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                <title> Supreme Court - Swatantra Prabhat</title>
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                <description> Supreme Court RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>जांच में अनिश्चित देरी स्वीकार नहीं, चार्जशीट में बहुत ज़्यादा विलंब कार्रवाई रद्द करने का आधार: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो, प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20 नवंबर) को एक अहम फैसले में कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में ‘अंतहीन जांच’ स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगे की जांच की अनुमति देने के बाद ट्रायल कोर्ट अपना दायित्व खत्म नहीं मान सकता, बल्कि सप्लीमेंट्री चार्जशीट फाइल करने में हो रही देरी पर जांच एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगना उसकी जिम्मेदारी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">11 साल से लंबित जांच, IAS अधिकारी को मिली राहत</h3>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने एक मामले में 11 साल से लंबित आगे की जांच को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161202/indefinite-delay-in-investigation-is-not-acceptable-excessive-delay-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/चार्जशीट-में-बहुत-ज़्यादा-विलंब-कार्रवाई-रद्द-करने-का-आधार--सुप्रीम-कोर्ट.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो, प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20 नवंबर) को एक अहम फैसले में कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में ‘अंतहीन जांच’ स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगे की जांच की अनुमति देने के बाद ट्रायल कोर्ट अपना दायित्व खत्म नहीं मान सकता, बल्कि सप्लीमेंट्री चार्जशीट फाइल करने में हो रही देरी पर जांच एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगना उसकी जिम्मेदारी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">11 साल से लंबित जांच, IAS अधिकारी को मिली राहत</h3>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने एक मामले में 11 साल से लंबित आगे की जांच को आधार बनाते हुए एक IAS अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी उचित कारण के इतनी लंबी देरी पूरा अभियोजन कमजोर करने के लिए पर्याप्त है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा,<br />“आरोपी को इस अनिश्चित भय में नहीं रखा जा सकता कि जांच अनंत चलती रहेगी और यह उसके रोज़मर्रा के जीवन और अधिकारों पर असर डालेगी।”</p>
<h3 style="text-align:justify;">कोर्ट के प्रमुख निर्देश</h3>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस करोल द्वारा लिखे फैसले में आगे की जांच की प्रक्रिया को ठोस और जवाबदेह बनाने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए:</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>(i) कोर्ट की निगरानी अनिवार्य</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">CrPC की धारा 173(8) के तहत सप्लीमेंट्री चार्जशीट कोर्ट की अनुमति से दायर होती है। इसलिए अनुमति देने के बाद ट्रायल कोर्ट का काम खत्म नहीं होता, बल्कि न्यायिक नियंत्रण बनाए रखना उसका दायित्व है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>(ii) बिना वजह लंबी देरी पर स्पष्टीकरण जरूरी</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">अगर FIR और अंतिम चार्जशीट के बीच असाधारण अंतर हो, या आरोपी इस आधार पर शिकायत करे, तो ट्रायल कोर्ट जांच एजेंसी से कारण पूछने और उसकी वैधता की जांच करने के लिए बाध्य है।<br />कोर्ट ने कहा कि न्याय प्रणाली में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>(iii) जांच अनंत नहीं हो सकती</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने माना कि जांच की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है और सख्त समय सीमा तय करना हमेशा संभव नहीं, लेकिन आरोपी को उचित समय के भीतर स्पष्टता मिलना उसका अधिकार है।<br />अगर बिना ठोस कारण के जांच अनिश्चित काल तक चले, तो आरोपी या शिकायतकर्ता हाईकोर्ट में BNSS की धारा 528 या CrPC की धारा 482 के तहत राहत मांग सकता है—<br />जैसे जांच में अपडेट, या कार्यवाही रद्द करने की मांग।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>(iv) प्रशासनिक निर्णय भी कारणों के आधार पर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि केवल न्यायिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर—जैसे अनुमति या मंजूरी देने वाले अधिकारियों को भी अपने फैसले के कारण स्पष्ट करने होंगे, क्योंकि ऐसे निर्णय आगे कानूनी परिणाम उत्पन्न करते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">निष्कर्ष</h3>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>अनिश्चित जांच अभियोजन को कमजोर करती है,</p>
</li>
<li>
<p>चार्जशीट में बिना वजह लंबी देरी कार्रवाई रद्द करने का आधार बन सकती है,</p>
</li>
<li>
<p>और ट्रायल कोर्ट को पुलिस जांच पर सक्रिय निगरानी रखनी चाहिए।</p>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने इस निर्देश के साथ उक्त IAS अधिकारी की याचिका स्वीकार कर ली।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Nov 2025 21:00:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जानवरों को भी जीने का हक… सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भड़के एनिमल राइट एक्टिविस्ट, जताई नाराज़गी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली | 9 नवंबर 2025</strong><br />सुप्रीम कोर्ट द्वारा शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें डॉग शेल्टर होम में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए जाने के बाद देशभर में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं में नाराज़गी देखी जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पशु अधिकार कार्यकर्ता <strong>अंबिका शुक्ला</strong> समेत कई एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट ने इस फैसले को ‘मानव-केंद्रित’ बताते हुए सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यह आदेश पशु अधिकारों और संवेदनाओं की अनदेखी करता है।</p>
<h3 style="text-align:center;">  </h3>
<h3 style="text-align:center;"><strong>अंबिका शुक्ला बोलीं — “ये कैसा वसुधैव कुटुम्बकम?”</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">रविवार को पत्रकारों से बातचीत में अंबिका शुक्ला ने कहा,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159528/animals-also-have-the-right-to-live%E2%80%A6-animal-rights-activists"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/जानवरों-को-भी-जीने-का-हक…-सुप्रीम-कोर्ट-के-आदेश-पर-भड़के-एनिमल-राइट-एक्टिविस्ट,-जताई-नाराज़गी.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली | 9 नवंबर 2025</strong><br />सुप्रीम कोर्ट द्वारा शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें डॉग शेल्टर होम में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए जाने के बाद देशभर में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं में नाराज़गी देखी जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पशु अधिकार कार्यकर्ता <strong>अंबिका शुक्ला</strong> समेत कई एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट ने इस फैसले को ‘मानव-केंद्रित’ बताते हुए सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यह आदेश पशु अधिकारों और संवेदनाओं की अनदेखी करता है।</p>
<h3 style="text-align:center;"> </h3>
<h3 style="text-align:center;"><strong>अंबिका शुक्ला बोलीं — “ये कैसा वसुधैव कुटुम्बकम?”</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">रविवार को पत्रकारों से बातचीत में अंबिका शुक्ला ने कहा,</p>
<blockquote>
<p>“सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर रोक हटाकर कहा कि प्रदूषण नहीं हटाओ, जानवर हटाओ — ये कैसा वसुधैव कुटुम्बकम है? क्या सिर्फ इंसानों को जीने का हक है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा कि यह आदेश बिना किसी विशेषज्ञ समिति, वैज्ञानिक डेटा या नगरपालिका रिपोर्ट के जारी किया गया है।</p>
<blockquote>
<p>“यह शायद पहला आदेश है जिसके फुटनोट में केवल असत्यापित मीडिया रिपोर्ट्स हैं। कोर्ट में सुनवाई होती है, डेटा और एक्सपर्ट की राय ली जाती है — लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ,” शुक्ला ने कहा।</p>
</blockquote>
<h3 style="text-align:justify;"> </h3>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>दिल्ली में हुआ विरोध प्रदर्शन</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">शनिवार को दिल्ली के झंडेवालान मंदिर के बाहर <strong>दर्जनों पशु प्रेमियों ने विरोध प्रदर्शन</strong> किया। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर कोर्ट के आदेश को वापस लेने की मांग की।</p>
<p style="text-align:justify;">पशु देखभालकर्ता <strong>रितिका शर्मा</strong> ने कहा,</p>
<blockquote>
<p>“यह फैसला ज़मीनी हक़ीक़तों की अनदेखी करता है। इतने सारे जानवरों को रखने के लिए पर्याप्त शेल्टर या प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। उन्हें नसबंदी और भोजन की ज़रूरत है, न कि कैद की।”</p>
</blockquote>
<p style="text-align:justify;">एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा कि रातोंरात हज़ारों जानवरों को सड़कों से हटाना न तो व्यावहारिक है और न मानवीय। सरकार को दीर्घकालिक और मानवीय समाधान निकालना चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> </h3>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जारी आदेश में कहा कि दिल्ली-एनसीआर सहित देशभर के स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और उन्हें निर्दिष्ट डॉग शेल्टर होम में भेजा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नगर निकाय और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) राजमार्गों से आवारा कुत्तों और मवेशियों को हटाने की जिम्मेदारी निभाएं, ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
