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                <title>Donald Trump - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Donald Trump RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान पीस डील पर हस्ताक्षर, यूएस झुका- पैसे भी देगा, होर्मुज़ खुलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते</span></p></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181546/america-iran-peace-deal-signed-us-bowed-%E2%80%93-will-also-give"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते के सफल होने से न केवल तेल की वैश्विक कीमतें स्थिर होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराने तनाव को कूटनीतिक रास्ते से सुलझाने का एक नया रास्ता खुलेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समझौते को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का नाम दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन से मुलाकात के दौरान इस समझौते की हार्ड कॉपी पर भी हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह साइन हो चुका है। मैंने अभी-अभी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।" दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और अन्य अधिकारियों ने भी इसे डिजिटल रूप से साइन किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने भी इस पर बयान जारी कर कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू होगा। पहले कदम के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान तुरंत हॉर्मुज जलडमरूमध्य </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को खोल देगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्हाइट हाउस और ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए समझौते के मुख्य प्वाइंट इस प्रकार हैं:</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल युद्धविराम: अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों (लेबनान सहित) पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य अभियानों को समाप्त करने की घोषणा करते हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग की धमकी या हमला नहीं करेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का सम्मान: दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों की समयसीमा: दोनों पक्ष अधिकतम </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते (</span>Final Deal) <span lang="hi" xml:lang="hi">पर बातचीत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का अंत: समझौते पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा और </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर इसे पूरी तरह खत्म कर देगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेना की वापसी: अंतिम समझौते के </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के नजदीकी इलाकों से अपनी सेनाएं हटा लेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना: ईरान शुरुआती </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान के समुद्र तक वाणिज्यिक जहाजों (</span>Commercial Vessels) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सुरक्षित और मुफ्त आवागमन की व्यवस्था करेगा। </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर नौसैनिक और तकनीकी बाधाओं (जैसे बारूदी सुरंगें हटाना) को दूर किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य का प्रशासन: ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को परिभाषित करने के लिए ओमान और अन्य तटीय देशों के साथ बातचीत करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज: अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम </span>300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर (</span>USD $300 Billion) <span lang="hi" xml:lang="hi">की योजना विकसित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों की समाप्ति: एक तय समय सारणी के तहत अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के खिलाफ सभी एकतरफा (प्राइमरी और सेकेंडरी) प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (</span>UNSC) <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने का वचन देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु हथियारों पर रोक: ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम संवर्धन का निपटारा: ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार का निपटारा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (</span>IAEA) <span lang="hi" xml:lang="hi">की देखरेख में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऑन-साइट डाउन-ब्लेंडिंग</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम की क्षमता कम करना) के जरिए किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यथास्थिति (</span>Status Quo) <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाए रखना: अंतिम समझौता होने तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही रोके रखेगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल निर्यात को छूट और फंड की बहाली: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए तत्काल छूट (</span>Waivers) <span lang="hi" xml:lang="hi">जारी करेगा। साथ ही विदेशों में फ्रीज (जब्त) की गई ईरान की संपत्तियों को वापस इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निगरानी तंत्र की स्थापना: समझौते के सफल कार्यान्वयन और भविष्य के अनुपालन की निगरानी के लिए एक कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा। इस अंतिम समझौते को </span>UNSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के एक बाध्यकारी प्रस्ताव द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने पुष्टि की कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस समझौते पर अंग्रेजी और फारसी (</span>Farsi) <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों भाषाओं में हस्ताक्षर किए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अनुवाद को लेकर भविष्य में कोई मतभेद या कोई और व्याख्या न हो। ईरान ने अपनी केंद्रीय बैंक के साथ मिलकर जब्त संपत्तियों को वापस पाने के तकनीकी तौर-तरीकों को भी अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
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                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:07:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>भारतीय पत्रकार के लहजे पर ट्रंप की टिप्पणी</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="container-wrapper one_column"><div class="column-wrapper"><div class="control-wrapper"><div class="jg_paragraph"><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान एक भारतीय पत्रकार के बोलने के अंदाज और भारी आवाज को लेकर टिप्पणी की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना शुरू हो गई।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रेस वार्ता के दौरान भारतीय पत्रकार ने भारत-अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर सवाल पूछा। इस पर ट्रंप ने पत्रकार के लहजे पर टिप्पणी करते हुए कहा, "क्या तुम भारत से हो? मुझे लगा कि तुम जर्मनी से हो।" हालांकि, इसके तुरंत बाद उन्होंने कहा, "मैं सिर्फ मजाक कर रहा हूं। तुम भारत से हो, यह बहुत अच्छी</p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180700/i-thought-you-were-from-germany-but-you-are-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/donald-trump-2-780x470.webp" alt=""></a><br /><div class="container-wrapper one_column"><div class="column-wrapper"><div class="control-wrapper"><div class="jg_paragraph"><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान एक भारतीय पत्रकार के बोलने के अंदाज और भारी आवाज को लेकर टिप्पणी की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना शुरू हो गई।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रेस वार्ता के दौरान भारतीय पत्रकार ने भारत-अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर सवाल पूछा। इस पर ट्रंप ने पत्रकार के लहजे पर टिप्पणी करते हुए कहा, "क्या तुम भारत से हो? मुझे लगा कि तुम जर्मनी से हो।" हालांकि, इसके तुरंत बाद उन्होंने कहा, "मैं सिर्फ मजाक कर रहा हूं। तुम भारत से हो, यह बहुत अच्छी बात है।"