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                <title>suprim court - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>तस्करों का देश नहीं है भारत—फिर बच्चे क्यों गायब हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[गरीबी से अस्पताल तक: बाल तस्करी का फैलता नेटवर्क]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163906/india-is-not-a-country-of-smugglers-%E2%80%93-then-why"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">19 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी और बच्चों के वाणिज्यिक यौन शोषण को भारत की एक "गहराई से परेशान करने वाली वास्तविकता</span>" <span lang="hi" xml:lang="hi">बताते हुए कठोर टिप्पणी की। यह फैसला साफ संकेत देता है कि कड़े कानूनों के बावजूद ये अपराध इसलिए पनप रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संगठित और सुनियोजित कार्टेलों का हिस्सा हैं। अदालत ने पीड़ित बच्चों की गवाही को विश्वसनीय ढंग से परखने के लिए अहम दिशानिर्देश जारी किए—छोटी-मोटी असंगतियों के आधार पर बयान खारिज न करने और यौन शोषण की स्मृतियों को बार-बार कुरेदने से पैदा होने वाली द्वितीयक पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहने पर विशेष जोर दिया। यदि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर ईमानदारी से पालन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बाल तस्करी के खिलाफ संघर्ष को वास्तविक मजबूती मिल सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के </span>2023 <span lang="hi" xml:lang="hi">के आंकड़े इस संकट की भयावहता को और उजागर करते हैं। वर्ष </span>2023 <span lang="hi" xml:lang="hi">में बच्चों के खिलाफ अपराधों के </span>1,77,335 <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले दर्ज हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>2022 <span lang="hi" xml:lang="hi">की तुलना में </span>9.2% <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक हैं। इनमें अपहरण और तस्करी की घटनाएं सबसे आगे हैं। मानव तस्करी के कुल </span>2,183 <span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों में अधिकांश पीड़ित बच्चे ही हैं। हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और लाखों ऐसे हैं जो कभी वापस नहीं मिलते। कोविड-</span>19 <span lang="hi" xml:lang="hi">महामारी के बाद हालात और बिगड़े हैं—कुछ इलाकों में तस्करी के मामलों में </span>68% <span lang="hi" xml:lang="hi">तक की वृद्धि दर्ज हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई राज्यों में अपहरण के मामले दोगुने से भी अधिक हो गए। गरीबी और सीमाओं की निकटता तस्करों के लिए रास्ते आसान बनाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बच्चों के लिए खतरे कहीं अधिक गहरे हो जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस भयावह संकट के केंद्र में हैं। यहां अपहरण के हजारों मामले दर्ज होते हैं और कोविड के बाद बाल तस्करी में तेज उछाल देखा गया है। अप्रैल </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों से नवजात शिशुओं की तस्करी पर कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में संबंधित अस्पताल का लाइसेंस तत्काल निलंबित किया जाए। अदालत ने बाल तस्करी से जुड़े मुकदमों का निपटारा छह माह के भीतर करने का आदेश भी दिया। यह सख्ती इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जीवन के रक्षक होने चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब कई जगह तस्करी के संगठित अड्डों में बदलते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां मिलीभगत के संकेत भी सामने आते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अपराध की जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में धंसी हुई हैं। गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और अशिक्षा परिवारों को बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वहीं तस्कर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। दलित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चे सबसे अधिक खतरे में हैं। कानूनों का कमजोर और असंगत क्रियान्वयन तस्करों को संरक्षण देता है। तकनीक का दुरुपयोग बढ़ा है—ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों को बहकाया जाता है। अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेलवे स्टेशन और बस अड्डे कार्टेल के प्रमुख ठिकाने बन चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि राजनीतिक गठजोड़ और कानूनी पेचीदगियां जांच की राह में दीवार खड़ी करती हैं। केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि </span>2020 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अब तक हजारों बच्चे लापता हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें बड़ी संख्या तस्करी का शिकार है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में बाल तस्करी रोकने के लिए सशक्त कानूनी ढांचा मौजूद है। संविधान का अनुच्छेद </span>23 <span lang="hi" xml:lang="hi">मानव तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। भारतीय दंड संहिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम </span>1956, <span lang="hi" xml:lang="hi">पॉस्को एक्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल संरक्षण अधिनियम </span>2012 <span lang="hi" xml:lang="hi">और किशोर न्याय अधिनियम </span>2000 <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कानून इस अपराध से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसलों में पीड़ितों की गवाही के संवेदनशील मूल्यांकन के स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं। वर्ष </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में पॉस्को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों के निपटान में उल्लेखनीय सुधार दिखा—</span>87,754 <span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों का निस्तारण हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि </span>80,320 <span lang="hi" xml:lang="hi">नए मामले दर्ज हुए—फिर भी लंबित प्रकरण और कम दोषसिद्धि दर बड़ी चुनौती बने हुए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज पर इसका प्रभाव केवल गंभीर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी तरह विनाशकारी है। तस्करी के शिकार बच्चे शारीरिक यातनाओं और गहरे मानसिक आघात के साथ जीने को मजबूर होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके घाव समय के साथ अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा और असामाजिक व्यवहार की नई श्रृंखलाओं में बदल जाते हैं। यौन शोषण न केवल व्यक्तिगत जीवन को तोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट और सामाजिक असुरक्षा को भी जन्म देता है। वहीं बाल श्रम मानव संसाधन को कुंद कर अर्थव्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला करता है। जब लाखों बच्चे इस अंधे और निर्दय जाल में फंसे हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब किसी भी राष्ट्र की विकास-गति का रुक जाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका भटक जाना तय हो जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान के लिए एक सुसंगठित और बहुआयामी रणनीति अनिवार्य है। पुलिस बल को विशेष प्रशिक्षण के साथ एआई</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">आधारित ट्रैकिंग और विश्लेषण प्रणाली से लैस किया जाए। अस्पतालों में कड़ी निगरानी व्यवस्था को बाध्यकारी बनाया जाए। शिक्षा और व्यापक जन-जागरूकता अभियानों को तेज किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़ें। फास्ट-ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ाकर मामलों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाए। राज्यों में समर्पित नोडल अधिकारियों की नियुक्ति हो और लंबित प्रकरणों को विशेष इकाइयों के हवाले किया जाए। समाज की सतर्कता भी निर्णायक होगी—पड़ोसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक और जिम्मेदार नागरिक संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग में सक्रिय भागीदार बनें। तकनीक के सकारात्मक और रणनीतिक उपयोग से तस्करों के नेटवर्क को जड़ से तोड़ा जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्ती एक दोटूक चेतावनी है कि बाल तस्करी अब किसी भी रूप में सहन नहीं की जाएगी। पर वास्तविक और स्थायी बदलाव तभी आएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कानूनों का कठोर व निष्पक्ष क्रियान्वयन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन की संवेदनशील तत्परता और समाज की सक्रिय भागीदारी एक साथ कदम बढ़ाएं। हर लापता बच्चा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी और नैतिक परीक्षा है। यदि आज निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तस्करी के कार्टेल और अधिक संगठित व शक्तिशाली होते जाएंगे। इसलिए यह समय आधे उपायों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इस अंधेरे को जड़ से खत्म करने के दृढ़ संकल्प का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि हर बच्चे का बचपन सुरक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमामय और भय से मुक्त हो सके।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Dec 2025 18:32:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>दमघोंटू हवा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती- अब  नियमित सुनवाई से जुड़ेगी दिल्ली की सांसों की लड़ाई</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दिल्ली एनसीआर की हवा इन दिनों सिर्फ प्रदूषित नहीं, बल्कि जीवन पर सीधा आक्रमण करती हुई महसूस हो रही है। ऐसे विषाक्त माहौल में आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने कठोर रुख अपनाया है। अदालत ने यह साफ कर दिया कि प्रदूषण को लेकर औपचारिक लिस्टिंग या प्रतीकात्मक सुनवाई से काम नहीं चलने वाला। अब इस मामले में नियमित और लगातार सुनवाई होगी, ताकि समस्या की तह तक जाकर समाधान के रास्ते खोजे जा सकें। मगर अदालत का यह सख्त स्वर भी इस कड़वे सच को खारिज नहीं करता कि प्रदूषण किसी एक आदेश से खत्म होने वाला संकट नहीं है। जैसा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/162030/supreme-courts-strictness-on-suffocating-air-now-the-fight"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download-(2)8.