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                <title>स्मार्टफोन - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>डिजिटल क्रांति के दौर में सार्वजनिक पुस्तकालयों की अनिवार्यता </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय को यदि ज्ञान और तकनीक का युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जानकारी को सहज, सुलभ और त्वरित बना दिया है। आज का युवा वर्ग ई-कंटेंट, ऑनलाइन पाठ्यसामग्री, ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स की ओर तीव्र गति से आकर्षित हो रहा है। इसके बावजूद यह सत्य उतना ही प्रबल है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता आज पहले से अधिक बढ़ गई है। पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना, सांस्कृतिक परंपरा और नैतिक मूल्यों के संरक्षक हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो ज्ञान-संस्कृति की जड़ें कमजोर पड़</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170991/necessity-of-public-libraries-in-the-era-of-digital-revolution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas40.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय को यदि ज्ञान और तकनीक का युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जानकारी को सहज, सुलभ और त्वरित बना दिया है। आज का युवा वर्ग ई-कंटेंट, ऑनलाइन पाठ्यसामग्री, ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स की ओर तीव्र गति से आकर्षित हो रहा है। इसके बावजूद यह सत्य उतना ही प्रबल है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता आज पहले से अधिक बढ़ गई है। पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना, सांस्कृतिक परंपरा और नैतिक मूल्यों के संरक्षक हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो ज्ञान-संस्कृति की जड़ें कमजोर पड़ सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सार्वजनिक पुस्तकालयों ने सदैव पढ़ने-लिखने की आदत को विकसित किया है। अकादमिक शिक्षा हो या स्वाध्याय के माध्यम से आत्मविकास की आकांक्षा, पुस्तकालय हर वर्ग के लिए समान रूप से उपयोगी रहे हैं। शांत वातावरण, अनुशासित परिवेश और विविध विषयों पर उपलब्ध साहित्य व्यक्ति को गहन अध्ययन की ओर प्रेरित करता है। डिजिटल माध्यमों की तात्कालिकता के बीच पुस्तकालय मन को स्थिरता प्रदान करते हैं। यह स्थिरता ही गहन चिंतन और मौलिक विचारों को जन्म देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न राज्यों में इनकी संख्या और गुणवत्ता में व्यापक अंतर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2018-19 तक देश में 46,746 सार्वजनिक पुस्तकालय थे, जिसका उल्लेख राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन ने किया था। यह संख्या आशाजनक प्रतीत होती है, परंतु देश की विशाल जनसंख्या और युवाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं कही जा सकती। महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हजारों पुस्तकालय हैं, जबकि कुछ समृद्ध राज्यों में इनकी संख्या अत्यंत सीमित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पुस्तकालयों का विकास केवल आर्थिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पढ़ने की संस्कृति और शासन की प्राथमिकताओं पर आधारित होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेष रूप से केरल का उदाहरण उल्लेखनीय है, जहां सीमित संसाधनों के बावजूद पढ़ने की परंपरा सशक्त है। इसके विपरीत कुछ धनी राज्यों में पुस्तकालयों की संख्या अत्यल्प है। अनेक राज्यों में पुस्तकालय भवन जर्जर अवस्था में हैं, स्टाफ की कमी है और नई पुस्तकों की उपलब्धता सीमित है। ग्रामीण और छोटे कस्बों में तो डिजिटल संसाधनों का अभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि पुस्तकालय सामाजिक समानता और ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डिजिटल युग ने अध्ययन के स्वरूप को परिवर्तित कर दिया है। ई-कंटेंट ने युवाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। ऑनलाइन कोर्स, डिजिटल जर्नल, शैक्षणिक वीडियो और ऑडियो सामग्री ने सीखने की प्रक्रिया को अधिक लचीला बना दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों विद्यार्थी इंटरनेट के माध्यम से अद्यतन जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। कई सार्वजनिक पुस्तकालयों ने भी डिजिटल सेवाएं आरंभ की हैं, जिससे वे युवाओं के लिए अधिक आकर्षक बन रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ई-कंटेंट का महत्व इस बात में है कि यह समय और स्थान की सीमाओं को समाप्त करता है। विद्यार्थी घर बैठे विश्वस्तरीय सामग्री तक पहुंच सकते हैं। दृष्टिबाधित या विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए ऑडियो बुक्स और सहायक तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार डिजिटल संसाधन शिक्षा को अधिक समावेशी और व्यापक बनाते हैं। परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच