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                <title>delhi election - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>दिल्ली के नतीजे में क्षेत्रीय दलों के लिए संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी का दिल्ली विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन ने उस सपने को भी चकनाचूर कर दिया,जिसमें देश की जनता ने कभी साफ-सुथरी राजनीति की उम्मीद देखी थी।अन्ना आंदोलन के वक्त देश के लोगो को लगा कि एक नया प्रयोग है और वैकल्पिक राजनीति की धारा बहेगी।इसी लिए लोग अपने काम धंधे छोड़ कर इससे जुड़े।बच्चों ने अपने गुल्लक तोड़ कर इसे बढ़ाने के लिए चंदा दिया।लेकिन आप के गठन के बाद से 2025 तक वह अपने वास्तविक उद्देश्य को भूलने के साथ ही प्रचलित राजनीति का हिस्सा बन गई।</div>
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<div>शराब घोटाला</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148607/message-to-regional-parties-in-delhi-result"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(2)2.jpg" alt=""></a><br /><div>भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी का दिल्ली विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन ने उस सपने को भी चकनाचूर कर दिया,जिसमें देश की जनता ने कभी साफ-सुथरी राजनीति की उम्मीद देखी थी।अन्ना आंदोलन के वक्त देश के लोगो को लगा कि एक नया प्रयोग है और वैकल्पिक राजनीति की धारा बहेगी।इसी लिए लोग अपने काम धंधे छोड़ कर इससे जुड़े।बच्चों ने अपने गुल्लक तोड़ कर इसे बढ़ाने के लिए चंदा दिया।लेकिन आप के गठन के बाद से 2025 तक वह अपने वास्तविक उद्देश्य को भूलने के साथ ही प्रचलित राजनीति का हिस्सा बन गई।</div>
<div> </div>
<div>शराब घोटाला और शीश महल में रहने की बात छोड़ भी दिया जाए तो भी अरविंद केजरीवाल उस किसी मानदंड पर खरे नहीं उतरे,जो उन्होंने रामलीला मैदान में महात्मा गांधी की फोटो के नीचे तय किए थे।केजरीवाल का आम आदमी झुग्गी झोपड़ी वालों, रेहड़ी पटरी वालों,आटो ड्राइवर और दलितों के लिए वजूद में आया था।उनके आम आदमी ने वादा किया था कि धर्म की राजनीति से उसका कोई वास्ता नहीं रहेगा।</div>
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<div>सरकारी सुविधाएं नहीं लेंगे,जो बाद में उन्होंने दूसरों से ज्यादा ली।उनका आम आदमी जल्दी ही मजहबी हो गया।धार्मिक स्थल उसके ऐजेंडा में शामिल हो गए।वह शिक्षा,चिकित्सा,विकास एवं बदलाव के मुद्दों को भूल कर वादों की खानापूर्ति पर उतर आया।आम आदमी पार्टी के और उसके नेताओं के दफ्तरों से बापू की तस्वीर ही उतर गई।अगर देखा जाए तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे सिर्फ भाजपा की सफलता की नहीं बल्कि यह उस पार्टी के पतन की भी कहानी कह रहे हैं जिसके आईने में लाखों लोगों ने बदलाव का सपना देखा था।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल बड़ा कड़वा सच है कि रेत की नींव पर राजनीतिक महल की उम्र कितनी होती है?आम जनता एक अच्छी सरकार और विकास चाहती है,लेकिन राजनीति की धुंध में विकास ऐसा शब्द है,जो हमेशा खो जाता है।स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पीने का साफ पानी जैसे मुद्दे राजनीतिक अखाड़े में दम तोड़ देते हैं।आपको याद होगा कि 2005 के आसपास सूचना के अधिकार पर अरविंद केजरीवाल सक्रिय थे।एक गंभीर लड़ाई लड़ रहे थे वह।तब सबने सोचना शुरू कर दिया कि काश,ऐसे लोग सक्रिय राजनीति में आ जाएं तो समाज, राज्य और देश की काया पलट सकती है।</div>
<div> </div>
<div>सूचना के अधिकार पर सक्रिय लोग कुछ वर्ष के बाद अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ लोकपाल के लिए सक्रिय दिखे। नौकरी करने वाले ढेर सारे लोगों ने नौकरी छोड़ दी।कॉलेज के विद्यार्थी तक अपनी पॉकेट खर्च बचाकर उन्हें ऑनलाइन चंदा भेज रहे थे।तब सब कुछ साफ-साफ था।लेकिन क्या करें सत्ता का गणित कुछ ऐसा है कि उसमें सारी पारदर्शिता शून्य में बदल जाती है।आप पार्टी के प्रचंड बहुमत में दिल्ली कितनी सुखी और साफ-सुथरी हुई, इस पर बहस सालों से हो रही है।</div>
<div> </div>
<div>आगे भी होती रहेगी। बेहतर की उम्मीद में जनता ने एक नई पार्टी को मौका दिया था। ऐसी पार्टी, जिसका कोई राजनीतिक इतिहास न था।लेकिन आम जनता ने समझ लिया कि ईमानदार होने का दावा करना और ईमानदार होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार का गहरा असर अरविंद केजरीवाल की राजनीति पर पड़ेगा।चार हजार से अधिक वोटों से हारने वाले ये वही केजरीवाल हैं जिन्होंने मंच से कहा था,मेरे जिंदा रहते भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में कभी चुनाव नहीं जीत सकती।ये अहंकार.वो भी राजनीति में।हालांकि जनता में या कहिए समर्थकों को शुरू-शुरू में ये रास आया।केजरीवाल खुद को आंदोलन से उपजे नेता और कट्टर ईमानदार कहा करते थे।लेकिन अन्ना को दगा, राजनीति में न आने की कसम और मजबूत करीबियों का ‘विश्वास’ तो उन्होंने पहले ही खो दिया।</div>
<div> </div>
<div>इससे पहले सत्ता के लिए कांग्रेस से हाथ मिला ही चुके थे।वो भी तब जब राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार ने कांग्रेस पर लगे दागों की संख्या बढ़ा दी थी।फिर दूसरे टर्म शराब घोटाला,लो फ्लोर बस,मोहल्ला क्लिनिक,जल बोर्ड के घपले सामने आए।मतलब वैकल्पिक राजनीति के अगुआ और उनकी पूरी टीम कठघरे में खड़ी हो गई।फिर आम आदमी सोचने लगा कि परम्परागत राजनीति और केजरीवाल की वैकल्पिक राजनीति में क्या फर्क है।बड़े दावे करने वाले केजरीवाल जांच एजेंसी को अपनी ईमानदारी का सबूत नहीं पेश कर सके।जिससे उनको जेल की हवा खानी पड़ी।</div>
<div> </div>
<div>यानी जिस भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर केजरीवाल का आम आदमी अस्तित्व में आया था,वह खुद उसी भ्रष्टाचार के दलदल में गहरे तक धंस गया।।दूसरी तरफ मोदी मार्का राजनीति आप के हर दावे को झूठ बताकर तार तार कर रही थी।पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कहीं भी मोदी गारंटी का जिक्र नहीं किया।लेकिन उन्होंने दिल्ली चुनाव के प्रचार में बार बार मोदी गारंटी का जिक्र किया।एक चुनावी सभा में तो उन्होंने एक दर्जन बार से विधायक मोदी गारंटी का जिक्र किया।शायद यही वजह रही कि चुनाव मतदान तक मोदी बनाम केजरीवाल हो गया।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली की सड़कों की हालत,हवा में घुलता जहर आम आदमी पर सीधा असर डाल रहा था।वहीं बिना रोजगार दिए मुफ्त बिजली-पानी केजरीवाल के बेस वोटर यानी मिडल क्लास और स्लम के युवाओं को भी नागवार गुजरा।भाजपा ने दांव खेला और केजरीवाल की मुफ्त योजनाओं को जारी रखते हुए उसका टाप अप प्लान पेश कर दिया।हालांकि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस की गारंटी फेल हो चुकी थी।क्यों कि जो पार्टी सत्ता में हो उसी की गारंटी पर भरोसा ज्यादा रहा है।ये झारखंड में भी हुआ जहां हेमंत सोरेन की गारंटी पर ही जनता ने भरोसा जताया।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के अहंकार, उन पर भ्रष्टाचार के लगे आरोपों के देख कर जनता ने तय कर लिया वो यहां अब ऐसा नहीं होने देगी।अरविंद केजरीवाल की पार्टी भ्रष्टाचार आंदोलन से निकलकर आई थी,लेकिन 10 साल बाद ही पार्टी के बड़े नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे।अरविंद केजरीवाल,मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को तो शराब घोटाले में जेल तक जाना पड़ गया।आप पर जो गंभीर आरोप लगे,उसके नैरेटिव को पार्टी खत्म नहीं कर पाई।इसके अलावा कैग की रिपोर्ट में भी आप पर हॉस्पिटल निर्माण आदि में भ्रष्टाचार के आरोप लगे।</div>
<div> </div>
<div>आप ने कैग की रिपोर्ट पर बहस कराने की बजाय इसे इग्नोर करने की कोशिश की। पूरे चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे की गूंज रही।वहीं केजरीवाल सिर्फ लाभार्थी वोटरों के भरोसे थे।केजरीवाल पिछले दो चुनाव से फ्री बिजली और पानी के जरिए अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे।इसका ज्यादा फायदा उठाने वाला वर्ग मिडिल और लोअर क्लास के थे।दिल्ली के दंगल से पहले बीजेपी ने इन वोटरों को साध लिया।पार्टी ने 12 लाख तक टैक्स फ्री कर अरविंद केजरीवाल का खेल कर दिया।वहीं आम आदमी पार्टी को पिछले 2 चुनावों में मुस्लिम और दलित बहुल इलाकों में बड़ी जीत मिली थी,लेकिन इस बार दोनों ही इलाकों में आप से ये वोटर्स छिटकते नजर आए।</div>
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<div>दरअसल,दिल्ली में जब भी मुसलमानों पर संकट आया,आप मुखर होने की बजाय खामोश हो गई।इसके अलावा केजरीवाल ने बीच में कुछ ऐसे बयान भी दिए जो मुसलमानों को नागवार लगे।इसी लिए भाजपा के आने की सम्भावना के बाद भी चुनाव में मुसलमानों ने एकतरफा आप को सपोर्ट नहीं किया,जिसके कारण आप नजदीकी मुकाबले में पिछड़ गई।कांग्रेस से गठबंधन न करके भी आप ने बड़ी भूल की।दिल्ली में कांग्रेस भले ही कोई सीट जीतने में कामयाब न हुई हो और कई सीटों पर उसके उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।लेकिन 14 सीटें ऐसी थी जहां कांग्रेस को मिले वोट आप की हार के अंतर से कहीं ज्यादा था।</div>