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दिल्ली एनसीआर की हवा इन दिनों सिर्फ प्रदूषित नहीं, बल्कि जीवन पर सीधा आक्रमण करती हुई महसूस हो रही है। ऐसे विषाक्त माहौल में आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने कठोर रुख अपनाया है। अदालत ने यह साफ कर दिया कि प्रदूषण को लेकर औपचारिक लिस्टिंग या प्रतीकात्मक सुनवाई से काम नहीं चलने वाला। अब इस मामले में नियमित और लगातार सुनवाई होगी, ताकि समस्या की तह तक जाकर समाधान के रास्ते खोजे जा सकें। मगर अदालत का यह सख्त स्वर भी इस कड़वे सच को खारिज नहीं करता कि प्रदूषण किसी एक आदेश से खत्म होने वाला संकट नहीं है। जैसा कि सीजेआई ने कहा-कोई आदेश दें और अगले दिन साफ हवा मिल जाए, ऐसा नहीं हो सकता। इस टिप्पणी में पूरे संकट का सार छिपा है। समस्या सबको पता है, पर समाधान शासन, प्रशासन और वैज्ञानिकों के ठोस कदमों पर निर्भर है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली की हवा का हाल इस समय भयावह स्तर पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, गुरुवार को राजधानी का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 349 रहा। यह स्तर सीधे तौर पर ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। इसका अर्थ है कि हवा में मौजूद जहरीले कण शरीर के हर हिस्से पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। पिछले कुछ वर्षों में नवंबर, दिसंबर अब त्योहारों और सर्दियों की शुरुआत का मौसम नहीं रह गया, बल्कि प्रदूषण की चरम स्थिति का संकेत बन चुके हैं। इस बार भी हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोग घरों के भीतर कैद होने को मजबूर हो गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ताज़ा सर्वे बताते हैं कि लगभग 76 प्रतिशत लोग लगातार घरों में दुबके हुए हैं, क्योंकि बाहर निकला जाना अब स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ जैसा महसूस होता है। 80 प्रतिशत नागरिकों को लगातार खांसी, गले में जलन, थकान, सांस में भारीपन और आंखों में चुभन जैसी समस्याएँ हो रही हैं। इन दिक्कतों के कारण 69 प्रतिशत लोग कम से कम एक बार डॉक्टर के पास जा चुके हैं। यह स्थिति किसी अस्थायी परेशानी का संकेत नहीं बल्कि एक व्यापक स्वास्थ्य आपदा का चित्रण है ।एक ऐसी आपदा जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वास्थ्य आपातकाल कहकर संबोधित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे गंभीर पहलू यह है कि लोग दिल्ली को छोड़ने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। 80 प्रतिशत लोग मानते हैं कि अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही तो उन्हें शहर छोड़ना पड़ सकता है, और 37 प्रतिशत लोग तो राजधानी से बाहर प्रॉपर्टी तलाशना भी शुरू कर चुके हैं। महानगर की अर्थव्यवस्था, रोजगार बाजार और सामाजिक संरचना पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। देश की राजधानी अगर नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे पाए, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता है बल्कि भविष्य के शहरी भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी है।दिल्ली की खराब हवा केवल वयस्कों या बुजुर्गों के लिए ही हानिकारक नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों को जन्म से पहले ही अपने दुष्प्रभावों में घेर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार, विषैली हवा में लंबे समय तक रहने से नवजात शिशुओं में कई तरह की जन्मजात बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी इसका खतरनाक असर पड़ता  है।कम वजन वाले बच्चों का जन्म, समय से पहले डिलीवरी और फेफड़ों के विकास में बाधा जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। यह स्थिति उस स्तर की है जहां हवा सिर्फ एक पर्यावरणीय चुनौती नहीं रही, बल्कि यह मानव विकास और भविष्य की पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला संकट बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन हालातों में नागरिकों का यह मानना स्वाभाविक है कि सरकारें प्रदूषण के खिलाफ ‘राजनीतिक इच्छा शक्ति’ नहीं दिखा रहीं। कई लोगों की धारणा है कि यह संकट हर साल दोहराया जाता है, पर कार्रवाई का स्तर हमेशा सीमित और देरी से होता है। चाहे पराली जलाने का मामला हो, औद्योगिक धुआं, डीज़ल वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण स्थलों की धूल या शहरी कचरे का गलत प्रबंधन,हर तरफ कठोर और स्थायी नीति बनाने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार इसी निष्क्रियता पर गहरी टिप्पणी भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने साफ कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा साफ हो जाएगी। समाधान सरकारों, विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के पास है, जिन्हें दीर्घकालिक रणनीति बनाकर तुरंत अमल शुरू करना होगा। अदालत की नियमित सुनवाई भले ही इस मामले में जवाबदेही तय करने का एक महत्वपूर्ण मंच बने, पर असली लड़ाई जमीन पर ही लड़ी जाएगी।जहाँ कानूनों का सख्ती से पालन, उत्सर्जन पर वास्तविक नियंत्रण और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर निर्णायक कार्रवाई ही कारगर सिद्ध हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली की हवा को साफ करने की दिशा में अभी तक ज्यादातर उपाय अल्पकालिक दिखते रहे हैं।जैसे स्कूल बंद करना, वाहनों पर प्रतिबंध लगाना, निर्माण गतिविधियों को रोकना आदि। लेकिन ये कदम समस्या को केवल कुछ दिनों के लिए कम करते हैं, खत्म नहीं। दीर्घकालिक उपायों पर सरकारें धीमी दिखती हैं। विशेषज्ञ वर्षों से सुझाव दे रहे हैं कि दिल्ली-एनसीआर को एक साझा हवा प्रबंधन क्षेत्र की तरह चलाना होगा, जहाँ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली मिलकर नीतियाँ बनाएं और लागू करें। पराली प्रबंधन, शहरी नियोजन, सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण, हरित क्षेत्रों का विस्तार ये सभी कदम व्यापक और निरंतर प्रयास की मांग करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि नागरिकों का व्यवहार भी इस लड़ाई में बराबर की भूमिका निभाता है। निजी वाहनों में अनावश्यक यात्राएँ, पटाखों का अत्यधिक उपयोग, कचरे का खुले में जलना, पेड़-पौधों की उपेक्षा,ये सब व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे व्यवहार हैं जिन्हें बदलना समय की जरूरत है। हवा को साफ करना केवल सरकारों या अदालतों का दायित्व नहीं, बल्कि यह  2 करोड़ से अधिक लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी है। पर व्यक्तिगत प्रयास तभी प्रभावी होंगे जब सरकारें बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराएं और प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज अदालत का सख्त रुख दिल्ली वालों में उम्मीद जगाता है कि शायद अब इस समस्या को गंभीरता से लिया जाएगा। नियमित सुनवाई का मतलब है कि सरकारी एजेंसियों को अदालत के प्रश्नों का नियमित रूप से सामना करना पड़ेगा, और यह दबाव वास्तविक कार्रवाई में बदल सकता है। लेकिन यह भी समझना होगा कि समाधान वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की सलाह से ही निकलेंगे और उन पर अमल तभी होगा जब राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली की हवा का संकट केवल एक मौसम की समस्या नहीं है। यह देश की राजधानी की प्रतिष्ठा, जनता के स्वास्थ्य, बच्चों के भविष्य और शहर की आर्थिक समृद्धि का प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और सख्त टिप्पणी एक प्रकार से अंतिम संकेत है कि अब समय हाथ से निकलता जा रहा है। अब यह कहना पर्याप्त नहीं कि प्रदूषण एक जटिल समस्या है। बल्कि अब जरूरत है कि इसे खत्म करने के लिए जटिल लेकिन आवश्यक कदम उठाए जाएं। और ये कदम तभी जमीन पर असर दिखाएंगे जब सरकारें वैज्ञानिकों के साथ मिलकर दीर्घकालीन नीति बनाएं, और उसे बिना किसी राजनीतिक दबाव या वोट बैंक की चिंता के लागू करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली की सांसों की यह लड़ाई अब अदालत की निगरानी में है। लेकिन असली जीत तब होगी जब राजधानी के नागरिक रोज सुबह उठकर यह महसूस कर सकें कि हवा में जहर नहीं, जीवन है। जब बच्चे बिना मास्क के स्कूल जा सकें, जब बुजुर्ग बिना डर के सैर कर सकें, और जब अस्पतालों की भीड़ कम होकर सामान्य हो जाए। यह सपना संभव है, लेकिन तभी जब इच्छा शक्ति, वैज्ञानिक समझ, राजनीतिक दृढ़ता और सामाजिक जिम्मेदारी सभी मिलकर काम करें। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर आगाह किया है, अब बारी शासन की है कि वह साबित करे कि वह हवा को साफ करना चाहता भी है और कर भी सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 28 Nov 2025 16:30:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>निठारी कांड के निर्णय पर गूंजते सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निठारी हत्याकांड के दोषी ठहराए गए सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुख की बात है कि लंबी जांच के बावजूद निठारी के जघन्य हत्याकांड के असली अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं हो पाई। अपराध जघन्य थे और परिवारों की पीड़ा अथाह थी। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के निठारी हत्याकांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में सुरेंद्र कोली को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसले में कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपराधिक कानून</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159979/questions-echoing-on-the-decision-of-nithari-case"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download3.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निठारी हत्याकांड के दोषी ठहराए गए सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुख की बात है कि लंबी जांच के बावजूद निठारी के जघन्य हत्याकांड के असली अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं हो पाई। अपराध जघन्य थे और परिवारों की पीड़ा अथाह थी। