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                <title>monsoon rain - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>monsoon rain RSS Feed</description>
                
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                <title>मॉनसून का करिश्माई रूप और कुदरत की विराट शक्ति के सामने इंसान की सीमाएं तथा असम की बाढ़ से मिला प्रकृति का बड़ा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182342/the-charismatic-form-of-monsoon-and-the-limitations-of-humans"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas26.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम और अरुणाचल प्रदेश में बारिश ने विकराल रूप धारण कर लिया। देखते ही देखते नदियां उफान पर आ गईं और हजारों परिवार बाढ़ की चपेट में आ गए। यह दृश्य केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि यह संदेश भी है कि प्रकृति के अपने नियम हैं और उसके सामने मनुष्य की शक्ति सीमित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम के अनेक जिलों में हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। सैकड़ों गांव पानी में घिर गए हैं। खेतों में खड़ी फसलें डूब गई हैं। पशुधन भी संकट में है। रेल संपर्क बाधित हो गया है और लोगों का सामान्य जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। यह केवल असम की समस्या नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं। कभी पहाड़ों में बादल फटते हैं तो कभी मैदानों में नदियां उफान पर आ जाती हैं। कहीं समुद्र तूफान लेकर आता है तो कहीं सूखा लोगों की जिंदगी कठिन बना देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अरुणाचल प्रदेश में लगातार हो रही वर्षा ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है। पहाड़ों से उतरने वाला पानी असम की नदियों में पहुंचा और बाढ़ का स्वरूप और भी भयावह हो गया। यह प्रकृति का वही चक्र है जिसे मनुष्य पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। विज्ञान ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन आज भी बादलों को आदेश नहीं दिया जा सकता कि वे कहां बरसें और कितनी देर तक बरसें। यही कारण है कि कुदरत के सामने हर व्यक्ति समान रूप से असहाय दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मॉनसून भारत की जीवनरेखा माना जाता है। देश की कृषि का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा पर निर्भर है। अच्छी बारिश होती है तो खेतों में हरियाली छा जाती है और किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। लेकिन यही बारिश जब सीमा से अधिक हो जाती है तब वही जीवनदायिनी जलधारा विनाश का कारण बन जाती है। इस बार भी यही देखने को मिला। जहां देश के कई हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे वहीं असम में इतनी अधिक वर्षा हुई कि लोगों के घर और खेत पानी में डूब गए। प्रकृति का यही विरोधाभास उसे रहस्यमयी और करिश्माई बनाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">देश के अनेक किसान इस समय कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। कहीं बारिश नहीं होने से बुवाई प्रभावित हुई है तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने तैयारियां बिगाड़ दी हैं। खेती पूरी तरह मौसम पर आधारित है और मौसम का मिजाज हर वर्ष बदलता रहता है। किसान मेहनत करता है लेकिन अंतिम निर्णय प्रकृति के हाथ में होता है। यही कारण है कि भारतीय किसान सदियों से धरती और आकाश दोनों को समान श्रद्धा से देखता आया है। उसे पता है कि मेहनत उसकी है लेकिन सफलता का आशीर्वाद प्रकृति देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस वर्ष अधिक मास के कारण लोगों के बीच यह चर्चा भी रही कि मॉनसून देर से आया। चाहे इसके धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भ अलग हों लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से मॉनसून का आगमन समुद्री हवाओं तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फिर भी भारतीय समाज में प्रकृति और आस्था का गहरा संबंध रहा है। लोग वर्षा को केवल मौसम नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा भी मानते हैं। जब समय पर बारिश होती है तो खुशियां आती हैं और जब अत्यधिक या कम वर्षा होती है तो चिंता बढ़ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ ने यह भी सिखाया है कि प्राकृतिक आपदाओं से मुकाबला केवल सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से भी संभव है। राहत और बचाव कार्य तेजी से चलना चाहिए। प्रभावित परिवारों तक भोजन दवाइयां और सुरक्षित आश्रय पहुंचाना सबसे पहली जिम्मेदारी है। बच्चों महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। जिन किसानों की फसलें और पशुधन प्रभावित हुए हैं उन्हें आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए ताकि वे दोबारा अपने जीवन को संभाल सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा राज्य सरकार से लगातार संपर्क बनाए रखना और राहत कार्यों की समीक्षा करना सकारात्मक पहल है। ऐसे समय में राजनीति से ऊपर उठकर केवल मानवता को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्राकृतिक आपदा किसी दल या क्षेत्र को देखकर नहीं आती। उसका सामना पूरे समाज को मिलकर करना पड़ता है। