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                <title>swatantra prabhat Sampadkiya - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>शौचालय बनाना सिर्फ एक बुनियादी  सुविधा न होकर, महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और समानता की लड़ाई है</title>
                                    <description><![CDATA[<p>विश्व शौचालय दिवस (World Toilet Day) सिर्फ एक दिन का जश्न नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि शौचालय तक पहुँच और स्वच्छता सिर्फ बुनियादी मानवाधिकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, स्वास्थ्य सुरक्षा और गरिमा का मामला है। भारत में स्वच्छ भारत मिशन ने इस दिशा में अहम कदम उठाए हैं, लेकिन उसके बावजूद कई चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, विशेष रूप से महिलाओं का मामला।<br />महिलाओं की स्थिति और शौच के अभाव में चुनौतियाँ बड़ी मुश्किल राहे थी।भारत में पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के कारण, महिलाओं अक्सर खुले में शौच के लिए मजबूर होती थीं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/160710/building-a-toilet-is-not-just-a-basic-facility-but"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/शौचालय-बनाना-सिर्फ-एक-बुनियादी--सुविधा-न-होकर,-महिलाओं-की-गरिमा,-सुरक्षा-और-समानता-की-लड़ाई-है.jpg" alt=""></a><br /><p>विश्व शौचालय दिवस (World Toilet Day) सिर्फ एक दिन का जश्न नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि शौचालय तक पहुँच और स्वच्छता सिर्फ बुनियादी मानवाधिकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, स्वास्थ्य सुरक्षा और गरिमा का मामला है। भारत में स्वच्छ भारत मिशन ने इस दिशा में अहम कदम उठाए हैं, लेकिन उसके बावजूद कई चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, विशेष रूप से महिलाओं का मामला।<br />महिलाओं की स्थिति और शौच के अभाव में चुनौतियाँ बड़ी मुश्किल राहे थी।भारत में पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के कारण, महिलाओं अक्सर खुले में शौच के लिए मजबूर होती थीं। यह सिर्फ स्वास्थ्य-खतरे का मामला नहीं था, बल्कि उनकी सुरक्षा, गरिमा और आत्मसम्मान से जुड़ा सवाल था।सुरक्षा और असमर्थता  खुले में शौच करने का मतलब होता था दूर-दूर जाना, अक्सर अंधेरे में या असुरक्षित स्थानों पर।</p>
<p>महिलाओं के लिए यह खतरा दोगुना था । उन्हें यौन उत्पीड़न, जान-बचाव की परेशानी और शारीरिक असुविधा का सामना करना पड़ता था। विशेष रूप से गर्भवती महिलाएं, बुज़ुर्ग महिलाएं और किशोर लड़कियों के लिए यह प्रक्रिया बेहद जोखिम भरी होती थी। स्वास्थ्य और स्वच्छताखुले में शौच के कारण कीचड़, कीड़े, बैक्टीरिया और मैल घुला पानी आसपास फैलता था, जिससे डायरिया, गंदे पानी से संक्रामक रोगों का जोखिम बढ़ता था। इस तरह की स्थितियाँ बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर भारी असर डालती थीं।</p>
<p><strong>गरिमा और सामाजिक दबाव</strong><br />महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान के लिए इज्जतघर बहुत मायने रखते हैं। बिना शौचालय के, उन्हें न केवल शारीरिक असुविधा बल्कि सामाजिक शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ती थी। कई जगहों पर महिलाएं इससे जुड़ी सामाजिक बंदिशों और शर्मिंदगी के कारण अपनी ज़रूरतों को छिपाती थीं या जोखिम भरा विकल्प चुनती थीं।सरकार की भूमिका और शौचालय निर्माण की प्रगति स्वच्छ भारत मिशन का दृष्टिकोण  है।<br />प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी, जिसके दो हिस्से थे। ग्रामीण (SBM-G) और शहरी (SBM-U)। इसका प्रमुख लक्ष्य था ओपन डेफेक्शन फ्री (ODF) भारत बनाना।सरकार ने अपनी नीति में यह माना कि सिर्फ शौचालय बनाना ही पर्याप्त नहीं है उन्हें बनाना तो पहला कदम है, लेकिन उसके बाद उपयोग, रख-रखाव, व्यवहार परिवर्तन और अपशिष्ट प्रबंधन बेहद ज़रूरी हैं।निर्मित शौचालयों की संख्या करोड़ो में है।स्वच्छ भारत मिशन के आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने बड़े पैमाने पर निर्माण किया है।</p>
<p>सितंबर 2024 तक, ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 11.66 करोड़ घर-घर शौचालय बनाए जा चुके हैं। शहरी क्षेत्रों में, SBM-Urban के अंतर्गत 63.63 लाख (लगभग 6.36 करोड़) व्यक्तिगत घरेलू शौचालय बनाए गए हैं। <br />इसके अलावा, शहरी हिस्से में लगभग 6.36 लाख (636,000) सार्वजनिक और सामुदायिक शौचालय भी बनाए गए हैं। <br />ग्रामीण स्तर पर 2.41 लाख से अधिक सामुदायिक सैनिटरी (सार्वजनिक) परिसर तैयार किए गए हैं। लगभग 5.87 लाख गाँवों को ओडीएफ ,+ स्टेटस मिला है, जहाँ सिर्फ खुले में शौच खत्म करने के बाद ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन तक किया जा रहा है। इस तरह की उपलब्धियाँ इस मिशन की गंभीरता और व्यापकता को दर्शाती हैं।</p>
<p>लोगों की सोच शौचालय के प्रति जन दृष्टिकोण और जनता की सोच इस मिशन के बारे में मिश्रित है। कुछ सकारात्मक दृष्टिकोण हैं, तो कुछ आलोचनाएँ भी।लोगो के सकारात्मक दृष्टिकोण है कि इसे मोदी सरकार की प्रमुख सफलता के रूप में देखते हैं ।उन्होंने दस वर्ष के अंदर लाखों-करोड़ों शौचालय बनवाए, जिससे पहले खुले में शौच करना सामान्य था और अब बहुत से गाँव और शहर ओडीएफ घोषित हुए हैं।महिलाओं और बच्चों की गरिमा में सुधार हुआ है। इज्जतघर का विचार सिर्फ भौतिक सुविधा नहीं, एक सामाजिक परिवर्तन भी है।स्वास्थ्य पर असर भी सकारात्मक दिखता है ।बच्चों में डायरिया जैसी बीमारियों में कमी, और स्वच्छता से जुड़ी जागरूकता बढ़ी है।</p>
<p>.नकारात्मक और सतर्क दृष्टिकोण केवल लोगो का ही नही है। विपक्ष भी हमलावर है और देश का विकास उनको पच नही रहा है।कांग्रेस ने देश की आजादी के बाद लोगो को मुलभुत सुविधा देने के लिए कभी सकारात्मक रुख नही अपनाया।जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया। कुछ विशेषज्ञ और समाजशास्त्री कहते हैं कि सिर्फ निर्माण ही काफी नहीं है। IMPRI की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कई घरों में शौचालय बने होने के बावजूद, हर जगह उनका उपयोग नहीं हो रहा है। रख-रखाव  की बड़ी समस्या है। कई शौचालयों में साफ-सफाई, पानी और अपशिष्ट प्रबंधन नहीं हो पाता।व्यवहार परिवर्तन का काम अधूरा है। कुछ जगहों पर लोग फिर भी खुले में जाना पसंद करते हैं, या उपयोग न करने की आदत बन गई है क्योंकि उनकी निर्माण की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी या सुविधाएँ सीमित थीं।</p>
