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                <title>top  hindi lekh - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>बसपा का निरंतर घटता जा रहा है जनाधार </title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी देश की उन गिनी-चुनी पार्टियों में से एक है जिन्हे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल है। वर्तमान में बसपा की अध्यक्ष मायावती हैं। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बसपा  के मुख्य वोट बैंक में पिछड़ा वर्ग, अनसूचित जाति, अनसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक शामिल हैं। पार्टी के अनुसार उसकी विचारधारा भीमराव आंबेडकर के मानवतावादी दर्शन के साथ ही बौद्ध दर्शन से प्रेरित है। पार्टी का गठन  14 अप्रैल 1984 को दलितों के करिश्माई नेता कांशीराम ने किया था। बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी है और इस पार्टी का मुख्य रंग</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141572/bsps-support-base-is-continuously-decreasing%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/gdfg.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी देश की उन गिनी-चुनी पार्टियों में से एक है जिन्हे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल है। वर्तमान में बसपा की अध्यक्ष मायावती हैं। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बसपा  के मुख्य वोट बैंक में पिछड़ा वर्ग, अनसूचित जाति, अनसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक शामिल हैं। पार्टी के अनुसार उसकी विचारधारा भीमराव आंबेडकर के मानवतावादी दर्शन के साथ ही बौद्ध दर्शन से प्रेरित है। पार्टी का गठन  14 अप्रैल 1984 को दलितों के करिश्माई नेता कांशीराम ने किया था। बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी है और इस पार्टी का मुख्य रंग नीला है। 13वीं लोकसभा में पार्टी के 14 सदस्य थे, 14वीं में 17 और 15वीं लोकसभा में 21 थे।</div>
<div> </div>
<div>बसपा का 16वीं लोकसभा के लिए इसका कोई उम्मीदवार नहीं जीत पाया था परन्तु मौजूदा लोकसभा यानि 17वीं लोकसभा में बसपा के 10 उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे। राज्यस्तर की बात करें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब, हरियाणा की विधानसभाओं में इसके सदस्य हैं। वैसे बसपा का मुख्य आधार वाला राज्य उत्तर प्रदेश है इसके बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय पार्टी का केवल एक विधायक है। समय के साथ बसपा दलित, पिछड़े मतदाताओं के बीच अपने घटते जनाधार को रोकने में विफल रही और इसका फायदा बीजेपी को मिला जिसने बसपा की सियासी जमीन को हथिया लिया। इसके अलावा पार्टी ने धीरे-धीरे कई अन्य समूहों के बीच भी अपना समर्थन खो दिया।</div>
<div> </div>
<div>पिछले लोकसभा चुनावों में कुर्मी, कोइरी, राजभर, निषाद आदि जैसी कई पिछड़ी जातियां और मुसलमानों की दलित जातियां जो बड़ी संख्या में बसपा के पक्ष में आई थीं वो अब उसके पाले से छिटक गईं है। यदि उत्तर प्रदेश विधानसभा की बात करें तों बसपा ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2007 विधानसभा चुनाव में दिया। 2007 के विधान सभा चुनावों में बीएसपी ने उत्तर प्रदेश में कुल 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी। ये माना जाता है कि इस चुनाव में बीएसपी की जीत की एक बड़ी वजह वो सोशल इंजीनियरिंग थी जिसके तहत पार्टी ब्राह्मण वोटरों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रही थी। उसके बाद के चुनावों में बसपा के वोटो में निरंतर गिरावट आई।</div>
<div> </div>
