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                <title>bombay High Court - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>bombay High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>जजों को भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठता है: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173063/even-judges-do-not-know-where-the-collegium-sits-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supreme-court-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और यह कहाँ मिलता है।उन्होंने कहा, "आपको यह जानकर हैरानी होगी कि न केवल हम जानते हैं कि क्या हो रहा है... हमें यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठ रहा है।"</p><p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता, जो पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान, ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया की कमी का मतलब था कि जजों को अपने सामने पेश होने वाले वकीलों के अपने असेसमेंट पर निर्भर रहना पड़ता था।उन्होंने कहा, “बॉम्बे हाई कोर्ट में, क्योंकि कोई ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया नहीं था, इसलिए हमने अपने सामने वकीलों के परफॉर्मेंस का असेसमेंट किया।”</p><p style="text-align:justify;">बाद में जज बनी महिलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:“जस्टिस शंपा सरकार, जस्टिस अमृता सिन्हा, जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य, जब मैं वहां (कलकत्ता हाई कोर्ट) था तो मैंने जिस तरह की पूछताछ की… अब मुझे यकीन है कि वे सभी वकीलों को संभाल सकती हैं।”जस्टिस दत्ता ने ज्यूडिशियरी में महिलाओं के रिप्रेजेंटेशन पर बातचीत को सिर्फ नंबरों तक सीमित करने के खिलाफ चेतावनी दी।</p><p style="text-align:justify;">“जब  समय का एक किस्सा भी सुनाया जब उन्होंने एक महिला वकील के प्रमोशन के सुझाव को मना कर दिया था।“एक जज ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि छह लोगों के नाम रिकमेंड किए जा रहे हैं। महिला के नाम क्यों नहीं? मैंने उस जज से कहा नहीं। मैंने कहा कि वह वकील मेरे सामने पेश हुई और वह नासमझ है और मुझे उसे मैच्योर होने के लिए समय देना होगा।”</p><p style="text-align:justify;">जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस गीता मित्तल ने रविवार को खुलकर उन चुनौतियों के बारे में बात की जिनका सामना महिलाओं को ज्यूडिशियरी में आने और आगे बढ़ने में करना पड़ता है।</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने कहा, "एक पुराना क्लाइंट आया और जब मैं आगे बढ़ी तो उसने कहा 'अरे यह सब लड़की दुल्हन मत दीजिए'। फिर एक पुरुष सहकर्मी उसके साथ चला गया। अगर मैंने तब आपत्ति जताई होती, तो यह खत्म हो गया होता।"</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने आगे कहा कि महिला वकीलों को मेंटरशिप की कमी, सैलरी में अंतर और कोर्टरूम के अंदर के रवैये जैसी दूसरी रुकावटों का भी सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, “मेंटरिंग की कमी है और उन्हें अच्छे सीनियर नहीं मिलते। फिर स्ट्रक्चरल पेमेंट का मुद्दा है। उनसे पूछा जाता है ‘कितना काम लेती हो? इतना तो पॉकेट मनी देंगे’। तो यह एक और मुद्दा है। फिर कोर्टरूम बायस आता है। जजों ने भी कई बार हमें गंभीरता से नहीं लिया है।”</p><h4 style="text-align:justify;"><strong> 12 लाख पेंडिंग केस, जज महज 110, 'भूखा और थका हूं' कहने वाले जज की क्या है मजबूरी</strong></h4><p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट मुकदमों के बोझ तले दबा हुआ है. यहां नए-पुराने करीब 12 लाख केसेज पेंडिंग हैं. इनमें कई पुराने मुकदमे ऐसे हैं जिनका नए मुकदमों के बीच नंबर ही नहीं आ रहा है. मतलब साफ है न्याय के लिए लंबी वेटिंग चल रही है.<br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 22:57:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दिल्ली-बॉम्बे हाईकोर्ट को मिली बम से उड़ाने की धमकी, पुलिस ने बढ़ाई सुरक्षा व्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