<p>मोदी सरकार को लोग कैसे देखते हैं ।मोदी सरकार को स्वच्छता को हिंदुस्तान की प्राथमिकता बनाने के लिए बहुत सम्मान मिला है। यह मिशन न सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है, बल्कि एक जन आंदोलन के रूप में पेश किया गया है।सरकार के बजट और संसाधन आवंटन को एक गंभीर सरकारी प्रतिबद्धता माना गया है । कई लोगों के नज़र में यह दिखाता है कि मोदी सरकार ने सिर्फ घोषणाएँ नहीं की, बल्कि बड़े पैमाने पर कार्रवाई की।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मिशन को पहचान मिली है, जिससे भारत की स्वच्छता छवि में सुधार हुआ है।<br />कुछ आलोचक कहते हैं कि सरकार ने शुरुआत में पर्याप्त बजट नहीं दिया था, या आवंटन और रिलीज़ के बीच देरी रही।</p>
<p>भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। निर्माण ठेकेदार, दलाल, स्थानीय मिस्त्रीगण और सरकारी एजेंसियाँ लाभ में शामिल हो सकती हैं।उपयोग और रख-रखाव के बाद की विस्तार योजनाओं (जैसे ODF Plus) में जनता और स्थानीय समुदाय की भागीदारी कुछ जगहों पर सुस्त है।भ्रष्टाचार, बिचौलिये और कमी  समस्या के पहलूआज भी विधमान है।भ्रष्टाचार इस मिशन की चुनौतियों में एक बड़ी बाधा रही है। बिचौलियों और दलालों की भूमिका में ग्रामीणों के मजबूरी का फायदा उठाया गया है।कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि शौचालय निर्माण में स्थानीय दलाल और मिडिलमैन शामिल होते हैं। वे लाभ कमाने के लिए निम्न-मानक निर्माण सामग्री उपयोग करते हैं।</p>
<p>ठेकेदारों और मिस्त्रीगण कभी-कभी गुणवत्ता नियंत्रण की अनदेखी करते हैं, जिससे टॉयलेट की दीवारें, टैंक या सीटें खराब बनती हैं।दावा किया गया है कि लाभार्थियों को मिलने वाली राशि (वित्तीय सहायता) पूरी तरह गायब नहीं होती, बल्कि कुछ हिस्सा दलालों या ठेकेदारों के पास चला जाता है।जिसमे पंचायत के कार्मिक से लेकर उच्च अधिकारी और सरपंच शामिल रहते थे। यह वित्तीय हस्तक्षेप लोगों तक सीधा नहीं पहुँचने का कारण बनता है।इस वजह से, कुछ परिवारों के हाथ में आठ- दस हजार जैसा हिस्सा आता है, जबकि शौचालय निर्माण में खर्च उससे कहीं अधिक हो सकता है। यह लाभ विभाजन और पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।दोष सिर्फ केंद्र सरकार को देना उचित नहीं है। राज्य सरकारें, पंचायत स्तर के अधिकारी, स्थानीय ठेकेदार और मिस्त्रीगण भी जिम्मेदार हैं। निगरानी तंत्र में कमज़ोरी रही है । तीसरे पक्ष की जांच, सतत निगरानी और जवाबदेही  प्रणाली मजबूत नहीं रही है।</p>
<p>लाभार्थियों की भागीदारी सीमित रही  है।सामाजिक जांच  और समुदाय-नेतृत्व को और बढ़ाना चाहिए।विपक्षी दल और आलोचक इस मिशन को पूरी तरह नकार नहीं करते, लेकिन उनकी चिंताएँ स्पष्ट हैं।<br />विपक्ष का मानना है कि बहुत से शौचालय निर्माण संख्या का खेल बन गए हैं।सिर्फ संख्या दिखाने के लिए निर्माण किया गया, लेकिन गुणवत्ता पर ध्यान कम गया। कुछ जगहों पर दो सीट वाला एक ही टॉयलेट जैसा विचित्र निर्माण मुद्दे सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में ऐसा मामला सामने आया है।<br />पर्याप्त राशि नहीं जारी की गई।</p>
<p>विपक्ष यह तर्क देता है कि केंद्र ने शुरू में पर्याप्त बजट आवंटन नहीं किया या राज्य और पंचायती स्तर पर फंड रिलीज़ में देरी की। ये देरी यानी कम राशि योजना को समय पर और प्रभावी रूप से लागू करने में बाधा बनती हैं। रख-रखाव और व्यवहार परिवर्तन पर ध्यान न देना।कई विपक्षी नेताओं की राय है कि मोदी सरकार सिर्फ निर्माण को महत्व देती है, लेकिन निर्माण के बाद उपयोग, सफाई, मरम्मत और समुदाय की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण स्तंभों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही। वे कहते हैं कि स्वच्छता योजना का असली परिणाम तभी दिखेगा जब शौचालय नियमित रूप से उपयोग किए जाएँ और उनके रख-रखाव का सही प्रबंधन हो।<br />भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमीदेखी गई।</p>
<p>विपक्ष उन मामलों को उजागर करता है जहाँ निर्माण दर में अनियमितताएँ और लाभार्थियों तक सीधे पैसों के न पहुँचने के आरोप हैं। वे चेतावनी देते हैं कि अगर निगरानी मजबूत नहीं हुई, तो स्वच्छता मिशन लंबे समय में टिकाऊ नहीं रह सकेगा। आगे का विजन और समाधान भी सरकार का सकारात्मक है।<br />भविष्य में स्वच्छता और शौचालयों के क्षेत्र में सुधार के लिए कुछ प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं:सरकार को . ODF Plus और व्यवहार परिवर्तन लाना चाहिए।</p>
<p>भारत को सिर्फ ओपन डेफेक्शन फ्री लक्ष्य से आगे बढ़कर ODF Plus की ओर जाना होगा, जहाँ न सिर्फ खुले में शौच खत्म हो, बल्कि ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन  भी सुनिश्चित हो।<br />व्यवहार परिवर्तन के लिए सामाजिक जागरूकता अभियानों को मजबूत किया जाना चाहिए।पंचायत स्तर पर महिलाएँ और युवा नागर समिति  नेतृत्व लें।<br /> रख-रखाव और प्रणालीगत निगरानीजरूरी है।<br />बनाए गए शौचालयों की नियमित निगरानी  सुनिश्चित करने के लिए स्वच्छता कॉल सेंटर, ऐप-आधारित शिकायत प्रणाली और स्थानीय स्वच्छता समितियाँ होनी चाहिए।</p>
<p>वित्तीय सहायता सिर्फ निर्माण तक सीमित न हो ।मरम्मत, सफाई और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए भी बजट निर्धारित करना चाहिए।<br />निर्माण में शामिल ठेकेदारों और मिस्त्रियों के लिए स्पष्ट तकनीकी मानक  और गुणवत्ता नियंत्रण नियम लागू किए जाने चाहिए।<br />लाभार्थियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए सामाजिक ऑडिट  पंचायत-स्तर की समीक्षा समितियाँ और तीसरी पक्ष की निगरानी  आवश्यक है।</p>
