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                <title>Climate Change - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Climate Change RSS Feed</description>
                
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                <title>पेड़ लगाइए जरूर, मगर पेड़ बचाइए — शिक्षक डॉ. तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अंबेडकर नगर।   </strong> प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षक एवं पर्यावरण जागरूकता के प्रेरक डॉ. तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु' ने कहा कि केवल पौधारोपण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लगाए गए पौधों को जीवित रखना और उनका नियमित संरक्षण करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण प्रदूषण, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र जैसी चुनौतियों का प्रभाव पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है । ऐसे समय में प्रत्येक नागरिक को पेड़ लगाने के साथ-साथ उनकी देखभाल का संकल्प लेना चाहिए । डॉ. जिज्ञासु ने कहा कि एक विकसित पेड़ वर्षों तक हमें शुद्ध वायु, छाया, वर्षा संतुलन, जैव</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183258/plant-trees-but-save-trees-%E2%80%93-teacher-dr-tarakeshwar-mishra"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1006297982.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अंबेडकर नगर।   </strong> प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षक एवं पर्यावरण जागरूकता के प्रेरक डॉ. तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु' ने कहा कि केवल पौधारोपण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लगाए गए पौधों को जीवित रखना और उनका नियमित संरक्षण करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण प्रदूषण, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र जैसी चुनौतियों का प्रभाव पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है । ऐसे समय में प्रत्येक नागरिक को पेड़ लगाने के साथ-साथ उनकी देखभाल का संकल्प लेना चाहिए । डॉ. जिज्ञासु ने कहा कि एक विकसित पेड़ वर्षों तक हमें शुद्ध वायु, छाया, वर्षा संतुलन, जैव विविधता का संरक्षण तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करता है । यदि लगाए गए पौधे कुछ ही दिनों में सूख जाएं, तो पौधारोपण अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए प्रत्येक व्यक्ति कम से कम एक पौधे को पेड़ बनने तक संरक्षित करने का संकल्प  लें । उन्होंने विद्यालयों, सामाजिक संगठनों तथा युवाओं से अपील की कि वे केवल औपचारिक पौधारोपण तक सीमित न रहें, बल्कि नियमित सिंचाई, सुरक्षा, ट्री-गार्ड की व्यवस्था तथा समय-समय पर पौधों की देखरेख सुनिश्चित करें ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनभर निभाई जाने वाली सामाजिक जिम्मेदारी है । अंत में डॉ. तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु' ने समाज से आह्वान किया कि "पेड़ लगाइए जरूर, मगर पेड़ बचाइए" का संदेश जन-जन तक पहुंचाकर धरती को हरित, स्वच्छ और सुरक्षित बनाने में अपना सक्रिय योगदान दें। यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सच्ची सेवा होगी।</div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 20:14:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183198/steps-towards-natural-farming"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि जल संरक्षण, कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संतुलन और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय ने सौराष्ट्र क्षेत्र के विभिन्न जिलों में मिट्टी के नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्राकृतिक खेती के प्रभावों का अध्ययन किया।  इस शोध में सामने आया कि जिन खेतों में लगातार पांच वर्षों तक प्राकृतिक खेती अपनाई गई, वहां मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा 0.45 प्रतिशत से बढ़कर 0.93 प्रतिशत तक पहुंच गई। किसी भी कृषि भूमि के लिए ऑर्गेनिक कार्बन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यही मिट्टी की उर्वरता, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और पौधों के पोषण का आधार होता है। ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ने का अर्थ है कि मिट्टी अधिक जीवंत, उपजाऊ और दीर्घकाल तक उत्पादन देने में सक्षम हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शोध में यह भी पाया गया कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले खेतों में वर्षा और सिंचाई का पानी पहले की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में मिट्टी के भीतर समा रहा है। पानी के समाने की दर 6.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा से बढ़कर 14.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा हो गई। इससे वर्षा जल का बेहतर संरक्षण संभव हुआ और भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिला। इसी प्रकार मिट्टी की नमी संग्रहण क्षमता 12.75 प्रतिशत से बढ़कर 19.84 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका सीधा लाभ किसानों को सूखे की स्थिति में मिलता है क्योंकि मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है और फसलों को बार-बार सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;">मिट्टी की संरचना में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी की छिद्रता 34.63 प्रतिशत से बढ़कर 41.08 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिलना संभव हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं मिट्टी का घनत्व भी कम हुआ, जिससे भूमि अधिक भुरभुरी और खेती के लिए अनुकूल बनी। ऐसी मिट्टी में जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधे अधिक स्वस्थ रहते हैं। सौराष्ट्र के विभिन्न जिलों में किए गए अध्ययन से यह भी सामने आया कि ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा हर जिले में अलग-अलग है। पोरबंदर की मिट्टी में सबसे अधिक 0.82 प्रतिशत ऑर्गेनिक कार्बन दर्ज किया गया, जबकि गिर सोमनाथ में 0.75 प्रतिशत और जूनागढ़ में 0.72 प्रतिशत पाया गया। दूसरी ओर सुरेंद्रनगर, भावनगर और जामनगर में यह मात्रा अपेक्षाकृत कम रही। पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र का औसत ऑर्गेनिक कार्बन 0.57 प्रतिशत दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती का विस्तार होगा, वहां यह स्तर आने वाले वर्षों में और बेहतर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सीमित उपयोग, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोलों का प्रयोग तथा न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। शोध के अनुसार प्राकृतिक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष चार से आठ टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का जलवायु लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहयोगी बनती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज प्राकृतिक खेती को केवल वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं बल्कि "क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर" के रूप में देखा जा रहा है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और जल संकट जैसी परिस्थितियों में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। कम लागत, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता इसे भविष्य की कृषि व्यवस्था का मजबूत आधार बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में हजारों किसान इस पद्धति को अपना चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारें भी प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं। किसानों के सफल अनुभव दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जो किसान पहले रासायनिक खेती छोड़ने को लेकर आशंकित थे, वे अब प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम देखकर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का आर्थिक पक्ष भी किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और महंगे कृषि रसायनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर, गोमूत्र, जैविक अवशेष और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसके साथ ही प्राकृतिक तरीके से उत्पादित खाद्यान्न, फल और सब्जियों की बाजार में मांग भी बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बन रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी प्राकृतिक खेती का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्यान्न उपभोक्ताओं को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हैं। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के कारण लोग प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे किसानों के लिए नए बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का शोध यह स्पष्ट संदेश देता है कि प्राकृतिक खेती केवल भावनात्मक या पारंपरिक विचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित एक प्रभावी कृषि प्रणाली है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने, खेती की लागत कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे अनेक क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। यदि देश में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ता है, तो यह केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास के राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी नई दिशा देगी। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का यह शोध इसी परिवर्तन की मजबूत वैज्ञानिक पुष्टि है और यह विश्वास जगाता है कि भविष्य की समृद्ध खेती प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:09:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रुद्राक्ष, चंदन व मौलश्री समेत 51 पौधे रोपे, पूर्व विधायक को चंदन का पौधा भेंट कर किया सम्मानित</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर। </strong>वन महोत्सव (1 से 7 जुलाई) के तहत गुरुवार को सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग की भांभर रेंज द्वारा बीरपुर सेमरा स्थित वन विश्राम भवन परिसर में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में रुद्राक्ष, आम, चंदन, मौलश्री सहित आस्था एवं पर्यावरण से जुड़े 51 पौधों का रोपण किया गया। जनप्रतिनिधियों, वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।</div>
