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                <title>  swatantra prabhat dehli news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>  swatantra prabhat dehli news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आईडीबीआई बैंक ने रणनीतिक सीएसआर के तहत सफदरजंग अस्पताल को प्रदान किये चिकित्सा उपकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात विशेष संवाददाता स्वतंत्र सिंह भुल्लर </strong></div>
<div>  </div>
<div><strong>नई दिल्ली। </strong>आईडीबीआई बैंक ने सामाजिक उत्तरदायित्व और स्वास्थ्य सेवा उन्नयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए, आज अपने व्यापक कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कार्यक्रम के तहत सफदरजंग अस्पताल को औपचारिक रूप से चिकित्सा उपकरण सौंपे। इस योगदान में आपातकालीन चिकित्सा विभाग के लिए ट्रॉलियों वाली दो उन्नत ईसीजी मशीनें और पैथोलॉजी विभाग के लिए एक परिष्कृत फ्यूम एक्सट्रैक्टर शामिल हैं।उपकरण सौंपने के समारोह में अस्पताल प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, आईडीबीआई बैंक के अधिकारी और स्वास्थ्य सेवा पेशेवर शामिल हुए, जो अस्पताल की नैदानिक क्षमताओं और सुरक्षा मानकों को बढ़ाने की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154100/idbi-bank-provided-medical-equipment-to-safdarjung-hospital-under-strategic"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/आईडीबीआई-बैंक-ने-रणनीतिक-सीएसआर-के-तहत-सफदरजंग-अस्पताल-को-प्रदान-किये-चिकित्सा-उपकरण.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात विशेष संवाददाता स्वतंत्र सिंह भुल्लर </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>नई दिल्ली। </strong>आईडीबीआई बैंक ने सामाजिक उत्तरदायित्व और स्वास्थ्य सेवा उन्नयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए, आज अपने व्यापक कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कार्यक्रम के तहत सफदरजंग अस्पताल को औपचारिक रूप से चिकित्सा उपकरण सौंपे। इस योगदान में आपातकालीन चिकित्सा विभाग के लिए ट्रॉलियों वाली दो उन्नत ईसीजी मशीनें और पैथोलॉजी विभाग के लिए एक परिष्कृत फ्यूम एक्सट्रैक्टर शामिल हैं।उपकरण सौंपने के समारोह में अस्पताल प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, आईडीबीआई बैंक के अधिकारी और स्वास्थ्य सेवा पेशेवर शामिल हुए, जो अस्पताल की नैदानिक क्षमताओं और सुरक्षा मानकों को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।ट्रॉलियों वाली दो अत्याधुनिक ईसीजी मशीनें आपातकालीन रोगी देखभाल के लिए हृदय निगरानी क्षमताओं को बढ़ाएँगी और महत्वपूर्ण हृदय मूल्यांकन के लिए प्रतिक्रिया समय में भी सुधार करेंगी।</div>
<div> </div>
<div>उन्नत फ्यूम एक्सट्रैक्टर एक आवश्यक प्रयोगशाला सुरक्षा उपकरण है जिसे खतरनाक फॉर्मेल्डिहाइड वाष्प और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) को पकड़ने और हटाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऐसे धुएँ के लंबे समय तक संपर्क में रहने से जलन, श्वसन संबंधी समस्याएँ और यहाँ तक कि कैंसर भी हो सकता है, जिससे प्रयोगशाला कर्मियों के लिए सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।सफदरजंग अस्पताल के निदेशक डॉ. संदीप बंसल ने इस योगदान के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त करते हुए कहा: "आईडीबीआई बैंक का यह उदार योगदान हमारी स्वास्थ्य सेवा वितरण क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है। ईसीजी मशीनें हमारे आपातकालीन चिकित्सा विभाग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी, जिससे हमारी चिकित्सा टीम महत्वपूर्ण क्षणों में तेज़ और अधिक सटीक हृदय मूल्यांकन प्रदान कर सकेगी।</div>
<div> </div>
<div>हमारे पैथोलॉजी विभाग के लिए फ्यूम एक्सट्रैक्टर हमारे प्रयोगशाला कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षित कार्य वातावरण तैयार करेगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि वे इष्टतम परिस्थितियों में अपना महत्वपूर्ण कार्य जारी रख सकें। कॉर्पोरेट संस्थाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के बीच ऐसी साझेदारियाँ हमारे स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने और अंततः अधिक लोगों की जान बचाने के लिए आवश्यक हैं। हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति आईडीबीआई बैंक की दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता के लिए उनके प्रति अत्यंत आभारी हैं।आईडीबीआई बैंक के जोनल हेड श्री शशांक दीक्षित ने बैंक के सीएसआर दर्शन पर प्रकाश डाला।आईडीबीआई बैंक में हमारा मानना है कि कॉर्पोरेट सफलता को केवल वित्तीय प्रदर्शन से नहीं, बल्कि समाज की भलाई में हमारे योगदान से मापा जाना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>हमारे सीएसआर ढांचे के तहत स्वास्थ्य सेवा हमारे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक है, और सफदरजंग अस्पताल में यह योगदान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे का समर्थन करने की हमारी प्रतिबद्धता के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। यह पहल हमारे द्वारा सेवा प्रदान किए जाने वाले समुदायों में स्थायी प्रभाव पैदा करने के हमारे दीर्घकालिक दृष्टिकोण को दर्शाती है, और हम इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा वितरण को और मजबूत करने के लिए सफदरजंग अस्पताल के साथ अपनी साझेदारी जारी रखने के लिए तत्पर हैं।"कार्यक्रम में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. चारु बांबा, वीएमएमसी की प्रिंसिपल प्रोफेसर गीतिका खन्ना, सभी अतिरिक्त एमएस, एचओडी, सीएसआर समिति के सदस्य, श्री मनीष पाठक, जीएम, क्षेत्रीय प्रमुख और सुश्री श्रुति शर्मा, शाखा प्रबंधक, ग्रीन पार्क उपस्थित थे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Aug 2025 17:58:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रम मानक तय करे सरकार, श्रमिकों का शोषण नहीं किया जाना चाहिए।: सुप्रीम कोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जल आयोग द्वारा दो एडहॉक कर्मचारियों को अचानक बर्ख़ास्त कर देने के ख़िलाफ़ याचिका सुनते हुए कहा कि सरकारी विभागों को कर्मचारियों को लंबी अवधि के लिए अस्थायी अनुबंध पर रखने के बजाय नौकरी की सुरक्षा और उचित माहौल सुनिश्चित करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 दिसंबर) को गिग इकोनॉमी और सरकारी संस्थानों दोनों में अनिश्चित रोजगार व्यवस्थाओं के बढ़ते प्रचलन की कड़ी आलोचना करते हुए निष्पक्ष और अधिक सुरक्षित श्रम प्रथाओं  का आह्वान किया।</div>
<div>  </div>
<div>जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों को कर्मचारियों को विस्तारित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147137/the-government-should-set-labor-standards-workers-should-not-be"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/श्रम-मानक-तय-करे-सरकार,-श्रमिकों-का-शोषण-नहीं-किया-जाना-चाहिए।-सुप्रीम-कोर्ट।.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जल आयोग द्वारा दो एडहॉक कर्मचारियों को अचानक बर्ख़ास्त कर देने के ख़िलाफ़ याचिका सुनते हुए कहा कि सरकारी विभागों को कर्मचारियों को लंबी अवधि के लिए अस्थायी अनुबंध पर रखने के बजाय नौकरी की सुरक्षा और उचित माहौल सुनिश्चित करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 दिसंबर) को गिग इकोनॉमी और सरकारी संस्थानों दोनों में अनिश्चित रोजगार व्यवस्थाओं के बढ़ते प्रचलन की कड़ी आलोचना करते हुए निष्पक्ष और अधिक सुरक्षित श्रम प्रथाओं  का आह्वान किया।</div>
<div> </div>
<div>जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों को कर्मचारियों को विस्तारित अवधि के लिए अस्थायी अनुबंध पर रखने के बजाय श्रमिकों को नौकरी की सुरक्षा और उचित माहौल सुनिश्चित करके एक सकारात्मक उदाहरण स्थापित करना चाहिए।</div>
<div>पीठ ने अस्थायी रोजगार अनुबंधों के व्यापक दुरुपयोग पर अफसोस जताते हुए कहा, ‘ये एक बड़े मुद्दे को दर्शाता है, जो श्रमिकों के अधिकारों और नौकरी सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। निजी क्षेत्र में गिग अर्थव्यवस्था के उभरने से अनिश्चित रोज़गार में वृद्धि हुई है, जिसमें अक्सर सुविधाओं की कमी, नौकरी की असुरक्षा देखने को मिलती है, जिसकी आलोचना होती है।</div>
<div> </div>