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के निठारी हत्याकांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में सुरेंद्र कोली को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसले में कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपराधिक कानून अनुमान या पूर्वधारणा के आधार पर दोषसिद्धि की अनुमति नहीं देता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> खुदाई शुरू होने से पहले घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुलासे को उसी समय दर्ज नहीं किया गया। रिमांड दस्तावेज में विरोधाभासी विवरण थे और कोली को समय पर अदालत की ओर से निर्देशित चिकित्सा जांच के बिना लंबे समय तक हिरासत में रखा गया। अदालत ने कोली की सजा को रद्द करते हुए कहा कि अगर वह किसी और मामले में वांछित नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। यह फैसला उन परिवारों और कानूनी हलकों के लिए अहम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पिछले </span>18 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों से इस मामले पर नजर रखे हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष सुरेंद्र कोली के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने माना कि जांच के दौरान कई गंभीर प्रक्रियागत खामियां रहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके चलते दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उम्रकैद या फांसी नहीं दी जा सकती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे  पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के चर्चित निठारी कांड के 12 केस के आरोपी सुरेंद्र कोली और दो केस में फंसी की सजा पाए कोठी डीएस−5 </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के मालिक मनिंदर सिंह पंढेर को  भी ने बरी कर दिया है। </span> <span lang="hi" xml:lang="hi"> न्यायालय ने इन्हें   दोष मुक्त तो  करार दे दिया, किंतु  ये न्याय एक तरफा है।  अधूरा  है। निठारी कांड तो हुआ है। चर्चित निठारी कांड में निचली अदालत से कोली को एक दर्जन से अधिक मामलों में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। निठारी गांव के कोठी डीएस−5 </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के मालिक मनिंदर सिंह पंढेर को दो </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केस में  फंसी की सजा हो  चुकी है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जब की ये निचली अदालत से फांसी की सजा पाए ये दोनों आरोपी हाईकोर्ट ने बरी कर दिए तो व्यवस्था को यह तो  बताना  ही होगा कि फिर इस कांड के आरोपी कौन हैं? किसने  इस कांड  की 19 घटनाओं को अंजाम दिया।  कांड  तो  हुआ ही है। ये  दोनों  आरोपी इसलिए बरी हो गए कि इनके विरूद्ध सुबूत नही थे, किंतु पीड़ित परिवार को भी तो  न्याय  चाहिए। उनके परिवार की युवतियों, बेटियों और बच्चों  पर जुल्म करने  वाला,  उनसे  व्यभिचार कर उन्हें काटकर खाने वाला कोई तो होगा? किसी ने तो  ये कांड किया होगा?  उसे  कानून की जद में लाकर सजा कौन दिलाएगा? ये निर्दोष थे तो फिर इनकी कोठी के पास नाले में  किसने मारकर इनको  डाला?</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">29 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर </span>2006 <span lang="hi" xml:lang="hi">को नोएडा में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे नाले से </span>19 <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों और महिलाओं के कंकाल मिले। मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली गिरफ्तार  किया। आठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2007 <span lang="hi" xml:lang="hi">को कोली और पंढेर को </span>14 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन की सीबीआई हिरासत में भेजा गया। मई </span>2007 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सीबीआई ने पंढेर को अपनी चार्जशीट में अपहरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्कर्म और हत्या के मामले में आरोप मुक्त कर दिया था। दो माह बाद अदालत की फटकार के बाद सीबीआई ने उसे मामले में सह अभियुक्त बनाया। </span>13 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2009 <span lang="hi" xml:lang="hi">को विशेष अदालत ने पंढेर और कोली को </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षीय किशोरी के अपहरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्कर्म और हत्या का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई। ये पहला फैसला था। इसके बाद 11 केस में दोनों को सजा हुई।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस ने इस मामले में कहा था कि कम से कम </span>19 <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके शवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। पुलिस ने उस समय कहा था कि ये हत्याएं पंढेर के घर के अंदर हुई थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां कोली नौकर के तौर पर काम करते थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि जिन बच्चों के अवशेष बैग में छिपे हुए पाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें कोली ने मिठाई और चॉकलेट देकर लालच देकर मार डाला था।पुलिस का कहना था कि जांच के दौरान कोली ने नरभक्षण और नेक्रोफिलिया (शवों के साथ संबंध बनाने) की बात कबूल की थी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> बाद में उन्होंने अदालत में अपना कबूलनामा ये कहते हुए वापस ले लिया कि उनसे जबरन ये बयान दिलवाया गया था। सीबीआई ने सुरेंदर कोली और पंढेर के खिलाफ़ </span>19 <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले दर्ज किए थे। जहां कोली पर हत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपहरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलात्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबूतों को मिटाने जैसे आरोप थे तो वहीं पंढेर पर अनैतिक तस्करी का आरोप था। इस मामले की गूंज कई सालों तक देश गूंजती रही थी। लोगों ने पुलिस पर लापरवाही बरतने के आरोप लगाए थे। स्थानीय लोगों ने उस समय कहा था कि पुलिस इस मामले में इसलिए भी कार्रवाई नहीं कर सकी क्योंकि लापता होने वालों में से अधिकतर गरीब परिवार के थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालय ने निर्णय में ये माना कि आरोपियों </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के विरूद्ध  सबूत नही हैं।  न्यायालय ने ये नही कहा कि कांड  हुआ ही नही। उसने माना कि कांड तो  हुआ। 19 महिलाओं  और बच्चियों के कंकाल कोठी डीएस−5 </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के  सामने  नाले से मिले। अब प्रश<u>्न</u> यह है कि ये नही तो किसी और ने ये कांड किया है। जिसने कांड किया उसे सजा  दिलाने की किसकी जिम्मेदारी है? किंतु   लगता है कि न्यायालय ने इस केस के आरोपी के बरी हो  जाने के बाद ये  केस व्यवस्था  की कबाड़ की फाइल में चला  जाएगा। 2006 से न्याय  की आशा में बैठे  पीडित परिवार को रो पीट कर चुप हो बैठना पड़ेगा । </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय के बाद पीड़ितों के माता पिता और परिवार वालों का दुख और गहरा हो गया। अपनों को खोने वालों ने कहा कि </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi">9</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साल बाद भी हम लोगों को न्याय नहीं मिला। निठारी कांड में अपने बच्चों को खोने वाले पैरंट्स का लगभग एक ही सवाल है कि अगर पंढ़ेर और कोली निर्दोष हैं तो उनके बच्चों को किसने मारा है?</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बात और हाईकोर्ट ने कहा कि शवों की मेडिकल रिपोर्ट के  आधार पर जांच  नही हुई। ये  रिपोर्ट मानव तस्करी की और इशारा कर रही थी। दोनों  न्यायधीश ने जांच  पर नाखुशी जताते हुए ये भी कहा कि जांच  बेहद खराब है। सुबूत जुटाने की मौलिक प्रक्रिया का पूरी तरह उल्लंघन किया गया। जांच एसेंसियों की नाकामी जनता के विश्वास के साथ धोखा  है। हाईकोर्ट ने  कहा कि जांच एजेंसियों ने अंग व्यापार के गंभीर पहलुओं की जांच किए बिना एक गरीब नौकर को खलनायक की तरह पेश किया।  हाईकोर्ट ने माना कि  ऐसी गंभीर चूक के कारण मिलीभगत सहित कई गंभीर निष्कर्ष  संभव है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि  दोनों  आरोपियों के खिलाफ कोई  सुबूत नही हैं। सुबूत के अभाव में दोनों आरोपियों को लगभग  19 साल जेल में रहना  पड़ा। अकारण जेल में बिताए  इनके इन सालों के लिए कौन जिम्मेदार है?</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस केस में  शुरूआत से ही पुलिस पर आरोप  लगते रहते  हैं कि वह इस मामले में रूचि नही ले रही।उसीके बाद मामला सीबीआई को गया। अब सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठा  है तो  सीबीआई  को अपनी जांच और प्रक्रिया पर भी  सोचना  और बदलाव करना  होगा। क्योंकि देश में उसका बहुत सम्मान है। प्रत्येक प्रकार के टिपिकल मामले में उसी से जांच कराने की बात आती है।  अब उसकी भी  जांच  ऐसी ही निम्न स्तरीय होगी,तो फिर उसे  सोचना तो  होगा ही।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Nov 2025 16:39:46 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट के अहम आदेश से लोगो की भावनाओ का सम्मान</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों पर लोगो की भावनाओ का सम्मान करते हुए दो अहम फैसले को केंद्र में रखकर लोगो को दीपावली की भेंट अर्पित कर दी है।करोड़ो लोगो का दिल जीत लिया है। पर्यावरण से दिल्ली -एनसीआर के नागरिकों को काफी कुछ सहन करना पड़ता है।दीपावली पर की जाने वाली आतिशबाजी से शहर का वातावरण प्रदूषित हो जाता है।जिससे लोगो को स्वांस लेने में दिक्कते आती है।हर वर्ष दिल्ली और एनसीआर की हवा प्रदूषित होती है।सरकार दिल्ली में पटाखो पर प्रतिबंध लगा देती है।लेकिन इस बार दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुहार लगाकर सीमित समय के लिए पटाखो</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/157458/respecting-peoples-sentiments-through-important-order-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/download-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों पर लोगो की भावनाओ का सम्मान करते हुए दो अहम फैसले को केंद्र में रखकर लोगो को दीपावली की भेंट अर्पित कर दी है।करोड़ो लोगो का दिल जीत लिया है। पर्यावरण से दिल्ली -एनसीआर के नागरिकों को काफी कुछ सहन करना पड़ता है।दीपावली पर की जाने वाली आतिशबाजी से शहर का वातावरण प्रदूषित हो जाता है।