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                <title>Hindi swatantra vichar - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>चरण-पादुका की नहीं बैशाखी की सत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p>त्रेता में राम राज की स्थापना से पहले 14  साल तक चरण-पादुका की सत्ता थी ।  कलियुग में एक बार फिर ऐसी ही सत्ता जनता के सामने आ रही है,लेकिन इस सत्ता में चरण-पादुकाएं नहीं बल्कि बैशाखियाँ इस्तेमाल की जा रहीं हैं। नयी सरकार आजकल में वजूद में आ जाएगी। मजे की बात ये है कि  ये सरकार भले ही अकेले भाजपा या मोदीकी सरकार नहीं है लेकिन इसका झंका-मंका पहले की ही तरह किया जाने वाला है। यानि कि  नए पंत प्रधान के रूप में जो भी शपथ लेगा पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ लेगा ताकि चेहरे पर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142005/the-power-of-the-crutches-not-of-the-feet-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/dsgdf.jpg" alt=""></a><br /><p>त्रेता में राम राज की स्थापना से पहले 14  साल तक चरण-पादुका की सत्ता थी ।  कलियुग में एक बार फिर ऐसी ही सत्ता जनता के सामने आ रही है,लेकिन इस सत्ता में चरण-पादुकाएं नहीं बल्कि बैशाखियाँ इस्तेमाल की जा रहीं हैं। नयी सरकार आजकल में वजूद में आ जाएगी। मजे की बात ये है कि  ये सरकार भले ही अकेले भाजपा या मोदीकी सरकार नहीं है लेकिन इसका झंका-मंका पहले की ही तरह किया जाने वाला है। यानि कि  नए पंत प्रधान के रूप में जो भी शपथ लेगा पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ लेगा ताकि चेहरे पर पड़ीं शिकन किसी को नजर न आएं।</p>
<p>पूरी दुनिया की तरह हम भी देश की भावी बैशखी सरकार के नेताओं और भावी पंत प्रधान को अपनी शुभकामनाएं देते हैं कि  वे पूरे पांच साल अबाध सत्ता में रहकर जनता की सेवा करें। लेकिन हमारी शुभकामनाओं से क्या होना जाना है ।  होगा तो वो ही जो राम जी ने रच रखा है। राम जी की लिखावट हम जैसे आम लोग कैसे समझ सकते हैं ? राम जी की लिखावट तो उन्हें अयोध्या लाने का दम्भ  दिखने वाले लोग ही नहीं पढ़ पाए और ठीक नए मंदिर के आसपास ही जीत का परचम नहीं फहरा पाए।</p>
<p>देश में गठबंधन की सरकार कोई पहली बार नहीं बन रही है ।  देश के पास इसका पर्याप्त तजुर्बा है ,लेकिन जनता के पास भी इस बात का खासा तजुर्बा है कि गठबंधन की सरकारें कैसे काम करतीं हैं और उनकी उम्र कितनी होती है ? गठबंधन की सरकार कायदे से जनता की सरकार होती है क्योंकि इसमें  एक नहीं बल्कि अनेक दल शामिल होते हैं ,लेकिन गठबंधन की सरकार चलाना आसान नहीं होता। कुछ नेता इसमें कामयाब होते हैं तो कुछ नहीं। गठबंधन की सरकार कि ऊपर हमेशा अनिश्चय कि बादल मंडराते रहते हैं। ये कब गरजें और कब बरस जाएँ कोई नहीं जानता।</p>
<p>बहुत पीछे न भी जाएँ तो देश में आपातकाल के बाद बनी गठबंधन की सरकार ढाई साल में ही अपने ही बोझ से गिर गयी थी। जनता ने जिस कथित तानाशाही कि खिलाफ जनादेश देकर गठबंधन की सरकार बनाने का रास्ता दिया था उसी जनता ने ढाई साल बाद गठबंधन में शामिल दलों और उसके नेताओं को धूल भी चटा दी थी। अटल बिहारी बाजपेयी और डॉ मन मोहन सिंह जैसे बिरले ही नेता हुए हैं जिन्होंने ढंग से गठबंधन की सरकार को चलाया। डॉ मन मोहन सिंह ने तो पांच नहीं बल्कि दस साल तक गठबंधन की सरकार चलाई। 2024  में भी जनादेश भाजपा सरकार की तानाशाही कि खिलाफ आया है लेकिन संयोग से जनता ने पार्टी को तो सत्ता से हटा दिया लेकिन जिस व्यक्ति को लेकर आक्रोश था वो नया चेहरा  लगाकर बैशाखियों  कि सहारे फिर सत्ता के शीर्ष पर है।</p>
<p>चूंकि ये नई सरकार बैशाखियों के सहारे चलने वाली सरकार है इसलिए इस बार तानाशाही के सर उठाने के अवसर तो कम आएंगे ,लेकिन कहते हैं कि चोर चोरी छोड़ सकता है हेराफेरी नहीं ,इसलिए ये सरकार कब गिर जाये ,कोई नहीं जानता। खुद भाजपा और टीडीपी तथा जेडीयू को भी इसका पता नहीं है। नयी सरकार की उम्र देशकाल तथा परिस्थितयां तय करेंगीं। नयी सरकार का एजेंडा भी पहले की तरह हिंदुत्व ,सनातन , एक राष्ट्र-एक चुनाव या सीएए जैसे मुद्दों क लेकर विवादास्पद नहीं होगा। नई सरकार तीन बड़े और बाकी के छोटे दलों की मंशा के अनुरूप  साझा कार्यक्रम [कॉमन मिनिमम प्रोग्राम ] और एजेंडे के अनुरूप चलेगी । नए पंत प्रधान में इतनी कूबत नहीं है कि  वो परदे के पीछे से अपना एजेंडा चला सके।</p>
<p>आपको याद दिला दूँ कि  नयी सरकार के नए दूल्हे राजा ने 2002  में भी राजधर्म नहीं निभाया था और न पिछले एक दशक में। 2002  में तो टोकने  वाले अटल बिहारी बाजपेयी भी थे  लेकिन बीते एक दशक में किसी ने भी अटल जी की तरह राजधर्म की याद दिलाने का दुस्साहस नहीं दिखाया। सबके सब पंत प्रधान के सामने भीगी बिल्ली बने रहे। नए जनादेश के बाद भी सबसे बड़ी पार्टी के संसदीय दल की बैठक में कोई एक महावीर उठकर खड़ा नहीं हुआ जो पार्टी का बंटाधार करने वाले अपने नेता से प्रश्न या प्रतिप्रश्न कर सके।प्रश्न करने की मनाही पहले भी  थी और आगे भी शायद रहेगी। बावजूद इसके समाज की प्रश्नाकुलता समाप्त नहीं होती। लोग स्वाभाविक रूप से सवाल करते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि  प्रश्न करना भी आजकल अपराध की श्रेणी में शामिल कर दिया गया है।</p>
<p> 2024  में पूरा देश चाहता है कि केंद्र की सरकार एक लोकतान्त्रिक सरकार साबित हो। एक ऐसी सरकार जिसके एजेंडे में मंगलसूत्र,मुर्गा-मछली,मुजरा और मुसलमान शीर्ष पर न हो ।  देश को नई सरकार से एक ही दरकार है कि  वो देश की सियासत से अदावत का खात्मा कर   समाज में सद्भाव की पुनर्स्थापना करे। समाज में व्याप्त भय के वातावरण को निर्मूल करे। ये कोई कठिन काम नहीं है ,लेकिन इसे कठिन बना दिया गया है। पुरानी सरकार समझती थी कि ' भय बिन प्रीत ' हो ही नहीं सकती,किन्तु जनता ने साबित कर दिया कि  भय से भय ही पैदा होता है लेकिन प्रीति नहीं। ये त्रेता नहीं कलियुग है । इस युग  में हर  चीज  कि मायने  बदल गए हैं। भारत को उन देशों की नकल भूलकर भी नहीं करना चाहिए जहाँ भय दिखाकर प्रीति करने कि लिए बाध्य किया जा रहा है। हम तो बचपन से सुनते आ रहे हैं कि -' है प्रीति यहां की रीति सदा ,मै गीत वहां कि गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ। '</p>
<p>देश की अठारहवीं संसद का स्वरूप भी सरकार की तरह बदला हुआ नजर आएगा ।  नई संसद में अब शायद ही कोई सत्तारूढ़  दल का सदस्य अल्पसंख्यक सांसद को बिधूड़ी की भाषा में धमका पाए  ,क्योंकि नई संसद में भाजपा की लाख  कोशिशों कि बावजूद कम से कम 23  अल्पसंख्यक मुसलमान सांसद भी चुनकर आये हैं ,नई संसद में हाथी का प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। भाजपा की ' बी '  टीम माने जाने वाले कुछ दलों की ताकत भी इस बार सदन में कम दिखाई देगी।संसद में संतुलन साफ़ दिखाई देगा। अब सत्तारूढ़  दल विपक्ष की न अनदेखी कार पाएंगे और न ध्वनिमत से विधेयक पारित  करने  का दुस्साहस दिखा पाएंगे ।  संसद में अब व्यक्ति विशेष कि नारे भी शायद ही लगाए जायें।</p>
<p> नयी सरकार और नयी संसद कि बारे में आज ही सब कुछ लिख देना उचित  नहीं है। हमारे यहां ' नई बहू की पालागन ' का रिवाज है ,इसलिए नई बहू से भी ज्यादा उम्मीदें  नहीं है।  नई बहू पहले चलना,उठना-बैठना तथा  घूंघट सम्हालना सीख ले ,बाद में सब कुछ देखा जाएगा।  सत्ता की सीता के हांथों में अभी  तो मेंहदी  का रंग  सुर्ख भी नहीं हुआ है। हमें नयी सरकार को वक्त देना पड़ेगा ।  पहले छह महीने में पूत  के पांव  पालने  में दिखाई देने  लगेंगे । अभी तो सवाल ये है कि<br />-कन्हैया ! किसको कहेगा तू मैया ?<br />एक ने तुझको जन्म दिया<br /> और एक ने तुझको पाला। रे कन्हैया !</p>
<p><strong> राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Thu, 06 Jun 2024 16:51:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title> अब ''रेवड़ी आवंटन ' में भी प्रतिस्पर्धा ? </title>
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<div>  भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे समर्थन देने वाला एक बड़ा वर्ग उन 'लोगों का भी था जिन्हें केंद्र सरकार ने 'प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 'मुफ़्त राशन बांटना शुरू किया था। भाजपा ने ग़रीब मतदाताओं के इस नये वर्ग को 'लाभार्थी वर्ग' के नाम से सम्बोधित किया था। इस योजना में पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी की फ़ोटो छपे मज़बूत थैलों में राशन बांटा गया था। देश में तमाम जगहों पर ढोल बजे व तमाशे के साथ इस योजना के तहत राशन बांटकर देश के ग़रीबों की</div>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141598/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/freebies-.webp" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div> भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे समर्थन देने वाला एक बड़ा वर्ग उन 'लोगों का भी था जिन्हें केंद्र सरकार ने 'प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 'मुफ़्त राशन बांटना शुरू किया था। भाजपा ने ग़रीब मतदाताओं के इस नये वर्ग को 'लाभार्थी वर्ग' के नाम से सम्बोधित किया था। इस योजना में पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी की फ़ोटो छपे मज़बूत थैलों में राशन बांटा गया था। देश में तमाम जगहों पर ढोल बजे व तमाशे के साथ इस योजना के तहत राशन बांटकर देश के ग़रीबों की ग़रीबी का न केवल मज़ाक़ उड़ाया जाता था बल्कि इसके बदले में उन ग़रीबों से वोट की उम्मीद भी रखी जाती थी। चुनावों के दौरान कई सत्ताधारी दबंग नेताओं को यह कहते भी सुना गया कि 'खायेंगे मोदी का तो वोट भी मोदी को ही देना होगा'।</div>
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<div>गोया सरकारी मुफ़्त राशन के बदले में वोट पर अधिकार जताने का दावा ? ऐसे ही एक 'राशन वितरण समारोह में मुझे भी मेरे एक परिचित राशन डिपो होल्डर ने ग़रीबों को राशन बांटने के लिये 'मुख्य अतिथि ' के रूप में आमंत्रित किया था। मैंने न केवल जाने से इंकार किया बल्कि उसे ''प्रवचन ' भी दे डाला कि वह अपनी दुकान के लाइसेंस के चक्कर में ग़रीबों की ग़रीबी का मज़ाक़ उड़ाने वालों की पंक्ति में न खड़ा हो तो बेहतर है। परन्तु वह तो एक सुनियोजित सरकारी प्रोपेगंडा मशीनरी का हिस्सा था लिहाज़ा मैं नहीं गया तो उसे राशन बांटने के लिये कोई दूसरा मिल गया। </div>
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<div>बहरहाल, प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना अप्रैल 2020 से प्रारंभ की गयी थी। इसका उद्देश्य देश में कोविड-19 के अचानक फैलने से हुए आर्थिक व्यवधानों के कारण ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को होने वाली कठिनाइयों को दूर करना बताया गया था। जिस समय यह योजना शुरू की गयी थी तभी से यह विपक्षी दलों के निशाने पर थी। परन्तु जैसे जैसे सरकार को जनता की ओर से इसका सकारात्मक फ़ीडबैक मिलता गया,सरकार इस मुफ़्त राशन योजना को आगे बढ़ाती गयी। परन्तु जब किसी राज्य में विपक्षी दाल की सरकार राज्य के नागरिकों को मुफ़्त बिजली,मुफ़्त स्वास्थ्य,मुफ़्त शिक्षा,क़र्ज़ मुआफ़ी या बेरोज़गारी भत्ता आदि देने की बात करती तो उसे स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'मुफ़्त की रेवड़ी ' बांटने का नाम देते।</div>