<div>2007 में पार्टी 310 सीटों पर या तो जीती या उपविजेता रही और यह संख्या 2012 में मामूली गिरावट के साथ 289 सीटों पर आ गई जिसमें 80 सीट वो जीती परन्तु 2017 के चुनावों में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई जब बसपा सिर्फ 19 सीटों पर जीती और केवल 119 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही। 2022 में तो बसपा का यूपी में लगभग पूर्ण सफाया हो गया वो मात्र 1 सीट ही जीत पाई।  2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों के बीच बसपा का वोट बैंक बड़ी तेजी से उसके पाले से खिसक पहले सपा फिर भाजपा के पाले में चला गया। बीएसपी को साल 2007 के विधानसभा चुनाव में 30.43 प्रतिशत वोट मिले थे, 2012 में यह आंकड़ा गिरकर 25.91 प्रतिशत और 2017 में 22.23 प्रतिशत हो गया था।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन 2022 में पार्टी को उत्तर प्रदेश में मिलने वाले वोट प्रतिशत में जबरदस्त गिरावट आई थी और यह गिरकर 12.8 प्रतिशत पर पहुंच गया था। 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में इसे राज्य में 20 प्रतिशत से कुछ अधिक वोट मिले। 2019 में बसपा ने लोकसभा चुनावों के लिए सपा से गठबंधन किया और 19 प्रतिशत वोट पा उत्तर प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही परन्तु इन चुनावों में यह साफ हो गया था कि पार्टी अपने बलबूते चुनाव नही जीत सकती थी। बसपा को इस चुनाव में सपा के आधार का भरपूर सहारा मिला और वो जीती। यदि हम यहां बसपा के घटते जनाधार की बात करे तो बेशक 2007 अगडे-पिछडे का गणित बैठा उसे सीटें मिली पर बसपा की राजनीतिक प्रचार की शैली पूरी तरह से जाति की पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित रही।</div>
<div> </div>
<div>जिसके केंद्र में दलित वोटर थे जिससे सवर्ण जाति का उनसे मोहभंग जल्द हो गया। पिछले कुछ वर्षों के दौरान दलितों के बीच एक नया वर्ग उभरा है। जो आधुनिक सोच के साथ-साथ महत्वकांक्षी भी है। जो दलित युवा वर्ग है वो अन्य वर्गों की राजनीति की शैली को अधिक पसंद कर रहा है। वो अपनी पिछड़ी जाति की पहचान पर गर्व करता हैं, आर्थिक बदलाव की बात करता है। इसके अलावा बसपा जिस वर्ग के मुद्दों की राजनीति करती है। उन वर्गों के मुद्दे का झण्डा थाम और बहुत से छोटे राजनीतिक दल मैदान में उतर चुके हैं। जो विशुद्ध तौर पर दलितों के मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं। बसपा के आधार खोने का अन्य बड़े कारणों में भ्रष्टाचार के मामले, सत्ता के केंद्रीकरण और बसपा के वैचारिक संदेश के कमजोर होने के कारण मायावती की छवि धूमिल होना है।</div>
<div> </div>
<div>इसके अलावा बसपा या कहें मायावती ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी को फिर से विकसित करने, नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को प्रोत्साहित करने या एक विश्वसनीय राजनीतिक संदेश देने का कोई गंभीर प्रयास कभी नहीं किया है। हालांकि इसमें दोराय नही कि मायावती के नेतृत्व में पार्टी का इतना ज्यादा और इतना जल्दी विस्तार हुआ जिसकी कल्पना शायद पार्टी संस्थापक कांशीराम द्वारा भी नही की गई होगी परन्तु सत्ता की दौड में अव्वल रहने की चाह ने पार्टी को नुकसान भी पहुंचाया। बसपा ने खुद को एक सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक पार्टी में बदल दिया। बसपा ने धीरे-धीरे खुद को एक सिद्धांतहीन राजनेताओं के एक समूह में बदल लिया। जो सत्ता के लिए किसी भी जाति और दल के साथ जा सकते हैं। जिस बसपा को दलित नायक कांशीराम ने बहुजन आंदोलन कह कर खड़ा किया था वो पार्टी अब वंशवाद की दलदल में धंस चुकी है।</div>
<div> </div>
<div>बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया है। जो अब पार्टी के अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा बन चुका है। बसपा के अधिकांश शीर्ष नेताओं ने या तो पार्टी छोड़ दी है या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव अभियान में बसपा की ओर से पूरी तरह आंनद ही छाए रहे हैं बाकि सब चेहरे साइडलाइन कर दिए गए हैं। मायावती के समर्थकों और विरोधियों के बीच यह भी चर्चा गर्म है कि मायावती काफी दबाव में हैं क्योंकि उन्हें कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य केंद्र सरकार एजेंसियों की कार्यवाई का डर है। इसी कारण से वो आईएनडीआईए गठबंधन में भी शामिल नही हुई</div>
