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                <title>संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता: प्रधानमंत्री मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<h3 style="text-align:justify;"><strong>International Desk </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बदलते स्वरूप को देखते हुए अब बदलाव "विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता" बन चुका है। वह रविवार को आयोजित <strong>इब्सा (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) नेताओं के शिखर सम्मेलन</strong> को संबोधित कर रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कहा कि ऐसे समय में जब दुनिया कई हिस्सों में विभाजित और अस्थिर दिखाई देती है, इब्सा देशों के बीच मजबूत सहयोग वैश्विक स्तर पर <strong>एकता, साझेदारी और मानवता</strong> का संदेश दे सकता है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति <strong>सिरिल</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161397/reform-of-un-security-council-is-no-longer-an-option"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/संयुक्त-राष्ट्र-सुरक्षा-परिषद-में-सुधार-अब-विकल्प-नहीं,-बल्कि-अनिवार्यता--प्रधानमंत्री-मोदी.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;"><strong>International Desk </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बदलते स्वरूप को देखते हुए अब बदलाव "विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता" बन चुका है। वह रविवार को आयोजित <strong>इब्सा (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) नेताओं के शिखर सम्मेलन</strong> को संबोधित कर रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कहा कि ऐसे समय में जब दुनिया कई हिस्सों में विभाजित और अस्थिर दिखाई देती है, इब्सा देशों के बीच मजबूत सहयोग वैश्विक स्तर पर <strong>एकता, साझेदारी और मानवता</strong> का संदेश दे सकता है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति <strong>सिरिल रामफोसा</strong> और ब्राजील के राष्ट्रपति <strong>लूला दा सिल्वा</strong> को संबोधित करते हुए सुरक्षा ढांचे को और अधिक प्रभावी बनाने हेतु <strong>इब्सा एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) स्तरीय बैठक</strong> को संस्थागत रूप देने का सुझाव दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने आतंकवाद को वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए कहा:</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-11/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A6-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82,-%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BF-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE--%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80.jpg" alt="संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता- प्रधानमंत्री मोदी" width="300" height="168"></img></strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>“आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हमें घनिष्ठ समन्वय के साथ आगे बढ़ना होगा। इतने गंभीर मुद्दे पर दोहरे मापदंड की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।”</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने प्रौद्योगिकी को मानव-केंद्रित विकास का प्रमुख आधार बताते हुए डिजिटल सहयोग बढ़ाने के लिए कई प्रस्ताव रखे। उन्होंने सुझाव दिया कि इब्सा देशों के बीच:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><strong>यूपीआई जैसे डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर</strong>,</p>
</li>
<li>
<p><strong>कोविन जैसे स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म</strong>,</p>
</li>
<li>
<p><strong>साइबर सुरक्षा ढांचे</strong>,</p>
</li>
<li>
<p>और <strong>महिलाओं द्वारा संचालित तकनीकी पहलों</strong></p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">को साझा करने और विकसित करने के लिए <strong>“इब्सा डिजिटल इनोवेशन एलायंस”</strong> का गठन किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इब्सा समूह का लक्ष्य दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना, वैश्विक शासन तंत्र में सुधार सुनिश्चित करना और विकासशील देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करना है। विशेषज्ञों के अनुसार, UNSC सुधार को लेकर तीनों देशों की समान सोच भविष्य में वैश्विक मंच पर बड़ा दबाव बना सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>यूरोप</category>
                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Nov 2025 17:43:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अफ्रीका की पटरी पर जी 20 का ऐतिहासिक मोड़</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">नवम्बर 2025 में दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन इतिहास में एक मील का पत्थर है, क्योंकि यह पहली बार G20 का सम्मेलन अफ्रीकी महाद्वीप पर हो रहा है।  यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है । अफ्रीका और विकासशील देशों की चुनौतियों को वैश्विक आर्थिक मंच पर प्राथमिकता देना। G20 की अध्यक्षता (2025) दक्षिण अफ्रीका को प्राप्त है, और इस वर्ष की थीम है ।एकजुटता, समानता, स्थिरता। यह बदलाव इस बात का प्रतीक है कि ग्लोबल साउथ विशेष रूप से अफ्रीका  अब सिर्फ G20 का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसकी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161263/g20s-historic-turn-on-africas-track"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download-(2)4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">नवम्बर 2025 में दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन इतिहास में एक मील का पत्थर है, क्योंकि यह पहली बार G20 का सम्मेलन अफ्रीकी महाद्वीप पर हो रहा है।  यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है । अफ्रीका और विकासशील देशों की चुनौतियों को वैश्विक आर्थिक मंच पर प्राथमिकता देना। G20 की अध्यक्षता (2025) दक्षिण अफ्रीका को प्राप्त है, और इस वर्ष की थीम है ।