जिससे लोगो को स्वांस लेने में दिक्कते आती है।हर वर्ष दिल्ली और एनसीआर की हवा प्रदूषित होती है।सरकार दिल्ली में पटाखो पर प्रतिबंध लगा देती है।लेकिन इस बार दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुहार लगाकर सीमित समय के लिए पटाखो की अनुमति की मांग की थी।इसको मद्देनजर रखते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखो की  सशर्त मंजूरी दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली एनसीआर में सीमित समय के लिए ग्रीन पटाखो को जलाने की अनुमति दी गई है। इस फैसले से युवाओ के चेहरे खिल उठे है।दरअसल, पटाखे जलाने की सुप्रीम की मंजूरी से करोड़ो लोगो के मन मे खुशी की लहर है।दीपावली भारत का सांस्कृतिक त्योहार है।बारह महीने में एक बार आने वाले इस सूचिता के पर्व पर हर व्यक्ति के मन मे उमंग रहती है कि वे भी आतिशबाजी कर खुशी के इस  पर्व को खूब मनाए।लेकिन पर्यावरण के लिए खतरा बनता धुंआ  शहर की हवा में जहर घोलता है। जिससे दीपावली के बाद  शुरुआती दिनों में  लोगो को स्वांस लेने मेंबहुत तकलीफ सहन करनीं पड़ती  है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वांस लेने मेंअमूमन लोगो को मुश्किलें पैदा हो जाती है। इसको ध्यान में रखकर माननीय सुप्रिम कोर्ट ने दीपावली पर्व पर तीन दिन के लिए ग्रीन पटाखे की अनुमति  दी है।जिससे लोगो के मन मे खुशी है।पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट का स्वागतयोग्य फैसला है।दीपावली पर्व  का हर व्यक्ति को बेसब्री से इंतजार रहता है।।दीपावली पर युवाओ के मन मे उदासीनता देखी जा रही  थी कि इस बार पटाखो का लुफ्त नही उठा सकेंगे।परन्तु माननीय  सुप्रीम कोर्ट के फैसले से युवाधन खुश  है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने हिन्दुओ की भावनाओ का सम्मान किया है। जबकि हर वर्ष दीपावली  पर दिल्लीवासियों को पटाखे जलाने के लिए वंचित रखा जाता था।आम आदमी की सरकार प्रतिवर्ष दिल्ली -एनसीआर में आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगा देती थी। सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व दीपावली पर हिन्दुओ की भावनाओ को ठेस पहुंचाई जाती थी।क्योकि हर वर्ष एक ही चर्चा रहती थी कि इस बार भी पटाखे नही जला सकेंगे? लोगो की भावनाओ को ठेस पहुंचाने का कार्य पूर्ववर्ती सरकारे करती आ रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम के इस फैसले का विपक्षी दलों ने विरोध किया है।गौरतलब है कि सुप्रीम ने ग्रीन पटाखे की इजाजत देकर लोगो की भावनाओ को आबाद किया है।सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने आदेश जारी करते हुए कहा कि अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।त्योहार पर न्यायसंगत फैसला कर उन लोगो को उत्साहित करने का कार्य किया है,जो कई सालों से पटाखो का लुफ्त उठाने में वंचित थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पर्यावरणीय क्षति को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम ने ग्रीन पटाखो को जलाने की अनुमति दी  है।सीजेआई गवई ने कहा कि त्योहारों की खुशी हम छीनना नही चाहते है।लेकिन पर्यावरण के साथ समझौता भी नही किया जा सकता है।पारंपरिक पटाखों की तस्करी और अवैध बिक्री से अधिक नुकसान होता है।इसलिए सुप्रीम ने ग्रीन पटाखो को सीमित समय के लिए नियंत्रित दायरे में अनुमति देकर लोगो के उत्साह में वृद्धि की है।सुप्रीम कोर्ट का खास फैसला स्वागतयोग्य है।इस के साथ ही माननीय सुप्रीम कोर्ट ने  दूसरे फैसले को केंद्र सरकार के विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन के विकल्प पर केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए सुप्रीम ने कहा कि सुई के विकल्प को अपनाना होगा,क्योकि समय के साथ बदलना जरूरी है।दरअसल, सरकार समय के साथ बदलना नही चाहती है।फांसी की जगह सुई के विकल्प के विरोध में केंद्र को फटकार लगाते हुए याचिका पर जनसुनवाई के दौरान केंद्र को आड़े हाथों लिया।सुप्रीम कोर्ट के ये  फैसले स्वागतयोग्य ही नही है यह लोगो की भावनाओ को आबाद करने में अहम हिस्सेदारी मानी जा रही है।उधर,कोर्ट ने कहा कि अमेरिका ने 49 राज्यो ने मौत की सुई को अपनाया है।क्योंकि फांसी देने के बाद व्यक्ति की लाश 40 मिनट तक लटकी रहती है।नवयुग मे कदमताल मिलाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश मे डेथ पेनल्टी इन्फॉर्मेशन सेंटर के अनुसार देश मे 38 लोगो को फांसी सुनाई जाने की सूची है।लिहाजा, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की याचिका पर कहा कि देश मे फांसी पाए कैदियों को लिथम इंजेक्शन का विकल्प देना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र का कहना है लिथम इंजेक्शन का विकल्प देना संभव नही है।कोर्ट ने कहा कि फांसी से मृत्युदंड देना  क्रूरतापूर्ण कृत्य है और इस सजा में समय ज्यादा लगता है।कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार समय के साथ विचार विकसित करने के लिए तैयार नही है।कोर्ट के दो अहम फैसले पर देश की नजर है।देश मे समय के साथ परिवर्तन करना समय की मांग बताते हुएसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को फिर से विचार करने की आवश्यकता है। इस पर मंथन करे केंद्र सरकार।</div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Oct 2025 18:37:31 +0530</pubDate>
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                <title>कफ सिरप कांड: सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल, CBI जांच की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ सिरप पीने से मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कम से कम </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi">  बच्चों की मौत के मामले ने देश को झकझोर दिया है। अब वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर इसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिका में सिरप में मिले जहरीले रसायनों डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकॉल (ईजी) की बिक्री पर सख्त नियंत्रण की भी मांग उठाई गई है।याचिका के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोल्ड्रिफ कफ सिरप में डीईजी की मात्रा </span>48.6<span lang="hi" xml:lang="hi">  फीसद तक पाई गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानक सीमा से करीब</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156768/cuff-syrup-case-pil-filed-in-supreme-court-demands-cbi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/कफ-सिरप-कांड--सुप्रीम-कोर्ट-में-pil-दाखिल,-cbi-जांच-की-मांग.png" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ सिरप पीने से मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कम से कम </span>14<span lang="hi" xml:lang="hi"> बच्चों की मौत के मामले ने देश को झकझोर दिया है। अब वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर इसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिका में सिरप में मिले जहरीले रसायनों डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकॉल (ईजी) की बिक्री पर सख्त नियंत्रण की भी मांग उठाई गई है।याचिका के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोल्ड्रिफ कफ सिरप में डीईजी की मात्रा </span>48.6<span lang="hi" xml:lang="hi"> फीसद तक पाई गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानक सीमा से करीब </span>500<span lang="hi" xml:lang="hi"> गुना अधिक है। यह रसायन औद्योगिक उपयोग के लिए होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दवाओं में मिलाने से किडनी फेलियर हो जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में </span>9, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान में </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> और अन्य राज्यों में भी मौतें हुईं। केंद्र सरकार ने सिरप पर प्रतिबंध लगाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जांच में लापरवाही बरती जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विशाल तिवारी ने कोर्ट से मांग की है कि मामले की जांच राष्ट्रीय न्यायिक आयोग या सीबीआई के तहत विशेषज्ञ समिति करे। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज इसकी निगरानी करें।उन्होंने कहा कि सभी राज्यों में दर्ज एफआईआर को एक स्थान पर स्थानांतरित कर एकीकृत जांच की जानी चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता ने मांग की है कि विषैले सिरप बनाने वाली कंपनियों के लाइसेंस तुरंत रद्द कर उन्हें बंद किया जाए और उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार से सभी प्रभावित उत्पाद वापस मंगवाने और एक मजबूत ड्रग्स रिकॉल पॉलिसी बनाने की मांग भी की गई है।इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याचिका में पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने की भी मांग की गई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने सोमवार को मध्य प्रदेश और राजस्थान के स्वास्थ्य विभागों के प्रमुख सचिवों को नोटिस जारी किया था।यह नोटिस दोनों राज्यों में कफ सिरप पीने के बाद </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> बच्चों की मौत के मामले में जारी किया गया है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्वास्थ्य मंत्री ने जांच का आश्वासन दिया है।जनता और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि दोषियों को बख्शा न जाए और बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार तंत्र के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएं।।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Oct 2025 18:47:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वकालत और पत्रकारिता दोनों साथ नहीं: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong>  सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी अधिवक्ता एक साथ पत्रकारिता नहीं कर सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि वकील और पत्रकार की दोहरी भूमिका पेशेवर कदाचार मानी जाएगी। यह मामला मोहम्मद कमरान बनाम राज्य (उत्तर प्रदेश) से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई के दौरान अदालत ने यह रुख स्पष्ट किया।</div>