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<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निवर्तमान गैसड़ी विधायक शैलेश कुमार सिंह 'शैलू' ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक पौधे लगाने के साथ उनकी</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182591/51-plants-including-rudraksh-sandalwood-and-maulshree-were-planted-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260702-wa0749.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर। </strong>वन महोत्सव (1 से 7 जुलाई) के तहत गुरुवार को सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग की भांभर रेंज द्वारा बीरपुर सेमरा स्थित वन विश्राम भवन परिसर में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में रुद्राक्ष, आम, चंदन, मौलश्री सहित आस्था एवं पर्यावरण से जुड़े 51 पौधों का रोपण किया गया। जनप्रतिनिधियों, वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निवर्तमान गैसड़ी विधायक शैलेश कुमार सिंह 'शैलू' ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल भी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वन महोत्सव केवल पौधारोपण का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का एक सशक्त माध्यम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वन क्षेत्राधिकारी योगेश प्रताप सिंह ने कहा कि हरियाली बढ़ाना और वन संपदा का संरक्षण विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से वृक्षारोपण को जन आंदोलन बनाने और लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करने की अपील की। कार्यक्रम के दौरान वन क्षेत्राधिकारी ने निवर्तमान विधायक शैलेश कुमार सिंह 'शैलू' को चंदन का पौधा स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर विधायक ने वन विभाग के इस प्रयास की सराहना करते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में वन दरोगा सूर्य नारायण उर्फ टिल्लू सिंह, वनरक्षक शैलेश कुमार पाठक,सुशील कुमार यादव, युवा समाजसेवी सुनील कुमार त्रिपाठी, बब्लू बाल्मीकि, भाजपा मंडल अध्यक्ष अमित जायसवाल सहित वन विभाग के कर्मचारी और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। अधिकारियों ने बताया कि वन महोत्सव के तहत भांभर रेंज में आगामी दिनों में भी विभिन्न स्थानों पर वृक्षारोपण अभियान जारी रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निवर्तमान गैसड़ी विधायक शैलेश कुमार सिंह 'शैलू' ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल भी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वन महोत्सव केवल पौधारोपण का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने वन विभाग की इस पहल को सराहनीय बताते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वन क्षेत्राधिकारी योगेश प्रताप सिंह ने कहा कि हरियाली बढ़ाना और वन संपदा का संरक्षण विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से वृक्षारोपण को जन आंदोलन बनाने और लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करने की अपील की। कार्यक्रम के दौरान वन क्षेत्राधिकारी ने निवर्तमान विधायक शैलेश कुमार सिंह 'शैलू' को चंदन का पौधा स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर विधायक ने वन विभाग के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में वन दरोगा सूर्य नारायण उर्फ टिल्लू सिंह, वनरक्षक शैलेश कुमार पाठक, युवा समाजसेवी सुनील कुमार त्रिपाठी, बब्लू बाल्मीकि, भाजपा मंडल अध्यक्ष अमित जायसवाल सहित वन विभाग के कर्मचारी और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। युवा समाजसेवी एवं दैनिक भास्कर पत्रकार वसीम अहमद ने भी चंदन का पौधा लगाया। अधिकारियों ने बताया कि वन महोत्सव के तहत भांभर रेंज में आगामी दिनों में भी विभिन्न स्थानों पर वृक्षारोपण अभियान जारी रहेगा।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 19:15:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मॉनसून का करिश्माई रूप और कुदरत की विराट शक्ति के सामने इंसान की सीमाएं तथा असम की बाढ़ से मिला प्रकृति का बड़ा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182342/the-charismatic-form-of-monsoon-and-the-limitations-of-humans"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas26.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम और अरुणाचल प्रदेश में बारिश ने विकराल रूप धारण कर लिया। देखते ही देखते नदियां उफान पर आ गईं और हजारों परिवार बाढ़ की चपेट में आ गए। यह दृश्य केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि यह संदेश भी है कि प्रकृति के अपने नियम हैं और उसके सामने मनुष्य की शक्ति सीमित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम के अनेक जिलों में हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। सैकड़ों गांव पानी में घिर गए हैं। खेतों में खड़ी फसलें डूब गई हैं। पशुधन भी संकट में है। रेल संपर्क बाधित हो गया है और लोगों का सामान्य जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। यह केवल असम की समस्या नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं। कभी पहाड़ों में बादल फटते हैं तो कभी मैदानों में नदियां उफान पर आ जाती हैं। कहीं समुद्र तूफान लेकर आता है तो कहीं सूखा लोगों की जिंदगी कठिन बना देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अरुणाचल प्रदेश में लगातार हो रही वर्षा ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है। पहाड़ों से उतरने वाला पानी असम की नदियों में पहुंचा और बाढ़ का स्वरूप और भी भयावह हो गया। यह प्रकृति का वही चक्र है जिसे मनुष्य पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। विज्ञान ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन आज भी बादलों को आदेश नहीं दिया जा सकता कि वे कहां बरसें और कितनी देर तक बरसें। यही कारण है कि कुदरत के सामने हर व्यक्ति समान रूप से असहाय दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मॉनसून भारत की जीवनरेखा माना जाता है। देश की कृषि का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा पर निर्भर है। अच्छी बारिश होती है तो खेतों में हरियाली छा जाती है और किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। लेकिन यही बारिश जब सीमा से अधिक हो जाती है तब वही जीवनदायिनी जलधारा विनाश का कारण बन जाती है। इस बार भी यही देखने को मिला। जहां देश के कई हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे वहीं असम में इतनी अधिक वर्षा हुई कि लोगों के घर और खेत पानी में डूब गए। प्रकृति का यही विरोधाभास उसे रहस्यमयी और करिश्माई बनाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">देश के अनेक किसान इस समय कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। कहीं बारिश नहीं होने से बुवाई प्रभावित हुई है तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने तैयारियां बिगाड़ दी हैं। खेती पूरी तरह मौसम पर आधारित है और मौसम का मिजाज हर वर्ष बदलता रहता है। किसान मेहनत करता है लेकिन अंतिम निर्णय प्रकृति के हाथ में होता है। यही कारण है कि भारतीय किसान सदियों से धरती और आकाश दोनों को समान श्रद्धा से देखता आया है। उसे पता है कि मेहनत उसकी है लेकिन सफलता का आशीर्वाद प्रकृति देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस वर्ष अधिक मास के कारण लोगों के बीच यह चर्चा भी रही कि मॉनसून देर से आया। चाहे इसके धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भ अलग हों लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से मॉनसून का आगमन समुद्री हवाओं तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फिर भी भारतीय समाज में प्रकृति और आस्था का गहरा संबंध रहा है। लोग वर्षा को केवल मौसम नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा भी मानते हैं। जब समय पर बारिश होती है तो खुशियां आती हैं और जब अत्यधिक या कम वर्षा होती है तो चिंता बढ़ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ ने यह भी सिखाया है कि प्राकृतिक आपदाओं से मुकाबला केवल सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से भी संभव है। राहत और बचाव कार्य तेजी से चलना चाहिए। प्रभावित परिवारों तक भोजन दवाइयां और सुरक्षित आश्रय पहुंचाना सबसे पहली जिम्मेदारी है। बच्चों महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। जिन किसानों की फसलें और पशुधन प्रभावित हुए हैं उन्हें आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए ताकि वे दोबारा अपने जीवन को संभाल सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा राज्य सरकार से लगातार संपर्क बनाए रखना और राहत कार्यों की समीक्षा करना सकारात्मक पहल है। ऐसे समय में राजनीति से ऊपर उठकर केवल मानवता को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्राकृतिक आपदा किसी दल या क्षेत्र को देखकर नहीं आती। उसका सामना पूरे समाज को मिलकर करना पड़ता है। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत भी है कि संकट की घड़ी में लोग एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि भविष्य के लिए बेहतर तैयारी करने की भी है। नदियों के किनारे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जल निकासी की प्रभावी योजना समय पर चेतावनी प्रणाली और पर्यावरण संरक्षण जैसे उपाय भविष्य में नुकसान कम कर सकते हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन ने भी कई क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ाया है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलेगा तो आपदाओं की तीव्रता को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कुदरत का अपना अद्भुत स्वभाव है। वही धरती को हरियाली देती है वही नदियों को जीवन देती है वही अन्न उपजाती है और वही कभी कभी अपनी अपार शक्ति का परिचय भी देती है। मनुष्य ने ऊंची इमारतें बना लीं आधुनिक तकनीक विकसित कर ली और अंतरिक्ष तक पहुंच गया लेकिन बादलों की चाल और नदियों के वेग के सामने आज भी उसकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। यही प्रकृति का सबसे बड़ा करिश्मा है कि वह जीवन भी देती है और समय आने पर विनम्रता का पाठ भी पढ़ाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ केवल एक समाचार नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी और सीख है। हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा उसके संतुलन को बनाए रखना होगा और आपदाओं से निपटने की तैयारी को मजबूत करना होगा। बारिश जीवन का उत्सव भी है और जिम्मेदारी की परीक्षा भी। जब तक संतुलन बना रहता है तब तक वर्षा अमृत बनकर बरसती है लेकिन जब संतुलन बिगड़ता है तब वही जल प्रलय का रूप ले लेता है। इसलिए आवश्यक है कि हम प्रकृति को जीतने का नहीं बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का प्रयास करें क्योंकि कुदरत के विराट स्वरूप के सामने अंततः हर मनुष्य विनम्र और लाचार ही दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>          *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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</div>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 16:09:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और कृषि पर संकट बढ़  रहा है, कृषि वैज्ञानिक - प्रोफेसर प्यारेलाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी।</p><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हिमाचल प्रदेश में राजकीय कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉक्टर अशोक कुमार प्यारेलाल ने कहा है कि मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और किसी  पर संकट बढ़ रहा है। लगातार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के मध्य नजर कृषि पर इसका क्या असर पड़ेगा इस संबंध में उन्होंने इलाहाबाद ब्यूरो के प्रमुख दयाशंकर त्रिपाठी से विस्तार से बातचीत की जिस पर उन्होंने कृषि पर पड़ने वाले दुष्परिणाम के कई कारण बताएं।उन्होंने कहा की जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां अब दूर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180800/climate-change-water-shortage-soil-erosion-the-crisis-on-our"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260605-wa0071.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी।</p><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हिमाचल प्रदेश में राजकीय कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉक्टर अशोक कुमार प्यारेलाल ने कहा है कि मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और किसी  पर संकट बढ़ रहा है। लगातार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के मध्य नजर कृषि पर इसका क्या असर पड़ेगा इस संबंध में उन्होंने इलाहाबाद ब्यूरो के प्रमुख दयाशंकर त्रिपाठी से विस्तार से बातचीत की जिस पर उन्होंने कृषि पर पड़ने वाले दुष्परिणाम के कई कारण बताएं।उन्होंने कहा की जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां अब दूर की समस्या नहीं रही यह सब सीधे हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही हैंजैसे अत्यधिक मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव और घटती वायु गुणवत्ता।ऐसे परिवेश में हमारे किसान और कृषि पर संकट बढता जा रहा है।</p><p style="text-align:justify;">मौसम के बदलते तेवर से  किसानों बागवानो को  जहां बहुत अधिक लाभ  नहीं होने वाला है। वहीं दूसरी तरफ इस साल का मानसून आम जनता को  भी  परेशान करेगा। एक अनुमान के अनुसार इस साल सामान्य से कम वर्षा होगी और साथ में अल नीनो का प्रभाव  बहुत  ख़तरनाक होगा सूखा और गर्मी   बढ़ेगी जिसके कारण खरीफ की फसलों का उत्पादन काम होगा विशेष तौर पर उन क्षेत्रों में जहां फसलों की सिंचाई की सुविधा नही है वहां पर बिजाई देर से होगी।और उत्पादन भी कम होगा।और देश में महंगाई बढ़ेगी । आमदनी पिछले साल की अपेक्षा इस साल कम हहोगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">आज विश्व का हर देश ईरान इजरायल अमेरिका युद्ध से भयंकर महंगाई के मोहाने पर खड़ा हो गया है। परन्तु युद्ध लड़ने वालों को मौसम मानसून  महंगाई और जनता से सरोकार नहीं है।  बस अपने को शक्तिशाली दिखाने की होड़ विश्व पटल पर लगी है कि मैं महान विजेता हूं ।इस युद्ध से भारत भी बहुत बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है।देश में महंगाई बढ़ रही है ऊर्जा का दाम बढ़ रहा है।तो वहीं यह मानसून भारत पर अलग तरह से कहर बरपाने का संकेत देकर भारत की गरीब जनता को और गरीबी में जीने के लिए मजबूर कर रहा है</p><p style="text-align:justify;">भारत को तीन  तरफ से मार पड़ेगा ।खराब मानूसन  खाद  की कमी और ऊर्जा ।भले टी वी डिवेट  पर सरकार के समर्थक  लोग आंकड़ों के जाल में जनता को फंसाते रहे परन्तु सच्चाई इन  आंकड़ों से इतर है। युद्ध कब तक चलेगा यह अगस्त या आगे तक भी चल सकता है फिर देश में नोट बन्दी की तरह हर चीज पर प्रतिबंध जैसे बैंकों से कम रुपया निकालना तेल गैस पर प्रतिबंध हर चीज का सीमित उपयोग।आदि  क ई तरह के उपाय करने पड़ सकते हैं। खाद के संकट को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने एक जुन से तीस जुन तक खेत बचाओ अभियान शुरू करने जा रहा है जिसमे कृषि वैज्ञानिक किसानों को रासायनिक खाद का उपयोग कम करने हरी खाद को बढ़ावा देने याद गोबर की खाद का अधिक उपयोग करने के फायदे बतायेंगे ।</p><p style="text-align:justify;">किसानों को अपने खेत की कम होती उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए कौन-सा सही तरीका लाभ कारी होगा साथ में खेती में लागत कम लगे और उत्पादन बढे यह एक सही कदम है।अब किसानों को आधुनिक खेती के साथ पुरानी खेती को अपनाने की जरुरत है जिसमें हरी खाद कमृपोष्ट खाद का बहुत महत्व है परन्तु बहुत से छोटे मझोले किसानों के पास पशुधन यानि बैल गाय भैंस नहीं के बराबर है जिससे गोबर की खाद बनेऔर खेत बचे साथ में उत्पादन भी बढ़े।सत्तर के दशक में कम्पोस्ट खाद बनाने की सरकार द्वारा योजना चला ई ग ई किसानों ने  गोबर गैस  प्लांट लगवाया खाद का उपयोग किया खेती से मजदुरो का पलायन होना शुरू हुआ पशुधन कम हुए तो गोबर गैस प्लांट बंद होते गये।अब खेती ट्रैक्टर रासायनिक खाद पर निर्भर है।</p><p style="text-align:justify;">हिमाचल के साथ देश भर में पिछले दो महीने से रुक रुक कर बे मौसमी बारिश ओला तेज हवा के कारण किसानों को काफी नुकसान पहुंचा है । जनहानि भी हुई है।मौसम की यह बेरूखी  ऊपरी हिमाचल में सेव  के किसानों और अन्य फल के किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है  । यह भी  एक अनुमान है कि हिमाचल प्रदेश वर्ष में 5000 से 6000 करोड़ का सेव  का कारोबार  हर साल होता है। जो इस साल  बे मौसम बरसात ओलावृष्टि से सेव का उत्पादन कम होने का अनुमान है। जिसके कारण  किसानों को 1500 से 2000 करोड़ का नुकसान होगा।  कम पैदावार का नुकसान आम जनता को भी उठाना पड़ता है कि फल सब्जियां अनाज दूध तेल सब महगे दामो  पर बिकेंगे गरीब और गरीब होता जाएगा व्यापारी अमीर होता जाएगा।<br /></p><p style="text-align:justify;">आईएमडी के अनुसार बरसात  कम हो सकती है प्रशांत महासागर  में अल नीनो का प्रभाव बढ़ रहा   है। मानसून इस साल जल्दी आयेगा ।उत्तर और मध्य भारत में कम बारिश हो सकती है खेती में फसलों के साथ फल  जैसे सेव  नाशपाती  का उत्पादन के साथ  बिजली उत्पादन कम हो सकता है।  मानसून कमजोर होने पर सीधा असर  फसलो  किसानों की आय और खाद्यान्न की कीमतों पर पड़ता है।   कमजोर मानसून से कम पैदावार होगी खरीफ की फसलों के साथ सब्जी फल  महंगें होगे। सिंचाई की लागत भी बढेगी सरकार का प्रयास रहा है कि जल संचयन को बढ़ावा  जाए।  यह प्रयास बहुत अच्छा नहीं हो पाया गांव-गांव अमृत सरोवर बन रहा है।  परंतु लाभ उतना नहीं मिलता है जितनी उम्मीद सरकार कर रही है अमृतसरोवर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है यदि किसानों को यह जानकारी पहले से हो कि मानसून कमजोर है और कम वर्षा होगी तो  अधिक पानी की फसलों की जगह कम पानी की फसलो जैसे बाजार ज्वार मक्का उड़द मूंग  तिल अन्य मिलट की फसलों की बिजाई करने से बहुत लाभ हो सकता है ।  </p><p style="text-align:justify;">सरकार को इन फसलों की खरीद  को भी सुनिश्चित करना होगा।  