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<div>दिल्ली हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद परिसर की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ दी गई है। जानकारी के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को एक ईमेल के जरिए बम की धमकी मिली थी। इस मामले की जानकारी मिलते ही दिल्ली पुलिस ने अदालत के पूरे परिसर की जांच की और गेट पर अतिरिक्त सुरक्षा बल लगा दिया।</div>
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<div>इस मामले को लेकर दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के महापंजीयक को बुधवार को उनके आधिकारिक अकाउंट में ईमेल मिला। बलवंत देसाई नामक व्यक्ति द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154839/68c3fabecab79"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/दिल्ली-बॉम्बे-हाईकोर्ट-को-मिली-बम-से-उड़ाने-की-धमकी,-पुलिस-ने-बढ़ाई-सुरक्षा-व्यवस्था.png" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
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<div>दिल्ली हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद परिसर की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ दी गई है। जानकारी के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को एक ईमेल के जरिए बम की धमकी मिली थी। इस मामले की जानकारी मिलते ही दिल्ली पुलिस ने अदालत के पूरे परिसर की जांच की और गेट पर अतिरिक्त सुरक्षा बल लगा दिया।</div>
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<div>इस मामले को लेकर दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के महापंजीयक को बुधवार को उनके आधिकारिक अकाउंट में ईमेल मिला। बलवंत देसाई नामक व्यक्ति द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के महापंजीयक को 12 फरवरी को भेजे गए ईमेल में आगाह किया गया है कि बृहस्पतिवार को एक बम धमाका होगा और यह दिल्ली में सबसे बड़ा धमाका होगा। ईमेल में लिखा है, ‘‘यह दिल्ली में सबसे बड़ा विस्फोट होगा। मंत्री को भी फोन करो, सबको उड़ा दिया जाएगा।’’ </div>
<div> </div>
<div>इस ईमेल को गंभीरता से लेते हुए प्राधिकारियों ने सुरक्षा बढ़ा दी है। ईमेल के बाद उच्च न्यायालय के प्राधिकारियों ने दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा को एक पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के सक्षम प्राधिकरण ने मामले को गंभीरता से लिया है और आयुक्त से उच्च न्यायालय परिसर में और उसके आसपास सुरक्षा बढ़ाने का अनुरोध किया है। उच्च न्यायालय के प्राधिकारियों ने मामले की विस्तृत जांच कराने और जल्द से जल्द एक रिपोर्ट सौंपने की मांग की है। </div>
<div> </div>
<div>दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर ने कहा कि उच्च न्यायालय के बाहर पहले हुए बम विस्फोट को ध्यान में रखते हुए प्राधिकारी कोई जोखिम नहीं लेना चाहते और सुरक्षा कड़ी कर दी गयी है। उन्होंने बताया कि अदालत के कामकाज में कोई बाधा नहीं है और बार के सदस्य सहयोग कर रहे हैं। माथुर ने बताया कि अदालत परिसर में आ रहे लोगों के पहचान पत्रों की जांच की जा रही है। बार सदस्यों की पहचान करने के लिए बार एसोसिएशन के कर्मचारी भी प्रवेश द्वार पर खड़े हैं।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली उच्च न्यायालय के बाद, बम की आशंका के बाद बॉम्बे उच्च न्यायालय को खाली कराया गया।यह घटनाक्रम दिल्ली उच्च न्यायालय में बम की धमकी के बाद कार्यवाही अचानक रोक दिए जाने के कुछ ही समय बाद हुआ।बम की आशंका के बाद परिसर खाली कराए जाने के बाद शुक्रवार को बॉम्बे उच्च न्यायालय में कार्यवाही बाधित रही।</div>
<div> </div>
<div>वकीलों, वादियों और अदालती कर्मचारियों को एहतियात के तौर पर इमारत छोड़ने के लिए कहा गया और सुरक्षाकर्मियों ने इलाके की घेराबंदी कर दी। बम निरोधक दस्तों को तुरंत जाँच के लिए तैनात किया गया।</div>
<div>पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा तलाशी अभियान शुरू करने के बाद अदालती सुनवाई स्थगित कर दी गई।यह घटनाक्रम शुक्रवार सुबह दिल्ली उच्च न्यायालय में हुई ऐसी ही घटनाओं के तुरंत बाद हुआ है, जब ईमेल के ज़रिए बम की धमकी के बाद कार्यवाही अचानक रोक दी गई थी।</div>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Sep 2025 20:24:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- ईडी कानून अपने हाथ में न ले, जनता को परेशान न करे, एक लाख का दंड।</title>