<div><strong>नीरज शर्मा'भरथल'</strong></div>
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 17:01:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संकुचित व षड्यंत्रकारी चुनावी विमर्श अत्यंत चिंतनीय</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div><strong>विगत चार दशकों से भारतीय जनता पार्टी भगवान राम के नाम पर राजनीति कर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करती रही है। आख़िरकार धार्मिक ध्रुवीकरण व राम मंदिर की राजनीति ने उसे केंद्रीय सत्ता में आने में मदद की और यह भाजपा का लोकप्रिय मुद्दा बन गया। अब वही भाजपा इससे भी दो क़दम आगे बढ़कर जहाँ सर्वव्यापी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना निजी 'भगवान ' समझने लगी है वहीँ अपने विरोधी दलों को राम विरोधी तो राम द्रोही आदि प्रचारित कर रही है। इसी दल की एक सांसद यहाँ तक कह चुकी है कि जो हमारे साथ</strong></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140962/the-narrow-and-conspiratorial-election-discussion-is-extremely-worrying"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/13.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div><strong>विगत चार दशकों से भारतीय जनता पार्टी भगवान राम के नाम पर राजनीति कर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करती रही है। आख़िरकार धार्मिक ध्रुवीकरण व राम मंदिर की राजनीति ने उसे केंद्रीय सत्ता में आने में मदद की और यह भाजपा का लोकप्रिय मुद्दा बन गया। अब वही भाजपा इससे भी दो क़दम आगे बढ़कर जहाँ सर्वव्यापी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना निजी 'भगवान ' समझने लगी है वहीँ अपने विरोधी दलों को राम विरोधी तो राम द्रोही आदि प्रचारित कर रही है। इसी दल की एक सांसद यहाँ तक कह चुकी है कि जो हमारे साथ हैं वह रामज़ादे हैं और जो ख़िलाफ़ हैं वह 'हराम ज़ादे ' हैं। इसके साथ ही स्वयं बहुसंख्यकवाद की राजनीति करने वाली यही भाजपा अपने विरोधी दलों को अल्पसंख्यक परस्त व मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले दलों के रूप में पूरे ज़ोर शोर से प्रचारित कर रही है। अपने इस 'अनैतिक' अभियान में वह वर्तमान चुनावी बेला में सार्वजनिक मंचों से जिन शब्दों व वाक्यों का इस्तेमाल कर रही है वह भारतीय राजनीति के इतिहास का अब तक का सबसे गिरा व निम्नस्तरीय चुनाव अभियान है। यह इस बात का भी परिचायक है कि अबकी बार चार सौ पार का हवाई नारा देने वाली भाजपा व इसके शीर्ष नेता समझ चुके हैं कि जनता अब उनके विघटनकारी मंसूबों को समझ चुकी है। और 400 पार की बात तो दूर इस बार तो उनकी सत्ता में वापसी पर भी प्रश्न चिन्ह लग चुका है।  </strong></div>
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<div><strong>ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर अयोध्या स्थित विवादित मंदिर मस्जिद मुक़ददमे का निर्णय सुनाया गया। इसी फ़ैसले में केंद्र सरकार से एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण करने को कहा गया। यहाँ यह भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि मंदिर-मस्जिद अदालती वाद परिवाद में मुद्दई के रूप में न तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था न विश्व हिन्दू परिषद् न ही भाजपा। परन्तु केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए सरकार होने के नाते बड़ी ही चतुराई से ट्रस्ट के गठन से लेकर मंदिर निर्माण व उद्घाटन तक के इस पूरे प्रकरण का भाजपा द्वारा 'निजीकरण ' कर लिया गया। यहाँ तक कि 22 जनवरी 2024 को हुये मंदिर उद्घाटन के दौरान इसके प्राण प्रतिष्ठा के धार्मिक विधि विधान सम्बन्धी तौर तरीक़ों व समय को लेकर देश के चारों शंकराचार्यों सहित तमाम संतों महंतों द्वारा इसका कितना तार्किक विरोध किया गया। परन्तु उन सब की अनसुनी कर दी गयी। और मंदिर ट्रस्ट से लेकर इसके उद्घाटन तक को पूर्णतः भाजपाई इवेंट के रूप में पेश किया गया। और अब उसी आधार पर यह कहकर वोट माँगा जा रहा है कि 'जो राम को लाये हैं हम उनको लाएंगे'। </strong></div>