<div>पीठ ने रेखांकित किया कि इस मामले में सरकारी संस्थानों को बेहतर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए क्योंकि उन्हें निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखने का काम सौंपा गया है।पीठ ने कहा, ‘सरकारी संस्थान, जिन्हें निष्पक्षता के सिद्धांतों को बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उन पर ऐसी शोषणकारी रोजगार प्रथाओं से बचने की बड़ी जिम्मेदारी है।’</div>
<div> </div>
<div>पीठ ने चार हाउसकीपिंग और रखरखाव कर्मचारियों की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें लगभग दो दशक पहले केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा एडहॉक पर रखा गया था और साल 2018 में उन्हें अचानक नौकरी से निकाल दिया गया।पीठ ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उनकी बहाली का आदेश दिया और उनकी सेवाएं नियमित करने का भी निर्देश दिया.फैसले में इस बात पर जिक्र किया गया कि कैसे अस्थायी और अस्थिर नौकरियां शोषणकारी प्रथाओं को तेजी से आग बढ़ा रही हैं, जो सरकारी विभागों में भी दिखाई दे रहा है।</div>
<div> </div>
<div>पीठ का कहना है कि जब सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएं अस्थायी अनुबंधों के दुरुपयोग में संलग्न होती हैं, तो यह न केवल गिग अर्थव्यवस्था में देखी गई हानिकारक प्रवृत्तियों को प्रतिबिंबित करती है, बल्कि एक चिंताजनक मिसाल भी स्थापित करती है जो सरकारी कार्यों में जनता के विश्वास को कम कर सकती है।इस बात पर जोर देते हुए कि अस्थायी अनुबंधों पर कर्मचारियों को शामिल करना उनके मनोबल और जनता के विश्वास दोनों को कमजोर करता है, अदालत ने कहा, ‘सरकारी संस्थानों को निष्पक्ष और स्थिर रोजगार प्रदान करने में उदाहरण पेश करना चाहिए।विस्तारित अवधि के लिए अस्थायी आधार पर श्रमिकों को नियुक्त करना, खासकर जब उनकी भूमिकाएं संगठन के कामकाज का अभिन्न अंग हैं, न केवल अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है बल्कि संगठन को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और कर्मचारी मनोबल को कमजोर करता है।</div>
<div> </div>
<div>फैसले में कहा गया है, ‘निष्पक्ष रोजगार प्रथाओं को सुनिश्चित करके सरकारी संस्थान अनावश्यक मुकदमेबाजी के बोझ को कम कर सकते हैं, नौकरी की सुरक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं और न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं. यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और निजी क्षेत्र के अनुसरण के लिए एक सकारात्मक मिसाल कायम करता है, जिससे देश में श्रम प्रथाओं की समग्र बेहतरी में योगदान मिलता है.’ अस्थायी अनुबंधों के प्रणालीगत दुरुपयोग के बारे में व्यापक टिप्पणियां करते हुए अदालत ने विशेष रूप से सार्वजनिक संस्थानों में अस्थायी कर्मचारियों के लिए मनमाने ढंग से अनुबंध समाप्ति, लाभों से इनकार, और करिअर की प्रगति में कमी की आलोचना की।</div>
<div> </div>
<div>पीठ ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि अवैध नियुक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए 2006 के उमा देवी फैसले की कैसे गलत व्याख्या की जा रही है ताकि नियमितीकरण के वैध दावों को अस्वीकार किया जा सके.</div>
<div>पीठ ने कहा, ‘सरकारी विभाग अक्सर कर्मचारियों के खिलाफ उमा देवी के फैसले को हथियार बनाते हैं, लेकिन उन मामलों की स्वीकृति को नजरअंदाज करते हैं जहां नियमितीकरण को उचित बताया गया है. यह चयनात्मक आवेदन उक्त निर्णय की भावना और उद्देश्य को विकृत करता है, इसे उन कर्मचारियों के खिलाफ प्रभावी ढंग से हथियार बनाता है जिन्होंने दशकों से जरूरी सेवाएं प्रदान की हैं।’</div>
<div> </div>
<div>वर्तमान मामले में अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं की लंबी और निर्बाध सेवा को केवल उनकी प्रारंभिक नियुक्तियों को अस्थायी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता है. अदालत ने कहा, ‘उनका निरंतर योगदान और उनके काम की प्रकृति नियमितीकरण के माध्यम से मान्यता की मांग करती है.’पीठ ने कहा कि उनकी बर्खास्तगी ने समाप्ति आदेशों से पहले उन्हें निष्पक्ष सुनवाई न देकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन किया है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Dec 2024 17:40:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“धर्म के आधार आरक्षण नहीं हो सकता”सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  </div>
<div><strong>जेपी सिंह।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मौखिक टिप्पणी की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के 77 समुदायों के अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई है, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम धर्म से संबंधित हैं।अदालत की टिप्पणी का जवाब देते हुए, राज्य के लिए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने प्रस्तुत किया कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि समुदायों के पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी 27-28 प्रतिशत है।</div>
<div>  </div>
<div>रंगनाथ आयोग ने मुसलमानों के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147055/%E2%80%9Creservation-cannot-be-done-on-the-basis-of-religion%E2%80%9D-comments"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/“धर्म-के-आधार-आरक्षण-नहीं-हो-सकता”सुप्रीम-कोर्ट-की-टिप्पणी।.jpg" alt=""></a><br /><div> </div>
<div><strong>जेपी सिंह।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मौखिक टिप्पणी की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के 77 समुदायों के अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई है, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम धर्म से संबंधित हैं।अदालत की टिप्पणी का जवाब देते हुए, राज्य के लिए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने प्रस्तुत किया कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं बल्कि समुदायों के पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी 27-28 प्रतिशत है।</div>
<div> </div>
<div>रंगनाथ आयोग ने मुसलमानों के लिए 10% आरक्षण की सिफारिश की। हिंदू समुदाय के लिए, 66 समुदायों को पिछड़े के रूप में वर्गीकृत किया गया था। फिर, यह प्रश्न उठा कि मुसलमानों के लिए आरक्षण हेतु क्या किया जाना चाहिए। इसलिए, पिछड़ा आयोग ने यह कार्य अपने हाथ में लिया और मुसलमानों के भीतर 76 समुदायों को पिछड़े वर्गों के रूप में वर्गीकृत किया जिनमें से बड़ी संख्या में समुदाय पहले से ही केन्द्रीय सूची में हैं। कुछ अन्य भी मंडल आयोग का हिस्सा हैं। बाकी हिंदू समकक्षों और अनुसूचित जातियों / जनजातियों के संबंध में है। धार्मिक आधार पर मुस्लिम जैसे धार्मिक समुदाय को ओबीसी लाभार्थी के रूप में मान्यता देने से विवादास्पद बहस छिड़ गई है। क्या अनुसूचित जाति के धर्मांतरित लोग आरक्षण के लिए पात्र हैं, यह एक और मुद्दा है जिसे अदालत में चुनौती दी गई है।सोमवार (9 दिसंबर) को सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि “आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता”। </div>
<div> </div>
<div>जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन मई में कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए कोटे के तहत 77 वर्गों - मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय से - को दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया गया था।कुछ सप्ताह पहले, 26 नवंबर को, सर्वोच्च न्यायालय ने एक महिला की अनुसूचित जाति (एससी) की स्थिति को मान्यता देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि न्यायालय ने कहा था कि महिला और उसके परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया है इन उदाहरणों के ज़रिए, धर्म और आरक्षण के बीच के रिश्ते को एक बार फिर से चर्चा में लाया गया है। 1950 में भारत का संविधान लागू होने के बाद से, केंद्र और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने यह परिभाषित करने का प्रयास किया है कि आरक्षण का लाभ देने के लिए धर्म को किस हद तक माना जा सकता है।</div>