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<div>जबकि केंद्र सरकार बड़े गर्व के साथ ग़रीबों के वोट बैंक की लालच में छाती ठोककर दावा करती कि केंद्र की मोदी सरकार देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन दे रही है। परन्तु जब इसी दावे के साथ यही सरकार यह दावे भी करती कि हमने करोड़ों लोगों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकाला,यही सरकार जब देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के दावे करती,देश में प्रगति व ख़ुशहाली की बातें करती तब यही विपक्ष केंद्र सरकार के उन्हीं दावों को शस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हुये यह पूछता कि जिस देश में 80 करोड़ लोग राशन ख़रीदने की स्थित में नहीं हैं  उस देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के दावे में भला कैसी सच्चाई ? उस सरकार के करोड़ों लोगों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकालने व देश में प्रगति व खुशहाली के दावों में कितनी सच्चाई ? </div>
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<div>परन्तु आज जब वही विपक्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में एन डी ए ,विशेषकर उसके सबसे बड़े घटक भाजपा से दो दो हाथ कर रहा है तो उसने भी जनता से अनेक लोकलुभावन वादे किये हैं। इण्डिया गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस ने तो 48 पन्नों का एक विस्तृत घोषणापत्र जारी किया है जिसमें 5 न्याय, 25 गारंटी, के साथ जनता से 300 से अधिक वादे किये गए हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी 5 न्याय, व 25 गारंटी की घोषणा उसे चुनाव जीतने की 'गारंटी' देगी। कांग्रेस के घोषणा पत्र में न्यूनतम मज़दूरी 400 रुपए प्रति दिन करने, ग़रीब परिवार की महिला को साल में 1 लाख रुपए देने, MSP को क़ानून बनाने,अग्निवीर योजना को समाप्त करने और जाति जनगणना कराने जैसी बातें तो काफ़ी हद तक ठीक लगती हैं।</div>
<div><span style="font-size:large;"><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/freebies1.jpg" alt="freebies1" width="1521" height="1142"></img></strong></span></div>
<div>परन्तु चुनाव के बीचो बीच जिसतरह इण्डिया गठबंधन व कांग्रेस के अपने चुनाव घोषणा पत्र से अलग हटकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने 15 मई को लखनऊ में यह घोषणा कर डाली कि इण्डिया गठबंधन सत्ता में आने के बाद ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों को मिलने वाले 5 किलो राशन की जगह उससे दो गुना यानी 10 किलो राशन देना शुरू करेगी। इस घोषणा ने दो मायने  में आश्चर्यचकित किया। एक तो यह कि यदि इण्डिया गठबंधन की तरफ़ से यह घोषणा होनी ही थी तो पहले फ़ेस के चुनाव से पूर्व ही इसकी घोषणा क्यों नहीं की गयी ? यदि चुनाव से पूर्व इस 'रेवड़ी वितरण ' को दोगुना किया जाना घोषित हो जाता तो विपक्ष को इसका और अधिक लाभ मिल सकता था। परंतु चूंकि इसकी घोषणा ठीक समय पर नहीं हुई इसका अर्थ यही है कि इण्डिया गठबंधन दलों में इस 'रेवड़ी वितरण ' को लेकर पूर्ण सहमति नहीं थी। </div>
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<div>परन्तु चुनाव के बीच 5 किलो की जगह 10 किलो राशन देने की बात करना वह भी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इसकी घोषणा करना और इस घोषणा के बाद कांग्रेस,अखिलेश यादव की सपा व राष्ट्रीय जनता दाल के तेजस्वी यादव द्वारा इस 'रेवड़ी वितरण ' को दोगुना किये जाने का ज़ोर शोर से प्रचार किया जाना यही दिखाता है कि चूँकि जनता को मुफ़्त की रेवड़ी की आदत डाली जा चुकी है इसलिये क्यों न ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जाये ? भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस व सपा द्वारा इण्डिया गठबंधन की ओर से की गयी इस घोषणा से बौखला गयी है तथा इस वादे को झूठ का पुलिंदा बता रही है। बेशक चुनाव परिणाम निर्धारित करेंगे कि भविष्य में ग़रीबों को पांच किलो मुफ़्त राशन मिलेगा या दस किलो, परन्तु भाजपा व इण्डिया गठबंधन की इस तरह की 'रेवड़ी वितरण ' जैसी घोषणाओं से एक बात तो अब साबित हो ही गयी है कि सत्ता हो या विपक्ष, ''रेवड़ी आवंटन ' में भी अब प्रतिस्पर्धा मची हुई है।</div>
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<div> <span style="font-size:large;"><strong>तनवीर जाफ़री</strong></span></div>
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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 15:53:43 +0530</pubDate>
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                <title>नतीजों से पहले नए यादवत्व की स्थापना</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश में 4  जून को आने वाले लोकसभा चुनाव परिणामों से पहले सत्तारूढ़ दल में नए प्रयोग तेजी से चल रहे है।  सत्तारूढ़ दल हाल ही में संघ से छोड़-छुट्टी का ऐलान कर ही चुका है और अब लगता है कि भाजपा ने पार्टी की सरकारों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर मध्य्प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को नए यादव नेता के रूप में स्थापित करने की मुहिम  शुरू कर दी है। भाजपा और उसके नेतृत्व वाला गठबंधन चाहे सरकार बना पाए या न बना पाए लेकिन अब उसे योगी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141566/establishment-of-new-yadavatva-before-the-results"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dsfa.jpg" alt=""></a><br /><p>देश में 4  जून को आने वाले लोकसभा चुनाव परिणामों से पहले सत्तारूढ़ दल में नए प्रयोग तेजी से चल रहे है।  सत्तारूढ़ दल हाल ही में संघ से छोड़-छुट्टी का ऐलान कर ही चुका है और अब लगता है कि भाजपा ने पार्टी की सरकारों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर मध्य्प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को नए यादव नेता के रूप में स्थापित करने की मुहिम  शुरू कर दी है। भाजपा और उसके नेतृत्व वाला गठबंधन चाहे सरकार बना पाए या न बना पाए लेकिन अब उसे योगी जी किसी   भी सूरत में बर्दाश्त होने वाले नहीं है।</p>
<p>पिछले दो महीने की गतिविधियों की समीक्षा के बाद ये तथ्य सामने आया है कि मोशा की जोड़ी 4  जून के बाद यदि सबसे पहले किसी के आभामंडल को कम करेगी तो वो होंगे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी जी ने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश को बनाया है और और प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में उनका कथित सुशासन मॉडल की तरह लोकप्रिय हो रहा है ,और यही मोशा की जोड़ी को बर्दाश्त नहीं। लोकसभा चुनावों के हर चरण में भाजपा प्रत्याशियों ने यदि मोशा के बाद किसी नेता की मांग की है तो वो नाम है योगी आदित्यनाथ का। अब नाथ मोशा के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी   बनकर उभरे हैं। पहले उनकी  जगह केन्दीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम सबसे ऊपर लिया जाता था।</p>
<p>जानकार बताते हैं कि चुनाव के पांचवें चरण  के बाद जहाँ-जहाँ से योगी की मांग आयी,वहां-वहां मोशा की जोड़ी ने विकल्प के तौर  पर मप्र के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को भेजा ।  खासतौर पर यादव बाहुल्य वाले राज्यों और चुनाव क्षेत्रों में। मोहन यादव हालाँकि अभी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह आम जनता  के मामा नहीं बन पाए हैं किन्तु भाजपा नेतृत्व उन्हें योगी के स्थान पर पार्टी का नया यादव नेता बनाने में जरूर रूचि ले रही है। डॉ मोहन यादव ने भी योगी की तरह प्रदेश में आल्प्सख्यकों को हड़काना शुरूकर दिया है।  हाल ही में उन्होंने प्रदेश के मुस्लिमों को चेतावनी दी है कि यदि किसी ने भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की कोशिश की तो उसकी खैर नहीं।</p>
<p>डॉ मोहन यादव को मुख्यमंत्री बने छह महीने से ज्यादा का समय हो गया है,लेकिन उनकी पहचान अभी तक मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित नहीं हो पायी है ,लेकिन एक यादव नेता के रूप में स्थापित होने में उन्हें ज्यादा कामयाबी मिली है। मोशा   की जोड़ी ने उन्हें अप्रत्याशित  रूप से शिवराज सिंह चौहान की जगह मप्र का मुख्यमंत्री बनाया था ,जबकि राज्य विधानसभा का चुनाव चौहान के चेहरे और उनकी सरकार की उपलब्धियों के आधार पर ही लड़ा गया था। कहा जाता है कि शिवराज सिंह का कद एक मुख्यमंत्री के रूप में तो बड़ा हो ही चुका था लेकिन वे लोगों को [ पार्टी के भीतर भी और बाहर भी ] प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी का विकल्प लगने लगे थे ,इसलिए उन्हें राज्य सत्ता  से बेदखल कर दिया गया।  अब वे पहले की तरह मात्र  एक लोकसभा सदस्य की हैसियत में रहेंगे। सरकार बनने पर जरूर उन्हें  नरेंद्र सिंह तोमर के प्रदेश वापस आने से हुई रिक्त कुर्सी दी जा सकती है।</p>
<p>चुनाव के छठवें चरण   को पार कर चुकी भाजपा का नेतृत्व इस बात को लेकर बहुत सतर्क है की पार्टी में कोई भी चूहे से बिल्ली बनकर मोशे की जोड़ी की तरफ म्याऊं न करे। मोशा कोई जोड़ी ने चुन-चुनकर चूहे से बिल्ली बनने की कोशिश कर रहे तमाम नेताओं को कमजोर कर दिया है। चूहों को बिल्ली बनाने वाले आरएसएस से भी मोशा ने तर्के -ताल्लुक करने के संकेत  दे दिए हैं। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्ढा के जरिये ये कहलाया जा चुका है कि भाजपा को अब संघ की जरूरत नहीं है। संघ अपनी बिल्ली को अपने ऊपर म्याऊं करते हुए देखकर खुद सन्निपात   में हैं। संघ नेतृत्व को खुद ये आशंका है कि यदि 4  जून के बाद भाजपा फिर से बहुमत में आयी तो मोशा संघ को ही कहीं अपना चूहा न बना ले ! संघ की पशोपेश देखते ही बनती है।</p>
<p>अब तक मिले संकेतों से लगता है कि भाजपा का सत्ता में बने रहना आसान नहीं है ,किन्तु ' मोदी है तो मुमकिन है ' के नारे के साथ भाजपा ईवीएम की मदद से सत्ता सिंहासन पहुंच भी सकती है।  पिछले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने ये चमत्कार करके दिखा भी दिया था। जब पूरा देश पांच में से तीन राज्यों में कांग्रेस की वापसी का राग अलाप रहा था तब भाजपा ने पांच में से चार पर अपना कब्जा बना लिया था। तमाम अटकलें गलत  साबित   हो गयीं थीं। मुमकिन है कि लोकसभा चुनाव में भी यही सब फिर से दोहराया जाये। आखिर भाजपा को 400  पर करना है।</p>
<p>बहरहाल अभी सभी की   नजर 25  मई को समाप्त हुए मतदान के छठवें चरण के बाद अंतिम चरण पर टिकी हुईं है।अंतिम चरण  में जिन राज्यों में मतदान होना है उन राज्यों की यादव बाहुल्य वाली सीटों पर मोशा मप्र के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। योगी से भी ज्यादा महत्व मोहन जी को दिया जा रहा है। खुद योगी जी भी इस तब्दीली को महसूस कार रहे हैं। अब देखना ये होगा कि देश में अगला मॉडल गुजरात का चलेगा या उत्तर प्रदेश का? उत्तर प्रदेश का चलेगा या मध्यप्रदेश का ?आप भी इस तब्दीली पर नजर रखियर और बताइये की आपको या महसूस होता है?</p>
<p><strong> राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:53:49 +0530</pubDate>