सभी को प्राप्त नहीं है। इंटरनेट और उपकरणों की कमी डिजिटल विभाजन को जन्म देती है। ऐसे में सार्वजनिक पुस्तकालय इस खाई को पाटने का माध्यम बन सकते हैं। यदि पुस्तकालयों में कंप्यूटर, इंटरनेट और ई-लाइब्रेरी की सुविधा उपलब्ध हो, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थी भी डिजिटल युग से जुड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय आज भी प्रेरणास्थल हैं। कोटा और अजमेर जैसे शहरों में हजारों विद्यार्थी नियमित रूप से पुस्तकालयों में अध्ययन करते हैं। शांत वातावरण और संदर्भ पुस्तकों की उपलब्धता उन्हें एकाग्रता प्रदान करती है। बेंगलूरु में सैकड़ों पुस्तकालय हैं, जिनमें बड़ी संख्या में पंजीकृत सदस्य हैं और उनमें अधिकांश विद्यार्थी हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि यदि पुस्तकालय आधुनिक सुविधाओं से युक्त हों तो युवा वर्ग उनसे जुड़ने में रुचि रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तकालयों की प्रासंगिकता केवल शैक्षणिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये हमारी साहित्यिक धरोहर, ऐतिहासिक दस्तावेज और वैचारिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हैं। डिजिटल माध्यमों की त्वरित और क्षणभंगुर प्रकृति के बीच पुस्तकालय स्थायित्व का प्रतीक हैं। यहां उपलब्ध सामग्री सत्यापन योग्य और विश्वसनीय होती है, जो युवाओं को भ्रामक सूचनाओं से बचाती है। आज जब सोशल मीडिया पर अप्रमाणित जानकारी का प्रसार तीव्र गति से होता है, तब पुस्तकालय प्रमाणिक ज्ञान के स्रोत के रूप में और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्र सरकार द्वारा पुस्तकालयों के सुदृढ़ीकरण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर पहल की गई है। राष्ट्रीय लाइब्रेरी मिशन के अंतर्गत राज्यों में केंद्रीय और जिला पुस्तकालयों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का प्रावधान है। यह प्रयास स्वागतयोग्य है, परंतु इसकी सफलता राज्य सरकारों की सक्रियता और समाज की सहभागिता पर निर्भर करती है। यदि पुस्तकालय कानून, बुनियादी ढांचा और फंडिंग की व्यवस्था होने के बावजूद अपेक्षित ध्यान न मिले, तो उनका विकास बाधित हो जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकालयों को केवल परंपरा के प्रतीक के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें डिजिटल युग के अनुरूप विकसित किया जाए। पारंपरिक पुस्तकों के साथ-साथ ई-कंटेंट, डिजिटल डेटाबेस और ऑनलाइन संसाधनों को समाहित कर पुस्तकालयों को ज्ञान के समग्र केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को पुस्तकालय से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जाने चाहिए। डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को सही और गलत जानकारी में अंतर करने की क्षमता प्रदान की जानी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डिजिटल युग में सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उनका स्वरूप परिवर्तित हुआ है। ई-कंटेंट युवाओं को नई दिशा दे रहा है, परंतु उस दिशा को संतुलित और सार्थक बनाने के लिए पुस्तकालयों का शांत, अनुशासित और ज्ञानपूर्ण वातावरण अनिवार्य है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी विवेकशील, संस्कारित और जिम्मेदार नागरिक बने, तो हमें पुस्तकालयों को सशक्त बनाना होगा। पुस्तकालय और ई-कंटेंट का समन्वय ही भविष्य की ज्ञान-संस्कृति को सुदृढ़ और समृद्ध बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांतिलाल मांडोत</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 18:26:06 +0530</pubDate>
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                <title>विकास की दौड़ में पिछड़ता भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों का स्वरूप समय के साथ काफी बदल गया है। पहले जहां चुनाव विचारधाराओं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दीर्घकालिक विकास के वादों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे के निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दों पर लड़े जाते थे</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वहीं अब यह एक तरह के अल्पकालिक आर्थिक प्रलोभन के बाजार में तब्दील होता जा रहा है। </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फ्रीबीज</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यानी मुफ्त सुविधाओं की राजनीति ने पूरे देश को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त बिजली</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त पानी</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त लैपटॉप</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्मार्टफोन और यहां तक कि बिना किसी उत्पादक</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170633/india-lagging-behind-in-the-race-of-development"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas37.