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<div style="text-align:justify;">21 अक्तूबर 2024 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि वकील को यह चुनना होगा कि वह अधिवक्ता रहेगा या पत्रकार — दोनों भूमिकाएँ एक साथ निभाना स्वीकार्य नहीं हैं। अदालत ने इस विषय पर बार</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/155941/both-advocacy-and-journalism-are-not-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/supream-court.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong> सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी अधिवक्ता एक साथ पत्रकारिता नहीं कर सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि वकील और पत्रकार की दोहरी भूमिका पेशेवर कदाचार मानी जाएगी। यह मामला मोहम्मद कमरान बनाम राज्य (उत्तर प्रदेश) से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई के दौरान अदालत ने यह रुख स्पष्ट किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">21 अक्तूबर 2024 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि वकील को यह चुनना होगा कि वह अधिवक्ता रहेगा या पत्रकार — दोनों भूमिकाएँ एक साथ निभाना स्वीकार्य नहीं हैं। अदालत ने इस विषय पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से जवाब माँगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद बार काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसके नियमों (रूल 49) के तहत अधिवक्ता किसी अन्य पूर्णकालिक पेशे में शामिल नहीं हो सकता। विशेषकर पत्रकारिता को वकालत के साथ जोड़ना वर्जित है, क्योंकि इससे हित-संघर्ष और नैतिक दायित्वों का टकराव पैदा होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं, याचिकाकर्ता अधिवक्ता मोहम्मद कमरान ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि वह अब पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं और केवल वकालत करेंगे। अदालत ने बार काउंसिल की दलीलों और कमरान के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया और मामले की अगली सुनवाई सूचीबद्ध कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत की इस टिप्पणी के बाद साफ है कि कोई भी अधिवक्ता पत्रकारिता जैसे दूसरे पेशे में सक्रिय नहीं रह सकता। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आने वाले समय में ऐसे अधिवक्ताओं के लिए नज़ीर बनेगा, जो खुद को पत्रकार भी बताते हैं।</div>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Oct 2025 17:46:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘मां-बाप की संपत्ति से बेदखल हो सकते हैं बच्चे’, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, बुजुर्ग को दिलाया हक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मां बाप की जायदाद से बच्चे कभी भी बेदखल किए जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति पर अहम फैसला सुनाया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने एक बुजुर्ग को मालिकाना हक दिलाया. बुजुर्ग के बेटे ने अपनी पैतृक जायदाद पर कब्जा कर लिया था और अपने पिता को भी उनमें प्रवेश की इजाजत नहीं दे रखी थी. अभागे पिता ने बेटे के खिलाफ कोर्ट का रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को पिता की संपत्ति खाली करने का आदेश दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मां-बाप के अधिकार बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156037/children-may-be-ousted-from-the-property-of-parents"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मां बाप की जायदाद से बच्चे कभी भी बेदखल किए जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति पर अहम फैसला सुनाया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने एक बुजुर्ग को मालिकाना हक दिलाया. बुजुर्ग के बेटे ने अपनी पैतृक जायदाद पर कब्जा कर लिया था और अपने पिता को भी उनमें प्रवेश की इजाजत नहीं दे रखी थी. अभागे पिता ने बेटे के खिलाफ कोर्ट का रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को पिता की संपत्ति खाली करने का आदेश दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मां-बाप के अधिकार बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि परेंट्स और सीनियर सिटीजंस अपनी संपत्ति से बच्चों को कभी भी बेदखल कर सकते हैं. भरण-पोषण एवं कल्याण एक्ट </span>2007<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत गठित ट्रिब्यूनल को परेंट्स और सीनियर सिटीजंस को ऐसे बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार देता है जो उन्हें रहने-खाने की जिम्मेदारी देने से भागें. सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के इस मामले में बड़े बेटे के खिलाफ बेदखली के आदेश को भी पलट दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापे में देखभाल की जिम्मेदारी नहीं निभाने के कारण बुजुर्ग ने ट्रिब्यूनल में अपील की थी. ट्रिब्यूनल ने उनके बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का भी आदेश दिया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को अमान्य करार दिया तो केस सुप्रीम कोर्ट में चला गया था. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि </span>2007 <span lang="hi" xml:lang="hi">का कानून वृद्ध व्यक्तियों की दुर्दशा दूर करने तथा उनकी देखभाल एवं सुरक्षा के लिए बनाया गया था।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 18:28:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड चुनाव आयोग पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया, कांग्रेस बोली- वोट चोरी पर अदालती मुहर</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उतराखंड चुनाव आयोग को दो या ज्यादा मतदाता सूचियों में नाम वाले उम्मीदवारों को पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग की याचिका खारिज कर दी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उतराखंड चुनाव आयोग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए आयोग से पूछा कि आप वैधानिक प्रावधान के विपरीत आदेश कैसे दे सकते हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल उत्तराखंड चुनाव आयोग ने पंचायत चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रद्द करने से</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156030/supreme-court-imposed-a-fine-of-two-lakh-rupees-on"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/supream-court1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उतराखंड चुनाव आयोग को दो या ज्यादा मतदाता सूचियों में नाम वाले उम्मीदवारों को पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग की याचिका खारिज कर दी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उतराखंड चुनाव आयोग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए आयोग से पूछा कि आप वैधानिक प्रावधान के विपरीत आदेश कैसे दे सकते हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल उत्तराखंड चुनाव आयोग ने पंचायत चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रद्द करने से इनकार कर दिया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका नाम दो या ज़्यादा जगह वोटर लिस्ट में शामिल था। आयोग का यह फैसला उत्तराखंड हाकोर्ट के आदेश के खिलाफ था। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को वैधानिक प्रावधान मानने के लिए कहा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसा नहीं किया। राज्य चुनाव आयोग ने एक सर्कुलर जारी कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों के नाम कई मतदाता सूचियों में दर्ज हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे पंचायत चुनाव लड़ सकते हैं। हाईकोर्ट ने आयोग के उस सर्कुलर पर रोक लगा दिया था। राज्य चुनाव आयोग ने इसी आदेश को चुनौती दी थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज राज्य निर्वाचन आयोग की याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को कानून के उल्लंघन पर 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश पारित किया। जस्टिस नाथ ने आयोग के वकील से सवाल किया कि आप कैसे वैधानिक प्रावधान के विपरीत निर्णय ले सकते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में बताया गया था कि कई मामलों में ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी जा रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में शामिल थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस फैसले पर कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि उत्तराखंड में वोट चोरी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई है। सप्पल ने कहा कि सवाल है कि चुनाव आयोग ने ऐसा किया क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल जनवरी में उत्तराखंड में अर्बन लोकल बॉडी यानी म्युनिसिपल चुनाव हुए। चुनाव में बीजेपी ने अपने लोगों को गांव से शहर की वोटर लिस्ट में शिफ्ट कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि फर्जी वोटिंग से वो चुनाव जीत सकें। चुनाव पूरे होने के बाद बीजेपी ने अपने लोगों को वापस गांव की वोटर लिस्ट में शिफ्ट करना शुरू किया ताकि मई-जून में होने वाले पंचायत चुनाव में वोटिंग में नाजायज फायदा ले सके। हमने इसे पकड़ लिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सप्पल ने कहा कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा ने चुनाव आयोग को बार-बार लिखा कि ऐसा नहीं किया जा सकता। हमने चुनाव आयोग को याद दिलाया कि वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए कम से कम 6 महीने उसी पते पर रहने का नियम है। 6 महीने से कम समय में कोई भी वोटर दोबारा अपना नाम शिफ्ट नहीं कर सकता है। कांग्रेस के विरोध के कारण बीजेपी के लोग वापस ग्रामीण एरिया में अपना नाम शामिल नहीं करवा सके। तो उन्होंने क्या करना शुरू किया</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने नाम शिफ्ट करने की जगह नए सिरे से अपना नाम दूसरी जगह जुड़वा लिया। अब वो दो-दो जगह के वोटर हो गए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरदीप सिंह सप्पल ने आगे कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीजेपी के ऐसे लोगों को जब चुनाव में टिकट मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे लोगों ने चुनाव आयोग से कहा कि ऐसे लोगों का नॉमिनेशन रद्द होना चाहिए। लेकिन चुनाव आयोग ने अपने ही नियम को मानने से मना कर दिया। इसीलिए लोग हाईकोर्ट में गए। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि उत्तराखंड पंचायती राज कानून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2016 की धारा 9(6) और 9(7) के अनुसार ऐसे उम्मीदवारों का नॉमिनेशन रद्द किया जाए। लेकिन उत्तराखंड चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट के निर्देश को ही मानने से मना कर दिया और बीजेपी के लोगों को दो-दो जगह वोटर होने के बावजूद चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी! इसीलिए आज सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग पर ही पेनल्टी लगा दी है। वोट चोरी की इस दास्तान पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपनी मुहर लगा दी है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 18:21:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली दंगा साजिश केस में जमानत के लिए शरजील इमाम सुप्रीम कोर्ट पहुँचे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong>छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की है, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों के कथित बड़े साजिश मामले में उन्हें जमानत देने से इंकार कर दिया गया था। यह मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत दर्ज है, जिसमें शरजील इमाम सहित कई आरोपी दंगों के कथित मास्टरमाइंड बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अभी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">शरजील इमाम को 2020 में गिरफ़्तार किया गया और ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154683/sharjil-imam-reached-supreme-court-for-bail-in-delhi-riot"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/download-(3)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong>छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की है, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों के कथित बड़े साजिश मामले में उन्हें जमानत देने से इंकार कर दिया गया था। यह मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत दर्ज है, जिसमें शरजील इमाम सहित कई आरोपी दंगों के कथित मास्टरमाइंड बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अभी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शरजील इमाम को 2020 में गिरफ़्तार किया गया और ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार कर दिए जाने के बाद उनकी बेल याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में तीन साल से लंबित थी। अब हाईकोर्ट ने उनको जमानत देने से इनकार कर दिया है। शरजील के वकील ने कहा कि इससे पहले सात डिवीजनल बेंचों के पास 62 बार सुनवाई के लिए केस सूचीबद्ध किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने ट्रायल में देरी और जेल में बिताए गए समय को जमानत का आधार मानने से इंकार कर दिया। बेंच ने टिप्पणी की कि 'ट्रायल में देरी का आधार सभी मामलों में सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं होता।जमानत का विवेकाधिकार प्रत्येक मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।' इसके अलावा, अदालत ने अन्य सह-आरोपियों जैसे देवांगना कलीता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को पहले जमानत मिलने के आधार पर समानता की मांग को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, 'इमाम और खालिद की भूमिका इन सह-आरोपियों से अलग है, जैसा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से लगता है।' एक अन्य बेंच ने तसलीम अहमद की जमानत याचिका को भी खारिज कर दिया था। ये सभी याचिकाएं 2022 से 2024 के बीच दायर की गई थीं और 9 जुलाई को फैसला सुरक्षित रखा गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फरवरी 2020 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में हुए दंगों ने पूरे देश को हिला दिया था। नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी। इन दंगों में 53 लोग मारे गए, जबकि 700 से अधिक घायल हुए। दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने एफआईआर दर्ज की, जिसमें आईपीसी की धाराओं के अलावा यूएपीए की धारा 13 के तहत आरोप लगाए गए हैं। इसमें आपराधिक साजिश, राजद्रोह, समूहों के बीच शत्रुता भड़काना, सार्वजनिक उपद्रव पैदा करने वाले बयान और देश की संप्रभुता, एकता या क्षेत्रीय अखंडता पर सवाल उठाने जैसे आरोप शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस हिंसा का उद्देश्य देश को धार्मिक आधार पर बांटना और वैश्विक स्तर पर भारत को बदनाम करना था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा था, 'यह कोई साधारण दंगा का मामला नहीं है। आरोपी कानून के खिलाफ विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि कुछ दुष्ट योजना रच रहे थे।' उन्होंने इमाम के भाषणों का हवाला देते हुए कहा कि इनका इरादा राष्ट्र को धार्मिक आधार पर विभाजित करना था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शरजील इमाम आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र और जेएनयू के पूर्व पीएचडी स्कॉलर हैं। इनको 28 जनवरी 2020 को बिहार के जहानाबाद से गिरफ्तार किया गया था। वह तब से तिहाड़ जेल में बंद हैं, यानी पांच साल से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं। इमाम ने सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उनके भाषणों या व्हाट्सएप चैट्स में कभी हिंसा की अपील नहीं की गई। उनके वकील ने तर्क दिया कि इमाम का दंगों के स्थान, समय या अन्य आरोपी उमर खालिद से कोई सीधा संबंध नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह अपील न केवल इमाम के लिए बल्कि पूरे मामले के अन्य आरोपियों के लिए भी अहम है। जेएनयू छात्र संघ यानी जेएनएसयू ने पहले उमर खालिद की जमानत रद्द होने के बाद मार्च निकाला था। कार्यकर्ता समूहों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट अब इस पर क्या फैसला लेता है, यह देखना दिलचस्प होगा, खासकर जब यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत जमानत मिलना दुर्लभ होता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Sep 2025 16:15:27 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>विधेयकों की मंजूरी में देरी के उदाहरण राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए निश्चित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज - </strong>  समयसीमा लागू करने को उचित नहीं ठहरा सकते: सुनवाई के विदौरान सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ की सुनवाई के 6 वें दिन, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि विधेयकों को सहमति देने में देरी के कुछ उदाहरण राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार कार्य करने के लिए एक व्यापक समयरेखा निर्धारित करने को सही नहीं ठहरा सकते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यदि देरी के व्यक्तिगत मामले हैं, तो पीड़ित पक्ष राहत पाने के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं, और न्यायालय निर्देश दे सकता है कि निर्णय एक समय सीमा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154441/examples-of-delay-in-approval-of-bills-fixed-for-governors"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/sc1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज - </strong> समयसीमा लागू करने को उचित नहीं ठहरा सकते: सुनवाई के विदौरान सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ की सुनवाई के 6 वें दिन, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि विधेयकों को सहमति देने में देरी के कुछ उदाहरण राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार कार्य करने के लिए एक व्यापक समयरेखा निर्धारित करने को सही नहीं ठहरा सकते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि देरी के व्यक्तिगत मामले हैं, तो पीड़ित पक्ष राहत पाने के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं, और न्यायालय निर्देश दे सकता है कि निर्णय एक समय सीमा के भीतर लिया जाना चाहिए; हालांकि, इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि न्यायालय को राज्यपाल और राष्ट्रपति के कार्यों के लिए एक सामान्य समयरेखा निर्धारित करनी चाहिए, न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा। न्यायालय ने बताया कि संविधान ने विशेष रूप से यह कहकर "लचीलापन" प्रदान किया है कि बिलों को किसी भी समय सीमा को निर्दिष्ट किए बिना "जल्द से जल्द" लौटाया जाए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीफ़ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ ने तमिलनाडु राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सीनियर एडवोकेट डॉ अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुन रही थी, जिन्होंने तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा निर्धारित 3 महीने की समय सीमा का समर्थन किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि राज्यपालों द्वारा विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए रोके जाने के मद्देनजर समयसीमा जरूरी है। CJI ने पूछा, "क्या हम राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों के प्रयोग के लिए अनुच्छेद 142 के तहत एक सीधा फॉर्मूला बना सकते हैं?" सिंघवी ने न्यायालय से "हाथीदांत-टॉवर" दृष्टिकोण नहीं लेने और "भारी देरी की समकालीन वास्तविकताओं" से निपटने का आग्रह करते हुए कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत शक्तियों के प्रयोग के लिए एक "सामान्य समयरेखा" आवश्यक है।</div>
