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                <title>climate crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>climate crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>लू की हवा का प्रकोप, कैसे सांस लेंगे हम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से जारी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का प्रत्यक्ष परिणाम है। इंटरगवर्नमेंटल क्लाइमेटिक चेंज स्टडीज की नवीनतम रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और यदि वर्तमान उत्सर्जन दर जारी रही तो 2030 के दशक में यह 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड मेटियोरोलिजकल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177276/how-will-we-breathe-the-wrath-of-heat-wave"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/154169033.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बेरहम तथा अप्राकृतिक प्रकृति के दोहन का परिणाम अब अपने चरम परिणामों के साथ हमारे सामने खड़ा है। आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों ने जिस तीव्र गर्मी की आशंका जताई है, वह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि दशकों से जारी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का प्रत्यक्ष परिणाम है। इंटरगवर्नमेंटल क्लाइमेटिक चेंज स्टडीज की नवीनतम रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और यदि वर्तमान उत्सर्जन दर जारी रही तो 2030 के दशक में यह 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड मेटियोरोलिजकल ऑर्गेनाइजेशन ने हाल ही में चेतावनी दी है कि पिछले आठ वर्ष मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं और दक्षिण एशिया विशेष रूप से चरम हीटवेव की चपेट में है। जब हम अपने विकास का इतिहास देखते हैं तो ब्रिटिश सत्ता के दौरान हमारे संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ, परंतु विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी हमने उसी मॉडल को और तीव्र रूप में अपनाया, परिणामस्वरूप मनुष्य तो स्वतंत्र हुआ पर प्रकृति आज भी बंधनों में जकड़ी रही। यूनाइटेड नेशंस एनवायरमेंटल एजेंसी के अनुसार दुनिया हर वर्ष लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र खो रही है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है, जहाँ शहरीकरण और औद्योगीकरण की तेज रफ्तार ने जंगलों, जलस्रोतों और जैव विविधता पर गंभीर दबाव डाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमूमन हमारी जरूरत रोटी, कपड़ा, मकान और जल की थी, किंतु हमने विकास को उपभोग और विस्तार की अंधी दौड़ बना दिया, मशीनें जितनी विशाल होती गईं, मनुष्य उतना ही प्रकृति से दूर और बौना होता गया। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से विश्व की लगभग 33 प्रतिशत भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है, भारत में भी कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है और भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है और 2030 तक देश की जल मांग उपलब्ध संसाधनों से दोगुनी हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब से हमने विकास के नाम पर उद्योगों की चिमनियाँ ऊँची कीं, मोबाइल क्रांति का बटन दबाया और डिजिटल संसार में प्रवेश किया, तब से प्रकृति की ध्वनियाँ धीमी पड़ती चली गईं, झरनों का कलकल स्वर, पक्षियों का कलरव और नदियों की जीवनदायिनी धारा जैसे विलुप्त होती जा रही है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अनुसार भारत के कई प्रमुख शहरों की वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुमान है कि वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष लाखों समयपूर्व मृत्यु हो रही हैं। अब प्रश्न यह है कि विकास के नाम पर हमें केवल डिजिटल इंडिया चाहिए या हरित भारत की भी आवश्यकता है, क्या बच्चों के हाथ में केवल इंटरनेट देकर हम भविष्य सुरक्षित कर लेंगे या उन्हें स्वच्छ हवा, जल और हरियाली भी देनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हरा-भरा हिंदुस्तान और डिजिटल इंडिया विरोधी नहीं बल्कि पूरक हो सकते हैं, बशर्ते हम संतुलन बनाना सीखें। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा संस्थान के अनुसार नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना ही जलवायु संकट से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय है और भारत ने सौर तथा पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति भी की है, फिर भी यह प्रयास पर्याप्त नहीं है जब तक कि हम उपभोग की प्रवृत्ति को नियंत्रित न करें। महात्मा गांधी का यह कथन आज और भी प्रासंगिक हो उठता है कि पृथ्वी सभी की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, किंतु किसी एक के लालच को नहीं। भारत की विडंबना यह है कि एक ओर महानगरों की चकाचौंध, मेट्रो, डिजिटल नेटवर्क और ऊँची इमारतें हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भारत में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, किसान पसीना बहा रहा है और बच्चे दीपक या कैरोसिन की रोशनी में पढ़ रहे हैं, यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि विकास के असंतुलित मॉडल की भी देन है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति आयोग की रिपोर्टों में भी जल संकट, कृषि संकट और पर्यावरणीय असंतुलन को गंभीर चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विकास का रास्ता हरित क्रांति, सतत संसाधन उपयोग और पर्यावरण संरक्षण से होकर ही गुजरता है, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस, ज्वार-भाटा ऊर्जा जैसे विकल्प केवल विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं। यदि जल, खनिज और प्राकृतिक संसाधन ही समाप्त हो गए तो न तो उद्योग चलेंगे, न ऊर्जा उत्पादन होगा और न ही डिजिटल इंडिया का सपना साकार होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी कवि की पंक्ति आज सच लगती है कि यदि घर बनाओ तो एक पेड़ भी लगा लेना, क्योंकि वही पेड़ आने वाली पीढ़ियों की सांसों का आधार बनेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित करें, उसे केवल आर्थिक प्रगति नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक समानता और मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ें, तभी हम अपनी 141 करोड़ जनसंख्या को स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित भविष्य दे पाएंगे और एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकेंगे जहाँ हरित क्रांति और डिजिटल प्रगति साथ-साथ आगे बढ़ें, न कि एक-दूसरे के विकल्प बनकर खड़े हों।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:29:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ग्रीस के सेंटोरिनी द्वीप में अब तक 36 घंटों  में 200 बार भूकंप के झटकों से दहला देश ! खास एडवाइजरी भी जारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>सबसे शक्तिशाली झटका 4.6 - </strong>  ग्रीस के सेंटोरिनी द्वीप और उसके आसपास के क्षेत्रों में शुक्रवार से अब तक 200 से अधिक भूकंप के झटके दर्ज किए गए हैं। इनमें सबसे शक्तिशाली झटका 4.6 तीव्रता का था। हालांकि अभी तक किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है, लेकिन सरकार ने एहतियातन स्कूलों को बंद कर दिया है, बचाव दलों को तैनात किया है और निवासियों को विशेष सुरक्षा निर्देश जारी किए हैं।</p>
<p>  ग्रीस के जलवायु संकट और नागरिक सुरक्षा मंत्रालय ने बताया कि शुक्रवार से लगातार छोटे-बड़े भूकंपों का सिलसिला जारी है। सबसे तेज झटका रविवार दोपहर 3:55 बजे</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-02/download-(3)1.jpg" alt="download (3)" width="275" height="183" />हालांकि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148142/country-shocking-in-36-hours-in-36-hours-so-far"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सबसे शक्तिशाली झटका 4.6 - </strong> ग्रीस के सेंटोरिनी द्वीप और उसके आसपास के क्षेत्रों में शुक्रवार से अब तक 200 से अधिक भूकंप के झटके दर्ज किए गए हैं। इनमें सबसे शक्तिशाली झटका 4.6 तीव्रता का था। हालांकि अभी तक किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है, लेकिन सरकार ने एहतियातन स्कूलों को बंद कर दिया है, बचाव दलों को तैनात किया है और निवासियों को विशेष सुरक्षा निर्देश जारी किए हैं।</p>
<p> ग्रीस के जलवायु संकट और नागरिक सुरक्षा मंत्रालय ने बताया कि शुक्रवार से लगातार छोटे-बड़े भूकंपों का सिलसिला जारी है। सबसे तेज झटका रविवार दोपहर 3:55 बजे महसूस किया गया, जिसकी तीव्रता 4.6 थी और केंद्र 14 किमी की गहराई पर स्थित था। इसके अलावा, 4.0 से अधिक तीव्रता वाले कई झटके और दर्जनों 3.0 तीव्रता के हल्के झटके भी रिकॉर्ड किए गए।  </p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-02/download-(3)1.jpg" alt="download (3)" width="275" height="183"></img>हालांकि अभी तक किसी प्रकार की क्षति या किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन प्रशासन ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। रविवार को हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में सेंटोरिनी सहित आसपास के अमोर्गोस, अनाफी और आईओएस द्वीपों में स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया।</p>
<p>सरकार ने होटल मालिकों और स्थानीय निवासियों को चेतावनी दी है कि वे अपने स्वीमिंग पूल को खाली कर दें, जिससे किसी बड़े भूकंप की स्थिति में पानी का भार इमारतों को अस्थिर न कर दे। बचाव कर्मियों ने खुले स्थानों में टेंट लगाने शुरू कर दिए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थान उपलब्ध हो सके।  <br /> <br />वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि इन झटकों का सीधा संबंध सेंटोरिनी के ज्वालामुखी से नहीं है, जिसने इतिहास के सबसे बड़े विस्फोटों में से एक को जन्म दिया था। हालांकि, लगातार भूकंप के झटकों ने इस क्षेत्र में एक बड़े भूकंप की संभावना को बढ़ा दिया है। रविवार शाम को ग्रीस के प्रधानमंत्री कार्यालय में देश के सशस्त्र बलों के प्रमुख और अन्य अधिकारियों के साथ एक आपात बैठक बुलाई गई। भूकंप की तीव्रता को देखते हुए प्रशासन किसी भी संभावित आपदा से निपटने के लिए तैयारी कर रहा है।  </p>