एकजुटता, समानता, स्थिरता। यह बदलाव इस बात का प्रतीक है कि ग्लोबल साउथ विशेष रूप से अफ्रीका  अब सिर्फ G20 का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसकी गवर्नेंस संरचनाओं को आकार देने वाला शक्ति केंद्र बन रहा है। अफ्रीकी यूनियन  ने भी इस भूमिका का स्वागत किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दक्षिण अफ्रीका ने G20 प्राथमिकताओं में सामाजिक न्याय और विकास को बहुत ऊपर रखा है। उनका कहना है कि आर्थिक वृद्धि अकेले काफी नहीं है । उसे इंक्लूज़िव वृद्धि, रोज़गार, और गरीबी उन्मूलन के साथ जोडऩा होगा। विशेष रूप से, G20 ने पहली बार  मीटिंग आयोजित की है, जिसका फोकस बेरोज़गारी, युवा रोजगार, लैंगिक असमानताएँ और डिजिटलाइजेशन है।  लेबर और रोजगार मंत्रियों की घोषणा में  गुणवत्ता वाले रोज़गार डिग्निटी के साथ काम और सोशल सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि G20 की यह सोच सिर्फ आर्थिक समस्या हल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचनाओं को बदलने की है। ताकि विकास सिर्फ अमीरों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के कमजोर हिस्सों तक पहुंचे।अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचनाओं का सुधार फोकस और IMF, विश्व बैंक और अन्य संस्थाएं पर विश्लेषण भी अवश्य होना है।दक्षिण अफ्रीका ने G20 के मंच का उपयोग अंतरराष्ट्रीय वित्तीय वास्तुकला  में सुधार की मांग करने के लिए किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेष रूप से, वह उन देशों की आवाज़ उठाना चाहता है जो उच्च ऋण बोझ के अधीन हैं । बहुत सारे विकासशील देशों को अपने का भारी भार झेलना पड़ रहा है।  उनकी रणनीति यह है कि न्यायपूर्ण और प्रत्यास्थ वित्तीय तंत्र बनाया जाए, जहां ज़्यादा लचीले ऋण पुनर्गठन, क़र्ज़ राहत और बेहतर विकास वित्तपोषण हो सके। इसके अलावा, G20 विकास कार्य समूह में सामाजिक सुरक्षा फ़्लोर की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि गरीबी और असमानता को कम किया जा सके। इस तरह, दक्षिण अफ्रीका यह संदेश देना चाहता है कि विकासशील और अत्यधिक कर्ज़ग्रस्त देशों को वित्तीय प्रणाली में बेहतर और अधिक समान हिस्सेदारी मिलनी चाहिए न कि सिर्फ़ बड़े आर्थिक शक्तियों की सेवा करना।जलवायु परिवर्तन दक्षिण अफ्रीका की G20 प्राथमिकताओं में एक केंद्रीय भूमिका है। मेज़बानी देश के रूप में, इसने न्यायपूर्ण संक्रमण की वकालत की है । अर्थव्यवस्थाओं को ग्रीन उर्जा की ओर ले जाने में, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करना कि गरीब और कमजोर समुदायों को इसके नकारात्मक प्रभावों से बचाया जाए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">G20 सामाजिक शिखर सम्मेलन में समावेशी जलवायु न्याय एक थीम रही है, जहाँ यह विचार किया गया कि कैसे विकासशील देशों को क्लाइमेट-फिनेंसिंग  प्राकृतिक आपदाओं और आपदा-प्रतिरोधक संरचनाओं में अधिक सहयोग मिल सके। इसके अलावा, ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला दा सिलवा ने G20 में फॉसिल फ्यूल (जैव ईंधन) के चरणबद्ध उन्मूलन की योजना पेश करने का संकेत दिया है।  यह दर्शाता है कि G20 में पारिस्थितिकी-संक्रमण  केवल पर्यावरणीय मुद्दों तक सीमित नहीं। यह आर्थिक और सामाजिक न्याय का भी मामला है।कृषि, खाद्य सुरक्षा और पोषणआदि पर दुनिया का ध्यान रहेगा।दक्षिण अफ्रीका की G20 प्राथमिकताओं में खाद्य सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। उप अध्यक्षों और मंत्रियों की तैयारियों में यह बात सामने आई है कि कृषि प्रणाली में लचीलापन बढ़ाया जाना चाहिए ताकि जलवायु व्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान, और खाद्य असुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना किया जा सके। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जी 20 के व्यापार और निवेश समूह  ने भी सुझाव दिए हैं कि कृषि को टिकाऊ और सहयोगात्मक रूप से पुनर्गठित किया जाए, ताकि छोटे किसानों, विशेष रूप से विकासशील देशों में, लाभ मिल सके। यह कदम पोषण सुधार से जुड़ा है क्योंकि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि उत्पादन तक पहुंच कमजोर वर्गों के हाथों में हो  खासकर गरीबी और असमानता के संदर्भ में। यूएन 2030 एजेंडा और सतत विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखकरदक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता का एक बड़ा उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र 2030 एजेंडा की प्रगति को गति देना है। G20 के समावेशी मंच जैसे  SDGs की चर्चा उच्च स्तर पर हो रही है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">G20  में यह उल्लेख है कि गरीबी ,असमानता और स्थिर आर्थिक विकास  जैसी चुनौतियों को हल करने के लिए सीधे G20 मंच का उपयोग किया जा सकता है। दक्षिण अफ्रीका यह रेखांकित कर रहा है कि G20 को गिरावटों को बंद करने के लिए सिर्फ आर्थिक नीतियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सोशल सुरक्षा, वित्तीय सुधार और गवर्नेंस सुधार को भी प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि 2030 तक SDG लक्ष्यों में अस्थिरता न हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैश्विक असमानता पर पूरा फोकस है। अमीर और गरीब देशों के बीचअसमानता के चक्र को तोड़ना पर बल दिया जाएगा।दक्षिण अफ्रीका ने G20 में वैश्विक असमानता को एक शीर्ष मुद्दा बनाया है। उसने एक विशेषज्ञ समूह  शुरू किया है, जिसकी अध्यक्षता नोबेल विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ कर रहे हैं, ताकि वैश्विक धन असमानता का विश्लेषण किया जाए और नीति-निमायकों के लिए सुझा  समाधान पेश किया जाए। यह असामान्यता सिर्फ देशों के बीच की नहीं है, बल्कि देशों के भीतर भी है ।अमीरों और गरीबों, सामाजिक-आर्थिक वर्गों के बीच। इस असमानता को दूर करना G20 के नए एजेंडे का बहुत बड़ा हिस्सा है, क्योंकि असमानता को सिर्फ नैतिक समस्या नहीं, बल्कि विकास और स्थिरता के लिए बाधा माना गया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>महिलाओं और युवा  G20 का सामाजिक आयाम</strong></div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं और विशेष रूप से महिलाओं के रोजगार को केंद्र में रखा है।  युवा बेरोज़गारी: G20 मंत्रियों ने युवाओं के लिए तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण ,कौशल विकास, उद्यमशीलता को बढ़ावा देने, और स्वरोज़गार को आसान बनाने पर जोर दिया है।  लैंगिक समानता: घोषणा में महिलाओं की कानूनी और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने, वेतन असमानता घटाने, और देखभाल अर्थव्यवस्था  में उनकी भूमिका को अधिक सुदृढ़ करने की बात कही गई है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> महिला-संगठनों का योगदान  में महिलाओं, युवा, लेबर, नागरिक समाज और अन्य समूहों को शामिल कर बहुमूल्य विचारों को निर्णयों में जोड़ने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा, G20 की सामाजिक बैठकों में समावेशी लोकतंत्र मीडिया आज़ादी और सतत वित्तीय प्रणाली जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि G20 सिर्फ आर्थिक मंच नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय एवं सुधार का एक महत्वपूर्ण यंत्र बनना चाहता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>विरोध, असहभागिता और भू-राजनीति की चुनौती</strong></div>