</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके बाद ट्रंप ने पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत हैं तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके अच्छे मित्र हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच जल्द ही व्यापार समझौता हो जाएगा।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नई दिल्ली के साथ संभावित ट्रेड डील पर ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों से काफी लाभान्वित हो रहा है और दोनों देश बहुत जल्द किसी समझौते पर पहुंचेंगे।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्रंप की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने प्रतिक्रिया दी। कुछ यूजर्स ने इसे अनुचित और अपमानजनक बताया, जबकि अन्य ने इसे नस्लीय पूर्वाग्रह से जोड़कर आलोचना की। एक यूजर ने लिखा कि ऐसे बयान किसी राष्ट्रपति के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं, जबकि दूसरे ने इसे नस्लवाद का उदाहरण बताया।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ट्रंप प्रशासन ने भारत सहित करीब 60 अर्थव्यवस्थाओं से होने वाले आयात पर अतिरिक्त 12.5 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। इसके बावजूद हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में तेजी देखी गई है।</p><p style="text-align:justify;">भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में है और केवल कुछ मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। वहीं, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी संकेत दिया है कि समझौते के अधिकांश पहलुओं पर सहमति बन चुकी है और अब वार्ता शेष बिंदुओं को अंतिम रूप देने पर केंद्रित है।</p></div></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 19:40:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बनता - अब्राहम समझौता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180143/new-approach-to-understanding-womens-hormonal-health"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/abraham-accords.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति हेतु एक बार फिर सभी मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ मित्रता कर अब्राहम समझौता करने की बात छेड़कर पाकिस्तान की हुकूमत और सेना प्रमुख की नींद उड़ा दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी कूटनीति के हिसाब से ईरान समझौते से ज्यादा मध्य पूर्व के देशों के बीच अब्राहम समझौता जरूरी है। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान समझौते पर जल्दबाज़ी न दिखाकर अब्राहम समझौते पर मुस्लिम देशों की राजनीति गरमा दी है। बकौल अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्राहम समझौता पश्चिम एशिया के सभी देशों की आर्थिक उन्नति का समझौता है। इसलिए भविष्य में मुस्लिम देशों को अपने व्यापारिक हितों के लिए आंतरिक मतभेदों को भूलकर अब्राहम समझौते पर सहमत होना पड़ेगा और जो राष्ट्र इस समझौते से इतर जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें स्वाभाविक रूप से अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और रूस जैसे महाशक्तिशाली देशों की नाराज़गी भी सहनी पड़ सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के अब्राहम समझौते पर कई मुस्लिम देशों ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ा भी दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम भी सार्थक निकल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तानी हुक्मरानों को अब्राहम समझौते पर सहमति देकर इजराइल के साथ संबंध बेहतर करने की बात से ही पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल मच गया है। पाकिस्तान ने इजराइल को कभी एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसकी वजह पाकिस्तान का फिलिस्तीनी प्रेम रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दुनिया के करीब सौ से ज्यादा देश इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच शांति मध्यस्थता करवाने वाले देश पहले अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर कर इजराइल से संबंध बेहतर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पाकिस्तान में सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेना और कट्टरपंथी आतंकी ताकतों के बीच घमासान मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अब्राहम समझौते वाली बात ने पाकिस्तान को एक बार फिर  गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए अब अब्राहम समझौता  गले की हड्डी बनता जा रहा है। यदि वे इसे स्वीकार करते हैं तो निश्चित ही पाकिस्तान में सत्ता और सेना के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का तीखा विरोध झेलना पड़ेगा और यदि पाकिस्तान अब्राहम समझौते से इंकार कर देता है तो फिर अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से उसका हुक्का-पानी बंद होना तय माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा अब्राहम समझौते को स्वीकार करने से इंकार करने के बाद पाकिस्तान के शांति का मसीहा बनने का दावे का झूठ भी उजागर हो चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोचना हो रही है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य पूर्व के देशों को अमेरिकी दबदबे को कम करने और अपनी आर्थिक उन्नति के लिए आपसी दुश्मनी को भुलाकर साझा व्यापार कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने हेतु अब्राहम समझौते को अपनाना ही होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश मनभेद रखकर इस समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे या तो गृहयुद्ध में स्वयं खत्म हो जाएंगे या फिर अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के दबाव में कमजोर पड़ जाएंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के नए शांति प्रस्ताव पर कई मुस्लिम देश मंथन कर रहे हैं और इसे मानवीय शांति का सबसे बड़ा समझौता कह रहे हैं। उम्मीद है कि अमेरिकी संबंधों और कूटनीति के चलते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले दिनों में </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब , कतर, तुर्की और ईरान </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी अब्राहम समझौते को स्वीकारते नजर आएं तो हैरानी नहीं होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः वर्षों से युद्ध की त्रासदी भुगत रहे मध्य पूर्व के देशों के लोगों के लिए अब्राहम समझौता मानवीय शांति का सबसे बड़ा उपहार साबित हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:43:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिकी हमलों के बावजूद अडिग ईरान : मिसाइल ताकत बरकरार, दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179243/irans-missile-power-intact-despite-us-attacks-not-ready-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों पर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान की मिसाइल क्षमता अब भी काफी हद तक सुरक्षित है और उसके अंडरग्राउंड नेटवर्क को अपेक्षित नुकसान नहीं पहुंचा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">खुफिया आकलनों के मुताबिक ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बचाने में सफल रहा है। इतना ही नहीं, उसके 90 प्रतिशत भूमिगत मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च नेटवर्क अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि ईरान ने वर्षों से जिस रणनीतिक तैयारी पर काम किया था, वह अमेरिकी हमलों के बावजूद पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित मिसाइल ठिकानों तक ईरान ने दोबारा पहुंच बना ली है। यह वही क्षेत्र है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार गुजरता है। यदि यहां अस्थिरता बढ़ती है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है कि वह तकनीकी और सैन्य रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत होने के बावजूद ईरान की “असममित युद्ध नीति” को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पा रहा। ईरान ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ऐसे नेटवर्क तैयार किए हैं जो भूमिगत सुरंगों, मोबाइल लॉन्चरों और विकेंद्रीकृत मिसाइल ठिकानों पर आधारित हैं। