 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बिथरी चैनपुर में हमारा आंगन–हमारे बच्चे उत्सव का में छात्र -छात्राओं ने प्रस्तुत किए मनोहारी कार्यक्रम </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बरेली/रिठौरा।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं निपुण भारत मिशन के अंतर्गत ब्लॉक संसाधन केन्द्र बिथरी चैनपुर में हमारा आंगन हमारे बच्चे उत्सव का आयोजन शुक्रवार को किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी विजय कुमार ने मां सरस्वती के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्य अतिथि  कुमार ने बताया उत्सव का मुख्य उद्देश्य प्रारंभिक शिक्षा को सुदृढ़ बनाना, बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा अभिभावकों एवं समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करना है। कार्यक्रम के माध्यम से निपुण भारत मिशन के लक्ष्यों, बच्चों की बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक दक्षता एफ एल एन के महत्व तथा विद्यालय,समुदाय</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171784/students-presented-beautiful-programs-at-hamara-aangan-%E2%80%93-hamara-bachche"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/2.--------अ.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बरेली/रिठौरा।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं निपुण भारत मिशन के अंतर्गत ब्लॉक संसाधन केन्द्र बिथरी चैनपुर में हमारा आंगन हमारे बच्चे उत्सव का आयोजन शुक्रवार को किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी विजय कुमार ने मां सरस्वती के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्य अतिथि  कुमार ने बताया उत्सव का मुख्य उद्देश्य प्रारंभिक शिक्षा को सुदृढ़ बनाना, बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा अभिभावकों एवं समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करना है। कार्यक्रम के माध्यम से निपुण भारत मिशन के लक्ष्यों, बच्चों की बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक दक्षता एफ एल एन के महत्व तथा विद्यालय,समुदाय समन्वय पर विशेष प्रकाश डाला  कार्यक्रम में शिक्षकों, अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों एवं शिक्षकों ने सहभागिता की। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों, प्रदर्शनी एवं बच्चों की प्रस्तुतियों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में नवाचारों को प्रदर्शित किया ,बल वाटिका छात्र की शिक्षा में नींव की तरह कार्य करती है जो आने वाले समय में छात्र के भविष्य निर्माण में सहायक बनती है।इस मौके पर एआरपी सौरभ शुक्ला,पवन मिश्रा ,राम मोहन तिवारी , कृष्ण अवतार सक्सेना, राजीव लोचन, डॉ शिखा अग्रवाल, सौरभ सहाय, कुसुमलता सहित तमाम स्टाफ मौजूद रहा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 21:03:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>भाषा सामाजिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया एवं माध्यम है- प्रो. सलूजा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद भगत सिंह सांध्य महाविद्यालय तथा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार : एकत्व का प्रारूप” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारम्भ हुआ। इस अवसर पर देशभर के शिक्षाविद, विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं भाषा विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता के रूप में समकृत प्रमोशन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. चाँद किरण सलूजा उपस्थित रहे। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अपने बीज वक्तव्य में उन्होंने कहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के बौद्धिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171717/language-is-the-process-and-medium-of-social-empowerment-%E2%80%93"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/img-20260226-wa0007.