<p>भ्रष्टाचार और बिचौलियों को नियंत्रित करने के लिए शिकायत निवारण तंत्र तेज़ और प्रभावी होना चाहिए।<br />पिंक टॉयलेट महिलाओं के लिए विशेष शौचालय की संख्या बढ़ानी चाहिए, खासकर शहरी झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों और सार्वजनिक स्थानों में, ताकि महिलाओं को निजी, सुरक्षित और स्वच्छ सुविधा मिले।<br />हर शौचालय योजना में महिला प्रतिनिधि को निर्माण और रख-रखाव समितियों में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे उनकी ज़रूरतें और अनुभव सीधे नीति निर्माण में आएँ।<br />स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों और महिलाओं के लिए स्वच्छता शिक्षा और सुरक्षित शौचालय सुविधा अनिवार्य होनी चाहिए।</p>
<p>स्क्रूटनी पैनल  और लोक शिकायत तंत्र  को मजबूत बनाना चाहिए ताकि लाभार्थियों की शिकायतों का निपटारा हो सके। पंचायत स्तर पर “स्वच्छता जगृति दल” बनाए जाएँ, जो स्थानीय लोगों की निगरानी करें और भ्रष्ट ठेकेदारों के खिलाफ लोक अभियानों  का नेतृत्व करें।<br />डिजिटल ट्रेसबिलिटी जैसे GPS-टैगिंग, फोटो सबमिशन को अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि निर्माण की वास्तविकता और गुणवत्ता की पुष्टि हो सके। विश्व शौचालय दिवस पर हमें यह समझना चाहिए कि शौचालय बनाना सिर्फ एक बुनियादी  सुविधा न होकर, महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और समानता की लड़ाई है।</p>
<p>मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से अभूतपूर्व प्रगति की है करोड़ों शौचालय बनाए, लाखों गाँव ODF घोषित किए गए, और सार्वजनिक बहस को आगे बढ़ाया गया। लेकिन चुनौतियाँ अभी खत्म नहीं हुई हैं: भ्रष्टाचार, बिचौलियों की जड़ें, गुणवत्ता की गिरावट, उपयोग और रख-रखाव की अनदेखी, और विशेष रूप से महिलाओं की ज़रूरतों पर पर्याप्त ध्यान न देना कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें नज़दीक से संबोधित करना होगा।</p>
<p>लोक, विपक्ष, सरकार और स्थानीय समुदायों के बीच मिलकर काम करने की ज़रूरत है ताकि प्रत्येक व्यक्ति विशेष रूप से महिलाएँ केवल शौचालय का अस्तित्व न पाएं, बल्कि सुरक्षित, स्वच्छ, उपयोगी और सम्मानजनक शौचालय का अनुभव कर सकें। इस रूपांतरण को स्थायी और टिकाऊ बनाने के लिए ODF Plus के विजन, पारदर्शिता, जवाबदेही और सहभागिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।देश मे शौचालय निर्माण सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि गिनी जा रही है।</p>
<p><strong>कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Nov 2025 18:16:31 +0530</pubDate>
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                <title>अपने विनाश और बर्बादी की पटकथा लिखता खुद कंगाल पाकिस्तान।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के पश्चात ही पाकिस्तान अपनी गलत नीतियों, गलत आर्थिक नियोजन और भारत के विरोध की चालों के कारण आज जर्जर हालत में दक्षिण एशिया के सर्वाधिक कंगाल एवं गरीब देश की श्रेणी में खड़ा हो गया है।<br />पाकिस्तान अभिनयमेंयह अपने अस्तित्व के सबसे गहरे संकट से गुजर रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से वह एक ऐसी अव्यवस्था में डूब चुका है, जहाँ से निकलने के लिए अब केवल आत्ममंथन और दिशा परिवर्तन की आवश्यकता है। कभी इस्लामी एकता और सामरिक शक्ति का दंभ भरने वाला यह राष्ट्र अब अपनी ही गलतियों का शिकार बन गया है। स्वतंत्रता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159617/poor-pakistan-itself-writes-the-script-of-its-own-destruction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/पटकथा-लिखता-खुद-कंगाल-पाकिस्तान.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के पश्चात ही पाकिस्तान अपनी गलत नीतियों, गलत आर्थिक नियोजन और भारत के विरोध की चालों के कारण आज जर्जर हालत में दक्षिण एशिया के सर्वाधिक कंगाल एवं गरीब देश की श्रेणी में खड़ा हो गया है।<br />पाकिस्तान अभिनयमेंयह अपने अस्तित्व के सबसे गहरे संकट से गुजर रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से वह एक ऐसी अव्यवस्था में डूब चुका है, जहाँ से निकलने के लिए अब केवल आत्ममंथन और दिशा परिवर्तन की आवश्यकता है। कभी इस्लामी एकता और सामरिक शक्ति का दंभ भरने वाला यह राष्ट्र अब अपनी ही गलतियों का शिकार बन गया है। स्वतंत्रता के बाद से पाकिस्तान की राजनीति में विकास नहीं, बल्कि विरोध और वैमनस्य की भावना का वर्चस्व रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उसने अपने सीमित संसाधनों और मानवीय क्षमता को शिक्षा, उद्योग और नागरिक विकास में लगाने के बजाय हथियारों, आतंकवाद और सैन्य विस्तार में झोंक दिया। नतीजतन वहाँ लोकतंत्र बार-बार सैन्य तख्तो के नीचे कुचला गया और जनता गरीबी, बेरोजगारी तथा महंगाई की दलदल में धँसती चली गई।इमरान खान की सरकार के तीन वर्ष पाकिस्तान के इतिहास के सबसे गर्त में डूबे हुए वर्ष साबित हुए। आर्थिक स्थिति इतनी विकट हो गई कि रोज़मर्रा की वस्तुएँ भी आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गईं। गेहूं, चावल, आटा, शक्कर और फल जैसी बुनियादी चीज़ें अब विलासिता की श्रेणी में आ गई हैं। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों ने परिवहन और उद्योग दोनों को प्रभावित किया है, जिससे वस्तुओं की आपूर्ति ठप पड़ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इमरान सरकार के पतन के बाद जनता को उम्मीद थी कि शाहबाज शरीफ कुछ सुधार करेंगे, पर यह सरकार तो और अधिक असमर्थ और दिशाहीन साबित हुई। पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में अब केवल कुछ अरब डॉलर शेष हैं, जिससे सरकार को रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कराची में बलूच आतंकवादियों द्वारा किए गए बम विस्फोट में चीनी नागरिकों की मौत के बाद पाकिस्तान का सबसे विश्वसनीय सहयोगी देश- चीन भी उससे दूरी बना चुका है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की कई परियोजनाएँ ठप हो गई हैं, और आर्थिक सहायता तत्काल प्रभाव से रोक दी गई है। चीन के बाद सऊदी अरब, तुर्की और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी पाकिस्तान की मदद को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। इस आर्थिक अलगाव ने पाकिस्तान को कूटनीतिक स्तर पर भी हाशिए पर पहुँचा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों के साथ उसके संबंध पहले से ही शिथिल थे। भारत के प्रति उसकी कटुता ने उसे दक्षिण एशिया में भी अकेला कर दिया है।