अरहर  मूग उड़द बाजरा के साथ मिश्रित खेती अधिक लाभकारी होगी ।जब मानसून कमजोर होता है तब इस तरह की खेती किसानों के लिए लाभदायक होती  है। इस वर्ष   ओलावृष्टि वारिस जो  हिमाचल और भारत के अन्य प्रदेशों में हो रही है।  जिसके परिणामस्वरूप  सबसे ज्यादा सेवव फल   उत्पादक किसान प्रभावित हो रहे हैं ।इस बदले मानसून से हिमाचल  मे सेव  का उत्पादन 50 से 70% कम होगा। बे मौसमी  बारिश से सेव  के पौधों में फूल काम हो गए हैं । मधुमक्खियां  से परगण भी काम हुआ है ।  हिमाचल में ढाई लाख परिवार बागवानी विशेष तौर पर सेव के ऊपर  निर्भर है।<br /></p><p style="text-align:justify;">भारत कृषि प्रधान देश है खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर  है तो दूध उत्पादन में पहले पायदान पर दुनिया में टिका हुआ है । सब्जी फल उत्पादन में भी दुनिया में अपना स्थान बनाया हुआ है।  परंतु अभी तक हमारे वैज्ञानिकों ने मौसम के अनुकूल या कम बारिश होने पर उस तरह के बीजों का ईजाद नहीं कर पाए हैं जो कम पानी में अधिक पैदावार दे सके। कुछ किस्में हैं  परन्तु उतना लाभदायक नहीं है। कमजोर मानसुन होने पर खाघानो के साथ फल सब्जियों का उत्पादन कम न हो । और देश में कम उत्पादन के कारण महंगाई न बढ़े परन्तु ऐसा नहीं हो पा रहा है।</p><p style="text-align:justify;"> किसानों को भी खेती से घाटा न हो वह भी  राहत महसुस करें कि कमजोर मानसून होने पर आय कम नहीं होंगी बस फसल बदल दे तो निश्चित ही आय होगी। यह देखा गया है कि धान लगाने वाला किसान जल्दी फसल नहीं बदलते है । वह धान पर ही टिका रहता है धान में अधिक सिंचाई के कारण लागत बढ़ जाता है।बाजार में सही मूल्य नहीं मिलता  है।तब किसानो  को नुकसान उठाना ही होता है ।अगर मानुसन के अनुरूप किसान सही फसल का चयन कर लेता है तो कभी भी किसान नुकसान में नहीं होगा बस उसके उत्पाद का सही बाजार मूल्य सरकार दे।<br /></p><p style="text-align:justify;">खरीफ के मौसम में  अधिकांश तौर पर पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश राजस्थान के किसान धान की खेती करते हैं कम बारिश के कारण धान की खेती में अधिक सिंचाई की जरूरत होगी जो महंगे डीजल के कारण पैदावार में लागत  मूल्य को बढ़ाता है।बाजार में मूल्य कम मिलता है। कमजोर मानसून से होने वाले नुकसान से बचने के लिए बस मोटे अनाजों की खेती है  एक मात्र सही उपाय है।जिसमें पानी की बहुत कम जरुरत होती है। मिश्रित खेती जैसे बाजरा उड़द अरहर बाजरा अहरह उड़द की खेती लाभ कारी होगी।। </p><p style="text-align:justify;">इस तरह की खेती से डीजल और  बिजली की बचत भी हो सकती है।  साथ में रसायनिक खाद की जरुरत भी कम पड़ती है।इस वर्ष किसानों पर तीन तरह से   मार पड़ेगी पहली मार कि मानसुन कमजोर है। बारिश कम होंगी। दुसरी मार खाद भी कम मात्रा में मिलेगा।  तीसरा ऊर्जा की कमी ।कारण ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध से देश में यूरिया के साथ साथ पोटाश फास्फोरस जैसे खादों का जो आयात होता वह भी कम होगा जिससे किसानों को खरीफ के फसलों के लिए भरपूर रसायनिक खाद नहीं मिलेगा।</p><p style="text-align:justify;">पिछले साल देश ने बड़े शोर के साथ मोटे अनाजों के उत्पादन और उपयोग पर बहुत गोष्ठी और सेमीनार करके किसानों को जागरूक किया और इन मोटे अनाजों के उपयोग से लाभ के बारे में भी खुब चर्चा हुई परन्तु उत्पादन बढ़ा कितना इस पर बात उसके बाद नही हुआ। नहीं यह बताया गया कि देश में क्या यह भोजन की थाली में आया या बस पशुचारा में गया मुफ्त अनाज योजना में मोटे अनाज को वितरित किया गया परन्तु अधिकांश परिवारो  को जो मुफ्त में दिया गया उसे बाजार में बेच दिये।अब देश को मुफ्त अनाज वितरण को बन्द करें।<br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 23:16:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व पर्यावरण दिवस पर बिहार का हरित संकल्प एक लाख पौधों से हरियाली की नई इबारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार ने पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राजधानी पटना के जेपी गंगा पथ पर एक लाख पौधारोपण अभियान की शुरुआत की। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस अभियान का शुभारंभ करते हुए राज्य को हरित और पर्यावरण अनुकूल बनाने के संकल्प को दोहराया। यह पहल केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण सुरक्षित करने की व्यापक सोच का हिस्सा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच यह अभियान प्रकृति और विकास के बीच</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180752/bihars-green-resolution-on-world-environment-day-new-lesson-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार ने पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राजधानी पटना के जेपी गंगा पथ पर एक लाख पौधारोपण अभियान की शुरुआत की। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस अभियान का शुभारंभ करते हुए राज्य को हरित और पर्यावरण अनुकूल बनाने के संकल्प को दोहराया। यह पहल केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण सुरक्षित करने की व्यापक सोच का हिस्सा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच यह अभियान प्रकृति और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व पर्यावरण दिवस का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित करना है। बिहार सरकार ने इस अवसर को जनभागीदारी से जोड़ते हुए इसे एक जन आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया है। जेपी गंगा पथ पर लगाए जा रहे पौधे भविष्य में न केवल हरियाली बढ़ाएंगे बल्कि वायु प्रदूषण को कम करने और ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपनी माता के सम्मान में अथवा उनकी स्मृति में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और उसकी देखभाल भी करें। उनका यह संदेश पर्यावरण संरक्षण को भावनात्मक और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास था जिससे अधिक से अधिक लोग इस अभियान का हिस्सा बन सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण श्रम एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के जागरूकता वाहनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। ये वाहन राज्य के विभिन्न जिलों में जाकर लोगों को पौधारोपण जल संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक करेंगे। पर्यावरण संबंधी चुनौतियों का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है बल्कि इसके लिए जनजागरूकता और सामूहिक भागीदारी आवश्यक है। ऐसे में जागरूकता अभियान पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार में हरित विकास की दिशा में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2005 से अब तक राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में 43 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। यह संख्या बिहार के पर्यावरणीय प्रयासों की गंभीरता और व्यापकता को दर्शाती है। इन पौधारोपण अभियानों का परिणाम यह हुआ है कि राज्य के वन क्षेत्र और हरित आवरण में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। हरित क्षेत्र बढ़ने से जैव विविधता को संरक्षण मिला है और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करने में सहायता मिली है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। तापमान में वृद्धि अनियमित वर्षा सूखा बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएं इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। बिहार भी इन चुनौतियों से अछूता नहीं है। राज्य को हर वर्ष बाढ़ और कई क्षेत्रों में जल संकट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बड़े पैमाने पर पौधारोपण पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने का प्रभावी उपाय माना जाता है। वृक्ष वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं तथा तापमान नियंत्रण में भी सहायता करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान कृषि और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले पांच पर्यावरणविदों को सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन लोगों के प्रयासों की सराहना है जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण को अपना जीवन लक्ष्य बनाया है। ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित करने से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है और अन्य लोगों को भी प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरणा मिलती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पर्यावरण संरक्षण के साथ ही बिहार सरकार स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दे रही है। मुख्यमंत्री ने इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने के लिए दी जा रही अनुदान योजनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि इलेक्ट्रिक स्कूटी खरीदने पर 12 हजार रुपए और चारपहिया इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने पर एक लाख रुपए तक की सहायता प्रदान की जा रही है। इससे न केवल लोगों को आर्थिक लाभ मिलेगा बल्कि पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता भी कम होगी। इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से वायु प्रदूषण में कमी आएगी और पर्यावरण संरक्षण को नई गति मिलेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में बिहार सरकार प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना को भी तेजी से लागू कर रही है। पहले चरण में पांच लाख घरों की छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार प्रति संयंत्र 33 हजार रुपए की सहायता प्रदान करेगी जबकि शेष राशि राज्य सरकार वहन करेगी। आने वाले दो वर्षों में 50 लाख परिवारों तक सौर ऊर्जा पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह पहल ऊर्जा आत्मनिर्भरता के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सौर ऊर्जा का विस्तार जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करेगा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देगा। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में मदद मिलेगी। सरकार की योजना के अनुसार जिन घरों में आवश्यकता से अधिक बिजली का उत्पादन होगा वहां से राज्य सरकार अतिरिक्त बिजली खरीदेगी और उसकी राशि सीधे उपभोक्ताओं के खाते में जमा करेगी। इससे लोगों को आर्थिक लाभ भी मिलेगा और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए प्रोत्साहन भी मिलेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। बढ़ता प्रदूषण घटते वन क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन भविष्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है। ऐसे समय में बिहार का यह हरित संकल्प अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक लाख पौधों का यह अभियान केवल संख्या का लक्ष्य नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्रतीक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने का संकल्प ले तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है। वृक्ष केवल हरियाली नहीं देते बल्कि जीवन देते हैं। वे वायु को शुद्ध करते हैं जल संरक्षण में मदद करते हैं और जैव विविधता को सुरक्षित रखते हैं। इसलिए पौधारोपण को केवल एक दिन का कार्यक्रम न मानकर जीवन का स्थायी हिस्सा बनाना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व पर्यावरण दिवस पर बिहार द्वारा लिया गया यह हरित संकल्प पर्यावरण संरक्षण के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पौधारोपण स्वच्छ ऊर्जा और जनजागरूकता को साथ लेकर चलने वाली यह पहल विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करती है। आने वाले वर्षों में यदि यह अभियान जन आंदोलन का रूप लेता है तो बिहार न केवल हरित राज्य के रूप में अपनी पहचान मजबूत करेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय प्रयासों में भी अग्रणी भूमिका निभाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:49:45 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>रस्मअदायगी नहीं, जिम्मेदारी: भीषण गर्मी में पौधारोपण क्यों बन जाता है औपचारिकता?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>जितेन्द्र सिंह पत्रकार</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रमों की भरमार दिखाई देती है। सरकारी कार्यालयों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, हर जगह पौधे लगाए जाते हैं और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की जाती हैं। लेकिन इस वर्ष कानपुर समेत पूरे उत्तर भारत में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है और लू के थपेड़े लोगों का जीना मुश्किल कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या इस भीषण गर्मी में लगाए गए नन्हे पौधे जीवित रह पाएंगे?</strong></div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविकता यह है कि बिना नियमित सिंचाई और देखभाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180684/why-does-tree-planting-become-a-formality-in-the-scorching"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001974815.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>जितेन्द्र सिंह पत्रकार</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रमों की भरमार दिखाई देती है। सरकारी कार्यालयों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, हर जगह पौधे लगाए जाते हैं और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की जाती हैं। लेकिन इस वर्ष कानपुर समेत पूरे उत्तर भारत में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है और लू के थपेड़े लोगों का जीना मुश्किल कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या इस भीषण गर्मी में लगाए गए नन्हे पौधे जीवित रह पाएंगे?</strong></div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविकता यह है कि बिना नियमित सिंचाई और देखभाल के अधिकांश पौधों का जीवित रहना बेहद कठिन है। केवल फोटो खिंचवाने या औपचारिकता निभाने के लिए पौधे लगाना पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि पौधों के साथ अन्याय है। यदि पौधा लगाने के बाद उसकी देखभाल नहीं की जाती, तो वह कुछ ही दिनों में सूख जाता है और पूरा प्रयास निरर्थक हो जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी जमीनी सच्चाई को ध्यान में रखते हुए "द कानपुर रिपोर्टर" की टीम ने निर्णय लिया है कि हम दिखावटी पौधारोपण से दूर रहेंगे और मानसून का इंतजार करेंगे। वर्षा ऋतु की पहली फुहार के साथ हमारी टीम शहर के विभिन्न क्षेत्रों में कम से कम 50 छायादार एवं फलदार पौधे लगाएगी। इतना ही नहीं, हम इन पौधों के बड़े होने तक उनकी नियमित देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज समाज में अधिकांश लोग अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, बैंक बैलेंस और संपत्ति जुटाने में पूरा जीवन लगा देते हैं। लेकिन शायद ही कोई उनके लिए स्वच्छ पर्यावरण और शुद्ध हवा की व्यवस्था करने के बारे में गंभीरता से सोचता है। यदि आने वाली पीढ़ी को सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा ही उपलब्ध नहीं होगी, तो धन-संपत्ति का महत्व भी सीमित रह जाएगा। एक पेड़ केवल छाया ही नहीं देता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ जीवन, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित भविष्य भी प्रदान करता है। इसलिए इस मानसून केवल पौधा लगाने का संकल्प न लें, बल्कि उसे वृक्ष बनाने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात कानपुर टीम की अपील</strong></div>
<div style="text-align:justify;">इस मानसून दिखावे से दूर रहें। अपने घर, मोहल्ले, विद्यालय, कार्यालय या आसपास उपलब्ध स्थानों पर ऐसे पौधे लगाएं जो भविष्य में घने छायादार और फलदार वृक्ष बन सकें। आने वाली पीढ़ी को विरासत में केवल कंक्रीट के मकान नहीं, बल्कि एक हरा-भरा और स्वस्थ भविष्य भी दें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 19:12:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गर्मी में प्यास, बारिश में सैलाब: विकास के मॉडल पर बड़ा सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>  </strong>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी का भारत एक कड़वी विडंबना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर देश अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयां छू रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर करोड़ों लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए जूझ रहे हैं। वर्ष </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">की भीषण गर्मी ने विकास की चमक के पीछे छिपी हकीकत उजागर कर दी है। कई क्षेत्रों में तापमान </span>48 <span lang="hi" xml:lang="hi">डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। बाड़मेर जैसे इलाकों में गांव एक हैंडपंप के सहारे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाएं मीलों दूर से पानी ला रही हैं और शहरों में दूषित जलापूर्ति को लेकर आक्रोश है। लेकिन</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180368/thirst-in-summer-flood-in-rain-big-question-on-development"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/whatsapp-image-2026-05-31-at-6.28.39-pm-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong> </strong>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी का भारत एक कड़वी विडंबना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर देश अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयां छू रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर करोड़ों लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए जूझ रहे हैं। वर्ष </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">की भीषण गर्मी ने विकास की चमक के पीछे छिपी हकीकत उजागर कर दी है। कई क्षेत्रों में तापमान </span>48 <span lang="hi" xml:lang="hi">डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। बाड़मेर जैसे इलाकों में गांव एक हैंडपंप के सहारे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाएं मीलों दूर से पानी ला रही हैं और शहरों में दूषित जलापूर्ति को लेकर आक्रोश है। लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद मानसून आते ही यही देश जल संकट से निकलकर जल प्रलय में घिर जाता है। सड़कें नदियां बन जाती हैं और जनजीवन थम जाता है। आखिर यह कैसा विकास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां गर्मी में प्यास और बारिश में सैलाब नियति बन चुके हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह संकट प्रकृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विकास और जल प्रबंधन की उपेक्षा का परिणाम है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में देश के </span>166 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण क्षमता का लगभग </span>39 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत ही बचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मई में और घट गया। कई बड़े जलाशय आधी क्षमता से नीचे पहुंच गए। पिछले वर्षों में वर्षा के असमान वितरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ती गर्मी और कमजोर जल प्रबंधन ने संकट को गहरा किया है। वहीं </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में एल-नीनो के प्रभाव से सामान्य से कम मानसून की आशंका है। दूसरी ओर भूजल का बेलगाम दोहन हालात और बिगाड़ रहा है। दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहर जल संकट के साथ भूमि धंसाव जैसे खतरों का भी सामना कर रहे हैं। स्पष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल आज की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य की भी गंभीर चुनौती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संकट की जड़ अंधाधुंध शहरीकरण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने प्रकृति और पानी का संतुलन तोड़ दिया है। कभी तालाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झीलें और आर्द्रभूमियां वर्षा जल संजोती थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज उनकी जगह कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। नतीजा यह है कि बारिश का पानी जमीन में उतरने के बजाय सड़कों और नालों में बह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि गर्मियों में भूजल खाली पड़ जाता है। मानो हम बरसात में पानी को ठुकराते हैं और फिर गर्मी में उसकी तलाश में भटकते हैं। दुर्भाग्य से विकास की परिभाषा ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों तक सिमट गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि जल संरक्षण हाशिये पर है। यही सोच आज जल संकट और जलभराव—दोनों की सबसे बड़ी वजह है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में जल संकट का कारण केवल पानी की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके उपयोग और प्रबंधन की खामियां भी हैं। कृषि और शहर मिलकर देश के </span>80 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक भूजल का दोहन कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी जल व्यवस्था चरमराई हुई है। शहरों में लाखों लीटर पानी पाइपलाइन लीकेज में बह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कई बस्तियां बूंद-बूंद को तरसती हैं। दूसरी ओर सीमित जल वाले क्षेत्रों में भी अत्यधिक पानी मांगने वाली फसलें उगाई जा रही हैं। नतीजा यह है कि गर्मियों में जलाशय सूख जाते हैं और बरसात में वही पानी अनियंत्रित होकर तबाही मचाता है। स्पष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संकट संसाधनों के अभाव से अधिक गलत प्रबंधन और विकृत प्राथमिकताओं का परिणाम है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गर्मी की प्यास और बारिश की तबाही का सबसे भारी बोझ समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। गांवों में पेयजल संकट स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेती और पशुधन—तीनों पर चोट कर रहा है। सूखती फसलें किसानों की आय घटा रही हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर बना रही हैं। वहीं शहरों में जलभराव और बाढ़ यातायात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारोबार और जनजीवन को ठप कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही बीमारियों का खतरा बढ़ा देते हैं। गरीब परिवारों के घर डूबते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोज़गार प्रभावित होता है और जीवन स्तर गिरता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जल संकट और जल प्रलय की सबसे बड़ी कीमत वही लोग चुका रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी इन समस्याओं को पैदा करने में सबसे कम भूमिका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह संकट अब केवल पर्यावरण या समाज तक सीमित नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की चुनौती बन चुका है। पानी सीधे खाद्य सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनस्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन से जुड़ा है। यदि जल स्रोत लगातार कमजोर होते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य में जल विवाद बढ़ेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि उत्पादन घटेगा और शहरों की जीवन क्षमता पर भी संकट गहराएगा। जो राष्ट्र अपने नागरिकों के लिए पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता सुनिश्चित नहीं कर सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका विकास भी लंबे समय तक टिक नहीं सकता। इसलिए पानी को महज़ एक संसाधन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्र निर्माण और विकास की आधारशिला मानने का समय आ गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राह मुश्किल जरूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन समाधान सामने हैं। जरूरत केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी की है। हर शहर और गांव में वर्षा जल संचयन अनिवार्य बनाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि तालाबों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झीलों और पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। शहरी विकास ऐसा हो कि वर्षा जल जमीन में समा सके और स्मार्ट ड्रेनेज व्यवस्था भूजल का आधार बने। कृषि में ड्रिप सिंचाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूक्ष्म सिंचाई और क्षेत्रानुकूल फसल चक्र को बढ़ावा देना होगा। साथ ही जल वितरण व्यवस्था दुरुस्त कर पाइपलाइन लीकेज पर अंकुश लगाना होगा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लोगों को जल संरक्षण का भागीदार बनाना होगा। बदलाव घोषणाओं से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ईमानदार और सख्त क्रियान्वयन से आएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत कितना विकसित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि क्या वह अपने लोगों के लिए पानी सुरक्षित रख पाया। गर्मी में प्यास और बारिश में सैलाब की यह विडंबना हमारी विकास यात्रा पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि जल संरक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल साक्षरता और जल के न्यायपूर्ण वितरण को राष्ट्रीय संकल्प नहीं बनाया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाली पीढ़ियां हमारी दूरदर्शिता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी लापरवाही को याद रखेंगी। विकास का वास्तविक पैमाना कंक्रीट के जंगल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हर नागरिक तक स्वच्छ और पर्याप्त पानी की पहुंच है। भारत को अब जल-केंद्रित विकास की दिशा में बढ़ना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि भविष्य की समृद्धि का रास्ता पानी से होकर गुजरता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:30:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बदलती जलवायु का संकट और उसका प्रभाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु संकट आज मानव सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। यह संकट धीरे धीरे नहीं बल्कि तेजी से गहराता जा रहा है और इसके प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव, सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है। इस पूरे परिदृश्य में एल नीनो जैसी प्राकृतिक घटना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो समुद्री तापमान में बदलाव के कारण वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करती है और कई देशों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177996/the-crisis-of-changing-climate-and-its-effects"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/cover.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु संकट आज मानव सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। यह संकट धीरे धीरे नहीं बल्कि तेजी से गहराता जा रहा है और इसके प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव, सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इस संकट की गंभीरता को दर्शाती है। इस पूरे परिदृश्य में एल नीनो जैसी प्राकृतिक घटना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो समुद्री तापमान में बदलाव के कारण वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करती है और कई देशों के लिए गंभीर परिणाम लेकर आती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एल नीनो एक ऐसी जलवायु प्रक्रिया है जो सामान्यतः 2 से 7 वर्षों के अंतराल पर उत्पन्न होती है और प्रशांत महासागर के मध्य तथा पूर्वी हिस्से के जल को सामान्य से अधिक गर्म कर देती है। इस गर्माहट का प्रभाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह वायुमंडलीय परिसंचरण को भी प्रभावित करता है, जिससे पूरी दुनिया के मौसम में असामान्य परिवर्तन देखने को मिलते हैं। भारत जैसे देशों में इसका सबसे बड़ा प्रभाव मानसून पर पड़ता है, जो कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आंकड़ों के अनुसार 1980 के बाद से लगभग 70 प्रतिशत एल नीनो वर्षों में भारत में कमजोर मानसून दर्ज किया गया है, जिससे वर्षा में कमी देखी गई है । यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि एल नीनो और मानसून के बीच गहरा संबंध है। जब मानसून कमजोर होता है तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है, इसलिए थोड़ी सी भी कमी खाद्यान्न उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">2026 में भी इसी तरह की स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जिससे खरीफ फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है । यदि वर्षा में कमी आती है तो धान, दाल और तिलहन जैसी फसलों का उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी और महंगाई बढ़ेगी। यह प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तापमान के संदर्भ में भी स्थिति चिंताजनक है। 