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों का स्वरूप समय के साथ काफी बदल गया है। पहले जहां चुनाव विचारधाराओं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दीर्घकालिक विकास के वादों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे के निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दों पर लड़े जाते थे</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वहीं अब यह एक तरह के अल्पकालिक आर्थिक प्रलोभन के बाजार में तब्दील होता जा रहा है। </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फ्रीबीज</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यानी मुफ्त सुविधाओं की राजनीति ने पूरे देश को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त बिजली</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त पानी</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त लैपटॉप</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्मार्टफोन और यहां तक कि बिना किसी उत्पादक कार्य के सीधे नकद राशि देने की अंधी होड़ में लगे हुए हैं। यह होड़ अब इतनी खतरनाक हो गई है कि राज्य के खजाने की वास्तविक क्षमता और राजकोषीय घाटे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। चुनाव जीतने की यह </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">शॉर्टकट</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रणनीति न केवल अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि यह देश की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी गहरे दांव पर लगा रही है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस खतरनाक प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए बहुत ही सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">विशेषकर जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने तमिलनाडु बिजली कंपनी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए जो टिप्पणियां कीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वे पूरे देश और नीति निर्माताओं की आंखें खोलने वाली हैं। अदालत ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन तथाकथित मुफ्त की रेवड़ियों का अंतिम और पूरा आर्थिक बोझ देश के उन ईमानदार करदाताओं पर ही पड़ता है जो दिन-रात मेहनत करके अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं। जब सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्त सुविधाएं बांटती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इसका सीधा और नकारात्मक असर देश के वास्तविक विकास कार्यों पर पड़ता है। अदालत की यह चिंता केवल एक राज्य या एक विशेष मामले तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि यह भारत की पूरी वृहद आर्थिक नीति पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब न्यायपालिका भी इस लोकलुभावन राजनीति के विनाशकारी आर्थिक दुष्प्रभावों को लेकर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहां आयकर देने वालों की संख्या कुल आबादी का बमुश्किल छह से सात प्रतिशत ही है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वहां मुफ्त की इन विशाल योजनाओं का पूरा ढांचा एक बहुत छोटे से वर्ग के कंधों पर टिका हुआ है। यह मध्यम वर्ग</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो हर दिन कड़ी मेहनत करता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">नियमों का पालन करता है और ईमानदारी से अपने करों का भुगतान करता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खुद को ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस करता है। करदाताओं के खून-पसीने की कमाई का उपयोग आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जर्जर शिक्षा प्रणाली को विश्वस्तरीय बनाने और ग्रामीण व शहरी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के बजाय</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">केवल सत्ता हासिल करने और वोट बैंक को पक्का करने के लिए किया जा रहा है। जब राज्य सरकारें अपनी आय से कहीं अधिक खर्च करने लगती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो उनके पास बाजार से भारी ब्याज दरों पर कर्ज लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। भारतीय रिजर्व बैंक की कई हालिया रिपोर्टों में यह कड़ी चेतावनी दी जा चुकी है कि देश के कई राज्यों का राजकोषीय घाटा उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद के सुरक्षित और निर्धारित स्तर को पार कर चुका है। यह बढ़ता हुआ कर्ज कोई हवा में गायब नहीं हो जाएगा</span>; <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः यह हमारी भविष्य की पीढ़ियों को ही चुकाना होगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसका सीधा अर्थ है कि आज के मुफ्त के वादे कल के भारी भरकम टैक्स और बेलगाम महंगाई का कारण बनेंगे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त