<div><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/33.jpg" alt="3"></img></strong></div>
<div><strong> देश के चारों शंकराचार्य ही नहीं बल्कि हज़ारों वरिष्ठ संतों ने तथा भाजपा विरोधी दलों ने यह बख़ूबी समझ लिया था कि ट्रस्ट गठन से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक का पूरा कार्यक्रम पूरी तरह राजनैतिक व अनैतिक है। इसी लिये जहां शंकराचार्यों ने इस आयोजन में शिरकत नहीं की वहीँ विपक्षी दलों के नेताओं ने भी 22 जनवरी के इस 'राजनैतिक आयोजन ' से दूरी बनाये रखी। इतना ही नहीं बल्कि कई प्रमुख केंद्रीय मंत्री व भाजपाई मुख्यमंत्री भी अभी तक अयोध्या के नवनिर्मित मंदिर दर्शन करने नहीं गए हैं। परन्तु भाजपा के निशाने पर केवल कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के नेता हैं। भाजपा इसे लेकर ऐसे ऐसे दुष्प्रचार कर रही है ताकि वह किसी तरह कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के अन्य दलों व उनके नेताओं को राम विरोधी साबित कर सके। अफ़सोस की बात तो यह है कि कल के धर्मनिर्पेक्षतावादी जो आज भगवा रंग में रंग रहे हैं उनसे भी भाजपा यही कहलवा रही है कि कांग्रेस राम विरोधी है। और कांग्रेस अयोध्या मंदिर दर्शन करने का विरोध करती है।  </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेट अयोध्या दर्शन करने जा चुकी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय रॉय पूरी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के साथ राम मंदिर जा चुके। सांसद दीपेंद्र हुडा , छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जेसे तमाम कांग्रेस नेता 22 जनवरी के बाद अयोध्या जा चुके हैं। परन्तु कांग्रेस आला कमान ने किसी नेता से इस विषय पर कोई सवाल नहीं किया। क्योंकि कांग्रेस शुरू से यही मानती आ रही है कि धर्म व धर्म पालना किसी भी व्यक्ति का आस्था सम्बन्धी अत्यंत निजी विषय है। इसकी पालना करने या न करने का प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी अधिकार है। कांग्रेस ने न तो कभी राम के नाम पर वोट माँगा न ही राम के विरोध के नाम पर। परन्तु दुष्प्रचार की इंतेहा यह कि नरेंद्र मोदी स्वयं यह कह रहे हैं कि मैं  'लोकसभा चुनाव में 400 सीट इसलिए जीतना चाहता हूं कि ताकि कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर पर बाबरी ताला ना लगा दे। कांग्रेस की चली तो कांग्रेस कहेगी कि भारत में जीने का पहला हक भी उसके वोट बैंक (मुसलमानों) का है। लेकिन जब तक मोदी ज़िंदा है, नक़ली सेक्युलरिज़्म के नाम पर भारत की  पहचान मिटाने की कोई भी कोशिश मोदी सफल नहीं होने देगा, और ये हज़ारों वर्ष पुराने भारत को, उसकी इस संतान की गारंटी है। '' देश के प्रधानमंत्री के मुंह से निकला हुआ यह वाक्यविपक्षी दलों के लिये कितनी कुंठा से भरा व हताशा से परिपूर्ण प्रतीत होता है ?</strong></div>
<div><strong> </strong></div>
<div><strong>आज देश मंहगाई,बेरोज़गारी,शिक्षा,स्वास्थ्य,अमेरिकी डालर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा में आ रही अभूतपूर्व गिरावट, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम, (पीएसयू) के चंद निजी हाथों में सौंपे जाने जैसे अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों से जूझ रहा है। परन्तु सरकार के पास इनका न तो कोई जवाब है न ही इनके समाधान की कोई नीति। 2019 का चुनाव इसी मोदी सरकार ने मुफ़्त राशन पाने वाले लाभार्थी मतदाताओं के दम पर जीत लिया था । इसबार वही लाभार्थी श्रेणी भी यह समझ चुकी है कि यह तो राशन पर उन्हें आश्रित बनाये रखने की सत्ता की एक गहरी चाल है। लिहाज़ा इसबार बड़ी ही बेशर्मी के साथ हिन्दू मुसलमान,राम मंदिर,मंगल सूत्र,भैंस,मछली,गाय,जिहाद जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श के बीच लाकर लड़ा जा रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह बातें भाजपा के किसी दूसरे व तीसरे दर्जे के नेता द्वारा नहीं बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जा रही हैं। जोकि देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च गरिमामयी पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति की मान व प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। और यह देश की बदनामी का भी कारक है। मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने की इस तरह का </strong><strong>संकुचित व षड्यंत्रकारी चुनावी विमर्श अत्यंत चिंतनीय है। </strong><strong> </strong></div>