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत भी है कि संकट की घड़ी में लोग एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि भविष्य के लिए बेहतर तैयारी करने की भी है। नदियों के किनारे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जल निकासी की प्रभावी योजना समय पर चेतावनी प्रणाली और पर्यावरण संरक्षण जैसे उपाय भविष्य में नुकसान कम कर सकते हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन ने भी कई क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ाया है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलेगा तो आपदाओं की तीव्रता को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कुदरत का अपना अद्भुत स्वभाव है। वही धरती को हरियाली देती है वही नदियों को जीवन देती है वही अन्न उपजाती है और वही कभी कभी अपनी अपार शक्ति का परिचय भी देती है। मनुष्य ने ऊंची इमारतें बना लीं आधुनिक तकनीक विकसित कर ली और अंतरिक्ष तक पहुंच गया लेकिन बादलों की चाल और नदियों के वेग के सामने आज भी उसकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। यही प्रकृति का सबसे बड़ा करिश्मा है कि वह जीवन भी देती है और समय आने पर विनम्रता का पाठ भी पढ़ाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ केवल एक समाचार नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी और सीख है। हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा उसके संतुलन को बनाए रखना होगा और आपदाओं से निपटने की तैयारी को मजबूत करना होगा। बारिश जीवन का उत्सव भी है और जिम्मेदारी की परीक्षा भी। जब तक संतुलन बना रहता है तब तक वर्षा अमृत बनकर बरसती है लेकिन जब संतुलन बिगड़ता है तब वही जल प्रलय का रूप ले लेता है। इसलिए आवश्यक है कि हम प्रकृति को जीतने का नहीं बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का प्रयास करें क्योंकि कुदरत के विराट स्वरूप के सामने अंततः हर मनुष्य विनम्र और लाचार ही दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>          *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 16:09:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विगत 2 दिनों से हो रही मानसूनी वर्षा से प्रखण्ड के कृषकों में दिखा हर्ष </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़/झारखण्ड:- </strong>पिछले दो दिनों से रूक-रूककर होती रही रिमझिम वर्षा से प्रखण्ड के किसान हर्षित दिख रहे हैं। फिलहाल बारिश से खेतों में जहां पानी है वहां कृषक खेती में लग चुके हैं। किसानों ने बताया कि बारिश से रोपे गये धान के पौधों को लाभ तो होगा ही साथ ही खेती का काम भी होगा। हालांकि प्रखण्ड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं अधिक बारिश होने की सूचना है।</div>
<div>  </div>
<div>बहरहाल इन दिनों धान के बीज तैयार हो चुके हैं और वर्षा भी हुई है जिससे धान रोपनी में तेजी आने की सम्भावना है। किसानों का मानना है कि अभी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/143810/there-was-joy-among-the-farmers-of-the-block-due"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-08/news-2.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़/झारखण्ड:- </strong>पिछले दो दिनों से रूक-रूककर होती रही रिमझिम वर्षा से प्रखण्ड के किसान हर्षित दिख रहे हैं। फिलहाल बारिश से खेतों में जहां पानी है वहां कृषक खेती में लग चुके हैं। किसानों ने बताया कि बारिश से रोपे गये धान के पौधों को लाभ तो होगा ही साथ ही खेती का काम भी होगा। हालांकि प्रखण्ड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं अधिक बारिश होने की सूचना है।</div>
<div> </div>
<div>बहरहाल इन दिनों धान के बीज तैयार हो चुके हैं और वर्षा भी हुई है जिससे धान रोपनी में तेजी आने की सम्भावना है। किसानों का मानना है कि अभी बरसात का मौसम है और पानी पड़ने की सम्भावना है जिससे धान रोपनी होने की आशा है। यदि वर्षा समय पर होती रही तो धान रोपनी के बाद जोरिया, तालाब, नदी व सिंचाई कूपों में जल स्टोर होगा जिससे रब्बी फसलों व विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती होगी। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>किसान</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 04 Aug 2024 16:45:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकुड़िया में मानसूनी वर्षा के बिना कृषि कार्य बाधित</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़,/झारखण्ड:- </strong>बीते दस एवम ग्यारह जुलाई की संध्या को हुई 48.8 एमएम वर्षा पात होने के बाद 16 तक झमाझम मानसूनी बारिश नहीं होने से पाकुड़िया प्रखण्ड के कृषकों में गहरी चिन्ता दिख रही है।