                                    <description><![CDATA[बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि अब समय आ गया कि ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए और कानून को अपने हाथ में लेकर नागरिकों को परेशान करना बंद करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147737/bombay-high-court-said-ed-should-not-take-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/bombay-high-court.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बॉम्बे</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि अब समय आ गया कि ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए और कानून को अपने हाथ में लेकर नागरिकों को परेशान करना बंद करना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एकल जज जस्टिस मिलिंद जाधव ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह सुनिश्चित करने के लिए 'कड़ा संदेश' भेजा जाना चाहिए कि नागरिकों को परेशान न किया जाए।कोर्ट ने कहा कि ईडी ने जांच शुरू करते हुए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया। केंद्रीय एजेंसियों को कानून के ढांचे के भीतर काम करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने शिकायत के आधार पर अगस्त 2014 में एक विशेष अदालत द्वारा मुंबई स्थित रियल एस्टेट डेवलपर, राकेश जैन को जारी की गई प्रक्रिया (समन/नोटिस) को रद्द कर दिया। जस्टिस जाधव ने कहा, "अब समय आ गया है कि ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियां कानून अपने हाथ में लेना और नागरिकों को परेशान करना बंद कर दें।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जाधव ने कहा कि मैं जुर्माना लगाने के लिए बाध्य हूं, क्योंकि ईडी  जैसी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह कड़ा संदेश भेजे जाने की जरूरत है कि उन्हें कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। वे बिना सोचे-समझे कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते और नागरिकों को परेशान नहीं कर सकते।जज ने कहा कि अब तक यह तय हो चुका है कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर अपने लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया, जिसमें राष्ट्र और समाज के हितों की अनदेखी की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डेवलपर राकेश जैन के खिलाफ विले पार्ले पुलिस स्टेशन में एक संपत्ति खरीदार ने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। ईडी ने पुलिस में की गई शिकायत के आधार पर राकेश जैन के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की थी। जस्टिस जाधव ने अपने फैसले में कहा कि जैन के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है और इसलिए मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप भी नहीं बनता है। यहां बताना जरूरी है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ इसी तरह जमीन हड़पने की पुलिस में शिकायत की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईडी ने उसी आधार पर हेमंत के खिलाफ जांच शुरू की और उन्हें गिरफ्तार तक किया। मामला रांची हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने ईडी की धज्जियां उड़ा दीं। रांची हाईकोर्ट ने भी यही कहा था कि किसी पुलिस शिकायत के आधार पर हेमंत सोरेन के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कैसे की जा सकती है और उन्हें गिरफ्तार कैसे किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस केस में भी हाईकोर्ट ने कहा कि डेवलपर राकेश जैन के खिलाफ शिकायतकर्ता के साथ-साथ ईडी की कार्रवाई साफ तौर पर दुर्भावनापूर्ण है और जुर्माना लगाने की मांग करती है।जस्टिस जाधव ने कहा कि "मैं ई़डी को नसीहत देने के लिए जुर्माना लगाने के लिए मजबूर हूं। क्योंकि ईडी जैसी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को एक कड़ा संदेश देने की जरूरत है कि उन्हें कानून के दायरे के भीतर काम करना चाहिए और वे बिना दिमाग लगाए कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते। नागरिकों को परेशान नहीं कर सकते।