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद भगत सिंह सांध्य महाविद्यालय तथा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार : एकत्व का प्रारूप” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारम्भ हुआ। इस अवसर पर देशभर के शिक्षाविद, विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं भाषा विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता के रूप में समकृत प्रमोशन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. चाँद किरण सलूजा उपस्थित रहे। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अपने बीज वक्तव्य में उन्होंने कहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक निर्माण का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शब्द नहीं, बल्कि वाक्य अर्थ का निर्माण करता है। प्रो. सलूजा ने संप्रेषण की सूक्ष्मताओं तथा दैनिक जीवन में भाषा के उपेक्षित आयामों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं को दिए गए महत्व को और अधिक सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। संस्कृत भाषा पर उनकी गहन पकड़ ने श्रोताओं को भाषायी चेतना के व्यापक आयामों से परिचित कराया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष चामु कृष्ण शास्त्री ने भाषायी विविधता एवं राष्ट्रीय एकता के समन्वय को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताते हुए सामाजिक सौहार्द एवं भ्रातृत्व की भावना को सुदृढ़ करने का आह्वान किया। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अरुण कुमार अत्री ने अपने स्वागतीय उद्बोधन में भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन का संवैधानिक आधार प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि भाषाओं का उपयोग समाज को विभाजित करने के राजनीतिक साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. प्रशांत उपाध्याय ने भाषाओं को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उद्घाटन सत्र का समापन संगोष्ठी के संयोजक प्रो. वी. एस. नेगी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषाओं की एकात्मता, सांस्कृतिक समृद्धि तथा भाषायी सशक्तिकरण के क्षेत्र में सार्थक संवाद को निरंतर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में शिक्षक एवं छात्र उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 19:25:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बड़ी पुरानी है ड्रेस कोड की सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश के शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड की सियासत बहुत पुरानी है। मध्यप्रदेश में डॉ मोहन यादव की सरकार ने भी एक बार फिर से ड्रेस कोड का राग अलापना शुरू कर दिया है। मुमकिन है कि मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों में आने वाले दिनों में  रंग-बिरंगी यूनिफार्म पहने छात्र-छात्राएं नहीं दिखाई दें और न ही कोई हिजाब या पगड़ी पहनकर कालेज आ सकेगा। सभी कालेजों में एकरूपता लाने के उद्देश्य से सरकार ड्रेसकोड लागू करने पर विचार कर रही है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देकर उच्चशिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने उच्चशिक्षा विभाग  को पत्र लिखकर निर्देश दिया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/143101/the-politics-of-dress-code-is-very-old"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-07/sdfgg.jpg" alt=""></a><br /><p>देश के शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड की सियासत बहुत पुरानी है। मध्यप्रदेश में डॉ मोहन यादव की सरकार ने भी एक बार फिर से ड्रेस कोड का राग अलापना शुरू कर दिया