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                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Nov 2025 21:46:04 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कोई भी गड़बड़ी मिली तो रद्द कर देंगे पूरी प्रक्रिया.. बिहार एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><span style="font-weight:bolder;">  ब्यूरो प्रयागराज।</span></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कड़ी चेतावनी दी है कि यदि बिहार में विशेष गहन संशोधन यानी एसआईआर अभियान में कोई गड़बड़ी या अवैधता साबित हुई तो कोर्ट पूरी प्रक्रिया को रद्द कर देगा। यह चेतावनी बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची के संशोधन को लेकर उठे विवाद के बीच आई है। कोर्ट ने साफ़ कहा कि मतदाता सूची को साफ़-सुथरा रखना ज़रूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल लोगों को वोट देने से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार में चुनाव आयोग ने 24 जून को विशेष गहन संशोधन यानी SIR अभियान की घोषणा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/155250/if-any-disturbance-is-found-the-whole-process-will-be"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/सुप्रीम-कोर्ट.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><span style="font-weight:bolder;"> ब्यूरो प्रयागराज।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कड़ी चेतावनी दी है कि यदि बिहार में विशेष गहन संशोधन यानी एसआईआर अभियान में कोई गड़बड़ी या अवैधता साबित हुई तो कोर्ट पूरी प्रक्रिया को रद्द कर देगा। यह चेतावनी बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची के संशोधन को लेकर उठे विवाद के बीच आई है। कोर्ट ने साफ़ कहा कि मतदाता सूची को साफ़-सुथरा रखना ज़रूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल लोगों को वोट देने से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार में चुनाव आयोग ने 24 जून को विशेष गहन संशोधन यानी SIR अभियान की घोषणा की थी। इसका मक़सद मतदाता सूची को अपडेट करना है, ताकि सभी योग्य मतदाताओं को शामिल किया जा सके और अयोग्य नामों को हटाया जा सके। आयोग का कहना है कि पिछले 20 सालों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए जाने से डुप्लिकेट एंट्रीज की आशंका बढ़ गई है। इस अभियान के तहत 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने हिस्सा लिया, जो 92% से ज्यादा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन विपक्षी दल और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR जैसे चुनाव सुधार में लगे एनजीओ ने आरोप लगाया कि यह अभियान मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उनका कहना है कि इससे करोड़ों गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक मतदाताओं को वोट का हक छीना जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">इस मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई को 7 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने 1 अक्टूबर से पहले सुनवाई की मांग की थी, क्योंकि इस तारीख को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होनी है, लेकिन जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने यह मांग ठुकरा दी। कोर्ट ने कहा कि 28 सितंबर से दशहरा अवकाश के कारण एक सप्ताह के लिए कोर्ट बंद रहेगा, इसलिए सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को आश्वासन दिया कि अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन से मामले के निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, 'अंतिम सूची के प्रकाशन से हमें क्या फर्क पड़ता है? अगर हमें लगता है कि कोई गैर-कानूनी कार्य हुआ है तो हम हस्तक्षेप करेंगे, चाहे सूची अंतिम हो या न हो।' यह बयान एडवोकेट प्रशांत भूषण द्वारा एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से दिए गए तर्कों के जवाब में आया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अपने ही नियमों और मैनुअल का पालन नहीं कर रहा है।प्रशांत भूषण ने दावा किया कि चुनाव आयोग को प्राप्त आपत्तियों को कानूनी रूप से अपलोड करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा।</div>
<div style="text-align:justify;">वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अनुरोध किया कि चुनाव आयोग को दैनिक आधार पर आपत्तियों और दावों का बुलेटिन प्रकाशित करने का निर्देश दिया जाए। इसके जवाब में चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि चुनाव आयोग साप्ताहिक अपडेट दे रहा है, क्योंकि आपत्तियों की जाँच जैसे कठिन कार्य के दौरान दैनिक अपडेट देना संभव नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को उपलब्ध जानकारी को सार्वजनिक डोमेन में रखना चाहिए, क्योंकि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी। उन्होंने कहा, 'जितना संभव हो, आप जो कर रहे हैं, उसे सार्वजनिक डोमेन में लाएं... इससे पारदर्शिता आएगी।' जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग कम से कम प्राप्त आपत्तियों की संख्या को सार्वजनिक कर सकता है। हालाँकि, पीठ ने इन टिप्पणियों को आदेश का हिस्सा नहीं बनाया।</div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.एम. सिंघवी और एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट से मामले की सुनवाई जल्द करने का आग्रह किया। ग्रोवर ने तर्क दिया कि बिहार में नई विधानसभा का गठन 22 नवंबर तक होना है, जिसका मतलब है कि अक्टूबर के मध्य तक चुनाव अधिसूचित हो जाएँगे। इसलिए, प्रभावी हस्तक्षेप के लिए समय बहुत कम है। हालाँकि, पीठ ने 7 अक्टूबर की तारीख़ पर अडिग रहते हुए कहा कि यह कोर्ट के पुन: खुलने के बाद का पहला उपलब्ध दिन है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के SIR को लेकर चल रहे विवाद में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। हालाँकि, याचिकाकर्ताओं की जल्द सुनवाई की मांग को ठुकराते हुए कोर्ट ने 7 अक्टूबर की तारीख़ तय की है। इस मामले में अगली सुनवाई में कोर्ट द्वारा दिए जाने वाले निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट की चेतावनी से चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ गया है। अब देखना यह है कि आयोग पारदर्शिता सुनिश्चित करता है या नहीं। यह मामला न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के चुनावी प्रक्रिया पर असर डालेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Tue, 16 Sep 2025 22:23:29 +0530</pubDate>
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                <title>आम आदमी पर फिलहाल आवारा कुत्तों का खतरा बना रहेगा </title>
                                    <description><![CDATA[<div>गाजियाबाद के एक थाने में तैनात बाइक सवार 25 वर्षीय महिला उपनिरीक्षक रिचा शर्मा की बीते दिन बाइक के सामने कुत्ता आ गया हादसे में सिर डिवाइडर से टकराने से उनकी मौत हो गई। यूं तो कमोबेश पूरे देश में आवारा कुत्तों के उत्पात मचाने इंसानों को काटने की शिकायतों की भरमार हो गई है। अदालत के आदेश के बाद देश में समाज दो भाग में बंटा है एक ओर डॉग लवर्स हैं जो रोजाना प्रदर्शन कर रहे हैं दूसरे ओर आवारा कुत्‍तों से परेशान आमजन हैं। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश ने कुत्तों की आजादी बदस्तूर कर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154042/the-common-man-will-be-at-risk-of-stray-dogs"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/आम-आदमी-पर-फिलहाल-आवारा-कुत्तों-का-खतरा-बना-रहेगा.png" alt=""></a><br /><div>गाजियाबाद के एक थाने में तैनात बाइक सवार 25 वर्षीय महिला उपनिरीक्षक रिचा शर्मा की बीते दिन बाइक के सामने कुत्ता आ गया हादसे में सिर डिवाइडर से टकराने से उनकी मौत हो गई। यूं तो कमोबेश पूरे देश में आवारा कुत्तों के उत्पात मचाने इंसानों को काटने की शिकायतों की भरमार हो गई है। अदालत के आदेश के बाद देश में समाज दो भाग में बंटा है एक ओर डॉग लवर्स हैं जो रोजाना प्रदर्शन कर रहे हैं दूसरे ओर आवारा कुत्‍तों से परेशान आमजन हैं। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश ने कुत्तों की आजादी बदस्तूर कर दी डाग लवर खुश हैं लेकिन आम आदमी पर आवारा कुत्तों का खतरा खत्म होने वाला नहीं है। </div>
<div> </div>
<div>आपको पता रहे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर लगातार हो रहे आवारा कुत्तों के हमलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बीते सोमवार 11 अगस्त को बेहद सख़्त निर्देश जारी किए. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हमें सड़कों को पूरी तरह से आवारा कुत्तों से मुक्त बनाना होगा, यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रयास होना चाहिए. अदालत ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नगर निकायों को तुरंत सभी इलाकों से कुत्तों को उठाने और उन्हें शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया।बीते बुधवार को कुत्तों के संबंध में अदालत के आदेश को लेकर पशु प्रेमियों की नाराजगी को देखते हुए स्वयं चीफ जस्टिस बी आर गवई ने इस मामले को स्वयं देखने की बात कही है।</div>
<div> </div>
<div>बीते गुरुवार को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय बैंच न सुनवाई की कपिल सिब्बल और एसजी तुषार मेहता की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया. मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि दिल्ली एनसीआर में आवारा कुत्तों के कारण बच्चों की मौत हो रही है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को सुलझाने की जरूरत है, न कि इस पर विवाद करने की. कोई भी जानवरों से नफरत नहीं करता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक बड़ी टिप्पणी की. उन्होंने भरी अदालत में कहा कि चिकन-मटन खाने वाले आज एनिमल लवर बन गए हैं.नसबंदी और टीकाकरण से न तो रेबीज रुकता है और न ही बच्चों पर हमले. बच्चों की मौतें और विकृति अब भी जारी हैं। </div>
<div> </div>
<div>दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध पूरे देश में फैल गया है, और लखनऊ, पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी और मुंबई जैसे शहरों में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए हैं।रामलीला मैदान के बाहर रविवार को पशुप्रेमियों ने विरोध-प्रदर्शन किया। इस बीच वे "आवारा नहीं हमारा है" जैसे नारे लगाते रहे। वे सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों को एकत्र कर आश्रयस्थलों में रखने वाले आदेश का पुरजोर विरोध करने के लिए यहां एकजुट हुए थे। इस बीच वे बड़े ही आक्रोशित दिखे। उन्होंने कोर्ट के इस निर्णय को पारिस्थितिकी तंत्र पर हमला कहा।</div>
<div> </div>
<div>आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक तल्ख फैसला देते हुए दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी म्युनिसिपलों को कहा है कि आठ हफ्ते के भीतर सडक़ों से हर आवारा कुत्ते को हटा दिया जाए, उनके लिए अलग से शेल्टर बनाए जाएं, और एक बार शेल्टर भेजने के बाद वे सडक़ों पर वापिस न आ सकें। दो जजों की बेंच बच्चों पर आवारा कुत्तों के हमलों की खबरों को देखकर खुद संज्ञान लेकर इस मामले पर सुनवाई कर रही थी, और अदालत ने पशुप्रेमी संगठनों से भी कहा कि कोई व्यक्ति इस आदेश पर अमल के बीच में न आए, वरना उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। अब मीलार्ड के आदेश पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और पशु हित रक्षक संगठन कड़ा ऐतराज जता रहे हैं। </div>