इसी बीच पाकिस्तान प्राकृतिक आपदाओं के भीषण दौर से गुजर रहा है। बिजली उत्पादन ठप है, जलस्रोत सूख चुके हैं, और विभिन्न प्रांतों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है। बिजली की कमी के कारण पानी की आपूर्ति बाधित है, जिससे सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्र भयंकर सूखे और भुखमरी का सामना कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फसलों का विनाश इतना व्यापक है कि अब खेत केवल राख और धूल में बदल चुके हैं। सिंध के मुख्यमंत्री के सलाहकार मंजूर वासन ने स्वीकार किया है कि पानी की कमी और भीषण गर्मी से कपास की पूरी फसल नष्ट हो चुकी है। चावल, गेहूं, गन्ना और आम जैसी प्रमुख फसलें भी झुलसकर बर्बाद हो गई हैं। इस विनाश ने पाकिस्तान की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है। किसान आसमान की ओर देखते हैं, लेकिन वहाँ से राहत नहीं बरसती—सिर्फ धूप और निराशा गिरती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया और जनता दोनों ही अब सरकार से पूरी तरह निराश हैं। शाहबाज शरीफ का मंत्रिमंडल अनुभवहीन और विभाजित है, और जनता के मुद्दों से कट चुका है। नवाज शरीफ की सलाहें अप्रासंगिक साबित हो रही हैं, जबकि शाहबाज शरीफ का प्रशासनिक कौशल इस संकट की गंभीरता के सामने फीका पड़ गया है। राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक आतंकवाद और बढ़ती बेरोजगारी ने आम नागरिक को निराशा के गर्त में धकेल दिया है। पाकिस्तान की मीडिया जो कभी सुधार की उम्मीद कर रही थी, अब सरकार की बखिया उधेड़ने में लगी है। जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो चुकी है कि उनके नेता केवल भारत-विरोध के सहारे सत्ता में बने रहना चाहते हैं, न कि जनता की भलाई के लिए शासन चला रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति आत्मविनाश की पराकाष्ठा है। एक ओर वह अंतरराष्ट्रीय सहायता के लिए गिड़गिड़ा रहा है, तो दूसरी ओर अपने ही पड़ोसी भारत के खिलाफ अनर्गल बयानबाज़ी जारी रखे हुए है। शाहबाज शरीफ का यह कहना कि “वह अपनी कमीज बेचकर भी जनता को रोटी देंगे”, अब व्यंग्य बड़ा प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि देश के पास रोटी देने की क्षमता तो दूर, बिजली और पानी तक की उपलब्धता नहीं रह गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि पाकिस्तान को वास्तव में अपनी स्थिति सुधारनी है, तो उसके पास एक ही विकल्प बचा है कि वह अपनी पुरानी दुश्मनी और कट्टर मानसिकता को त्यागकर भारत से व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित करे। भारत अतीत में भी पाकिस्तान को कपास, गेहूं और चावल जैसी वस्तुएँ रियायती दरों पर उपलब्ध कराता रहा है। भारत ने श्रीलंका जैसे देशों की आर्थिक मदद कर उनके पुनर्निर्माण में सहयोग दिया है। पाकिस्तान चाहे तो उसी मार्ग पर चलकर आर्थिक स्थिरता प्राप्त कर सकता है। पर इसके लिए उसे अपनी नीति, दृष्टि और व्यवहार में आमूल परिवर्तन करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान को अब यह समझना चाहिए कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता, उसके खेत और उसके संसाधन हैं न कि उसकी बंदूकें। जब तक वह अपने लोगों को भोजन, रोजगार और शिक्षा नहीं देगा, तब तक उसकी कोई भी सरकार टिक नहीं सकती। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, चीन या सऊदी अरब की सहायता भी तब तक निष्फल रहेगी, जब तक पाकिस्तान स्वयं आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगा।पाकिस्तान की दुर्दशा किसी बाहरी शक्ति की साज़िश नहीं, बल्कि उसके आत्मघाती निर्णयों का परिणाम है।</p>
<p style="text-align:justify;">धर्म और कट्टरता के नाम पर नीतियाँ बनाना, आतंकवाद को प्रश्रय देना और भारत के साथ निरंतर वैमनस्य बनाए रखना—यही उसकी सबसे बड़ी भूलें रही हैं। यदि अब भी पाकिस्तान अपने अंधकार से निकलने का साहस दिखाए और लोकतांत्रिक तथा विकासोन्मुखी दृष्टिकोण अपनाए, तो पाँच से छह वर्षों में वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में लौट सकता है। लेकिन यदि उसने वही पुरानी राह चुनी, तो उसके राष्ट्र के अस्तित्व पर संकट स्थायी हो जाएगा। आज पाकिस्तान के सामने इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती है क्या वह अपने अतीत की गलतियों से सीखकर सुधार का मार्ग अपनाएगा, या फिर स्वयं अपने अंत की पटकथा लिखेगा? यही प्रश्न आने वाले वर्षों में उसकी नियति तय करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर,स्तंभकार, चिंतक, लेखक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Nov 2025 18:41:07 +0530</pubDate>
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                <title>हिंदी भाषा पर अवलंबित वैश्विक अर्थतंत्र। हिंदी बनी व्यावसायिक भाषा।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा है कि हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द या भाषा का तिरस्कार नहीं किया। और यही तथ्य हिंदी भाषा के गौरव को अत्यंत विशाल तथा विराट बनाती है । हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति सनातन तथा संस्कारों की सारगर्भित भाषा है। हिंदी भाषा भारत में ही 141 करोड़ लोगों की भाषा बन चुकी है। देश के लिए जनसंख्या जरूर समस्या के रूप में देखी जा सकती है पर अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए यह एक बड़े बाजार का खजाना ही साबित हो रही है । भारत अब</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154918/global-economy-assigned-on-hindi-language"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/हिंदी-भाषा-पर-अवलंबित-वैश्विक-अर्थतंत्र।-हिंदी-बनी-व्यावसायिक-भाषा.jpg" alt=""></a><br /><div>डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा है कि हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द या भाषा का तिरस्कार नहीं किया। और यही तथ्य हिंदी भाषा के गौरव को अत्यंत विशाल तथा विराट बनाती है । हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति सनातन तथा संस्कारों की सारगर्भित भाषा है। हिंदी भाषा भारत में ही 141 करोड़ लोगों की भाषा बन चुकी है। देश के लिए जनसंख्या जरूर समस्या के रूप में देखी जा सकती है पर अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए यह एक बड़े बाजार का खजाना ही साबित हो रही है । भारत अब एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता बाजार बन चुका है और और भारतीय उत्पाद को बेचने के लिए हिंदी भाषा एक सशक्त माध्यम बन चुकी है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में न जाने कितनी अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक संस्थाएं अपने उत्पाद बेचने के लिए आतुर रहती हैं और यही एक बड़ा कारण है कि उन्हें अपने विज्ञापन तथा माल बेचने के लिए भारतीय उपभोक्ताओं को आकर्षित करने हिंदी में विज्ञापन में बेची जाने वाली वस्तुओं की समस्त जानकारी रखनी होती हैं ।