<div style="text-align:justify;">हालाँकि G20 का यह सम्मेलन ऐतिहासिक है, लेकिन यह पूरी तरह से बाधा-मुक्त नहीं है। डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ने इस सम्मेलन का बहिष्कार करने की घोषणा की है।  ट्रम्प ने दक्षिण अफ्रीका पर नस्लीय मानवाधिकार-उल्लंघन का आरोप लगाया, और कहा कि कोई अमेरिकी अधिकारी सम्मिलित नहीं होगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह बहिष्कार G20 की एकता और सहमति प्रक्रिया पर दबाव डालता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसका मतलब है कि G20 की प्रस्तावित घोषणाएं कमजोर पड़ सकती हैं क्योंकि अमेरिका आर्थिक और राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी  पर्दे के पीछे बातचीत में हिस्सा नहीं ले रहा। इस पार्श्वभूमि में, दक्षिण अफ्रीका को यह चुनौती है कि कैसे वह अपनी एजेंडा को आगे बढ़ाये, जबकि असहमति और गहरी भू-राजनीतिक दरारों को प्रबंधित करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>महिलाओं के अधिकारों और अत्याचारों पर ध्यान</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं और अन्य देशों जैसे अर्जेंटीना, मेक्सिको, नाइजीरिया के राष्ट्रप्रमुखों ने भी इस मुद्दे को उठाया है। हालांकि, वर्तमान समाचार स्रोतों में G20 स्तर पर ऐसा कोई प्रमुख सामूहिक बयान या प्रतिज्ञा, जो विशेष रूप से दक्षिण अफ्रीका में महिला-उन्मुख हिंसा या अत्याचारों पर केंद्रित हो, अभी प्रमुखता से सामने नहीं आया है। फिर भी, G20  की संरचना ऐसी है कि महिलाओं और लैंगिक असमानता के मुद्दों को बातचीत में शामिल किया जाता है।  इसके अलावा, G20 में लैंगिक वेतन असमानता, महिलाओं की भागीदारी, देखभाल अर्थव्यवस्था आदि पर फोकस किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला अत्याचार के मुद्दे को देखें, तो यह संभावना है कि यह G20 मंच पर नागरिक समाज  महिला समूह और अन्य समावेशी समूहों की आवाज़ के माध्यम से दबाव बनाए रखने में काम आए ।लेकिन इसे पूरी तरह राजनीतिक और कानूनी हस्तक्षेप के लिए जोड़ना G20 के दायित्वों में सीमित हो सकता है, क्योंकि G20 एक आर्थिक-राजनीतिक मंच है, निरपेक्ष मानवाधिकार न्यायालय नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका की भूमिका</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल होंगे। यह बिल्कुल सही दिशा है। भारत पहले ही G20 अध्यक्षता का हिस्सा रहा है (2023), और भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने G20 में विश्व परिवारकी अवधारणा को प्रमुखता दी थी, जो एक समावेशी, एकजुट और न्यायपूर्ण विश्व की कल्पना को दर्शाती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ब्राज़ील, जो पिछले G20 चक्र का हिस्सा था, भी सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय के मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है, जैसे कि जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध उन्मूलन  का हिस्सा है। दक्षिण अफ्रीका, गहराई से जुड़ा हुआ ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। उसकी G20 अध्यक्षता दिखाती है कि यह मंच केवल पश्चिमी और विकसित शक्तियों का मोर्चा नहीं है, बल्कि वैश्विक बहुलता और न्याय का स्थान बन सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> ग्लोबल साउथ का सशक्त मंच  अफ्रीका को पहली बार G20 मेज़बानी मिलना यह दर्शाता है कि विकासशील देशों की चुनौतियाँ अब G20 एजेंडा में प्रमुख रूप से शामिल हैं। गरीबी, असमानता और वित्तीय सुधार G20 एक बड़ी शक्ति के रूप में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संरचनाओं को बदलने की दिशा में कदम उठा सकता है।सामाजिक न्याय और पर्यावरण न्याय का समन्वय  जलवायु परिवर्तन, रोजगार, लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को एकीकृत रूप में संबोधित किया जाना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकनीति और अन्य भागीदारी समूहों के माध्यम से नागरिक समाज, युवा, महिलाएँ, कार्यकर्ता आदि की आवाज़ निर्णय-निर्माण में शामिल हो रही है। 2030 एजेंडा के लिए गति  G20 को SDGs को साकार करने की दिशा में पुल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। राजनीतिक विभाजन  अमेरिका का बहिष्कार बहुत बड़ी बाधा हो सकता है, क्योंकि G20 की सहमति उसके बिना कमजोर पड़ सकती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम कार्रवाई  आदि में घोषणाएँ और प्रतिज्ञाएँ करना आसान है, लेकिन उन्हें जीता-जागता रूप देने के लिए ठोस नीति और वित्तपोषण चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गैर-राज्य अभिनेताओं  की हिस्सेदारी  G20 को यह सुनिश्चित करना होगा कि सामाजिक मंचों पर सामने आई चिंताएं केवल बयानबाज़ी न बनें, बल्कि वास्तविक नीति प्रतिबद्धताओं में बदलें। महिलाओं के अधिकारों पर प्रत्यक्ष कार्रवाई  हो।यदि G20 सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से महिला मुद्दों को देखे, तो यह सामाजिक और कानूनी वास्तविकताओंउच्च हिंसा, असमानता को पूरी तरह नहीं पकड़ पाएगा। निरंतरता और प्रभाव एक शिखर सम्मेलन ही पर्याप्त नहीं है। सुधारों को बनाए रखने और लागू करने के लिए बाद में भी मजबूत नीतिगत कदम चाहिए होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जोहानिसबर्ग में आयोजित यह G20 सम्मेलन न सिर्फ एक प्रतीकात्मक वाक्य है, बल्कि रणनीतिक मोड़ भी है । एक ऐसा मोड़ जहाँ अफ्रीका, विकासशील देश और ग्लोबल साउथ सक्रिय रूप से वैश्विक आर्थिक और सामाजिक एजेंडा को आकार देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका, अपनी G20 अध्यक्षता के माध्यम से, एकजुटता, समानता और स्थिरता की अवधारणाओं को सिर्फ नारा नहीं, बल्कि नीति प्लेटफार्म बनाना चाहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस चर्चा में गरीबी, बेरोज़गारी, असमानता, क्लाइमेट जस्टिस, वित्तीय सुधार और महिला एवं युवा अधिकार जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। हालांकि, चुनौतियाँ बड़ी हैं । गहरे भू-राजनीतिक मतभेद, आर्थिक शक्ति संतुलन, कार्रवाई में निरंतरता, और सामाजिक न्याय की वास्तविक ओरिएंटेशन की आवश्यकता है।