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<div>इसमें से कई सीटें मुस्लिम बाहुल्य थी,जहां मुसलमानों ने आप के बदले कांग्रेस को वोट कर दिया।अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की हार की वजह भी इन सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार ही थे।यहां तक की दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी भी हारते हारते बची।दरअसल हरियाणा में आम आदमी पार्टी चाहती थी कि कांग्रेस से गठबंधन हो लेकिन राहुल गांधी तैयार नहीं हुए थे।दिल्ली में कांग्रेस चाहती थी कि आम आदमी पार्टी से गठबंधन हो लेकिन अरविंद केजरीवाल तैयार नहीं हुए थे।</div>
<div> </div>
<div>आंकड़े बताते हैं कि अगर गठबंधन होता तो दिल्ली की तस्वीर कुछ और हो सकती थी।जहां बीजेपी को 45.56 फ़ीसदी वोट मिले वहीं आम आदमी पार्टी को 43.57 फ़ीसदी वोट मिले।यहां तीसरे खे़मे के रूप में कांग्रेस थी जिसका वोट प्रतिशत 6.34 फ़ीसदी रहा।ये 2020 के चुनावों में उसके प्रदर्शन से बेहतर था, जब उसे 4.63 फ़ीसदी वोट मिले थे।साफ जाहिर है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे का संदेश दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहेगा।इसका असर समूचे देश की राजनीति पर पड़ने वाला है।</div>
<div> </div>
<div>इससे इंडिया गठबंधन भी गहरे तक प्रभावित होगा।दिल्ली के नतीजों ने ये भी साबित कर दिया है कि देश की जनता को भाजपा के हिंदुत्व के अलावा और किसी का हिंदुत्व पसंद नहीं है।जब उसे हिंदुत्व के मुद्दे पर ही अपनी सरकार चुन्नी है तो फिर भाजपा में क्या बुराई है जो खुल कर अपने को सनातन धर्म की रक्षक बताती है।देश में हिन्दुत्व की राजनीती में भाजपा अब इकलौती खिलाड़ी है,यहाँ तक कि उसने शिवसेना को भी बाहर कर दिया।कांग्रेस और अखिलेश यादव साफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग कई बार कर चुके हैं लेकिन सफल नहीं हुए।केजरीवाल ने भी ऐसा ही प्रयोग कर रहे थे।</div>
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<div>दिल्ली में केजरीवाल की हार ये भी बता रही है कि देश में देश में क्षेत्रीय पार्टियों की पकड़ कमज़ोर हुई है।ओडिशा में नवीन पटनायक को बीजेपी ने पटखनी दी,बिहार में जेडीयू को जूनियर पार्टनर बना चुकी है, महाराष्ट्र में शिवसेना को कमज़ोर कर चुकी है,हरियाणा से आईएनएलडी निष्प्रभावी हो गया है,तेलंगाना में बीआरएस कमज़ोर हो चुकी है।उत्तर प्रदेश और बिहार के कई प्रभावशाली छोटे दल पहले ही भाजपा के पाले में हैं।</div>
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<div>मज़ेदार बात ये है कि ये छोटे दल बड़े क्षेत्र में वोट बैंक रखते हैं लेकिन वह चुनावी जीत में इसे तभी बदल पाते हैं जब उनको भाजपा का साथ मिलता है।इस लिए वह भाजपा से सीटों की परफेक्ट सौदेबाजी नहीं कर पाते हैं।अब कांग्रेस के पास मौका है कि वह दिल्ली और पंजाब में अपनी खोई हुई जमीन को फिर से वापस लेने की कोशिश करें।अरविंद केजरीवाल को मिली हार के बाद अब राहुल गांधी खुद को विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में आगे कर सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>केजरीवाल की हार ने राहुल गांधी के लिए खुद को इंडिया ब्लॉक के स्वाभाविक नेता के रूप में स्थापित करने का रास्ता खोल दिया है।वहीं केजरीवाल के भविष्य को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का दौर अभी से शुरू हो गया है।तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।लेकिन ऐसा लगता नहीं कि बड़ी हार के बाद केजरीवाल पंजाब या फिर राज्यसभा का रूख करेंगे।वह दिल्ली में ही रह कर पार्टी के लिए मंथन करेंगे।लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि केजरीवाल अपनी लगभग खोई हुई,धूमिल हो चुकी छवि को कैसे सुधारेंगे। दरअसल जब आम आदमी पार्टी अगर खड़ी हुई थी,तो उसके पीछे अरविंद केजरीवाल की साख थी,जो उस समय किसी दूसरे राजनीतिज्ञों के पास नहीं थी।</div>
<div> </div>
<div>एक मजबूत लीडरश‍िप थी।कट्टर ईमानदारी और इंसानियत का तमगा भी उनके पास था।अरविंद केजरीवाल ने इसी के दम पर द‍िल्‍ली से लेकर पंजाब तक राज क‍िया। फिर गुजरात में भी ताकत बढ़ाई।लेकिन अब उनकी इसी ताकत पर सवाल है।मॉडल स्‍टेट का सपना चकनाचूर हो गया है।वह मोदी के गुजरात माडल का जवाब नहीं दे सके।वे खुद अपनी सीट हार गए हैं।इसी लिए अब उनके सामने बड़ी चुनौती पंजाब,गोवा, गुजरात से लेकर अन्य राज्यों तक पार्टी को एकजुट बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2025 17:41:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title> क्या दिल्ली में सत्ता के साथ व्यवस्था बदलेगी</title>
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<div>अन्ना हजारे के नेतृत्व और उनके आमरण अनशन के संकल्प के साथ 2011 के अगस्त महीने में भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान से एक देशव्यापी आंदोलन आरंभ हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की इस मुहिम में किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, शशिभूषण, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव एवं अन्य समाजसेवी शामिल हुए। इस आंदोलन ने तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और दिल्ली कांग्रेस सरकार की जड़े हिला कर रख दी। इसी अन्ना आंदोलन से सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन से जुड़े कुछ सहयोगियों की मदद से परन्तु अन्ना की रजामंदी के बगैर एक</div></div></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148561/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/01.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div>अन्ना हजारे के नेतृत्व और उनके आमरण अनशन के संकल्प के साथ 2011 के अगस्त महीने में भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान से एक देशव्यापी आंदोलन आरंभ हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की इस मुहिम में किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, शशिभूषण, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव एवं अन्य समाजसेवी शामिल हुए। इस आंदोलन ने तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और दिल्ली कांग्रेस सरकार की जड़े हिला कर रख दी। इसी अन्ना आंदोलन से सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन से जुड़े कुछ सहयोगियों की मदद से परन्तु अन्ना की रजामंदी के बगैर एक राजनीतिक दल 26 नवम्बर 2012 को आम आदमी पार्टी के नाम से बनाया।</div>
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<div>बच्चो की कसम भी खाई, कहा ना सरकारी घर लूंगा, ना गाड़ी लूंगा, ना सिक्योरिटी लूंगा आम आदमी हूं आम आदमी की तरह रहूँगा। भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा बुलंद कर कट्टर ईमानदार की छवि के साथ अरविंद केजरीवाल एण्ड पार्टी ने चुनाव लड़ा और अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में झाड़ू चुनाव चिन्ह के साथ  28 सीटों पर कब्जा कर लिया। कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में नही था। कांग्रेस के समर्थन के साथ आप ने सरकार बनाई। केजरीवाल उस सरकार में मुख्यमंत्री बने। लेकिन 49 दिनों के बाद कांग्रेस पर असहयोग के आरोप लगा अरविंद केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद अन्ना आंदोलन से उठा यह हवा का झोंका तूफान में बदल गया।</div>
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<div>देश में मोदी लहर चल रही थी परन्तु 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में फ्री बिजली, फ्री पानी, स्वास्थ्य सुविधाए, अच्छे स्कूलों आदि का वादा कर केजरीवाल की आप ने कुल 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीत सभी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर पूरे 5 साल सरकार चलाई। देश में मोदी और भाजपा की लहर प्रचण्ड हो गई थी। बड़े-बड़े सूरमा धराशाई हो रहे थे। भाजपा अपने सहयोगीयों के साथ ज्यादातर राज्यों में विधानसभा चुनाव जीत रही थी।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस बिल्कुल हाशिए पर चली गई। ऐसे समय में भी 2019 के दिल्ली व‍िधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आप ने नरेंद्र मोदी के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की लगाम थाम भाजपा को जबरदस्त पटखनी दी और दिल्ली की 70 में से 62 सीटों पर कब्जा कर अपना दम दिखाया था। पूरे देश में केजरीवाल का नाम गूंजने लगा। दिल्ली के बाहर भी पार्टी चुनाव लड़े और कुछ राज्यों में कुछ सीटें भी जीती। आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला।</div>
<div> </div>
<div>पंजाब व‍िधानसभा चुनावों में आप ने अन्य दलों को जड़ से उखाड फैंका और दिल्ली की तरह वहां भी एकतरफा प्रचंड जीत के साथ सरकार बनाई। इस जीत ने केजरीवाल को एक ब्रांड बना दिया। शायद यह खुशियाँ केजरीवाल की किस्मत मे आखिरी खुशी की तरह थी। इसके बाद उनके बुरे दौर की शुरूआत हुई। एल.जी से टकराव, सहयोगीयों और केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के इल्जाम व ईडी के शिकंजे ने केजरीवाल सहित आप के प्रमुख नेताओं को जेल के पीछे पहुंचा दिया। साथ ही साथ मुख्यमंत्री के अलीशान शीशमहल का मुद्दा गर्मा गया। लोग खुद को ठगा सा महसूस करने लगा।</div>
<div> </div>