है। मुमकिन है कि मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों में आने वाले दिनों में  रंग-बिरंगी यूनिफार्म पहने छात्र-छात्राएं नहीं दिखाई दें और न ही कोई हिजाब या पगड़ी पहनकर कालेज आ सकेगा। सभी कालेजों में एकरूपता लाने के उद्देश्य से सरकार ड्रेसकोड लागू करने पर विचार कर रही है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देकर उच्चशिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने उच्चशिक्षा विभाग  को पत्र लिखकर निर्देश दिया है कि प्रधानमंत्री उत्कृष्टता महाविद्यालय एवं अन्य महाविद्यालयों में ड्रेसकोड लागू करने की नीति और प्रस्ताव प्रस्तुत करें।</p>
<p>ड्रेस कोड केवल शिक्षण संस्थाओं में ही नहीं बल्कि तमाम सैन्य और अर्ध सैन्य संगठनों ,में भी प्रमुखता से लागू होता है। अब तो समाजिक ही नहीं धार्मिक  संगठनों तक ने अपने-अपने ड्रेस कोड बना रखे हैं। हमारे यहां प्राचीन गुरुकुलों में भी ड्रेस कोड लागू था। लेकिन आधुनिक संसार में ड्रेस कोड अंग्रेजों की देन है। शैक्षणिक संगठनों  में ड्रेस कोड की प्रथा इंग्लैंड में 16वीं शताब्दी से शुरू हुई थी. तब छात्रों को एक ड्रेस कोड दिया जाता था . जिसमें एक लंबा नीला कोट और पीला ट्राउजर और घुटने तक ऊंचे मोजे होते थे. वहां के चैरिटी स्कूलों में जहां अक्सर गरीब बच्चों के लिए यूनिफॉर्म स्कूल से दी जाती थी. स्कूल यूनिफॉर्म पहनने की प्रथा को कई अन्य देशों ने भी अपनाया हैं. ठीक इसी तरह भारत में भी बेसिक स्कूलों में एक ड्रेस कोड लागू किया गया. जो वर्ष 1852 में प्रभावी तौर पर उत्तर प्रदेश के 5 जिलों में लागू हुआ था।  </p>
<p>ड्रेस कोड को लेकर जब राजनीति होती है तब समस्याएं खड़ी होतीं है।  ड्रेस कोड में हिन्दू- मुसलमान होने लगता है तब और ज्यादा समस्या होती है। ड्रेस कोड सरकारों का नहीं बल्कि शैक्षणिक संस्थानों का विषय होना चाहिए ,लेकिन देश में जब से साम्प्रदायिकता की राजनीति शुरू हुई है तभी से ड्रेस कोड विवादास्पद हो गया है।  ड्रेस कोड लागू करने के पीछे धर्म विशेष के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की मंशा सबसे बड़ी समस्या है।  मध्यप्रदेश सरकार के निर्णय के पीछे भी इसी तरह की मानसिकता की आहट सुनाई देती है।</p>
<p>दरअसल देश के शैक्षणिक संस्थानों को ड्रेस कोड से ज्यादा जरूरत शैक्षणिक वातावरण में सुधर लाने की है ,लेकिन इस दिशा में कोई,कुछ करने  को तैयार नहीं है ।  मध्य्प्रदेश तो उन राज्यों में से है जहाँ शैक्षणिक संस्थानों का वातावरण सबसे ज्यादा दूषित है।  मध्य्प्रदेश में तो शैक्षिणक संस्थानों में शिक्षकों की हत्याएं तक हो चुकी हैं और आज के सत्तारूढ़ दल के प्रमुख ऐसे मामलों में आरोपी भी रह चुके हैं ,ये बात अलग है कि  उन्हें बाद में अदालत ने बड़ी कर दिया। मै प्रोफेसर सबरबाल हत्याकांड की बात कर रहा हूँ। 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज के प्रोफेसर सब्बरवाल से छात्रसंघ चुनावों के दौरान कुछ लोगों ने मारपीट की थी, जिसके बाद उनकी की मौत हो गई थी। इस मामले में एबीवीपी के शशिरंजन अकेला प्रमुख आरोपी थे।</p>
<p>ड्र्रेस कोड वैसे कोई बुरी बात नहीं है। ,लेकिन इसे जबरन थोपना बहुत बुरी बात है।  ड्रेस कोड में उतनी शिथिलता दी जाना चाइये जितनी कि  सेना में मिलती है।  सेना में भारत में ही नहीं बल्कि इंग्लैंड,अमेरिका और कनाडा में भी इस बात की रियायत है कि  लोग अपनी धार्मिक पहचान रखते हुए ड्रेस कोड का पालन करें।  पुलिस में भी ये छूट है ,फिर शैक्षणिक संस्थानों में ये छूट देने में सियासत क्यों की जाती है ?,ये समझ से परे हैं। पिछले वर्षों में ड्रेस कोड को लेकर आपको कर्नाटक के दृश्य याद होंगे जहाँ कुछ हिन्दू संगठनों ने हिजाब पहनकर कालेज जाने वाली लड़कियों के साथ कितनी बदसलूकी की थी ? आप मुसलमानों के हिजाब  ,सिखों की पगड़ी के रंग को ड्रेस कोड में शामिल कर सकते हैं लेकिन उन्हें प्रतिबंधित नहीं कर सकते। लेकिन मध्यप्रदेश में एक बार फिर कर्नाटक में हुई गलती का अनुशरण किया जा रहा है ,ये दुर्भाग्यपूर्ण है।</p>