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी ईरान की जवाबी क्षमता खत्म नहीं हुई। रिपोर्टों के अनुसार उसके लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर सुरक्षित हैं। इन लॉन्चरों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें किसी भी इलाके में ले जाकर अचानक हमला किया जा सकता है। इससे विरोधी देश लगातार अनिश्चितता और दबाव में रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की रणनीति केवल सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है। उसने पिछले दो दशकों में अपने रक्षा ढांचे को इस प्रकार विकसित किया है कि बाहरी हमलों की स्थिति में भी उसका कमांड और कंट्रोल सिस्टम सक्रिय बना रहे। अमेरिकी और इजरायली हमलों के खतरे को देखते हुए ईरान ने अपने मिसाइल नेटवर्क को पहाड़ों के भीतर और भूमिगत सुरंगों में स्थापित किया। यही वजह है कि अत्याधुनिक बमबारी के बावजूद अमेरिका उसकी पूरी सैन्य क्षमता को नष्ट नहीं कर पाया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना कि “ईरान के सामने केवल दो रास्ते हैं—समझौता या पूर्ण विनाश”, राजनीतिक रूप से भले ही आक्रामक संदेश हो, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है। उसने समझौते के बदले युद्ध क्षतिपूर्ति, प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता की मान्यता जैसी शर्तें रखी हैं। यह दिखाता है कि ईरान खुद को कमजोर स्थिति में नहीं मानता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की इस निडरता के पीछे केवल सैन्य तैयारी ही नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक और राजनीतिक सोच भी जिम्मेदार है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान ने खुद को पश्चिमी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव के बावजूद उसने अपनी मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को लगातार विकसित किया। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी वहां की सत्ता व्यवस्था या सैन्य संरचना में कोई बड़ा टूटाव दिखाई नहीं देता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। ट्रम्प का चीन दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका चाहता है कि शी जिनपिंग ईरान पर दबाव डाले। चीन और ईरान के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध मजबूत रहे हैं। चीन पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। ऐसे में अमेरिका चीन को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति का समर्थन करेगा, इसकी संभावना कम दिखाई देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान के मुद्दे ने वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित किया है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। दुनिया के लगभग एक तिहाई समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी क्षेत्र से गुजरता है। ईरान कई बार संकेत दे चुका है कि यदि उसके खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाया गया तो वह इस मार्ग को बाधित कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की नीति अपना रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य संरचना का बचा रहना अमेरिकी रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे देशों में बड़े सैन्य अभियान चलाए, लेकिन लंबे समय में वहां स्थिरता स्थापित नहीं कर पाया। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है, क्योंकि यहां मजबूत राष्ट्रवादी भावना, संगठित सैन्य ढांचा और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क मौजूद हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और इराक-सीरिया के कई सशस्त्र समूह ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। इसलिए ईरान पर हमला केवल एक देश के खिलाफ कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित कर सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की मिसाइल क्षमता का बरकरार रहना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हवाई हमलों से नहीं जीते जा सकते। तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद जमीनी तैयारी, नेटवर्क आधारित रक्षा और रणनीतिक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ईरान ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि कोई देश लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से अपनी रक्षा नीति तैयार करे तो वह महाशक्तियों के सामने भी टिक सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज की स्थिति में अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान अपने अस्तित्व और संप्रभुता की लड़ाई के रूप में इसे प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान के भीतर भय या आत्मसमर्पण का माहौल नहीं दिखाई देता। बल्कि उसकी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह लंबे संघर्ष के लिए तैयार है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में शांति फिलहाल दूर नजर आती है। यदि बातचीत का रास्ता नहीं निकला तो आने वाले समय में यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है। लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका के लगातार हमलों और धमकियों के बावजूद ईरान की सैन्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह टूटी नहीं है। उसकी मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहना इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल ताकत का नहीं, बल्कि रणनीति, धैर्य और राजनीतिक संकल्प का भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:11:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिकी राष्ट्रपतियों पर जान जानलेवा हमले, अब्राहम लिंकन से लेकर डोनाल्ड ट्रंप तक सुरक्षा में चूक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका के राष्ट्रपतियों पर जानलेवा हमलों का इतिहास लोकतांत्रिक व्यवस्था की जटिलताओं, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सुरक्षा चुनौतियों का एक गंभीर अध्याय रहा है।जिसकी शुरुआत अब्राहम लिंकन की हत्या से मानी जाती है 14 अप्रैल 1865 को वॉशिंगटन डी.सी. के फोर्ड्स थिएटर में नाटक देखते समय अभिनेता जौंन विल्किस बूथ ने उन्हें गोली मार दी, जो गृहयुद्ध के बाद के तनावपूर्ण माहौल और दक्षिणी असंतोष का परिणाम था। इसके बाद 1881 में जेम्स ए गारफील्ड को चाल्र्स जे गेतयु ने गोली दागी थी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और यह घटना राजनीतिक संरक्षण  से उपजे गहरे असंतोष को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1901</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177387/deadly-attacks-on-american-presidents-security-lapses-from-abraham-lincoln"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/a1582dc0-4375-11ef-81b7-eb26ff9f97f3.jpg.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका के राष्ट्रपतियों पर जानलेवा हमलों का इतिहास लोकतांत्रिक व्यवस्था की जटिलताओं, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सुरक्षा चुनौतियों का एक गंभीर अध्याय रहा है।जिसकी शुरुआत अब्राहम लिंकन की हत्या से मानी जाती है 14 अप्रैल 1865 को वॉशिंगटन डी.सी. के फोर्ड्स थिएटर में नाटक देखते समय अभिनेता जौंन विल्किस बूथ ने उन्हें गोली मार दी, जो गृहयुद्ध के बाद के तनावपूर्ण माहौल और दक्षिणी असंतोष का परिणाम था। इसके बाद 1881 में जेम्स ए गारफील्ड को चाल्र्स जे गेतयु ने गोली दागी थी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और यह घटना राजनीतिक संरक्षण  से उपजे गहरे असंतोष को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1901 में विलियम मेकंली की हत्या लिओन ज़ोलगोस द्वारा की गई, जिसने अराजकतावादी विचारधारा से प्रेरित होकर यह हमला किया था। 20वीं सदी में सबसे चर्चित घटना 1963 में जॉन एफ केनेडी की हत्या है, जब ली हार्वे ओसवाल्ड ने टेक्सास के डलास में गोली चलाई, यह घटना एसेसिनेशन का जॉन एफ कैनेडी के रूप में इतिहास में दर्ज है और आज भी इसके षड्यंत्र सिद्धांतों पर बहस जारी है। हालांकि हर हमला सफल नहीं रहा, 1912 में पूर्व राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट पर चुनाव अभियान के दौरान गोली चलाई गई लेकिन वे बच गए थे और घायल अवस्था में भाषण भी दिया, जो उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस का प्रतीक बना था।</p>