<div> </div>
<div>आपको बता दें कि अदालत के सामने आए आंकड़ों में बताया गया है कि दिल्ली में 10 लाख कुत्ते हैं, और पिछले बरस 68 हजार लोगों को कुत्तों ने काटा था।देश भर में कुत्तों की तादाद तेजी से बढ़ रही है और करीब पांच करोड़ तक पहुंच है। कमोबेश देश भर में आवारा कुत्तों के हमले में छोटे बच्चे रोजाना जान गंवा रहे हैं देश भर में कुत्ते रोजाना 25000 लोगों को काट रहे हैं यानी हर मिनट 415 लोग कुत्तों के शिकार बन जाते हैं जबकि दिल्ली में ही रोजाना 2000 से अधिक लोगों को कुत्ते काट लेते हैं। दुनिया में रैबीज से होने वाली मौतों में से 36प्रतिशत भारत में होती हैं। हाल ही में कुत्ते के काटने के बाद कबड्डी खिलाडी ब्रजेश सोलंकी की रैबीज से बेहद दर्दनाक मौत हो गई।</div>
<div> </div>
<div>यह मामला जानवरों और इंसानों के सहअस्तित्व का है। दसियों हजार बरस पहले इंसानों ने शायद एक जंगली नस्ल को पालकर उसे घरेलू और पालतू बनाया, और वह इंसान के सबसे वफादार प्राणी बन गए। लेकिन यह बात इंसानों के पाले हुए कुत्तों तक तो सीमित थी, जब सडक़ों पर बिना किसी घरवाले कुत्ते बढ़ने लगे, तो जाहिर है कि न तो उनका टीकाकरण हो सका, और न ही बधियाकरण। नतीजा यह निकला कि कुत्तों में पैदाइश के हर मौसम में आबादी बढ़ जाती है, और म्युनिसिपल किसी भी तरह उन पर काबू नहीं पा सकता।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली के आवारा कुत्तों को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स इंडिया (पेटा इंडिया) की पशु स्वास्थ्य विभाग की वरिष्ठ निदेशक डॉ. मिनी अरविंदन की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, "कई कम्युनिटीज आसपास रहने वाले कुत्तों को परिवार मानते हैं, और कुत्तों को विस्थापित करना और जेल में डालना वैज्ञानिक नहीं है और कभी कारगर नहीं रहा है. 2022-23 में किए गए एक जनसंख्या सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली में लगभग 10 लाख कम्युनिटी कुत्ते हैं, जिनमें से आधे से भी कम की नसबंदी की गई है. दिल्ली की सड़कों से लगभग 10 लाख कम्युनिटी कुत्तों को जबरन हटाने से उन कम्युनिटीज में खलबली मच जाएगी, जो उनकी गहरी परवाह करते हैं. इसके साथ ही कुत्तों में भी बड़े पैमाने पर अराजकता और पीड़ा होगी.</div>
<div> </div>
<div>"मिनी अरविंदन के बयान में आगे कहा गया कि अंततः इससे कुत्तों की आबादी पर अंकुश लगाने, रेबीज़ कम करने या कुत्तों के काटने की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिलेगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि पर्याप्त संख्या में कुत्तों के आश्रय स्थल बनाना असंभव है और कुत्तों को विस्थापित करने से कुत्तों के बीच क्षेत्र को लेकर झगड़े और भुखमरी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं. अंततः, कुत्ते फिर से उन्हीं क्षेत्रों में लौट आते हैं, खासकर जब पिल्ले पैदा होते रहते हैं. इसीलिए, सरकार ने 2001 से कम्युनिटी कुत्तों की नसबंदी अनिवार्य कर दी है।</div>
<div> </div>
<div>एक ऐसी प्रक्रिया, जो उन्हें शांत करती है और इस दौरान उन्हें रेबीज़ का टीका भी लगाया जाता है.पेटा इंडिया ने कहा कि अगर दिल्ली सरकार ने कुत्तों की नसबंदी के लिए एक प्रभावी कार्यक्रम लागू किया होता, तो आज सड़कों पर शायद ही कोई कुत्ता होता।  आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन कुत्तों को पकड़ने या इकट्ठा करने में बाधा डालेगा, तो उस पर अवमानना की कार्रवाई होगी.  सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि हम कुछ कुत्ते प्रेमियों की वजह से अपने बच्चों की बलि नहीं चढ़ा सकते।</div>
<div> </div>
<div>आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि नसबंदी वाले या बिना नसबंदी वाले सभी कुत्तों को सड़कों से हटाया जाए. खासकर संवेदनशील इलाकों और घनी आबादी वाले शहरों में यह काम प्राथमिकता पर हो.  अगर इसके लिए कोई स्पेशल फोर्स बनानी पड़े, तो तुरंत बनाई जाए.  अदालत ने कहा कि फिलहाल किसी भी नियम को भूल जाइए, हमें सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित करना है. इधर सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को लेकर पशु प्रेमी पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने अदालत की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इस आदेश को अव्यावहारिक, वित्तीय लिहाज से अनुपयुक्त और क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन के लिए संभावित रूप से हानिकारक करार दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की समस्या को बेहद गंभीर बताते हुए दिल्ली सरकार और नगर निकायों को सभी इलाकों से आवारा कुत्तों को जल्द से जल्द उठाने और आश्रय स्थलों में रखने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस अभियान में बाधा डालने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी।</div>
<div> </div>
<div>पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने कहा कि इस काम की जटिलता इसे 'अव्यावहारिक' बनती है। उन्होंने कहा, 'दिल्ली में तीन लाख आवारा कुत्ते हैं। उन सभी को सड़कों से हटाने के लिए आपको 3,000 पालतू जानवरों के लिए आश्रय स्थल बनाने होंगे, जिनमें से प्रत्येक में जल निकासी, पानी, शेड, रसोई और चौकीदार की व्यवस्था हो। इस पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। क्या दिल्ली के पास इसके लिए 15,000 करोड़ रुपये हैं?'इनके पालन पोषण रखरखाव के लिए हर हफ्ते पांच करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। उन्होंने आगाह किया कि आवारा कुत्तों को हटाने से नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं और इससे जनता में आक्रोश भी फैल सकता है। मेनका ने फैसले की वैधता पर भी सवाल उठाया।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा कि एक महीने पहले ही शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ ने इसी मुद्दे पर एक फैसला सुनाया था।उन्होंने कहा, '48 घंटों के भीतर गाजियाबाद और फरीदाबाद से तीन लाख कुत्ते आ जाएंगे, क्योंकि दिल्ली में खाना उपलब्ध है और जैसे ही आप कुत्तों को हटाएंगे, बंदर सड़क पर आ जाएंगे... मैंने अपने घर में भी ऐसा होते देखा है। 1980 के दशक में पेरिस में, जब कुत्तों और बिल्लियों को हटाया गया, तो शहर चूहों से भर गया था।'बहरहाल कुत्तों की समस्या को लेकर शीर्ष अदालत और पशु प्रेमियों के अलग अलग तर्क है। दोनों ही पक्षों को मिल कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाधान निकालना चाहिए  ताकि कुत्ते और इंसान  दोनों ही सुरक्षित जीवन जी सकें? नगर निगम प्रशासन और समाज के सामूहिक प्रयास से यह संभव हो सकता है।
<div> </div>
</div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Aug 2025 18:16:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बांके बिहारी मंदिर: सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश लाने में यूपी सरकार की जल्दबाज़ी पर सवाल उठाए, ।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 अगस्त) को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृंदावन, मथुरा स्थित बांके बिहारी मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास अध्यादेश, 2025 जारी करने की "बेहद जल्दबाज़ी" पर सवाल उठाया। कोर्ट ने उस "गुप्त तरीके" पर भी असहमति जताई, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार ने दीवानी विवाद में आवेदन दायर करके कॉरिडोर विकास परियोजना के लिए मंदिर के धन के उपयोग की अनुमति 15 मई के फैसले के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त की।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने मौखिक रूप से 15 मई के फैसले में दिए</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153685/the-banke-bihari-temple-supreme-court-raised-questions-on-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/supreme-court-of-india.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 अगस्त) को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृंदावन, मथुरा स्थित बांके बिहारी मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास अध्यादेश, 2025 जारी करने की "बेहद जल्दबाज़ी" पर सवाल उठाया। कोर्ट ने उस "गुप्त तरीके" पर भी असहमति जताई, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार ने दीवानी विवाद में आवेदन दायर करके कॉरिडोर विकास परियोजना के लिए मंदिर के धन के उपयोग की अनुमति 15 मई के फैसले के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने मौखिक रूप से 15 मई के फैसले में दिए गए उन निर्देशों को वापस लेने का प्रस्ताव रखा, जिनमें राज्य को मंदिर के धन का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने मंदिर के प्रबंधन की निगरानी के लिए रिटायर हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति गठित करने का भी प्रस्ताव रखा, जब तक कि अध्यादेश की वैधता पर हाईकोर्ट द्वारा निर्णय नहीं लिया जाता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कल तक के लिए स्थगित कर दी ताकि एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज खंडपीठ द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों पर सरकार से निर्देश प्राप्त कर सकें।</div>
<div style="text-align:justify;">पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि वह अध्यादेश को चुनौती देने के लिए संबंधित पक्षों को हाईकोर्ट में भेज देगी। इस बीच, मंदिर का प्रबंधन रिटायर जज की अध्यक्षता वाली समिति के अधीन रहेगा। न्यायालय ने कहा कि परिवार द्वारा मंदिर के अनुष्ठान पहले की तरह जारी रहेंगे। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि कलेक्टर और अन्य अधिकारी भी समिति का हिस्सा होंगे। न्यायालय ने आगे प्रस्ताव दिया कि क्षेत्र के समग्र विकास के लिए एएसआई को भी समिति से जोड़ा जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बांके बिहारी मंदिर के पूर्व प्रबंधन की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने दलील दी कि अध्यादेश ने गोस्वामियों, जो पहले मंदिर का प्रबंधन कर रहे थे, उनको हटा दिया और प्रबंधन का दायित्व सरकार के नियंत्रण वाले एक ट्रस्ट को सौंप दिया। दीवान ने सुप्रीम कोर्ट के 15 मई के फैसले पर भी आपत्ति जताई, जिसमें सरकार को कॉरिडोर विकास परियोजना के लिए मंदिर के धन का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा कि ये निर्देश "प्रबंधन की पीठ पीछे" दिए गए, क्योंकि उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो संप्रदायों के बीच एक निजी विवाद से संबंधित मामले में आया था। उन्होंने कहा कि राज्य ने निजी विवाद में हस्तक्षेप किया और मंदिर के धन के उपयोग के आदेश प्राप्त किए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दीवान ने "यथास्थिति" के आदेश पर ज़ोर दिया और राज्य द्वारा तत्काल अध्यादेश जारी करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया। दीवान ने दलील दी, "मुझे आज यथास्थिति चाहिए। सैकड़ों सालों से यह चल रहा है... और अचानक राज्य अध्यादेश पारित कर देता है... अध्यादेश आपातकालीन उपायों के लिए होता है।"</div>