यह उनकी व्यावसायिक मजबूरी ही है कि भारत तथा विदेशों में रहने वाले तमाम हिंदुस्तानियों के लिए हिंदी भाषा के माध्यम से प्रचार प्रसार तथा विज्ञापन करती रहें तब जाकर उनका निर्मित उत्पाद विक्रय के लिए बाजार में आ सकेगा। वर्तमान में हिंदी को वैश्विक स्तर पर उपभोक्तावाद से जोड़ा गया है। और बीच-बीच में हिंदी के मध्य उर्दू और अंग्रेजी ने अपनी जगह बनाई है।</div>
<div> </div>
<div>आज स्थिति यह है कि हिंदुस्तान में ही हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी के कई शब्द मिलाकर हिग्लिश भाषा बोली जाती है। न्यूज़ चैनल में न्यूज़ एंकर विशुद्ध हिंदी की जगह हिग्लिश ही बोलकर अपनी इतिश्री कर लेते हैं। और तो और अब हिंदी के बड़े साहित्यकार भी हिंदी में अंग्रेजी तथा उर्दू के शब्द मिलाकर लिख रहे हैं, बोल रहे हैं, और पढ़ रहे हैं। विडंबना यह है कि भारत में 141 करोड़ उपभोक्ता की उपस्थिति में विशुद्ध हिंदी का प्रयोग करना थोड़ा कठिन हो जाता है।जैसे हम टी,वी, को दूरदर्शन नहीं कहते, इंटरनेट को इंटरनेट ही लिखा जाता है, अंतरजाल नहीं लिखा जाता ।यह जितनी अंग्रेजी की शब्दावली हिंदी में जुड़ी हुई है,यह संचार माध्यम टी,वी व्हाट्सएप,फेसबुक,ट्विटर, इंटरनेट सीधे-सीधे उपभोक्ताओं के बाजार वाद के कारण जुड़े हुए हैं।</div>
<div> </div>
<div>हिंदुस्तान में लगभग 141 करोड़ उपभोक्ता निवास करते हैं, और उन तक पहुंचने के लिए हिंदी का प्रयोग अंग्रेजी तथा उर्दू की मिलावट के साथ किया जाता है। वैश्विक स्तर पर भी देखा जाए तो हिंदुस्तानी मूल के लोग श्रीलंका,मॉरीशस,फिजी, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा,ऑस्ट्रेलिया,न्यू जीलैंड, साउथ अफ्रीका में फैले हुए हैं। ऐसे में हिंदी का वैश्विक विस्तार अपने आप हिंदी भारतीय अप्रवासी, प्रवासी भारतीय लोगों के माध्यम से होने लगता है।फिर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रॉस, इटली, जापान,चाइना इनके उत्पादक को भारत के उपभोक्ताओं के बीच बेचने के लिए उन्हें हिंदी की आवश्यकता होती है, भारत एक शक्तिशाली उपभोक्ता बाजार है। एक साथ एक ही जगह इतने ग्राहक मिलना किसी अन्य देश में असंभव है।</div>
<div> </div>
<div>इन परिस्थितियों में विश्व का हर देश अपने बनाए गए उत्पादन का बाजार खोजने भारत की ओर खिंचा चलाआता है। और हिंदी को माध्यम बनाकर वह अपना माल बेचना शुरू करता है। और इसके लिए टी,वी, इंटरनेट, कंप्यूटर,व्हाट्सएप तथा फेसबुक में हिंदी में विज्ञापन देकर उसका प्रचार प्रसार करता है। विज्ञापनों में हिंदी का व्यापक रूप से प्रचार और प्रसार वैश्विक स्तर पर होने लगा है।</div>
<div> </div>
<div>डॉक्टर जयंती प्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन 2012 में यह दावा किया है कि विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है। हिंदी में अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं का उपयोग करने वालों को पीछे छोड़ दिया है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाए जाने का निर्णय लिया था। इसी तारतम्य में भारत में प्रत्येक पर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में व्यापक स्तर पर देश की राजधानी दिल्ली चलेगी ग्राम पंचायत तक मनाया जाता है। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा है हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द या भाषा का तिरस्कार नहीं किया।</div>
<div> </div>
<div>वैसे भी अंग्रेजों के आगमन के पूर्व हिंदी देवनागरी लिपि में उर्दू तथा फारसी शब्दों का समावेश होता रहा है। अंग्रेजों के आने के बाद इसने अंग्रेजी शब्दों को भी आत्मसात किया। हिंदी एक विशाल हृदय की विशाल भाषा है। इसमें अन्य भाषा के अपभ्रंश आने से हिंदी कभी मूल रूप से दिग्भ्रमित या विकृत नहीं हो पाई है। यही वजह है कि हिंदी वैश्विक स्तर पर धीरे-धीरे विस्तारित, प्रचारित एवं प्रसारित होती जा रही है। वर्तमान में विश्व में लगभग 45 करोड़ से अधिक लोग हिंदी भाषा बोलते हैं, इसकी सरलता विश्व के लोगों को प्रभावित करती जा रही है, भारत के विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, कवियों, फिल्मी गीत कारों के प्रयासों से हिंदी ने वैश्विक रूप लिया है।</div>
<div> </div>
<div>हिंदी को वैश्विक रूप से उपभोक्ताओं से जोड़ने के लिए फिल्म निर्माताओं गीतकार एवं संगीत, गानों का भी बड़ा योगदान रहा है। हिंदुस्तान में बनी फिल्म को विदेशों में रह रहे भारतीय तथा अन्य भाषाई लोग उसके गीतों तथा उसके संवाद के कारण उस फिल्म को देखने जाते हैं, जिससे सीधे-सीधे भारतीय फिल्मकारों को विदेशी मुद्रा का अर्जन होता है। इस तरह उपभोक्तावाद, बाजारवाद के नजरिए से देखें तो हिंदुस्तानी उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा बाजार वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। जिससे हिंदी भाषा न सिर्फ बाजारवाद की भाषा बनी है, बल्कि साहित्यिक रूप से भी गीत, ग़ज़ल और गानों के रूप में समृद्ध हुई है। वर्तमान में हिंदी न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय होती जा रही है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए 14 सितंबर को हिंदी दिवस मना कर एवं वैश्विक स्तर पर विश्व हिंदी सम्मेलन अलग-अलग देशों में आयोजित किया जाता रहा है। इस संदर्भ में पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने कहा कि हिंदी के प्रचार प्रसार तथा विस्तार को कोई भाषा रोक नहीं सकती है। हिंदी भारत की एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसके माध्यम से भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न भाषा वासी लोग आपस में अपने विचारों का आदान-प्रदान सकते हैं। एनी बेसेंट ने हिंदी भाषा को लेकर काफी सत्य कहा है कि भारत के विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं मैं जो भाषा सबसे प्रभावशाली बन कर सामने आती है वह हिंदी है। वह व्यक्ति जो हिंदी जानता है पूरे भारत में किसी भी प्रांत की यात्रा कर सकता है और हिंदी बोलने वालों से हर तरह की जानकारी प्राप्त कर सकता है।</div>