की राजनीति का सबसे बुरा और स्पष्ट असर देश के ऊर्जा क्षेत्र पर देखा जा रहा है। मुफ्त बिजली का वादा हर विधानसभा चुनाव में एक प्रमुख हथियार बन गया है। इसका भयानक परिणाम यह है कि राज्य संचालित बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) लाखों करोड़ रुपये के भारी-भरकम घाटे में डूब चुकी हैं। जब बिजली पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इसका बेतहाशा दुरुपयोग होता है। जो नागरिक या किसान मुफ्त बिजली प्राप्त कर रहा होता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह ऊर्जा संरक्षण या उसके सही उपयोग पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता क्योंकि उसे इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकलुभावन वादों के दबाव में राज्य सरकारें डिस्कॉम कंपनियों को समय पर सब्सिडी का पैसा नहीं चुका पाती हैं। इससे ये कंपनियां नई तकनीक</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ग्रिड आधुनिकीकरण</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्मार्ट मीटरिंग और हरित ऊर्जा में आवश्यक निवेश करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाती हैं। तमिलनाडु</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पंजाब और अन्य राज्यों के उदाहरण हमारे सामने हैं जहां बिजली सब्सिडी का बिल हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और व्यवस्था चरमरा रही है। अदालत ने भी ठीक यही तार्किक सवाल उठाया था कि कई मामलों में बड़े और संपन्न लोग भी इस मुफ्त बिजली का अनुचित लाभ उठा रहे हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जबकि वास्तव में जो अत्यंत गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उसे इसका कोई खास फायदा नहीं मिल रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसका पूंजीगत व्यय होता है। जब सरकारें नई सड़कें</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बड़े पुल</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रेलवे नेटवर्क</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">आधुनिक बंदरगाह</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अच्छे स्कूल और सर्वसुविधायुक्त अस्पताल बनाती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इससे न केवल वर्तमान में भारी मात्रा में रोजगार पैदा होता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य के लिए एक स्थायी राष्ट्रीय संपत्ति भी बनती है जो दशकों तक अर्थव्यवस्था को गति और मजबूती देती है। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्त की योजनाओं पर किया जाने वाला अंधाधुंध खर्च राजस्व व्यय की श्रेणी में आता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो अनुत्पादक होता है। जब राज्य का एक बड़ा बजट मुफ्त रेवड़ियों में ही स्वाहा हो जाता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो पूंजीगत व्यय के लिए पैसा ही नहीं बचता। प्रतिष्ठित संस्थानों के आंकड़े साफ बताते हैं कि राज्यों पर बढ़ता सब्सिडी का भारी बोझ उन्हें दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास परियोजनाओं से दूर कर रहा है। इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि हम आज के क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए देश के भविष्य की मजबूत नींव को खोखला कर रहे हैं। बिना मजबूत बुनियादी ढांचे के कोई भी देश </span>21<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वीं सदी में एक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का अपना सपना कभी पूरा नहीं कर सकता।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यहां इस बारीक लेकिन महत्वपूर्ण बात को समझना बहुत जरूरी है कि एक </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कल्याणकारी राज्य</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की अवधारणा और </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फ्रीबीज</span>' (<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मुफ्तखोरी) की राजनीति में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है। भारतीय संविधान के तहत चुनी गई किसी भी सरकार का यह प्राथमिक और नैतिक दायित्व है कि वह समाज के सबसे कमजोर</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">शोषित और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए काम करे। सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और आपात स्थिति या आपदा में खाद्य सुरक्षा प्रदान करना एक कल्याणकारी राज्य का अहम कर्तव्य है। लेकिन</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बिना किसी उत्पादक कार्य के सीधे लोगों के बैंक खातों में नकद बांटना</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">या चुनाव से ठीक पहले लैपटॉप</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्मार्टफोन और मंगलसूत्र जैसी चीजें बांटना जन कल्याण बिल्कुल नहीं