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<div>ओबीसी या अनुसूचित जनजाति आरक्षण के लाभार्थियों के रूप में धार्मिक समूहों की पहचान करने पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, हालांकि धार्मिक समूहों या समुदायों को आरक्षण के दायरे में शामिल करने के प्रयास बड़े पैमाने पर ओबीसी श्रेणी में ही किए गए हैं। संविधान का अनुच्छेद 16(4) राज्यों को “नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में आरक्षण प्रदान करने की शक्ति देता है, जिसका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है”। उदाहरण के लिए, केरल ने 1956 से ओबीसी कोटे के भीतर मुसलमानों के लिए आरक्षण प्रदान किया है, और कर्नाटक (1995 में) और तमिलनाडु (2007 में) सहित अन्य राज्यों ने भी मुस्लिम समुदाय के भीतर समूहों के लिए ओबीसी आरक्षण की पेशकश की है।</div>
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<div>कर्नाटक में मुसलमानों के लिए आरक्षण राज्य के तीसरे पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा 1990 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद प्रदान किया गया था, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति ओ. चिन्नाप्पा रेड्डी ने की थी। आयोग ने पाया कि मुसलमानों को “समग्र रूप से” सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग माना जा सकता है। 2006 में न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर समिति - जिसे मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने के लिए केंद्र द्वारा अधिकृत किया गया था - ने पाया कि केंद्र सरकार के विभागों और एजेंसियों में मुस्लिम ओबीसी का प्रतिनिधित्व “बेहद कम” था, यह सुझाव देते हुए कि “पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित अधिकारों का लाभ अभी तक उन तक नहीं पहुंचा है”।</div>
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<div>इंदिरासाहनी बनाम भारत संघ (1992) में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने इस मुद्दे को एक नया आयाम दिया। अदालत ने कहा कि ओबीसी आरक्षण का उद्देश्य विभिन्न समूहों द्वारा सामना किए जाने वाले ऐतिहासिक भेदभाव को संबोधित करना था, और "नागरिकों के किसी भी वर्ग को केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर पिछड़ा नहीं माना जा सकता"। अनिवार्य रूप से, अदालत ने माना कि धर्म और अन्य समूह पहचान प्रासंगिक हैं, लेकिन ओबीसी कोटे के भीतर आरक्षण प्रदान करने के लिए एकमात्र मानदंड नहीं हो सकते।</div>
<div> </div>
<div>इस फ़ैसले के आधार पर, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 22 मई, 2024 को 77 वर्गों - जिनमें से 75 मुस्लिम समुदाय से थे - को दिए गए ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया कि इन वर्गों के पिछड़ेपन को निर्धारित करने के लिए किसी भी "उद्देश्यपूर्ण मानदंड" का उपयोग किए बिना आरक्षण प्रदान किया गया था। इसने यह भी कहा, "वास्तव में इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने के लिए धर्म ही एकमात्र मानदंड रहा है"।</div>
<div> </div>
<div>संविधान का अनुच्छेद 341(1) राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह “ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों या जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या समूहों को निर्दिष्ट करें जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुसूचित जातियाँ माना जाएगा”। महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश के खंड 3 में कहा गया है कि “कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा”। यह आदेश शुरू में हिंदुओं तक ही सीमित था, लेकिन बाद में इसमें उन अनुसूचित जाति के हिंदुओं को भी शामिल कर लिया गया, जिन्होंने सिख धर्म (1956 में) और बौद्ध धर्म (1990 में) अपना लिया था।</div>
<div> </div>
<div>इस आदेश को 1983 में सूसाई नामक एक मोची ने चुनौती दी थी, जो अनुसूचित जाति आदि-द्रविड़ समुदाय से था, लेकिन उसे अनुसूचित जातियों के लिए सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि उसने ईसाई धर्म अपना लिया था। उसने तर्क दिया कि ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद भी वह आदि-द्रविड़ समुदाय का सदस्य है। सूसाई बनाम भारत संघ (1985) में न्यायालय ने इस बात का उत्तर नहीं दिया कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद अपनी जाति की स्थिति बनाए रखेगा या नहीं, लेकिन यह माना कि यह अनुसूचित जाति के लाभों का उपयोग करने के लिए “पर्याप्त” नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी, व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि “ऐसी जाति सदस्यता से पीड़ित बाधाएँ… एक अलग धार्मिक समुदाय के नए वातावरण में अपनी दमनकारी गंभीरता में बनी रहती हैं।। </div>
<div> </div>
<div>1996 में, पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने ईसाई धर्मांतरित लोगों को सूची में शामिल करने के लिए अनुसूचित जाति के आदेश में संशोधन करने के लिए एक विधेयक पेश किया; इसे कभी पेश नहीं किया गया।</div>
<div>2007 में, रंगनाथ मिश्रा आयोग (केंद्र द्वा एससी आरक्षण के दायरे में भी बदलाव की संभावना है। गाजी सादुद्दीन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2004 से लंबित) के मामले में , 1950 के आदेश की संवैधानिक वैधता को फिर से चुनौती दी गई थी।</div>
<div> </div>
<div>अप्रैल 2024 में, याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों के बावजूद, न्यायालय ने मामले में दलीलें सुनने में देरी करने का फैसला किया, क्योंकि उसने पाया कि केंद्र ने यह जांच करने के लिए एक आयोग बनाया था कि क्या धर्मांतरित लोगों को अपना एससी का दर्जा बरकरार रखना चाहिए। केंद्र ने प्रस्तुत किया कि उसने रंगनाथ मिश्रा आयोग की 2007 की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक नया आयोग बनाया। समिति ने विभिन्न राज्यों में सार्वजनिक सुनवाई की है और नवंबर 2024 में इसे अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए अक्टूबर 2025 तक का विस्तार मिला।</div>
<div> </div>
<div>सर्वोच्च न्यायालय भी इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या ओबीसी आरक्षण किसी धार्मिक समूह को समग्र रूप से दिया जा सकता है। 2005 में, आंध्र प्रदेश सरकार ने ओबीसी कोटे के भीतर मुसलमानों को 5% आरक्षण देने के लिए एक कानून पेश किया था, जिसे उसी वर्ष एपी उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। कलकत्ता HC के फैसले के समान, न्यायालय ने माना कि सरकार ने मुसलमानों को समग्र रूप से पिछड़ा वर्ग के रूप में लेबल करने के लिए "उद्देश्यपूर्ण मानदंड" का उपयोग नहीं किया। पीठ ने मामलों को 7 जनवरी, 2025 तक विस्तृत सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Dec 2024 17:30:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गोंडा किसानों की एकजुटता के आगे झुका बजाज चीनी मिल दिया 10 करोड़ रुपए का भुगतान </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>विशेष संवाददाता प्रदीप यादव </strong></div>
<div>  </div>
<div><strong>गोंडा </strong>शुक्रवार को दोपहर एक बजे अपर पुलिस अधीक्षक की ऑफिस में एडीशन एसपी की अध्यक्षता में कुन्दरखी बजाज चीनी मिल के यूनिट हेड पीएन सिंह व एन के शुक्ला व अवधकेसरी सेना के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के साथ करीब डेढ़ घन्टा बैठक चली किसानों के हितों में बहुत सी  महत्वपूर्ण परेशानियों पर चर्चा किया गया। बजाज  चीनी मिल किसानों की एकजुटता से डरकर 10 करोड़ रुपया दिया जिसमें साढ़े 5 करोड़ रुपया 13 दिसम्बर को शाम 5 बजे किसानों के खाते में भेज देंगे व साढ़े 4 करोड़ रुपया बुधवार को देंगे।</div>
<div>  </div>
<div>बाकी का शेष 60</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146971/bajaj-sugar-mill-bowed-before-the-solidarity-of-gonda-farmers"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/img-20241213-wa0175.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>विशेष संवाददाता प्रदीप यादव </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>गोंडा </strong>शुक्रवार को दोपहर एक बजे अपर पुलिस अधीक्षक की ऑफिस में एडीशन एसपी की अध्यक्षता में कुन्दरखी बजाज चीनी मिल के यूनिट हेड पीएन सिंह व एन के शुक्ला व अवधकेसरी सेना के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के साथ करीब डेढ़ घन्टा बैठक चली किसानों के हितों में बहुत सी  महत्वपूर्ण परेशानियों पर चर्चा किया गया। बजाज  चीनी मिल किसानों की एकजुटता से डरकर 10 करोड़ रुपया दिया जिसमें साढ़े 5 करोड़ रुपया 13 दिसम्बर को शाम 5 बजे किसानों के खाते में भेज देंगे व साढ़े 4 करोड़ रुपया बुधवार को देंगे।</div>
<div> </div>