प्रखण्ड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही जानकारियों के मुताबिक कहीं खेतों में पानी है तो बीज नहीं और यदि कहीं बीज तैयार है तो जल के बिना रोपनी नहीं हो पा रही है। एक ओर देश के विभिन्न प्रदेशों में भारी बारिश से जल जमाव तथा बाढ़ से लोगों की जान-माल की क्षति हो रही है जबकि पाकुड़ जिला के पाकुड़िया प्रखण्ड में,रिमझिम वर्षा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/143286/agricultural-work-disrupted-without-monsoon-rain-in-pakuria"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-07/news-2-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़,/झारखण्ड:- </strong>बीते दस एवम ग्यारह जुलाई की संध्या को हुई 48.8 एमएम वर्षा पात होने के बाद 16 तक झमाझम मानसूनी बारिश नहीं होने से पाकुड़िया प्रखण्ड के कृषकों में गहरी चिन्ता दिख रही है।प्रखण्ड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही जानकारियों के मुताबिक कहीं खेतों में पानी है तो बीज नहीं और यदि कहीं बीज तैयार है तो जल के बिना रोपनी नहीं हो पा रही है। एक ओर देश के विभिन्न प्रदेशों में भारी बारिश से जल जमाव तथा बाढ़ से लोगों की जान-माल की क्षति हो रही है जबकि पाकुड़ जिला के पाकुड़िया प्रखण्ड में,रिमझिम वर्षा नहीं होने से खेती नहीं होने से किसानों की चिन्ता बढ़ने लगी है।</div>
<div> </div>
<div>खेती के विषय में पूछने पर किसानों का कहना कि फिलहाल खेती के अनुकूल वर्षा नहीं होने से बड़े पैमाने पर ‌धान रोपनी नहीं हो पा रही है। यदि बड़े पैमाने पर बारिश होगी तो धान रोपनी होगी पर फसल कम होने की सम्भावना है। किसानों का मानना है कि पाकुड़िया प्रखण्ड में अगस्त महीने तक रोपनी की जाती है। हालांकि आसमान पर काले सफेद बादल छाये रहने के बावजूद वर्षा भारी मात्रा में नहीं होना कृषकों को चकित करता रहा है।पाकुड़िया में 22 मई से 11 जुलाई तक हल्के स्तर पर कुल 206.4 मिली मीटर ही वर्षा हुई है।यद्यपि किसानों को आशा है वर्षा का समय है और वर्षा होगी और धान रोपनी भी भले देर से ही सही। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>किसान</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jul 2024 16:18:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मानसूनी वर्षा के अभाव में फिलहाल कृषि कार्य बाधित </title>
                                    <description><![CDATA[3 जुलाई की सर्वाधिक 31. 4 मिली-मीटर हुई बारिश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/143087/agricultural-work-currently-disrupted-due-to-lack-of-monsoon-rains%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-07/news-12.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पाकुड़िया/पाकुड़/झारखण्ड:- </strong>कहा जाता है भारत के मेहनती एवम ईमानदार कृषकों की खेती की निर्भरता मानसूनी वर्षा पर है। यद्यपि देश के विभिन्न राज्यों में कृषि के लिए सिंचाई के अलग-अलग स्थाई श्रोत हैं, तथापि देश के बड़े भू-भाग अब भी सिंचाई की सुविधा से वंचित है और उन्हें वर्षा पर आश्रित रहना पड़ता है। विगत दिनों देश के अनेक राज्यों में मानसूनी बारिश के प्रकोप से बाढ़ से बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हो रही है।जबकि झारखण्ड राज्य के पाकुड़ जिला के पाकुड़िया प्रखण्ड में मौसमी बारिश के बिना कृषि कार्य पूर्णतः बाधित है।</div>
<div> </div>
<div>यदि एक नजर पाकुड़िया में वर्षापात पर डाली जाय तो विदित होगा कि 22 मई से 8 जुलाई तक 160.4 एमएम वर्षा हुई है जबकि तीन जुलाई को 31.4 मिली-मीटर सर्वाधिक बारिश हुई है। प्रखण्ड के किसानों को नीले आसमान और तेज धूप के बीच तैर रहे बादलों के समूह को आशा भरी दृष्टि से देख ये लगता है कि बादल बरसने वाले हैं, लेकिन किसानों के चेहरे पर उभर रही चिन्ता की रेखाओं से उन्हें कतई फर्क नहीं पड़ता दिख रहा है। हालांकि किसानों का मानना है कि आषाढ़ माह समापन की ओर है यदि अब भी मुसलधार वर्षा होगी तो धान रोपनी की जा सकेगी।</div>
<div> </div>
<div>8 जुलाई के बाद पाकुड़िया में 10 की संध्या के 4 बजे 28.4 मिली मीटर वर्षा हुई है। यद्यपि किसानों का मानना है कि निचली भूमि में जल है वहीं धान के बीज फिलहाल नहीं बढ़ने से रोपनी नहीं हो पायेगी। प्रखण्ड के प्रसिद्ध कृषक एवम पूर्व शिक्षक अमरेन्द्र घोष उर्फ़ सट्टू घोष ने वर्षा व धान रोपनी के सम्बन्ध में मंगलवार को पूछने पर कहा कि बुधवार को बारिश होने से बीज को लाभ होगा। लेकिन धान रोपनी के लिए तथा धान फसल के लिए और पानी की आवश्यकता है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि वर्षा की जरुरत है पर रोपनी में देर होने से धान की फसल कम होने की सम्भावना बनी रहती है।</div>
<div> </div>
<div>किसानों ने बताया कि फिलहाल खाली पड़ी अन्य भूमि पर अरहर, मकई आदि फसल लगाई जायेगी। यदि भारी बारिश होगी तो बीज तैयार होत ही धान की रोपनी में तेजी आयेगी। फिलहाल किसान आशान्वित हैं कि वर्षा होगी और धान की रोपनी भी की जायेगी। </div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 12 Jul 2024 16:12:54 +0530</pubDate>
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