है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि यह कानूनी रूप से मतदाताओं को रिश्वत देने के समान है। पूर्व की सरकारों द्वारा शुरू की गई मनरेगा जैसी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम के बदले रोजगार और पैसा देना था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिससे संपत्तियों का निर्माण भी होता था। लेकिन आज की </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फ्री राइडर</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">संस्कृति लोगों को कर्महीन बना रही है। जब लोगों को बिना मेहनत किए बुनियादी जरूरतें और मुफ्त नकद मिलने लगता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो समाज में उत्पादकता में भारी गिरावट आती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसका सीधा असर हमारे कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों में मजदूरों की भारी कमी के रूप में देखा जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">आर्थिक और वृहद दृष्टिकोण से देखें तो इस फ्रीबीज संस्कृति का एक और घातक परिणाम अनियंत्रित मुद्रास्फीति (महंगाई) के रूप में सामने आता है। जब सरकारें मुफ्त नकद योजनाओं के माध्यम से बाजार में बिना किसी मेहनत के पैसा डालती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो लोगों की क्रय शक्ति अचानक से बढ़ जाती है। लेकिन चूंकि इस पैसे के पीछे कोई नया उत्पादन या नया रोजगार सृजन नहीं हुआ है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इसलिए बाजार में वस्तुओं की आपूर्ति वही पुरानी रहती है। अर्थशास्त्र का यह एक बहुत ही सामान्य और बुनियादी नियम है कि जब बाजार में बहुत सारा पैसा बहुत कम वस्तुओं का पीछा करता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो चीजों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। आज हम जो खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि देख रहे हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह आंशिक रूप से इसी का एक प्रत्यक्ष परिणाम है। अंततः</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह बढ़ती महंगाई उसी गरीब आदमी की कमर सबसे ज्यादा तोड़ती है जिसे चुनाव के समय मुफ्त सुविधाओं का लालच देकर वोट लिया गया था। इस तरह</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सरकार एक हाथ से जो मुफ्त में देती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह दूसरे हाथ से अदृश्य महंगाई के रूप में वापस छीन लेती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और आम जनता इस राजनीतिक भ्रमजाल को आसानी से समझ नहीं पाती।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इतिहास और वैश्विक अर्थव्यवस्था के कड़वे अनुभव हमें इस विनाशकारी रास्ते के प्रति बार-बार आगाह करते हैं। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला का उदाहरण पूरी दुनिया के सामने एक सबक है। प्राकृतिक संसाधनों और तेल के विशाल भंडार से समृद्ध होने के बावजूद</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वहां की सरकारों ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन नीतियां अपनाईं और जनता को हर चीज मुफ्त देने की बुरी आदत डाल दी। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही सालों में देश भारी आर्थिक संकट</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाइपरइन्फ्लेशन (अत्यधिक महंगाई) और भयानक भुखमरी का शिकार हो गया। इसी तरह</span>, 2010 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के दशक में ग्रीस का भयंकर आर्थिक संकट भी बेलगाम सरकारी खर्च</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कर्ज लेकर घी पीने की आदत और लोकलुभावन नीतियों का ही सीधा परिणाम था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया था। भारत को इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से समय रहते सबक लेना चाहिए। आज हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन अगर यह राजकोषीय अनुशासनहीनता और मुफ्तखोरी की राजनीति इसी तरह बढ़ती रही</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो हम भी बहुत जल्द एक गहरे और अकल्पनीय आर्थिक संकट की ओर धकेले जा सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस जटिल समस्या का समाधान यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना पूरी तरह से बंद कर दे</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि इसका वास्तविक समाधान इस सरकारी मदद को तर्कसंगत</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पारदर्शी और पूरी तरह से लक्षित बनाने में छिपा है। आज तकनीक के इस उन्नत युग में हमारे पास आधार कार्ड</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मोबाइल और जन-धन खातों का एक बहुत ही मजबूत और सुरक्षित ढांचा मौजूद है। सरकार को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) का शत-प्रतिशत उपयोग करते हुए केवल और केवल उन लोगों तक ही सब्सिडी पहुंचानी चाहिए जो वास्तव में इसके असली हकदार हैं। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पीएम-किसान योजना एक लक्षित योजना का अच्छा उदाहरण है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो सीधे छोटे और सीमांत किसानों के खातों में बिना किसी बिचौलिए के पैसा भेजती है। लेकिन एक सार्वभौमिक मुफ्त बिजली या मुफ्त पानी की योजना</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसका लाभ एक अमीर जमींदार</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">एक उद्योगपति और एक गरीब मजदूर दोनों समान रूप से उठा रहे हों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">न केवल अनुचित है बल्कि यह राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है। सरकार को मुफ्त की चीजें बांटने के बजाय देश के नागरिकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सही मायने में देश से गरीबी उन्मूलन का एकमात्र और सबसे प्रभावी तरीका स्थायी और सम्मानजनक रोजगार पैदा करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सख्त टिप्पणियों में ठीक इसी बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया है कि राज्य सरकारों को लोकलुभावन वादों के बजाय ठोस रोजगार सृजन की नीतियों पर काम करना चाहिए। </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्किल इंडिया</span>', '<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्टार्टअप इंडिया</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मेक इन इंडिया</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जैसी बेहतरीन पहलों को फाइलों से निकालकर धरातल पर अधिक मजबूती और ईमानदारी से लागू करने की तत्काल आवश्यकता है। जब देश के युवाओं के हाथों में कौशल (</span>Skill) <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">होगा और उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार सम्मानजनक रोजगार मिलेगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए किसी भी सरकार की मुफ्त रेवड़ियों या दया की कोई आवश्यकता नहीं होगी। देश में स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध कराना</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लालफीताशाही खत्म करना और बेहतर नीतियां बनाना ही असली जन कल्याण है। मुफ्त की चीजें केवल एक कमजोर और सरकार पर निर्भर समाज का निर्माण करती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जबकि मेहनत का रोजगार एक आत्मनिर्भर</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्वाभिमानी और शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस राजनीतिक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए देश में मजबूत संस्थागत और चुनाव सुधार अब अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। भारत के चुनाव आयोग को कानूनी रूप से अधिक अधिकार दिए जाने चाहिए ताकि वह राजनीतिक दलों को उन झूठे वादों को करने से सख्ती से रोक सके जिनका कोई ठोस आर्थिक आधार या बजट उपलब्ध नहीं है। सभी राजनीतिक दलों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे चुनाव घोषणा पत्र जारी करते समय जनता को यह स्पष्ट रूप से बताएं कि वे मुफ्त की इन लोकलुभावन योजनाओं के लिए हजारों करोड़ रुपये कहां से लाएंगे। क्या वे इसके लिए जनता पर कोई नया टैक्स लगाएंगे या फिर बुनियादी ढांचे और शिक्षा के बजट में कटौती करेंगे</span>? <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह वित्तीय पारदर्शिता मतदाताओं को वोट देते समय सही और तार्किक निर्णय लेने में बहुत मदद करेगी। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों का हर राज्य द्वारा कड़ाई से पालन होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जो भी राज्य राजकोषीय घाटे की तय सीमा का जानबूझकर उल्लंघन करते हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उनके केंद्रीय अनुदान में कटौती करने या उन्हें बाजार से कर्ज लेने से रोकने जैसे सख्त कदम उठाए जाने चाहिए ताकि पूरे देश में वित्तीय अनुशासन बना रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">राजनीति में इस बड़े और सकारात्मक बदलाव की पूरी जिम्मेदारी केवल अदालतों या चुनाव आयोग के कंधों पर नहीं छोड़ी जा सकती</span>; <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह देश के आम नागरिकों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">नागरिक समाज और मीडिया की भी एक बहुत बड़ी सामूहिक जिम्मेदारी है। देश के लोगों को यह गहराई से शिक्षित करने की जरूरत है कि सरकार के पास आसमान से गिरा हुआ अपना कोई पैसा नहीं होता</span>; <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो भी पैसा मुफ्त की योजनाओं पर खर्च होता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह अंततः आम आदमी और करदाताओं की जेब से ही टैक्स के रूप में वसूला जाता है। मुफ्त की राजनीति एक ऐसा मीठा जहर है जो बहुत ही खामोशी से और धीरे-धीरे देश की आर्थिक नींव