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                <title>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट से भविष्य में नौकरियों को खतरा ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट के भारतीय संदर्भ में जहां जनसंख्या 141 करोड़ हो चुकी है और बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार है ज्यादा प्रयोग से लोगों की नौकरियां जाने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह बात दुनिया के बड़े अरबपति कारोबारी टेस्ला और एक्स के कारोबारी एलन मस्क ने स्टार्टअप के एक कार्यक्रम में फ्रांस में महत्वपूर्ण अंदाज में कहीं, भविष्य के लिए यह बात एकदम सटीक एवं सार्थक है। एक अन्य अरबपति कारोबारी इयान बैंक्स ने भी इस पर गंभीर चिंता जताई है। यह बात सभी विकासशील देशों के लिए भी लागू हो सकती है। अब आर्टिफिशियल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141563/artificial-intelligence-and-robots-threaten-jobs-in-the-future"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/download3.jpg" alt=""></a><br /><p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट के भारतीय संदर्भ में जहां जनसंख्या 141 करोड़ हो चुकी है और बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार है ज्यादा प्रयोग से लोगों की नौकरियां जाने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह बात दुनिया के बड़े अरबपति कारोबारी टेस्ला और एक्स के कारोबारी एलन मस्क ने स्टार्टअप के एक कार्यक्रम में फ्रांस में महत्वपूर्ण अंदाज में कहीं, भविष्य के लिए यह बात एकदम सटीक एवं सार्थक है। एक अन्य अरबपति कारोबारी इयान बैंक्स ने भी इस पर गंभीर चिंता जताई है। यह बात सभी विकासशील देशों के लिए भी लागू हो सकती है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नफ्ज़ पढ़कर आपके मस्तिष्क की बात तुरंत पकड़कर उस पर अमल करने लगेगा। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पल्स रेट द्वारा आपके मन की हर बात जानने में सक्षम हो सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक को वैज्ञानिकों ने मानव की सहायता के लिए और देश की बेहतरी के लिए अविष्कार किया है।</p>
<p>अभी तक तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, इजरायल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मामले में काफी आगे पर अब खाड़ी के देशों विगत 5 साल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति केवल तेल के कुए पर न रह कर अन्य योजनाओं पर भी काम करना शुरू कर दिया है और आश्चर्यजनक रूप से यूएई ,सऊदीअरबिया, कतर, मिस्र, जॉर्डन, मोरक्को और अन्य देशों में यूरोप की तुलना में अब और ज्यादा खर्च करके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक को अपने देश में बहुत मजबूत बना लिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जितने फायदे हैं उससे ज्यादा विकासशील देशों के लिए यह नुकसान देह भी हो सकता है</p>
<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपकी पल्स रीडिंग और मानसिक विचारधारा को केवल थंब इंप्रेशन में ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का डिवाइस पढ़ कर उस पर अमल कर सकता है।इस टेक्नोलॉजी से अमेरिका तथा यूरोपीय देश अब तक दुश्मन की अनेक सूचनाएं बड़ी आसानी से प्राप्त कर उसका सामरिक उपयोग करने में लगे हुए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग रूस अपनी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर मिसाइल दागने में यूक्रेन यूक्रेन के विरुद्ध कर रहा है और अब तक यूक्रेन यूरोपीय तथा नाटो देश की मदद से इसी तकनीक के सहारे रूस के विरुद्ध अब तक टिका हुआ है वैसे तो यूक्रेन और रूस का युद्ध में काफी नुकसान हुआ है पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भरपूर उपयोग दोनों देश एक दूसरे पर कर रहे हैंl</p>
<p>विकासशील देशों में इस टेक्नोलॉजी का विकास अभी काफी एडवांस नहीं है इन परिस्थितियों में उनके लिए उनके सामरिक महत्व की चीजें छुपाना दुश्मन देशों के सामने कठिन हो जाएगा और उनकी खुफिया जानकारी शक्तिशाली देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल एक सूत्र प्राप्त करने के बाद ही पूरी प्राप्त कर सकते हैं.<br />खाड़ी के देश जिनमें सऊदी अरबिया, कतर ,मिस्र, जॉर्डन, यूएई अपने बजट का 34% बढ़ा हुआ हिस्सा एआई तकनीक पर लगातार कर रहे हैं। खाड़ी के देश इस टेक्नोलॉजी का उपयोग इस वजह से कर रहे हैं क्योंकि यह उनकी भविष्य की योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है</p>
<p>जिससे वे तेल की कमाई से हटकर अन्य साधनों से अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार ला सकेंl यूं एई पहला देश है जिसने 2017 ने इस तकनीक को अपनाया था इसके बाद खाड़ी के देशों में अब टेक्नोलॉजी को अपनाने में होड़ हो गई हैl यह सभी देश एआई टेक्नोलॉजी पर लगभग 3 अरब डॉलर खर्च कर चुके हैंl दूसरी तरफ यदि इसका इस्तेमाल अति विशेषज्ञों द्वारा नहीं किया गया तो इसका दुरुपयोग जिन देशों के पास इन टेक्नोलॉजी से एडवांस टेक्नोलॉजी है वह पूरी जानकारी निकालने में सक्षम होंगे।</p>
<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग यूरोपीय देश न सिर्फ सामरिक महत्व की चीजों में कर रहे हैं बल्कि मेडिकल साइंस और अंतरिक्ष विज्ञान में भी पूरी तरह हो रहा है और इससे बहुत फायदे भी मिल रहे हैंl आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव प्रजाति के लिए जितना फायदेमंद है दूसरी तरफ उतना ही नुकसान दे और इससे वैश्विक शांति को खतरा भी हो सकता हैl राइट एक्टिविस्ट मानते हैं कि रोबोट की तरह इस तरह की विज्ञान पर आधारित चीजें माननीय प्रजाति को खत्म कर सकती है बल्कि उनकी चिंता डेटा सुरक्षा प्रपो गेंडा सर्विलांस के विरुद्ध होने वाले नुकसान पर भी ज्यादा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर खाड़ी के देशों ने एआई के इस्तेमाल पर दिशा निर्देश तय कर उसे जारी किया है हालांकि इस पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं है फिर भी इसका दुरुपयोग होने से मानव को खतरा भी हो सकता है यह एक वैश्विक चिंता की बात है।</p>
<p><strong>संजीव ठाकुर,</strong><br /><strong>वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक लेखक, कवि,स्तंभकार,</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:38:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>( देश-हित) इतिहास से ज्ञान, वर्तमान के श्रम से भविष्य के निर्माण का ले संकल्प।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हमें सदैव वर्तमान में जीना चाहिए, वर्तमान का कठोर श्रम सुनहरे भविष्य की ओर अग्रसर होता है। इतिहास से शिक्षा लेनी चाहिए और भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच के साथ आगे सदैव अग्रसर होते रहना चाहिए। किसी भी राष्ट्र को बड़ा बनाने या समृद्ध बनाने के लिए वर्षों की मेहनत अथक प्रयास और सकारात्मक सोच के साथ संयम एवं उच्च मनोबल की आवश्यकता होती है, तब जाकर ही राष्ट्र एक मजबूत तथा विकासवान राष्ट्र बन पाता है। आजादी के 75 वर्ष के बाद भारत ने विकास की गति को बहुत मजबूती के साथ थामा हुआ है। 140 करोड़ की जनसंख्या</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141530/in-the-interest-of-the-country-take-a-pledge-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dsffdasd.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हमें सदैव वर्तमान में जीना चाहिए, वर्तमान का कठोर श्रम सुनहरे भविष्य की ओर अग्रसर होता है। इतिहास से शिक्षा लेनी चाहिए और भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच के साथ आगे सदैव अग्रसर होते रहना चाहिए। किसी भी राष्ट्र को बड़ा बनाने या समृद्ध बनाने के लिए वर्षों की मेहनत अथक प्रयास और सकारात्मक सोच के साथ संयम एवं उच्च मनोबल की आवश्यकता होती है, तब जाकर ही राष्ट्र एक मजबूत तथा विकासवान राष्ट्र बन पाता है। आजादी के 75 वर्ष के बाद भारत ने विकास की गति को बहुत मजबूती के साथ थामा हुआ है। 140 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में युवा जनसंख्या का प्रतिशत बहुत ज्यादा है, आने वाले भविष्य में देश की बागडोर इन्हीं युवा हाथों में होने वाली है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बहुत अच्छी कहावत है कि "आशाओं पर आकाश टिका हुआ है" और निसंदेह आशा,उम्मीद, संभावना बहुत ही सारगर्भित एवं चमत्कारिक शब्द भी हैं। उम्मीद जो इतिहास में कई बार चमत्कार करती आई है। यह आशा एवं उम्मीद का ही प्रतिफल है कि हम सकारात्मक होकर उच्च मनोबल के साथ किसी लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ते है। फिर यदि लक्ष्य मेडिकल साइंस में किसी नई दवा को इजाद करना हो या स्पेस रिसर्च में नई टेक्नोलॉजी लाना हो या देश मे विकास की नई धारा को प्रवाहित करना हो, तो सकारात्मक ऊर्जा हमें इस संदर्भ में मदद करने वाला तत्व होता है। अच्छी और सही सोच हमेशा अच्छे परिणाम देने वाला होती है, पर बिना सकारात्मक सोच के और बिना किसी सार्थक परिणाम की कल्पना किए हुए उस पर पसीना बहाना बड़ा ही दुष्कर कार्य प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छे पद अथवा अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी सकारात्मक सोच और उच्च मनोबल तथा संयम को लेकर ही आगे अपनी तैयारी करता है एवं उच्चतम अंक या उच्च पद की प्राप्ति करता है। कोई भी खिलाड़ी ओलंपिक में बिना पदक की लालसा के तैयारी नहीं कर सकता और पदक को लक्ष्य मानकर जब वह पूर्ण मनोबल के साथ आशाओं की लकीरों के मध्य वह जब अपना पसीना मैदान में बहाता है तो वह लक्ष्य प्राप्ति की ओर लगातार अग्रसर होता है और उसे अंत में अपनी सकारात्मक ऊर्जा के कारण वह पदक अवश्य प्राप्त होता है। दार्शनिक भी कहते हैं कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक बेहतर और अच्छी शुरुआत सफलता का बहुत बड़ा हिस्सा होती है। हम संभावनाओं के दम पर जो हमें निरंतर प्रेरित करती है अपना पहला कदम उठाकर सफलता सुनिश्चित करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन की कटु सच्चाई तथा जिंदगी के उतार-चढ़ाव को झेलने के लिए एवं सफलता की ओर अग्रसर होने के लिए हमें आशा एवं सकारात्मक सोच की सदैव मदद करती इसके बिना किसी सफलता के बारे में सोचना भी बेमानी होगा। संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए हमें अपने संपूर्ण मनोबल के साथ उस कार्य को अंजाम देने के लिए अपनी तरफ से पूरी पूरी कोशिश करनी होगी एवं लक्ष्य के साथ दे तथा साधनों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर उस के संदर्भ में उसके अंतर्निहित हर तत्व को भलीभांति पहचान कर उस पर मेहनत करनी होगी अन्यथा बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यदि मेहनत और कठोर श्रम न किया जाए तो असफलता ही हाथ लगती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही वजह है कि जिन भी बड़े लोगों ने बड़ी सफलता प्राप्त की है निसंदेह उन्होंने कठिन परिश्रम अपने लक्ष्य के लिए किया था, है और करेंगे। हर बड़े कार्य को करने के लिए अच्छी योजना ,अच्छा आकलन एवं उस सफलता को अपना बनाने के लिए सही विचार तथा नीतियां बनानी होगी एवं अपने उपलब्ध संसाधनों का विश्लेषण तथा अवलोकन कर उसकी क्षमता का आकलन करना होगा। केवल हवा में सकारात्मक सोच और मनोबल के दम पर किसी बड़े लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। उत्तम एवं बड़े सकारात्मक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक बड़ी सोच अथक मेहनत एक सुनियोजित नीति एवं पृष्ठभूमि में शांत चित्त मस्तिष्क की आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वप्रथम हमारे सामने जो उपलब्ध वर्तमान का समय है वर्तमान के अवसर संपूर्ण सदुपयोग कर भविष्य की तमाम सफलताओं को सुनिश्चित किया जा सकता है। हमें सदैव चौकन्ना रहकर जो हमारे सामने समय सीमा है एवं समय के अवसर हैं उन्हें पहचान कर उसका संपूर्ण दोहन कर उपलब्ध संसाधनों का परीक्षण कर समेकित रूप से सब का समुचित उपयोग कर लक्ष्य की प्राप्ति की ओर जागृत होना चाहिए। जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री ने कहा की करोना काल में हमें आपदा में अवसर की तलाश करनी चाहिए और अवसर ही हमें किसी भी विकट परिस्थिति से लड़ने एवं उस पर नियंत्रण रखने की शक्ति एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह सकारात्मक सोच का ही परिणाम है की कोविड-19 के संक्रमण में भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में उस पर प्रभावी नियंत्रण किया एवं उस पर विजय