<div> </div>
<div>अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पादों का प्रचार प्रसार पूर्णता हिंदी में करना शुरू कर दिया। इसी तारतम्य में यदि यह कहा जाए कि हिंदी वैश्विक बाजार वाद या उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी एवं सशक्त भाषा बन गई है, तो यह अतिरेक नहीं होगा। अंग्रेजी जरूर अंतर राष्ट्रीय भाषा है,पर हिंदी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोले जाने वाली द्वितीय भाषा तो जरूर है ही, एवं उपभोक्ताओं के लिए यह प्रथम स्थान रखती है।भारत में हिंदी भाषा सभी प्रांतों सभी राज्यों को एकता के सूत्र में पिरोने वाली एक मातृभाषा स्थापित रूप से है। इसीलिए इसे राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा का वास्तविक सम्मान दिए जाने की आवश्यकता है।</div>
<div><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Sep 2025 18:06:37 +0530</pubDate>
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                <title>रक्षा बन्धन का पर्व केवल दो धागों का नही</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पर्व भारतीय संस्कृति के प्राण है।जोकि अतीत के उज्ज्वल गरिमामय को तरोताजा कर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते है।पर्व के माध्यम से संस्कृति की पहचान होती है।तथा निर्मल भावो का संचार भी जन जन में बिना किसी प्रयास के सहजता से होता है।पर्व और त्योहार की जड़े इतनी गहरी है कि हमलावर लोग धन लूट कर ले गये।लेकिन बाहरी रूप से हमे गुलामी की जंजीरों से बांधा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भाई और बहन के प्यार में जो सात्विकता वह अन्य सम्बन्धो में कहा परिलक्षित हो पाती है?समाज का हर एक वर्ग एक दूसरे के स्नेह के बंधन में बांध लें तो जीवन ही</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153727/the-festival-of-defense-fastening-is-not-only-of-two"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/रक्षा-बन्धन-का-पर्व-केवल-दो-धागों-का-नही.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पर्व भारतीय संस्कृति के प्राण है।जोकि अतीत के उज्ज्वल गरिमामय को तरोताजा कर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते है।पर्व के माध्यम से संस्कृति की पहचान होती है।तथा निर्मल भावो का संचार भी जन जन में बिना किसी प्रयास के सहजता से होता है।पर्व और त्योहार की जड़े इतनी गहरी है कि हमलावर लोग धन लूट कर ले गये।लेकिन बाहरी रूप से हमे गुलामी की जंजीरों से बांधा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाई और बहन के प्यार में जो सात्विकता वह अन्य सम्बन्धो में कहा परिलक्षित हो पाती है?समाज का हर एक वर्ग एक दूसरे के स्नेह के बंधन में बांध लें तो जीवन ही निखर जाएगा।राखी का पर्व सात्विक स्नेह और प्रेम का पर्व है।गुलामी की जंजीरों में हमे बंधा,लेकिन पर्व की संस्कृति को ज़रा भी ठेस नही पहुंचा सके।यही कारण है कि आज हमारी संस्कृति सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी न केवल सुरक्षित है बल्कि चली आ रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विभिन्न भाषा ओर प्रान्त होने के बावजूद मानवीय रिश्तों को मजबूती अगर  किसी ने प्रदान की है तो वह है पर्व।जो अमीर गरीब तक सभी लोग हर्षोल्लास और उल्लासित होकर मनाते है।यही कारण है कि हमारी राष्ट्रीय एकता अक्षुण्ण बनी हुई है।रक्षा बंधंन का पर्व दो दागों का नही।इसके पीछे अनन्त  प्यार और शक्ति समाहित है।रक्षा बंधन केवल भाई बहन का रिश्ता ही नही दर्शाता।बल्कि हमे कर्तव्य का भी बोध कराता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रक्षा का अर्थ है प्रेम,दया,सहयोग और सहानुभूति।रक्षा जीवन मे मधुरता का संचार करती है। भाईचारे की भव्य भावना को उजागर करती है। रक्षा की भव्य भावना से उठोरित होकर ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने धनुष उठाया था ओर कर्मयोगी श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र धारा था।बड़े बड़े योद्धाओं ने रक्षा की भावना से ही तलवारे ग्रहण की थी।रक्षा के लिए ही यह सभी साधन निर्मित हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रक्षा शब्द में जीवन की शक्ति है। प्राण है, आत्मा का निज गुण है।मानव ह्दय की अदभुत कोमलता है,मानव के अंतर मानस से प्रवाहित होने वाला एक ऐसा निर्मल निर्झर है जो पाप,ताप और संताप से मुक्त कराता है।रक्षा के भीतर मानवीय सुख दुःख की सहनुभूति, संवेदना और उत्सर्ग की भावना छिपी है।रक्षा बंधन को वैदिक महर्षियों ने चार वर्णों की स्थापना की है।</div>
<div style="text-align:justify;">आज राष्ट्र में हजारों बहने है जिसका जीवन असुरक्षित है,उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।रक्षा बंधन का पर्व यह पावन प्रेरणा दे रहा है कि हम उनकी रक्षा करे।आज संसार मे नारी असुरक्षित है।पुरुष की दुर्बलता समझिए या उसकी संस्कारो की हीनता समझिए कि वह नारी को सौंदर्य का प्रतीक मान बैठा है।,जबकि वास्तविकता इससे विपरीत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रक्षाबंधन का दिन बहनों के सन्मान की रक्षा का दिन है ।नारी की शारीरिक सुंदरता का अवांछनीय उपयोग विज्ञापनों में नही करे।वे अपने विष बुझे हुए तरकश में बंद रखे।इन उतेजनात्मक तीरों से राष्ट्र की धर्म प्रधान संस्कृति को,नीति सदाचार की इस जीर्ण शीर्ण काया को जो अधिक घायल न करे।यह पर्व सारे समाज का पर्व है।समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करे और समाज की व्यवस्था को बनाए रखने हेतु सम्पन्न वर्ग अपने से विपन्न व्यक्ति का सहयोग करे।यही संदेश है रक्षाबंधन का।गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया था।राणा सांगा हार चुके थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनकी विधवा रानी कर्मावती ने हुमायु को राखी भेजकर बहादुरशाह से रक्षा मांगने का मन बनाया तो राजपूत संस्कारो ने रानी से कहा-महारानी!हुमायु जानता है कि आप उसके पिता बाबर के शत्रु की रानी है।क्या वह आपकी रक्षा करने आयेगा? रानी कर्मावती ने बड़े आत्म विश्वास के साथ कहा-हुमायु कर्मावती की रक्षा करने कभी नही आएगा,लेकिन मुसलमान भाई अपनी हिन्दू बहिन की रक्षा करने अवश्य आएगा।राखी व्रज से भी कठोर बन्धन है।समाज का हर वर्ग एक दूसरे के स्नेह के बंधन में बांध लें तो जीवन ही निखर जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Aug 2025 18:47:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]></dc:creator>