<p style="text-align:justify;">1933 में राष्ट्रपति बनने से रूजवेल्ट सेकंड पर गोसीपी जेंगरा ने गोली चलाई, हालांकि निशाना चूक गया और शिकागो के मेयर की मृत्यु हो गई। 1950 में हेनरी ट्रूमैन पर प्लेयर हाउस के बाहर हमलावरों ने गोलीबारी की, जो प्यूर्टो रिकन राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़े थे, लेकिन ट्रूमैन सुरक्षित बच गए । 1975 मे गेराल्ड फोर्ड पर दो अलग-अलग महिलाओं  ने हमले किए, जो उस समय के सामाजिक उथल-पुथल और अतिवादी मानसिकता को दर्शाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">1981 में रोनाल्ड रीगन पर  गोली चलाई, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए लेकिन वे सुरक्षित बच गए थे, यह घटना मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा तंत्र की समीक्षा का कारण बनी।आधुनिक समय में भी खतरे समाप्त नहीं हुए हैं, 21वीं सदी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर चुनावी रैलियों के दौरान हमले या प्रयासों की खबरें सामने आईं, और वर्तमान में वॉशिंगटन डीसी में एक समारोह के दौरान उन पर गोलियां चलाई गई वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य सुरक्षित रहे। यह सारी घटनाएं बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण और हिंसात्मक प्रवृत्तियों का संकेत देती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन घटनाओं के बीच एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप मे अमेरिका की खुफिया एजेंसी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, जिसकी स्थापना मूलतः वित्तीय अपराधों की जांच के लिए हुई थी लेकिन बाद में राष्ट्रपति सुरक्षा इसकी प्रमुख जिम्मेदारी बन गई। इन हमलों के पीछे विभिन्न कारण रहे हैं राजनीतिक असंतोष, वैचारिक चरमपंथ, मानसिक अस्थिरता, नस्लीय तनाव, और कभी-कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या प्रसिद्धि पाने की चाह जो अमेरिकी समाज के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी अत्यंत उल्लेखनीय है कि प्रत्येक घटना के बाद सुरक्षा प्रोटोकॉल और खुफिया तंत्र को और अधिक सुदृढ़ किया गया, जैसे खुले मंचों पर राष्ट्रपति की उपस्थिति को नियंत्रित करना, बुलेटप्रूफ वाहनों और जैकेट्स का उपयोग, तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू करना आदि  फिर भी लोकतांत्रिक समाज में जनता से सीधा संपर्क बनाए रखना एक चुनौती बना रहता है, क्योंकि सुरक्षा और लोकतांत्रिक खुलापन दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्र में भी सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं और यह केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि समाज की वैचारिक दिशा, राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक संतुलन का भी दर्पण है, जहां हर हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके मूल्यों पर भी आघात होता ।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका जैसे शक्ति संपन्न राष्ट्र के सर्वाधिक सुरक्षित देश के प्रथम व्यक्ति राष्ट्रपति पर जानलेवा हमले हो सकते हैं और उनकी जान भी जाती रही है तो कल्पना कीजिए कि अन्य विकासशील राष्ट्रों के राष्ट्रीय प्रमुख कितने सुरक्षित हैं। वैसे भी राजनीति कांटों से भर तक माना जाता है और राजनेताओं की जिंदगी भी असुरक्षित ही मानी गई है। इसीलिए सुरक्षागत उपकरणों उपाय और सिद्धांतों को प्रथम प्राथमिकता दी जानी चाहिए।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:22:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डोनाल्ड ट्रंप अपनी नीतियों से ही घिरे, अमेरिकी संसद और इजरायल ट्रंप के नियंत्रण से बाहर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174664/donald-trump-surrounded-by-his-own-policies-us-parliament-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/american-president-donald-trump-bbc-apologises-.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में अलग-अलग शहरों में ट्रंप की नीतियों का खुलकर विरोध कर रही है। परिणाम स्वरूप ट्रंप का आत्मविश्वास अब धीरे-धीरे डगमगाने लगा है और ट्रंप अपने बौद्धिक तथा युद्ध की नीतियों को लागू करने में घबराने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच युद्ध की संभावनाएँ ट्रंप प्रशासन को अपेक्षाकृत अलग-थलग करती नजर आ रही हैं।दूसरी ओर मध्य पूर्व में इजरायल डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के नियंत्रण से बाहर हो गया है इजरायल की स्थिति भी बहुस्तरीय दबावों से घिरी हुई है जहाँ बेंजामिन नेतनाहू की सरकार को एक तरफ सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती है तो दूसरी तरफ लगातार सैन्य अभियानों के कारण सैनिकों की थकान, रिजर्व बलों पर बढ़ती निर्भरता और युद्ध की लंबी अवधि से उपजा मानसिक तनाव एक गंभीर चिंता बन चुका है। कई विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि निरंतर युद्ध जैसी परिस्थितियों ने इजराइली सैनिकों की मनोबल और कार्यक्षमता दोनों को प्रभावित किया है जिससे भविष्य के अभियानों की गति और प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं ईरान अपनी रणनीति के तहत प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए क्षेत्रीय सहयोगियों, प्रॉक्सी समूहों और सामरिक दबाव के माध्यम से संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ईरान को अब हुति समूह का प्रत्यक्ष लाभ मिलना भी शुरू हो गया यह समूह लगातार इसराइल पर अलग-अलग तरीके से हमले करने लगा है। जिससे संघर्ष एक बहु-स्तरीय और अप्रत्यक्ष युद्ध का रूप लेता जा रहा है। यह स्थिति खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य वैश्विक संस्थाएँ शांति की अपील तो कर रही हैं लेकिन उनका प्रभाव सीमित होता जा रहा है जिससे कूटनीतिक प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका का आंतरिक विरोध, इजराइल की सैन्य थकान, ईरान की रणनीतिक सक्रियता और वैश्विक शक्तियों की संतुलनकारी भूमिका मिलकर एक ऐसे जटिल भू-राजनीतिक संकट को जन्म दे रही हैं जहाँ किसी भी छोटी घटना से व्यापक युद्ध भड़कने की आशंका बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह टकराव नियंत्रित नहीं हुआ तो यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित न रहकर वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक पुनर्संतुलन का कारण बन सकता है और यदि युद्ध परमाणु युद्ध में बदल जाता है तो वैश्विक स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी उसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया में मानवता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। आगामी युद्ध यदि परमाणु युद्ध में परिणत होता है तो यह युद्ध पिछले दो विश्व युद्ध और परमाणु युद्ध से ज्यादा भयानक होगा इसमें पूरे विश्व को नई मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है एवं पूरे विश्व में हाहाकार होने की संभावना बलवती हो गई है ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:21:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>US–Israel–Iran War: ग्राउंड ऑपरेशन से इनकार नहीं, रक्षा सचिव बोले– लंबी लड़ाई के लिए तैयार अमेरिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी रक्षा सचिव <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Pete Hegseth</span></span> ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि फिलहाल ईरान की जमीन पर कोई अमेरिकी सैनिक तैनात नहीं है, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की घोषणा</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने बताया कि राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> के निर्देश पर “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया गया है। उनके मुताबिक यह अब तक के सबसे सटीक और जटिल हवाई अभियानों में से एक है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा करना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172293/us%E2%80%93israel%E2%80%93iran-war-ground-operation-not-ruled-out-defense-secretary-said"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/iran-attack-sharjah-1772429613.