<div style="text-align:justify;">इस मौके पर जस्टिस कांत ने राज्य की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से पूछा कि 15 मई के फैसले को कैसे उचित ठहराया जा सकता है, जब प्रभावित पक्षों की बात नहीं सुनी गई। जस्टिस कांत ने पूछा, "आप अदालत के निर्देश को कैसे उचित ठहराते हैं? जब वे पक्षकार ही नहीं थे?" एएसजी नटराज ने जवाब दिया कि यह सार्वजनिक मंदिर है और जिन लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है, उन्हें प्रबंधन समिति का सदस्य नहीं माना जाता। हालांकि, जस्टिस कांत ने प्रभावित पक्षों को बिना कोई सूचना दिए निर्देश जारी करने के तरीके पर अपनी असहमति जताई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस कांत ने कहा, "इस न्यायालय के समक्ष जो मामला है, वह बांके बिहारी मंदिर से संबंधित नहीं है। एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया जा सकता है...क्या न्यायालय द्वारा नियुक्त कोई रिसीवर है? यह नो मैन्स लैंड का मामला नहीं है। मंदिर की ओर से किसी की सुनवाई होनी है। अगर सिविल जज निगरानी कर रहे हैं तो सिविल जज को नोटिस जारी किया जा सकता है... इस न्यायालय द्वारा कोई सार्वजनिक नोटिस जारी किया जाना चाहिए... कि युद्धरत समूहों के बीच लंबित विवाद के कारण... हम यही प्रस्ताव दे रहे थे...मंदिर के धन का उपयोग तीर्थयात्रियों के लिए किया जाना चाहिए, इसे निजी व्यक्तियों द्वारा हड़पा नहीं जा सकता।"</div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस कांत ने कहा कि राज्य ने "गुप्त तरीके से" आवेदन दायर किया जो अस्वीकार्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जज ने पूछा कि राज्य ने मुआवज़ा देने के बाद कानून के अनुसार ज़मीन का अधिग्रहण क्यों नहीं किया। जस्टिस कांत ने कहा, "अगर राज्य कोई विकास कार्य करना चाहता है तो कानून के अनुसार उसे ऐसा करने से किसने रोका? ज़मीन निजी है या नहीं, इस मुद्दे पर अदालत फ़ैसला सुना सकती है... राज्य गुप्त रूप से आगे आ रहा है, उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दे रहा... हमें इसकी उम्मीद नहीं है... राज्य को पूरी निष्पक्षता से उन्हें सूचित करना चाहिए है।" जस्टिस कांत ने राज्य से पूछा, "अध्यादेश लाने की इतनी जल्दी क्या थी?" उन्होंने स्वर्ण मंदिर के आसपास के क्षेत्र के विकास का उदाहरण देते हुए आस-पास के निवासियों की ज़मीनें अधिग्रहित करने का उदाहरण दिया और पूछा कि इस मामले में ऐसा ही तरीका क्यों नहीं अपनाया जा सकता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">2025 के उत्तर प्रदेश अध्यादेश में मंदिर प्रशासन को एक वैधानिक ट्रस्ट सौंपने की बात कही गई। इसके अनुसार, मंदिर का प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं की ज़िम्मेदारी 'श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास' द्वारा संभाली जाएगी। 11 न्यासी मनोनीत किए जाएंगे, जबकि अधिकतम 7 सदस्य पदेन हो सकते हैं। सभी सरकारी और गैर-सरकारी सदस्य सनातन धर्म के अनुयायी होंगे। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">28 जुलाई को सूचीबद्ध एक याचिका की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन समिति से यह पता लगाने को कहा कि पूरे भारत में कितने मंदिरों का प्रबंधन कानूनों के माध्यम से अपने अधीन किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Aug 2025 21:11:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विदेश भागी फर्स्ट फ्लाईट कोरियर से बकाया के इंतजार में अबतक दर्जनों कर्मचारियों की मौत, एच एम के पी ने फिर लिखा पीएम को पत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>कानपुर।</strong> फर्स्ट फ्लाइट कोरियर प्रबंधकों द्वारा योजना बद्ध तरीके से करोड़ों की संपत्ति बेचने के बाद विदेश भाग जाने से अहमदाबाद ,बेंगलुरु, चेन्नई ,कोयंबटूर , गुवाहाटी, हैदराबाद, मुंबई, पुणे ,जमशेदपुर, जयपुर, इंदौर , लखनऊ, दिल्ली, नोएडा, लुधियाना, चंडीगढ़ और गुड़गांव आदि के सैकड़ों कर्मचारी भुखमरी से जूझने के लिए मजबूर हैं। </div>
<div>  </div>
<div>यही नहीं न्याय का इंतजार करते-करते अब तक दर्जनों कर्मचारी मौत का भी शिकार हो चुके हैं। जबकि उनके आश्रित भी हाल-बेहाल होकर दर-दर की ठोकरें खाते घूम रहे हैं। अब शेष बचे कर्मचारियों को न्याय दिलाने के लिए हिंद मजदूर किसान पंचायत लगातार कमर कसे हुए है। उसने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147493/dozens-of-employees-have-died-while-waiting-for-dues-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/gsdh.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>कानपुर।</strong> फर्स्ट फ्लाइट कोरियर प्रबंधकों द्वारा योजना बद्ध तरीके से करोड़ों की संपत्ति बेचने के बाद विदेश भाग जाने से अहमदाबाद ,बेंगलुरु, चेन्नई ,कोयंबटूर , गुवाहाटी, हैदराबाद, मुंबई, पुणे ,जमशेदपुर, जयपुर, इंदौर , लखनऊ, दिल्ली, नोएडा, लुधियाना, चंडीगढ़ और गुड़गांव आदि के सैकड़ों कर्मचारी भुखमरी से जूझने के लिए मजबूर हैं। </div>
<div> </div>
<div>यही नहीं न्याय का इंतजार करते-करते अब तक दर्जनों कर्मचारी मौत का भी शिकार हो चुके हैं। जबकि उनके आश्रित भी हाल-बेहाल होकर दर-दर की ठोकरें खाते घूम रहे हैं। अब शेष बचे कर्मचारियों को न्याय दिलाने के लिए हिंद मजदूर किसान पंचायत लगातार कमर कसे हुए है। उसने भेजे जा चुके दर्जनों के क्रम में एक और पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा है, जिसमें कर्मचारियों की पीड़ा से अवगत कराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्याय की मांग की गई है। </div>
<div> </div>
<div>विदेश भाग चुकी फर्स्ट फ्लाइट कोरियर कंपनी कंपनी के खिलाफ कई मामले न्यायालय में भी विचाराधीन हैं लेकिन विदेश भाग जाने की वजह से फर्स्ट फ्लाइट कोरियर प्रबंधकों के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई भी प्रभावहीन साबित हो रही है। वहीं दूसरी ओर बेरोजगार हुए इन सैकड़ों कर्मचारियों को न्याय दिलाने के लिए हिंद मजदूर किसान पंचायत भी लगातार संघर्ष कर रही है। </div>
<div> </div>
<div>कर्मचारियों के हित में न्याय के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र में मजदूर हितों के संघर्ष में अग्रणी हिन्द मजदूर किसान पंचायत के राष्ट्रीय सचिव व प्रदेश महामंत्री राकेश मणि पाण्डेय ने बताया कि इस कोरियर कंपनी के खिलाफ 2022 से लगातार प्रार्थना पत्र भी दिए जा रहे हैं लेकिन उन पर भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। </div>
<div> </div>
<div>हिन्द मजदूर किसान पंचायत के राष्ट्रीय सचिव व प्रदेश महामंत्री राकेश मणि पाण्डेय ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में यह भी बताया है कि फर्स्ट फ्लाइट कोरियर कंपनी के मालिकान तुषार ओम, प्रकाश साबू और अन्य निदेशक शर्मीला ओम प्रकाश साबो, राज कुमार साबू , भरत जमनादास , हिम्मत सिंह लगड़ और सुप्रिया राजकुमार अग्रवाल आदि पीड़ित कर्मचारियों की समस्त देनदारियों को लेकर भारत की चल अचल सम्पत्तियों को बेचते हुए या फिर फ्रैनचाईजी में इस्तेमाल करते हुए विदेश भाग गये हैं ,जहां उनका कार्यालय व कार्य भी चल रहा है।</div>
<div> </div>
<div>फर्स्ट फ्लाईट के खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में वाद भी चलने लेकिन समुचित पते के अभाव में किसी भी तामिली की पुष्टि नहीं हो पाने की भी जानकारी देते हुए श्रमिक नेता राकेश मणि पाण्डेय ने लिखे पत्र में प्रधानमंत्री को यह भी अवगत कराया है कि जब आपके लिखे पत्रों को केन्द्रीय श्रमायुक्त को स्थानान्तरित किया जाता हैं ,तब वहां से सेवायोजकों के वर्तमान वास्तविक पते की मांग की जाती है। जबकि कम्पनी के निदेशकों द्वारा भाग जाने पर उन्हें भारत लाने और देश-विदेश की चल अचल सम्पत्तियों को जब्त कर 15 हजार करोड़ से अधिक की देनदारियों को वसूल कर उन्हें पीड़ित कर्मचारियों को देने की सारी जिम्मेदारी भारत सरकार की ही होती है।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन उसके बाद भी सरकार इस पर कठोरता से कोई कार्यवाही नहीं कर पा रही है ,जिसके फल स्वरुप न्याय का इंतजार करते-करते अबतक सैकड़ों कर्मचारी काल कलवित भी हो चुके हैं और उनके आश्रित बेसहारा होकर दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं। कई मजदूर आंदोलनों की सफल अगुवाई कर चुके चर्चित श्रमिक नेता राकेश मणि पांडेय ने बताया कि लिखे पत्र में प्रधानमंत्री को आगे यह भी अवगत कराया है कि वर्ष 2022 से लेकर अब तक सैकड़ो पत्र ई-मेल आपके यानी पीएमओ के साथ-साथ सभी सम्बन्धित अधिकारियों को प्रेषित किये गये हैं। लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।</div>
<div> </div>
<div>वरिष्ठ श्रमिक नेता राकेश मणि पांडेय ने फर्स्ट फ्लाइट कोरियर कंपनी के बंद होने से संबंधित कोई भी आधिकारिक पत्र आज तक जारी नहीं किए जाने की भी जानकारी देते हुए बताया कि फ्रैंचाइज़ी के आधार पर दूसरों को अधिकृत करते हुए 15 अन्य कम्पनियों के माध्यम से पारिवारिक सदस्यों शर्मीला ओम प्रकाश साबो, राज कुमार साबू , भरत जमनादास ठक्कर , हिम्मत सिंह लगड़ और सुप्रिया राजकुमार अग्रवाल आदि को निदेशक दिखा कर फस्ट फ्लाइट के आय को उसमें स्थानांतरित भी कर लिया गया है। जिसके खिलाफ न्याय मिलने तक हिन्द मजदूर किसान पंचायत कर्मचारियों की हित में अपना आंदोलन लगातार जारी रखेगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jan 2025 17:11:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थलों के खिलाफ नए मुकदमों के पंजीकरण, सर्वेक्षण आदेश पारित करने पर रोक लगाई।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div>
<div><strong>नई दिल्ली।</strong> उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (12 दिसंबर) को आदेश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश तक देश में पूजा स्थलों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि लंबित मुकदमों (जैसे ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा शाही ईदगाह, संभल जामा मस्जिद आदि से संबंधित) में न्यायालयों को सर्वेक्षण के आदेश सहित प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करना चाहिए। अंतरिम आदेश पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई करते हुए पारित किया गया।</div>
<div>  </div>