<div>उन्हे लगा आम आदमी बन कर जो सत्ता में आया था वो अब राजा- महाराजा वाला शाही जीवन जी रहा है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार विकास कर नही पा रही थी। बस मामला फ्री बिजली-पानी, स्कूलों तक रह गया था। मोहल्ला क्लीनिक बदहाल हो गए थे। प्रदूषित हवा, पानी, बरसातों में डूबती दिल्ली, रोजाना सड़कों पर जाम और अन्य समस्याओ से दिल्ली सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा भड़क रहा था। केंद्र की भाजपा सरकार भी लोगों का यह गुस्सा भड़काने में अहम भूमिका एल.जी के हस्तक्षेप द्वारा निभाती रही। केंद्र की एजेंसियों के हत्थे चढ़ने के बाद केजरीवाल ने बहुत कुछ गंवाया।</div>
<div> </div>
<div>भ्रष्टाचार के इल्जामों ने ‘ब्रांड केजरीवाल' के साथ जुड़े तमाम चमकदार विशेषणों को बेरंगत कर दिया। दो बार ठसक और धमक के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो 2025 के व‍िधानसभा चुनाव में  केजरीवाल मुंह के बल गिरे। पार्टी के सभी धुरंधर चुनाव हार गए। खुद केजरीवाल अपना चुनाव हार गए। बीजेपी 27 वर्ष बाद दिल्ली की सत्ता में वापिस आई है। दिल्ली विधानसभा के पुनर्गठन के बाद हुए पहले 1993 के चुनाव में भाजपा की सरकार बनी थी, तब 5 साल के कार्यकाल में भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी के कारण सरकार बनने के बाद दो बार मुख्यमंत्री को बदला गया।</div>
<div> </div>
<div>इस सरकार का गठन मदनलाल खुराना को मुख्यमंत्री बना कर हुआ। फिर कुछ सालों बाद खुराना को हटा साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। वर्मा को भी कुछ समय बाद हटना पड़ा और उनकी जगह पदभार संभाला सुषमा स्वराज ने, अब दिल्ली की जनता की बहुत उम्मीद भाजपा सरकार से है। अब जबकि दिल्ली में आप साफ हो गई तो आने वाले समय में आईएनडीआईए की राजनीति पर इसका क्या असर होगा यह विपक्ष के लिए विचारणीय होगा। आप का विस्तार पहले से ही ठहरा हुआ था, विस्तार की संभावना अब और कम हो जाएगी। अब अगले 5 साल केजरीवाल देश की जगह दिल्ली में अपने वजूद को वापिस पाने पर फोकस करने के लिए मजबूर हो सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>ऐसा हुआ तो दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की संभावनाएं और कम हो जाएंगी। बमुश्किल आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आप दिल्ली में साझीदार थे। खुद नेहरू गांधी परिवार ने आप के उम्मीदवार को वोट किया था परन्तु अब आईएनडीआईए की एकजुटता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। बेशक बिहार में केजरीवाल का कोई वजूद नही है परन्तु दिल्ली के नतीजों के बाद बीजेपी विरोधी पार्टियों के बीच जो आपसी खिंचातान शुरू होगी, उसका असर बिहार चुनाव में महागठबंधन की राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा। कांग्रेस पर दिल्ली में आप का खेल बिगाड़ने के आरोप लगेंगे।</div>
<div> </div>
<div>यदि यह सब हुआ तो बिहार में महागठबंधन की चुनावी संभावनाओं को नुकसान जरूर पहुंच सकता है। भाजपा के लिए दिल्ली में अब कुछ कर दिखाने का समय है। अब देखना होगा दिल्ली में सत्ता के साथ व्यवस्था भी बदलती है या नही। प्रदूषण मुक्त, ट्रैफिक जाम मुक्त, यमुना को साफ कर एवंम अन्य समस्याओ से छुटकारा दिला भाजपा दिल्ली को अन्य प्रदेशों की जनता के सामने उदाहरण बना पेश कर सकती है। </div>
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:52:01 +0530</pubDate>
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                <title>मजबूत नेताओं से कमजोर होता विपक्ष </title>
                                    <description><![CDATA[<div>किसी भी दल व संगठन की मजबूती के लिए उसके नेतृत्व का मजबूत होना जरूरी है। यहां हम विपक्ष की बात कर रहे हैं जो मजबूत घटक दलों के होने के बाद भी कमजोर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में जो एनडीए का गठबंधन है उसमें भाजपा बहुत ही मजबूत दल है और उसके सहयोगी दल छोटे हैं लेकिन जब उन छोटे दलों को भाजपा का साथ मिलता है तो वह मजबूत बन जाते हैं।</div>
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<div>वहीं यदि हम देश के विपक्ष को देखें तो इसमें सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी है लेकिन उसके साथ जो सहयोगी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148559/opposition-weakened-by-strong-leaders%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img_20250212_113800.jpg" alt=""></a><br /><div>किसी भी दल व संगठन की मजबूती के लिए उसके नेतृत्व का मजबूत होना जरूरी है। यहां हम विपक्ष की बात कर रहे हैं जो मजबूत घटक दलों के होने के बाद भी कमजोर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में जो एनडीए का गठबंधन है उसमें भाजपा बहुत ही मजबूत दल है और उसके सहयोगी दल छोटे हैं लेकिन जब उन छोटे दलों को भाजपा का साथ मिलता है तो वह मजबूत बन जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>वहीं यदि हम देश के विपक्ष को देखें तो इसमें सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी है लेकिन उसके साथ जो सहयोगी दल हैं वो अपने क्षेत्र में मजबूत हैं और यही कारण है कि वह न तो किसी से झुकना पसंद करते हैं और न ही किसी का आगे बढ़ना पसंद करते हैं और यहां बात उठती है विपक्षी संगठन के नेतृत्व की इसमें न तो कांग्रेस पीछे रहना चाहती और न ही अन्य दल।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस चाहती है कि जिन क्षेत्रों में वह कमजोर है वहां सहयोगियों के द्वारा उसे बढ़ने का मौका मिले जब कि अन्य क्षेत्रीय दल चाहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर अन्य राज्यों में बढ़ने का मौका मिले। बस इसी खींचतान में विपक्ष चुनाव दर चुनाव पीछे होता जा रहा है। कांग्रेस का जनाधार हिंदीभाषी राज्यों से लगभग खिसक चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यदि हम बात करें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड की तो यहां कांग्रेस बैशाखियों पर निर्भर है। जब कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने उसको बहुत पीछे कर दिया है। कुल मिलाकर विपक्ष में सब अपना अपना हित साधने में लगे हैं लेकिन किसी भी हित होता नहीं दिख रहा है। यहीं यदि थोड़ा सा विचार परिवर्तन हो जिसमें सब एक दूसरे का हित साधते दिखें तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए वीपी सिंह के नेतृत्व में जब जनता दल बना था तब उसका केवल एक उद्देश्य था और वह था कांग्रेस को सत्ता से दूर करना। इसके अलावा किसी नेता या किसी क्षेत्रीय दल का कोई दूसरा उद्देश्य नहीं था। जनता दल में अपने अपने क्षेत्र के सभी कद्दावर नेता थे जो किसी पहचान के मोहताज नहीं थे।</div>
<div> </div>
<div>सभी ने मेहनत थी किसी को नहीं पता था कि कौन क्या बनेगा, किसका क्या भविष्य होगा। और जब परिणाम सामने आया तो कांग्रेस के पसीने छूट गए। जनता दल से कांग्रेस को पूरे देश में चारों खाने चित कर दिया। जब कांग्रेस सरकार से हट गई और जनता दल को जब सरकार बनाने का मौका मिला उसके बाद तय हुआ कि कौन क्या पद सम्हालेगा। लेकिन आज की विपक्ष की स्थिति अलग है कोई भी किसी को बढ़ना नहीं देखना चाहता।</div>
<div> </div>
<div>विपक्षी खेमे में चाहे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो, बंगाल में ममता बनर्जी हों या महाराष्ट्र में एनसीपी, शिवसेना उद्धव गुट का गठबंधन हो या दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी हो सभी अपने क्षेत्र के भारी भरकम दल हैं। और ये ऐसे राजनैतिक दल बन चुके हैं जो कम कीमत पर कांग्रेस से समझौता नहीं कर सकते जब कि कांग्रेस अकेले कुछ भी नहीं कर सकती। दिल्ली का चुनाव देखने के बाद तो स्थिति यह बन चुकी है कि विपक्ष भारतीय जनता पार्टी से नहीं अपने आप से ही लड़ रहा है।</div>
<div> </div>
<div>किसी को किसी पर विश्वास नहीं है। सब केवल अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। सरकार बने न बने पार्टी रुपी दुकान तो चल ही रही है। केजरीवाल पूरे देश में राजनीति करना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में विस्तार करना चाहती है।</div>
<div> </div>
<div> दिल्ली के मतदाताओं ने इस चुनाव में जो निर्णय दिया है उसमें एक बहुत गहरी सोच छिपी है। लेकिन शायद इस सोच को राजनैतिक दल न समझ सकें। केजरीवाल सत्ता से दूर क्यों हुए ? इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन प्रमुख कारण है कि आप जनता को बेवकूफ समझना बंद कीजिए। आप पूरे देश में कांग्रेस से गठबंधन कर रहे हैं और जब दिल्ली और पंजाब की बात आती है तो आप अकेले चुनाव में चले जाते हैं। यह क्या संदेश देता है, क्या जनता आपके मतलब को नहीं समझ पायेगी। गठबंधन करना है तो पूरी तरह से कीजिए अन्यथा गठबंधन का नाटक बंद कीजिए।</div>
<div> </div>