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी रक्षा सचिव <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Pete Hegseth</span></span> ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि फिलहाल ईरान की जमीन पर कोई अमेरिकी सैनिक तैनात नहीं है, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की घोषणा</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने बताया कि राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> के निर्देश पर “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया गया है। उनके मुताबिक यह अब तक के सबसे सटीक और जटिल हवाई अभियानों में से एक है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा करना और ईरान की दशकों पुरानी शत्रुता का जवाब देना है।हेगसेथ ने कहा कि सैन्य रणनीति पहले से सार्वजनिक करना समझदारी नहीं होती। “दुश्मन को यह नहीं पता होना चाहिए कि अमेरिका कब और क्या कदम उठाएगा,” उन्होंने कहा।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>ग्राउंड ऑपरेशन पर क्या बोले?</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका भविष्य में ईरान में जमीनी सेना भेज सकता है, तो उन्होंने साफ किया कि जरूरत पड़ने पर ऐसा कदम उठाया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने दोहराया कि अमेरिका बिना सोचे-समझे कोई कार्रवाई नहीं करेगा।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>ईरानी जवाबी हमले और अमेरिकी सैनिकों की मौत</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और इजराइल की संयुक्त कार्रवाई के बाद ईरान और उसके सहयोगी समूहों ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइल पर मिसाइल हमले किए। इन हमलों में चार अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि संघर्ष और लंबा खिंच सकता है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>47 साल की दुश्मनी का जिक्र</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">हेगसेथ ने कहा कि तेहरान का शासन पिछले 47 वर्षों से अमेरिका के खिलाफ “अप्रत्यक्ष युद्ध” करता रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Islamic Revolutionary Guard Corps</span></span> और उसकी कुद्स फोर्स ने विभिन्न हमलों को समर्थन दिया।उन्होंने यह भी कहा कि “हमने यह युद्ध शुरू नहीं किया, लेकिन हम इसे खत्म करेंगे।” उनके अनुसार, यह सरकार बदलने की औपचारिक लड़ाई नहीं है, बल्कि अमेरिकी नागरिकों और हितों की सुरक्षा का सवाल है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘हम जीतने के लिए लड़ते हैं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका “जीतने के लिए लड़ता है” और लंबे समय तक अनिश्चित संघर्ष में उलझने का इरादा नहीं रखता। उन्होंने कहा कि यदि कहीं भी अमेरिकियों को निशाना बनाया गया, तो अमेरिका बिना हिचकिचाहट जवाब देगा।मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह संघर्ष सीमित हवाई कार्रवाई तक रहेगा या जमीनी अभियान का रूप ले सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/172293/us%E2%80%93israel%E2%80%93iran-war-ground-operation-not-ruled-out-defense-secretary-said</link>
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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 22:05:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईरान पर हमले तेज होंगे, ‘बड़ी लहर आनी बाकी’ – ट्रंप की नई चेतावनी; इस्फहान न्यूक्लियर साइट पर धमाके</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई अभी और तेज हो सकती है और “बड़ी लहर आनी बाकी है।” एक इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सेना चार से पांच सप्ताह तक अभियान जारी रख सकती है। इसी बीच ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु ठिकाने पर नए धमाकों की खबरें सामने आई हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘तीव्रता बनाए रखना मुश्किल नहीं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के लिए लड़ाई की तीव्रता बनाए रखना कठिन नहीं होगा। उनका दावा है कि लक्ष्य ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172291/attacks-on-iran-will-intensify-big-wave-yet-to-come"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/4a8d6460-fcf6-11f0-9c55-8bade468c676.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई अभी और तेज हो सकती है और “बड़ी लहर आनी बाकी है।” एक इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सेना चार से पांच सप्ताह तक अभियान जारी रख सकती है। इसी बीच ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु ठिकाने पर नए धमाकों की खबरें सामने आई हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘तीव्रता बनाए रखना मुश्किल नहीं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के लिए लड़ाई की तीव्रता बनाए रखना कठिन नहीं होगा। उनका दावा है कि लक्ष्य ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह निष्क्रिय करना है। हालांकि, उन्होंने सैन्य रणनीति के विस्तृत विवरण साझा नहीं किए।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>शासन परिवर्तन पर विरोधाभासी संकेत</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर ट्रंप के बयान अलग-अलग संकेत देते नजर आए। एक ओर उन्होंने उम्मीद जताई कि ईरान के विशेष सैन्य बल, जिनमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Islamic Revolutionary Guard Corps</span></span> के अधिकारी शामिल हैं, अंततः जनता के सामने हथियार डाल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अपनाया गया मॉडल “आदर्श परिदृश्य” था। उन्होंने <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Nicolás Maduro</span></span> का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस समय उन्होंने विशेष बलों को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। हालांकि, ईरान में सर्वोच्च नेतृत्व को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि उनके पास “तीन अच्छे विकल्प” हैं, लेकिन फिलहाल उनका खुलासा नहीं करेंगे।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘फैसला ईरानी जनता पर’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार को हटाने का फैसला अंततः ईरानी जनता पर निर्भर करेगा। उनके मुताबिक, “वे वर्षों से बदलाव की बात कर रहे हैं, अब उन्हें अवसर मिलेगा।” यह बयान उनके पहले दिए गए वेनेजुएला मॉडल के संकेत से अलग माना जा रहा है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>सार्वजनिक मंच से दूरी, सोशल मीडिया पर घोषणाएं</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई से जुड़ी जानकारी मुख्य रूप से इंटरनेट मीडिया के जरिए साझा की है। तड़के जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने बड़े सैन्य हमले की घोषणा की। इसके बाद भी उनकी टिप्पणियां वीडियो संदेशों और चुनिंदा पत्रकारों से बातचीत तक सीमित रहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट्स के मुताबिक, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Ali Khamenei</span></span> को लेकर आई खबरों पर भी उन्होंने कोई औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। बताया गया कि वह पाम बीच स्थित अपने निजी क्लब <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Mar-a-Lago</span></span> में मौजूद थे और वहीं सीमित दायरे में जानकारी साझा की।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>रणनीति और पारदर्शिता पर सवाल</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">हमले से पहले भी ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से विस्तृत रणनीतिक तर्क पेश नहीं किए थे। अब लगातार सोशल मीडिया के माध्यम से की जा रही घोषणाओं के चलते उनकी रणनीति और पारदर्शिता को लेकर विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 21:49:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>दुनिया के लिए मुसीबत बन रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद अमेरिकी जनता से यूक्रेन युद्ध रुकवाने का वादा किया था. लेकिन नया साल शुरू होते ही उनके कदम दुनिया में शांति के बजाय तनाव और टकराव को बढ़ाते नजर आ रहे हैं. यूक्रेन युद्ध अभी खत्म भी नहीं हुआ कि मिडिल ईस्ट में आग भड़क चुकी है. इस बीच अब अमेरिका-रूस के बीच सीधा टकराव वैश्विक चिंता का कारण बन गया है. सवाल उठने लगा है कि क्या ट्रंप दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल रहे हैं?