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                <title>होली के रंगो पर हुड़दंग और हिंसा की कालिख क्यों ! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>समाज में बंधुत्व प्रेम सद्भाव समरसता के संदेश का रंगपर्व आखिर क्यों बन जाता है कलह वैमनस्यता खून खराबे का दिन? आप जानते हैं कि इस बार होली और रमजान का जुमा एक दिन होने की वजह से पूरे देश में होली पर हाई अलर्ट किया गया था। पुलिस व सुरक्षा बलों की चौकसी और नागरिकों के संयम की वजह से देश में कोई बड़ी घटना नहीं हुई। फिर भी कम से कम चार राज्यों में होली पर हिंसा और झड़प की वारदातों को अंजाम दिया गया है।</div>
<div>  </div>
<div>वहीं देश भर में नशा कर गाड़ी चलाने और हुड़दंग मचाने की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149958/why-soot-on-holi-colors-and-soot-of-violence-%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(18)2.jpg" alt=""></a><br /><div>समाज में बंधुत्व प्रेम सद्भाव समरसता के संदेश का रंगपर्व आखिर क्यों बन जाता है कलह वैमनस्यता खून खराबे का दिन? आप जानते हैं कि इस बार होली और रमजान का जुमा एक दिन होने की वजह से पूरे देश में होली पर हाई अलर्ट किया गया था। पुलिस व सुरक्षा बलों की चौकसी और नागरिकों के संयम की वजह से देश में कोई बड़ी घटना नहीं हुई। फिर भी कम से कम चार राज्यों में होली पर हिंसा और झड़प की वारदातों को अंजाम दिया गया है।</div>
<div> </div>
<div>वहीं देश भर में नशा कर गाड़ी चलाने और हुड़दंग मचाने की सैकड़ों वारदातों में पचास लोग जान गंवा गए जबकि सैकड़ों की संख्या में लोग घायल अवस्था में अस्पतालों में इलाज के लिए लाए गए। अकेले उत्तर प्रदेश में 250 से अधिक सड़क दुर्घटना दर्ज की गई है जिसमें 430 लोग घायल हुए हैं। जबकि उत्तराखंड में हुड़दंग हिंसा की वारदातों में कुल 14 लोगों की मौत हो गई। </div>
<div> </div>
<div>सामाजिक समरसता के खिलाफ अप्रिय वारदातों में पश्चिम बंगाल की वीरभूम की वारदात को गंभीर माना जा रहा है। वहां हिंसा के बाद 17 मार्च तक इंटरनेट बंद कर दिया गया है। राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगाने शुरू कर दिया है। भाजपा ने हिंसा के बाद राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि हिंदू त्योहारों पर ही ऐसी हिंसा क्यों होती है?केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने हिंसा के बाद राज्य सरकार पर हमला करते हुए कहा कि राज्य की पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से निष्क्रिय हो गए हैं। भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल ने भी शनिवार को ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया है कि हिंदू त्योहारों के दौरान हिंसा क्यों होती है? उन्होंने बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। </div>
<div> </div>
<div>पश्चिम बंगाल के अलावा तीन और राज्यों बिहार छत्तीसगढ़ पंजाब में होली पर हिंसा हुई। बिहार के मुंगेर में ग्रामीणों के हमले में एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर की मौत हो गई। पटना में दो गुटों में होलिका दहन का विवाद होली के दिन पथराव तक पहुंच गया। पुलिस की गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए। यहां फायरिंग की भी खबर है। झारखंड के गिरिडीह में होली के दिन दो गुटों में पथराव के बाद उपद्रवियों ने दुकानों और बाइक में आग लगा दी। इसके अलावा पंजाब के लुधियाना में दो समुदायों के बीच ईंट, पत्थर और बोतलें चलीं। झड़प में 11 लोग घायल हुए हैं। मुसलमानों कहना है कि नमाज अदा करते वक्त पथराव किया गया। वहीं हिंदुओं का कहना है कि पहले मस्जिद की तरफ ईंट फेंकी गई। कई वाहनों में भी तोड़फोड़ हुई है।</div>
<div> </div>
<div>बेंगलुरु में नशे में धुत कुछ लोगों के बीच हुए झगड़े में तीन लोगों की मौत की खबर आ रही है. पुलिस की शुरुआती जांच में पता चला है कि मामला होली के दिन  का है. जब एक निर्माणधीन इमारत में होली पार्टी करने के दौरान बिहार से आए छह मजदूरों के बीच मारपीट हो गई. मजदूरों के बीच पहले बहस शुरू हुई थी जो देखते ही देखते हिंसक हो गई. जांच में पता चला विवाद की शुरुआत किसी महिला को लेकर की गई टिप्पणी से शुरू हुई थी. मजदूरों के बीच आपसी झड़प के दौरान लोगों ने एक दूसरे पर लाठी और छड़ से हमला कर दिया. घटना में तीन लोगों को गंभीर रूप से चोटें आई. जिस वजह से उनकी मौत हो गई. घटना के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए. पुलिस को घटना की सूचना मिली तो मौके से पुलिस ने तीन लोगों के शवों को बरामद किया।</div>
<div> </div>
<div>पुलिस टीम को पहला शव अपार्टमेंट के रास्ते में मिला, जबकि दूसरा कमरे के अंदर और तीसरा अपार्टमेंट से बाहर मिला. पुलिस ने दो मृतकों की पहचान 22 वर्षीय अनसू और 23 वर्षीय राधे श्याम के रूप में की है. जबकि तीसरे मृतक की पहचान नहीं हो पाई है।</div>
<div> </div>
<div>आप को बता दें पश्चिम बंगाल के बीरभूम में दो समूहों के बीच हिंसक झड़प की खबर है  राज्य सरकार ने इलाक़े में इंटरनेट सेवाओंं को सस्पेंड कर दिया. क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में सुरक्षाबलों को तैनात भी किया गया है. पुलिस का कहना है कि घटना के बाद 20 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है.इस हिंसा की शुरुआत 14 मार्च, यानी होली के दिन हुई. इंडिया टुडे के इनपुट के मुताबिक़, सैंथिया कस्बे में एक ग्रुप और नशे में धुत कुछ लोगों के बीच कहासुनी हो गई. स्थिति तब और बिगड़ गई, जब दोनों ग्रुट एक-दूसरे पर पत्थर फेंकने लगे और हाथापाई हो गई. हालात को संभालने के लिए पुलिस की तरफ़ से हल्का लाठीचार्ज भी किया गया.  विवाद में कुछ स्थानीय लोगों के घायल होने की खबर है. हिंसक वारदात के बाद पश्चिम बंगाल के गृह विभाग ने इंटरनेट सस्पेंड करने का आदेश जारी किया. पुलिस का कहना है कि स्थिति पर काबू पा लिया गया है।</div>