<div>बाकी का शेष 60 करोड़ रुपये का भुगतान दिसंबर महीने लास्ट तक फाइनल कर देंगे इसीलिए तमाम बातों व किसानों के छोलवा मजदूरी की समस्या को ध्यान में रखकर कल 14 दिसम्बर को होने वाले आंदोलन को स्थगित किया जाता है  सभी जनपद वासियों किसानों के साथ व सहयोग के लिए अवधकेसरी सेना आप सभी का सदैव आभारी रहेगी हम सब मिलकर लगातार किसान हित की आवाज बुलंद करते रहेंगे लेकिन एक बात सभी किसान साथियों को कह रहा हूं।</div>
<div> </div>
<div>जब अपने विधायक सांसद के पास जाओ तो अपनी बात गम्भीरता पूर्वक जारूर रखें कि किसान हित की आवाज पार्लियामेंट और सांसद सत्र में क्यों नहीं उठाई जाती मीडिया वार्तालाभ में अवध केसरी सेना के अध्यक्ष नीरज सिंह ने कहा कि आज के युग में हमारे किसान साथियों को डराया जाता है तथा उनकी आवाज़ को दबाया जाता है लेकिन अवध केसरी सेना कदाप ऐसा नहीं होने देगी हर क़दम किसानो की आवाज उठाता रहूंगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Dec 2024 17:29:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थलों के खिलाफ नए मुकदमों के पंजीकरण, सर्वेक्षण आदेश पारित करने पर रोक लगाई।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div class="a3s aiL">
<div>
<div><strong>नई दिल्ली।</strong> उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (12 दिसंबर) को आदेश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश तक देश में पूजा स्थलों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि लंबित मुकदमों (जैसे ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा शाही ईदगाह, संभल जामा मस्जिद आदि से संबंधित) में न्यायालयों को सर्वेक्षण के आदेश सहित प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करना चाहिए। अंतरिम आदेश पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई करते हुए पारित किया गया।</div>
<div>  </div>
<div>मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी.</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146966/the-supreme-court-banned-passing-orders-for-registration-and-survey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/सुप्रीम-कोर्ट-ने-पूजा-स्थलों-के-खिलाफ-नए-मुकदमों-के-पंजीकरण.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>नई दिल्ली।</strong> उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (12 दिसंबर) को आदेश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश तक देश में पूजा स्थलों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि लंबित मुकदमों (जैसे ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा शाही ईदगाह, संभल जामा मस्जिद आदि से संबंधित) में न्यायालयों को सर्वेक्षण के आदेश सहित प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करना चाहिए। अंतरिम आदेश पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई करते हुए पारित किया गया।</div>
<div> </div>
<div>मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की विशेष पीठ ने आदेश पारित किया कि चूंकि मामला इस न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि यद्यपि वाद दायर किए जा सकते हैं, लेकिन इस न्यायालय के अगले आदेश तक कोई वाद पंजीकृत नहीं किया जाएगा और कार्यवाही नहीं की जाएगी। हम यह भी निर्देश देते हैं कि लंबित वादों में न्यायालय अगली सुनवाई की तारीख तक सर्वेक्षण के आदेश सहित कोई भी प्रभावी अंतरिम आदेश या अंतिम आदेश पारित नहीं करेगा।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई तक मंदिर-मस्जिद से जुड़ा कोई भी नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। यह कानून पूजा स्थलों के स्वरूप में किसी भी बदलाव पर रोक लगाता है और यह सुनिश्चित करता है कि 15 अगस्त 1947 को जो पूजा स्थल का जो स्वरूप था, वह वैसा ही बना रहे।</div>
<div> </div>
<div>हालांकि, न्यायालय ने मस्जिदों/दरगाहों जैसे पूजा स्थलों के खिलाफ वर्तमान में लंबित मुकदमों की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने केंद्र सरकार से आज से चार सप्ताह के भीतर पूजा स्थल अधिनियम पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने को भी कहा। केंद्र के जवाबी हलफनामे की प्रति को एक वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया है, जहां से कोई भी व्यक्ति इसे डाउनलोड कर सकता है।पीठ को बताया गया कि वर्तमान में देश में 10 मस्जिदों/धर्मस्थलों के खिलाफ 18 मुकदमे लंबित हैं।</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय 1991 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति से पूजा स्थलों के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन पर रोक लगाता है।मुख्य याचिका (अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ) 2020 में दायर की गई थी, जिसमें न्यायालय ने मार्च 2021 में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। बाद में, क़ानून को चुनौती देते हुए कुछ अन्य समान याचिकाएँ दायर की गईं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा अधिनियम के क्रियान्वयन की मांग करते हुए दायर की गई एक रिट याचिका भी आज सूचीबद्ध की गई। सीपीआई (एम), इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, डीएमके और आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा, एनसीपी (शरद पवार) सांसद जितेंद्र अव्हाड़ आदि जैसे विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अधिनियम की सुरक्षा की मांग करते हुए कई हस्तक्षेप आवेदन दायर किए गए हैं।</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय द्वारा कई बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया है। उत्तर प्रदेश में संभल जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बाद हुई हिंसक घटनाओं के मद्देनजर यह अधिनियम हाल ही में सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया। न्यायालय ने अधिवक्ता कनु अग्रवाल, विष्णु शंकर जैन और एजाज मकबूल को क्रमशः संघ, याचिकाकर्ताओं और अधिनियम का समर्थन करने वाले पक्षों की ओर से संकलन करने के लिए नोडल वकील नियुक्त किया। </div>
<div>अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई याचिका में  जिन्होंने प्रार्थना किया गया  है कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 2, 3 और 4 को रद्द कर दिया जाए।</div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ता का कहना है कि ये तीनों धाराएं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15, 21, 25,26 और 29 का उल्लंघन करती हैं। याचिका के मुताबिक ये सभी हमारे संविधान की मूल भावना और प्रस्तावना के खिलाफ हैं। प्रस्तुत किए गए विभिन्न कारणों में से एक यह तर्क था कि ये प्रावधान किसी व्यक्ति या धार्मिक समूह के पूजा स्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए न्यायिक उपचार के अधिकार को छीन लेते हैं।</div>
<div>1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने पूजा स्थल कानून लेकर आई थी। इस कानून के मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था।</div>
<div> </div>
<div>धारा-4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को किसी पूजा स्थल का जो चरित्र था उसे वैसा ही बनाए रखना होगा। वहीं. धारा-4(2) इसके प्रावधान उन मुकदमों, अपीलों और कानूनी कार्यवाही को रोकने की बात करता हैं जो पूजा स्थल कानून के लागू होने की तिथि पर लंबित थे। इसके साथ ही ये धारा किसी नए मामले को दायर करने पर भी रोक लगाती है। इस कानून की धारा-5 कहती है कि पूजा स्थल कानून  राम जन्मभूमि से जुड़े मुकदमों पर लागू नहीं होगा। इस कानून को चुनौती देने वाली कम से कम दो याचिकाएं कोर्ट में विचाराधीन हैं। इनमें से एक याचिका लखनऊ के विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ और कुछ अन्य सनातन धर्म के लोगों की है। दूसरी याचिका भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने लगाई है।  दोनों याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। </div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है। जो संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही ये कानून एक मनमाना तर्कहीन कटऑफ तिथि भी लागू करता है जो हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्म के अनुयायियों के अधिकार को कम करता है। जुलाई 1991 में जब केंद्र सरकार ये कानून लेकर आई थी तब भी संसद में भाजपा ने इसका विरोध किया था। उस वक्त राज्यसभा में अरुण जेटली और लोकसभा में उमा भारती ने इस मामले को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने की मांग की थी।अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद एक बार फिर काशी और मथुरा सहित देशभर के करीब 100 पूजा स्थलों पर मंदिर की जमीन होने को लेकर दावेदारी की जा रही है, लेकिन 1991 के कानून के चलते दावा करने वाले कोर्ट नहीं जा सकते। ज्ञानवापी में इसी कानून के उल्लंघन की बात मुस्लिम पक्ष कह रहा है।</div>