हाल ही में अमेरिका ने उत्तरी अटलांटिक महासागर में रूसी झंडे वाले तेल टैंकर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/165580/donald-trump-is-becoming-a-problem-for-the-world"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद अमेरिकी जनता से यूक्रेन युद्ध रुकवाने का वादा किया था. लेकिन नया साल शुरू होते ही उनके कदम दुनिया में शांति के बजाय तनाव और टकराव को बढ़ाते नजर आ रहे हैं. यूक्रेन युद्ध अभी खत्म भी नहीं हुआ कि मिडिल ईस्ट में आग भड़क चुकी है. इस बीच अब अमेरिका-रूस के बीच सीधा टकराव वैश्विक चिंता का कारण बन गया है. सवाल उठने लगा है कि क्या ट्रंप दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल रहे हैं?हाल ही में अमेरिका ने उत्तरी अटलांटिक महासागर में रूसी झंडे वाले तेल टैंकर ‘मरीनेरा’ को जब्त कर लिया है. यह कार्रवाई अमेरिकी कोस्ट गार्ड और सेना के संयुक्त ऑपरेशन में की गई. अमेरिकी दावा है कि यह टैंकर प्रतिबंधों का उल्लंघन कर अवैध रूप से वेनेजुएला का तेल ले जा रहा था. यह वही टैंकर है जिसका पुराना नाम ‘बेला-1’ था और जिस पर 2024 में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे. बाद में इसका नाम बदलकर मरीनेरा कर दिया गया. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसे अक्सर सैन्य विस्तार, आर्थिक प्रभुत्व और सांस्कृतिक प्रभाव के मिश्रण के रूप में समझा जाता है, आज प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद की जगह नीतिगत दबाव, वैश्विक संस्थानों, तकनीकी व वित्तीय ताकत के जरिए संचालित होता है। भारत के संदर्भ में यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत एक ओर उभरती महाशक्ति है, तो दूसरी और अपने ऐतिहासिक गुटनिरपेक्ष रुख और रणनीतिक स्वायत्तता पर गर्व करता है। बहरहाल, भारत और अमेरिका के रिश्ते इस वक्त ऐसी ढलान पर हैं जहां तनाव हर बीतते दिन के साथ गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ तीखी बयानबाजी और टेरिफ बढ़ाने की धमकियां अब सिर्फ जुबानी नहीं रही। बात अब अमेरिकी संसद तक पहुंच गई। दरअसल अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा कानून आने वाला है जो भारत के लिए काफी भारी पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वो ऐसे कि अमेरिकी सीनेट में रूस पर प्रतिबंध अधिनियम 2025 लाने की तैयारी है। यह बिल अमेरिका के दो सीनेटरों- लिंसे ग्राहम और रिचर्ड लुमथन ने मिलकर तैयार किया है। जिसे व्हाइट हाउस की हरी झंडी मिल चुकी है। मकसद साफ है रूस की आर्थिक नसों को काटना। लेकिन इसकी चपेट में भारत भी आता दिखाई दे रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से जमकर सस्ता कच्चा तेल खरीदा है। लेकिन अब अमेरिका इसे बर्दाश्त करने के मूड में नहीं। इस नए बिल के तहत एक बेहद खतरनाक प्रावधान जोड़ा गया है। अगर रूस शांति वार्ता के लिए नहीं झुकता तो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत तक का टेरिफ लगा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत पर अमेरिका ने पहले ही रूसी तेल को लेकर अतिरिक्त टेरिफ लगाए हैं। दूसरी ओर, लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और व्यापारिक तनाव के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ व्यवहार में सावधानी बरती है। इसका एक प्रमुख कारण दुर्लभ खनिजों, इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण घटकों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरणों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर बीजिंग का प्रभुत्व है। भले ही चीन रूसी तेल का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, लेकिन उस पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाए गए हैं। इसके बजाय, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीनी आयात पर नए शुल्क को स्थगित कर दिया, जिससे शुल्क 30 प्रतिशत पर बना रहा, जो भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क से काफी कम है। इसके विपरीत, भारत के पास चीन जैसी रणनीतिक ताकत नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से नई दिल्ली रियायती दरों पर रूसी तेल का एक प्रमुख खरीदार बन गया है, लेकिन महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चीन की तरह उसका कोई दबदबा नहीं है। ट्रंप ने भारत की व्यापार नीतियों पर बार-बार असंतोष जताया है और नई दिल्ली पर अमेरिकी वस्तुओं पर उच्च शुल्क और बाधाएं बनाए रखने का आरोप लगाया है। कुल 50 प्रतिशत के ये शुल्क भारत द्वारा रूसी तेल की भारी मात्रा में खरीद के कारण लगाए गए हैं, जिसे अमेरिका यूक्रेन संघर्ष के बीच रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन देने वाला मानता है। इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि रूस से तेल खरीदने पर भारत पर लगाए गए उच्च शुल्क को लेकर प्रधानमंत्री मोदी नाखुश हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाउस ऑफ रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की बैठक में ट्रंप ने कहा कि हालांकि संबंध सौहार्दपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन शुल्क के मुद्दे ने तनाव पैदा कर दिया है। कहना न होगा कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का स्वरूप अक्सर 'नियम-निर्माण' के माध्यम से दिखाई देता है, जिनमें व्यापार शर्तें, बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल शासन, और वित्तीय संस्थानों में प्रभाव शामिल हैं। भारत पर कभी-कभी व्यापार घाटे, डेटा स्थानीयकरण, दवा पेटेंट या मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर दबाव देखा गया है। प्रतिबंधों की राजनीति और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था भी विकासशील देशों की नीतिगत स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है। सांस्कृतिक स्तर पर भी अमेरिकी प्रभाव, हॉलीवुड, उपभोक्तावाद, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म-भारतीय समाज में आकांक्षाओं और जीवनशैली को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह प्रभाव अपने साथ अवसर और जोखिम दोनों लाता है- नवाचार, अभिव्यक्ति और वैश्विक जुड़ाव के अवसर, पर साथ ही स्थानीय भाषाओं, कलाओं और श्रम-संरचनाओं पर दबाव भी। ऐसे में, भारत की चुनौती यहां संतुलन साधने की है। एक ओर चीन जैसी आक्रामक शक्ति के बीच अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिए उपयोगी है। दूसरी ओर, किसी एक शक्ति ध्रुव पर अत्यधिक निर्भरता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। इसलिए भारत बहुध्रुवीय विश्व का समर्थक रहा है, जहां अमेरिका, यूरोप, रूस, एशिया और वैश्विक दक्षिण सभी की भूमिका हो। नीति-निर्माण में आत्मनिर्भरता, विनिर्माण क्षमता, तकनीकी नवाचार और दक्षिण-दक्षिण सहयोग जैसे कदम अमेरिकी प्रभुत्व के संभावित नकारात्मक प्रभावों को संतुलित कर सकते हैं। साथ ही, लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून के शासन और मानवाधिकारों पर भारत का अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। बदलते वैश्विक माहौल में अमेरिका खुद दुनिया के सामने मुसीबत के बीज बो रहा है और डोनाल्ड ट्रम्प इस सारे विवाद को जन्म दे रहे हैं। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jan 2026 18:24:23 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>आतंक की खतरनाक साजिश से निबटने के लिए सतर्कता जरूरी </title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश को एक बार फिर देश में ही छिपे गद्दारों के जरिए विदेशी मदद से आतंकवाद की आग में झोंकने की बड़ी साजिश की जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पदस्थ होते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह भारत के खिलाफ ट्रेड टेरिफ का हथियार इस्तेमाल किया लेकिन भारत नहीं झुका इसके बाद ट्रंप की सनक बढ़ गई और उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख के साथ रिश्ते बढाकर दबे पांव भारत में अस्थिरता के बीज बोने की नाकाम कोशिश शुरू कर दी। आपको पता है कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में 26 हिन्दू पर्यटकों की हत्या और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/160713/vigilance-is-necessary-to-deal-with-the-dangerous-conspiracy-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/आतंक-की-खतरनाक-साजिश.jpg" alt=""></a><br /><p>देश को एक बार फिर देश में ही छिपे गद्दारों के जरिए विदेशी मदद से आतंकवाद की आग में झोंकने की बड़ी साजिश की जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पदस्थ होते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह भारत के खिलाफ ट्रेड टेरिफ का हथियार इस्तेमाल किया लेकिन भारत नहीं झुका इसके बाद ट्रंप की सनक बढ़ गई और उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख के साथ रिश्ते बढाकर दबे पांव भारत में अस्थिरता के बीज बोने की नाकाम कोशिश शुरू कर दी। आपको पता है कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में 26 हिन्दू पर्यटकों की हत्या और 10 नवम्बर, 2025 को दिल्ली में लाल किले के निकट आत्मघाती कार बम विस्फोट द्वारा 15 निर्दोष लोगों की हत्या का कनैक्शन 'जैश-ए-मोहम्मद' के साथ निकला है। इस बीच 15 नवम्बर को 'श्रीनगर' के 'नौगाम' पुलिस थाने में एक विस्फोट में 10 लोगों की मौत व 32 अन्य घायल हो गए। इनमें 27 पुलिस कर्मी हैं।</p>