<div> </div>
<div><span style="font-size:large;"><strong>निर्मल रानी </strong></span></div>
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 May 2024 16:10:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>अब दल-बदल ही हमारा राजधर्म</title>
                                    <description><![CDATA[<p>इस युग में यानि कलियुग में आप कह सकते हैं कि मोदी युग में जितने भी राजधर्म होंगे उनमने दल-बदल सबसे बड़ा राजधर्म माना जाएगा। ये भविष्यवाणी करना शायद भगवान भूल गए थे।  गलती इंसान से ही नहीं भगवान से भी होती है। दल-बदल को लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपराध मानकर कांग्रेस की तत्कालीन सरकार के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दल-बदल के खिलाफ क़ानून की नींव रखी। और संयोग देखिये कि  आज यही दल-बदल कांग्रेस के लिए अभिशाप और भाजपा के लिए वरदान बन गया है। भविष्य में मुमकिन है कि  यदि भाजपा सत्ता में आयी तो इस वरदान को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140696/now-defection-is-our-state-religion"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/17_08_2019-dalbadlu_neta_19493855.jpg" alt=""></a><br /><p>इस युग में यानि कलियुग में आप कह सकते हैं कि मोदी युग में जितने भी राजधर्म होंगे उनमने दल-बदल सबसे बड़ा राजधर्म माना जाएगा। ये भविष्यवाणी करना शायद भगवान भूल गए थे।  गलती इंसान से ही नहीं भगवान से भी होती है। दल-बदल को लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपराध मानकर कांग्रेस की तत्कालीन सरकार के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दल-बदल के खिलाफ क़ानून की नींव रखी। और संयोग देखिये कि  आज यही दल-बदल कांग्रेस के लिए अभिशाप और भाजपा के लिए वरदान बन गया है। भविष्य में मुमकिन है कि  यदि भाजपा सत्ता में आयी तो इस वरदान को स्थाई बनाने के लिए कोई नया क़ानून ले आये। क्योंकि दल-बदल राष्ट्रहित में किया जाने वाला सबसे बड़ा सद्कर्म है।</p>
<p>आपकी आप जानें किन्तु मुझे शुरू से दल-बदलू पसंद नहीं हैं।  मै दल -बदल को प्रश्रय देने वालों के भी खिलाफ हू।  दल-बदल चाहे कोई भी दल करे या कराये मुझे देशद्रोही लगते है।  लेकिन मेरे लगने या न लगने से क्या होता है ? मै यानि आम जनता दल-बदल को मूकदर्शकों की तरह टुकुर-टुकुर देखने ,सहने के लिए अभिशप्त है। जब राजनीतक दल ही दल-बदल को सबसे बड़ी योग्यता मानते हों तो बेचारा आम आदमी इसके खिलाफ खड़ा होकर कर भी क्या सकता है। मै आपको दल-बदल के इतिहास में नहीं ले जाऊँगा। गूगल पर विकिपीडिया खंगालने के लिए भी नहीं कहूंगा। क्योंकि इससे दल -बदल की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।</p>
<p>दल -बदल एक अनवरत ,सतत,सनातन कार्य है। त्रेता से होता आ रहा है और कलियुग में तो दल-बदल इतना सुगम हो गया है जितना कि  दिल-बदलना । दल बदलने में दिल बदलने से भी कम समय लगता है।  इंदौर में कांग्रेस के प्रत्याशी किन्हीं बम साहब के दल-बदल ने ये प्रमाणित कर दिया है। लोग मेडिकल टूरिज्म के लिए दुनिया के कौन-कौन से भारत आते है।  मुझे लगता है कि  भविष्य में दुनिया के तमाम राजनीतिक दल अपने यहां दल-बदल करने के लिए गुरुदीक्षा लेने भारत आया करेंगे। भारत किसी  और मामले में विश्व गुरु हो या न हो किन्तु दल-बदल के मामले में तो ब्रम्हांड गुरु बन चुका है।</p>
