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                <title>Earth - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Earth RSS Feed</description>
                
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                <title>धरती और प्रकृति का बदलता नैसर्गिक स्वरूप</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">इंसान की लालच ने मूक धरती को भी कहीं का नहीं छोड़ा है इंसानों की स्वार्थी गतिविधियों के कारण आज पृथ्वी पर उष्णता का गंभीर संकट मंडरा रहा है। धरती, जिसे हमने सदा मां का सम्मान दिया है, आज वही पृथ्वी माता अपनी ही संतानों के लोभ, लालच और स्पृहा से कराह कर,जख्मी हो कर तड़प रही है। औद्योगिकीकरण की अंधा-धुंध दौड़, प्रदूषण का भयानक विस्तारित स्वरूप, जंगलों की बेदर्द कटाई और धरती में उपलब्ध संसाधनों का अंधाधुंध दोहन इन सबने धरती का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। नतीजा यह है कि कभी बरसात बेकाबू होकर प्रलय लाती है,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156528/the-natural-nature-of-the-earth-and-nature-changes"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/download-(2).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">इंसान की लालच ने मूक धरती को भी कहीं का नहीं छोड़ा है इंसानों की स्वार्थी गतिविधियों के कारण आज पृथ्वी पर उष्णता का गंभीर संकट मंडरा रहा है। धरती, जिसे हमने सदा मां का सम्मान दिया है, आज वही पृथ्वी माता अपनी ही संतानों के लोभ, लालच और स्पृहा से कराह कर,जख्मी हो कर तड़प रही है। औद्योगिकीकरण की अंधा-धुंध दौड़, प्रदूषण का भयानक विस्तारित स्वरूप, जंगलों की बेदर्द कटाई और धरती में उपलब्ध संसाधनों का अंधाधुंध दोहन इन सबने धरती का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। नतीजा यह है कि कभी बरसात बेकाबू होकर प्रलय लाती है, तो कभी महीनों तक आसमान सूखा रहकर दरारें छोड़ देता है। यही है आज का सबसे बड़ा संकट ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्टें बता रही हैं कि धरती का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। सुनने में यह मामूली छोटा आंकड़ा लगता है, पर इसके असर बेहद भयावह हैं। हिमखंड पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मौसम का मिज़ाज पूरी तरह बदल चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भारत खेती पर ही  अधारित,निर्भर देश इसका सबसे बड़ा भुक्त भोगी रहा है। यहां की अर्थव्यवस्था और करोड़ों किसानों का जीवन मानसून पर अवलंबित तथा टिका हुआ  है। लेकिन अब मानसून का स्वरूप पूरी तरह तहस नहस हो चुका है।  देश के राज्य कीगईअसम, बिहार और उत्तराखंड में हर साल बाढ़ तबाही मचाती है, जबकि विदर्भ, मराठवाड़ा, बुंदेलखंड और राजस्थान में सूखा किसानों को आत्महत्या तक करने को मजबूर कर देशता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2018 की केरल बाढ़ ने लाखों परिवार उजाड़ दिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> वैश्विक स्तर पर दुनिया के दूसरे हिस्सों की तस्वीर भी उतनी ही डरावनी है। चीन की यांग्त्ज़ी नदी की बाढ़ करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। अफ्रीका का साहेल क्षेत्र लगातार सूखे से जूझ रहा है। अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया और ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग हर साल नई तबाही लाती है। यूरोप की गर्म हवाएं हजारों लोगों की जान ले चुकी हैं। हमारे पड़ोसी बांग्लादेश और नेपाल बार-बार बाढ़ और तूफानों से त्रस्त रहते हैं। यह स्पष्ट है कि वैश्विक उष्णता अब किसी एक देश का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी मानवता का संकट है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति सदा से प्रकृति को पूजती आ रही है। ऋग्वेद से लेकर महात्मा गांधी तक हमें यही संदेश मिला कि प्रकृति का सम्मान करो, उसका दोहन नहीं। गांधी जी ने चेताया था कि "धरती मनुष्य की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन उसके लालच को नहीं।" दुर्भाग्य से हमने इस चेतावनी की अनदेखी की और आज परिणाम हमारे सामने है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी उम्मीद बाकी है। बचाव के रास्ते हमारे ही हाथों में हैं। कोयले और पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाकर सौर, पवन और बायोगैस जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। जंगलों की कटाई रोककर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा। जल संरक्षण को आंदोलन का रूप देना होगा। तालाब-कुएं पुनर्जीवित करने होंगे, नदियों की सफाई करनी होगी। किसानों को सूक्ष्म सिंचाई और आधुनिक जल प्रबंधन से जोड़ना होगा। और व्यक्तिगत स्तर पर ऊर्जा की बचत, प्लास्टिक का कम प्रयोग और हरित जीवनशैली अपनाना अब हर नागरिक का धर्म होना चाहिए।