“</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने ईडी को चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट लाइब्रेरी को 1 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। पीठ ने मामले में मूल शिकायतकर्ता (खरीदार) पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह लागत शहर स्थित कीर्तिकर लॉ लाइब्रेरी को दी जाएगी। हाईकोर्ट ने समझाया है कि दरअसल मनी लॉन्ड्रिंग अपराध क्या है। अदालत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध एक व्यक्ति द्वारा जानबूझकर डिजाइन करने और अपने लाभ को बढ़ाने के मकसद से, राष्ट्र और समाज के हित की अनदेखी करते हुए किया जाता है। फैसले में कहा गया, "ऐसा देखा गया है कि मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश गोपनीयता से रची जाती है और चुपचाप अंजाम दी जाती है। मेरे सामने मौजूद मामला पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम) को लागू करने की आड़ में उत्पीड़न का एक क्लासिक मामला है।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बहरहाल, ईडी के वकील श्रीराम शिरसाट के अनुरोध पर, हाईकोर्ट ने अपने फैसले पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी ताकि ईडी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर कर सके। ईडी ने अधिकतर मामले इसी तरह दर्ज कर रखे हैं। कई मामले तो ऐसे हैं, जिनमें एफआईआर कई साल पहले दर्ज हुई और ईडी ने उस पर जांच बाद में शुरू की। जाहिर सी बात है कि ईडी ने बिना मकसद वर्षों बाद उस पर जांच नहीं शुरू की होगी। ईडी पर विपक्ष का आरोप है कि वो केंद्र सरकार और बीजेपी के दबाव में काम कर रही है। उसे जो निर्देश ऊपर से मिलता है, उसी के अनुसार वो कार्रवाई करती है। लेकिन अब वो आम जनता के साथ भी इसी तरह पेश आने लगी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला एक खरीदार और डेवलपर के बीच कथित 'समझौते के उल्लंघन' से संबंधित था, जिसमें खरीदार ने उपनगरीय मलाड में इमारत की दो मंजिलों के जीर्णोद्धार के लिए फर्म के साथ समझौता किया था, जो मूल रूप से डेवलपर की क्रॉस होल्डिंग थी। खरीदार ने इस जीर्णोद्धार के लिए 4 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की थी। क्रेता नवनिर्मित भवन की सोसायटी का अध्यक्ष था। उसने अलग से प्रवेश और पार्किंग सुविधाओं के साथ आवासीय होटल या गेस्ट हाउस सुविधा शुरू करने के लिए दो मंजिलें (प्रत्येक में 15 कमरे) अलग से खरीदी थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका के अनुसार, क्रेता और डेवलपर के बीच भवन की दो मंजिलों की बिक्री के संबंध में 6 करोड़ रुपये से अधिक की राशि में दूसरा समझौता हुआ था।दोनों पक्षकारों के बीच यह सहमति बनी थी कि डेवलपर को 30 जुलाई, 2007 को परिसर का कब्जा देना होगा। हालांकि, डेवलपर ने परिसर को अधिभोग प्रमाण पत्र (OC) के साथ सौंपने में विफल रहा, जिसके बारे में डेवलपर ने कहा कि यह क्रेता के निर्देश पर किए गए जीर्णोद्धार में बड़े संशोधनों और पूरे भवन में अन्य फ्लैट मालिकों द्वारा किए गए संशोधनों के कारण था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, 'अपरिहार्य' देरी से व्यथित होकर, क्रेता ने मलाड पुलिस स्टेशन में दो बार शिकायत दर्ज कराई, जिसने इस आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया कि विवाद पूरी तरह से नागरिक प्रकृति का था। इसके बाद क्रेता ने अंधेरी में मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दर्ज कराई और विले पार्ले पुलिस स्टेशन को जांच करने का निर्देश देते हुए आदेश प्राप्त किया।विले पार्ले पुलिस स्टेशन ने मार्च 2009 में एफआईआर दर्ज की और उसके बाद अगस्त 2010 में धोखाधड़ी आदि के आरोपों के तहत डेवलपर के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिसंबर, 2012 में विले पार्ले पुलिस स्टेशन ने अपना आरोप पत्र ईडी  को भेज दिया, जिसने उसके बाद डेवलपर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया। ईडी   ने शिकायतकर्ता क्रेता की दलीलों को स्वीकार कर लिया कि डेवलपर ने उसके साथ धोखाधड़ी की, उसने अंधेरी में अलग परियोजना में दो फ्लैट और एक गैरेज भी खरीदा, जिसे डेवलपर ने 'अपराध की आय' (शिकायतकर्ता द्वारा डेवलपर को भुगतान किया गया धन) से खरीदा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दलील को स्वीकार करते हुए ईडी  ने स्पेशल पीएमएलए कोर्ट के समक्ष अपनी रिपोर्ट दाखिल की, जिसने भी इसे स्वीकार कर लिया और बाद में डेवलपर द्वारा अपराध की आय से कथित रूप से खरीदी गई उक्त संपत्तियों को कुर्क करने की अनुमति दी।