लेकिन अगर यह सम्मेलन सफल होता है, तो यह G20 को केवल एक आर्थिक मंच के बजाय न्यायपूर्ण वैश्विक शासन मंच के रूप में पुनर्परिभाषित कर सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Nov 2025 16:31:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत, रूस, चीन और ब्राज़ील एक प्लेटफॉर्म पर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">यह बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार  राष्ट्रपति पद की ताजपोषी के साथ-साथ डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनी विदेश नीति के तहत अंधाधुंध आयात टैरिफ लगाकर भारत रूस और चीन को नाराज कर लिया है। भारत पर आज से 50%  टैरिफ लागू कर दिया गया है अब भारत अमेरिका के विकल्प के रूप में नया बाजार तलाश करने और रूस तथा चीन से गहरे गढ़ जोड़ बनाने में लगा हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">(स्वतंत्रता के बाद से अविश्वसनीय चीन पर भारत ने अब भरोसा जताना शुरू किया है चीन के विदेश</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154172/india-russia-china-and-brazil-on-a-platform"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/download-(4).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">यह बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार  राष्ट्रपति पद की ताजपोषी के साथ-साथ डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनी विदेश नीति के तहत अंधाधुंध आयात टैरिफ लगाकर भारत रूस और चीन को नाराज कर लिया है। भारत पर आज से 50%  टैरिफ लागू कर दिया गया है अब भारत अमेरिका के विकल्प के रूप में नया बाजार तलाश करने और रूस तथा चीन से गहरे गढ़ जोड़ बनाने में लगा हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">(स्वतंत्रता के बाद से अविश्वसनीय चीन पर भारत ने अब भरोसा जताना शुरू किया है चीन के विदेश मंत्री के भारत में व्यापारिक के लिए यात्रा पर उनका स्वागत किया गया । भारत के प्रधानमंत्री बहुत जल्द चीन की यात्रा पर जाने वाले वाले हैं और चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करने की योजना बना रहे हैं। ब्राज़ील पर भी अमेरिका ने 40 से 50% आयात शुल्क आरोपित कर दिया है ब्राजील ने अमेरिका से बात करने की बजाय भारत के राष्ट्रपति नरेंद्र मोदी से बात करना उचित समझा। ब्राज़ील भी अमेरिका से व्यापारिक मुद्दों पर काफी खफा नजर आ रहा है। इस तरह भारत रूस चीन और ब्राजील एक प्लेटफार्म पर खड़े नजर आ रहे हैं। निश्चित तौर पर एशिया और दक्षिण एशिया डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की नीतियों के विरोध में आ चुका है।)</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है अमेरिका से व्यापारिक संबंध खराब होने पर भारत को 25% तक नुकसान होने की संभावना है पर भारत के लिए यह एक बड़ा सबक प्रमाणित होगा कि किसी एक पश्चिमी देश पर निर्भर रहना भारत की विदेश नीति के लिए उपयुक्त नहीं होगा। फल स्वरुप उसे ओपन मार्केट पॉलिसी अपना कर सभी देशों से अपना व्यापार और व्यवसाय करने की योजना निर्मित करनी होगी तब जाकर ही भारत तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख सकता है। दूसरी बार डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद रूस यूक्रेन युद्ध के युद्ध को विराम तो नहीं दे पाए किंतु युद्ध की आग को और भड़का दिया है। उधर परमाणु संपन्न देश चीन नॉर्थ कोरिया और रूस की त्रिगुटीय जुगलबंदी ने अमेरिका सहित नाटो यूरोपीय देश और यूक्रेन की नींद उड़ा दी है। उल्लेखनीय की नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया के आपस के कड़वे रिश्ते के बीच अमेरिका का साउथ कोरिया को लेकर काफी हस्तक्षेप है जिसे नॉर्थ कोरिया कई दशक से पसंद नहीं करता आया है ।संयुक्त राष्ट्र संघ और एमनेस्टी इंटरनेशनल की भूमिका निरर्थक हो चुकी है वैसे भी संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की कठपुतली बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या मानवीय संवेदनाओं की आशाएं निर्मूल साबित हो रही हैं। वैश्विक शांति और अमन की कल्पनाओं से परे वैश्विक युद्ध की आशंका में उत्तर कोरिया ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है ताजा ताजा घटनाक्रम में रूस के विदेश मंत्री लावरोव उत्तर कोरिया के दौरे पर जाकर वहां के समकक्ष चोई सांन संग से उत्तर कोरिया के शहर पूर्वी वोंनसान मैं अत्यंत महत्वपूर्ण मीटिंग की है।रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने उत्तरी कोरिया के तानाशाह नेता किम जोंग उन से भी मुलाकात कर रुस को यूक्रेन और अमेरिका के खिलाफ समर्थन देने की बात रखी जवाब में उत्तरी कोरिया के तानाशाह नेता किम जोंग उन ने रूस को अमेरिका यूरोप और यूक्रेन के खिलाफ निशर्त खुला समर्थन देने की घोषणा कर दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौरतलब है कि उत्तरी कोरिया पिछले कई महीनो से मिसाइल का परीक्षण कर साउथ कोरिया अमेरिका तथा यूरोपीय देशों को सीधा-सीधा संदेश दिया है कि साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया के संबंधों के बीच किसी देश के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उत्तर कोरिया की आधिकारिक न्यूज़ एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी के अनुसार दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच अब तनाव बढ़ने लगा हैl उधर उत्तर कोरिया के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम के जवाब में अमेरिका दक्षिण कोरिया व जापान त्रिपक्षीय त्रिपक्षी संधियां और सैनिक अभ्यास का विस्तार तथा फिर से बहाली कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीनों देशों ने उत्तर कोरिया के रूस और चीन को समर्थन देने के और परमाणु परीक्षणों के खिलाफ दक्षिण कोरिया प्रायद्वीप के पास अमेरिकी परमाणु सक्षम बम वर्षको के साथ संयुक्त हवाई अभ्यास किया है। उल्लेखनीय है कि तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों ने एक गंभीर बैठक कर उत्तर कोरिया से क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाली सभी गैर कानूनी गतिविधि बंद करने का आह्वान किया है वैसे भी उत्तर कोरिया अमेरिका के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया और जापान के इस युद्ध अभ्यास को उत्तर