धरती तप रही है, आसमान गरम हो रहा है और बारिश-बाढ़ का तांडव हमें आगाह कर रहा है कि समय हाथ से निकल रहा है। यह केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का सवाल नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का प्रश्न है। यदि आज नहीं चेते तो कल की सभ्यता केवल इतिहास की किताबों में बचेगी। धरती मां की पुकार साफ है-: “मुझे बचाओ, ताकि तुम्हारा भविष्य भी बचा रहे।” </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 17:16:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>NASA ने चौंकाने वाली बात कही , अभी तक का पांचवा सबसे गर्म साल रहा 2022</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></p>
<p>अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) द्वारा जारी एक विश्लेषण के अनुसार, पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 2022 में 2015 के साथ पांचवें सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज हुआ। जलवायु मॉडलिंग के लिए अग्रणी केंद्र, नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज (GISS) के वैज्ञानिकों ने गुरुवार को बताया कि पृथ्वी की दीर्घकालिक वार्मिंग प्रवृत्ति को जारी रखते हुए 2022 में वैश्विक तापमान नासा की बेसलाइन अवधि (1951-1980) के औसत से 1.6 डिग्री फ़ारेनहाइट (0.89 डिग्री सेल्सियस) अधिक था।</p>
<p>नासा के प्रशासक बिल नेल्सन ने कहा, ‘‘गर्मी का यह चलन खतरनाक है।'' ‘‘हमारा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/126888/nasa-said-shocking-thing-that-2022-will-be-the-fifth"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-01/51.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></p>
<p>अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) द्वारा जारी एक विश्लेषण के अनुसार, पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 2022 में 2015 के साथ पांचवें सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज हुआ। जलवायु मॉडलिंग के लिए अग्रणी केंद्र, नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज (GISS) के वैज्ञानिकों ने गुरुवार को बताया कि पृथ्वी की दीर्घकालिक वार्मिंग प्रवृत्ति को जारी रखते हुए 2022 में वैश्विक तापमान नासा की बेसलाइन अवधि (1951-1980) के औसत से 1.6 डिग्री फ़ारेनहाइट (0.89 डिग्री सेल्सियस) अधिक था।</p>
<p>नासा के प्रशासक बिल नेल्सन ने कहा, ‘‘गर्मी का यह चलन खतरनाक है।'' ‘‘हमारा गर्म जलवायु पहले से ही एक निशान बना रहा है: जंगल की आग तेज हो रही है; तूफान मजबूत हो रहे हैं; सूखा कहर बरपा रहा है और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि नासा जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने में अपनी भूमिका निभाने की हमारी प्रतिबद्धता को गहरा कर रहा है। हमारी पृथ्वी प्रणाली वेधशाला हमारे जलवायु मॉडलिंग, विश्लेषण और भविष्यवाणियों का समर्थन करने के लिए अत्याधुनिक डेटा प्रदान करेगी ताकि मानवता को हमारे ग्रह की बदलती जलवायु का सामना करने में मदद मिल सके।</p>
<p>नासा के अनुसार आधुनिक रिकॉर्ड रखने की 1880 में शुरुआत के बाद से पिछले नौ साल सबसे गर्म साल रहे हैं। इसका मतलब है कि 2022 में पृथ्वी 19वीं सदी के अंत के औसत से लगभग 2 डिग्री फ़ारेनहाइट (लगभग 1.11 डिग्री सेल्सियस) गर्म थी। जीआईएसएस के निदेशक गेविन श्मिट ने कहा कि गर्मी की प्रवृत्ति का कारण यह है कि मानव गतिविधियां वायुमंडल में भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों को बढ़ना जारी रखती हैं, और दीर्घकालिक ग्रहीय प्रभाव भी जारी रहेंगे।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>एशिया</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
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                <pubDate>Fri, 13 Jan 2023 13:17:23 +0530</pubDate>
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