को पूरी तरह से खोखला कर रहा है। भारत ने वर्ष </span>2047 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तक दुनिया का एक अग्रणी और विकसित राष्ट्र बनने का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब हम वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर देश की उत्पादकता</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">नवाचार</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी के विकास में भारी निवेश करें। सभी राजनीतिक दलों को अब दलगत और क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में सोचना ही होगा। देश का खजाना और टैक्स का पैसा जनता की एक पवित्र अमानत है और इसे पूरी जिम्मेदारी</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जवाबदेही और दूरदर्शिता के साथ खर्च किया जाना चाहिए। मुफ्त रेवड़ियों की इस आत्मघाती संस्कृति को हमेशा के लिए छोड़कर नागरिक सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रोजगार और ठोस विकास की राजनीति को अपनाना ही भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और उसके उज्ज्वल भविष्य की असली कुंजी है।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 18:16:32 +0530</pubDate>
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                <title>स्मार्टफोन की ओवरहीटिंग बन सकती है जान का खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[<p>स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। आम जिंदगी के कई सारे जरूरी काम अब हम इसी स्मार्टफोन से करते हैं। अगर हमारा स्पोर्टफोन काम करना बंद कर दे तो हमारे कई सारे काम रुक सकते हैं। गर्मी आ चुकी है और गर्मी से सिर्फ इंसान ही नहीं परेशान होता है बल्कि हमारा ये स्मार्टफोन भी पेरशानियां झेलता है। इसमें कई तरह की दिक्कतें आने लगती हैं। गर्मी में हमें स्मार्टफोन को एक्स्ट्रा देखभाल की जरूरत पड़ती ही है। </p>
<p>हर एक स्मार्टफोन में थोड़ी बहुत हीटिंग होती ही है लेकिन गर्मियों के मौसम में ये समस्या कुछ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140955/overheating-of-smartphone-can-become-life-threatening"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/smartphone_large_1809_150.webp" alt=""></a><br /><p>स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। आम जिंदगी के कई सारे जरूरी काम अब हम इसी स्मार्टफोन से करते हैं। अगर हमारा स्पोर्टफोन काम करना बंद कर दे तो हमारे कई सारे काम रुक सकते हैं। गर्मी आ चुकी है और गर्मी से सिर्फ इंसान ही नहीं परेशान होता है बल्कि हमारा ये स्मार्टफोन भी पेरशानियां झेलता है। इसमें कई तरह की दिक्कतें आने लगती हैं। गर्मी में हमें स्मार्टफोन को एक्स्ट्रा देखभाल की जरूरत पड़ती ही है। </p>
<p>हर एक स्मार्टफोन में थोड़ी बहुत हीटिंग होती ही है लेकिन गर्मियों के मौसम में ये समस्या कुछ ज्यादा देखने को मिलती है। अगर आपका फोन थोड़ा पुराना हो चुका है और वह ओवर हीट कर रहा है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। आपको इस मौसम में पोन का हीटिंग को जरा भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर फोन ज्यादा गर्म हो जाता है तो हो सकता है कि इसकी बैटरी ब्लास्ट कर जाए और इससे आपको भारी नुकसान हो सकता है। </p>
<p>अगर आपका भी स्मार्टफोन थोड़ी देर इस्तेमाल करने पर ओवरहीट होने लगता है तो हम आपको कुछ ऐसे आसान तरीके बताने जा रहे हैं जिससे आप इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। </p>
<p>अगर आपका स्मार्टफोन थोड़ी देर इस्तेमाल करने पर गर्म हो जाता है तो आपको अपने फोन की ब्राइटनेस को कम रखना चाहिए। गर्मियों के मौसम में ब्राइटनेस ज्यादा रखने से अक्सर फोन ओवर हीट करने लगते हैं। </p>
<p>कई बार स्मार्टफोन में ब्लूटूथ ऑन होने पर भी फोन गर्म होने लगता है। इसलिए अगर आपका फोन ओवर हीट कर रहा है तो चेक कर लें कहीं ब्लूटूथ तो ऑन नहीं हैं। अगर जरूरी न हो तो ब्लूथ को हमेशा ऑफ ही रखें। </p>
<p>अगर आपका स्मार्टफोन इस्तेमाल करते करते गर्म होने लगता है तो उसे थोड़ी देर के लिए एयर प्लेन मोड में डाल दें। नेटवर्क डिस्कनेक्ट होने के बाद फोन तेजी से ठंडा होने लगेगा। </p>
<p>कई बार एक साथ कई सारी ऐप्लिकेशन जैसे, कैमरा, गैलरी, डाक्यूमेंट्स, क्रोम, यूट्यूब ओपन होने के कारण से भी फोन में गर्माहट होने लगती है। अगर फोन गर्म हो रहा है तो सभी ऐप्लिकेशन को बंद कर दें। <br />गर्मियों के मौसम में स्मार्टफोन सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक गर्म होते हैं। इसलिए जहां तक संभव हो अपने स्मार्टफोन को ठंडी जगह पर ही रखें। </p>
<p>कई बार स्मार्टफोन के अपडेट न होने की वजह से भी ये गर्म होने लगता है। अगर आपने अपने एंड्रॉयड वर्जन को काफी दिनों से अपडेट नहीं किया है तो सॉफ्टवेयर को तुरंत अपडेट कर लें। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 May 2024 15:26:22 +0530</pubDate>
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