2026 में भारत के कई हिस्सों में तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जो सामान्य से काफी अधिक है । यह न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। अत्यधिक गर्मी के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो रही है। शहरी क्षेत्रों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि वहां कंक्रीट संरचनाएं गर्मी को अधिक समय तक बनाए रखती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जल संकट भी इस पूरे परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जब वर्षा कम होती है तो जलाशयों में पानी का स्तर घट जाता है, जिससे पेयजल और सिंचाई दोनों प्रभावित होते हैं। कई शहरों में पहले से ही पानी की कमी की समस्या है और एल नीनो जैसी घटनाएं इसे और बढ़ा सकती हैं। उदाहरण के लिए कुछ क्षेत्रों में जलाशयों की क्षमता का केवल लगभग 28 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैश्विक स्तर पर भी इसके प्रभाव कम नहीं हैं। एशिया में तापमान बढ़ने से बिजली की मांग तेजी से बढ़ती है क्योंकि लोग ठंडक के लिए अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं। इससे ऊर्जा संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार एशिया में वैश्विक बिजली मांग का आधे से अधिक हिस्सा है और तापमान में वृद्धि से इस मांग में और वृद्धि होगी । दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में अधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे वहां के बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एल नीनो के कारण मौसम में असंतुलन केवल वर्षा की कमी तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह वर्षा के वितरण को भी प्रभावित करता है। कहीं अत्यधिक बारिश होती है तो कहीं बिल्कुल नहीं होती। इस प्रकार की असमानता कृषि और जल प्रबंधन दोनों के लिए चुनौती पैदा करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार हाल के दशकों में चरम वर्षा की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है, जो जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर और अधिक गंभीर हो रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन और एल नीनो का संयुक्त प्रभाव इस संकट को और जटिल बना देता है। जहां एल नीनो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, वहीं जलवायु परिवर्तन मानव गतिविधियों का परिणाम है। औद्योगीकरण, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा दी है, जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। जब यह बढ़ता तापमान एल नीनो जैसी घटनाओं के साथ मिल जाता है तो इसके प्रभाव और भी तीव्र हो जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक दृष्टि से भी यह संकट गहरा असर डालता है। कमजोर मानसून के कारण कृषि उत्पादन घटता है, जिससे ग्रामीण आय में कमी आती है और मांग घटती है। इसके साथ ही खाद्य कीमतों में वृद्धि से महंगाई बढ़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त प्रभाव आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है और सामाजिक असमानताओं को बढ़ा सकता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक प्रभावित वे लोग होते हैं जो पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं, जैसे छोटे किसान, मजदूर और गरीब वर्ग। उनके पास संसाधनों की कमी होती है और वे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में सक्षम नहीं होते। इसलिए जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी मुद्दा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाधान के संदर्भ में यह आवश्यक है कि वैश्विक और स्थानीय स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, जल संरक्षण के उपाय अपनाना, टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना और वनों की रक्षा करना ऐसे कदम हैं जो इस संकट को कम करने में मदद कर सकते हैं। इसके साथ ही मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत करना और आपदा प्रबंधन की तैयारी को बेहतर बनाना भी जरूरी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि जलवायु संकट एक बहुआयामी समस्या है, जिसमें प्राकृतिक और मानव दोनों कारक शामिल हैं। एल नीनो जैसी घटनाएं इस संकट को और अधिक जटिल बना देती हैं, लेकिन यह भी सच है कि यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाएं तो इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस समस्या को गंभीरता से समझें और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से एक संतुलित और सुरक्षित भविष्य की दिशा में आगे बढ़ें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 17:35:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>हर मिनट उजड़ते ग्यारह फुटबॉल मैदान जितने जंगल—मानव विकास या विनाश ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंगल और जमीन—प्रकृति के ये तीनों आधार स्तंभ समस्त जीव-जगत के जीवन की धुरी हैं। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक और शिक्षित मानव ने अपने तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं आधारों का निर्मम दोहन किया है। जंगलों की बलि देकर खड़ी की जा रही विकास यात्रा आज भी अनवरत जारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वनों के अंधाधुंध विनाश ने न केवल भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी दुनिया को भीषण तापमान वृद्धि के संकट में धकेल दिया है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि हर मिनट लगभग</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177782/forests-the-size-of-eleven-football-fields-getting-destroyed-every"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/bda2766099334b289bdd5c002811a16c42b9df191b1b13f64afedfe2c7b67eb7.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंगल और जमीन—प्रकृति के ये तीनों आधार स्तंभ समस्त जीव-जगत के जीवन की धुरी हैं। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक और शिक्षित मानव ने अपने तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं आधारों का निर्मम दोहन किया है। जंगलों की बलि देकर खड़ी की जा रही विकास यात्रा आज भी अनवरत जारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वनों के अंधाधुंध विनाश ने न केवल भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी दुनिया को भीषण तापमान वृद्धि के संकट में धकेल दिया है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि हर मिनट लगभग ग्यारह फुटबॉल मैदान के बराबर जंगल नष्ट किए जा रहे हैं। यह आंकड़ा भले ही अविश्वसनीय लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यही आज की कठोर सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरीलैंड विश्वविद्यालय की ‘ग्लोबल लैंड एनालिसिस एंड डिस्कवरी लैब’ की रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिवर्ष लगभग </span>43 <span lang="hi" xml:lang="hi">हजार वर्ग किलोमीटर जंगल समाप्त हो जाते हैं—जो कि डेनमार्क जैसे देश के बराबर क्षेत्रफल है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी मानवता के लिए चेतावनी भी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सन् </span>2021 <span lang="hi" xml:lang="hi">में आयोजित जलवायु शिखर सम्मेलन में </span>100 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिक देशों ने वनों की कटाई पर रोक लगाने का संकल्प लिया था। दुर्भाग्यवश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस संकल्प को गिने-चुने देशों ने ही गंभीरता से निभाया। परिणामस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है।आज बढ़ता तापमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमय बाढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूस्खलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पेयजल संकट ये सभी प्रकृति के असंतुलन के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हिमालयी क्षेत्रों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ कभी पंखे की आवश्यकता नहीं पड़ती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज वहाँ एयर कंडीशनर की मांग बढ़ रही है। यह परिवर्तन केवल जीवनशैली का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जलवायु संकट का स्पष्ट संकेत है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए वनों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। हर वर्ष बढ़ती गर्मी और प्राकृतिक आपदाएँ इस संकट को और गहरा कर रही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें कठोर कानून बनाएं और हर नागरिक की जिम्मेदारी तय करें।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वनों का विनाश इसी गति से जारी रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाले दो दशकों में मानव अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा सकता है। अतः समय की मांग है कि हम सभी वृक्षारोपण को जन-आंदोलन बनाएं और ईमानदारी से जंगलों के पुनर्निर्माण में योगदान दें।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति का संरक्षण ही मानवता का संरक्षण है।