<p>ये भारत में लोकतंत्र की सेहत के लिए दल-बदल एक अनिवार्य प्रक्रिया है। जो दल जितना जयादा दल-बदल कराएगा उसे उतना मजबूत और लोकतांत्रिक माना जाएगा। एक दल का दुष्ट  -पापी दूसरे दल में आते ही दुष्टता  और अपने पापों से मुक्त हो जाता है। अर्थात दल-बदल पाप मोचन का सबसे सरल,सुगम और सुबोध तरीका है। हमारे यहां बड़े-बड़े सूरमाओं ने राजे-महाराजों ने दल-बदल किये हैं ,बम  टाइप के साधारण लोग उनके सामने कहाँ लगते हैं।  आज मान्यता हो गयी है कि  जिसने अपने राजनीतिक जीवनकाल में दल-बदल नहीं किया उसने समझो की कुछ नहीं किया। दल के प्रति निष्ठावान बने रहने से क्या मिलता है आखिर ? दल-बदल कीजिये तो नगद नारायण के साथ ही टिकिट,मंत्री पद और न जाने क्या-क्या मिलता है।</p>
<p>मै अगर सत्ता में होता या तीसरी बार सत्ता में आने की तैयारी कर रहा होता तो अपने चुनाव  घोषणा पत्र में दल-बदल को राजधर्म की मान्यता दिलाने के लिए दल-बदल क़ानून को ही समाप्त करने का वचन देता ।  वचन देता ही नहीं उसे प्राण-पण से निभाता भी।  आप सोचकर देखिये कि दल-बदल के फायदे कितने हैं और नुक्सान कितने ? गुणा-भाग करने के बाद आप जो हासिल पाएंगे वो लाभ ही निकलेगा ।  हानि नहीं। दल -बदल में सुविधा  ये है कि आप इसे जितनी बार करना चाहें कर सकते हैं। दल-बदल के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं।  इसके लिए जरूरी है आपका  किसी  एक दल से ऊबना या किसी एक दल से मुक्ति पाना। मै अपने ऐसे कुछ मित्रों  को जानता हूँ जिन्होंने एक से ज्यादा बार दल बदल किया। दल -बदल का आध्यात्मिक पक्ष ये है कि  इसे घाट-घाट का पानी पीना कहते हैं।  </p>
<p>आप याद कीजिये कि ये देश पहली बार दल-बदल से नहीं गुजर रहा। देश में भक्तिकाल भी कोई पहली घटना नहीं है।  लंकापति रावण के भाई बिभीषनं  दल-बदल का आदर्श उदाहरण है।  वे दल-बदल न करते तो मुमकिन है कि कभी भी लंकापति नहीं बन पाते। बिभीषन ने समझदारी से होशियारी से हिकमत अमली से , काम लिया और सद्गति को प्राप्त हुए। आज भी दल-बदल करने वाला सबसे पहले बिभीषन जी का आभार प्रकट करता है। करना भी चाहिए ,क्योंकि यदि बिभीषन ने सत्ता-सुख पाने का ये आसान तरीका ईजाद न किया होता तो अधिकांश दलों में लोग चप्पलें घिसते-घिसते मर जाते लेकिन सत्ता सुख हासिल नहीं कर पाते।शरणागत को ही गति मिलती है।आजकल तो राजनीतिक दलों ने अपने-अपने यहां शरणार्थी शिविर खोल रखे हैं।  </p>
<p>दल -बदल का हासिल ये है कि ये महंगे चुनाव खर्च से मुक्ति दिलाता  है।  अब जैसे इंदौर में ,खजुराहो में या सूरत में कांग्रेस और सपा के प्रत्याशियों ने जिस साधुवाद  से दल बदल किया उसका कितना ज्यादा लाभ इस गरीब देश को हुआ ।  जनता चुनाव प्रचार की कांय-कांय से बची। सड़के बिद्रूप  होने  से बचीं  और केंद्रीय चुनाव आयोग का अमला चुनावी  इंतजाम करने से ,हल्दी लगी और न फिटकरी फिर भी रंग चोखा ही आया। यदि दल-बदल के जरिये देश में पंचाट से संसद स्तर तक के चुनाव कराये जाने की व्यवस्था कर दी जाये तो किसी सरकार को इलेक्टोरल बांड लेकर चुनाव के लिए धन उगाहने की जरूरत ही क्यों पड़े ? क्यों उसे सुप्रीम कोर्ट से खामखां लानत -मलानत का सामना करना पड़े ?</p>
<p>भगवान करे कि भारत जैसे लोकतंत्र में दल-बदलुओं को हमेशा परम  पद की प्राप्ति हो। दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों  कि बजाय दल-बदलुओं कि लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की जाये दल -बदलुओं को वे सारी सुविधाएं  और सम्मान मिलना चाहिए जो किसी परमवीर चक्रधारी या भारतरत्न का तमगा गले में लटकाने वाले को हासिल हैं। मै तो कहता हूँ कि तमाम दल-बदलुओं का  मृत्योपरांत अंतिम संस्कार  भी राजकीय सम्मान  कि साथ किया जाना चाहिए पार्टिनिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को आत्मचिंत कर पता  लगना  चाहिए कि उन्हें  उनकी  निष्ठा  कि बदले आखिर मिलता क्या है ? दल -बदलू वो सम्मान पल भर में हासिल कर लेता है जो एक निष्ठावान  कार्यकर्ता या नेता को पूरी  उम्र  किसी दल की सेवा  करने कि बाद भी नहीं मिल  पाता।</p>