इसलिए डेवलपर ने विशेष अदालत के इस आदेश को एकल जज के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने इन तथ्यों पर गौर करने के बाद माना कि ED और शिकायतकर्ता क्रेता की ओर से की गई कार्रवाई पूरी तरह से 'दुर्भावनापूर्ण' थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जज ने कहा कि इस मामले के तथ्यों में धोखाधड़ी के कोई भी तत्व मौजूद नहीं हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है जो डेवलपर को बिक्री समझौता करने और किसी अन्य इकाई के माध्यम से उसी परिसर में अतिरिक्त सुविधाएं/नवीनीकरण प्रदान करने के लिए एक साथ समझौते के निष्पादन की अनुमति देने से रोकता हो। मुंबई शहर में विकास इसी तरह होता है।जस्टिस जाधव ने कहा कि डेवलपर्स द्वारा क्रॉस होल्डिंग के माध्यम से खरीदारों के साथ एक साथ समझौते करने की यह प्रथा "सामान्य व्यावसायिक प्रथा है और इसमें कोई दोष नहीं है।"</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>महाराष्ट्र/गोवा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2025 22:00:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बॉम्बे हाईकोर्ट से केंद्र की फैक्ट चेक यूनिट रद्द- 'नियम संशोधन असंवैधानिक'।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>बंबई उच्च न्यायालय ने सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों का पता लगाने का प्रावधान करने वाले संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों को शुक्रवार को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया।जनवरी में एक खंडपीठ ने संशोधित आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर खंडित निर्णय दिया था, जिसके बाद एक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर के पास इस मामले को भेजा गया था।</div>
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<div>फैक्ट चेक यूनिट पर मोदी सरकार को बॉम्बे हाईकोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने शुक्रवार को आईटी नियमों में 2023 के संशोधन को रद्द कर दिया।</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145031/bombay-high-court-cancels-centres-fact-check-unit-rule"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-09/बॉम्बे-हाईकोर्ट-से-केंद्र-की-फैक्ट-चेक-यूनिट-रद्द--&#039;नियम-संशोधन-असंवैधानिक&#039;।.png" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>बंबई उच्च न्यायालय ने सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों का पता लगाने का प्रावधान करने वाले संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों को शुक्रवार को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया।जनवरी में एक खंडपीठ ने संशोधित आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर खंडित निर्णय दिया था, जिसके बाद एक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर के पास इस मामले को भेजा गया था।</div>
<div> </div>
<div>फैक्ट चेक यूनिट पर मोदी सरकार को बॉम्बे हाईकोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने शुक्रवार को आईटी नियमों में 2023 के संशोधन को रद्द कर दिया। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार फैक्ट चेक यूनिट नहीं बना सकती है। इन संशोधित नियमों से ही केंद्र सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसके कामकाज के बारे में 'फर्जी और भ्रामक' सूचनाओं की पहचान करने और उन्हें खारिज करने के लिए फैक्ट चेक यूनिट बनाने की मंजूरी मिली थी।</div>
<div> </div>
<div>न्यायमूर्ति चंदुरकर ने शुक्रवार को कहा कि ये नियम संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मैंने इस मामले पर गहनता से विचार किया है। विवादित नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 19(1)(जी) (व्यवसाय की स्वतंत्रता और अधिकार) का हनन करते हैं।’’उन्होंने कहा कि नियमों में ‘‘फर्जी, झूठा और भ्रामक’’ अभिव्यक्ति किसी परिभाषा के अभाव में ‘‘अस्पष्ट और इस तरह गलत’’ है।</div>
<div> </div>
<div>इस फैसले के साथ, उच्च न्यायालय ने हास्य कलाकार कुणाल कामरा और अन्य द्वारा नये नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। इन नियमों में, सरकार के बारे में फर्जी या झूठी सामग्री की पहचान करने के लिए एक तथ्य जांच इकाई (एफसीयू) स्थापित करने का प्रावधान भी शामिल है।</div>