<p>भारत में सफेद कोट माड्यूल बना कर जिस तरह एक समुदाय विशेष के दर्जनों उच्च शिक्षित डाॅक्टरों के जरिए आतंक फैलाने की बड़ी साजिश की गई जिस का समय रहते भंडाफोड़ हो गया। इसके पीछे भी विदेशी मदद का हाथ है। हाल ही में अमेरिका के प्रयास से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान के बीच समझोता करा कर भारत में ने सिरे से कश्मीर को मुद्दा बना कर वहां के शिक्षित लोगों की भावनाओं को भड़का कर भारत में आतंकी वारदातों को अंजाम देने की साजिश रची जा रहीं हैं। तमाम आतंकी घटनाओं के बाद भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई तेज कर दी गई है जिसके तहत पिछले दिनों में की गई गिरफ्तारियों तथा बरामदगियों से मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है। </p>
<p>आपको बता दें 13 नवम्बर को कश्मीर के 'सोपोर' से 2 हाईब्रिड आतंकवादियों 'शब्बीर अहमद नाजर' तथा 'शब्बीर अहमद मीर' को गिरफ्तार करके उनसे एक पिस्तौल, एक मैगजीन, 20 जिंदा राऊंड तथा 2 हथगोले बरामद किए गए।  13 नवम्बर को ही उत्तर प्रदेश के 'हापुड़' और 'फिरोजाबाद' जिलों में 3 आरोपियों को गिरफ्तार करके उनसे 46 किलो 'हाईड्रोक्लोरिक एसिड' और 2.5 किलोग्राम विस्फोटक बरामद किए गए।<br />13 नवम्बर को ही पश्चिम बंगाल के 'बीरभूम' जिले में एक व्यक्ति को गिरफ्तार करके उससे जिलेटिन की 20,000 छड़ें बरामद की गईं।</p>
<p>अतः क्या आतंकवादी 'दिल्ली' की तरह 'बंगाल' को दहलाने की कोशिश कर रहे थे ? 14 नवम्बर को 'लाल किला विस्फोट' में प्रयुक्त कार के आत्मघाती ड्राइवर 'डा. उमर नबी' के पुलवामा जिले में स्थित मकान को सुरक्षा बलों ने आई.ई.डी. से विस्फोट करके उड़ा दिया।14 नवम्बर को ही अधिकारियों ने 'नूह' से 2 और मैडीकल छात्रों 'मुस्तकीम' तथा 'मोहम्मद' को हिरासत में लिया।15 नवम्बर को ही 'दिल्ली बम विस्फोट' के सिलसिले में 'पठानकोट' और 'नूह' से 2 डाक्टरों 'रईस अहमद भट्ट' तथा 'रेहान' को हिरासत में लिया गया।</p>
<p>15 नवम्बर को ही 'अहमदाबाद' (गुजरात) में 'गुजरात आतंकवाद निरोधक दस्ते' ने एक आतंकवादी गिरोह के लिए हथियारों की तस्करी करने में शामिल 'गुरप्रीत सिंह' उर्फ 'गोपी बिल्ला' को गिरफ्तार किया 15 नवम्बर को ही 'फिरोजपुर' में भारत-पाक सीमा पर बी.एस.एफ. ने खेतों में 2 ड्रोन व पाकिस्तान से भेजी गई 549 ग्राम हैरोइन का पैकट बरामद किया। 16 नवम्बर को 'अमृतसर कमिश्नरेट' पुलिस ने पाक आधारित हथियार और नार्को नैटवर्क का पर्दाफाश करके 1.01 किलो हैरोइन और 6 आधुनिक पिस्तौलों सहित 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया।</p>
<p>16 नवम्बर को ही सी. आई.ए. ने सफेदपोश आतंकवादी माड्यूल मामले में जम्मू-कश्मीर के 'अनंतनाग' जिले में एक महिला डाक्टर के घर पर छापेमारी की और वहां से एक मोबाइल जब्त कर अपने साथ ले गई16 नवम्बर को ही 'राष्ट्रीय जांच ब्यूरो' ने 'लाल किला' कार बम विस्फोट के हमलावर 'डा. उमर उन नबी' के साथी 'आमिर राशिद अली' तथा अगले दिन 17 नवम्बर को एक अन्य साजिशकर्त्ता 'जसीर बिलाल वानी' को गिरफ्तार किया।<br />और अब 17 नवम्बर को सुरक्षा एजेंसियों को घटनास्थल पर एक जूता मिला है जिसमें 'अमोनियम नाईट्रेट' तथा जरा सी गर्मी से फटने वाले अत्यंत खतरनाक विस्फोटक 'टी.ए.टी.पी. के अंश मिले हैं। इसे देखते हुए इस धमाके में 'जूता बम' के इस्तेमाल का भी शक व्यक्त किया जा रहा है।</p>
<p>इसे पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अपने देश की जनता की बदहाली दूर करने के लिए प्रयास करने की बजाय इसके शासक और सेना आतंकवादियों को पाल रही है और उनकी सहायता से भारत में तबाही मचा रही है। हालत यह है कि गरीबी के कारण पाकिस्तान में 2.5 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हो गए हैं जबकि 2 लाख बच्चे तो कभी स्कूल गए ही नहीं।<br />इतना ही  नहीं, पाकिस्तान की 'शहबाज शरीफ' सरकार द्वारा फील्ड मार्शल 'असीम मुनीर' के दबाव में सुप्रीमकोर्ट की शक्तियों को कम करने वाले 'विवादास्पद 27वें संविधान संशोधन' के विरुद्ध 16 नवम्बर को वकीलों ने हड़ताल की।</p>
<p>हम मानते हैं आतंकवादियों द्वारा पहलगाम व दिल्ली आदि में मारे गए निर्दोषों की जान कभी वापस नहीं आ सकती है लेकिन इन वारदातों के बाद सरकार तथा सुरक्षा बलों ने पूरी ताकत से आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करके अनेक लोगों का जीवन बचा लिया है।ये साजिश खत्म होने वाली नही है अभी भी खतरा टला नहीं है,देव असुर संग्राम थमने वाला नहीं है अतः आतंकवादियों तथा उनके मददगारों के विरुद्ध सफाई के अभियान को तब तक और तेजी से जारी रखा जाना चाहिए जब तक कि आतंकवादियों का समूल सफाया नहीं हो जाता वहीं देश के भीतर छिपे गद्दारों रेडिकलाइज चरम पंथी लोगों पर भी नजर रखनी होगी खासकर उन कट्टरपंथी मजहबी व्यक्तियों और संस्थानों पर जो अलफलाह यूनिवर्सिटी की तरह चरमपंथी षडयंत्र का अड्डा बन सकते हैं।</p>
<p>भारत की खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों को और अधिक तेज तर्रार तकनीकी युक्त प्रशिक्षण और अत्याधुनिक सुविधाओं व साधनों से समृद्ध करने की जरूरत है ताकि आतंक के बदलते चेहरे की पहचान और समय रहते खात्मा किया जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Nov 2025 18:24:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दुनिया में हथियारों की खतरनाक होड़ के सूत्रधार बनेंगे ट्रंप </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करने की घोषणा पर दुनिया में जबरदस्त हलचल मच गई है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 33 साल बाद परमाणु परीक्षण का आदेश दिया है. चीन और रूस की टेस्टिंग के बीच यह फैसला वैश्विक तनाव बढ़ा सकता है और एनपीटी समझौते पर सवाल खड़े करता है।</div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं, लेकिन इंटरनेशनल कैंपेन टू एबॉलिश न्यूक्लियर वेपंस  के अनुसार, रूस के पास लगभग 5,500 परमाणु वारहेड हैं, जबकि अमेरिका के पास करीब 5,044 हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/158673/trump-will-become-the-architect-of-dangerous-arms-race-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/whatsapp-image-2025-11-01-at-19.50.25_52c0be58.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करने की घोषणा पर दुनिया में जबरदस्त हलचल मच गई है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 33 साल बाद परमाणु परीक्षण का आदेश दिया है. चीन और रूस की टेस्टिंग के बीच यह फैसला वैश्विक तनाव बढ़ा सकता है और एनपीटी समझौते पर सवाल खड़े करता है।</div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं, लेकिन इंटरनेशनल कैंपेन टू एबॉलिश न्यूक्लियर वेपंस  के अनुसार, रूस के पास लगभग 5,500 परमाणु वारहेड हैं, जबकि अमेरिका के पास करीब 5,044 हैं। </div>