कोरिया के खिलाफ होने वाले हमले का पूर्व अभ्यास मानता है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर बड़े हमले की चेतावनी भी दे डाली है। इन परिस्थितियों में विश्व में चल रहे रूस यूक्रेन युद्ध तथा इसराइल हमास लेबनान ईरान युद्ध के अलावा उत्तर कोरिया ने हमले की धमकी देकर एक नये युद्ध का मोर्चा खोल दिया हैl यह तो सर्व विदित है कि उत्तर कोरिया का तानाशाह किम जोंग-उन एक सनकी तानाशाह है और अमेरिका पर परमाणु युद्ध के हमले की गाहे-बगाहे धमकियां भी दिया करता हैl</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया की किसी भी हिमाकत पर उस पर हमला कर सकता हैl उधर रूस यूक्रेन युद्ध को ढाई वर्ष पूरे हो चुके है कई प्रभावशाली प्रयासों के बाद भी युद्ध रुकने  का नाम नहीं ले रहा है रूस के व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के व्लादिमीर जेलेन्स्की हास्य कलाकार होने के बावजूद यूक्रेन के लिए त्रासदी के नायक बन गए हैं। दोनों देशों में हजारों नागरिक एवं सैनिक मारे जा चुके हैं इसके अलावा अरबों डॉलर की संपत्ति का भारी नुकसान भी हुआ है । इसराइल हमास लेबनान तथा ईरान के मध्य युद्ध अपने पूरे शबाब पर हैl इजरायल के आतंकवादी समूह हिज्बुल्लाह के कमांडर याह्या सिंनवार को रॉकेट लांचर से मार देने के बाद इसके जवाब में लेबनान से इजरायल के सिरोसिया शहर में जहां इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का आधिकारिक निवास है रॉकेट लांचर से हमला किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने अपने बयान में बताया की इस तरह के और हमले अभी जारी रहेंगे। पूरा विश्व इस समय विश्व युद्ध की कगार पर है और यदि उत्तर तथा दक्षिण कोरिया के मध्य युद्ध होता है तो निश्चित तौर पर अमेरिका साउथ कोरिया की तरफ से एवं रूस,चीन नॉर्थ कोरिया की तरफ से इस युद्ध में शामिल हो सकते हैं। पूरा विश्व दो भागों में बट गया है एक तरफ रूस,चीन, नॉर्थ कोरिया, पाकिस्तान तथा पश्चिम एशिया के देश होंगे तथा दूसरी तरफ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, इजरायल तथा अन्य देश के युद्ध में शामिल होने की संभावना बलवती हो रही हैl भारत लगातार रूस-यूक्रेन, इसराइल-हमास युद्ध को रोकने के लिए प्रयासरत है और इस प्रयास के अंतर्गत भारत के प्रधानमंत्री ने रूस तथा यूक्रेन की आधिकारिक यात्राएं भी की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के अडियल रवैये के कारण शांति वार्ता संभव नहीं हो पाई, परंतु जैसा पुतिन ने अपने वक्तव्य में बताया की रूस यूक्रेन के साथ युद्ध विराम शांतिपूर्वक तरीके से करना चाहता है पर यूक्रेन इस वार्ता से पीछे हटकर अमेरिका तथा नाटो देशों के दम पर इनकार कर दिया हैl रूस यूक्रेन युद्ध से अमेरिका रूस का बड़ा विरोधी बनकर लगभग 15 साल पीछे जा चुका है एवं उसकी मुद्रा डॉलर की कीमत भी अब वैश्विक स्तर पर काम होते जा रही है। रूस के नुकसान के साथ-साथ अमेरिका को भी काफी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी हैl पुतिन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे हमेशा रूस के लिए और शांति प्रयासों के लिए फिक्रमंद रहते हैं यह यह तथ्य वैश्विक शांति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम भी है। पूरी दुनिया वैश्विक युद्ध के परिणाम से अच्छे तरह से वाकिफ है पूर्व के विश्व युद्ध में जापान के नागाशाकी तथा हिरोशिमा की भयानक मानवीय त्रासदी को हर देश के नागरिक अच्छे से महसूस करते हैं। अतः विश्व युद्ध को हर संभव प्रयासों से  रोका जाना चाहिए अन्यथा विश्व युद्ध मानवता के विकास के लिए एक बडा अवरोध और विनाशक होगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 17:20:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>देश लौटे 'फ्रीक्वेंट फ्लायर' पीएम, अब मणिपुर और बुनियादी ढांचे पर दें ध्यान', कांग्रेस की मोदी को नसीहत</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>प्रयागराज ।</strong> कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मोदी की पांच देशों की आधिकारिक यात्रा संपन्न होने के बाद बृहस्पतिवार को तंज भरे लहजे में कहा कि अब वह चाहें तो मानसून सत्र का एजेंडा तय करने के लिए सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता करने के साथ हिंसा प्रभावित मणिपुर जाने, पहलगाम के आतंकवादियों को अब तक न्याय के कठघरे में क्यों नहीं लाया गया है, इसकी समीक्षा करने और अपने गृह राज्य में लगातार गिरते-ढहते, नाकाम होते बुनियादी ढांचे पर विचार करने के लिए समय निकाल सकते हैं।</div>
<div>  </div>
<div>प्रधानमंत्री मोदी ने ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153073/frequent-flyer-pm-returned-to-the-country-now-pay-attention"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-07/download.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>प्रयागराज ।</strong> कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मोदी की पांच देशों की आधिकारिक यात्रा संपन्न होने के बाद बृहस्पतिवार को तंज भरे लहजे में कहा कि अब वह चाहें तो मानसून सत्र का एजेंडा तय करने के लिए सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता करने के साथ हिंसा प्रभावित मणिपुर जाने, पहलगाम के आतंकवादियों को अब तक न्याय के कठघरे में क्यों नहीं लाया गया है, इसकी समीक्षा करने और अपने गृह राज्य में लगातार गिरते-ढहते, नाकाम होते बुनियादी ढांचे पर विचार करने के लिए समय निकाल सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>प्रधानमंत्री मोदी ने ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के अलावा पांच देशों - घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया का दौरा किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘भारत अपने ‘सुपर प्रीमियम फ्रीक्वेंट फ्लायर’ प्रधानमंत्री का स्वागत करता है, जो शायद अगली विदेश यात्रा से पहले तीन हफ्तों के लिए देश में रहेंगे।’’ उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि अब जब वे देश में हैं, तो शायद उन्हें मणिपुर जाने का समय मिल जाए, जहां लोग दो साल से अधिक समय से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>जयराम रमेश का कहना है, ‘‘वह यह भी समीक्षा कर सकते हैं कि पहलगाम में हुए आतंकी हमलों के दोषियों को अब तक न्याय के कठघरे में क्यों नहीं लाया गया, अपने गृह राज्य में लगातार गिरते-ढहते, नाकाम होते बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे सकते हैं, और बाढ़ से तबाह हिमाचल प्रदेश के लिए सहायता राशि मंजूर कर सकते हैं।’’</div>