<div>जनवरी में न्यायमूर्ति गौतम पटेल और एन. गोखले की खंडपीठ द्वारा खंडित फैसला सुनाए जाने के बाद आईटी नियमों के खिलाफ याचिकाएं न्यायमूर्ति चंदुरकर के पास भेज दी गई थीं।न्यायमूर्ति पटेल ने कहा था कि ये नियम ‘सेंसरशिप’ के समान हैं, लेकिन न्यायमूर्ति गोखले ने कहा था कि इनका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। न्यायमूर्ति चंदुरकर ने शुक्रवार को कहा कि वह न्यायमूर्ति पटेल (अब सेवानिवृत्त) द्वारा दी गई राय से सहमत हैं।</div>
<div> </div>
<div>केंद्र सरकार ने 6 अप्रैल 2023 को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 में संशोधनों को लागू किया था, जिसमें सरकार से संबंधित फर्जी, झूठी या भ्रामक ऑनलाइन सामग्री को चिह्नित करने के लिए ‘एफसीयू’ का प्रावधान किया जाना भी शामिल था।</div>
<div>याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ये दोनों नियम धारा 79 के विरुद्ध हैं जो मध्यस्थों को तीसरे पक्ष की सामग्री के खिलाफ कार्रवाई से बचाता है और आईटी अधिनियम 2000 की धारा 87(2)(जेड) और (जेडजी) के विरुद्ध हैं। इसके अलावा तर्क दिया गया कि वे नियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत नागरिकों को 'कानून के तहत समान सुरक्षा' और अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(जी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करने वाले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।</div>
<div> </div>
<div>अपनी याचिका में कुणाल कामरा ने कहा कि वह एक राजनीतिक व्यंग्यकार हैं, जो अपनी सामग्री साझा करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर निर्भर हैं और नियमों के कारण उनकी सामग्री पर मनमाने ढंग से सेंसरशिप हो सकती है।याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नियम संशोधन से सामग्रियों पर मनमाने ढंग से सेंसरशिप हो सकती है क्योंकि इन्हें रोका जा सकता है, हटाया जा सकता है, या उनके सोशल मीडिया खातों को निलंबित या निष्क्रिय किया जा सकता है।हालाँकि, सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने दावा किया था   कि यह जनहित में होगा कि सरकार के कामकाज से जुड़ी प्रामाणिक जानकारी का पता लगाया जाए और उसे सरकारी एजेंसी द्वारा फैक्ट चेक के बाद प्रसारित किया जाए ताकि बड़े पैमाने पर जनता को होने वाले संभावित नुकसान को रोका जा सके।</div>
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<div class="nr wR">
<div class="amn"><span class="ams bkH">Reply</span><span class="ams bkI">Reply all</span><span class="ams bkG">Forward</span>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Sep 2024 16:18:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रेस की आजादी को खतरे में डालने वाली केंद्रीय अधिसूचना पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई।</title>
                                    <description><![CDATA[बॉम्बे हाई कोर्ट  के अंतिम निर्णय तक रोक लागू रहेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/139735/the-supreme-court-put-a-stay-on-the-central-notification"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-03/asfsd2.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो।</strong></div>
<div><strong>जेपी सिंह।</strong></div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी है, जिसमें फैक्ट चेक यूनिट लागू करने का आदेश जारी किया था। यह रोक तब तक लागू रहेगी, जब तक बॉम्बे हाईकोर्ट आईटी नियम संशोधन 2023 की चुनौतियों पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता। सरकार के इलेक्ट्रोनिक्स और आईटी मंत्रालय ने 20 मार्च को ही आईटी (संशोधन) कानून के तहत फैक्ट चेक यूनिट के नियम लागू करने की अधिसूचना जारी की थी। आईटी संशोधन कानून 2023 के नियमों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले तक फैक्ट चेक यूनिट के नोटिफिकेशन पर रोक लगाने का आदेश दिया है। सरकार ने आईटी संशोधन कानून के तहत सोशल मीडिया पर कंटेंट की निगरानी के लिए फैक्ट चेक यूनिट का गठन किया था।  </div>
<div> </div>