<div>मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी.</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146966/the-supreme-court-banned-passing-orders-for-registration-and-survey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/सुप्रीम-कोर्ट-ने-पूजा-स्थलों-के-खिलाफ-नए-मुकदमों-के-पंजीकरण.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div>
<div><strong>नई दिल्ली।</strong> उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (12 दिसंबर) को आदेश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश तक देश में पूजा स्थलों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि लंबित मुकदमों (जैसे ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा शाही ईदगाह, संभल जामा मस्जिद आदि से संबंधित) में न्यायालयों को सर्वेक्षण के आदेश सहित प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करना चाहिए। अंतरिम आदेश पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई करते हुए पारित किया गया।</div>
<div> </div>
<div>मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की विशेष पीठ ने आदेश पारित किया कि चूंकि मामला इस न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि यद्यपि वाद दायर किए जा सकते हैं, लेकिन इस न्यायालय के अगले आदेश तक कोई वाद पंजीकृत नहीं किया जाएगा और कार्यवाही नहीं की जाएगी। हम यह भी निर्देश देते हैं कि लंबित वादों में न्यायालय अगली सुनवाई की तारीख तक सर्वेक्षण के आदेश सहित कोई भी प्रभावी अंतरिम आदेश या अंतिम आदेश पारित नहीं करेगा।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई तक मंदिर-मस्जिद से जुड़ा कोई भी नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। यह कानून पूजा स्थलों के स्वरूप में किसी भी बदलाव पर रोक लगाता है और यह सुनिश्चित करता है कि 15 अगस्त 1947 को जो पूजा स्थल का जो स्वरूप था, वह वैसा ही बना रहे।</div>
<div> </div>
<div>हालांकि, न्यायालय ने मस्जिदों/दरगाहों जैसे पूजा स्थलों के खिलाफ वर्तमान में लंबित मुकदमों की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने केंद्र सरकार से आज से चार सप्ताह के भीतर पूजा स्थल अधिनियम पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने को भी कहा। केंद्र के जवाबी हलफनामे की प्रति को एक वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया है, जहां से कोई भी व्यक्ति इसे डाउनलोड कर सकता है।पीठ को बताया गया कि वर्तमान में देश में 10 मस्जिदों/धर्मस्थलों के खिलाफ 18 मुकदमे लंबित हैं।</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय 1991 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति से पूजा स्थलों के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन पर रोक लगाता है।मुख्य याचिका (अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ) 2020 में दायर की गई थी, जिसमें न्यायालय ने मार्च 2021 में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। बाद में, क़ानून को चुनौती देते हुए कुछ अन्य समान याचिकाएँ दायर की गईं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा अधिनियम के क्रियान्वयन की मांग करते हुए दायर की गई एक रिट याचिका भी आज सूचीबद्ध की गई। सीपीआई (एम), इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, डीएमके और आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा, एनसीपी (शरद पवार) सांसद जितेंद्र अव्हाड़ आदि जैसे विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अधिनियम की सुरक्षा की मांग करते हुए कई हस्तक्षेप आवेदन दायर किए गए हैं।</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय द्वारा कई बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया है। उत्तर प्रदेश में संभल जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बाद हुई हिंसक घटनाओं के मद्देनजर यह अधिनियम हाल ही में सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया। न्यायालय ने अधिवक्ता कनु अग्रवाल, विष्णु शंकर जैन और एजाज मकबूल को क्रमशः संघ, याचिकाकर्ताओं और अधिनियम का समर्थन करने वाले पक्षों की ओर से संकलन करने के लिए नोडल वकील नियुक्त किया। </div>
<div>अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई याचिका में  जिन्होंने प्रार्थना किया गया  है कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 2, 3 और 4 को रद्द कर दिया जाए।</div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ता का कहना है कि ये तीनों धाराएं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15, 21, 25,26 और 29 का उल्लंघन करती हैं। याचिका के मुताबिक ये सभी हमारे संविधान की मूल भावना और प्रस्तावना के खिलाफ हैं। प्रस्तुत किए गए विभिन्न कारणों में से एक यह तर्क था कि ये प्रावधान किसी व्यक्ति या धार्मिक समूह के पूजा स्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए न्यायिक उपचार के अधिकार को छीन लेते हैं।</div>
<div>1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने पूजा स्थल कानून लेकर आई थी। इस कानून के मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था।</div>
<div> </div>
<div>धारा-4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को किसी पूजा स्थल का जो चरित्र था उसे वैसा ही बनाए रखना होगा। वहीं. धारा-4(2) इसके प्रावधान उन मुकदमों, अपीलों और कानूनी कार्यवाही को रोकने की बात करता हैं जो पूजा स्थल कानून के लागू होने की तिथि पर लंबित थे। इसके साथ ही ये धारा किसी नए मामले को दायर करने पर भी रोक लगाती है। इस कानून की धारा-5 कहती है कि पूजा स्थल कानून  राम जन्मभूमि से जुड़े मुकदमों पर लागू नहीं होगा। इस कानून को चुनौती देने वाली कम से कम दो याचिकाएं कोर्ट में विचाराधीन हैं। इनमें से एक याचिका लखनऊ के विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ और कुछ अन्य सनातन धर्म के लोगों की है। दूसरी याचिका भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने लगाई है।  दोनों याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। </div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है। जो संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही ये कानून एक मनमाना तर्कहीन कटऑफ तिथि भी लागू करता है जो हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्म के अनुयायियों के अधिकार को कम करता है। जुलाई 1991 में जब केंद्र सरकार ये कानून लेकर आई थी तब भी संसद में भाजपा ने इसका विरोध किया था। उस वक्त राज्यसभा में अरुण जेटली और लोकसभा में उमा भारती ने इस मामले को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने की मांग की थी।अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद एक बार फिर काशी और मथुरा सहित देशभर के करीब 100 पूजा स्थलों पर मंदिर की जमीन होने को लेकर दावेदारी की जा रही है, लेकिन 1991 के कानून के चलते दावा करने वाले कोर्ट नहीं जा सकते। ज्ञानवापी में इसी कानून के उल्लंघन की बात मुस्लिम पक्ष कह रहा है।</div>
</div>
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<div class="WhmR8e"> </div>
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<div></div>
</div>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Dec 2024 17:24:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अवैध पेड़ों की कटाई पर अवमानना नोटिस जारी किया।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा में वृंदावन रोड पर 454 पेड़ों की अवैध कटाई के बाद उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को सिविल अवमानना नोटिस जारी किया है, जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों का उल्लंघन है। जस्टिस अभय एस. ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने 18 और 19 सितंबर, 2024 की रात को हुई इस घटना पर हैरानी और चिंता व्यक्त की। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ों की अवैध कटाई सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए की गई थी। न्यायाधीशों ने कहा, "सीईसी की नवीनतम रिपोर्ट में चौंकाने वाली स्थिति</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146760/supreme-court-issues-contempt-notice-on-illegal-tree-cutting-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-12/सुप्रीम-कोर्ट-ने-उत्तर-प्रदेश-में-अवैध-पेड़ों-की-कटाई-पर-अवमानना-नोटिस-जारी-किया।.webp" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा में वृंदावन रोड पर 454 पेड़ों की अवैध कटाई के बाद उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को सिविल अवमानना नोटिस जारी किया है, जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों का उल्लंघन है। जस्टिस अभय एस. ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने 18 और 19 सितंबर, 2024 की रात को हुई इस घटना पर हैरानी और चिंता व्यक्त की। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ों की अवैध कटाई सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए की गई थी। न्यायाधीशों ने कहा, "सीईसी की नवीनतम रिपोर्ट में चौंकाने वाली स्थिति का खुलासा हुआ है। इसमें दर्ज है कि 454 पेड़ों को अवैध रूप से काटा गया था... रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि रिपोर्ट में नामित व्यक्तियों द्वारा इस न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करते हुए यह स्पष्ट रूप से अवैध कार्रवाई की गई है। प्रथम दृष्टया, हमारा मानना है कि रिपोर्ट में उल्लिखित व्यक्ति सिविल अवमानना के दोषी हैं।"</div>
<div> </div>
<div>न्यायालय ने दोषी अधिकारियों को अवमानना नोटिस का जवाब देने और यह बताने के लिए 16 दिसंबर की तारीख तय की है कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। इसके अलावा, न्यायालय ने साइट पर किसी भी तरह के पेड़ की कटाई या निर्माण गतिविधियों को तत्काल रोकने का आदेश दिया है और यह अनिवार्य किया है कि अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की लकड़ी को कानूनी नियमों के अनुसार संभाला जाए।</div>
<div> </div>
<div>यह सख्त निर्देश ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन के भीतर पर्यावरण उल्लंघनों को संबोधित करने के व्यापक प्रयास के हिस्से के रूप में आया है, ताजमहल के चारों ओर एक निर्दिष्ट क्षेत्र है जहाँ ऐतिहासिक स्थल को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए पर्यावरण नियमों की कड़ी निगरानी की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब पेड़ों को काटने की अनुमति दी जाती है, तो उसे अदालत द्वारा निर्दिष्ट समय का सख्ती से पालन करना चाहिए, विशेष रूप से शाम 6 बजे से सुबह 8 बजे के बीच ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। अवैध रूप से पेड़ों की कटाई का मुद्दा गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करता है, जिसमें वनों की कटाई, आवास का नुकसान और पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान शामिल है।</div>