प्राप्त की है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आसान काम नहीं था किंतु पूरे देश के नागरिकों एवं अग्रिम नेताओं की सकारात्मक सोच तैयारी एवं संसाधनों के समुचित प्रयोग से ही संभव हो पाया। आज हमारे सामने समाज में जो भी हमारे प्रेरणा स्रोत हैं, वे कभी चुनौतियों के सामने झुके नहीं और ना ही उन्हें किसी प्रकार की समाजिक कठिनाई अथवा चुनौती झुका पाई और यही कारण है की वह हमारे प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। इस संदर्भ में हर व्यक्ति को सकारात्मक सोच रख कर अपने मौजूदा संसाधनों का संपूर्ण दोहन कर सटीक नीति और भविष्य की योजनाएं बनाकर उस पर मेहनत करनी होगी और मेहनत से उपजे आत्मबल तथा संयम के साथ किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संपूर्ण ऊर्जा समेकित रूप से केंद्रित कर उस लक्ष्य की प्राप्ति करनी होगी। नागरिकों के समेकित प्रयास अच्छी सोच और कड़ी मेहनत से ही संपूर्ण राष्ट्र वैश्विक स्तर पर एक आदर्श तथा प्रेरणादायक राष्ट्र बनने की क्षमता की ओर आगे बढ़ सकता है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>वर्ल्ड रिकॉर्ड भारत लेखक कवि, चिंतक, स्तंभकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 16:54:33 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>क्यों संदिग्ध है अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पिछले दशकों में पुरस्कारों की बंदर बांट कथित साहित्यकारों, कलाकारों और अपने लोगों को प्रस्तुत करने के लिए विशेष साहित्यकार, पुरोधा कलाकार, साहित्य ऋषि जैसी कई श्रेणियां बनी है। जिसके तहत विभिन्न अकादमियां एक दूसरे के अध्यक्षों को पुरस्कृत कर रही है और निर्णायकों को भी सम्मान दिलवा रही है। इन पुरस्कारों में पारदर्शिता का अभाव है। राज्य अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां संदिग्ध है। जो कार्य एक वर्ष में पूर्ण होने चाहिए उनको करने में सालों लग रहें है। पुरस्कारों के लिए मूल्यांकन प्रक्रिया स्पष्ट और समयानुसार नहीं है। साहित्य किसी भी देश और समाज का दर्पण होता है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141527/why-the-annual-activities-of-the-academy-awards-are-suspicious%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dfsdf.jpg" alt=""></a><br /><p>पिछले दशकों में पुरस्कारों की बंदर बांट कथित साहित्यकारों, कलाकारों और अपने लोगों को प्रस्तुत करने के लिए विशेष साहित्यकार, पुरोधा कलाकार, साहित्य ऋषि जैसी कई श्रेणियां बनी है। जिसके तहत विभिन्न अकादमियां एक दूसरे के अध्यक्षों को पुरस्कृत कर रही है और निर्णायकों को भी सम्मान दिलवा रही है। इन पुरस्कारों में पारदर्शिता का अभाव है। राज्य अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां संदिग्ध है। जो कार्य एक वर्ष में पूर्ण होने चाहिए उनको करने में सालों लग रहें है। पुरस्कारों के लिए मूल्यांकन प्रक्रिया स्पष्ट और समयानुसार नहीं है। साहित्य किसी भी देश और समाज का दर्पण होता है।</p>
<p>इस दर्पण को साफ़-सुथरा रखने का काम करती है वहां की साहित्य अकादमियां। लेकिन सोचिये क्या होगा? जब देश या राज्य का आईना सही से काम न कर रहा हो तो वहां की सरकार पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जी हाँ, ऐसा ही कुछ हो रहा है देश के राज्यों की साहित्य अकादमियों में। किसी भी राज्य की साहित्य अकादमी के अध्यक्ष है होते हैं राज्य के मुख्यमंत्री। मुख्यमंत्री जिस संस्था के अध्यक्ष हो वही संस्था अगर सही से काम न करें तो बाकी संस्थाओं की स्थिति का अंदाज़ा आप लगा सकते है।</p>
<p>साहित्य किसी भी देश और समाज का दर्पण होता है। इस दर्पण को साफ़-सुथरा रखने का काम करती है वहां की साहित्य अकादमियां। लेकिन सोचिये क्या होगा? जब देश या राज्य का आईना सही से काम न कर रहा हो तो वहां की सरकार पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जी हाँ, ऐसा ही कुछ हो रहा है देश के राज्यों की साहित्य अकादमियों में। किसी भी राज्य की साहित्य अकादमी के अध्यक्ष है होते हैं राज्य के मुख्यमंत्री। मुख्यमंत्री जिस संस्था के अध्यक्ष हो वही संस्था अगर सही से काम न करें तो बाकी संस्थाओं की स्थिति का अंदाज़ा आप लगा सकते है।</p>
<p>आज हम देखते हैं कि अधिकांश साहित्य और कला अकादमियों के मंच पर पुरस्कृत होने वाले लोगों में अधिकतर को कोई जानता भी नहीं है। यह सच है कि आज जितनी राजनीति में राजनीति है उससे अधिक राजनीति साहित्य और कलाओं में है। प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे जलने वाली मशाल कहा था। लेकिन देश भर में आज साहित्य राजनेताओं के पीछे चल रहा है। पिछले दशकों में हुए साहित्य, संस्कृति और भाषा के पतन का असर आगामी पीढ़ियों तक जाएगा। लेकिन किसे फिक्र है।</p>
<p>राज्य अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां संदिग्ध है। जो कार्य एक वर्ष में पूर्ण होने चाहिए उनको करने में सालों लग रहें है। पुरस्कारों के लिए मूल्यांकन प्रक्रिया स्पष्ट और समयानुसार नहीं है। उदाहरण के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी के वार्षिक परिणामों की घोषणा का साल खत्म होने को है, मगर अभी तक नहीं हुई है। न ही आगामी साल का प्रपत्र जारी किया गया है। एक अकादमी के भीतर क्या- क्या खेल चलते है ? पारदर्शिता के अभाव में किसी को पता नहीं चलता।</p>
<p>वैसे कोई भी पुरस्कार या सम्मान उत्कृष्टता का पैमाना नहीं हो सकता। हिंदी भाषा में निराला, मुक्तिबोध, फणीश्वरनाथ रेणु, धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव, असगर वजाहत जैसे महत्वपूर्ण कवियों-लेखकों को भी साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया गया और बहुत से ऐसे लेखकों को पुरस्कृत किया गया, जिन्हें कभी का भुलाया जा चुका है। इस बारे में विचार करना चाहिए और पुरस्कार की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए।</p>
<p>आज जिस प्रकार से सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त करने के लिए कुछ योग्य एवं अयोग्य साहित्यकार, कवि, लेखक, कलाकार साम-दाम-दण्ड-भेद सब अपना रहे हैं और अपने प्रयासों में प्रायः सफल भी हो रहे हैं, उससे सम्मानों और पुरस्कारों के चयन की प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। पुरस्कारों की दौड़ में साहित्य का भला नहीं हो सकता।</p>
<p><strong> *</strong><strong>पुरस्कारों की दौड़ में खोकर</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>भूल बैठे हैं सच्चा सृजन ।</strong></p>
<p><strong>लिख के वरिष्ठ रचनाकार</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>करते है वो झूठा अर्जन ।।</strong></p>
<p><strong>मस्तक तिलक लग जाए</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>और चाहे गले मे हार ।</strong></p>
<p><strong>बड़े बने ये साहित्यकार।।*</strong><strong> </strong></p>
<p>आज साहित्य और कला जगत में बहुत सी संस्थाएं काम कर रही है। जब मैं इन संस्थाओं की कार्यशेळी देखता हूँ या इनके समारोहों से जुडी कोई रिपोर्ट पढ़ता हूँ तो सामने आता है एक ही सच। और वो सच ये है कि किसी क्षेत्र विशेष या एक विचाधारा वाली संस्थाएं आपस में अग्रीमेंट करके आगे बढ़ रही है। ये एग्रीमेंट यूं होता है कि आप हमें सम्मानित करेंगे और हम आपको। और ये सिलसिला लगातार चल रहा है अखबारों और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरता है। खासकर ये ऐसी खबर शेयर भी खुद ही आपस में करते है। आम पाठक को इससे कोई ज्यादा लेना देना नहीं होता। अब बात करते है सरकारी संस्थाओं और पुरस्कारों की। इनकी सच्चाई किसी से छुपी नहीं। जिसकी जितनी मजबूत लाठी, उतना बड़ा तमगा। सिफारिशों के चौराहों से गुजरते ये पुरस्कार पता नहीं, किस को मिल जाये। किसी आवेदक को पता नहीं होता। इनकी बन्दर बाँट तो पहले से ही जगजाहिर है।  ऐसे पुरस्कारों की विश्वसनीयता को लेकर देश भर में गंभीर आरोप लग रहे हैं। सच्चा रचनाकार इनके चक्कर में कम ही पड़ रहा है।</p>
<p><strong> *</strong><strong>अब चला हाशिये पे गया</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>सच्चा कर्मठ रचनाकार।</strong></p>
<p><strong>राजनीति के रंग जमाते</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>साहित्य के ये ठेकेदार।।</strong></p>
<p><strong>बेचे कौड़ी में कलम</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>हो कैसे साहित्यिक उद्धार।</strong></p>
<p><strong>बड़े बने ये साहित्यकार।।*</strong><strong> </strong></p>
<p>आज  संस्थाएं एक दूजे की हो गयी है। एक दूसरे को सम्मानित करने और शॉल ओढ़ाने में लगी है। सरकारी पुरस्कार बन्दर बाँट कहे या लाठी का दम। जितनी जान-पहचान उतना बड़ा तमगा। ये प्रमाण  पुरस्कार विजेताओं की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं। आज देशभर की साहित्य अकादमियां पद और पुरस्कारों की बंदर बांट करने में लगी है।अधिकांश अकादमियों के कामकाज को देखकर तो यही लगता है। जब तक विशेषज्ञता के क्षेत्र में राजनीतिक नियुक्तियां होती रहेगी तब तक ऐसी दुर्घटनाएं होती रहेगी।</p>
<p>सिविल सेवा कमिशन और प्रदेशों की अकादमी में सदस्यों और अध्यक्षों की राजनीतिक नियुक्तियों ने इन संस्थाओं की विशेषज्ञता पर प्रश्न चिन्ह लगाए हैं। पिछले दशकों में पुरस्कारों की बंदर बांट कथित साहित्यकारों, कलाकारों और अपने लोगों को प्रस्तुत करने के लिए विशेष साहित्यकार, पुरोधा कलाकार, साहित्य ऋषि जैसी कई श्रेणियां बनी है। जिसके तहत विभिन्न अकादमियां एक दूसरे के अध्यक्षों को पुरस्कृत कर रही है और निर्णायकों को भी सम्मान दिलवा रही है। इन पुरस्कारों में पारदर्शिता का अभाव है। बिना साधना के कैसा साहित्य?</p>
<p><strong> *</strong><strong>देव-पूजन के संग जरूरी</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>मन की निश्छल आराधना।।</strong></p>
<p><strong>बिना दर्द का स्वाद चखे</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>न होती पल्लवित साधना।।</strong></p>
<p><strong>बिना साधना नहीं साहित्य</strong><strong>,</strong></p>
<p><strong>झूठा है वो रचनाकार।</strong></p>
<p><strong>बड़े बने ये साहित्यकार।।</strong></p>
<p>अब समय आ गया है कि देश की सभी राज्य अकादमियों को केंद्रीय साहित्य अकादमी की तरह सचमुच स्वायत बनाया जाए और इनका काम पूरी तरह से साहित्यकारों, कलाकारों को सौंपा जाए। किसी भी अकादमी के वार्षिक कार्यों की प्रगति समयानुसार और पूरी तरह पारदर्शी बनाने पर जोर देना होगा ताकि सच्चे साहित्यकारों का विश्वास उन पर बना रहे। </p>
<p>उदाहरण के लिए हरियाणा हिंदी साहित्य अकादमी के वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा जिसका राज्य के साहित्यकार बेसब्री से इंतज़ार करते है, के वर्ष 2022 के परिणाम अभी 2024 में भी जारी नहीं हुए है। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते है कि समाज को आईना दिखाने वाले किस क़द्र सोये पड़े है। हरियाणा हिंदी साहित्य अकादमी हर वर्ष 12 से अधिक साहित्यिक पुरस्कार जिसमें एक लाख से सात लाख तक की पुरस्कार राशि दी जाती है और श्रेष्ठ कृति के अंतर्गत पद्रह सौलह विधाओं में 31 -31 हज़ार रुपये की राशि सम्मान स्वरुप प्रदान करती है।</p>
<p>इन पुरस्कारों के अलावा वर्ष भर की श्रेष्ठ पांडुलिपियों को चयनित कर उन्हें प्रकाशन अनुदान प्रदान करती है। लेकिन हरियाणा में सरकारी भर्तियों की तरह ये भी बड़ा दुखद है कि जो परिणाम अगस्त में घोषित होने थे; वो अगले साल कि जनवरी बीत जाने के बाद भी नहीं घोषित किये गए न ही साल 2023 का प्रपत्र जारी किया गया जिसमें आने वाले साल के लिए साहित्यकारों को आवेदन करना होता है; आखिर क्यों ?</p>