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                <pubDate>Fri, 13 Dec 2024 17:24:13 +0530</pubDate>
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                <title>अतुल सुभाष खुदकुशी केस ने पूरे देश को झकझोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div><strong>नई दिल्ली।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करने के लिए 8 पैमाने तय किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों से कहा है कि गुजारा भत्ता तय करते वक्त वे पति-पत्नी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पत्नी और बच्चों की जरूरतें, दोनों के रोजगार की स्थिति, आय और संपत्ति को आधार बनाए। अतुल सुभाष खुदकुशी केस ने पूरे देश को झकझोर दिया है। सोशल मीडिया पर जबरदस्त आक्रोश है। 34 साल के सुभाष बेंगलुरु में एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर थे। उन्होंने मरने से पहले 24 पन्ने का नोट लिखा और 80 मिनट का वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया जिसमें उन्होंने अपना दर्द</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146964/atul-subhash-suicide-case-shocked-the-entire-country-the-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/अतुल-सुभाष-खुदकुशी-केस-ने-पूरे-देश-को-झकझोर-दिया।सुप्रीम-कोर्ट-ने-संज्ञान-लिया।.webp" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>नई दिल्ली।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करने के लिए 8 पैमाने तय किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों से कहा है कि गुजारा भत्ता तय करते वक्त वे पति-पत्नी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पत्नी और बच्चों की जरूरतें, दोनों के रोजगार की स्थिति, आय और संपत्ति को आधार बनाए। अतुल सुभाष खुदकुशी केस ने पूरे देश को झकझोर दिया है। सोशल मीडिया पर जबरदस्त आक्रोश है। 34 साल के सुभाष बेंगलुरु में एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर थे। उन्होंने मरने से पहले 24 पन्ने का नोट लिखा और 80 मिनट का वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया जिसमें उन्होंने अपना दर्द बयां किया।</div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने अपनी मौत के लिए पत्नी की प्रताड़ना के साथ-साथ फैमिली कोर्ट की जज को भी जिम्मेदार बताया जिन्होंने कथित तौर पर केस सेटलमेंट के लिए उनसे 5 लाख रुपये की मांग की थी। सुभाष की 5 साल पहले शादी हुई थी और उनका एक 4 साल का बच्चा भी था।  फैमिली कोर्ट ने उन्हें बच्चे के गुजारा के लिए पत्नी को हर महीने 40 हजार रुपये देने का आदेश दिया था। पत्नी निकिता सिंघानिया ने उनके और उनके परिवार वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न समेत 9 केस दर्ज करा रखे थे। सुभाष की मौत के बाद सोशल मीडिया पर तमाम लोग आक्रोश जता रहे और आरोप लगा रहे हैं तलाक के मामलों में कई बार अदालतें मनमाने तरीके से मैंटिनेंस की रकम तय कर रही हैं।</div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">अतुल सुभाष मामले पर आक्रोश के बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करने के लिए देशभर की अदालतों को 8 सूत्रों वाला फॉर्म्युला दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्थायी गुजारा भत्ता की राशि पति को दंडित न करे। ये पत्नी के लिए एक सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करने के मकसद से बनाई जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा, 'यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि स्थायी गुजारा भत्ता की राशि पति को दंडित न करे बल्कि पत्नी के लिए एक सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई जानी चाहिए।' वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2020 में 'रजनीश बनाम नेहा' केस में भी गुजारे भत्ते को लेकर अदालतों के लिए गाइडलाइंस तय किए थे। शीर्ष अदालत ने अपने ताजा फैसले में गुजारा भत्ता तय करने के लिए किन 8 पैमानों को सेट किया है।</div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">जिसमें  पति और पत्नी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति,भविष्य में पत्नी और बच्चों की बुनियादी जरूरतें,दोनों पक्षों की योग्यता और रोजगार, आय और संपत्ति के साधन, ससुराल में रहते हुए पत्नी का जीवन स्तर, क्या उसने परिवार की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी है?,जो पत्नी काम नहीं कर रही है, उसके लिए कानूनी लड़ाई के लिए उचित राशि,पति की आर्थिक स्थिति, उसकी कमाई और गुजारा भत्ता के साथ अन्य जिम्मेदारियां शामिल है। </div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2020 को 'रजनीश बनाम नेहा' केस में गुजारे भत्ते को लेकर देशभर की अदालतों के लिए गाइडलाइंस तय किए थे। कोर्ट ने कहा था कि गुजारा भत्ता की रकम कितनी हो, इसका कोई तय फॉर्म्युला नहीं है। यह केस पर निर्भर है और केस टु केस अलग हो सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालतें जब गुजारे भत्ते की राशि तय करें तो उन्हें किसी पिछले फैसले पर विचार करना चाहिए। मैंटिनेंस अमाउंट तय करते वक्त संबंधित पक्षों की स्थिति, आवेदक की जरूरत, प्रतिवादी की आय और संपत्ति, दावेदार की वित्तीय जिम्मेदारियों, संबंधित पक्षों की उम्र और रोजगार की स्थिति, नाबालिग बच्चों के भरण पोषण और बीमारी या अक्षमता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मैंटिनेंस से जुड़े आदेशों का पालन भी सिविल कोर्ट के फैसलों की तरह होना चाहिए। आदेश का पालन नहीं होने पर संबंधित पक्ष को हिरासत में लिए जाने से लेकर संपत्ति की जब्ती जैसी कार्रवाई हो। अदालतों के पास अधिकार होगा कि वह ऐसे मामलों में अवमानना की कार्रवाई शुरू कर सके।</div>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 13 Dec 2024 17:08:45 +0530</pubDate>
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                <title>पुशअप मैन रोहतास चौधरी के सम्मान में खानपुर में स्वागत समारोह</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली।</strong> हाल ही में गुजरात में एक पैर पर पाकिस्तान के पुश अप मैन के 534 के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए पुश अप मैन रोहतास चौधरी ने 722 का विश्व कीर्तिमान स्थापित कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भारत का नाम दर्ज करा दिया।इसके उपलक्ष्य में दिल्ली प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी सदस्य इंदराज पहलवान द्वारा एम बी रोड खानपुर स्थित पुराने पेट्रोल पंप पर भव्य स्वागत समारोह एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया गया।</div>
<div>  </div>
<div>जिसमें पुश अप मैन ऑफ इंडिया  रोहतास चौधरी का शानदार स्वागत किया गया,और भारी संख्या में इस समारोह में उपस्थित लोगों ने प्रसाद का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146833/welcome-ceremony-in-khanpur-in-honor-of-pushup-man-rohtas"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/img-20241205-wa0119.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली।</strong> हाल ही में गुजरात में एक पैर पर पाकिस्तान के पुश अप मैन के 534 के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए पुश अप मैन रोहतास चौधरी ने 722 का विश्व कीर्तिमान स्थापित कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भारत का नाम दर्ज करा दिया।इसके उपलक्ष्य में दिल्ली प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी सदस्य इंदराज पहलवान द्वारा एम बी रोड खानपुर स्थित पुराने पेट्रोल पंप पर भव्य स्वागत समारोह एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया गया।</div>
<div> </div>
<div>जिसमें पुश अप मैन ऑफ इंडिया  रोहतास चौधरी का शानदार स्वागत किया गया,और भारी संख्या में इस समारोह में उपस्थित लोगों ने प्रसाद का भी आनंद उठाया।उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व श्री चौधरी ने 37 केजी वजन के साथ स्पेन के खिलाफ 743 पुश अप का रिकॉर्ड बनाया था। लगातार पुश अप में नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने वाले रोहतास चौधरी को लोगों ने फूलमाला एवं शॉल पहनकर स्वागत किया तथा उन्हें जीत की बधाई दी।</div>