<div> </div>
<div>यह मामला पर्यावरण कानूनों को लागू करने के लिए अधिकारियों द्वारा सामना किए जा रहे संघर्ष और अनुपालन सुनिश्चित करने और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। शीर्ष न्यायालय ने टीटीजेड में वृक्षों की कटाई से संबंधित एमसी मेहता मामले पर विचार करते हुए प्राधिकारियों को वृक्षों की गणना करने का भी निर्देश दिया था।</div>
<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे कारण बताने को कहा है कि ताज ट्रेपेज़ियम क्षेत्र (टीटीजेड) में पेड़ों की कटाई से संबंधित मामले में उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।</div>
<div> </div>
<div>न्यायमूर्ति ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, " हमारा मानना है कि अनुच्छेद 8 में उल्लिखित व्यक्ति सिविल अवमानना के दोषी हैं। इसलिए हम उन्हें 19 दिसंबर तक जवाब देने के लिए नोटिस जारी करते हैं और उनसे कारण बताने को कहते हैं कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। " साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट में 'चौंकाने वाली स्थिति' का खुलासा किया गया है , जिसमें दर्ज किया गया है कि 18 और 19 सितंबर 2024 को 454 पेड़ों को अवैध रूप से गिराया गया था।</div>
<div>पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल थे, ने कहा कि अवैध रूप से काटे गए 454 पेड़ों में से 420 डालमिया फार्म नामक निजी भूमि पर थे, जबकि शेष 32 पेड़ इस निजी भूमि से सटे सड़क के किनारे काटे गए थे, जो एक संरक्षित वन है।इसने आगे कहा कि इन 454 पेड़ों की अवैध कटाई उक्त रिपोर्ट के पैराग्राफ 8 में नामित व्यक्तियों द्वारा की गई थी, जो इस अदालत द्वारा मई 2015 और 8 दिसंबर, 2021 में पारित आदेश का उल्लंघन है।</div>
<div> </div>
<div>तदनुसार न्यायालय ने उन व्यक्तियों को जिनके खिलाफ नोटिस जारी किया गया था, निर्देश दिया कि वे डालमिया फार्म पर कोई भी कार्य या निर्माण कार्य न करें तथा यथास्थिति बनाए रखें। न्यायालय ने मथुरा के पुलिस अधीक्षक को स्थानीय पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को डालमिया फार्म का दौरा करने तथा यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने को कहा कि पेड़ों की कटाई नहीं की जा रही है।</div>
<div>आज सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी एडीएन राव ने कोर्ट का ध्यान तस्वीरों की ओर दिलाया और सुझाव दिया कि कोर्ट को शाम 6:00 बजे के बाद पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का आदेश पारित करना चाहिए, क्योंकि सभी पेड़ आधी रात को काटे गए थे। उन्होंने कोर्ट से उन लोगों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी करने को भी कहा जो कोर्ट द्वारा पारित आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं। </div>
<div> </div>
<div>इसी तरह, राज्य की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने अदालत से नोटिस जारी करने का आग्रह करते हुए कहा, "यदि माननीय न्यायाधीश नोटिस जारी करेंगे, तो इससे हमें काम पूरा करने के लिए और अधिक अधिकार प्राप्त होंगे।"  भाटी ने अदालत को यह भी बताया कि राज्य ने उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ यूपी वृक्ष संरक्षण अधिनियम, भारतीय वन अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए हैं।उक्त दृष्टिकोण से सहमत होते हुए, अदालत ने तदनुसार नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि "शाम 6 बजे के बाद से अगले दिन सुबह 8 बजे तक कोई पेड़ नहीं गिराया जाना चाहिए"। उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम (डीटीपीए) के तहत राजधानी में वृक्षों की गणना करने में विफल रहने पर दिल्ली वृक्ष प्राधिकरण (डीटीए) को कड़ी फटकार लगाई थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Dec 2024 17:13:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सरकारी नौकरियों के लिए बीच में नहीं बदले जा सकते भर्ती नियम-। सुप्रीम कोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली। </strong>सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को सरकारी नौकरियों में भर्ती को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती नियमों को बीच में नहीं बदला जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि सरकारी नौकरियों के लिए चयन नियम भर्ती प्रक्रिया शुरू होने से पहले तय किए जाने चाहिए।</div>
<div>संविधान पीठ ने कहा कि सरकारी</div>
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<div>  नौकरियों में चयन के नियमों या एलीजिबिलिटी क्राइटेरिया को बीच में या भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक कि नियम इसकी अनुमति न</div>
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<div>पीठ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146054/recruitment-rules-for-government-jobs-cannot-be-changed-midway"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/सरकारी-नौकरियों-के-लिए-बीच-में-नहीं-बदले-जा-सकते-भर्ती-नियम-।-सुप्रीम-कोर्ट।.webp" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली। </strong>सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को सरकारी नौकरियों में भर्ती को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती नियमों को बीच में नहीं बदला जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि सरकारी नौकरियों के लिए चयन नियम भर्ती प्रक्रिया शुरू होने से पहले तय किए जाने चाहिए।</div>
<div>संविधान पीठ ने कहा कि सरकारी</div>
<div> </div>
<div> नौकरियों में चयन के नियमों या एलीजिबिलिटी क्राइटेरिया को बीच में या भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक कि नियम इसकी अनुमति न दें। न्यायालय ने कहा कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के नियमों में बीच में तब तक बदलाव नहीं किया जा सकता जब तक कि ऐसा निर्धारित न किया गया हो। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने से पहले निर्धारित किए जा चुके नियमों से बीच में छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। पीठ में जस्टिस हृषिकेश रॉय, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस मनोज मिश्रा भी शामिल थे।पीठ ने जुलाई 2023 में इस मामले पर फैसला सुरक्षित रखने के बाद आज फैसला सुनाया।</div>
<div> </div>
<div>पीठ ने कहा कि चयन नियम मनमाने नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से कहा कि पारदर्शिता और गैर-भेदभाव सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की पहचान होनी चाहिए। बीच में नियमों में बदलाव करके उम्मीदवारों को हैरान- परेशान नहीं किया जाना चाहिए।</div>
<div>अदालत के समक्ष प्रस्तुत मामले में यह सवाल था कि क्या किसी सार्वजनिक पद पर नियुक्ति के मानदंडों को संबंधित प्राधिकारियों द्वारा चयन प्रक्रिया के बीच में या उसके शुरू होने के बाद बदला जा सकता है। दूसरे शब्दों में, सवाल यह था कि क्या नौकरी चयन प्रक्रिया के नियमों को बीच में बदला जा सकता है।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने फैसले में के. मंजूश्री आदि बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2008) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसले पर जोर दिया, जिसमें कहा गया था कि भर्ती प्रक्रिया के नियमों को बीच में नहीं बदला जा सकता।</div>
<div>यह मामला राजस्थान हाई कोर्ट के कर्मचारियों के लिए तेरह अनुवादक पदों को भरने की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित था। उम्मीदवारों को एक लिखित परीक्षा और उसके बाद व्यक्तिगत साक्षात्कार देना था। 21 अभ्यर्थी इसमें शामिल हुए थे। उनमें से केवल तीन को ही उच्च न्यायालय (प्रशासनिक पक्ष) द्वारा सफल घोषित किया गया। बाद में पता चला कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने आदेश दिया था कि पदों के लिए केवल उन्हीं अभ्यर्थियों का चयन किया जाना चाहिए जिन्होंने कम से कम 75 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हों।</div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-11/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%9A-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%AE-%E0%A5%A4-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%A4.webp" alt="सरकारी नौकरियों के लिए बीच में नहीं बदले जा सकते भर्ती नियम-। सुप्रीम कोर्ट।" width="720" height="420"></img></div>
<div>जब भर्ती प्रक्रिया को पहली बार हाई कोर्ट ने अधिसूचित किया था, तब 75 प्रतिशत मानदंड का उल्लेख नहीं किया गया था।</div>
<div>इस संशोधित मानदंड को लागू करने पर ही तीन उम्मीदवारों का चयन किया गया और बाकी उम्मीदवारों को छोड़ दिया गया। जिसके बाद तीन असफल अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर इस परिणाम को चुनौती दी, जिसे मार्च 2010 में खारिज कर दिया गया। जिसके बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Fri, 08 Nov 2024 16:42:56 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असम में फर्जी मुठभेड़ों के आरोप गंभीर, मानवाधिकार आयोग को सक्रिय रुख अपनाना चाहिए: । सुप्रीम कोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>नई दिल्ली। असम में 'फर्जी' मुठभेड़ों के मुद्दे को उठाने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मानवाधिकार आयोगों की स्थापना के पीछे विधायी जनादेश है और उनसे नागरिक स्वतंत्रता के मामलों में सक्रियता से काम करने की उम्मीद की जाती है।असम के संदर्भ में, इसने उन मामलों में असम मानवाधिकार आयोग द्वारा शुरू की गई जांच, यदि कोई हो, के बारे में डेटा मांगा, जहां 'फर्जी' मुठभेड़ के आरोप लगाए गए थे। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145761/draft-add-your-title-allegations-of-fake-encounters-in-assam"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/मानवाधिकार-आयोग-को-सक्रिय-रुख-अपनाना-चाहिए--सुप्रीम-कोर्ट.jpg" alt=""></a><br /><div>नई दिल्ली। असम में 'फर्जी' मुठभेड़ों के मुद्दे को उठाने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मानवाधिकार आयोगों की स्थापना के पीछे विधायी जनादेश है और उनसे नागरिक स्वतंत्रता के मामलों में सक्रियता से काम करने की उम्मीद की जाती है।असम के संदर्भ में, इसने उन मामलों में असम मानवाधिकार आयोग द्वारा शुरू की गई जांच, यदि कोई हो, के बारे में डेटा मांगा, जहां 'फर्जी' मुठभेड़ के आरोप लगाए गए थे। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत याचिकाकर्ता की इसी मुद्दे को उठाने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया गया था। कथित तौर पर, हाईकोर्ट का मानना था कि कथित घटनाओं की अलग से जांच की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि राज्य के अधिकारी प्रत्येक मामले में जांच कर रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि असम में सैकड़ों मुठभेड़ें हुई हैं और पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का घोर उल्लंघन हुआ है। उन्होंने आग्रह किया कि अधिकांश मामलों में न तो कोई फोरेंसिक और बैलिस्टिक विश्लेषण हुआ, न ही कोई मजिस्ट्रेट जांच या स्वतंत्र जांच हुई। इसके बजाय, मुठभेड़ों के पीड़ितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और मुठभेड़ों के आरोपी पुलिसकर्मियों ने खुद ही मुठभेड़ पीड़ितों के मामलों की जांच की।</div>