<div>दरअसल, इसकी अधिसूचना की आड़ में प्रेस की आजादी लेकर तमाम चिंताएं जताई जा रही थीं। भारत के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है। हालाँकि, अदालत ने मामले की मेरिट पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।।</div>
<div> </div>
<div>फैक्ट चेक यूनिट सरकार की तरफ से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, एक्स या इंस्टाग्राम आदि पर कंटेंट की निगरानी करेगी और ये यूनिट किसी जानकारी को फर्जी या गलत बता सकती है। फैक्ट चेक यूनिट की आपत्ति के बाद उस कंटेंट या पोस्ट को सोशल मीडिया से हटाना होगा और इंटरनेट से उसका यूआरएल भी ब्लॉक करना होगा। फैक्ट चेक यूनिट एक नोडल एजेंसी होगी।</div>
<div> </div>
<div>केंद्र ने अप्रैल 2023 में फैक्ट चेक यूनिट के लिए नियम जारी किए, लेकिन कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और कुछ अन्य मीडिया संगठनों द्वारा नियमों को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद इसे आधिकारिक रूप से अधिसूचित करने पर रोक लगा दी गई।</div>
<div> </div>
<div>हालाँकि, इस महीने की शुरुआत में, अदालत ने फैक्ट चेक यूनिट की स्थापना पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और शीर्ष अदालत ने 21 मार्च को एफसीयू अधिसूचना पर स्टे लगा दिया।</div>
<div>अदालत ने गुरुवार को कहा कि "हमारा विचार है कि अंतरिम राहत के आवेदन की अस्वीकृति के बाद 20 मार्च, 2024 की अधिसूचना पर रोक लगाने की जरूरत है। 3(1)(बी)(5) की वैधता को चुनौती में गंभीर संवैधानिक प्रश्न और प्रभाव शामिल हैं। जिसमें भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी पर नियम का हाईकोर्ट द्वारा विश्लेषण करने की आवश्यकता है।"</div>
<div> </div>
<div>फैक्ट चेक यूनिट को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा 2021 के आईटी नियमों के तहत अधिसूचित किया गया था। अधिसूचना में कहा गया था कि यह नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगी कि केंद्र सरकार से संबंधित कोई भी जानकारी "फर्जी समाचार" या "गलत सूचना" है या नहीं। पीआईबी वेबसाइट के अनुसार, इस इकाई का नेतृत्व भारतीय सूचना सेवा (आईआईएस) के एक वरिष्ठ महानिदेशक/अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के अधिकारी द्वारा किया जाता है और इसके दैनिक कार्यों को विभिन्न स्तरों पर आईआईएस अधिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वेबसाइट में कहा गया है, "यूनिट पीआईबी के प्रधान महानिदेशक को रिपोर्ट करती है जो भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता के रूप में कार्य करते हैं।"</div>
<div> </div>
<div>इस अधिसूचना का सबसे आपत्तिजनक नियम यह है कि अगर किसी खबर, ऑनलाइन कंटेंट, वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट को सरकार यानी एफसीयू फ्लैग कर देती या आपत्ति जता देती है तो इसे पोस्ट करने वाले के पास इसे हटाने या अस्वीकार करने का विकल्प होता है। दूसरा विकल्प अपनाने यानी अस्वीकार करने पर, मध्यस्थ कानूनी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होता है। इस नियम से यह साफ है कि जो खबर, रिपोर्ट, वीडियो, ट्वीट सरकार के खिलाफ है, सरकार की यह यूनिट उस पर आपत्ति जता सकती है और फिर उस पर कार्रवाई भी हो सकती है।</div>
<div> </div>
<div> </div>
<div><strong>सुप्रीम कोर्ट  न्यायालय ने कहा कि नियमों को चुनौती "गंभीर संवैधानिक प्रश्न" उठाती है।</strong></div>
<div> </div>
<div>कोर्ट ने कहा, "2023 में संशोधित नियम 3(1)(बी)(v) का भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रभाव हाईकोर्ट द्वारा विश्लेषण के लिए रखा जाएगा।  याचिका में आईटी संशोधन कानून के नियमों को असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया। एडिटर्स गिल्ड का कहना है कि फर्जी खबरें तय करने की पूरी शक्ति सरकार के हाथ में आ जाएगी, जो कि मीडिया की आजादी के विरोध में है।</div>
<div> </div>
<div>बॉम्बे हाईकोर्ट की तीन जजों, जस्टिस जीएस पटेल, जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस चंदूरकर की पीठ फैक्ट चेक यूनिट पर रोक लगाने को लेकर एकमत नहीं सकी और रोक लगाने से इनकार कर दिया। अभी भी फैक्ट चेक यूनिट मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से अब उन्हें राहत मिली है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 21 Mar 2024 21:18:04 +0530</pubDate>
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