<div> </div>
<div>रमेश ने कहा, ‘‘वह चाहें तो जीएसटी में व्यापक सुधार पर भी ध्यान दे सकते हैं, जिससे आम उपभोग को प्रोत्साहन मिल सके और कुछ खास बड़े कॉरपोरेट समूहों के अलावा बाकी निजी कंपनियों को भी निवेश के लिए प्रेरित किया जा सके।’’ उन्होंने कहा कि बदलाव के तौर पर वह मानसून सत्र के लिए एजेंडा तय करने के उद्देश्य से सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता भी कर सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने वडोदरा पुल हादसे को लेकर बीजेपी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यह हादसा सरकार की उदासीनता, नेतृत्व संकट और भ्रष्टाचार का नतीजा है। खड़गे ने आरोप लगाया कि सिर्फ भाषण और विज्ञापनबाज़ी में व्यस्त बीजेपी नेतृत्व और सरकार उदासीनता की सारी हदें पार कर चुके हैं।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने यह दावा भी किया कि यह नेतृत्व संकट, चौतरफ़ा भ्रष्टाचार और सरकार चलाने की क्षमता में कमी का नतीजा है। अधिकारियों ने बताया कि वडोदरा में बुधवार सुबह लगभग चार दशक पुराने एक पुल का कुछ हिस्सा ढह जाने के कारण 13 लोगों की मौत हो गई।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस अध्यक्ष ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, "देश में आए दिन दुर्घटनाएँ आम बात हो गई हैं। कभी रेल दुर्घटना, कहीं उद्घाटन के साथ ही पुल में दरार आना। अभी विमान दुर्घटना के हादसे से देश उबर नहीं पाया है कि कल गुजरात से पुल ढहने की खबर आ गई। 13 मासूम जानें चली गई। "</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने पीड़ितों के परिजन के प्रति संवेदना प्रकट की। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "ख़बरों के अनुसार तीन साल पहले ही पुल हिलने से खतरनाक स्थिति की बात कही गई थी। फिर भी कुछ नहीं किया गया। 2021 से यह गुजरात में पुल गिरने की सातवीं घटना है। "</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Jul 2025 17:38:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> आधी हाजिरी वेतन पूरा सांसदों के वेतन में इजाफा क्यों? </title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश के माननीय सांसदों के वेतन, भत्तों और पेंशन में भारी बढ़ोत्तरी की गई है एक विकासशील देश जिस पर प्रति व्यक्ति कर्ज और बेरोजगारी का बोझ लगातार बढ़ रहा है वहा माननीय अपना वेतन स्वयं बढाने के लिए बेकरार रहते है यह चिंता का विषय है। वहीं पता रहे कि अधिकांश माननीय आय का अन्य स्रोत रखते हैं बहुत कम ऐसे हैं जिनका आय का इकलौता स्रोत संसद सैलरी है। यहां यह भी गौरतलब हालांकि दूसरे देशों के मुकाबले अपने देश में जनप्रतिनिधियों की सैलरी कम है। लेकिन शर्मसार करने वाली बात यह भी है कि सांसद बहुत सीमित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150455/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/202.jpg" alt=""></a><br /><div>देश के माननीय सांसदों के वेतन, भत्तों और पेंशन में भारी बढ़ोत्तरी की गई है एक विकासशील देश जिस पर प्रति व्यक्ति कर्ज और बेरोजगारी का बोझ लगातार बढ़ रहा है वहा माननीय अपना वेतन स्वयं बढाने के लिए बेकरार रहते है यह चिंता का विषय है। वहीं पता रहे कि अधिकांश माननीय आय का अन्य स्रोत रखते हैं बहुत कम ऐसे हैं जिनका आय का इकलौता स्रोत संसद सैलरी है। यहां यह भी गौरतलब हालांकि दूसरे देशों के मुकाबले अपने देश में जनप्रतिनिधियों की सैलरी कम है। लेकिन शर्मसार करने वाली बात यह भी है कि सांसद बहुत सीमित उपस्थिति दे रहे हैं। क्या महत्वपूर्ण चर्चाओं में भी संसद में गैर हाजिरी करने वाले माननीय पूर्ण वेतन पाने के हकदार हैं? </div>
<div> </div>
<div>यहां आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने एक अप्रैल 2023 से प्रभावी संसद सदस्यों और पूर्व सदस्यों के वेतन, दैनिक भता, पेंशन और अतिरिक्त पेंशन में वृद्धि को आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया है। यह परिवर्तन संसद सदस्यों के वेतीिलन्यन, भते और पेंशन अधिनियम 1954 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत किया गया है और यह आयकर अधिनियम, 1961 में उल्लिखित कोस्ट इंफ्लेशन इंडेक्स पर आधारित है। यह कदम कर्नाटक सरकार द्वारा मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन में 100 प्रतिशत वृद्धि को मंजूरी देने के कुछ दिनों बाद उठाया गया है।</div>
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<div>सरकार द्वारा जारी किए गए नोटीफिकेशन के मुताबिक संसद के सदस्यों का मासिक वेतन 1 लाख से बढ़ाकर 1 लाख 24 हजार रुपये कर दिया गया है। वहीं, दैनिक भत्ता 2000 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये कर दिया गया है, जबकि मासिक पेंशन 25000 रुपये से बढ़ाकर 31000 रुपये कर दी गई है। इसके अलावा पूर्व सदस्यों के लिए अतिरिक्त पेंशन भी 2000 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये की गई है। अगर देखा जाए तो जनप्रतिनिधियों की सैलरी को आगे बढ़ाना और तार्किक परिणति तक ले जाना इसलिए जरूरी है कि जब भी सांसदों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी होती है या उसका प्रस्ताव आता है, उस पर आमतौर पर नाराजगी भरी प्रतिक्रियाएं होती हैं।</div>
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<div>मीडिया में भी आलोचना के स्वर उभरते हैं। यों सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के वेतन भत्ते एक निश्चित अंतराल पर बढ़ाए जाते हैं, उसके लिए आयोग गठित होता है, पर सांसदों की वेतन वृद्धि ही क्यों आलोचना का विषय बनती रही है। हालांकि इसके कई कारण है, जिसमें संसद चलने के दौरान सांसदों का व्यवहार प्रमुख है। दरअसल संसद के सदस्यों को मिलने वाला वेतन और सुख-सुविधाएं संसद सदस्य (वेतन, भत्ता और पेंशन) अधिनियम, 1954 के तहत दी जाती हैं। </div>
<div> </div>
<div>गौर तलब है कि देश में सांसदों की सैलरी केंद्र सरकार निर्धारित करती है और उसमें बढ़ोत्तरी भी केंद्र सरकार ही करती है। ऐसे में देश के सभी सांसदों की सैलरी भी एक जैसी ही होती है, राज्यवार उसमें कोई अंतर नहीं होता है। इससे पहले 2018 में सांसदों का मूल वेतन 1 लाख रुपये महीना तय किया गया था। इसका मकसद था कि उनकी सैलरी महंगाई और जीवन यापन की बढ़ती लागत के हिसाब से हो। 2018 के बदलाव के अनुसार, सांसदों को अपने क्षेत्र में ऑफिस चलाने और लोगों से मिलने-जुलने के लिए 70 हजार रुपये का भत्ता मिलता है।</div>