<div>मुठभेड़ों के पीड़ितों द्वारा दायर विशिष्ट घटनाओं और हलफनामों का हवाला देते हुए, भूषण ने अदालत का ध्यान एक महिला के मामले की ओर आकर्षित किया, जिसने दावा किया कि उसके पति की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई थी। इस महिला के अनुसार, उसके पति के शरीर पर कई चोटें (नाखून गायब, टूटी हुई हड्डियां आदि) थीं, जो थर्ड-डिग्री टॉर्चर का संकेत देती हैं।इस बात पर जोर देते हुए कि मुठभेड़ों के पीड़ितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, वकील ने जोर देकर कहा कि मुठभेड़ों के फर्जी होने के आरोपों की कभी कोई जांच नहीं की गई।</div>
<div> </div>
<div>दूसरी ओर, असम के एडिशनल एडवोकेट जनरल नलिन कोहली ने बताया कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की साख और "स्पष्ट रूप से झूठे" बयानों के बारे में चिंता व्यक्त की। इसके अलावा, यह आग्रह किया गया कि याचिकाकर्ता की जनहित याचिका को समय से पहले देखा गया और अनिवार्य रूप से, उन्होंने अनुच्छेद 226 याचिका के माध्यम से डेटा मांगा था।  वकीलों की सुनवाई करते हुए, पीठ ने पूछा कि क्या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले में कोई जांच का आदेश दिया है। भूषण ने इसका जवाब देते हुए कहा कि, याचिकाकर्ता ने पहले एनएचआरसी से ही संपर्क किया था। हालांकि, एनएचआरसी ने मामले को राज्य मानवाधिकार आयोग को स्थानांतरित कर दिया, जिसने इसे बंद कर दिया।</div>
<div> </div>
<div>असम एचआरसी द्वारा बंद करने की आलोचना करते हुए, भूषण ने कहा कि आयोग ने 6 महीने तक कुछ नहीं किया, और उसके बाद ही, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की, जिसका हवाला देते हुए असम एचआरसी ने उसके समक्ष मामला बंद कर दिया, भले ही उसे (या असम राज्य को) नोटिस जारी नहीं किया गया था। पीठ ने कहा कि यह मामला बहुत गंभीर और चिंताजनक है, क्योंकि 171 मामलों में 'फर्जी' मुठभेड़ों का आरोप लगाया गया है। इनमें से कुछ मामले मौत के हैं, जबकि अन्य गंभीर चोटों के हैं।</div>
<div> </div>
<div>जस्टिस भुइयां ने कहा,"इस तरह की याचिका को समय से पहले खारिज नहीं किया जा सकता...सच यह है कि मुठभेड़ हुई थी...[असम] का अतीत परेशानियों से भरा रहा है और रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में हैं...171 मामलों की संख्या काफी बड़ी है...जिन परिस्थितियों में आरोपियों की मौत हुई है, वे गंभीर संदेह पैदा करते हैं... [...] जोरहाट की घटना का जिक्र करते हुए, जहां आरोपी को सुबह 3 बजे [...] पीछे से एक वाहन से...मोरेगांव की एक घटना में आरोपी को हथकड़ी सहित कुएं में कूदते हुए पाया गया।"</div>
<div> </div>
<div>जस्टिस भुइयां नेकहा कि  स्वदेशी समुदायों को निशाना बनाए जाने पर और दुख जताते हुए कहा,निशाना बनाया जा रहा है!"जस्टिस भुइयां ने असम के दरांग जिले में तीन साल पुराने बेदखली अभियान से संबंधित सेवानिवृत्त गौहाटी हाईकोर्ट के न्यायाधीश बीडी अग्रवाल की अध्यक्षता वाले एक आयोग की हाल की न्यायिक जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें हिंसा में दो लोग मारे गए थे और अन्य घायल हो गए थे। "बीडी अग्रवाल ने हाल ही में एक न्यायिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की है जिसमें कहा गया है कि पुलिस ने हद पार कर दी है, हालांकि बेदखली उचित थी"।</div>
<div> </div>
<div>इसके साथ ही जस्टिस कांत ने कहा,"आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। हम उम्मीद करते हैं कि मानवाधिकार आयोग सक्रिय होंगे..."।जवाब में, कोहली ने बताया कि असम पुलिस को आरोपी व्यक्तियों की पहचान से कोई सरोकार नहीं है और बेदखली मामले में, हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में कार्रवाई की गई थी।</div>
<div>"अतीत में परेशानी" वाली टिप्पणी का जवाब देते हुए, एएजी ने दलील दी कि असम ने उग्रवाद के खिलाफ युद्ध में एक लंबा सफर तय किया है। उन्होंने कहा कि अपराध का कोण बदल गया है - 'ड्रग्स' नई लड़ाई है। असम किस तरह से प्रवेश द्वार की तरह काम करता है, इस पर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि असम के इतिहास पर विचार करते समय न्यायालय को अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>उनकी बात सुनकर, न्यायालय ने आश्वासन दिया कि वह असम और इसकी भौगोलिक स्थिति की संवेदनशीलता के प्रति सचेत है। हालांकि, वर्तमान मामला नशीली दवाओं से संबंधित नहीं है, और अन्यथा भी, पीयूसीएल के निर्णय के आदेश का अनुपालन होना चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि मानवाधिकार आयोग का कर्तव्य है कि वह शिकायतों का अपने आप अनुसरण करे, भले ही पीड़ित/पीड़ित के रिश्तेदार इसका अनुसरण करें या न करें। अंततः, न्यायालय ने वकीलों से दो पहलुओं पर डेटा लाने को कहा -(i) किसने आरोपों की जाँच की और परिणाम क्या था? (ii) क्या राज्य मानवाधिकार आयोग अपनी स्वयं की जांच मशीनरी का उपयोग करके कोई स्वतंत्र जांच करता है?</div>
<div> </div>
<div>यह याचिका असम के एक वकील आरिफ मोहम्मद यासीन जवादर ने दायर की है, जिसमें राज्य में पुलिस कर्मियों द्वारा मुठभेड़ों का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि मई 2021 (जब मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कार्यभार संभाला) से असम पुलिस और विभिन्न मामलों में आरोपी व्यक्तियों के बीच 80 से अधिक फर्जी मुठभेड़ें हुईं। वह सीबीआई, एसआईटी या अन्य राज्यों की पुलिस टीम जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग कर रहे हैं।पिछले साल 17 जुलाई को याचिका पर नोटिस जारी किया गया था, जिसमें असम सरकार के अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और असम मानवाधिकार आयोग से जवाब मांगा गया था।</div>
<div>अप्रैल में, न्यायालय ने सुझाव दिया था कि याचिकाकर्ता कुछ अतिरिक्त जानकारी रिकॉर्ड पर पेश करे। उसी के अनुसार, उन्होंने तिनसुकिया मुठभेड़ मामले के पीड़ितों के हलफनामे दाखिल किए हैं, जिसमें तीन व्यक्ति (दीपज्योति नियोग, बिस्वनाथ बरगोहेन और मनोज बरगोहेन) कथित तौर पर पुलिस की गोलीबारी में घायल हुए थे।</div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ता ने कहा है कि तिनसुकिया मुठभेड़ मामले के दो पीड़ितों बिस्वनाथ और मनोज के परिवार के सदस्य गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराना चाहते थे। लेकिन, संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी ने तब तक शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया जब तक कि उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि पीड़ित प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन-उल्फा में शामिल होने जा रहे थे। इसके बजाय, मुठभेड़ होने के बाद पीड़ितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।</div>
<div>यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस स्टेशन ढोला (असम) के प्रभारी अधिकारी ने खुद को मामले में जांच अधिकारी नियुक्त किया, जबकि वह मुठभेड़ के समय घटनास्थल पर मौजूद थे और कथित तौर पर पीड़ित दीपज्योति नियोग ने उनकी पिस्तौल छीनी थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Oct 2024 18:06:56 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पराली जलाने के मामले में  पंजाब-हरियाणा को सुप्रीम कोर्ट की फटकार।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>ब्यूरो नई दिल्ली। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने पर गलतबयानी के लिए पंजाब और हरियाणा सरकार की जमकर खिंचाई की। अदालत ने कहा कि दोनों राज्यों ने पराली जलाने वालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि अगर ये सरकारें सच में कानून को लागू करने में रुचि रखती हैं तो कम से कम एक अभियोजन जरूर होगा।</div>
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<div>सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव से कहा कि करीब 1080 उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन आपने सिर्फ 473 लोगों से मामूली जुर्माना वसूला है। आप 600 या उससे ज्यादा लोगों को बख्श रहे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145738/draft-add-your-title-supreme-court-reprimands-punjab-haryana-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/पराली-जलाने-के-मामले-में -पंजाब-हरियाणा-को-सुप्रीम-कोर्ट-की-फटकार।.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>ब्यूरो नई दिल्ली। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने पर गलतबयानी के लिए पंजाब और हरियाणा सरकार की जमकर खिंचाई की। अदालत ने कहा कि दोनों राज्यों ने पराली जलाने वालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि अगर ये सरकारें सच में कानून को लागू करने में रुचि रखती हैं तो कम से कम एक अभियोजन जरूर होगा।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव से कहा कि करीब 1080 उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन आपने सिर्फ 473 लोगों से मामूली जुर्माना वसूला है। आप 600 या उससे ज्यादा लोगों को बख्श रहे हैं। हम आपको साफ-साफ बता दें कि आप उल्लंघनकर्ताओं को यह संकेत दे रहे हैं कि उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जाएगा। यह पिछले तीन सालों से हो रहा है।</div>
<div> </div>