<h4 style="text-align:justify;"> </h4>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>'समयसीमा तय करने के लिए हमें संविधान में संशोधन करना होगा। </strong></h4>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नाथ ने कहा कि एक सामान्य समयरेखा निर्धारित करना व्यावहारिक रूप से संविधान में संशोधन करने के समान होगा, क्योंकि अनुच्छेद 200 और 201 कोई समयरेखा निर्दिष्ट नहीं करते हैं। न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, 'समयसीमा तय करने के लिए हमें संविधान में संशोधन करना होगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ, विशेष रूप से जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस नाथ ने राज्यपाल/राष्ट्रपति द्वारा समयसीमा का पालन नहीं करने के परिणामों के बारे में पूछा। उन्होंने पूछा कि क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति को अदालत की अवमानना के लिए फटकार लगाई जा सकती है। सिंघवी ने जवाब दिया कि विधेयकों को "सहमति माना गया" एक परिणाम हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सिंघवी ने सीजेआई गवई द्वारा लिखे गए तीन जजों की खंडपीठ के हालिया फैसले का हवाला दिया, जिसमें तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को तीन महीने के भीतर अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। सीजेआई ने बताया कि वहां, अदालत ने एक निर्देश जारी किया जो मामले के लिए विशिष्ट था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ ने कहा, ''हमने यह निर्देश नहीं दिया कि सभी विधानसभा अध्यक्षों को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला करना होगा। यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के लिए विशिष्ट था, "सीजेआई ने कहा। सिंघवी ने पेरारिवलन मामले पर भी भरोसा किया, जहां अदालत ने राजीव गांधी हत्या मामले में दोषियों को रिहा करने का निर्देश दिया था, यह घोषित करने के बाद कि उन्हें "सजा काट ली गई है", उनके माफी आवेदनों पर राज्यपाल की निष्क्रियता को देखते हुए। उन्होंने कहा, 'लेकिन ये व्यक्तिगत मामले हैं। अलग-अलग तथ्यात्मक विचार हो सकते हैं, "सीजेआई गवई ने कहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि अगर राज्य को हर बार राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई करने से इनकार करने पर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो इससे केवल देरी बढ़ेगी। "मामला-दर-मामला दृष्टिकोण समस्या का समाधान नहीं करेगा। अनुच्छेद 200 और 201 के लिए एक सामान्य समयरेखा की आवश्यकता होती है। यह लॉर्डशिप का इरादा नहीं हो सकता है कि मैं हर बार अदालत में वापस आता रहूं, "सिंघवी ने कहा। </div>
<div style="text-align:justify;">
<h4 style="text-align:justify;"> </h4>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>हम एक समय सीमा निर्धारित करेंगे, एक कठिन प्रस्ताव है। </strong></h4>
<div style="text-align:justify;">"अगर समयसीमा का पालन नहीं किया जाता है तो क्या होगा?" जस्टिस नाथ ने पूछा। सिंघवी ने जवाब दिया, "योर लॉर्डशिप के हाथ और कान लंबे और शक्तिशाली हैं जो यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इसका पालन किया जाए। जस्टिस नरसिम्हा ने तब कहा, "हम समयसीमा निर्धारित करते हैं, और फिर, मेरे भाई ने एक बहुत ही सही सवाल पूछा, फिर क्या? यदि यह एक प्रशासनिक आदेश है जो गैर-अनुपालन के लिए अमान्य हो जाता है, तो क्या किया जाना है? "जितनी जल्दी हो सके" प्रदान किया गया लचीलापन एक संवैधानिक मानदंड है। लेकिन जब मामले न्यायालय में जाते हैं और कोई कहता है कि काफी समय पहले ही लिया जा चुका है, तो यह व्यक्तिगत मामला बन जाता है। वहां, न्यायालय किसी भी प्रकार की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। यहां तक कि 142 शक्ति भी। लेकिन यह कहना कि हम एक समय सीमा निर्धारित करेंगे, एक कठिन प्रस्ताव है। </div>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि अनुच्छेद 200 में केवल यह निर्दिष्ट किया गया है कि राज्यपाल को "जल्द से जल्द" फैसला करना चाहिए। न्यायाधीश ने पूछा, "क्या यह काफी नहीं है?" सिंघवी ने कहा कि मामले बताते हैं कि यह सामान्य जनादेश पर्याप्त नहीं था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई गवई ने सामान्य समयरेखा के बारे में अपना संदेह दोहराया। पीठ ने कहा, व्यक्तिगत मामलों में पार्टियां अनुच्छेद 226 के तहत भी जा सकती हैं। लेकिन एक समयरेखा निर्धारित करना। अलग-अलग अत्यावश्यकताएं, विचार हो सकते हैं, जिनके लिए अलग-अलग अधिनियमों के लिए अलग-अलग समय-सीमा की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन एक निश्चित समयरेखा प्रदान करना "। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>क्या हितों का टकराव होगा?</strong></h4>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया , जहां अदालत ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई के पैनल द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि संसद कानून नहीं बना देती। सिंघवी ने कहा कि यह फैसला अदालत द्वारा संविधान में चुप्पी को भरने का एक उदाहरण है, जो वास्तविक दुनिया की बीमारी को दूर करने के लिए एक सामान्य निर्देश देता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि अनुच्छेद 200 के संदर्भ में, न्यायालय को "मामला-दर-मामला" दृष्टिकोण का पालन नहीं करना चाहिए। "समयरेखा वस्तु का पालन करने के लिए एक मार्गदर्शन होना है। यह मानते हुए कि समयरेखा का पालन नहीं किया जाता है, इसके साथ जुड़ा परिणाम माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नाथ ने तब पूछा कि क्या अदालत किसी विधेयक को सहमति देने की घोषणा करती है, और यदि विधेयक को बाद में अदालत के समक्ष चुनौती दी जाती है, तो क्या हितों का टकराव होगा? सिंघवी ने कहा कि सहमति की घोषणा करते हुए न्यायालय विधेयक के गुण-दोष में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। "सवाल यह है कि क्या अनुच्छेद 142 के तहत एक सामान्य समयसीमा दी जा सकती है," सीजेआई गवई ने सिंघवी की दलीलें समाप्त करने से पहले प्रश्न को दोहराया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Sep 2025 15:27:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का बिहार एसआईआर पर बड़ा आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong> </strong>बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले में भारत के चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मसौदा मतदाता सूची के संबंध में दावे/आपत्तियां 1 सितंबर की समय-सीमा के बाद भी दायर की जा सकती हैं। नामांकन की अंतिम तिथि से पहले दायर किए गए ऐसे सभी दावों/आपत्तियों पर विचार किया जाएगा। इस दलील पर गौर करते हुए न्यायालय ने 1 सितंबर की समय-सीमा बढ़ाने का कोई आदेश नहीं दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जिन लोगों के नाम लिस्ट में नहीं है उनकी मदद के लिए वॉलंटियर्स नियुक्त होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों और हटाए गए मतदाताओं को दावे दायर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154355/%C2%A0%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%B8%E0%A4%86%E0%A4%88%E0%A4%86%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/sc.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong> </strong>बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले में भारत के चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मसौदा मतदाता सूची के संबंध में दावे/आपत्तियां 1 सितंबर की समय-सीमा के बाद भी दायर की जा सकती हैं। नामांकन की अंतिम तिथि से पहले दायर किए गए ऐसे सभी दावों/आपत्तियों पर विचार किया जाएगा। इस दलील पर गौर करते हुए न्यायालय ने 1 सितंबर की समय-सीमा बढ़ाने का कोई आदेश नहीं दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिन लोगों के नाम लिस्ट में नहीं है उनकी मदद के लिए वॉलंटियर्स नियुक्त होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों और हटाए गए मतदाताओं को दावे दायर करने में मदद के लिए पैरा लीगल वॉलंटियर्स नियुक्त किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह व्यक्तियों, दलों को दावे और आपत्तियां दर्ज करने में मदद करने के लिए पैरा लीगल वॉलेंटियर्स की नियुक्ति करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ राजद सांसद मनोज कुमार झा और बिहार के विधायक अख्तरुल ईमान सहित राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा दायर आवेदनों पर विचार कर रहा था, जिनमें 1 सितंबर की समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई। पिछले सप्ताह इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए भेजा गया, जब न्यायालय को बताया गया कि उसके पिछले आदेश से तीन सप्ताह पहले 80,000 दावे दायर किए गए। उसके बाद के सप्ताह में 95,000 दावे दायर किए गए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ ने चुनाव आयोग की दलील दर्ज की कि दावे/आपत्तियां समय-सीमा (1 सितंबर) के बाद भी प्रस्तुत की जा सकती हैं। सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद उन पर विचार किया जाएगा। चुनाव आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया नामांकन की अंतिम तिथि तक जारी रहेगी और सभी प्रविष्टियाँ/छूट अंतिम सूची में शामिल कर ली जाएंगी, जिसे न्यायालय ने दर्ज कर लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय ने टिप्पणी की: "समय विस्तार के संबंध में चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तुत नोट में कहा गया कि 1 सितंबर के बाद दावे/आपत्ति या सुधार दाखिल करने पर रोक नहीं है। यह कहा गया कि दावे/आपत्ति/सुधार समय सीमा के बाद यानी 1 सितंबर के बाद भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं। सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद उन पर विचार किया जाएगा। यह प्रक्रिया नामांकन की अंतिम तिथि तक जारी रहेगी और सभी प्रविष्टियाँ/छूट अंतिम सूची में शामिल कर ली जाएंगी। इस दृष्टिकोण के आलोक में दावे/आपत्ति/सुधार दाखिल करने का काम जारी रखा जाए। इस बीच राजनीतिक दल/याचिकाकर्ता नोट के जवाब में अपने हलफनामे प्रस्तुत कर सकते हैं।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष से अनुरोध किया कि वे कल (मंगलवार) दोपहर से पहले सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को अर्ध-विधिक स्वयंसेवकों को उनके नाम और मोबाइल नंबर सहित नियुक्त/अधिसूचित करने के निर्देश जारी करें, जो व्यक्तिगत मतदाताओं और राजनीतिक दलों को दावे, आपत्तियां या सुधार ऑनलाइन प्रस्तुत करने में सहायता करेंगे। इसके बाद प्रत्येक अर्ध-विधिक स्वयंसेवक संबंधित जिला जज को एक गोपनीय रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। न्यायालय ने आदेश दिया कि अर्ध-विधिक स्वयंसेवकों से एकत्रित की गई यह जानकारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के स्तर पर एकत्रित की जा सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि राजनीतिक दल मसौदा सूची से मतदाताओं के नाम हटाने की मांग कर रहे हैं, न कि उन्हें शामिल करने का दावा, जिसे उन्होंने "बहुत अजीब" बताया। राजद द्वारा समय-सीमा बढ़ाने की मांग के आवेदन के संबंध में द्विवेदी ने कहा कि उनकी एकमात्र शिकायत यह है कि उनके द्वारा दायर की गई आपत्तियां उनके नामों में नहीं दिखाई गईं। उन्होंने बताया कि 7.24 करोड़ मतदाताओं में से 99.5% ने अपने फॉर्म दाखिल कर दिए। 