<div> </div>
<div>इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आईपीएस ईश्वर सिंह, महेश चौधरी, नरजीत यादव, निगम पार्षद ममता यादव के अलावा रामनिवास गर्ग, कृष्णा चौधरी, राकेश चौधरी, आर के पप्पू चौधरी, सुनील चौधरी, टीकम चौधरी, राजकुमार गुर्जर, अतर सिंह गजराज, बिजेंदर विकल,राजेश विकल मास्टर रौशन लाल,राम जी मास्टर चरण सिंह, राजपाल बिधूड़ी, विरम बिधूड़ी के अलावा भारी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Dec 2024 17:01:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राज्य पुलिस द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारियों की गिरफ्तारी के बढ़ते मामलों पर महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के अधिकारियों को बदले की भावना से की जाने वाली कार्रवाई से बचाने के उद्देश्य से संतुलन बनाने पर जोर दिया है। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने राज्य पुलिस को भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से केंद्रीय जांच एजेंसियों के अफसरों को नहीं रोकने का भी सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच में केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राज्‍य सरकारों की तरफ से भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146761/supreme-court-needs-to-maintain-a-balance-between-central-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/supream-court.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्य पुलिस द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारियों की गिरफ्तारी के बढ़ते मामलों पर महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के अधिकारियों को बदले की भावना से की जाने वाली कार्रवाई से बचाने के उद्देश्य से संतुलन बनाने पर जोर दिया है। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने राज्य पुलिस को भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से केंद्रीय जांच एजेंसियों के अफसरों को नहीं रोकने का भी सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच में केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्‍य सरकारों की तरफ से भी सीबीआई और ईडी के अफसरों पर मुकदमे ठोके जाने के मामले  में अब सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया है। देश की सर्वोच्‍च अदालत ने कहा कि केंद्र के अधिकारियों पर बदले की भावना से की जाने वाली कार्रवाई से बचाने के लिए एक दूसरे के खिलाफ संतुलन बनाने की जरूरत है। कोर्ट ने यह तो माना कि राज्य पुलिस को भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से नहीं रोका जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा कि केंद्र और राज्‍य की एजेंसियों के बीच टकराव से संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने तमिलनाडु पुलिस द्वारा कथित भ्रष्टाचार के लिए ईडी अधिकारी की गिरफ्तारी से संबंधित मामले की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी का जांच में कोई अधिकार नहीं है, लेकिन उसे निष्पक्ष जांच का अधिकार है।बेंच ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि अगर अधिकारी केंद्र सरकार से है, तो क्या उसे राज्य पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाना चाहिए। अगर केंद्र सरकार ने उस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुमति दी होती, तो स्थिति बिल्कुल अलग होती।</div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु पुलिस का कहना था कि ईडी अधिकारी को 20 लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामले की जांच लगभग पूरी हो चुकी है। राज्य पुलिस आरोपपत्र दाखिल करने के लिए तैयार थी, लेकिन ईडी के सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण इंतजार करना पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच के मामले में आरोपी की कोई भूमिका नहीं हो सकती, लेकिन उसे निष्पक्ष जांच का अधिकार है। संघीय ढांचे में प्रत्येक घटक को अपने अधिकार क्षेत्र के डोमेन को बनाए रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।अगर कोई राज्य पुलिस बदले की भावना से केंद्र सरकार के अधिकारियों को गिरफ्तार करती है तो यह एक संवैधानिक संकट पैदा करेगा। लिहाजा यह कहना कि राज्य के पास गिरफ्तारी का विशेष अधिकार होगा, यह संघीय ढांचे के लिए खतरनाक होगा।लेकिन राज्य पुलिस को अपने अधिकार क्षेत्र में किसी अपराध की जांच करने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम पुलिस शक्ति के इन दो प्रतिस्पर्धी पहलुओं के बीच संतुलन बनाने के लिए दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार-विमर्श करेंगे। यह स्‍टेट बनाम यूनियन का एक क्लासिक उदाहरण है। हम बड़े संघीय ढांचे की योजना पर विचार करेंगे और ऐसे मामलों की जांच के लिए सिस्‍टम को निर्धारित करेंगे। पेश मामले में  गिरफ्तार ईडी अधिकारी को दी गई अंतरिम जमानत की अविध को अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान ने संघीय गतिशीलता की पेचीदगियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जांच करने के लिए राज्य की स्वायत्तता महत्वपूर्ण है, लेकिन अनियंत्रित शक्तियां संभावित रूप से संवैधानिक गतिरोध का कारण बन सकती हैं, खासकर अगर केंद्र सरकार के अधिकारियों को स्थानीय अधिकारियों द्वारा बिना किसी ठोस आधार के निशाना बनाया जाता है। न्यायमूर्ति कांत ने कार्यवाही के दौरान टिप्पणी की, “काल्पनिक परिदृश्य जहां राज्य एजेंसियां मनमाने ढंग से केंद्र सरकार के अधिकारियों को हिरासत में ले सकती हैं, हमारे संघीय ढांचे के लिए खतरा पैदा करती हैं और संवैधानिक संकट को जन्म दे सकती हैं।”</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चिंताओं को स्वीकार करने के बावजूद, पीठ ने निष्पक्ष जांच के लिए अभियुक्तों के अधिकारों को भी मान्यता दी, और जोर देकर कहा कि अपने अधिकार क्षेत्र में राज्य पुलिस के अधिकार को नकारना भी उतना ही अवांछनीय है। पीठ ने कहा, “हमारा उद्देश्य एक ऐसा विवेकपूर्ण दृष्टिकोण तैयार करना है जो केंद्रीय और राज्य दोनों जांच एजेंसियों की स्वायत्तता का सम्मान करे।” सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई जनवरी के लिए निर्धारित की है, जहाँ उसे इन जटिल मुद्दों को पूरी तरह से संबोधित करने की उम्मीद है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 17:21:26 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अवैध पेड़ों की कटाई पर अवमानना नोटिस जारी किया।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा में वृंदावन रोड पर 454 पेड़ों की अवैध कटाई के बाद उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को सिविल अवमानना नोटिस जारी किया है, जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों का उल्लंघन है। जस्टिस अभय एस. ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने 18 और 19 सितंबर, 2024 की रात को हुई इस घटना पर हैरानी और चिंता व्यक्त की। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ों की अवैध कटाई सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए की गई थी। न्यायाधीशों ने कहा, "सीईसी की नवीनतम रिपोर्ट में चौंकाने वाली स्थिति</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146760/supreme-court-issues-contempt-notice-on-illegal-tree-cutting-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/सुप्रीम-कोर्ट-ने-उत्तर-प्रदेश-में-अवैध-पेड़ों-की-कटाई-पर-अवमानना-नोटिस-जारी-किया।.webp" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा में वृंदावन रोड पर 454 पेड़ों की अवैध कटाई के बाद उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को सिविल अवमानना नोटिस जारी किया है, जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों का उल्लंघन है। जस्टिस अभय एस. ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने 18 और 19 सितंबर, 2024 की रात को हुई इस घटना पर हैरानी और चिंता व्यक्त की। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ों की अवैध कटाई सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए की गई थी। न्यायाधीशों ने कहा, "सीईसी की नवीनतम रिपोर्ट में चौंकाने वाली स्थिति का खुलासा हुआ है। इसमें दर्ज है कि 454 पेड़ों को अवैध रूप से काटा गया था... रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि रिपोर्ट में नामित व्यक्तियों द्वारा इस न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करते हुए यह स्पष्ट रूप से अवैध कार्रवाई की गई है। प्रथम दृष्टया, हमारा मानना है कि रिपोर्ट में उल्लिखित व्यक्ति सिविल अवमानना के दोषी हैं।"</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय ने दोषी अधिकारियों को अवमानना नोटिस का जवाब देने और यह बताने के लिए 16 दिसंबर की तारीख तय की है कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। इसके अलावा, न्यायालय ने साइट पर किसी भी तरह के पेड़ की कटाई या निर्माण गतिविधियों को तत्काल रोकने का आदेश दिया है और यह अनिवार्य किया है कि अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की लकड़ी को कानूनी नियमों के अनुसार संभाला जाए।</div>