<p>भाजपा संगठन और भाजपा की सिंगल और डबल इंजिन सरकारों की ये कमजोरी है कि  वे  हर क्षेत्र का भगवाकरण करना चाहतीं है।  रेलों का रंग वे बदल चुके है।  खिलाडियों की जर्सी में भगवा कहें या केसरिया रंग शामिल किया जा चुका है। और तो और सरकारी साइन बोर्डों और सरकारी विज्ञापनों का रंग भी भगवा किया जा चुका है। भगवा रंग हो या केसरिया रंग बुरा नहीं है किन्तु जिस मानसिकता से से इन रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है वो घातक है। भाजपा को हरे रंग से चिढ है क्योंकि ये रंग मुस्लिमों को प्रिय है। मजे की बात ये है कि  हरियाली के प्रतीक इस हरे रंग को भाजपा ने अपने झंडे में शामिल किया हुआ है। रंगों को साम्प्रदायिकता से मुक्त रखने की जरूरत है और ड्रेस कोड को भी।</p>
<p>मप्र में भवन विहीन स्कूलों की संख्या सबसे ज्यादा है। प्रदेश में करीब 1 लाख 20 हजार सरकारी स्कूल हैं। मूलभूत सुविधाओं में मप्र के स्कूल 17वें स्थान पर मध्य प्रदेश के 67 हजार प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में बिजली कनेक्शन तो 50 हजार में चारदीवारी नहीं है। 1900 स्कूलों का अपना भवन ही नहीं है। करीब 6 हजार स्कूल एक-दो कमरों में चल रहे हैं। इसका खुलासा मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फरवरी में एक परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स में किया था। इसमें मप्र के स्कूलों को ग्रेड-2 में रखा गया था और मूलभूत सुविधाओं में देश में 17वें स्थान पर था। गोवा पहले, चंडीगढ़ दूसरे और दिल्ली तीसरे स्थान पर था।लेकिन जोर दिया जा रहा है ड्रेस कोड पर।</p>
<p>मध्य्प्रदेश में शैक्षणिक संस्थानों में ड्रेस कोड लागू करने से ज्यादा जरूरी भवन विहीन शैक्षणिक संस्थानों को भवन,स्टाफ उपलब्ध करना है। सरकार इस दिशा में पहल करे तो उसका खुले दिल से स्वागत किया जाएगा ,लेकिन सरकार को स्वागतयोग्य कोई काम करना ही नहीं है।  सरकार का खुला एजेंडा साम्प्रदायिकता के आधार पर निर्णय करना है।  मप्र में भी उत्तर प्रदेश की नकल की जा रही है ।  मप्र ने ऊपर से बुलडोजर संस्कृति सीखी ।  मदरसों पर हमला करना ,उन्हें बंद करना या उनमें घुसपैठ करना भी उत्तर प्रदेश से सीखा है। जबकि मप्र को कुछ  ऐसी पहल करना चाहिए कि  दूसरे सूबे  मध्यप्रदेश की नकल करें। मप्र के मुख्यमंत्री पढ़े -लिखे हैं। पीएचडी उपाधि धारक हैं। वे दूसरे मुख्यमंत्रियों की तरह बाबा नहीं हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि  वे कुछ ऐसा करेंगे जो मप्र में उमा भारती,बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह नहीं कर पाए।</p>
<p>ड्रेस कोड के मुद्दे पर मै अल्पसंख्यक नेताओं से ही कहना चाहूंगा कि  वे सरकार के इस निर्णय पर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर न लगाएं। कोशिश करें की ड्रेस कोड लागू करने में कोई अड़चन  न हो। बीच का रास्ता निकल जाए ताकि शैक्षणिक संस्थानों का वातावरण न बिगड़े। प्रदेश सरकार को भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। ड्रेस कोड में यदि अल्पसंख्यक मुस्लिम,सिख या कोई दूसरा समाज यदि कोई रियायत  चाहता है तो उसे देना चाहिए। मैंने सेना और पुलिस का उदाहरण दिया है। ड्रेस कोड कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जो की विकास से जुड़ा है ।  बच्चे यदि ड्रेस कोड में नहीं जायेंगे तो उनके पढ़ने-पढ़ने पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। बेहतर हो कि  प्रदेश सरकार आरएसएस की ड्रेस का रंग और रूप शैक्षणिक संस्थानों  पर लागू कर दे। लेकिन इसमें भी हिजाब और पगड़ी को तो शामिल करना ही चाहिए। बाकी सरकार समर्थ होती है। कुछ भी कर सकती है।</p>
<p><strong>राकेश अचल  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jul 2024 17:32:27 +0530</pubDate>
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