<div>लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी को सर्वाधिक सीट सौंपी और वहीं उपचुनाव में जनता ने सब कुछ भारतीय जनता पार्टी को दे दिया। ऐसा क्यों इसके उत्तर भी समाजवादी पार्टी को खोजने होंगे। एक अयोध्या की जीत को आप देश की जीत नहीं मान सकते। किसी क्षेत्र में मिली जीत वहां का एक स्थानीय कारण भी हो सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:38:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>  मणिपुर : फ़ेल हुई 'डबल इंजन 'की सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[<div>8 फ़रवरी को जब दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे और भाजपा के साथ ही देश का मीडिया भी भाजपा की जीत के क़सीदे बांचने में लगा था। देश को यह बताया जा रहा था कि दिल्ली से 'आप' दा  जा चुकी है।  ठीक उसी समय भाजपा हाईकमान द्वारा निर्देशित भाजपा की मणिपुर की सबसे 'आपदा ग्रस्त ' डबल इंजन सरकार के मुख्यमंत्री नोंगथोम्बम बीरेन सिंह को त्यागपत्र देने हेतु निर्देशित किया जा चुका था । जिसे दिल्ली जीत के जश्न से ठीक अगले दिन यानी 9 फ़रवरी को अमल में लाया गया। पिछले छह महीनों से मैतेई,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148557/%C2%A0%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/beeren-rahul-.jpg" alt=""></a><br /><div>8 फ़रवरी को जब दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे और भाजपा के साथ ही देश का मीडिया भी भाजपा की जीत के क़सीदे बांचने में लगा था। देश को यह बताया जा रहा था कि दिल्ली से 'आप' दा  जा चुकी है।  ठीक उसी समय भाजपा हाईकमान द्वारा निर्देशित भाजपा की मणिपुर की सबसे 'आपदा ग्रस्त ' डबल इंजन सरकार के मुख्यमंत्री नोंगथोम्बम बीरेन सिंह को त्यागपत्र देने हेतु निर्देशित किया जा चुका था । जिसे दिल्ली जीत के जश्न से ठीक अगले दिन यानी 9 फ़रवरी को अमल में लाया गया। पिछले छह महीनों से मैतेई, कुकी और नागा विधायक एक साथ मिलकर मुख्यमंत्री बीरेन को पद से हटाने के लिए केंद्रीय नेताओं से बात कर रहे थे।</div>
<div> </div>
<div>ख़बरों के अनुसार गत  3 फ़रवरी को ही मणिपुर के 33 विधायकों ने, जिनमें 19 विधायक भाजपा के भी बताये जा रहे हैं,दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री व गृह मंत्री से मिलकर मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के विरुद्ध  अविश्वास प्रस्ताव की जानकारी दे दी थी।  बल्कि यह भी बता दिया था कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के विरुद्ध अविश्वास प्रस्तव आने की स्थिति में भाजपा विधायक भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर सकते हैं। इसीलिये भाजपा नेतृत्व को भारतीय राजनीति के इतिहास के सबसे अकुशल,असफल व अकर्मण्य व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा।</div>
<div> </div>
<div>हाँ मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के त्याग पात्र के बावजूद यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि इतनी व्यापक व दीर्घकालिक अनियंत्रित हिंसा होने के बावजूद आख़िर भाजपा नेतृत्व ने किन परिस्थितियों में उन्हें मुख्यमंत्री पद से पहले क्यों नहीं हटाया ? इतना ही नहीं बल्कि बीरेन सिंह पर जातीय हिंसा के दौरान पक्षपात करने का भी आरोप है। बीरेन सिंह स्वयं मैतेई समुदाय से आते हैं। कुकी जनजाति के एक व्यक्ति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह आरोप लगाया गया था कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने राज्य में हिंसा भड़काई है।  याचिकाकर्ता ने इससे सम्बंधित एक ऑडियो टेप भी अदालत में सबूत के तौर पर जमा कराया है। प्रयोगशाला 'ट्रुथ लैब्स' ने इस बात की पुष्टि भी की है कि इस ऑडियो टेप में 93 प्रतिशत आवाज़ बीरेन सिंह की आवाज़ से मेल खाती है। गोया बीरेन सिंह 'राजधर्म का पालन' न करने के भी खुले दोषी हैं। </div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-02/beeren.png" alt="beeren" width="1200" height="700"></img></div>
<div>इतिहास इस बात का साक्षी रहेगा कि बावजूद इसके कि देश के और भी कई राज्य समय समय पर किसी न किसी मुहिम या आंदोलन वश हिंसा,अशांति व अव्यवस्था के शिकार रहे हैं। परन्तु भाजपा शासित इस राज्य में 3 मई 2023 से मैतेयी व कुकी समुदायों के बीच छिड़े जातीय हिंसक संघर्ष में जिस स्तर की हिंसा व अशांति देखनी पड़ी उसकी दूसरी मिसाल देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। हिंसा,आगज़नी,बलात्कार,सामूहिक बलात्कार यहाँ तक कि हिंसक भीड़ द्वारा युवतियों की नग्न परेड कराने जैसी शर्मनाक घटनाएं घटीं। मंत्रियों,विधायकों व अन्य नेताओं के घरों को आग के हवाले कर दिया गया।</div>
<div> </div>
<div>पुलिस  थाने आग की भेंट चढ़े,यहाँ तक कि शस्त्रागार के हथियार तक उपद्रवी छीन ले गये। सैकड़ों लोग इस संघर्ष में मारे गये जबकि हज़ारों लोग विस्थापित भी हुये। परन्तु मणिपुर का 'डबल इंजन ' मूक दर्शक बना रहा। क़ानून व्यवस्था की यह स्थिति राज्य में उस समय पैदा हुई थी जबकि मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा में एन डी ए के पास 52 सीटें हैं जिसमें अकेली भाजपा के पास 37 सीटें हैं। राज्य सरकार के लिये इससे बेहतर बहुमत और क्या हो सकता था ? </div>
<div> </div>
<div>बहरहाल मई 2023 से लेकर अभी तक जारी हिंसा के बीच लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गाँधी जहां तीन बार मणिपुर का दौरा कर हिंसा पीड़ितों के बीच जाकर वहां के लोगों से मिलकर हालात का जायज़ा ले चुके हैं वहीँ प्रधानमंत्री ने अभी तक एक बार भी हिंसाग्रस्त मणिपुर का दौरा करना मुनासिब नहीं समझा। हद तो यह है कि राहुल गाँधी व विपक्ष के तमाम प्रयासों के बावजूद सदन में मणिपुर पर चर्चा को भी टालने की कोशिशें हुईं। सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा मणिपुर की शर्मनाक घटनाओं को कांग्रेस शासित राज्यों से जोड़कर मणिपुर घटनाओं पर लीपापोती करने की कोशिश की गयी।</div>
<div> </div>
<div>निःसंदेह राहुल गाँधी देश के अकेले ऐसे नेता हैं जो लगातार मणिपुर हिंसा के विषय को उठाते रहे हैं । और भाजपा पर यह दबाव इतना बढ़ा कि मणिपुर विधानसभा में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आने से पहले ही पार्टी ने आख़िरकार उनसे त्याग पत्र ले ही लिया। </div>
<div> </div>
<div>बीरेन सिंह के त्यागपत्र के बाद मणिपुर में भाजपा के लिये राजनैतिक संकट खड़ा होना तो निश्चित है ही साथ ही अब यह भी प्रमाणित हो चुका है कि बीरेन सिंह पूरी तरह से मणिपुर हिंसा को नियंत्रित कर पाने में असफल रहे हैं। अन्यथा क्या कारण था कि 3 मई 2023 से लेकर अब तक हिंसा पर पूर्ण नियंत्रण हासिल नहीं किया जा सका ? इसी दीर्घकालिक हिंसा के कारण भाजपा के ही अधिकांश विधायक बीरेन नेतृत्व के विरुद्ध होते जा रहे थे। और मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी भाजपा विधायकों द्वारा ही की जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे में इस बात की पूरी संभावना थी कि कहीं मणिपुर बीजेपी के हाथ से निकल न जाये। क्योंकि राज्य में हिंसा की भेंट चढ़े लंबा समय बीत चुका है और समाधान के नाम पर कुछ भी सामने नज़र नहीं आ रहा। ऐसे में प्रदेश बीजेपी के अंदर ही काफ़ी मतभेद शुरू हो गए थे."बीजेपी के लोग ही मुख्यमंत्री बदलने की मांग कर रहे थे। आगामी 10 फ़रवरी से विधानसभा सत्र शुरू होते ही मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। इसीलिये भाजपा नेतृत्व द्वारा दिल्ली चुनाव परिणाम के जश्न के बीच ही बीरेन सिंह से त्यागपत्र लेने का फ़ैसला किया गया। </div>
<div> </div>
<div>देखना होगा कि बंगाल सहित अन्य ग़ैर भाजपा शासित राज्यों को 'जंगल राज ' व 'आपदा ग्रस्त ' सरकार बताने वाली भाजपा, मणिपुर में महा 'आपदा' के रूप में विराजमान रहे मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को हटाने के बाद जातीय हिंसा में सुलगते मणिपुर के लोगों को भयमुक्त करने व उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिये क्या क़दम उठती है। और देश की इस बात पर भी नज़र रहेगी कि मणिपुर में  'डबल इंजन 'की सरकार के बुरी तरह से फ़ेल होने का प्रभाव भविष्य में पूर्वोत्तर की भाजपा की राजनीति पर क्या पड़ेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 16:35:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title> क्या आरोप लगाने से बाज़ आएगा विपक्ष ?</title>
                                    <description><![CDATA[<div>दिल्ली विधानसभा के चुनाव संपन्न हो गये, भारतीय जनता पार्टी ने वहां 27 साल के बाद सत्ता में वापसी की है। वहीं दस वर्षों तक सत्ता में काबिज रहने वाली आम आदमी पार्टी अब दिल्ली की सत्ता से दूर हो चुकी है। इस बार दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी 48 जबकि आप को 22 सीटें मिलीं। पिछली विधानसभा की बात करें तो आप के पास 62 सीट थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी के पास 8 सीट थीं। यह निश्चित है कि इस चुनाव में आप सत्ता से बाहर हुई है लेकिन भाजपा को सफलता का वो प्रतिशत नहीं मिला जो</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148489/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/34045113.jpg" alt=""></a><br /><div>दिल्ली विधानसभा के चुनाव संपन्न हो गये, भारतीय जनता पार्टी ने वहां 27 साल के बाद सत्ता में वापसी की है। वहीं दस वर्षों तक सत्ता में काबिज रहने वाली आम आदमी पार्टी अब दिल्ली की सत्ता से दूर हो चुकी है। इस बार दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी 48 जबकि आप को 22 सीटें मिलीं। पिछली विधानसभा की बात करें तो आप के पास 62 सीट थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी के पास 8 सीट थीं। यह निश्चित है कि इस चुनाव में आप सत्ता से बाहर हुई है लेकिन भाजपा को सफलता का वो प्रतिशत नहीं मिला जो पिछली दो विधानसभा में आप के पास था। दिल्ली की हार के बाद विपक्ष में आपस में आरोप प्रत्यारोप शुरू हो चुके हैं।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन क्या सिर्फ आरोप प्रत्यारोप के द्वारा हम अपनी गलतियों को छिपा सकते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को कटघरे में लिया है। और यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कारण आप की हार हुई है। यहां पर सोचने वाली बात यह है कि कांग्रेस को हटाकर ही आप दिल्ली की सत्ता में आई थी तो क्या आप को जिताने के लिए कांग्रेस को हट जाना चाहिए ? क्यों नहीं दिल्ली में गठबंधन करके चुनाव लड़ा गया। 