<div>हरियाणा के मुख्य सचिव ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 400 फसल जलाने की घटनाएं हुईं। साथ ही राज्य में 32 एफआईआर दर्ज की गई हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पराली जलाने वालों के आंकड़ों के बारे में झूठ बोला जा रहा है। आंकड़े हर मिनट बदल रहे हैं।</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हरियाणा लोगों का चयन कर रहा है। उसके अनुसार कुछ लोगों से मुआवजा लिया जा रहा और कुछ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है। पीठ ने कहा, 'हम कुछ पर एफआईआर दर्ज करने और कुछ पर मामूली जुर्माना लगाने को लेकर चिंतित हैं।'</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव से पूछा, पराली के बारे में क्या किया जा रहा है और क्या किसानों को कुछ प्रदान किया गया है? इस पर मुख्य सचिव ने कहा कि पराली के निस्तारण के लिए करीब एक लाख मशीनें दी गई हैं, जिससे पराली जलाने में कमी आई है।</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र और पंजाब तथा हरियाणा राज्यों को यह याद दिलाने का समय आ गया है कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है। वायु प्रदूषण के मामले को दिवाली के बाद स्थगित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह दिल्ली में परिवहन से उत्पन्न प्रदूषण, शहर में भारी ट्रकों के प्रवेश और खुले में कूड़ा जलाने के मुद्दों पर विचार करेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Oct 2024 17:33:22 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>तिरुपति लड्डू विवाद की सीबीआई की निगरानी में एसआईटी जांच का आदेश,।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली।जेपी सिंह।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तिरूपति लड्डू विवाद की नए सिरे से जांच का आदेश दियाऔर पांच सदस्यीय नई विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया। एसआईटी में केंद्रीय जांच ब्यूरो, आंध्र प्रदेश पुलिस और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अधिकारी शामिल होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इसमें दो सदस्य सीबीआई से, दो सदस्य आंध्र प्रदेश पुलिस से और एक सदस्य एफएसएसएआई से होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईटी जांच की निगरानी सीबीआई निदेशक करेंगे।</div>
<div>  </div>
<div>जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ  ने कई याचिकाओं पर आदेश पारित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145339/order-for-sit-investigation-under-cbi-monitoring-in-tirupati-laddu"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/तिरुपति-लड्डू-विवाद-की-सीबीआई-की-निगरानी-में-एसआईटी-जांच-का-आदेश,।.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली।जेपी सिंह।</strong></div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तिरूपति लड्डू विवाद की नए सिरे से जांच का आदेश दियाऔर पांच सदस्यीय नई विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया। एसआईटी में केंद्रीय जांच ब्यूरो, आंध्र प्रदेश पुलिस और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अधिकारी शामिल होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इसमें दो सदस्य सीबीआई से, दो सदस्य आंध्र प्रदेश पुलिस से और एक सदस्य एफएसएसएआई से होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईटी जांच की निगरानी सीबीआई निदेशक करेंगे।</div>
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<div>जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ  ने कई याचिकाओं पर आदेश पारित करते हुए कहा कि हम अदालत को "राजनीतिक युद्ध के मैदान" के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे। तमाम याचिकाओं में अदालत की निगरानी में जांच की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में एक नए "स्वतंत्र" विशेष जांच दल (एसआईटी) को आदेश दिया कि वह पिछली वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान आंध्र प्रदेश के तिरुपति में तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर में वितरित किए गए लड्डुओं में मिलावटी घी के इस्तेमाल के आरोपों की जांच करे।</div>
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<div>नई एसआईटी टीम में सीबीआई और आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस के दो-दो अधिकारी तथा भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का एक वरिष्ठ अधिकारी शामिल होगा। नई एसआईटी द्वारा जांच का निर्देश देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों और प्रतिवादों या प्रतिवादी के रुख पर गौर नहीं किया है। पीठ ने कहा, "हम स्पष्ट करते हैं कि हम अदालत को राजनीतिक युद्ध के मैदान के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देंगे। हालांकि, करोड़ों लोगों की भावनाओं को शांत करने के लिए, हम पाते हैं कि जांच एक स्वतंत्र एसआईटी द्वारा की जानी चाहिए।</div>
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<div>हालांकि, हम स्पष्ट करते हैं कि हमारे आदेश को एसआईटी की स्वतंत्रता या निष्पक्षता पर किसी भी तरह के प्रतिबिंब के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। हम स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने का आदेश केवल देवता में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों की भावनाओं को शांत करने के लिए पारित कर रहे हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के नेतृत्व वाली सरकार ने तिरुपति के लड्डू में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की “शुद्धता” पर संदेह जताया । आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने लैब रिपोर्ट सार्वजनिक की, जिसमें आरोप लगाया गया कि तिरुपति मंदिर के भक्तों के बीच प्रतिदिन वितरित किए जाने से पहले देवता को चढ़ाए जाने वाले लड्डू पशु और वनस्पति वसा से दूषित थे।</div>
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<div>30 सितंबर को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा था कि क्या राज्य सरकार के आरोपों की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए।</div>
<div>शुक्रवार को मेहता ने पीठ से कहा, "मैंने इस मामले की जांच की है। एक बात बहुत स्पष्ट है। अगर इस आरोप में सच्चाई का कोई तत्व है, तो यह अस्वीकार्य है... भक्त दुनिया भर में फैले हुए हैं। खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी इसमें शामिल है... मुझे एसआईटी के सदस्यों के खिलाफ कुछ भी नहीं मिला। वे अपना काम करने में सक्षम और योग्य हैं। उन्हें केंद्र सरकार के पुलिस बल के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा निगरानी में रखा जाना चाहिए,। जो एसआईटी के सदस्यों से वरिष्ठ हो।</div>
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<div><strong> एक अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य होगा।</strong></div>
<div>... मुझे लगता है कि इससे विश्वास पैदा होगा और जांच जारी रह सकती है।"</div>
<div>सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुरू में कहा कि अगर आरोपों में सच्चाई का कोई तत्व है तो यह अप्राप्य है। साथ ही, एसजी ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल के वर्तमान सदस्य सक्षम और स्वतंत्र हैं; हालांकि, एसजी ने सुझाव दिया कि SIT की जांच की निगरानी केंद्र सरकार के अधिकारियों द्वारा की जा सकती है।</div>
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<div>इस बिंदु पर जस्टिस गवई ने तिरुपति तिरुमाला देवस्थानम (टीटीडी) की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के उस बयान के बारे में पूछा, जिसमें उन्होंने समाचार पत्रों में बताया कि उन्हें न्यायालय द्वारा आदेशित किसी भी जांच पर कोई आपत्ति नहीं है। इसके बाद लूथरा ने न्यायालय से समाचार पत्रों की रिपोर्टों पर न जाने का अनुरोध करते हुए कहा कि टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी द्वारा कथित तौर पर दिए गए बयानों के बारे में समाचार रिपोर्ट भी भ्रामक हैं।</div>
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<div>राज्यसभा सांसद और पूर्व टीटीडी चेयरमैन वाईवी सुब्बा रेड्डी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा दिए गए पूर्व बयानों के मद्देनजर राज्य SIT से स्वतंत्र जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।सिब्बल ने कहा,"अगर माननीय सदस्य स्वतंत्र जांच करवाते हैं तो यह उचित होगा। अगर उन्होंने (सीएम ने) बयान नहीं दिया होता तो यह अलग बात होती। इसका असर पड़ता है।"</div>
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<div>आंध्र प्रदेश राज्य की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) की लैब रिपोर्ट जुलाई में ही आ गई थी। इसी आधार पर मुख्यमंत्री ने सितंबर में बयान दिया था।</div>
<div>सिब्बल ने कहा,"उन्हें कैसे पता कि चर्बी का इस्तेमाल किया गया था?" रोहतगी ने कहा कि लैब रिपोर्ट में ऐसा कहा गया। इस पर पलटवार करते हुए सिब्बल ने कहा कि रिपोर्ट में वनस्पति वसा का जिक्र किया गया है।</div>
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<div>जस्टिस विश्वनाथन ने लूथरा से कहा,ये 6 और 12 जुलाई की दो खेपें थीं। और टीटीडी के चेयरमैन ने रिकॉर्ड में कहा है कि इनका इस्तेमाल नहीं किया गया।"लूथरा ने हालांकि कहा कि 6 और 12 जुलाई को पहाड़ी पर पहुंची घी की खेपें दूषित थीं। सिब्बल ने तब पूछा कि दूषित खेप को पहाड़ी मंदिर तक पहुंचने की अनुमति क्यों दी गई। लूथरा ने जवाब देते हुए कहा कि पिछली सरकार ने दिसंबर में आपूर्तिकर्ता को अनुबंध दिया था।</div>
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<div>न्यायालय ने इस प्रकार आदेश दियाः“एक ही आपूर्तिकर्ता द्वारा 6 जुलाई को दो टैंकरों तथा 12 जुलाई को दो टैंकरों में आपूर्ति किए गए घी में मिलावट का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की गई। एफआईआर में आरोप है कि मिलावटी घी का उपयोग प्रसादम लड्डू बनाने में किया गया।</div>
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<div>एफआईआर में लगाए गए आरोपों से दुनिया भर में रहने वाले करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचने की आशंका है। पिछली तारीख पर हमने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से अनुरोध किया कि वे निर्देश लें कि क्या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त SIT द्वारा जांच जारी रखी जा सकती है। मिस्टर मेहता ने निर्देश पर कहा कि उन्होंने SIT के सदस्यों की साख के बारे में विचार किया तथा SIT के सभी सदस्यों की अच्छी प्रतिष्ठा है। इसलिए उन्होंने कहा कि जांच राज्य SIT द्वारा की जा सकती है। हालांकि उन्होंने कहा कि यह न्यायालय SIT की निगरानी के लिए केंद्र के किसी अधिकारी को नियुक्त कर सकता है।हमने आरोपों तथा प्रतिआरोपों पर विचार नहीं किया। हम स्पष्ट करते हैं कि हम न्यायालय को राजनीतिक युद्ध के मैदान के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देंगे। </div>
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<div>पिछली तारीख पर न्यायालय ने मामले की जांच के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक बयान देने के औचित्य पर सवाल उठाया था।पीठ ने मौखिक रूप से यह भी कहा था  कि लैब रिपोर्ट से प्रथम दृष्टया संकेत मिलता कि यह अस्वीकृत घी के सैंपल थे, जिनकी जांच की गई थी। अंत में इसने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से निर्देश मांगने को कहा कि आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी  जांच करेगी या कोई केंद्रीय एजेंसी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Oct 2024 16:46:56 +0530</pubDate>
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