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<div style="text-align:justify;">हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने परमाणु हमले की तैयारी के अभ्यास का आदेश दिया था. रूसी सेना ने इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल  यार्स और सिनेवा मिसाइल का परीक्षण किया, साथ ही टीयू-95 बमवर्षक विमान से लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइल भी दागी. ट्रंप ने इन परीक्षणों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि पुतिन को युद्ध खत्म करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि मिसाइल टेस्ट करने पर। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप के परमाणु परीक्षण के आदेश से वैश्विक स्तर पर हड़कंप मच गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम वैश्विक निरस्त्रीकरण प्रयासों को कमजोर कर सकता है और न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी का उल्लंघन भी माना जा सकता है, जिसे अमेरिका ने 1992 में साइन किया था. आपको बता दें कि इस पर तीखी प्रतिक्रिया आ रही है। ईरानी के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक्स पर एक पोस्ट लिखकर ट्रम्प के बयान की तीखी आलोचना की। उनका कहना था कि अपने रक्षा विभाग का नाम बदलकर युद्ध विभाग रखने वाला परमाणु हथियारों से लैस दबंग देश खुद परमाणु हथियारों का परीक्षण करने जा रहा है। यही दबंग देश ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को बदनाम कर रहा है और हमारे सुरक्षित परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले की धमकी दे रहा है। इससे पहले ये जानना जरूरी है कि परमाणु परीक्षण क्या है और इसके क्या नुकसान हो सकते हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">नाभिकीय अस्त्र परीक्षण या परमाण परीक्षण उन प्रयोगों को कहते हैं जो डिजाइन एवं निर्मित किए गए नाभिकीय अस्त्रों के प्रभाविकता, उत्पादकता एवं विस्फोटक क्षमता की जांच करने के लिए किए जाते हैं। परमाणु परीक्षणों से कई जानकारियां प्राप्त होतीं हैं, जैसे ये नाभिकीय हथियार कैसा काम करते है, विभिन्न स्थितियों में ये किस प्रकार का परिणाम देते है, भवन एवं अन्य संरचनाएं इन हथियारों के प्रयोग के बाद कैसा बर्ताव करतीं हैं। इसके अलावा परमाणु परीक्षणों से वैज्ञानिक, तकनीकी एवं सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करने की कोशिश भी की जाती है। बीसवीं सदी में कई देशों ने परमाणु परीक्षण किए थे। पहला परमाणु परीक्षण अमेरिका ने 16 जुलाई, 1945 में किया था जिसमें 20 किलोटन का परीक्षण किया गया था। अब तक का सबसे बड़ा परमाणु परीक्षण सोवियत रूस में 30 अक्टूबर 1961 को किया गया था जिसमें 50 मेगाटन के हथियार का परीक्षण किया गया था।</div>
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<div style="text-align:justify;">25 मई, 2009 को उत्तरी कोरिया ने परमाणु परीक्षण किया था, जिसे विश्व के अधिकांश देशों ने निंदनीय बताया है। विश्व के परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों ने अब तक कम से कम 2000 परमाणु परीक्षण किए हैं। हालांकि अब इस पर अंतर्राष्ट्रीय कानून बने हुए हैं, जिनका पालन करना दुनिया के हर देश का कर्तव्य है, लेकिन अब ट्रम्प ने परमाणु परीक्षण की बात कहकर दुनिया में हलचल मचा दी है। अगर अब परमाणु परीक्षण होता है, तो यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का घोर उल्लंघन है। इस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ने परमाणु परीक्षण की बात कहकर इन कानूनों का उल्लंघन किया है। ईरान के विदेश मंत्री का साफ कहना था कि अमेरिका दुनिया में परमाणु प्रसार का सबसे बड़ा खतरा है। उल्लेखनीय है कि श्री ट्रम्प ने दक्षिण कोरिया में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) शिखर सम्मेलन से इतर चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग से मुलाकात से ठीक पहले गुरुवार को अपने टूथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा था कि उन्होंने अमेरिका के रक्षा विभाग को परमाणु हथियारों के परीक्षण का आदेश दिया है।</div>
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<div style="text-align:justify;">अन्य देशों के परीक्षण कार्यक्रमों के कारण, मैंने युद्ध विभाग को निर्देश दिया है कि वे हमारे परमाणु हथियारों का समान परीक्षण शुरू करें। रूस ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि रूस ने हाल में कोई परीक्षण नहीं किया है, लेकिन अगर अमेरिका ऐसा करता है, तो रूस भी परमाणु हथियारों का परीक्षण शुरू कर देगा। सोवियत संघ ने आखिरी बार 1990 में, अमेरिका ने 1992 में और चीन ने 1996 में परमाणु हथियार का परीक्षण किया था। चीन ने हालांकि ट्रम्प के बयान पर संतुलित रुख अपनाया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन का कहना था कि बीजिंग को उम्मीद है कि अमेरिका व्यापक परमाणु परीक्षण-प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) और परमाणु परीक्षणों पर उसके प्रतिबंधका पालन करेगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले जापानी परमाणु बम पीड़ितों के समूह निहोन हिडांक्यो ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणा कड़ी आलोचना की है और इसे पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। उधर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका परीक्षण दोबारा शुरू करता है, तो यह हथियारों की नई दौड़ को जन्म दे सकता है. अमेरिकी सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने कहा, “ट्रंप परमाणु हथियारों को खिलौना बना रहे हैं.” दुनिया भर के विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम रूस और चीन के बढ़ते परमाणु प्रभाव के जवाब में है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता को बड़ा झटका लग सकता है.यह स्थिति विश्व भर में हथियारों की खतरनाक होड़ को जन्म दे सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Nov 2025 19:52:25 +0530</pubDate>
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                <title>पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन 30 साल बाद भारत में कदम रखेगा, पूरी दुनिया में मचा हड़कंप! </title>
                                    <description><![CDATA[ उसी समय आसिम मुनीर शहबाज शरीफ और पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन आमिर खान मुत्ताकी भारत में कदम रख रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156511/68e0b501daec1"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/पाकिस्तान-का-सबसे-बड़ा-दुश्मन-30-साल-बाद-भारत-में-कदम-रखेगा,-पूरी-दुनिया-में-मचा-हड़कंप! .jpg" alt=""></a><br /><p><strong>International Desk</strong></p>
<p>करीब 30 साल बाद भारत में एक ऐसा शख्त कदम रखने वाला है जो कभी तो पाकिस्तान का दोस्त हुआ करता था। लेकिन अब पाकिस्तान को बर्बाद करने की कसम खा चुका है। पाकिस्तान ने पूरी कोशिश की कि ये शख्स भारत न आ पाए। लेकिन भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इस शख्स को हिंदुस्तान बुलाने की ताकत ले आया।</p>
<p>पहली बार तालिबान का एक बड़ा नेता भारत में कदम रखेगा और वो भी ऐसे समय जब अमेरिका और पाकिस्तान मिलकर अफगानिस्तान पर हमले का प्लान बना रहे हैं। जिस समय डोनाल्ड ट्रंप आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ को अमेरिका बुला रहे हैं। उसी समय आसिम मुनीर शहबाज शरीफ और पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन आमिर खान मुत्ताकी भारत में कदम रख रहा है। </p>
<p>आमिर खान मुत्ताकी अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री है। जो 9 अक्टूबर को भारत आएंगे। भारत आकर मुत्ताकी विदेश मंत्री एस जयशंकर और एनएसए अजित डोभाल से मिलेंगे। तालिबान के सबसे बड़े नेता का एनएसए अजित डोभाल से मिलना पाकिस्तान की कुंडली के लिए अच्छा नहीं है। मुत्ताकी 9 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक भारत में रहेंगे। सोचिए इतने लंबे समय तक भारत में क्या क्या प्लानिंग होगी।</p>
<p>अफगानिस्तान के अंतरिम विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की संभावित भारत यात्रा को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर से 9-16 अक्टूबर के बीच दिल्ली आने के लिए इजाजत मिल गई है। हालांकि इस यात्रा के बारे में उन्होंने और कोई जानकारी नहीं दी।</p>
<p>भारत ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, तो मुत्ताकी को किस तरह का प्रोटेकॉल दिया जाएगा, इस पर उन्होंने कछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे सवाल के जवाब में जायसवाल ने कहा कि 'मुत्ताकी अफगानिस्तान के विदेश मंत्री हैं।</p>
<p>जायसवाल ने मई में विदेश मंत्री एस जयशंकर और मुत्ताकी के बीच टेलीफोन कॉल का जिक्र करते हुए दोनों देशों के बीच बढ़ते इंगेजमेंट पर रोशनी डाली। बता दें कि मुत्ताकी पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद  बाहर यात्रा करने को लेकर बैन लगाया है, जिसे भारत यात्रा के लिए हटाया गया है। करीब 30 साल बाद भारत इस तरह से तालिबान के संपर्क में होगा। </p>
<p>मुत्ताकी को अगस्त में ही भारत आना था। लेकिन पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मुत्ताकी की शिकायत कर दी थी। जिसके बाद आमिर खान मुत्ताकी को अपनी यात्रा टालनी पड़ गई। लेकिन बाद में भारत उसी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मुत्ताकी को भारत लाने की इजाजत ले आया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 17:56:20 +0530</pubDate>
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