<div> </div>
<div>यह सख्त निर्देश ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन के भीतर पर्यावरण उल्लंघनों को संबोधित करने के व्यापक प्रयास के हिस्से के रूप में आया है, ताजमहल के चारों ओर एक निर्दिष्ट क्षेत्र है जहाँ ऐतिहासिक स्थल को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए पर्यावरण नियमों की कड़ी निगरानी की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब पेड़ों को काटने की अनुमति दी जाती है, तो उसे अदालत द्वारा निर्दिष्ट समय का सख्ती से पालन करना चाहिए, विशेष रूप से शाम 6 बजे से सुबह 8 बजे के बीच ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। अवैध रूप से पेड़ों की कटाई का मुद्दा गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करता है, जिसमें वनों की कटाई, आवास का नुकसान और पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान शामिल है।</div>
<div> </div>
<div>यह मामला पर्यावरण कानूनों को लागू करने के लिए अधिकारियों द्वारा सामना किए जा रहे संघर्ष और अनुपालन सुनिश्चित करने और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। शीर्ष न्यायालय ने टीटीजेड में वृक्षों की कटाई से संबंधित एमसी मेहता मामले पर विचार करते हुए प्राधिकारियों को वृक्षों की गणना करने का भी निर्देश दिया था।</div>
<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे कारण बताने को कहा है कि ताज ट्रेपेज़ियम क्षेत्र (टीटीजेड) में पेड़ों की कटाई से संबंधित मामले में उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।</div>
<div> </div>
<div>न्यायमूर्ति ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, " हमारा मानना है कि अनुच्छेद 8 में उल्लिखित व्यक्ति सिविल अवमानना के दोषी हैं। इसलिए हम उन्हें 19 दिसंबर तक जवाब देने के लिए नोटिस जारी करते हैं और उनसे कारण बताने को कहते हैं कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। " साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट में 'चौंकाने वाली स्थिति' का खुलासा किया गया है , जिसमें दर्ज किया गया है कि 18 और 19 सितंबर 2024 को 454 पेड़ों को अवैध रूप से गिराया गया था।</div>
<div>पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल थे, ने कहा कि अवैध रूप से काटे गए 454 पेड़ों में से 420 डालमिया फार्म नामक निजी भूमि पर थे, जबकि शेष 32 पेड़ इस निजी भूमि से सटे सड़क के किनारे काटे गए थे, जो एक संरक्षित वन है।इसने आगे कहा कि इन 454 पेड़ों की अवैध कटाई उक्त रिपोर्ट के पैराग्राफ 8 में नामित व्यक्तियों द्वारा की गई थी, जो इस अदालत द्वारा मई 2015 और 8 दिसंबर, 2021 में पारित आदेश का उल्लंघन है।</div>
<div> </div>
<div>तदनुसार न्यायालय ने उन व्यक्तियों को जिनके खिलाफ नोटिस जारी किया गया था, निर्देश दिया कि वे डालमिया फार्म पर कोई भी कार्य या निर्माण कार्य न करें तथा यथास्थिति बनाए रखें। न्यायालय ने मथुरा के पुलिस अधीक्षक को स्थानीय पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को डालमिया फार्म का दौरा करने तथा यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने को कहा कि पेड़ों की कटाई नहीं की जा रही है।</div>
<div>आज सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी एडीएन राव ने कोर्ट का ध्यान तस्वीरों की ओर दिलाया और सुझाव दिया कि कोर्ट को शाम 6:00 बजे के बाद पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का आदेश पारित करना चाहिए, क्योंकि सभी पेड़ आधी रात को काटे गए थे। उन्होंने कोर्ट से उन लोगों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी करने को भी कहा जो कोर्ट द्वारा पारित आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं। </div>
<div> </div>
<div>इसी तरह, राज्य की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने अदालत से नोटिस जारी करने का आग्रह करते हुए कहा, "यदि माननीय न्यायाधीश नोटिस जारी करेंगे, तो इससे हमें काम पूरा करने के लिए और अधिक अधिकार प्राप्त होंगे।"  भाटी ने अदालत को यह भी बताया कि राज्य ने उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ यूपी वृक्ष संरक्षण अधिनियम, भारतीय वन अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए हैं।उक्त दृष्टिकोण से सहमत होते हुए, अदालत ने तदनुसार नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि "शाम 6 बजे के बाद से अगले दिन सुबह 8 बजे तक कोई पेड़ नहीं गिराया जाना चाहिए"। उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम (डीटीपीए) के तहत राजधानी में वृक्षों की गणना करने में विफल रहने पर दिल्ली वृक्ष प्राधिकरण (डीटीए) को कड़ी फटकार लगाई थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 17:13:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>संविधान दिवस पर यूनिटी आफ लॉयर्स फॉर जस्टिस संस्था ने किया अधिवक्ताओं को सम्मानित</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली।</strong> संविधान दिवस के उपलक्ष में अधिवक्ताओं का सम्मान समारोह यूनिटी आफ लॉयर्स फॉर जस्टिस अम्बेडकर नगर, के द्वारा सुतुर भवन साकेत में बनाया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में बी सी डी मेंबर राजपाल कसाना जी हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कपिल सांखला जी साकेत बार प्रेसिडेंट विनोद शर्मा जी साकेत सेक्रेटरी विपिन चौधरी जी वाइस प्रेसिडेंट विक्रम चौधरी जी तरुण प्रकाश जी सहसंयोजक दिल्ली अधिवक्ता परिषद भाई हिमांशु बिधूड़ी जी रविंद्र भाटी जी ने मंच की शोभा बढ़ाई।</div>
<div>  </div>
<div>मैं मदन लाल जी, राजेश परेवा जी, नरेंद्र मलावलिया जी, एम एस आर्या जी, नीरज आनंद जी, करनैल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146707/unity-of-lawyers-for-justice-organization-honored-advocates-on-constitution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/img-20241129-wa0080.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली।</strong> संविधान दिवस के उपलक्ष में अधिवक्ताओं का सम्मान समारोह यूनिटी आफ लॉयर्स फॉर जस्टिस अम्बेडकर नगर, के द्वारा सुतुर भवन साकेत में बनाया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में बी सी डी मेंबर राजपाल कसाना जी हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कपिल सांखला जी साकेत बार प्रेसिडेंट विनोद शर्मा जी साकेत सेक्रेटरी विपिन चौधरी जी वाइस प्रेसिडेंट विक्रम चौधरी जी तरुण प्रकाश जी सहसंयोजक दिल्ली अधिवक्ता परिषद भाई हिमांशु बिधूड़ी जी रविंद्र भाटी जी ने मंच की शोभा बढ़ाई।</div>
<div> </div>
<div>मैं मदन लाल जी, राजेश परेवा जी, नरेंद्र मलावलिया जी, एम एस आर्या जी, नीरज आनंद जी, करनैल सिंह जी, धीर सिंह जी, अनिल बैसोया जी, एम एल चौधरी जी,रमेश कोली जी, अशोक महामना जी, अशगर खान जी,स्मिता जी, सुबिया जी, अंजू तंवर जी, सुनील मोहन जी, इरफान हुसैन जी,हितेश बैसला जी,अरुण लवली जी, राहुल मालिक जी, नरेंद्र शर्मा जी,संजय दत्त जी,सुनीता भास्कर, इद्रीश जी आदि उपस्थित रहे।</div>
<div> </div>