<div> </div>
<div>इस चुनाव में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि आम आदमी पार्टी को इस बार सत्ता में वापसी करने में दिक्कत हो सकती है। लेकिन फिर भी आप ने गठबंधन के लिए कांग्रेस से दो टूक मना कर दी थी। जब विपक्षी दल एक होकर चुनाव नहीं लड़ सकते तो उनको कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी दूसरी पार्टी पर उंगली उठा सकें। और फिर कांग्रेस क्यों हटे क्या सारे विपक्ष को जिताने का ठेका कांग्रेस ने ही ले रखा है। अन्य विपक्षी दलों का कोई कर्तव्य नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>सच तो यह है चाहे वह उत्तर प्रदेश का मिल्कीपुर हो या दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम। विपक्ष इसमें हारा है। विपक्ष हारा ही नहीं उसकी रणनीति भी फेल हो रही है। आपसी खींचतान में न उलझकर एक रणनीति की आवश्यकता है जो कि कभी दिखाई नहीं दी। नितीश कुमार ने इंडिया गठबंधन को ऐसे ही नहीं छोड़ा है, यही सब कारण बनते हैं जब केवल निजी स्वार्थ की बात होती है।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली की सत्ता जाने के बाद अब आगे भी आम आदमी पार्टी को सत्ता में वापसी करना मुश्किल होगा। दिल्ली एक ऐसा राज्य है जहां की जनता ने आप को उस समय बंपर जीत दी जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी। लेकिन आपसी खींचतान की वजह से आप इसको बरकरार रखने में सफल नहीं हो सकी। ऐसा दिल्ली में ही नहीं है बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी ऐसा ही हुआ है। और यही कारण है कि मजबूत होते हुए भी विपक्ष कमजोर प्रदर्शन कर पा रहा है।</div>
<div> </div>
<div>जब भी विपक्षी एकता की बात होती है तो पहले विपक्षी दलों को आपना स्वार्थ साधते देखा जाता रहा है। सही मायने में तो देखा जाए तो विपक्षी दल स्वयं ही भारतीय जनता पार्टी को हटाना नहीं चाहते और आरोप एक दूसरे पर मढ़ रहे हैं। सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने दिल्ली चुनाव के बाद तुरंत यह कहते देर नहीं लगाई कि दिल्ली में आप की हार की जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी है। जब कांग्रेस को सत्ता में रहते आप ने जीरो पर समेट दिया था तब जिम्मेदार कौन था। क्या दूसरे दलों के लिए कांग्रेस अपनी राजनीति खत्म करदे, क्या यही विपक्ष चाहता है।</div>
<div> </div>
<div>विपक्षी दलों का गठबंधन भी अजीब दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर सभी गठबंधन करना चाहते हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर सभी के विचार, सिद्धांत बदल जाते हैं। लोकसभा का चुनाव साथ लड़ना चाहते हैं लेकिन विधानसभा चुनाव में जहां स्वयं मजबूत हैं वहां किसी अन्य को अधिक महत्व नहीं देना चाहते। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि विपक्ष केवल अपनी ग़लत रणनीति के कारण हार रहा है और इसीलिए वह दम भर कर कहती है कि आने वाले 15-20 सालों तक देश की राजनीति से भाजपा को कोई हिला नहीं सकता।</div>
<div> </div>
<div>एक राज्य में आप एक होकर चुनाव लड़ते हैं वहीं दूसरे राज्य में एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आते हैं। देश की जनता इतनी बेवकूफ नहीं है और न ही जनता को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में मजबूत थे तब वहां किसी से गठबंधन नहीं करना चाहते थे जब कि अन्य राज्यों में उनके गठबंधन के विकल्प खुले रहते हैं। आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों ? देश की जनता यह जानना चाहती है।</div>
<div> </div>
<div>आम आदमी पार्टी की सरकार से पहले दिल्ली में लगातार तीन बार शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। लगातार तीन बार सरकार बनना इतना आसान नहीं है। जबकि दिल्ली के पड़ोसी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में राजनैतिक उथल-पुथल जारी रही। दिल्ली में केजरीवाल ने जब एक नई राजनीति की शुरुआत की तो लोगों को लगा कि शायद ये कुछ अलग करेंगे लेकिन राजनीति के नियम और सिद्धांत एक ही हैं।</div>
<div> </div>
<div>यदि राजनीति करनी है तो उन्हें अपनाना होगा और यही आम आदमी पार्टी के साथ हुआ। सभी को पता है कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का कांग्रेस के साथ गठबंधन था लेकिन वहीं विधानसभा चुनाव में पंजाब और दिल्ली में आप ने स्पष्ट मना कर दिया कि वह इन विधानसभा चुनाव में किसी भी दल के साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी। आम आदमी पार्टी समेत समूचे विपक्ष को एक बार बैठकर चिंतन करने की आवश्यकता है। </div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Feb 2025 17:22:09 +0530</pubDate>
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                <title>क्या दिल्ली में सत्ता के साथ व्यवस्था बदलेगी</title>
                                    <description><![CDATA[<div>अन्ना हजारे के नेतृत्व और उनके आमरण अनशन के साथ 2011 के अगस्त महीने में भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान से एक देशव्यापी आंदोलन का आरंभ हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की इस मुहिम में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव एवं अन्य अनेक प्रसिद्ध समाजसेवी शामिल हुए। इस आंदोलन ने तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और दिल्ली कांग्रेस सरकार की जड़े हिला कर रख दी।</div>
<div>  </div>
<div>इसी अन्ना आंदोलन से सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन से जुड़े कुछ सहयोगियों की मदद से परन्तु अन्ना की रजामंदी के बगैर एक राजनीतिक दल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148433/will-the-system-change-with-power-in-delhi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(25).jpg" alt=""></a><br /><div>अन्ना हजारे के नेतृत्व और उनके आमरण अनशन के साथ 2011 के अगस्त महीने में भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान से एक देशव्यापी आंदोलन का आरंभ हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की इस मुहिम में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव एवं अन्य अनेक प्रसिद्ध समाजसेवी शामिल हुए। इस आंदोलन ने तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और दिल्ली कांग्रेस सरकार की जड़े हिला कर रख दी।</div>
<div> </div>
<div>इसी अन्ना आंदोलन से सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन से जुड़े कुछ सहयोगियों की मदद से परन्तु अन्ना की रजामंदी के बगैर एक राजनीतिक दल 26 नवम्बर 2012 को आम आदमी पार्टी के नाम से बनाया। भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना दिखा, ना घर लूंगा ना गाड़ी लूंगा ना सिक्योरिटी लूंगा का नारा बुलंद कर कट्टर ईमानदार की छवि के साथ अरविंद केजरीवाल एण्ड पार्टी ने चुनाव लड़ा और अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में झाड़ू चुनाव चिन्ह के साथ  28 सीटों पर कब्जा कर लिया। कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में नही था।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस के समर्थन के साथ आप ने सरकार बनाई। लेकिन 49 दिनों के बाद कांग्रेस पर असहयोग के आरोप लगा केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद अन्ना आंदोलन से उठा यह हवा का झोंका तूफान में बदल गया। देश में मोदी लहर चल रही थी परन्तु 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में फ्री बिजली, फ्री पानी, स्वास्थ्य सुविधाए, अच्छे स्कूलों का वादा कर केजरीवाल की आप ने कुल 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीत सभी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर पूरे 5 साल सरकार चलाई।</div>
<div> </div>
<div>देश में मोदी और भाजपा की लहर प्रचण्ड हो गई थी। बड़े-बड़े सूरमा धराशाई हो रहे थे। भाजपा ज्यादातर राज्यों में विधानसभा चुनाव जीत रही थी। कांग्रेस बिल्कुल हाशिए पर चली गई। उस समय में भी 2019 के दिल्ली व‍िधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आप ने नरेंद्र मोदी की भाजपा को जबरदस्त पटखनी दी और दिल्ली की 70 में से 62 सीटों पर कब्जा कर के अपना दम दिखाया था। पूरे देश में केजरीवाल का नाम गूंजने लगा। दिल्ली के बाहर भी पार्टी चुनाव लड़ने लगी और कुछ राज्यों में कुछ सीटें भी जीती।</div>
<div> </div>
<div>पंजाब व‍िधानसभा चुनावों में आप ने अन्य दलों को जड़ से उखाड फैंका और दिल्ली की तरह वहां भी एकतरफा जीत के साथ सरकार बनाई। इस जीत ने केजरीवाल को एक ब्रांड दिया। आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला परन्तु शायद यह केजरीवाल की किस्मत मे आखिरी खुशी की तरह था। इसके बाद उनके बुरे दौर की शुरूआत हुई। एल.जी से टकराव, सहयोगीयों और केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के इल्जामों व ईडी के शिकंजे ने केजरीवाल सहित आप के प्रमुख नेताओं को जेल के पीछे पहुंचा दिया।</div>