<p><strong> निवासियों को दी गई चेतावनी </strong><br />- बड़े सार्वजनिक आयोजनों से बचें।  <br />- ऊंची चट्टानों के पास जाने से परहेज करें।  <br />- सुरक्षित स्थानों पर रहने की योजना बनाएं।  <br />- भूकंप आपातकालीन किट तैयार रखें।  <br /> <br /><strong>टोरिनी का भूकंपीय इतिहास  - </strong>सेंटोरिनी द्वीप पर 1600 ईसा पूर्व में हुए एक भीषण ज्वालामुखी विस्फोट ने पूरे द्वीप को तबाह कर दिया था। इस विस्फोट ने एक प्राचीन शहर को नष्ट कर दिया था और भूकंप व सुनामी उत्पन्न की थी, जिसके प्रभाव क्रेते द्वीप और मिस्र तक देखे गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में 6.0 तीव्रता तक का भूकंप आ सकता है, लेकिन यह कब होगा, इस पर सटीक अनुमान लगाना कठिन है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>एशिया</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Feb 2025 18:03:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु संकट से जूझती महिलाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div>हाल में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए एक आंतरिक शोध से पता चला है कि बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में महिलाएं और बच्चे विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन संबंधी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन संबंधी खतरों के संपर्क में आने वाले बच्चों में बौनापन, कम वजन और जल्दी गर्भधारण की संभावना अधिक देखी जा रही है। हमारे देश में महिलाओं और बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर बहुत कम शोध हुए हैं, साथ ही नीति निर्माण में अक्सर इनकी अनदेखी की जाती है। महिला एवं बाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141807/women-struggling-with-climate-crisis"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/sdfsdf1.jpg" alt=""></a><br /><div>हाल में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए एक आंतरिक शोध से पता चला है कि बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में महिलाएं और बच्चे विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन संबंधी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन संबंधी खतरों के संपर्क में आने वाले बच्चों में बौनापन, कम वजन और जल्दी गर्भधारण की संभावना अधिक देखी जा रही है। हमारे देश में महिलाओं और बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर बहुत कम शोध हुए हैं, साथ ही नीति निर्माण में अक्सर इनकी अनदेखी की जाती है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन के मुताबिक भारत के 70 फीसद जिलों में बाढ़, सूखा और चक्रवात का खतरा बढ़ गया है। 183 जिले चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं, वहीं 349 जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। इन जिलों में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण, किशोरावस्था में गर्भ धारण और घरेलू हिंसा संकेतक भी बहुत गंभीर हैं।</div>
<div>देश के करीब 51 फीसद बच्चे गरीबी और जलवायु संकट की दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं।</div>
<div> </div>
<div>आंकड़ों के मुताबिक भारत के करीब 35.2 करोड़ बच्चे वर्ष में एक बार प्राकृतिक आपदा का सामना जरूर करते हैं। ऐसे में हम भले विकसित बनने का दम भर लें, लेकिन कहीं न कहीं यह हकीकत से काफी परे है और वर्तमान के साथ ही भारत का भविष्य भी चिंतित करने वाला है। हम वैश्विक अर्थव्यवस्था में पहले स्थान पर धाक जमाएं या न जमाएं, लेकिन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सार्थक कदम की सख्त जरूरत है। मगर हमारे देश में राजनेताओं के लिए पर्यावरण संकट कभी मुद्दा नहीं रहा और शायद यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट विकराल हो चला है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान तेजी से बढ़ रहा है। अब तो हालात इस हद तक बदतर हो चले हैं कि मां की कोख में पल रहा बच्चा तक सुरक्षित नहीं है। आज समूचे विश्व में बढ़ते तापमान के चलते समयपूर्व बच्चों के जन्म का खतरा कई गुना बढ़ गया है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि तापमान के बढ़ने से न केवल नवजात शिशुओं, बल्कि भ्रूण में पल रहे बच्चे तक के प्राण संकट में हैं।</div>
<div> </div>