</span></strong></p><p style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 17:00:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आग उगलती भीषण गर्मी में प्यासे कंठों की कौन सुने दास्तां</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177391/who-will-listen-to-the-tales-of-thirsty-throats-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों के जीवन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। पानी प्रकृति के समस्त जीवों की मूलभूत और अनिवार्य आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विडंबना यह है कि जब यही आवश्यकता पूरी नहीं हो पा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवों के अस्तित्व पर संकट गहराना स्वाभाविक है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वीकार करना होगा कि आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में यह कल्पना करना कठिन नहीं कि वन्यजीव अपनी प्यास बुझाने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करते होंगे। मानव जीवन के लिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने हेतु केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष अनेक प्रयास करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी स्तर पर ये प्रयास अभी भी अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं। विशेषकर सुदूर ग्रामीण अंचलों में पेयजल व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ‘नल-जल योजना’ एक महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी पहल है। बावजूद इसके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई स्थानों पर जिला प्रशासन की उदासीनता के कारण इन योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। अनेक गाँवों में बनी पानी की टंकियाँ केवल दिखावा बनकर रह गई हैं। ये टंकियाँ प्यासे कंठों को राहत देने के बजाय व्यवस्था की खामियों का प्रतीक बनती जा रही हैं।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पानी हर जीव की मूलभूत आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि इसी आवश्यकता की पूर्ति में कमी रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल गंभीर लापरवाही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अक्षम्य अपराध के समान है। भीषण गर्मी में जब लोग घर से बाहर निकलने से बचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग मीलों दूर से पानी लाने को विवश होते हैं। जल संकट के कारण मूक पशु-पक्षियों का जीवन बचाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति-विनाश के चलते बढ़ती गर्मी और अस्तित्व बचाने के लिए भटकते वन्यजीव—ये दोनों ही हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हैं। ऐसे में सरकार और समाज को मिलकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के अंतिम छोर तक मानव और वन्य प्राणियों के लिए पेयजल की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यदि इस दिशा में ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ कार्य किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो देश के हर कोने में सभी जीवों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जल उपलब्ध कराया जा सकता है। अन्यथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर वर्ष की भाँति आग उगलती गर्मी में प्यासे मूक प्राणियों की दास्तां अधूरी ही रह जाएगी।</span></p><p style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:28:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>लू की हवा का प्रकोप, कैसे सांस लेंगे हम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से जारी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का प्रत्यक्ष परिणाम है। इंटरगवर्नमेंटल क्लाइमेटिक चेंज स्टडीज की नवीनतम रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और यदि वर्तमान उत्सर्जन दर जारी रही तो 2030 के दशक में यह 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड मेटियोरोलिजकल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177276/how-will-we-breathe-the-wrath-of-heat-wave"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/154169033.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से जारी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का प्रत्यक्ष परिणाम है। इंटरगवर्नमेंटल क्लाइमेटिक चेंज स्टडीज की नवीनतम रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और यदि वर्तमान उत्सर्जन दर जारी रही तो 2030 के दशक में यह 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड मेटियोरोलिजकल ऑर्गेनाइजेशन ने हाल ही में चेतावनी दी है कि पिछले आठ वर्ष मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं और दक्षिण एशिया विशेष रूप से चरम हीटवेव की चपेट में है। जब हम अपने विकास का इतिहास देखते हैं तो ब्रिटिश सत्ता के दौरान हमारे संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ, परंतु विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी हमने उसी मॉडल को और तीव्र रूप में अपनाया, परिणामस्वरूप मनुष्य तो स्वतंत्र हुआ पर प्रकृति आज भी बंधनों में जकड़ी रही। यूनाइटेड नेशंस एनवायरमेंटल एजेंसी के अनुसार दुनिया हर वर्ष लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र खो रही है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है, जहाँ शहरीकरण और औद्योगीकरण की तेज रफ्तार ने जंगलों, जलस्रोतों और जैव विविधता पर गंभीर दबाव डाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमूमन हमारी जरूरत रोटी, कपड़ा, मकान और जल की थी, किंतु हमने विकास को उपभोग और विस्तार की अंधी दौड़ बना दिया, मशीनें जितनी विशाल होती गईं, मनुष्य उतना ही प्रकृति से दूर और बौना होता गया। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से विश्व की लगभग 33 प्रतिशत भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है, भारत में भी कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है और भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है और 2030 तक देश की जल मांग उपलब्ध संसाधनों से दोगुनी हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब से हमने विकास के नाम पर उद्योगों की चिमनियाँ ऊँची कीं, मोबाइल क्रांति का बटन दबाया और डिजिटल संसार में प्रवेश किया, तब से प्रकृति की ध्वनियाँ धीमी पड़ती चली गईं, झरनों का कलकल स्वर, पक्षियों का कलरव और नदियों की जीवनदायिनी धारा जैसे विलुप्त होती जा रही है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अनुसार भारत के कई प्रमुख शहरों की वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुमान है कि वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष लाखों समयपूर्व मृत्यु हो रही हैं। अब प्रश्न यह है कि विकास के नाम पर हमें केवल डिजिटल इंडिया चाहिए या हरित भारत की भी आवश्यकता है, क्या बच्चों के हाथ में केवल इंटरनेट देकर हम भविष्य सुरक्षित कर लेंगे या उन्हें स्वच्छ हवा, जल और हरियाली भी देनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हरा-भरा हिंदुस्तान और डिजिटल इंडिया विरोधी नहीं बल्कि पूरक हो सकते हैं, बशर्ते हम संतुलन बनाना सीखें। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा संस्थान के अनुसार नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना ही जलवायु संकट से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय है और भारत ने सौर तथा पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति भी की है, फिर भी यह प्रयास पर्याप्त नहीं है जब तक कि हम उपभोग की प्रवृत्ति को नियंत्रित न करें। महात्मा गांधी का यह कथन आज और भी प्रासंगिक हो उठता है कि पृथ्वी सभी की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, किंतु किसी एक के लालच को नहीं। भारत की विडंबना यह है कि एक ओर महानगरों की चकाचौंध, मेट्रो, डिजिटल नेटवर्क और ऊँची इमारतें हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भारत में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, किसान पसीना बहा रहा है और बच्चे दीपक या कैरोसिन की रोशनी में पढ़ रहे हैं, यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि विकास के असंतुलित मॉडल की भी देन है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति आयोग की रिपोर्टों में भी जल संकट, कृषि संकट और पर्यावरणीय असंतुलन को गंभीर चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विकास का रास्ता हरित क्रांति, सतत संसाधन उपयोग और पर्यावरण संरक्षण से होकर ही गुजरता है, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस, ज्वार-भाटा ऊर्जा जैसे विकल्प केवल विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं। यदि जल, खनिज और प्राकृतिक संसाधन ही समाप्त हो गए तो न तो उद्योग चलेंगे, न ऊर्जा उत्पादन होगा और न ही डिजिटल इंडिया का सपना साकार होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी कवि की पंक्ति आज सच लगती है कि यदि घर बनाओ तो एक पेड़ भी लगा लेना, क्योंकि वही पेड़ आने वाली पीढ़ियों की सांसों का आधार बनेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित करें, उसे केवल आर्थिक प्रगति नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक समानता और मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ें, तभी हम अपनी 141 करोड़ जनसंख्या को स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित भविष्य दे पाएंगे और एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकेंगे जहाँ हरित क्रांति और डिजिटल प्रगति साथ-साथ आगे बढ़ें, न कि एक-दूसरे के विकल्प बनकर खड़े हों।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:29:28 +0530</pubDate>
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