22 अगस्त को न्यायालय के आदेश के बाद ड्राफ्ट से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं में से केवल 33,326 (व्यक्तिगत) और 25 दावे (पार्टियों के माध्यम से) ही शामिल किए जाने के लिए प्रस्तुत किए गए। उन्होंने आगे बताया कि 1,34,738 आपत्तियां बाहर किए जाने के लिए दायर की गईं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि चुनाव आयोग के अधिकारी अपने ही नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। एडवोकेट निज़ाम पाशा ने दावा किया कि बीएलओ फॉर्म स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं। राजद की ओर से सीनियर एडवोकेट शोएब आलम ने कहा कि न्यायालय द्वारा 22 अगस्त तक अपने आदेश के अनुसार आधार के उपयोग की अनुमति देने के बाद समय-सीमा से केवल नौ दिन पहले ही रह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय राजद सांसद मनोज कुमार झा और बिहार के विधायक अख्तरुल ईमान सहित राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा दायर आवेदनों पर विचार कर रहा था, जिनमें 1 सितंबर की समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई। पिछले सप्ताह इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए भेजा गया, जब न्यायालय को बताया गया कि उसके पिछले आदेश से तीन सप्ताह पहले 80,000 दावे दायर किए गए। उसके बाद के सप्ताह में 95,000 दावे दायर किए गए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने पिछले आदेश में न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह लगभग 65 लाख बहिष्कृत मतदाताओं को अपने आधार कार्ड के साथ ऑनलाइन माध्यम से शामिल होने के लिए आवेदन जमा करने की अनुमति दे। मामले को 8 सितंबर के लिए स्थगित करते हुए न्यायालय ने उक्त अवसर पर पक्षकारों को मौखिक रूप से आश्वासन दिया कि समय सीमा बढ़ाने के अनुरोध पर बाद में विचार किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इससे पहले, 14 अगस्त को न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट के साथ-साथ जिला निर्वाचन अधिकारियों की वेबसाइटों पर बहिष्कृत 65 लाख मतदाताओं के नाम, उनके बहिष्करण के कारणों सहित, प्रकाशित करे। यह जानकारी EPIC-खोज योग्य प्रारूप में प्रदर्शित की जानी थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/154355/%C2%A0%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%B8%E0%A4%86%E0%A4%88%E0%A4%86%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6</link>
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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 15:14:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिहार: वोटर लिस्ट संशोधन की समय सीमा बढ़ाने पर 1 सितंबर को सुप्रीम सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 29 अगस्त को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की याचिका पर 1 सितंबर को सुनवाई करने का फैसला किया। इसमें मांग की गई है कि बिहार में चल रहे मतदाता सूची संशोधन में दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समय सीमा बढ़ाई जाए। यह दिलचस्प है कि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की वर्तमान समय सीमा भी 1 सितंबर को समाप्त हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने शुक्रवार को वकील प्रशांत भूषण और वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने फौरन उल्लेख की मांग की तो कोर्ट ने सोमवार के लिए इसे सूचीबद्ध किया। जस्टिस</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154217/supreme-hearing-on-1-september-on-extending-the-deadline-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/download-(2)3.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 29 अगस्त को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की याचिका पर 1 सितंबर को सुनवाई करने का फैसला किया। इसमें मांग की गई है कि बिहार में चल रहे मतदाता सूची संशोधन में दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समय सीमा बढ़ाई जाए। यह दिलचस्प है कि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की वर्तमान समय सीमा भी 1 सितंबर को समाप्त हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने शुक्रवार को वकील प्रशांत भूषण और वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने फौरन उल्लेख की मांग की तो कोर्ट ने सोमवार के लिए इसे सूचीबद्ध किया। जस्टिस कांत ने पूछा कि क्या समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध पहले चुनाव आयोग से किया गया था, तो प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि आयोग को अनुरोध भेजा गया था, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आरजेडी ने अपनी याचिका में आयोग को निर्देश देने की मांग की है कि दावों की अवधि को दो सप्ताह बढ़ाकर 15 सितंबर तक की जाए। पार्टी ने डिलिटेड मतदाताओं से आवेदनों में तेज वृद्धि का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है, "चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) अपडेट के अनुसार, दावों की संख्या बढ़ी है और पिछले एक सप्ताह में एक लाख से अधिक दावे दर्ज किए गए हैं। पिछले दो दिनों में 33,349 दावे दाखिल हुए हैं। दावे दर्ज करने की अवधि 01-09-2025 को समाप्त हो रही है। यदि इसे बढ़ाया नहीं गया, तो जिन वास्तविक मतदाताओं के नाम गलती से हटा दिए गए हैं, वे अपने दावे प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे और आगामी चुनावों में मतदान के अधिकार से वंचित रह जाएंगे।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आरजेडी ने यह भी तर्क दिया है कि छोटी समय सीमा "मतदाता सूची की शुद्धता" को प्रभावित कर सकती है। वकील फौजिया शकील की याचिका में कहा गया है कि 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के आधार कार्ड को दावों के लिए पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने के आदेश के बाद, "22-08-2025 को 84,305 से बढ़कर 27-08-2025 को केवल पांच दिनों में 1,78,948 मतदाताओं के दावे दोगुने हो गए।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आरजेडी ने आरोप लगाया कि कई मतदाता अधिकारी 24 जून की चुनाव आयोग की अधिसूचना में सूचीबद्ध 11 पहचान दस्तावेजों में से ही एक की मांग कर रहे हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के उस स्पष्टीकरण की अवहेलना करता है कि आधार कार्ड ही पर्याप्त होगा। पार्टी ने आयोग को 22 अगस्त के आदेश को प्रचारित करने और आधार के साथ दाखिल दावों को स्वीकार करने तथा दैनिक स्थिति रिपोर्ट में शामिल करने के निर्देश देने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शुक्रवार का घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिहार की राजनीतिक पार्टियों को उनकी "निष्क्रियता" के लिए फटकार लगाने के एक सप्ताह बाद आया है। कोर्ट ने कहा था कि 6.5 मिलियन मतदाताओं को ड्राफ्ट सूची से हटाया गया था। 22 अगस्त को, जस्टिस जॉयमाल्या बागची के साथ पीठ ने नोट किया कि 1.6 लाख से अधिक बूथ-स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त होने के बावजूद, पार्टियों ने केवल दो आपत्तियां दर्ज की थीं। पीठ ने टिप्पणी की, "हमें राजनीतिक पार्टियों की निष्क्रियता पर आश्चर्य है। बीएलए नियुक्त करने के बाद उन्होंने क्या किया? पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच इतनी दूरी क्यों है? वे इन लोगों को अच्छी तरह जानते हैं।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने प्रक्रिया को मतदाता-अनुकूल बनाने के लिए स्पष्ट किया कि दावे आधार या 11 स्वीकृत पहचान दस्तावेजों के साथ दाखिल किए जा सकते हैं, और भौतिक दाखिल करना अनिवार्य नहीं है। इसने बूथ-स्तरीय अधिकारियों को सभी दावों की पावती देने और आयोग से आपत्तियों को ऑनलाइन अपलोड करने पर विचार करने को कहा।</div>
<div style="text-align:justify;">21 अगस्त को दायर हलफनामे में, ईसीआई ने कहा कि उसने 6.5 मिलियन डिलीट मतदाताओं की बूथ-वार सूची बिहार के 38 जिला निर्वाचन अधिकारियों और मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइटों पर प्रकाशित की। जिसमें बहिष्करण के कारण मृत्यु, प्रवास या दोहराव उल्लिखित हैं। ये सूचियां पंचायत कार्यालयों में प्रदर्शित की गईं और बूथ-स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) और बीएलए के साथ साझा की गईं। प्रचार अभियान अखबारों, रेडियो, सोशल मीडिया और ब्लॉक/गांव कार्यालयों में नोटिस के माध्यम से चलाया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एसआईआर विवाद बिहार विधानसभा चुनावों से पहले एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। विपक्षी इंडिया गठबंधन ने ईसीआई पर लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया है और चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर दोहराई जा सकती है। वहीं, आयोग ने संशोधन का बचाव करते हुए कहा कि बिहार की मतदाता सूची को लगभग दो दशकों में गहन संशोधन नहीं किया गया था। कोर्ट में आयोग के वकील द्विवेदी ने कहा, "पार्टियों का प्रदर्शन करने के बजाय वास्तविक मतदाताओं की मदद करना अधिक रचनात्मक होगा।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार में इस समय नेता विपक्ष राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा चल रही है। इस यात्रा ने विपक्ष के वोट चोरी के आरोपों को जनता के बीच पहुंचा दिया है। लोग राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होकर बता रहे हैं कि वो जिन्दा हैं, फिर भी मतदाता सूची में उन्हें मृत के रूप में दिखा दिया गया है। कई मृत लोगों ने राहुल गांधी के साथ रैली में मंच पर भी अपने को सबूत के रूप में पेश किया।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e" style="text-align:justify;"> </div>
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</div>
<div class="ajx" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="gA gt acV">
<div class="gB xu">
<div class="mVCoBd" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="ip iq">
<div class="bJvOmf"> </div>
</div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 31 Aug 2025 21:21:20 +0530</pubDate>
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