<div>कार्यक्रम का संचालन कर रहे एडवोकेट राजकुमार गोठवाल ने आए हुए सभी देव तुल्य अधिवक्तागणों का दिल की गहराई से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आप सभी के सहयोग से ये कार्यक्रम सफल हुआ है, और आशा करता हूं आगे भी इसी तरह हम सभी मिलकर राष्ट्रहित के लिए कार्य करते रहेंगे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Nov 2024 16:58:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली की अदालत ने 'अपमानजनक' और 'आक्रामक' प्रतिक्रिया के लिए ईडी को फटकार लगाई, विशेष निदेशक को पेश होने को कहा।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>दिल्ली।</strong> दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को एक प्रश्न के जवाब में उसके वकील द्वारा दिए गए “आक्रामक” और “अपमानजनक” जवाब के लिए फटकार लगाई।  विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने विशेष निदेशक को उसके समक्ष उपस्थित होकर यह सत्यापित करने को कहा कि क्या वकील उनके निर्देशानुसार कार्य कर रहा है और मामले का संचालन कर रहा है। दिल्ली की अदालत कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें धन शोधन के एक मामले में कुछ शीट और डिजिटल उपकरणों को जारी करने की मांग की गई थी।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146607/delhi-court-pulls-up-ed-for-outrageous-and-aggressive-response"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/दिल्ली-की-अदालत-ने-&#039;अपमानजनक&#039;-और-&#039;आक्रामक&#039;-प्रतिक्रिया-के-लिए-ईडी-को-फटकार-लगाई.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>दिल्ली।</strong> दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को एक प्रश्न के जवाब में उसके वकील द्वारा दिए गए “आक्रामक” और “अपमानजनक” जवाब के लिए फटकार लगाई।  विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने विशेष निदेशक को उसके समक्ष उपस्थित होकर यह सत्यापित करने को कहा कि क्या वकील उनके निर्देशानुसार कार्य कर रहा है और मामले का संचालन कर रहा है। दिल्ली की अदालत कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें धन शोधन के एक मामले में कुछ शीट और डिजिटल उपकरणों को जारी करने की मांग की गई थी।</div>
<div> </div>
<div>न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा, "चूंकि शिक्षा विभाग (ईडी) के वकील ने स्थगन मांगने का कारण स्पष्ट नहीं किया है और केवल इतना कहा है कि उन्हें उच्च अधिकारियों द्वारा ऐसा करने के लिए कहा गया है, इसलिए मैं योग्य विशेष निदेशक को नोटिस जारी करने के लिए बाध्य हूं कि वे उपस्थित हों और वर्तमान आवेदन के संबंध में शिक्षा विभाग का रुख स्पष्ट करें तथा सत्यापित करें कि क्या उनके वकील उनके निर्देशानुसार कार्य कर रहे हैं और मामले का संचालन कर रहे हैं। न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने के लिए उचित कार्रवाई शुरू करने के लिए योग्य विशेष निदेशक का जवाब आवश्यक है।"</div>
<div> </div>
<div>अदालत कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कुछ शीट और डिजिटल डिवाइस जारी करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में इस मामले में शिवकुमार के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था।</div>
<div>ईडी का प्रतिनिधित्व करने वाले विशेष लोक अभियोजक मनीष जैन ने कहा कि उन्हें निर्देश दिया गया है कि आवेदन का जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया जा सकता है। इस पर शिवकुमार के वकील ने तर्क दिया कि ईडी आवेदक को परेशान करने के लिए जानबूझकर सामग्री जारी नहीं कर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>ईडी के वकील द्वारा स्थगन की मांग करने पर अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विशेष अदालतों को सप्ताह में कम से कम एक बार मामलों को सूचीबद्ध करना चाहिए और जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, कोई स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>न्यायाधीश ने कहा, "एल.डी. वकील से यह प्रश्न पूछा गया था कि वे अदालत को स्थगन मांगने की अत्यधिक आवश्यकता के बारे में सूचित करें, जिस पर एल.डी. वकील (ईडी के) ने बहुत ही आक्रामक और अपमानजनक तरीके से ऊंची आवाज में अदालत कक्ष में मौजूद वकीलों को सुनाई देने वाली बात कही, 'कोर्ट को जैसा लगे वैसा कर ले' (अदालत वह कर सकती है जो उसे सही लगता है)," न्यायाधीश ने कहा।</div>
<div>न्यायाधीश सिंह ने कहा, "यह न्यायालय आश्चर्यचकित है कि एल.डी. वकील (ईडी का प्रतिनिधित्व कर रहे) एक साधारण प्रश्न पूछने पर इतने उत्तेजित क्यों हो गए। यह कोई अकेला मामला नहीं है, जहां डीओई के वकीलों ने इस तरह का व्यवहार किया हो।"</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें एजेंसी ने अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुतिकरण किया था। उन्होंने आगे लिखा, "यह कोई अकेला मामला नहीं है, जहां प्रवर्तन निदेशालय के वकीलों ने इस तरह का व्यवहार किया हो। ईसीआईआर संख्या डीएलजेडओ-1/43/2021 में 'प्रवर्तन निदेशालय बनाम अमरेंद्र धारी सिंह एवं अन्य' शीर्षक वाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश वकील ने अप्रमाणित दस्तावेजों की सूची की आपूर्ति के बारे में गलत प्रस्तुतिकरण किया था।"</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:57:26 +0530</pubDate>
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                <title>अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन ( आइसीए ) के वैश्विक सम्मेलन के लिए तैयार है इफको।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली। </strong>वैश्विक सहकारी आंदोलन के 130 साल के इतिहास में इफको ( Indian Farmers Fertiliser Cooperative ) के नेतृत्व में भारत पहली बार सहकारिता के वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है। जून 2023 में इफको के प्रबंध निदेशक, सीईओ डॉ उदय शंकर अवस्थी के प्रयास से ही आईसीए ने निमंत्रण स्वीकार करते हुए 2024 में पहली बार भारत को इसकी मेजबानी का जिम्मा सौंपा । इस सम्मेलन को डॉ उदय शंकर अवस्थी  का कुशल, दक्ष, दूरदर्शी और प्रभावी नेतृत्व प्राप्त है।  </div>
<div>  </div>
<div>25 -30 नवंबर  2024 तक दिल्ली में पांच दिनी अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन ( आइसीए ) के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146602/iffco-is-ready-for-the-global-conference-of-international-cooperative"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/img_20241124_195810.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली। </strong>वैश्विक सहकारी आंदोलन के 130 साल के इतिहास में इफको ( Indian Farmers Fertiliser Cooperative ) के नेतृत्व में भारत पहली बार सहकारिता के वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है। जून 2023 में इफको के प्रबंध निदेशक, सीईओ डॉ उदय शंकर अवस्थी के प्रयास से ही आईसीए ने निमंत्रण स्वीकार करते हुए 2024 में पहली बार भारत को इसकी मेजबानी का जिम्मा सौंपा । इस सम्मेलन को डॉ उदय शंकर अवस्थी  का कुशल, दक्ष, दूरदर्शी और प्रभावी नेतृत्व प्राप्त है।  </div>
<div> </div>
<div>25 -30 नवंबर  2024 तक दिल्ली में पांच दिनी अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन ( आइसीए ) के वैश्विक सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी  सोमवार, 25 नवंबर, 2024 को ' संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 ' का शुभारंभ करेंगे । केंद्रीय सहकारिता मंत्री , नीति पुरुष,   अमित शाह 25 नवंबर को इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहेंगे और वैश्विक सहकारी सम्मेलन के उद् घाटन  सत्र की अध्यक्षता करेंगे। </div>
<div> </div>
<div>इस सम्मेलन में लगभग 3,000 प्रतिनिधि भाग लेंगे जिनमें 1,000 विदेशी प्रतिनिधि होंगे। भूटान के प्रधानमंत्री दाशो शेरिंग तोबगे और फिजी के उप प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका भी इस सम्मेलन में सम्मानित अतिथि होंगे। सम्मेलन में 100 से अधिक देश भाग ले रहे हैं। यह आयोजन भारतीय सहकारी समितियों की ताकत दिखाने का अवसर होगा। भारत में आठ लाख सहकारी समितियां हैं।</div>
<div> </div>
<div>यह कार्यक्रम कार्बन-मुक्त होगा और देशभर में 10,000 पीपल के पेड़ लगाए गए हैं। इस कार्यक्रम में शाकाहारी भोजन ही अतिथियो को परोसा जाएगा एवं कार्यक्रम मदिरारहित होगी।इस कार्यक्रम का विषय होगा ' सहकारिता से सभी की समृद्धि का निर्माण'। उप-विषय होंगे - ' सक्षम नीति और उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र ' ,  ' सभी के लिए समृद्धि का सृजन करने के लिए उद्देश्यपूर्ण नेतृत्व का पोषण ' , ' सहकारी पहचान की पुनः पुष्टि ' और ' भविष्य को आकार देना: 21वीं सदी में सभी के लिए समृद्धि का एहसास करना'।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 25 Nov 2024 16:37:53 +0530</pubDate>
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