<p>उम्मीद है कि राज्य सरकारें अकादमियों के वर्तमान विवादास्पद कार्यों की जांच कराएगी और अकादमी में योग्य और प्रतिभाशाली लेखक, कलाकारों को नियुक्त करेगी। ताकि देश भर पर भाषा, साहित्य और संस्कृति नित नए आयाम गढ़ती रहे।</p>
<p><strong>-</strong><strong>डॉ</strong><strong>. </strong><strong>सत्यवान सौरभ</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 16:42:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>व्यावहारिक अनुभव हासिल करने के लिए छात्र ऑनलाइन इंटर्नशिप का विकल्प चुन रहे हैं </title>
                                    <description><![CDATA[<div>आज के तेजी से विकसित हो रहे शैक्षिक परिदृश्य में, छात्र अपने भविष्य के करियर को आकार देने में सक्रिय भागीदारी के महत्व को तेजी से पहचान रहे हैं। अपनी व्यावसायिक आकांक्षाओं के लिए "दरवाजा बनाने" की कहावत को अपनाते हुए, स्कूली छात्र मूल्यवान अनुभवात्मक सीखने के अवसर प्राप्त करने और खुद को गतिशील नौकरी बाजार के लिए तैयार करने के साधन के रूप में ऑनलाइन इंटर्नशिप की ओर रुख कर रहे हैं जो स्नातक होने पर उनका इंतजार कर रहा है। हाल के वर्षों में ऑनलाइन इंटर्नशिप की प्रासंगिकता में वृद्धि देखी गई है, जिससे स्कूली छात्रों को पारंपरिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141516/students-are-opting-for-online-internships-to-gain-practical-experience%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dfgdf.jpg" alt=""></a><br /><div>आज के तेजी से विकसित हो रहे शैक्षिक परिदृश्य में, छात्र अपने भविष्य के करियर को आकार देने में सक्रिय भागीदारी के महत्व को तेजी से पहचान रहे हैं। अपनी व्यावसायिक आकांक्षाओं के लिए "दरवाजा बनाने" की कहावत को अपनाते हुए, स्कूली छात्र मूल्यवान अनुभवात्मक सीखने के अवसर प्राप्त करने और खुद को गतिशील नौकरी बाजार के लिए तैयार करने के साधन के रूप में ऑनलाइन इंटर्नशिप की ओर रुख कर रहे हैं जो स्नातक होने पर उनका इंतजार कर रहा है। हाल के वर्षों में ऑनलाइन इंटर्नशिप की प्रासंगिकता में वृद्धि देखी गई है, जिससे स्कूली छात्रों को पारंपरिक व्यक्तिगत प्लेसमेंट से परे कई प्रकार के लाभ मिलते हैं।</div>
<div> </div>
<div>लचीलापन और पहुंच: निश्चित शेड्यूल के साथ पारंपरिक इंटर्नशिप के विपरीत, ऑनलाइन इंटर्नशिप छात्रों को उनके शेड्यूल को समायोजित करने के लिए लचीला कार्य वातावरण प्रदान करती है। यह लचीलापन उन्हें कक्षाओं या पाठ्येतर गतिविधियों जैसी अन्य प्रतिबद्धताओं को संतुलित करते हुए उनकी एकाग्रता के चरम घंटों के अनुसार उत्पादकता को अनुकूलित करने की अनुमति देता है। इसके अतिरिक्त, वर्चुअल इंटर्नशिप से जुड़े आवागमन के समय की अनुपस्थिति छात्रों की अपनी भूमिकाओं के लिए समय समर्पित करने की क्षमता को और बढ़ा देती है। कौशल विकास: अपनी रुचि के क्षेत्र से जुड़े कार्यों में संलग्न होकर, प्रशिक्षु व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करते हैं और पेशेवर सफलता के लिए आवश्यक आवश्यक दक्षताओं को निखारते हैं।</div>
<div> </div>
<div>सौंपी गई परियोजनाओं को दूरस्थ रूप से पूरा करने में पहल और आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन करके, प्रशिक्षु विविध कार्य वातावरण में पनपने के लिए अपनी तत्परता प्रदर्शित करते हैं। ये अनुभव न केवल उनकी विशेषज्ञता को गहरा करते हैं बल्कि उनके बायोडाटा को भी मजबूत करते हैं, जिससे वे प्रतिस्पर्धी नौकरी बाजारों में अलग हो जाते हैं। भौगोलिक सीमाओं से परे प्रतिभा तक पहुंच: ऑनलाइन इंटर्नशिप नियोक्ताओं को भौगोलिक सीमाओं से परे प्रतिभा के विविध पूल तक पहुंच प्रदान करती है। यह विस्तारित पहुंच संगठनों को विविध दृष्टिकोण, कौशल और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से समृद्ध करती है, टीमों के भीतर नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देती है। इसके अतिरिक्त, यह दूरस्थ कार्य क्षमताओं को विकसित करके कंपनियों को आधुनिक कार्यबल की उभरती गतिशीलता के लिए तैयार करता है।</div>
<div> </div>
<div>कैरियर पथों की खोज: ऑनलाइन इंटर्नशिप छात्रों के लिए विभिन्न कैरियर पथों का पता लगाने और विभिन्न उद्योगों में अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करती है। यह अन्वेषण चरण छात्रों को अपनी रुचियों को स्पष्ट करने, ताकत और कमजोरियों की पहचान करने और अपने भविष्य के करियर लक्ष्यों के बारे में सूचित निर्णय लेने की अनुमति देता है। नेटवर्किंग के अवसर: दूरस्थ होने के बावजूद, ऑनलाइन इंटर्नशिप छात्रों को नेटवर्किंग के अवसर प्रदान करती है जो उनके करियर विकास में सहायक हो सकते हैं। अपने चुने हुए उद्योग में पेशेवरों के साथ बातचीत करने, साथी प्रशिक्षुओं के साथ जुड़ने और सलाहकारों और पर्यवेक्षकों के साथ संबंध बनाने से सलाह के अवसर, नौकरी रेफरल और उद्योग के रुझानों में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्राप्त हो सकती है।</div>
<div> </div>
<div>नवीन शिक्षण अनुभव: इंटरैक्टिव परियोजनाओं, आभासी बैठकों और ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से, ऑनलाइन इंटर्नशिप नवीन शिक्षण अनुभव प्रदान करते हैं जो पारंपरिक कक्षा शिक्षा के पूरक हैं। ये गहन अनुभव सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं। सांस्कृतिक प्रदर्शन: विविध पृष्ठभूमि के सहकर्मियों के साथ काम करने से छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों, संचार शैलियों और कार्य संस्कृतियों का पता चलता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंध के बारे में उनकी समझ समृद्ध होती है। ऑनलाइन इंटर्नशिप में शामिल होने से छात्रों के बायोडाटा और समर्थन में काफी वृद्धि होती हैभविष्य में रोजगार के लिए उनकी संभावनाएं।</div>
<div> </div>
<div>ये अनुभव उनकी पहल, अनुकूलनशीलता और गतिशील कार्य वातावरण में पनपने की क्षमता के ठोस सबूत के रूप में काम करते हैं, जो उन्हें उनके चुने हुए करियर पथ में सफलता के लिए तैयार वांछनीय उम्मीदवारों के रूप में स्थापित करते हैं। इस प्रकार, ऑनलाइन इंटर्नशिप न केवल छात्रों के कौशल सेट को समृद्ध करती है बल्कि उन्हें आधुनिक नौकरी बाजार की जटिलताओं से निपटने के लिए भी सशक्त बनाती है। 
<div> </div>
<div><strong>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट </strong></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:25:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सियासत में शेखचिल्ली की शिनाख्त</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141515/sheikh-chillis-identity-in-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/bjp_sultanpur_maneka_gandhi_on_robert_vadra_rahul_gandhi_varun_lok_sabha_elections_1712833483.jpg" alt=""></a><br /><p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई नहीं लेता। जाहिर है कि यदि राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं तो मेनका जी भी उसी परिवार की बहू हैं जिस परिवार के चश्मों-चिराग को मेनका जी के सबसे बड़े नेता शाहजादा  कहते हैं। जब राहुल शेखचिल्ली हैं तो बिलासुबा उनके चचेरे भाई यानि मेनका जी के पुत्र वरुण  गांधी भी पैदायशी शेखचिल्ली हुए। उनके पिता  भी जाहिर है  शेखचिल्ली ही रहे होंगे। जैसे खग ही खग की भाषा जानता है वैसे ही रक्त संबंधी ही अपने रक्त संबंधी को पहचान लेता है।</p>
<p>शेखचिल्ली होना कोई बुरी बात नहीं है । शेखचिल्ली को गाली या अपशब्द मानने वाले बुरे हैं।  शेखचिल्ली एक ऐसा किरदार है जो हंसी-मजाक करते हुए भी बड़ी से बड़ी गुत्थी को सुलझा देता है । शेख चिल्ली का रिश्ता दुर्भाग्य से गुजरात से नहीं बल्कि हमारे उस हरियाणा से बताया जाता है जहाँ से हमारे मित्र अरुण जैमिनी आते हैं। हरियाणा के डीएनए में शेखचिल्लीपना भरा पड़ा है ।  एक हरियाणवीं ही अपने आप पर हंस सकता है। लेकिन यदि शेखचिल्ली यूपी से है तो भी उसे हंसना -रोना खूब आता है।  आप उसे गंगा किनारे रोते देख सकते हैं ,क्रूज पर इंटरव्यू देते देख सकते हैं , या रायबरेली में हँसते हुए भी।</p>
<p>भारत की सियासत में यदि शेखचिल्ली न हों तो सियासत बेरौनक हो जाये। शायद इसीलिए हर दशक की सियासत में एक न एक शेखचिल्ली हमेशा मौजूद रहता है। देश को आपातकाल का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के जमाने में ठेठ समाजवादी राजनारायण को लोग शेखचिल्ली कहते थे ,लेकिन उन्हीं राजनारायण ने इंदिरा जी का तख्ते ताउस [मयूर सिंहासन ] पलट दिया था। राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी भी अपने जमाने के रंगरेज शेखचिल्ली वीपी सिंह के शिकार बने थे। और तो और 2014  में महान अर्थशास्त्री डॉ मन मोहन सिंह को एक गुजराती शेखचिल्ली ने चारों खाने चित कर दिया था।नेहरू जी के जमाने में प्रख्यात समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया को शेखचिल्ली कहा जाता था।</p>
<p>मुझे लगता है कि मेनका जी अपने भतीजे की शिनाख्त करने में शायद इसीलिए अब तक भय खा रहीं थीं   कि कहीं भाजपा वाले उनका शेखचिल्ली डीएनए देखकर टिकिट न काट दें। दरअसल भाजपा ने मेनका जी को तो टिकिट नारीशक्ति वंदन क़ानून का सम्मान करते हुए दिया है। उनके बेटे का टिकट तो काट ही दिया ,क्योंकि वे शेखचिल्ली परिवार से जो आते हैं।मेनका जी   का शुक्रिया अदा करना चाहिए राहुल गांधी को, लेकिन वे खामोश है।  परिवार कि रिवायतें होतीं है। मेनका जी भले उनके साथ नहीं रहतीं,दूसरे दल में हैं ,लेकिन हैं तो सगी चाची। राहुल के लिए मेनका के लिए शायद उतना ही सम्मान होगा जितना कि अपनी माँ श्रीमती सोनिया गाँधी के लिए है। इसलिए शायद राहुल गाँधी पलटकर जबाब नहीं देंगे। देना भी नहीं चाहिए।</p>
<p>सोनिया इटली से आतीं हैं लेकिन भारतीय माँ के सारे गुण जानतीं हैं।  उन्होंने शायद एक बार भी अपनी देवरानी या भतीजे के लिए किसी हल्के शब्द का इस्तेमाल नहीं किया ।  कम से कम वरुण गांधी को तो शेखचिल्ली नहीं कहा ,लेकिन मेनका जी ने एक भारतीय माँ होते हुए भी अपनी मर्यादा तोड़ दी। मुमकिन है कि वे मजबूर हों।  उनसे जबरन ये सब कहलाया गया हों ।  मुमकिन है कि उनके मन में राहुल को लेकर कोई कुंठा हो ? लेकिन यदि वे ये सब न भी कहतीं तो उन्हें भारतरत्न नहीं मिलने वाला था। वे भाजपा के लिए एक अतिथि कलाकार से ज्यादा न कल थीं और न आज हैं और न कल रहेंगीं।</p>
<p>भारत के लोग बहुत शिष्ट होते है।  काने को को काना नहीं कहते । वे सम्मान से उसे 'एक नयन ' कहते है।  ' सूरदास ' कहते हैं।  इस समय देश के सबसे बड़े शेखचिल्ली को भी किसी ने आजतक शेखचिल्ली नहीं कहा ।  कांग्रेस ने भी नहीं कहा।  ये शिष्टाचार के खिलाफ है। जनता सब  जानती है कि कौन शेखचिल्ली है और कौन नहीं ? मेनका जी ने खामखां  ये जहमत उठाई और देश को बताया कि उनका भतीजा यानि जेठानी का लड़का शेखचिल्ली है। अब है तो है ।  इसका खंडन कोई नहीं कर सकता। इसका खंडन देश कि जनता कर सकती है ।  देश को 4  जून को ही पता चल पायेगा कि शेखचिल्ली किस दल का बड़ा है ? इस बार के चुनाव लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के साथ ही श्रेष्ठ शेखचिल्ली के चयन के लिए भी हो रहे हैं। </p>
<p>चूंकि आज का मुद्दा शेखचिल्ली हैं इसलिए अपने पाठकों को बताता चलूँ कि असली शेखचिल्ली   मुगल शहजादे दारा शिकोह  के गुरु थे।  शाहजहां खुद उनका बहुत सम्मान करते थे।   मुग़ल बादशाह शाहजहां का बेटा दारा शिकोह शेख चिल्ली का बड़ा प्रशंसक था।  उसने उनसे कई महत्त्वपूर्ण बातें सीखी।  शेखचिल्ली को  अब्दउर्र रहीम, अलैस अब्द उइ करीम, अलैस अब्द उर्र रज्जाक के नाम से भी जाना जाता था।  सत्रहवीं सदी के  लोग शेखचिल्ली को  महान दरवेश  मानते थे। शेखचिल्ली का  मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में है।</p>