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<div>इसके अलावा, उन्हें ऑफिस के खर्च के लिए 60 हजार रुपये महीना और संसद सत्र के दौरान हर दिन 2 हजार रुपये का भत्ता मिलता है। इसके अलावा, सांसदों को हर साल फोन और इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए भी भत्ता मिलता है। वे अपने और अपने परिवार के लिए साल में 34 फ्री डोमेस्टिक फ्लाइट में सफर कर सकते हैं। वे काम के लिए या निजी तौर पर कभी भी फर्स्ट क्लास में ट्रेन से यात्रा कर सकते हैं। सड़क से यात्रा करने पर भी उन्हें ईंधन का खर्च मिलता है। सांसदों को हर साल 50 हजार यूनिट बिजली और 4 हजार किलोलीटर पानी भी मुफ्त मिलता है। सरकार उनके रहने का भी इंतजाम करती है।</div>
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<div>सांसदों को दिल्ली में 5 साल के लिए बिना किराए के घर मिलता है। उन्हें उनकी सीनियरिटी के हिसाब से हॉस्टल के कमरे, अपार्टमेंट या बंगले मिल सकते हैं। जो सांसद सरकारी घर नहीं लेते, उन्हें हर महीने घर का भत्ता मिलता है। देखा जाए तो देश के आजादी के बाद से समय के साथ सांसदों की वेतन और भत्तों में बढ़ोत्तरी होती रही है। 1947 को देश को आजादी मिली और वह गरीबी का समय था। देश गरीबी के साथ तमाम चुनौतियों से जूझ रहा था।</div>
<div> </div>
<div>साल 1964 में सांसदों के वेतन में इजाफा तो जरूर हुआ, लेकिन ये सौ रुपये का था। तब वेतन बढ़कर 500 रुपये हो गया। 2006 में सांसदों को 16 हजार रुपये वेतन के रूप में मिलने लगे। 2009 में वेतन सबसे ज्यादा बढ़ा और ये सीधे 50 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया गया और इसके बाद साल 2018 में इसे बढ़ाकर एक लाख रुपये हर महीने किया गया। अब इसमें 24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई है। बहरहाल, बदली हुई परिस्थितियों में वेतन वृद्धि की जरूरत समझी जा सकती है। चूंकि सभी सेक्टर में वेतन में बढ़ोत्तरी हो रही है, तो जन प्रतिनिधियों के वेतन में भी भी बढ़ोत्तरी होनी ही चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे में भी ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में सांसदों का बेसिक वेतन उनके भारतीय सांसदों से तीन गुना अधिक है। भारतीय सांसदों को बड़े देशों के सांसदों की तुलना में भी कम वेतन मिलता है। दुनिया भर में सांसदों और जनसंख्या के बीच का अनुपात अलग-अलग है। फ्रांस में एक सांसद करीब 70,000 लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अमेरिका में यह संख्या 6 लाख से भी ज्यादा हो जाती है। वहीं, चीन में हर सांसद 5 लाख से कम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।</div>
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<div>भारत की बात करें तो, यहां एक सांसद करीब 18 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। इसका मतलब है कि अन्य देशों के सांसदों की तुलना में भारत में प्रत्येक सांसद के जिम्मे कहीं ज्यादा जनसंख्या है। इसलिए इस बढ़ोत्तरी का स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि एक वर्ग इसका स्वागत तो एक वर्ग विरोध भी करता है। स्वागत करने वाले वर्ग का तर्क होता है कि सांसदों को ज्यादा वेतन देने से राजनीति में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और उनकी कार्यशैली में भी सुधार होता है। साथ ही, ज्यादा वेतन मिलने से राजनीति में पढ़े-लिखे और पेशेवर लोग आने की संभावना भी बढ़ जाती है। </div>
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<div>एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हाल ही में 2024 के आंकड़ों से पता चलता है कि चुनाव दोबारा लड़ने वाले सांसदों की औसत संपत्ति में 43 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो अब 21.55 करोड़ रुपये हो गई है। 18वीं लोकसभा के 543 में से 500 से अधिक सांसदों के पास कम से कम 1 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है। विरोध करने वालों का तर्क है कि राजनेता कहते हैं कि वे राजनीति में सेवा के लिए आते हैं, ऐसे में उनको इतनी ज्यादा सैलरी और सुविधाओं की क्या जरूरत है।</div>
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<div>दूसरी बात है कि सांसदों का ज्यादा समय संसद में हंगामा में वितता है। सदन देश के सामने मौजूद समस्याओं और चुनौतियों पर बहस का मंच है तथा नीतियां और कानून पारित करने की जगह है। सरकार का कोई प्रस्ताव गलत मालूम पड़े, तो उसका विरोध करना और उसकी तरफ देश का ध्यान खींचना विपक्ष का हक है। मगर जिन मसलों पर कोई टकराहट नहीं होती, कई बार तब भी सांसदों की मौजूदगी अपेक्षा से बहुत कम होती है। कई विधेयक बिना किसी चर्चा के पारित कर दिए जाते हैं। चूंकि हमारी विधायिका की साख लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रह गई है, इसलिए हैरत की बात नहीं कि सांसदों और विधायकों की वेतन वृद्धि पर आम प्रतिक्रिया अमूमन सकारात्मक नहीं होती।</div>
<div> </div>
<div>इसलिए जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे संसद मे अपनी सक्रियता बढ़ाए, ताकि उनके वेतन बढ़ोत्तरी का स्वागत आम जनता करें।लेकिन साथ ही जिस तरह से संसद में सांसद लगातार हंगामा विरोध प्रदर्शन कार्यवाही मे बाधा डालते हैं तो ऐसा लगता है कि संसद के माननीय सदस्यों को आम जनता के धन का दुरुपयोग नही करना चाहिए।ये सारी सुविधाएं जनता के द्वारा किसी न किसी परोक्ष अपरोक्ष चुकाए गए टैक्स के बूते पर ही दी जा रही है क्या हमारे माननीय सांसद इन सुविधाओं को मितव्ययता के साथ इस्तेमाल करेंगे? हमारे माननीय ऐसी उपभोग संस्कृति का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं जिसमें बिजली पानी से लेकर तमाम सुविधाओं के मितव्ययता पूर्ण उपयोग की भावना निहित हो ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Mar 2025 14:34:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ब्राजील में 14 लोगों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>INTERNATIONAL NEWS: </strong><br /><br /></p>
<p><strong>ब्राजील</strong> के पूर्वोत्तर राज्य पेरनामबुको में एक जीर्ण-शीर्ण इमारत के ढहने से छह बच्चों समेत 14 लोगों की मौत हो गई। इस इमारत में बेघर लोगों ने आश्रय लिया था और एक दशक से भी अधिक समय से वे उसमें रह रहे थे। दमकल कर्मियों ने यह जानकारी दी। रेसिफ के पॉलिस्ता उपनगर में जीर्ण-शीर्ण इमारत शुक्रवार तड़के ढह गई, जिसके बाद इसमें रह रहे लोगों की तलाश तेज कर दी गई।</p>
<p><br />  एक बयान में कहा गया कि इमारत पर बेघर लोगों का कब्जा था, हालांकि 2010 से वहां रहना प्रतिबंधित था। समाचार पत्र ‘फोल्हा डे साओ</p>