<div> </div>
<div>साथ ही साथ मुख्यमंत्री के अलीशान शीशमहल का मुद्दा गर्मा गया। लोगों को लगने लगा आम आदमी बन कर जो सत्ता में आया था वो आज महाराजा वाला शाही जीवन जी रहा है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार विकास कर नही पा रही थी। बस मामला फ्री बिजली-पानी, स्कूलों तक रह गया था। मोहल्ला क्लीनिक बदहाल हो गए थे। प्रदूषित हवा, पानी, बरसातों में डूबती दिल्ली, रोज के सड़कों पर जाम और अन्य समस्याओ ने दिल्ली सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा भर दिया।</div>
<div> </div>
<div>केंद्र की भाजपा सरकार भी लोगों का यह गुस्सा भड़काने में अहम भूमिका एल.जी के हस्तक्षेप द्वारा निभाती रही। केंद्र की एजेंसियों के हत्थे चढ़ने के बाद केजरीवाल बहुत कुछ गंवा बैठे। भ्रष्टाचार के इल्जामों ने ‘ब्रांड केजरीवाल' के साथ जुड़े तमाम चमकदार विशेषणों को बेरंगत कर दिया। दो बार ठसक और धमक के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो 2025 के व‍िधानसभा चुनाव में  केजरीवाल मुंह के बल गिरे। पार्टी के सभी धुरंधर चुनाव हार गए। खुद केजरीवाल अपना चुनाव हार गए। बीजेपी 27 वर्ष बाद दिल्ली की सत्ता में वापिस आई है।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली विधानसभा के पुनर्गठन के बाद हुए पहले 1993 के चुनाव में भाजपा की सरकार बनी थी, तब 5 साल के कार्यकाल में भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी के कारण सरकार बनने के बाद दो बार मुख्यमंत्री को बदला गया। इस सरकार का गठन मदनलाल खुराना को मुख्यमंत्री बना कर हुआ। फिर कुछ सालों बाद खुराना को हटा साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। वर्मा को भी कुछ समय बाद हटना पड़ा और उनकी जगह पदभार संभाला सुषमा स्वराज ने, अब दिल्ली की जनता की बहुत उम्मीद भाजपा सरकार से है। अब जबकि दिल्ली में आप साफ हो गई तो आने वाले समय में आईएनडीआईए की राजनीति पर इसका क्या असर होगा यह विपक्ष के लिए विचारणीय होगा।</div>
<div> </div>
<div>आप का विस्तार पहले से ही ठहरा हुआ था, विस्तार की संभावना अब और कम हो जाएगी। अब अगले 5 साल केजरीवाल देश की जगह दिल्ली में अपने वजूद को वापिस पाने पर फोकस करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की संभावनाएं और कम हो जाएंगी। बमुश्किल आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आप दिल्ली में साझीदार थे। खुद नेहरू गांधी परिवार ने आप के उम्मीदवार को वोट किया था परन्तु अब आईएनडीआईए की एकजुटता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।</div>
<div> </div>
<div>बेशक बिहार में केजरीवाल का कोई वजूद नही है परन्तु दिल्ली के नतीजों के बाद बीजेपी विरोधी पार्टियों के बीच जो आपसी खिंचातान शुरू होगी, उसका असर बिहार चुनाव में महागठबंधन की राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा। कांग्रेस पर दिल्ली में आप का खेल बिगाड़ने के आरोप लगेंगे। यदि यह सब हुआ तो बिहार में महागठबंधन की चुनावी संभावनाओं को नुकसान जरूर पहुंच सकता है। भाजपा के लिए दिल्ली में अब कुछ कर दिखाने का समय है। अब देखना होगा दिल्ली में सत्ता के साथ व्यवस्था भी बदलती है या नही। प्रदूषण मुक्त, ट्रैफिक जाम मुक्त, यमुना को साफ कर एवंम अन्य समस्याओ से छुटकारा दिला भाजपा दिल्ली को अन्य प्रदेशों की जनता के सामने उदाहरण बना पेश कर सकती है। </div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Mon, 10 Feb 2025 16:46:59 +0530</pubDate>
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                <title>वीरेन का इस्तीफा, यानि का वर्षा जब कृषि सुखानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पिछले 21  महीने से साम्प्रदायिकता की आग में धधक रहे मणिपुर के मुख्यमंत्री वीरेन कुमार सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया,इससे पहले उन्होंने   कुम्भ में डुबकी लेकर अपनी नाकामी के लिए शायद   प्रायश्चित   भी किया,लेकिन अब मुख्यमंत्री के इस्तीफे का कोई अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि भाजपा   हाईकमान ने वीरेन सिंह को हटाने में काफी देर कर दी। दिल्ली  विधानसभा चुनाव जीतने के फौरन बाद वीरेन सिंह के इस्तीफे की खबर दबकर रह गयी। आपको याद होगा कि मणिपुर 03  मई 2023  से हिंसा की आग में जल रहा है। निर्णय लेने में डबल इंजिन की सरकार को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148430/virens-resignation-ie-rain-when-agriculture-is-dried"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/mnipur1-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>पिछले 21  महीने से साम्प्रदायिकता की आग में धधक रहे मणिपुर के मुख्यमंत्री वीरेन कुमार सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया,इससे पहले उन्होंने   कुम्भ में डुबकी लेकर अपनी नाकामी के लिए शायद   प्रायश्चित   भी किया,लेकिन अब मुख्यमंत्री के इस्तीफे का कोई अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि भाजपा   हाईकमान ने वीरेन सिंह को हटाने में काफी देर कर दी। दिल्ली  विधानसभा चुनाव जीतने के फौरन बाद वीरेन सिंह के इस्तीफे की खबर दबकर रह गयी। आपको याद होगा कि मणिपुर 03  मई 2023  से हिंसा की आग में जल रहा है। निर्णय लेने में डबल इंजिन की सरकार को लगभग पूरे दो साल लग गए। निर्णय लेने में देरी के संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में जो चौपाई लिखी वो कालांतर   में मुहावरा बन गया ।  उन्होंने लिखा -का बरषा सब कृषी सुखानें।समय चुकें पुनि का पछितानें॥</p>
<p>भाजपा ने मणिपुर की हिंसा के फौरन बाद यदि मुख्यमंत्री को हटा दिया होता तो शायद मणिपुर की हिंसा भी रूकती और भाजपा को आलोचनाओं का शिकार भी नहीं होना पड़ता ,लेकिन भाजपा  ने इस मामले में जान-बूझकर लेतलाली की। मुख्यमंत्री का इस्तीफा तो छोड़िये देश के प्रधानमंत्री भी पिछले दो साल में एक बार भी मणिपुर हिंसा की समीक्षा करने या पीड़ितों से भेंट करने मणिपुर नहीं गए।</p>
<p>मुझे  याद है इसलिए मै आपको याद दिलाना चाहता हूँ   कि 27 मार्च 2023 को मणिपुर हाई कोर्ट ने एक आदेश में राज्य सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की बात पर जल्दी विचार करने को कहा था.और इस आदेश के कुछ दिन बाद ही तीन मई 2023 को राज्य में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़क गई थी।  इसमें कई लोगों की जान भी गई। मणिपुर में ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर द्वारा आयोजित एक जन रैली के हिंसक हो जाने के बाद प्रशासन ने शूट ऐट साइट का ऑर्डर भी जारी किया।</p>
<p><br />उसके बाद प्रदेश के अधिकांश ज़िलों में कर्फ़्यू लगा दिया गया और हालात को नियंत्रित करने के लिए सेना और असम राइफ़ल्स के जवानों को तैनात किया गया। कभी -कभी ऐसा लगता है  कि  देश की मजबूत सरकार मनीपुर की हिंसा को जानबूझकर सुलगाये रही। भाजपा ने देश में इस बीच आधा दर्जन से ज्यादा   विधानसभाओं के   चुनाव लड़े और जीते। भाजपा को शायद ये भी या आशंका थी कि यदि मणिपुर में मुख्यमंत्री को बदला गया तो मुमकिन है कि भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी नेतृत्व परिवर्तन की मांग खड़ी हो सकती है ,क्योंकि भाजपा ने जिस तरह से मप्र  और राजस्थान कएकदम नए चेहरे दिए इससे पार्टी के भीतर घोर असंतोष था।</p>
<p>मणिपुर की हिंसा भाजपा शासन के ऊपर पिछले  एक दशक का सबसे बड़ा धब्बा है।19 जुलाई 2023 को मणिपुर में हुई हिंसा दुनिया भर में सुर्खियां बनीं - जब दो कुकी महिलाओं के नग्न परेड का वीडियो सोशल मीडिया में सामने आया.मणिपुर पुलिस ने इस वीडियो की पुष्टि करते हुए बताया कि ये महिलाएं चार मई को मणिपुर के थोबल ज़िले में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं।  मणिपुर की हिंसा को लेकर दुनिया के अनेक देशों में प्रतिक्रियाएं हुईं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर जाना उचित नहीं समझा। वे संसद में भी मणिपुर पर बहुत देर में बोले।</p>
<p>इस अभूतपूर्व हिंसा को लेकर राजनीति भी खूब हुई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मणिपुर से मुंबई तक 6,700 किलोमीटर से ज़्यादा की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की थी। मणिपुर की राजधानी इम्फाल के निकट थौबल में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में एक बड़ी रैली के सामने बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा, "मणिपुर जिस दर्द से गुज़रा है, हम उस दर्द को समझते हैं."उन्होंने कहा, "हम वादा करते हैं कि उस शांति, प्यार, एकता को वापस लाएंगे,। राहुल दो बार मणिपुर गए भी लेकिन उन्हें इसका कोई राजनितिक लाभ नहीं मिला। इस हिंसा से भाजपा का भी कोई नुक्सान नहीं हुआ। शेष देश की जनता को लगा जैसे की मणिपुर की हिंसा किसी दुसरे देश का मामला है।</p>