<p>आपको बता दूँ   कि दल-बदल करना बेहद   आसान सद्कर्म है ।  बस   अपने गले में पड़ा  पुराना  गमछा  उतार  फेंकिए  और नया गमछा  डाल लीजिये ।  सामने वाले कि समाने कृतज्ञ भाव से झुकिए,गुलदस्ता लीजिये या दीजिये। एक ग्रुप  फोटो  खिंचवाइये  और बस  हो गया  दल बदल। दल-बदल कि साथ  ही आपको अपनी बल्दियत भी बदलना पड़ती है। घर   की बैठक   में लगीं   पुरानी  तस्वीरें  भी बदलना पड़तीं  हैं ।  लेकिन ये मंहगा सौदा  नहीं है। इसके लिए किंचित  बेशर्मी  की चादर  ओढ़ना पड़ती है और आपका चस्मा मय नंबर  और फ्रेम  के बदल जाता है।</p>
<p><strong>@ राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Apr 2024 16:19:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> दूध सी सफेद चमकार भाजपा वाशिंग मशीन</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>इसमे कोई दोराय नही मोदी सरकार आने के बाद से विपक्ष लगातार खत्म होता जा रहा है। विपक्ष के बड़े-बड़े व दिग्गज नेता जो किसी समय उठते-बैठते, सोते-जागते भाजपा को गालियां देते नही थकते थे, आज बढ़ी शांति और श्रृद्धा से भाजपा में शामिल हो रहे हैं। ताजा जानकारी के अनुसार हाल ही में विपक्षी दलों के 80 हजार से अधिक कार्यकर्ता और नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं। यह सिलसिला लोकसभा चुनाव घोषणा के बाद भी नही रूक रहा है। चुनावों की घोषणा होने के बाद भी कांग्रेस समेत अन्य दलों के दिग्गज नेता बड़ी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140128/milk-white-shining-bjp-washing-machine"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/hindi-divas8.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>इसमे कोई दोराय नही मोदी सरकार आने के बाद से विपक्ष लगातार खत्म होता जा रहा है। विपक्ष के बड़े-बड़े व दिग्गज नेता जो किसी समय उठते-बैठते, सोते-जागते भाजपा को गालियां देते नही थकते थे, आज बढ़ी शांति और श्रृद्धा से भाजपा में शामिल हो रहे हैं। ताजा जानकारी के अनुसार हाल ही में विपक्षी दलों के 80 हजार से अधिक कार्यकर्ता और नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं। यह सिलसिला लोकसभा चुनाव घोषणा के बाद भी नही रूक रहा है। चुनावों की घोषणा होने के बाद भी कांग्रेस समेत अन्य दलों के दिग्गज नेता बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>कुछ नेता ऐसे भी है जो  भाजपा छोड़ अन्य दलों में जा रहे हैं उसका मुख्य कारण टिकट ना मिलना दिख रहा है। देश में लोकसभा चुनाव के बीच नेताओं का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आने-जाने का सिलसिला लगातार जारी है। विपक्षी नेताओं के पार्टी बदलने के आंकड़ों को देखे तो एक खास ट्रेंड या रूझान नजर आता है। वो यह कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे और जिन पर जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसा वहीं नेता सत्ताधारी पार्टी में शामिल होते दिखाई दिए। उधर से इधर आते ही उन नेताओं पर चल रही जांच भी ढीली पड़ गई।</div>
<div> </div>
<div>यही वजह है कि, विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ बीजेपी को वॉशिंग मशीन कहती है। 2014 के बाद से कथित भ्रष्टाचार के लिए केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना करने वाले 25 से ज्यादा दूसरी पार्टियों के प्रमुख नेता बीजेपी में शामिल हुए। इनमें 10 कांग्रेस से, एनसीपी और शिवसेना से चार-चार, तृणमूल कांग्रेस से तीन, तेलगु देशम पार्टी से दो, सपा और वाईएसआर से एक-एक है। इसमें अकेले महाराष्ट्र से 12 प्रमुख नेता है जो 2022 या उसके बाद भाजपा में चले गए। बीजेपी ज्वाइन करने के बाद 20 नेताओं के खिलाफ जांच ठंडी पड़ गई और 3 के केस बंद हो गए।</div>
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<div>विपक्ष इसे वॉशिंग मशीन कहता है यानी एक ऐसा सिस्टम जिससे भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को अपनी पार्टी छोड़ने और बीजेपी में शामिल होने पर केन्द्रीय एजेंसियों के जांच और जेल का सामना ना करने का लाभ प्राप्त होता है। इन लाभार्थियों में अजीत पवार का नाम भी शामिल है। एनसीपी नेता अजीत पवार पर महाराष्ट्र के राज्य सहकारी बैंक में कथित अनियमिताओं से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में अगस्त 2019 के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर आर्थिक अपराध शाखा ने एफआईआर दर्ज की हुई है।</div>