<p>धारणा है  कि शेख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान के खानाबदोश कबीले में हुआ था।  वो लगातार घुमक्कड़ी करते थे।  यही घुमक्कड़ी उन्हें भारत ले आई।  वैसे शेखचिल्ली ऐसी कहानियों के नायक हैं, जो आम लोक-जीवन के संघर्षों से बार-बार उबारता  है. बार-बार उन्हीं संघर्षों में जुट जाता है।  उसमें ईमानदारी है, निष्ठा है, मर्यादा है, परिस्थितिजन्य विवेक है।  सबसे बड़ी बात ये भी कि कि वो वर्तमान में जीता है आज के शेखचिल्ली राहुल गांधी की तरह।<br /><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:20:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में चुनाव आयोग </title>
                                    <description><![CDATA[<div>आज-कल पूरे भारत पर चुनावी रंग चढा हुआ है। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को लोग भरपूर हर्षोल्लास से मना रहे हैं। 543 संसदीय सीटों के लिए हो रहे लोकसभा चुनाव सात चरणों में पूर्णता की ओर बढ रहे है। इन चुनावों में 96 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनेंगे। अब तक पांच चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं परन्तु पहले चरण के मतदान होते ही चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के घेरे में आ गया हैं। इन आरोपों में से एक आरोप की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141513/election-commission-in-the-dock-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/vdfg.jpg" alt=""></a><br /><div>आज-कल पूरे भारत पर चुनावी रंग चढा हुआ है। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को लोग भरपूर हर्षोल्लास से मना रहे हैं। 543 संसदीय सीटों के लिए हो रहे लोकसभा चुनाव सात चरणों में पूर्णता की ओर बढ रहे है। इन चुनावों में 96 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनेंगे। अब तक पांच चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं परन्तु पहले चरण के मतदान होते ही चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के घेरे में आ गया हैं। इन आरोपों में से एक आरोप की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी आंकड़ों को देरी से जारी करने का आरोप लग रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में बूथों पर मतों की संख्या संबंधित फॉर्म 17-सी की स्कैनड कॉपी अपलोड करने संबंधी याचिका दाख़िल की थी। इस याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग मतदान में मतों की कुल गिनती की संख्या मतदान खत्म होने के तुरंत बाद अपनी वेबसाइट पर जारी करे।</div>
<div> </div>
<div>इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते शुक्रवार को भारतीय चुनाव आयोग को एक सप्ताह के अंदर मतदान संबंधी आंकड़ों को जारी करने से संबंधित याचिका पर अपना पक्ष रखने को कहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पार्दीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। तीन जजों की बेंच का नेतृत्व कर रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़ ने चुनाव आयोग के वकील से पूछा कि प्रत्येक मतदान अधिकारी शाम 6 या 7 बजे के बाद मतदान रिकॉर्ड जमा करता है, तब तक मतदान पूरा हो जाता है। इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर के पास पूरे निर्वाचन क्षेत्र का डेटा होगा। आप इसे अपलोड क्यों नहीं करते? बेंच का सवाल एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा दायर एक आवेदन पर आधारित था। जिसका प्रतिनिधित्व वकील प्रशांत भूषण, नेहा राठी और चेरिल डिसूजा ने किया था।</div>
<div> </div>
<div>जिसमें मतदान के पहले दो चरणों के मतदाता आंकड़ों के प्रकाशन में अत्यधिक देरी का आरोप लगाया गया है।  निर्वाचन संचालन नियम, 1961 के नियम 49एस और नियम 56सी (2) के अनुसार पीठासीन अधिकारी को फॉर्म 17सी (भाग 1) प्रारूप में दर्ज मतों का लेखा-जोखा तैयार करना आवश्यक है। एनजीओ का कहना है कि मतदान विवरण प्रकाशित करने में देरी के अलावा, चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रारंभिक मतदान प्रतिशत के आंकड़ों में भी असामान्य रूप से तेज वृद्धि हुई थी। इस घटनाक्रम ने सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध मतदान डेटा की प्रामाणिकता और यहां तक ​​कि क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को स्विच किया गया है के बारे में जनता के मन में खतरे की घंटी बजा दी है। </div>
<div> </div>
<div>याचिका में कहा गया है कि लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों के लिए मतदान प्रतिशत डेटा चुनाव आयोग द्वारा 30 अप्रैल को प्रकाशित किया गया था, 19 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान के 11 दिन बाद और दूसरे चरण के मतदान के चार दिन बाद चुनाव आयोग द्वारा 30 अप्रैल की प्रेस विज्ञप्ति में प्रकाशित आंकड़ों में मतदान के दिन घोषित प्रारंभिक प्रतिशत से तेज वृद्धि (लगभग 5-6 प्रतिशत) दिखाई गई थी। 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के बाद चुनाव आयोग ने एक प्रेस नोट जारी किया था जिसमें कहा गया था कि शाम 7 बजे तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदान का अनुमानित आंकड़ा 60 प्रतिशत से अधिक था।</div>
<div> </div>
<div>इसी तरह दूसरे चरण के मतदान के बाद 26 अप्रैल को चुनाव आयोग ने कहा था कि मतदान 60.96% था। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पार्दीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच इस मामले की अगली सुनवाई 24 मई को करेगी। इस आरोप के अलावा चुनाव आयोग पर कई दूसरे आरोप भी लग रहे हैं। विपक्ष सरकारी एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ दुरुपयोग का आरोप पहले से लगाता आया है। एडीआर ने अपने याचिका में मांग की है कि चुनाव आयोग वोटिंग के 48 घंटे बाद वोटिंग प्रतिशत का फाइनल डेटा जारी करे। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह सवाल चुनाव आयोग के वकील से किया। चुनाव आयोग ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा कि डेटा इतना ज्यादा है कि इसे 48 घंटे के अंदर फाइनल कर लेना संभव नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>एडीआर ने चुनाव आयोग को वोटिंग खत्म होने के 48 घंटे के भीतर मतदान के आंकड़े जारी करने के निर्देश देने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पूछा कि "मतदान के आंकड़े को वेबसाइट पर डालने में क्या कठिनाई है"। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि इसमें समय लगता है,  क्योंकि हमें बहुत सारा डेटा इकट्ठा करना होता है। वहीं 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मतपत्रों की वापसी और ईवीएम पर संदेह की एडीआर की याचिका को खारिज कर दिया था। ईवीएम के खिलाफ संदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था, कि यह विश्वसनीय हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने वोट प्रतिशत बढ़ने का हवाला देते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को बदलने की आशंका जताई थी। बता दें कि चुनाव आयोग के सीनियर वकील मनिंदर सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आयोग के सीनियर अधिकारियों ने एनजीओ के वकील प्रशांत भषण के सभी संदेशों का जवाब दिया है।</div>
<div> </div>
<div>हालांकि जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से बात करने के बाद 26 अप्रैल को याचिका को खारिज कर दिया था। चुनाव आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने कहा कि क्यों कि एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण को 2019 से लंबित याचिका में आवेदन के जरिए कुछ भी लाने का मन है, कोर्ट को इस पर विचार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश है। चुनाव के चार चरण सही ढंग से संपन्न हो चुके हैं। चुनाव आयोग के वकील द्वारा भूषण के साथ तरजीही व्यवहार किए जाने वाली दलील पर सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच ने आपत्ति जताते हुए इसे गलत आरोप बताया। उन्होंने कहा कि अदालत को अगर लगता है कि किसी मुद्दे पर कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत है तो वह ऐसा ही करेंगे।</div>
<div> </div>
<div>चाहे उनके सामने कोई भी हो। जरूरत पड़ने पर सुनवाई के लिए बेंच पूरी रात बैठेगी। चुनाव आयोग के 4 चरणों के अपडेटेड टर्नआउट में 1.07 करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। प्रत्येक चरण में मतदान वाले दिन देर रात चुनाव आयोग की तरफ से जारी मतदान के आंकड़ों और अंत में अपडेटेड आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि लोकसभा चुनावों के पहले चार चरणों की तुलना में अंतर करीब 1.07 करोड़ वोटों का हो सकता है। यह  379 निर्वाचन क्षेत्रों, जहां वोटिंग खत्म हो चुकी है, वहां पर हर निर्वाचन क्षेत्र में औसतन 28,000 से अधिक वोट हैं। निस्संदेह इतनी वोटें किसी भी सीट पर हार को जीत और जीत को हार में बदलने के लिए पर्याप्त से कहीं जयादा बड़ा आंकड़ा है। इन्हीं सब आशंकाओं के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को अपने कटघरे में खड़ा किया है।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"><strong>(नीरज शर्मा'भरथल)</strong></div>
<div class="adL"> </div>
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<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:12:30 +0530</pubDate>
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                <title>चारधाम यात्रा :परेशानी का सबब बन रहा है अति उत्साह !</title>
                                    <description><![CDATA[<div>उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के ज्यादातर रास्ते सैलानियों की बेतादाद भीड़ से ब्लाक हो रहे हैं खासकर केदारनाथ के रास्ते साठ किलोमीटर पहले से ही यातायात जाम से जूझ रहे हैं। चार धाम यात्रा के शुरुआती नौ दिनों के दौरान कम से कम 29 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई है, मुख्य रूप से हृदय संबंधी जटिलताओं के कारण। मृतकों में बद्रीनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ में हुई मौतें शामिल हैं, जिसके बाद अधिकारियों ने तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं, जिसमें घोड़ों और खच्चरों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल है।</div>
<div>  </div>
<div>चारधाम यात्रा को लेकर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141512/chardham-yatra-excessive-enthusiasm-is-becoming-a-cause-of-trouble"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dfgsd.jpg" alt=""></a><br /><div>उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के ज्यादातर रास्ते सैलानियों की बेतादाद भीड़ से ब्लाक हो रहे हैं खासकर केदारनाथ के रास्ते साठ किलोमीटर पहले से ही यातायात जाम से जूझ रहे हैं। चार धाम यात्रा के शुरुआती नौ दिनों के दौरान कम से कम 29 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई है, मुख्य रूप से हृदय संबंधी जटिलताओं के कारण। मृतकों में बद्रीनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ में हुई मौतें शामिल हैं, जिसके बाद अधिकारियों ने तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं, जिसमें घोड़ों और खच्चरों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल है।</div>
<div> </div>