<p>बहरहाल अब मणिपुर   में मुख्यमंत्री हटा दिए गए है ।  लगता है वहां अब शीघ्र ही नया मुख्यमंत्री भेज दिया जाएगा। भाजपा अब दिल्ली जीतने के बाद अपने आपको एकदम सुरक्षित समझने लगी है। लेकिन ऐसा है नहीं। भले ही भाजपा ने ' देर आयद,दुरुस्त आयद ' की कहावत को सार्थक किया है किन्तु ये देर से उठाया कदम तो है ही। यही काम यदि भाजपा ने दो वर्ष पहले कर दिया होता तो आज मणिपुर की तस्वीरें कुछ और ही होतीं।  मणिपुर में नया मुख्यमंत्री कौन होगा और कौन नहीं इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला। फिर भी भाजपा को आई सद्बुद्धि के लिए मोशा की जोड़ी का आभार।</p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Feb 2025 16:32:36 +0530</pubDate>
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                <title>भाजपा की दिल्ली में जीत पर ब्लॉक प्रमुख ने दी वहां की जनता को बधाई सनातन की जीत </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बरेली/</strong>अपने को भाजपा कार्य करता बताने वाले भदपुरा विकासखंड के ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार ने दिल्ली में भाजपा की बंपर जीत पर उन्होंने वहां की जनता को बधाई दी और कहा 10 वर्ष बाद वहां की जनता ने पहले गंदगी को हटाकर पुनः देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताते हुए दिल्ली में कमल खिलाने का कार्य किया है इसके लिए वहां की जनता बधाई की पात्र है।</div>
<div>  </div>
<div>  उन्होंने स्वतंत्र प्रभात से बात करते हुए कहा 10 वर्षों से वहां पर घोटालेबाजों की सरकार कार्य कर रही थी जिससे वहां की जनता त्रस्त होकर अब उसने</div>
<div> </div>
<div>बल्कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148377/bjp-wins-in-delhi%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/1.-------------------pic.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बरेली/</strong>अपने को भाजपा कार्य करता बताने वाले भदपुरा विकासखंड के ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार ने दिल्ली में भाजपा की बंपर जीत पर उन्होंने वहां की जनता को बधाई दी और कहा 10 वर्ष बाद वहां की जनता ने पहले गंदगी को हटाकर पुनः देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताते हुए दिल्ली में कमल खिलाने का कार्य किया है इसके लिए वहां की जनता बधाई की पात्र है।</div>
<div> </div>
<div> उन्होंने स्वतंत्र प्रभात से बात करते हुए कहा 10 वर्षों से वहां पर घोटालेबाजों की सरकार कार्य कर रही थी जिससे वहां की जनता त्रस्त होकर अब उसने भाजपा का दामन पकड़ा है इतना ही नहीं उन्होंने उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मिल्कीपुर विधानसभा सीट से भी भाजपा प्रत्याशी की बंपर जीत होने पर उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निष्पक्ष एवं निर्भीकता पूर्वक न्यायोचित शासन चलाने के लिए वहां की जनता ने लोकसभा चुनाव की भूल सुधारने का कार्य ही नहीं किया है।</div>
<div> </div>
<div>बल्कि विरोधियों को संदेश देने का कार्य किया है की जनता अब तुम्हारे क्रियाकलापों से संतुष्ट नहीं है जनता अब अन्य दलों की सरकारों के साथ ही भाजपा सरकार से भी तौल नाप कर रही है जिसमें भाजपा की सरकार के कार्य जनता को अत्यंत पसंद है बिना किसी भेदभाव के सभी के साथ विकास कार्यों में पूर्ण सहयोग कर रही है उन्होंने दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने पर दिल्ली वासियों के लिए राहत की सांस मिलने की बात कही</div>
<div> </div>
<div>भाजपा  झूठे वादे नहीं करेगी परंतु धरातल पर विकास दिल्ली में भी दिखाई देगा इसीलिए परचम लहराता जा रहा है किसी के साथ कोई अन्य नहीं किया जा रहा है सबका साथ सबका विकास का नारा सिद्ध होता जा रहा इसीलिए लोग भाजपा के प्रति अपना विश्वास व्यक्त करते हुए नजर आए रहे हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 17:38:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> गरीब लाचारों ने झुग्गीवासीयों व पूर्वांचलियों का करारा जवाब, जड़ से उखाड़ फेंका पटेल नगर से चर्नी उखाड़ने वालों को </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div><strong> नई दिल्ली -</strong> दिल्ली पटेल नगर में कल चुनाव परिणाम आने के बाद यह देखने को मिला कि दिल्ली की जनता ने मुफ्त की रेवड़ी बांटने वाली सरकार के बदले उनको बेहतर समझी जिसने सबका साथ और सबके विकास की बात की। जनता सर्वोच्च है जिसने जो उचित समझा वही किया। इस बार के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस के वोट प्रतिशत को भी बढ़ाया जिससे कांग्रेस के अंदर भी ऊर्जा का प्रवाह तेज हुआ।
<div>  </div>
<div>दिल्ली की जनता जहां आपदा को हटाने का काम किया वही पटेल नगर विधान सभा के लोग भी चुनाव परिणाम आने के बाद खुशी हो गए।</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148369/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img-20250209-wa0263.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div><strong> नई दिल्ली -</strong> दिल्ली पटेल नगर में कल चुनाव परिणाम आने के बाद यह देखने को मिला कि दिल्ली की जनता ने मुफ्त की रेवड़ी बांटने वाली सरकार के बदले उनको बेहतर समझी जिसने सबका साथ और सबके विकास की बात की। जनता सर्वोच्च है जिसने जो उचित समझा वही किया। इस बार के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस के वोट प्रतिशत को भी बढ़ाया जिससे कांग्रेस के अंदर भी ऊर्जा का प्रवाह तेज हुआ।
<div> </div>
<div>दिल्ली की जनता जहां आपदा को हटाने का काम किया वही पटेल नगर विधान सभा के लोग भी चुनाव परिणाम आने के बाद खुशी हो गए। हमारे विशेष संवाददाता से बात करते हुए क्षेत्र के ही एक जागरूक मतदाता और समाज के चिंतक दुर्गेश शर्मा ने वार्तालाप में बताया कि पटेल नगर की जनता ने स्वयं के जागरूक होने का परिचय सभी पार्टियों को दे दिया और यह भी सभी पार्टियों को बताया कि समाज के प्रति संवेदना, विकास और सम्मान जो नहीं करेगा उसे पटेल नगर की जनता स्वीकार नहीं करेगी।</div>
<div> </div>
<div>जनता से यह भी बताया कि आप कितने भी बड़े पैसा वाले हो पैसे के ही बल पर चुनाव नहीं जीता जा सकता जनता के मान सम्मान का ख्याल रखना ही पड़ेगा नहीं तो जनता ऐसे ही उखाड़ फेकेगी। बीजेपी उम्मीदवार ने जिस तरीके का व्यवहार पटेल नगर विधान सभा के जन सेवक सामाजिक कार्यकर्ता एस के चौबे के साथ किया कि जनता के बीच में उनकी चर्नी उखाड़ने की बात की जिसके बाद चौबे ने मात्र एक बार जनता से भावनात्मक अपील किया कि कोई भी जीते लेकिन बीजेपी को यहां से मत जीतने देना जिसके बाद क्षेत्र की जनता ने बीजेपी की जीती हुई सीट को हार में बदल कर रख दी और बीजेपी को जड़ से उखाड़ कर फेक दी।</div>
<div> </div>
<div>जनता ने आज यह साबित कर दिया कि जो जनता के हित की बात करेगा जनता उसके मान सम्मान पर आंच नहीं आने देगी (साक्षातम किम प्रणाणं) जिस एस के चौबे के विषय में राजकुमार आनन्द ने धमकाने का काम किया उसी चौबे के एक निवेदन पर जनता ने बीजेपी के हर सुविधा का लाभ उठाया लेकिन मतदान ठीक उनके प्रतिद्वंदी को देकर अपने दिन रात में सुख दुःख के साथी के अपमान का बदला ले ली।</div>
<div> </div>
<div>एस के चौबे ने समाज को बहुत कुछ दिया है बिना किसी क्षेत्रवाद, जाति पाती व धर्म को देखे मात्र समाजहित की बात किया करते है यह समाज को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में दिखता है। आज एस के चौबे क्षेत्र के लिए एक तमाम युवाओं, हमउम्रों के लिए आइडियल बन चुके है और चौबे किसी विधायक, पार्षद से जनता के लिए कम नहीं है आज चौबे के साथ तमाम क्षेत्र के लोग जुड़े है और उसका फायदा भी उठाते है। बीजेपी या अन्य राजनीतिक दल भविष्य में अब ऐसी गलती नहीं करेंगे क्योंकि किसी भी सामाजिक व्यक्ति के साथ जनता अन्याय नहीं होने देगी जो कि इस चुनावी परिणाम ने बता दिया।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 17:15:01 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>एक पूर्वांचली पड़ा धन कुबेरों पर भारी, पूर्वांचल की एक अपील ने उखाड़ फेंकी बीजेपी उम्मीदवार के बदजुबानी की चर्नी</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div>अब दिल्ली में पूर्वांचल की पैठ लगातार बढ़ती जा रही हैं जो कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अब पूर्वांचल को विशेष स्थान देने पर मजबूर कर दिया है। पूर्वांचली अभी तक तो तमाम राजनीतिक दलों में बटे हुए थे जिसका फायदा सभी राजनीतिक दल उठाते रहते थे लेकिन इस दिल्ली चुनाव ने पूर्वांचलियों को आपस ने एकजुट होकर अपनी महती भूमिका का एहसास सभी राजनीतिक दलों को कराया है।</div>
<div>  </div>
<div>हमारे विशेष संवाददाता से विधान सभा पटेल नगर के पूर्वांचल और कांग्रेस दल के वरिष्ठ नेता आर के मिश्रा ने वार्तालाप में बताया कि पूर्वांचल के लोग अगर अपने गांव</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148368/an-appeal-from-a-heavy-purvanchal-on-the-dhan-kubera"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/img-20250130-wa0417-(1).jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div>
<div>अब दिल्ली में पूर्वांचल की पैठ लगातार बढ़ती जा रही हैं जो कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अब पूर्वांचल को विशेष स्थान देने पर मजबूर कर दिया है। पूर्वांचली अभी तक तो तमाम राजनीतिक दलों में बटे हुए थे जिसका फायदा सभी राजनीतिक दल उठाते रहते थे लेकिन इस दिल्ली चुनाव ने पूर्वांचलियों को आपस ने एकजुट होकर अपनी महती भूमिका का एहसास सभी राजनीतिक दलों को कराया है।</div>
<div> </div>