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<div>अजीत पवार जब महा विकास आघाडी सरकार का हिस्सा थे तब मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अक्टूबर 2020 में एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी। भाजपा के सत्ता में लौटने पर पार्टी ने मामले को फिर से खोलने की मांग की लेकिन फिर अजीत पवार के एनडीए में शामिल होने के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। पश्चिम बंगाल के एक प्रमुख नेता सुवेंदु अधिकारी 11 अन्य टीएमसी नेताओं के साथ 'नारद स्टिंग ऑपरेशन' मामले में आरोपी हैं। अपराध के समय वो एक सांसद थे। सीबीआई 2019 से नारद स्टिंग ऑपरेशन मामले में जांच कर रही है। इसी बीच साल 2020 में सुवेंदु अधिकारी टीएमसी छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए।</div>
<div> </div>
<div>सांसद रहने की वजह से उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष से मंजूरी लेने का प्रावधान है। लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद से ही सीबीआई लोकसभा अध्यक्ष से मंजूरी का इंतजार कर रही है। इसके साथ-साथ यानी ऐसे मामले भी है जो केवल नाम के लिए खुले रहते है, जिनमें कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं होती। इसी घोटाले में आरोपी मुकुल राय चालाक निकले वो जांच के डर से पहले भाजपा में चले गए। सीबीआई चार्जशीट से नाम हटने के बाद फिर टीएमसी में आ गए। धुलाई के बाद स्वच्छ होने वालों में एक और चर्चित नाम है हिमंत बिस्वा सरमा का। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को 2014 में शारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई की पूछताछ और छापेमारी का सामना करना पड़ा था, उस समय वो कांग्रेस के नेता थे।</div>
<div> </div>
<div>उनका नाम गोवा में जल परियोजना अनुबंधों के लिए कथित रिश्वत देने से जुड़े लुइस बर्जर मामले में सामने आया था। लेकिन 2015 में उनके भाजपा में शामिल होने के बाद से उनके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ा है।ताजा उदाहरण के तौर पर पूर्व कांग्रेसी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आता है। वो मुंबई के आदर्श सहकारी हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैट आवंटन से संबंधित मामले में मुख्य आरोपियों में से एक हैं। सीबीआई ने उन पर कथित तौर पर रिश्तेदारों के लिए दो फ्लैटों के बदले में ऊंचे फ्लोर स्पेस इंडेक्स को मंजूरी देने का आरोप लगाया। इसी के तहत ईडी ने सीबीआई की एफआईआर पर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की और उनसे पूछताछ की गई।</div>
<div> </div>
<div>चव्हाण कुछ दिनों पहले बीजेपी में शामिल हो गए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आदर्श हाउसिंग मामले में सीबीआई और ईडी की कार्यवाही पर रोक लगाई हुई है। इनके अलावा प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, नवीन जिंदल, हसन मुश्रीफ, संजय सेठ, ज्योति मिर्धा, वाईएस चौधरी, प्रताप सरनाईक, भावना गवली, यामिनी, यशवन्त जाधव, सी एम रमेश, रनिंदर सिंह, के.गीता, सोवन चटर्जी, कृपाशंकर सिंह, दिगंबर कामत,  तापस रॉय, अर्चना पाटिल, गीता कोड़ा, बाबा सिद्दीकी, ज्योति मिर्धा, सुजना चौधरी आदि ऐसे नाम है जिन पर सीबीआई या ईडी की जांच में जबरदस्त ‍शिकंजा कसा जा रहा था। जिस के बाद इनके भाजपा या उसके सहयोगी दलों में शामिल होते ही या तो जांच रूक गई या जांच के तेवर नरम पड़ गए। अब देखते हैं आने वाले समय में और कौन-कौन नेता भाजपा की इस वाशिंग मशीन मे धुलकर दूध सी सफेद चमकार पाता है।-</div>
<div> </div>
<div><strong>नीरज शर्मा 'भरथल'</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Apr 2024 17:10:34 +0530</pubDate>
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