<div>चारधाम यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर है. रोजाना बड़ी तादाद में तीर्थयात्री यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ पहुंच रहे हैं. इसी बीच यात्रियों की सुविधा के लिए उत्तराखंड सरकार ने आदेश जारी किया है कि सभी तीर्थयात्रियों के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य है. इसे लेकर उत्तराखंड की मुख्य सचिव ने आदेश जारी किया है कि हरिद्वार और ऋषिकेश में ऑफलाइन पंजीकरण बंद कर दिए जाने से अब ऑनलाइन पंजीकरण के बाद ही श्रद्धालु चारधाम यात्रा पर आ सकते हैं.शासनादेश में कहा गया है कि उम्मीद है कि असुविधा से बचने के लिए सभी तीर्थयात्री यात्रा एडवाइजरी का पालन करते हुए शासन-प्रशासन को सहयोग करेंगे.बता दें कि 10 मई से प्रारंभ हुई चारधाम यात्रा में अब तक करीब 8 लाख चारों धामों के दर्शन कर चुके हैं. इस साल चारधाम यात्रा 3 नवंबर तक चलेगी। </div>
<div> </div>
<div>आप को ज्ञात है कि 10 मई से शुरू हो गई है। केदारनाथ  और यमुनोत्री  गंगोत्री धाम के कपाट खोले गए जबकि बद्रीनाथ मंदिर में दर्शन 12 मई से शुरू हो गए हैं। इसी के साथ पर्यटकों की भारी भीड़ ने तमाम इंतजामात को ध्वस्त कर दिया  यहां पहले ही दिन हजारों लोगों की भीड़ के कारण अव्यवस्था देखने को मिली।वहीं श्रद्धा आस्था के ऊपर पर्यटन वाली मानसिकता हावी होती देखी जा सकती है। जिसके चलते पहाड़ के नाजुक पर्यावरण के साथ भी मनमानी खिलवाड़ की जा रही है। अब शनिवार को तीन तीर्थयात्रियों की मौत के बाद मृतकों की संख्या में इज़ाफा हुआ, एक बद्रीनाथ में और दो यमुनोत्री में।</div>
<div> </div>
<div>पीड़ितों में सूरत के 49 वर्षीय तीर्थयात्री शशिकांत भी शामिल हैं, जिनकी बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान हृदयाघात के कारण मृत्यु हो गई, जिससे तीर्थस्थल पर मरने वालों कीकुल संख्या चार हो गई। यमुनोत्री मंदिर में दर्शन के दौरान दो और श्रद्धालुओं की मौत हो गई।तक चार धाम यात्रा के लिए गए 11 लोगों की मौत भी हो गई है।वहीं केदारनाथ के लिए पहुंचे 12 श्रद्धालुओं की मृत्यु का समाचार है। आस्था और पर्यटन का यह संगम पहाड़ की सेहत के लिए भी खतरा खड़ा कर सकता है। अब 31 मई तक के लिए यात्रा का आफलाइन पंजीकरण बंद कर दिया गया है। </div>
<div> </div>
<div> चार धाम यात्रा के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु उत्तराखंड पहुंच रहे हैं. यात्रा के शुरू होते ही चार धाम में लग रही भारी भीड़ को देखते हुए दो दिनों के लिए ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन बंद किया गया है. यहां आपको बता दें कि पिछले साल यात्रा खत्म होने के बाद सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक केदारनाथ में 96, यमुनोत्री धाम में 34, गंगोत्री धाम में 29, बद्रीनाथ धाम में 33 और हेमकुंड साहिब में 7 और गौमुख ट्रेक में 1 यानी कुल दो सौ लोगों की मौत हुई थी. वहीं 2022 में चारधाम यात्रा के दौरान 232 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। यह आंकड़े काफी डराने वाले हैं। अगर आप अभी उत्तराखंड में चारधाम यात्रा करने का प्लान बना रहे हैं तो फिलहाल इसे कुछ दिन टाल दें, क्योंकि अधिक भीड़ हो जाने से व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं।</div>
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<div>यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि बिना रजिस्ट्रेशन के यात्री पहुंच रहे हैं बुधवार से प्रशासन ने सख्ती शुरू कर दी है। व्यवस्था सुधारने के लिए सचिव स्तर के अधिकारी पहुंचे हैं। अब तक 2 लाख 76 हजार 416 श्रद्धालु चारधाम के दर्शन कर चुके हैं।उत्तरकाशी - गंगोत्री मार्ग पर पर सोमवार को गंगनानी के पास 45 किलोमीटर लंबा जाम लगा था जिसे बार बार खुलवाया गया है। हालांकि यात्रा सुचारु रुप से चलने का दावा किया गया है।कोशिश है सुगम व सुरक्षित यात्रा के साथ हर श्रद्धालु को दर्शन का लाभ मिले।यात्रा के लिए 35 लाख से ज्यादा रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। </div>
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<div>पहले दिन अधिक श्रद्धालु पहुंच गए यमुनोत्री धाम में पांच किमी का रास्ता बेहद संकरा है। यहां पर एक समय में सीमित संख्या में ही लोग आ-जा कर सकते हैं। पिछले साल जब कपाट खुले थे तो उस दिन कुल 6,838 श्रद्धालु आए थे जबकि इस बार कपाट खुलने वाले दिन 12,193 यात्री आ गए। केदारनाथ धाम में पिछले साल कपाट खुलने वाले दिन 18,335 यात्री आए लेकिन इस साल करीब 29 हजार श्रद्धालु पहुंच गए। यमुनोत्री धाम के जानकी चट्टी में कुल 15,455 श्रद्धालु थे जिनमें से आज सुबह 10 बजे तक कुल 4 हजार यात्री दर्शन भी कर चुके थे। गंगोत्री में 3902, केदारनाथ में सुबह 10 बजे तक 8194 एवं बद्रीनाथ में 4518 ने श्रद्धालुओं ने दर्शन किए।सुरक्षा के मद्देनजर कुछ यात्रियों को यमुनोत्री व गंगोत्री मार्ग पर भी ठहराया जा रहा है। सूखी टॉप से लौटते समय व गंगनानी से आगे गेट सिस्टम लागू किया गया है।</div>
<div> </div>
<div>10 मई को कपाट खुलने के बाद से अब तक करीब चार लाख श्रद्धालुओं ने केदारनाथ पहुंचकर नया रिकॉर्ड बनाया है।लोगों के लिए न रुकने का ठिकाना, न खाने-पीने की व्यवस्था पिछले चार दिनों के दौरान गंगोत्री जाते वक्त उत्तरकाशी से 20 किमी आगे बढ़ते ही सड़क किनारे बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग आराम करते दिख रहे हैं। यहां न खाने का ठिकाना है और न रुकने का। आसपास के गांवों के लोग पानी की बोतल के 30 से 50 रु. तो शौचालय उपयोग का 100 रु. तक ले रहे हैं। गंगोत्री रूट पर छह दिन से जाम में फंसे महाराष्ट्र, मप्र, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा और दिल्ली के 7 हजार यात्रियों ने आगे की यात्रा स्थगित कर लौटना ही मुनासिब समझा।पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक उत्तराखंड में चार धाम यात्रा 1200 साल से हो रही है, लेकिन पहली बार इतने श्रद्धालु पहुंचे हैं। पिछले साल यमुनोत्री, गंगोत्री के कपाट 22 अप्रैल तो केदारनाथ के 25 अप्रैल और बद्रीनाथ के 27 अप्रैल को खुले थे।गुजरात सरकार ने श्रद्धालुओं की मदद करने के लिए गांधीनगर में इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर बनाया है।</div>
<div> </div>
<div>अधिक तादाद में श्रद्धालुओं के पहुंचने से एक ओर व्यवस्थाओं का गड़बड़ाना लाजिमी है दूसरी ओर पवित्र स्थलों की पवित्रता भी प्रभावित होने की संभावना कम नही है। जब इतना अधिक संख्या में यात्रियों के जमघट चारों धाम पहुंच रहे हैं तो पहाड़ के संवेदनशील भोगोलिक वातावरण पर दुष्प्रभाव होना भी स्वाभाविक है बेशक पर्यटन से राजस्व कमाने और रोजगार व अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए चारधाम यात्रा को आकर्षण बनाने की मुहिम की गई जिस का परिणाम यात्रा के लिए आरहे लोगों की बढी तादाद है लेकिन तत्कालिक लाभ के लिए पहाड़ की सेहत से खिलवाड़ उचित नहीं है। पूर्व में उत्तराखंड का केदारनाथ जिस प्राकृतिक त्रासदी से दो चार हो चुका है जिसमें कई हजार श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी उस को भी याद रखना चाहिए लेकिन इन दिनों लोगों में कभी बेहद दुर्गम व पवित्र तीर्थ धाम माने जाने वाले इन पावन स्थलों को पर्यटन की तर्ज पर घूमने की होड़ लगी हुई है दरअसल सम्पन्न मध्यमवर्गीय लोगों में आस्था और पर्यटन एक पंथ दो काज करने की मानसिकता बनी है लोग इन समुद्र तल से आठ हजार फुट व अधिक ऊचाईयों वाले कम आक्सीजन वाले धार्मिक स्थलों पर बुजुर्गों और छोटे बच्चों को भी साथ लेकर आ रहे हैं।</div>
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<div>यात्रा शुरु होने के पहले सप्ताह में ही दर्जनों श्रद्धालुओं की मौत बता रही है कि लापरवाही चरम पर है व्यवस्थाएँ कमजोर है और सिस्टम नाकारा है। इस सब के बावजूद लोगों में पहाड़ पर पर्यटन की तर्ज पर चारधाम जाने की होड़ लगी है। यह उचित नहीं है। धार्मिक स्थलों की मर्यादाओं को ध्यान में रखकर दर्शन करने से ही पुन्य मिल सकता है पर्यटन के भाव से मौज मस्ती और अमर्यादित वस्त्र परिधान पहन कर धार्मिक विश्वास दर्शाना महज धोखा है। इन हालातों में पहाड़ की सेहत से तो जबरदस्त खिलवाड़ की जा रही है ऐसा करना अतिसंवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक सौंदर्य और वातावरण के साथ भी अन्याय है। सरकार बेरोजगारी के माहौल में रोजगार और राजस्व के लोभ में आंख बंद कर रही है और लोग पर्यटन और पुन्य का लाभ उठाने के लिए सरपट दौड़ लगा रहे हैं। </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong> लेखक वरिष्ठ पत्रकार </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:09:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चिकित्सा विज्ञान को बहुत कुछ करना  होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के बाद भारत में  चिकित्सा विज्ञान  ने बहुत तरक्की की।इंसान का जीवन काफी सरल कर दिया।गंभीर बीमारी का इलाज खोज  लिया।  दर्द  रहित आपरेशन  होने लगे। दिल −दिमाग समेत सभी क्षेत्र में  तरक्की होने से आदमी बहुत आराम और सुख   महसूस  कर रहा है, किंतु  इतना सब होने के बाद भी अभी  बहुत कुछ किया जाना शेष है।मरीज की छोटी −छोटी परेशानी के इलाज के भी  उपाए करने होंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञान इंसान के जीवन को सरल करने की हर बेहतर कोशिश में लगा है,इस सबके बावजूद अभी  बहुत कुछ होना है। हाल में गुजरात में राजकोट के स्टर्लिंग हास्पिटल</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141451/medical-science-has-a-lot-to-do"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/sdffsdf.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के बाद भारत में  चिकित्सा विज्ञान  ने बहुत तरक्की की।इंसान का जीवन काफी सरल कर दिया।गंभीर बीमारी का इलाज खोज  लिया।  दर्द  रहित आपरेशन  होने लगे। दिल −दिमाग समेत सभी क्षेत्र में  तरक्की होने से आदमी बहुत आराम और सुख   महसूस  कर रहा है, किंतु  इतना सब होने के बाद भी अभी  बहुत कुछ किया जाना शेष है।मरीज की छोटी −छोटी परेशानी के इलाज के भी  उपाए करने होंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञान इंसान के जीवन को सरल करने की हर बेहतर कोशिश में लगा है,इस सबके बावजूद अभी  बहुत कुछ होना है। हाल में गुजरात में राजकोट के स्टर्लिंग हास्पिटल में मेरे  हृदय की बाई−पास सर्जरी हुई।छोटे बेटे के पास यहां आए थे।यहीं तबियत खराब होने का पता चला।इसलिए मुझे यहीं आपरेशन कराना पड़ा। मुझे सवेरे सात बजे आपरेशन थियेटर में ले लिया गया।आपरेशन थियेटर की टेबिल पर मुझे  लिटाकर स्टाफ  मेरे  हाथ  टेबिल में  बांधता  है।यहां तक मुझे याद है। अब तक सिर्फ दो आपरेशन थियेटर सहायक ही मेरे आसपास थे।  इसके बाद कब चिकित्सक आ गए। कब आपरेशन हो गया। मुझे कुछ पता नही।  दुपहर बाद दो  बजे के आसपास मुझे  लगा कि रोशनी जली है। मुंह में भी  कोई पाइप का  चुभा।मैनें आख  खोलीं।एक बड़े हाल में कुछ बैड पर  मेरे जैसे मरीज लेटे थे। सामने लगी घड़ी दो  बजा रही थी। मेरे मुंह में दिया हुआ  पाइप हलका चुभ  रहा था। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"> बोलना चाहा तो लगा कि किसी  चीज से मुंह बंद किया हुआ। थकान महसूस हुई। मैंने आंखे बंद  कर लीं।ये भी लगा कि सात घंटे  बाद होश आया है।कुछ समय बाद लोगों के बोलने की आवाज आई। आंखे खोली तो  डाक्टर के साथ मास्क लगाए  मेरे बिस्तर के पास मेरी पत्नी खड़ी है।उसके पूछने पर मैने  इशारों से कहा कि ठीक हूं। डाक्टर ने मुझे  बताया कि आपरेशन बढिया हुआ है। सब ठीक है। चिंता की कोई बात नहीं। डाक्टर का आभार  जताने के लिए मैं हाथ  जोड़ना   चाहता हूं कि लगता  है कि हाथ अभी टेबिल में बंधे  हैं। पत्नी मुझे देखकर चली जाती हैं। कुछ देर में स्टाफ मुंह से  टेप हटाकर मुंह में दी टयूब  निकाल देता  है। हाथ भी  खोल दिए जाते  हैं। अब मैं  आराम  महसूस  कर रहा हूं ।