<div>जलवायु परिवर्तन के कारण हवा की गुणवत्ता खराब हो रही है। बदलता मौसम संक्रामक रोगों के संचरण, पानी की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा में कमी का कारण बन रहा है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन सभी को प्रभावित करता है, लेकिन जैविक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है। बढ़ते तापमान के कारण गर्भवती स्त्रियों के लिए गंभीर जोखिम का कारण बन रहा है। समय से पहले प्रसव, गर्भ के समय उच्च रक्तचाप और 'प्री-एक्लेमप्सिया' का खतरा काफी बढ़ रहा है। गर्भवती महिलाओं का अधिक गर्मी के संपर्क में आने से गर्भपात और समय पूर्व प्रसव का खतरा कई गुना बढ़ गया है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ के एक अध्ययन की मानें, तो गर्भावस्था के पहले सात हफ्तों के दौरान अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने वाली महिलाओं में जल्दी प्रसव होने की संभावना ग्यारह फीसद तक बढ़ जाती है।</div>
<div> </div>
<div>. जलवायु परिवर्तन के चलते बीमारियों का प्रसार बढ़ता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए संकट पैदा करता है। भारत में गरीब समुदाय की महिलाएं स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि वे ऐसे वातावरण में रहने को मजबूर हैं, जो स्वास्थ्य और साफ-सफाई की दृष्टि से काफी प्रदूषित है। साथ ही, ऐसी महिलाओं को पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं भी मयस्सर नहीं हो पाती हैं। बढ़ती बीमारियां महिलाओं के जीवन पर सीधे असर डालती हैं। अगर स्वास्थ्य खराब है, तो दिक्कत होना स्वाभाविक है, लेकिन अगर परिवार का कोई अन्य सदस्य भी बीमार हो जाए तो इससे घर की महिलाओं की दिनचर्या सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। इस तरह महिलाएं बीमारी के चक्र में फंसी रहती हैं।</div>
<div> </div>
<div>भारत में 1901 से 2018 के बीच औसत तापमान में 0.7 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे देश भर में लू के दिन तेजी से बढ़ गए। इसे 'साइलेंट किलर' का नाम दिया गया है। आज भी हमारे देश की करीब 67 फीसद आबादी ऐसे इलाकों में रहती है, जहां वायु गुणवत्ता राष्ट्रीय मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ज्यादा है। इसके चलते भारतीयों की औसत आयु 5.3 वर्ष तक कम हो रही है। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, क्योंकि महिलाएं घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं। घर की रसोई से निकलने वाला धुआं भी महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के उत्तरी मैदानी इलाकों में बौनापन बढ़ रहा है, जबकि उत्तरी महाराष्ट्र और दक्षिण मध्यप्रदेश कम वजन वाले बच्चों के लिए चिह्नित किए गए हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते बच्चों में बौनापन होने की संभावना छह फीसद अधिक है, वजन कम होने की संभावना 24 फीसद अधिक है।</div>
<div> </div>
<div>न्यूनतम आहार विविधता में 35 फीसद कमी का अनुभव होता है, और अगर वे पांच वर्ष से कम उम्र के हैं और सूखे के संपर्क में हैं, तो मृत्यु की संभावना 12 फीसद बढ़ जाती है। इस अध्ययन में सूखे, बाढ़ और चक्रवात वाले क्षेत्रों में महिलाओं और युवा लड़कियों पर प्रभाव के संदर्भ में प्रमुख जगहों की पहचान की गई है। उत्तरी बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से दक्षिण पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ हिस्से, पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी मध्यप्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से ज्यादा प्रभावित हैं। ऐसे क्षेत्रों में सूखे की स्थितियों के चलते कम वजन वाली महिलाओं में 35 फीसद, बाल विवाह में 37 फीसद, किशोर गर्भावस्था 17 फीसद और घरेलू हिंसा की संभावना 50 फीसद तक बढ़ जाती है।</div>
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<div>जलवायु परिवर्तन के चलते देशभर में भीषण गर्मी और लू विकराल रूप ले लिया है। भारत लू चलने का एक मूल कारण ग्लोबल वार्मिंग है। जीवाश्म ईंधन जलाने, वनों की कटाई और औद्योगिक गतिविधियों के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि हो रही है। अभी बीते दिनों उत्तराखंड के जंगलों की आग सबने देखी। भीषण गर्मी के प्रकोप के चलते दुनिया भर में हर वर्ष करीब 1.53 लाख लोग मौत के आगोश में समा जाते हैं। आश्चर्य की बात है कि 20 फीसद मौतें अकेले भारत में होती हैं, जो सबसे ज्यादा है। गर्मी के बढ़ते प्रकोप के कारण मौतों को जायज ठहराना सही नहीं है। सरकार को प्रत्येक राज्य और शहर में लू के प्रभावों से निपटने के लिए कार्ययोजना बनानी होगी, ताकि ऐसी असामयिक मौत को टाला जा सके। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से महिलाओं और बच्चों को बचाने के लिए एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है।</div>
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<div><strong>विजय गर्ग  शैक्षिक स्तंभकार  मलोट पंजाब</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 May 2024 16:21:43 +0530</pubDate>
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