<p><br />दमकल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/132061/14-people-died-in-brazil"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-07/ब्राजील-में-14-लोगों-की-मौत.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>INTERNATIONAL NEWS: </strong><br /><br /></p>
<p><strong>ब्राजील</strong> के पूर्वोत्तर राज्य पेरनामबुको में एक जीर्ण-शीर्ण इमारत के ढहने से छह बच्चों समेत 14 लोगों की मौत हो गई। इस इमारत में बेघर लोगों ने आश्रय लिया था और एक दशक से भी अधिक समय से वे उसमें रह रहे थे। दमकल कर्मियों ने यह जानकारी दी। रेसिफ के पॉलिस्ता उपनगर में जीर्ण-शीर्ण इमारत शुक्रवार तड़के ढह गई, जिसके बाद इसमें रह रहे लोगों की तलाश तेज कर दी गई।</p>
<p><br /> एक बयान में कहा गया कि इमारत पर बेघर लोगों का कब्जा था, हालांकि 2010 से वहां रहना प्रतिबंधित था। समाचार पत्र ‘फोल्हा डे साओ पाउलो' ने बताया कि शहर के अधिकारियों ने राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की हालिया यात्रा के दौरान इस मुद्दे को उठाया था।  </p>
<p><br />दमकल कर्मियों ने शनिवार को बताया कि बचावकर्ताओं ने खोजी कुत्तों की मदद से मलबे में तलाश की और 15 साल की दो लड़कियों तथा 65 साल की महिला को जीवित बाहर निकाला गया, साथ ही हादसे में घायल 18 वर्षीय युवक को भी निकाला गया, लेकिन बाद में उसने दम तोड़ दिया। दमकल विभाग ने कहा, ‘‘खोज अभियान अब मवेशियों को हटाने पर केंद्रित है।''</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Jul 2023 15:41:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति बोलसोनारो के समर्थकों ने मचाया उत्पात</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></p>
<p>ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो के समर्थकों ने रविवार को राजधानी में सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन और अन्य स्थान पर धावा बोला। राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा के कार्यभार संभालने के एक सप्ताह बाद बोल्सोनारो के समर्थकों ने यह हरकत की। बोलसोनारो ने उनके खिलाफ आए चुनावी नतीजों को मानने से इनकार दिया था, तभी से उनके समर्थक प्रदर्शन कर रहे हैं।</p>
<p>हजारों प्रदर्शनकारियों ने अवरोधक को पार कर सुरक्षा घेरा तोड़ों, छतों पर चढ़ गए, खिड़कियां तोड़ दीं और तीन इमारतों पर धावा बोला। इनमें से कई चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इनकार करते हुए</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/126773/draft-add-your-title"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-01/93.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></p>
<p>ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो के समर्थकों ने रविवार को राजधानी में सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन और अन्य स्थान पर धावा बोला। राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा के कार्यभार संभालने के एक सप्ताह बाद बोल्सोनारो के समर्थकों ने यह हरकत की। बोलसोनारो ने उनके खिलाफ आए चुनावी नतीजों को मानने से इनकार दिया था, तभी से उनके समर्थक प्रदर्शन कर रहे हैं।</p>
<p>हजारों प्रदर्शनकारियों ने अवरोधक को पार कर सुरक्षा घेरा तोड़ों, छतों पर चढ़ गए, खिड़कियां तोड़ दीं और तीन इमारतों पर धावा बोला। इनमें से कई चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इनकार करते हुए सशस्त्र बलों से इसमें हस्तक्षेप करने और बोलसोनारो को दोबारा राष्ट्रपति बनाए जाने की मांग कर रहे हैं। साओ पाउलो में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लूला डा सिल्वा ने कहा कि बोलसोनारो ने उन लोगों को विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया। </p>
<p><strong>प्रदर्शनकारियों ने की तोड़फोड़</strong></p>
<p>सिल्वा ने उन लोगों को ‘‘फासीवादी कट्टरपंथी'' करार दिया। उन्होंने संघीय जिले में सुरक्षा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए संघीय सरकार का एक आदेश भी पढ़ा। लूला डा सिल्वा ने कहा, ‘‘पहले कभी ऐसा नहीं हुआ और इन लोगों को दंडित किए जाने की जरूरत है।'' टीवी चैनल ‘ग्लोबो न्यूज़' पर प्रसारित फुटेज में प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय ध्वज को प्रतिबिंबित करने वाले हरे व पीले रंग के कपड़े पहने हुए नजर आ रहे हैं, जो देश के रूढ़िवादी आंदोलन का प्रतीक बन गए हैं। अक्सर बोलसोनारो के समर्थक इसी रंग के कपड़े पहने नजर आए हैं। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की कई बार सुप्रीम कोर्ट के साथ तनातनी हुई है और जिस कमरे में वे बैठक करते हैं वहां भी दंगाइयों ने तोड़फोड़ की। उन्होंने कांग्रेस भवन में आगजनी और राष्ट्रपति भवन में कार्यालयों में तोड़फोड़ की। सभी भवनों के शीशे भी टूटे नजर आए। लूला डा सिल्वा के कार्यभार संभालने से पहले ही फ्लोरिडा चले गए बोलसोनारो ने रविवार की घटनाओं पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है। </p>
<p><strong>आंसू गैस के गोले दागे</strong></p>
<p>पुलिस ने इमारतों का नियंत्रण वापस लेने के लिए आंसू गैस के गोले दागे। हमला करने के करीब चार घंटे से कम समय में स्थानीय समयानुसार शाम साढ़े छह बजे सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों को खदेड़ते नजर आए। हालांकि तब तक काफी नुकसान हो चुका था, जिससे पुलिस की कार्रवाई व लापरवाहियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लूला डा सिल्वा ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘ अयोग्यता या गलत मंशा? पुलिस की ओर से...बोलसोनारो के समर्थकों के कुछ सप्ताह पहले राजधानी में हिंसा करने पर भी उनका रवैया ऐसा ही था। उन्होंने वादा किया कि उन अधिकारियों को दंडित किया जाएगा।'' गौरतलब है कि लूला डा सिल्वा ने 30 अक्टूबर को हुए चुनाव में बोल्सोनारो को मात दी थी, जिसके बाद उनके कई समर्थक देशभर में सड़कों पर उतर आए थे और चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। ऐसी ही घटना अमेरिका में भी देखने को मिली थी, जब डोनाल्ड ट्रंप ने 2020 राष्ट्रपति चुनाव में हार स्वीकार नहीं की थी और उन्होंने चुनाव में धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे। ट्रंप के इन आरोपों के बीच उनके कथित समर्थकों ने छह जनवरी को संसद भवन परिसर में हिंसा की थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>एशिया</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Jan 2023 13:45:49 +0530</pubDate>
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