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन कब हो गया पता ही नही चला। स्टाफ ने इतना जरूर कहा कि आपके आपरेशन में छह घंटे लगे हैं।आपरेशन तो दर्द  रहित हो गया किंतु परेशानी की कहानी अब शुरू होती है।लगता है कि होठ  सूख  रहें हैं। जीभ  अकड़  रही है। देखरेख के लिए तैनात स्टाफ नर्स से मैं पीने के लिए पानी मांगता हूं।वह मनाकर देती है।  कहती है कि शाम छह बजे  चाय  दी  जाएगी।  उसके पच जाने पर थोड़ा− थोड़ा पानी  मिलेगा। राउंड  पर आए डाक्टर से मैं होथ सूखने और जीभ के अकड़ने की बात कहतां हूं।वह कहते हैं कि इसे तो  बर्दाश्त करना  होगा।किंतु  होठ भिगोने के लिए एक −दो बूंद  पी देने के कह जाते हैं।एक महीना इसी में निकल जाता है। मुह में छाले हो जाने से कुछ खाना संभव नही होता।  न खाने  से सूखी  उलटी होती हैं।दर्द रहित आपरेशन के बाद चिकित्सा विज्ञान को  इस  एक माह की परेशानी का इलाज भी खोजना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बात और उत्तर प्रदेश और दिल्ली एनसीआर में आपरेशन को जाने वाले को आपरेशन की जरूरत के लिए खून का प्रबंध खुद करना  प़ड़ता है। मैं  इसी को लेकर परेशान था कि हम तो घर से बहुत दूर यहां  गुजरात में हैं ,हमें  खून कौन देगा कौन  तीमारदारी करेगा,किंतु अस्पताल में पता भी नही चला।आपरेशन के स्टीमेट में दो बोतल बल्ड का मूल्य  जुड़ा देखकर मैं  संतुष्ठ हो गया कि अब रक्त का प्रबंध  हमें नही करना  होगा। अस्पताल करेगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन के बाद  और  बाद में आईसीयू और अस्पताल में भर्ती  रहने के दौरान स्टाफ  का व्यवहार और सेवा कार्य लाजवाब था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">रविवार 12 मई को अंतराष्ट्रीय नर्सेज डे  मनाया गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय नर्स सप्ताह प्रत्येक वर्ष </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मई को शुरू होता है और </span>12 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन पर समाप्त होता है। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">को आधुनिक नर्सिग आन्दोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया व सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल "द लेडी विद द लैंप" (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ था। लेकिन उच्च कुल में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज अस्पताल के स्टाफ  और  उसके कार्य को  देखता हूं तो  सभी  नर्स में मुझे फ्लोरेंस नाइटिंगेल  नजर आती हैं। सेवा करते वह कभी  बहिन  नजर आती है तो कभी  बेटी  और कभी  मां। ये  अलग बात है कि ये  पैसे के लिए अस्पताल में कार्य कर रही है किंतु इनका समर्पण कही भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल से कम मुझे  नजर नही आया।चिकित्सक भी अपने में लाजवाब हैं। मेरे  हृदय का आपरेशन करने  वाले डा सर्वेशवर प्रसाद  हृदय के  प्रतिदिन तीन −चार आपरेशन  करते हैं किंतु न  उनके चेहरे पर कभी तनाव नजर आता है, थकान।  ये ही हालत   डा सर्वेशवर प्रसाद   के जूनियर्स की भी है।फोन पर डाक्टर और उनके सहायक दिन राज− उपलब्ध हैं।उनके कार्य सेवाभाव और समर्पण को देखकर लगता है कि यह सब ऐसे ही नही है।इसके लिए उनका त्याग और मरीज के लिए सेवाभाव उन्हें प्रसिद्धि दे रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन के दूसरे दिन स्टाफ मुझे  ही नही,  हृदय के आपरेशन के सभी  मरीज को  सहारा देकर बैठाकर देता है।  बाद में  उसे खड़ाकर धीरे− धीरे हाल में घुमाया जाता है।एक से दो घंटे के लिए कुर्सी पर बैठाया जाता  है। कहा  जाता है कि आपका आपरेशन हो गया। अब नियमित जीवन शुरू की जीइए।घूमिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतना   सब होने के बाद महसूस होता  है कि अन्य अस्पतालों की तरह इस अस्पताल में भी  लोकल कंपनी की अधिकतर दवाएं मल्टीनेशनल कंपनी से काफी मंहगी है। मेरे आपरेशन के टांकों में पानी आने के कारण मुझे इंट्रावेनस  एंटीबाइटिक इंजैक्शन   लिखा  जाता है।ये  इंजैक्शन अस्पताल में मैडिकल स्टोर पर  1100  रूपये के आसपास   है, जबकि राजकोट के दवाई के होलसेल मार्केट में यह तीन सौ रूपये का मिल रहा है। होलसेल मार्केट में बस दवाई का बिल नही मिलता।सरकार को अस्पताल के  मैडिकल स्टोर पर बिकने वाली दवा पर  नियंत्रण  करना  पडेगा।  एक चीज और  देखने में आई कि प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड योजना के कार्डधारक अब अस्पताल में निशुल्क  चिकित्सा  सुविधा का लाभ  उठा रहे हैं।लगभग  सभी अस्पताल में आपरेशन के लिए आने वालों  से रिसेप्शन पर ही  पूछा  जाता  है कि आयुष्मान कार्ड  है। कार्ड  देने पर मरीज के प्राय− लगभग सभी  आपरेशन पूरी तरह निशुल्क  हैं। इसमें कोई भेदभाव नही। मरीज हिंदू हो या मुस्लिम बस कार्डधारक होना   चाहिए। प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्डधारक की चिकित्सा सरकार ने निशुल्क करके आम आदमी का उपचार बहुत सरल कर दिया।उसका जीवन सरल बना दिया। इस योजना में अभी  सुधार की जरूरत है।किसी भी प्राइवेट  मेडिक्लेम में आपरेशन के बाद दो  महीने का  दवा का व्यय भी  कंपनी की ओर से देय  है,  जबकि आयुष्मान योजना में अस्पताल की ओर से  मात्र  दस दिन की दवा देने का प्रबंध है, जबकि काफी मरीजों का  उपचार लंबा  चलता है। देखने में आया है कि कुछ अस्पताल आपरेशन के बाद की दस दिन की दवा भी मरीज को नही देते।इसलिए इस योजना में अभी  बहुत सुधार की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं) </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 May 2024 16:54:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>न जाने कितने मुखौटों में जिंदगी तू है</title>
                                    <description><![CDATA[<p>एक तरफ राजनीति है और दूसरी तरफ जिंदगी ।  दोनों के पास असंख्य मुखौटे हैं। इसीलिए न जिंदगी का असल चेहरा सामने आ पाता है और न राजनीति का।  लोग एक चेहरे पर कई चेहरे लगाए बैठे हैं। हमारे साथी कवि स्वर्गीय प्रदीप चौबे ने सियासत पर कम जिंदगी पार ज्यादा लिखा ।  वे कहते थे -<br />कभी जुकाम,कभी पीलिया,कभी फ़्लू है<br />न जाने कितने मुखौटों में  जिंदगी तू है<br />यकीनन जितनी दुश्वारियां जिंदगी के साथ बाबस्ता हैं ,उतनी ही दुश्वारियां सियासत के साथ भी हैं। दोनों गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। आप कह सकते हैं कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141447/you-are-life-in-so-many-masks"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/mukhaute1.jpg" alt=""></a><br /><p>एक तरफ राजनीति है और दूसरी तरफ जिंदगी ।  दोनों के पास असंख्य मुखौटे हैं। इसीलिए न जिंदगी का असल चेहरा सामने आ पाता है और न राजनीति का।  लोग एक चेहरे पर कई चेहरे लगाए बैठे हैं। हमारे साथी कवि स्वर्गीय प्रदीप चौबे ने सियासत पर कम जिंदगी पार ज्यादा लिखा ।  वे कहते थे -<br />कभी जुकाम,कभी पीलिया,कभी फ़्लू है<br />न जाने कितने मुखौटों में  जिंदगी तू है<br />यकीनन जितनी दुश्वारियां जिंदगी के साथ बाबस्ता हैं ,उतनी ही दुश्वारियां सियासत के साथ भी हैं। दोनों गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। आप कह सकते हैं कि उस्ताद हैं। न आप जिंदगी से पार पा सकते हैं और न सियासत से। जिंदगी और सियासत के बिना काम भी नहीं चलता। आप समाज में वीतरागी होकर तो रह नहीं सकते।</p>
<p> सियासत का का हर फैसला आपकी जिंदगी को प्रभावित करता है ,भले ही आपका सियासत से कोई रिश्ता हो या न हो ? आप किसी दल या विचारधारा के साथ हों या न हों ? मार तो आपको खाना ही पड़ेगी। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक और कितनी मार खाई जा सकती है ?<br />आजकल जिंदगी पर मौसम भी भरी पद रहा ह।  पारा 47  डिग्री को पार कर चुका है ।  जैसे  नेताओं को कोई केंचुआ आदर्श आचार संहिंता की धज्जियां उड़ाने से नहीं रोक सकता ,उसी तरह मौसम को भी   कोई अपने तेवर दिखने से नहीं रोक सकता। अकेले वृक्ष रोक सकते थे लेकिन उन्हें भी बेरहमी के साथ कत्ल किया जा रहा है।  कल ही पढ़ा की पांच साल में 53  लाख से ज्यादा छायादार वृक्ष हमारे राष्ट्रवादी,देशभक्त,अंधभक्त समाज ने काट कर फेंक दिए। अब आसमान से बरसती आग को रोकने के लिए कोई छाता हमारे पास नहीं है। एयर कंडीशनर हमें भीतर ठंडक देते हैं लेकिन बाहर वे भी इतनी आग उगलते हैं की सांस लेना मुश्किल हो रहा है। दुर्भाग्य से इस बार सियासी पारा और मौसम का पारा एक साथ चढ़ा हुआ है। इसीलिए गर्मी दो गुना ज्यादा है। परिंदों और पशुओं की तो छोड़िये किसी को इंसानों की जिंदगी की फ़िक्र नहीं है।  सारे फ़िक्र तौसवीं इन दिनों चुनाव में व्यस्त है।  कुछ लड़ रहे हैं और   बाकी के चुनाव लड़ा रहे हैं। दिल्ली में तो केजरीवाल,मालीवाल आपस में ही लड़ रहे हैं। जनता के बारे में सोचे कौन ?</p>
<p>लोकतंत्र में आम चुनाव सत्यनारायण कथा के अध्यायों की तरह होने लगे है।  चुनाव में मौसम  का मिजाज नहीं बल्कि सत्तारूढ़ दल की सहूलियत देखी जाती है ।  इस बार भी केंचुआ ने मतदान की तारीखें तय करते वक्त मौसम विभाग से नहीं भाजपा मुख्यालय से विमर्श किया। इसी का नतीजा है कि इस बार मतदान अपेक्षाकृत कम हो रहा है। अब आप ही सोचिये की आदमी मतदान के जरिये अपना लोकतंत्र ,अपना विचार ,अपना भविष्य बचाये या जिंदगी बचाये ? अगर मतदान के लिए घर से निकले और लू ने आपकी लू-लू कर दी तो न घर के रहिएगा और न घाट के। 'जिंदगी से हाथ धोना पड़ेंगे सो अलग। लू से मरने पर कोई भी सरकार अपने परिजनों को दो-चार लाख रूपये का मुआवजा भी नहीं देने वाली। यदि आपने बीमा करवा रखा होगा तो कम्पनी दावा स्वीकार नहीं करेगी । कहेगी-' भरी दोपहर में घर से निकले ही क्यों थे मरने के लिए ?'</p>
<p>अग्निदग्ध मौसम में नयी सरकार चुनना  भी लोहे के चने चबाने जैसा है ।  एक तरफ अपीलें की जा रहीं हैं कि -' पहले मतदान ,बाद में जलपान 'और दूसरी तरफ मतदान के बाद जलपान कराने वाला कोई दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा। अयोध्या में राम मंदिर में प्राण -प्रतिष्ठा समारोह में जाने के लिए निमंत्रण   के साथ घर-घर पीले चावल बांटने वाले इस बार मतदाता पर्चियां बांटने भी नहीं आये ।  सबने सोच लया है कि राम जी के नाम पर जिसे वोट देना है वो पीले चावलों या मतदाता पर्चियों का इन्तजार थोड़े ही करेंगा ? भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने ये मान लिया है कि जिसे अपनी बीबी का मंगलसूत्र बचाना है,पुरखों कि जमीन बचाना है ,आरक्षण बचाना है और मुसलमानों को भगाना है तो हर कोई  झक मारकर वोट डालने आएगा। अर्थात अब अटकी मतदाता की है ,भाजपा की नहीं। भाजपा को तो जो हासिल करना था सो उसने कर लिया।</p>
<p>प्रचंड गर्मी में हो रहे मतदान के नतीजे भी प्रचंड ही आएंगे ।  आप जब इस लेख को पढ़ रहे होंगे तब तक मतदान का पांचवां चक्र समाप्त हो चुका होगा।  टीवी चैनलों  और यू- ट्यूब चैनलों पर एक तरफ गोदी मीडिया और दूसरी तरफ गैर मोदी मीडिया की चिड़ियाँ चहकती नजर आएँगी। वे किस को हरा रही होंगी तो किसी को जिता रही होंगी। पांचवें चरण में   मोदी से लेकर गांधी तक का भविष्य दांव पर  है ।देश के भविष्य की बात कोई नहीं कर रहा और न किसी को देश के भविष्य की फ़िक्र है। सबको अपना-अपना भविष्य दिखाई दे रहा है। इतने आत्मकेंद्रित नेताओं के भविष्य के मुकाबले आपको,हमको देश के भविष्य की चिंता करना चाहिए।</p>
<p><strong>राकेश अचल  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Mon, 20 May 2024 16:48:43 +0530</pubDate>
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