<div>हमारे विशेष संवाददाता से विधान सभा पटेल नगर के पूर्वांचल और कांग्रेस दल के वरिष्ठ नेता आर के मिश्रा ने वार्तालाप में बताया कि पूर्वांचल के लोग अगर अपने गांव घर से 1000- 2000 किलो मीटर दूर दिल्ली आए है तो मात्र अपने मान सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा को सम्मानजनक तरीके से बचाए रखने के लिए आए है।</div>
<div> </div>
<div>वे दिल्ली में मेहनत, मजदूरी, बुद्धि विवेक, संवैधानिक पदों से जो भी पैसा कमाते है उसमें से अपने खर्चे को निकालने के बाद जो पैसा बचता है उसे अपने गांव घर इसलिए भेज देते है जिससे हमारे सामाजिक मान मर्यादा को नुकसान न हो सके और सामाजिक प्रतिष्ठा बची रहे।आज दिल्ली में पूर्वांचलियों की एक अलग पहचान है और समाज का नेतृत्व करने वालों की आज कमी नहीं है और आज हर पूर्वांचली अपने आपको अपने समाज के बीच सुरक्षित महसूस कर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>आपने देखा होगा पटेल नगर में आज बीजेपी के हारने का मात्र एक ही कारण रहा जो सीधे तौर पर आज देखा जा रहा है।आपको शायद मालूम होगा कि बीजेपी उम्मीदवार राज कुमार आनंद ने एक पूर्वांचली और समाज सेवक एस के चौबे को धमकाते हुए चर्नी उखाड़ने की धमकी दे दी जिसको लेकर चौबे गंभीर हो गया और उसकी एक अपील ने बीजेपी प्रत्याशी राजकुमार आनंद की ही चर्नी उखाड़ दी। आज पटेल नगर विधान सभा में एस के चौबे किसी पहचान का मोहताज नहीं है ।</div>
<div> </div>
<div>एस के चौबे भले ही पूर्वांचली है लेकिन उसे कभी किसी जाति धर्म, क्षेत्रवाद या पक्षपात पूर्ण काम करते हुए समाज नहीं देख सकता और ना ही कोई कह सकता है। हमें चौबे पर गर्व होता है कि हमारे समाज का वह इकलौता व्यक्ति जिसने हर समाज को अपने साथ खड़ा कर लिया है और किसी विधायक पार्षद से कम उसकी हैसियत भी नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>आज समाज को एस के चौबे के साथ खड़ा देखकर बहुत खुशी होती है जिसने हमारे समाज का नाम दिल्ली के पटेल नगर में बढ़ाया है जिसका परिणाम रहा कि उसकी चर्नी उखाड़ने वालों की ही चर्नी उखड़ गई। मै पूर्वांचलियों की इसी एकजुटता को और मजबूत बनाए रखने के लिए प्रभु से प्रार्थना करता हूं। मै बोला था कि एक प्रभावशाली पूर्वांचली को धमकाना बीजेपी उम्मीदवार को भारी पड़ेगा और हुआ भी वहीं जो मै बोला था। अगर राजनीति करनी है तो पूर्वांचलियों को आदर देना ही होगा।</div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 17:10:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छोटे अहंकार की  बड़े अहंकार  से मात</title>
                                    <description><![CDATA[<p>दिल्ली जीतने के लिए भाजपा नेतृत्व को हार्दिक बधाई।  ब्धाई दे रहा हूँ क्योंकि ये बधाई बनती है।  मै  भाजपा की तरह न ' तंग-दिल ' हूँ और न 'संग-दिल 'इसलिए तमाम असहमतियों के रहते हुए मुझे देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी को बधाई देने में कोई संकोच नहीं है।  मोदी की भाजपा ने 27  साल की लम्बी तपस्या का फल हासिल कर लिया है। अब बड़ी दिल्ली और छोटी दिल्ली दोनों भाजपा के हाथ में हैं।  भाजपा ने बड़ी ही हिकमत  अमली से केजरीवाल से उनकी दिल्ली छीन ली है।</p>
<p>  दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर</p>
<p>दिल्ली</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148363/beat-with-big-ego-of-small-ego"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(22).jpg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली जीतने के लिए भाजपा नेतृत्व को हार्दिक बधाई।  ब्धाई दे रहा हूँ क्योंकि ये बधाई बनती है।  मै  भाजपा की तरह न ' तंग-दिल ' हूँ और न 'संग-दिल 'इसलिए तमाम असहमतियों के रहते हुए मुझे देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी को बधाई देने में कोई संकोच नहीं है।  मोदी की भाजपा ने 27  साल की लम्बी तपस्या का फल हासिल कर लिया है। अब बड़ी दिल्ली और छोटी दिल्ली दोनों भाजपा के हाथ में हैं।  भाजपा ने बड़ी ही हिकमत  अमली से केजरीवाल से उनकी दिल्ली छीन ली है।</p>
<p> दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर आपने तमाम मीमांसाएँ,समीक्षाएं,विश्लेषण देखे और पढ़े होंगे ,लेकिन मैंने शरू से कहा था कि इस बार दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ठीक उसी तरह घेरे जा चुके हैं जैसे 2019  के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश   में अजेय सिंधिया ज्योतिरादित्य को घेरकर हराया गया था।  सिंधिया ने पराजय के बाद भाजपा में शामिल होकर दोबारा से जय हासिल कर ली किन्तु अरविंद केजरीवाल की किस्मत में ये भी मुमकिन नहीं है , क्योंकि वे देश केप्रधानमंत्री को ' चौथी पास राजा ' कह चुके हैं और उस विधानसभा में कह चुके हैं जिसके रिकार्ड को विलोपित करना भाजपा के लिए भी आसान नहीं है ,भले ही उसे 27  साल बाद दिल्ली में प्रचंड,अखंड या ' बम्पर ' बहुमत मिला है।</p>
<p>दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की हार नहीं है ,ये नीतियों की भी हार नहीं है ,ये ईमानदारी और बेईमानी की भी हार नहीं है। ये हार दरअसल अहंकार की हार है। दुर्भाग्य ये कि दिल्ली का छोटा अहंकार देश  के बड़े अहंकार से हार गय। अर्थात दिल्ली को अभी भी अहंकार  से निजात नहीं मिली है। यदि दिल्ली में कुशासन हारा है तो दुशासन से हारा है। सुशासन   के लिए तो कहीं कोई जगह है ही नहीं आज की राजनीति में।  सुशासन कहीं दुबका हुआ बैठा होगा। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की नाव वहां डूबी है जहां पानी कोई कोई कमी नहीं थी ,कमी थी तो विनम्रता की।  आम आदमी पार्टी ने अपने खिलाफ एक साथ दो शत्रु खड़े  कर लिए थे।</p>
<p>आप मानकर चलिए कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव जिस कड़वे माहौल में हुए हैं उसके फलस्वरूप दिल्ली की सियासत में कोई सुधा बरसने वाली नहीं है। आने वाले दिन आम आदमी पार्टी के आम कार्यकर्ता के साथ ख़ास नेताओं तक के लिए भरी पड़ने वाले हैं ,क्योंकि भाजपा है कमान आम आदमी पार्टी के आमो-खास को मुआफ करने वाली नहीं है ।  भाजपा की केंद्रीय और अब दिल्ली की सरकार चुन-चुनकर केजरीवाल ऐंड कम्पनी से बदला लेगी। केजरीवाल से लेकर मनीष सिसौदिया को एक बार फिर से जेल-यात्राएं   करना होंगी।  अदालतें भी शायद उनकी मदद न कर पाएं।</p>
<p>ये विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय दलों के लिए अपशकुन हैं तो क्षेत्रीय दलों के लिए एक संकेत भी। कि वे अकेले किसी भी सूरत में भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते । उन्हें कांग्रेस   के साथ चलना ही होगा। दिल्ली के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए भी एक नयी चुनौती हैं।  भाजपा का इतिहास रहा है कि उसने अपने तमाम समर्थकों और विरोधियों को निर्ममता के साथ समाप्त किया है।  भाजपा के नेतृत्व ने पार्टी के भीतर जब विरोधियों को नहीं बख्शा तो बाहर के विरोधियों को बख्शने का सवाल ही नहीं उठता।  </p>
<p>जैसा कि माननीय मोदी जी के विजयोत्स्व के भाषण से साफ़ है कि अब केवल बंगाल की तृण मूल कांग्रेस ही नहीं अपितु बिहार की उनकी अपनी सहयोगी जेडीयू भी भाजपा के निशाने पर है।  भाजपा अब टीडीपी को भी कोई उड़ान नहीं भरने देगी।  गोबर पट्टी में विजय पताकाएं   फहराते हुए आगे बढ़ रही भाजपा अब दक्षिण और पूरब की और रुख करेगी और 2028  से पहले अपने अखिल भारत विजय के अभियान को पूरा करना चाहेगी।<br />संदर्भ के लिए याद दिला दूँ कि भाजपा ने जब अपनी पुरानी सहयोगी उड़ीसा की बीजद  को नहीं छोड़ा तो आम आदमी पार्टी को वो कैसे छोड़ देती ?</p>
<p>भाजपा अपने तमाम  सहयोगी दलों की या तो बलि ले चुकी है या फिर उन्हें दो-फांक   कर अपने साथ खड़ा कर चुकी  है। अकाली हों या शिवसेना वाले कोई भाजपा की मार से बचे नही।  एक आंकड़ा बताता है कि भाजपा के मौजूदा नेतृव ने पिछले 10  साल में अपने 24  छोटे-बड़े सहयोगी दलों की निर्मम हत्या की है। आम आदमी  पार्टी के संस्थापक को जीतकर भाजपा ने नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को भी संकेत दे दिए हैं की वे किसी गफलत में न रहें। गफलत में देश को भी नहीं रहना चाहिए और कांग्रेस को भी। भाजपा की अक्षोहणी सेना  हर चुनाव में पूरी तैयारी के साथ उतरती है।  भाजपा ने यदि झारखण्ड ,तेलंगाना और कर्नाटक नहीं जीत पाया तो ये नहीं समझा जाना चाहिए कि भाजपा की जीतने कोई भूख मर गयी है। भाजपा चौबीस   घंटे युद्धरत रहती है।</p>
<p>दिल्ली के विधानसभा चुनाव ये संकेत दे चुके हैं की क्षेत्रीय  दलों को निगलने के बाद उसका अगला और अंतिम निशाना कांग्रेस ही है। कांग्रेस चूंकि ' हप्पा ' नहीं है इसलिए उसे निगलने में भाजपा को वक्त लगेगा ,लेकिन भाजपा हार मानकर बैठने वाली नहीं है।  उसकी नफरत की आंधी और अदावत के तूफ़ान भारतीय राजनीति को हलकान किये रहेंगे। इसलिए मेरा मश्विरा है कि स्थितिप्रज्ञ होकर फ़िलहाल ' तेल देखिये और तेल की धार देखिये '</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 16:52:10 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दिल्ली के रेड्डी पटरी वाले वोले केजरीवाल की सरकार गरीबों की पार्टी है #breakingnews#delhi #aap#news</title>
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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2025 17:32:25 +0530</pubDate>
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