<div> </div>
<div>झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित घोड़थंबा में होली 14 मार्च 2025 के दिन जुलूस के दौरान हिंदुओं पर हमला हुआ। ये हमला मस्जिद वाली गली में हुआ। इस हिंसा के दौरान एक खास समुदाय के घरों से पत्थर चले।  मस्जिद वाली गली में हिंदुओं के जुलूस को निशाना बनाया गया ,  फिर पीछे की गली में मंदिर पर हमले-पथराव और पुलिस की गाड़ियों को निशाना बनाया गया । इन सभी का सिलसिलेवार तरीके से एफआईआर की कॉपी में भी जिक्र है।</div>
<div> </div>
<div>आरोप है कि इसके बावजूद कथित राजनीतिक तुष्टिकरण की राजनीति के चलते आरोपित नंबर 1 से 11 तक हिंदुओं के नाम है।  झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस पर घोर आपत्ति व्यक्त की  है। इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए उन्होंने प्रशासन पर हिंदुओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। </div>
<div>एफआईआर के अनुसार, 14 मार्च 2025 की शाम 15-20 लोगों की होली की टोली मस्जिद गली से गुजरना चाहती थी, लेकिन नमाज का समय होने की वजह से उन्हें रोका गया। टोली का कहना था कि वे हर साल इसी रास्ते से जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>समझाने के बावजूद टोली गली में आगे बढ़ गई। इसके बाद कथित तौर पर समुदाय विशेष के लोगों पेट्रोल बम, बोतल, ईंट और पत्थरों से हमला शुरू कर दिया। बाजार चौक के पास पेट्रोल बम फेंककर कई दुकानों, बाइकों और गाड़ियों में आग लगा दी गई।जानकारी के अनुसार प्राथमिकी में इस बात का साफ-साफ जिक्र है कि समुदाय विशेष  ने मंदिर पर हमला किया। पत्थर फेंके और पुलिस पहुँची तो उसकी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। इस हिंसा में चार पुलिसकर्मी घायल हुए। प्राथमिकी धनवार के बीपीओ सह दंडाधिकारी सुरेंद्र कुमार वर्णवाल ने दर्ज की है।</div>
<div> </div>
<div>दिल्ली के द्वारका में होली का जश्न हिंसा में बदल गया. गोयला डेरी स्थित छठ घाट पार्क में होली का जश्न मनाया जा रहा था. इस दौरान हुआ छोटा विवाद हाथापाई में बदल गया. दिल्ली पुलिस के मुताबिक, राजू कुमार (35) अपने दोस्त राजेश से मिलने के लिए टैक्सी से पार्क गया था. उत्सव के दौरान, होली का कुछ रंग गलती से एक लड़के पर गिर गया, जिससे दोनों में तीखी बहस हो गई कुछ देर बाद, लड़के ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर राजू कुमार और राजेश पर हमला कर दिया. मारपीट में हमलावरों ने राजू कुमार की टैक्सी में भी तोड़फोड़ की और उसके शीशे तोड़ दिए।</div>
<div> </div>
<div>पंजाब के लुधियाना में दो समुदायों के बीच ईंट-पत्थर और बोतलें चलीं। झड़प में 11 लोग घायल हुए हैं। विशेष समुदाय के लोगों का कहना है कि नमाज अदा करते वक्त पथराव किया गया। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि पहले मस्जिद की तरफ ईंट फेंकी गई। कई वाहनों में भी तोड़फोड़ हुई है।</div>
<div> </div>
<div>पश्चिम बंगाल में भी होली पर्व पर हिंसा हुई है। भाजपा ने नंदीग्राम में मूर्ति तोड़ने का आरोप लगाया है। भाजपा आइटी सेल ने भी तस्वीरें पोस्ट कर आरोप लगाया कि बरुईपुर, जादवपुर और मुर्शिदाबाद समेत पूरे प्रदेश में त्योहार पर शरारत करने की घटनाएं सामने आई हैं। </div>
<div> </div>
<div>पटना के एनटीपीसी थाना क्षेत्र के सहनौरा गांव में होलिका दहन को लेकर दो पक्षों में शुक्रवार को झड़प हो गई। एक पक्ष के ग्रामीण ने सड़क पर होलिका दहन किया, जिसका दूसरे पक्ष ने विरोध किया।रात से ही दोनों पक्षों में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। धुलेंडी की दोपहर करीब 1 बजे स्थिति बिगड़ गई और दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाजी हुई। मौके पर पहुंची पुलिस टीम को भी आक्रोशित लोगों ने खदेड़ दिया। पुलिस की गाड़ी पर भी पत्थर फेंके गए।</div>
<div> </div>
<div>देश भर में होली रंग के दौरान व्यापक एहतियात के बावजूद की स्थानों पर सांप्रदायिक झगड़े छिटपुट हिंसा एक सहायक उपनिरीक्षक की हत्या समुदायों के बीच पनपी घृणा विद्वेष को बयान करती है। क्या जरूरत है कि मस्जिद के सामने ही हुड़दंग किया जाए और पहले से ही पथराव के लिए एक समुदाय पत्थर और पैट्रोल की तैयारी रखे? दोषी दोनों हैं।आजादी के 78 साल बाद भी फिरकापरस्ती और घृणा का यह षडयंत्र खत्म होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि रंगों की होली को खून की होली मे तब्दील करने वाले दंगाइयों असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी वारदातों की पुनरावृत्ति न हो और सद्भाव के रंगों को बदरंग होने से बचाया जा सके। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 15:37:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>' आखिर  क्यों पिटती है हमारी पुलिस ?'</title>
                                    <description><![CDATA[<p>एक छोटा सा सवाल है  कि आखिर देश  के हर हिस्से में पुलिस क्यों पिटती है ? क्या देश में जनता को खाकी वर्दी से अब डर नहीं लगता जबकि पुलिस की वर्दी का दूसरा नाम ही खौफ है। मध्यप्रदेश के मऊगंज से लेकर भागलपुर तक  और भागलपुर से लेकर जहानाबाद तक पुलिस को पिटते देख ये सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि  हिंदुस्तान में आखिर क्या वजह है जो  पुलिस का इकबाल मिटटी में मिल गया है ?</p>
<p>सबसे पहले मध्यप्रदेश के मऊगंज की बात करते हैं। मऊगंज में न कोई अबू आजमी है और न किसी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149952/after-all-why-is-the-police-in-every-state"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(15)2.jpg" alt=""></a><br /><p>एक छोटा सा सवाल है  कि आखिर देश  के हर हिस्से में पुलिस क्यों पिटती है ? क्या देश में जनता को खाकी वर्दी से अब डर नहीं लगता जबकि पुलिस की वर्दी का दूसरा नाम ही खौफ है। मध्यप्रदेश के मऊगंज से लेकर भागलपुर तक  और भागलपुर से लेकर जहानाबाद तक पुलिस को पिटते देख ये सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि  हिंदुस्तान में आखिर क्या वजह है जो  पुलिस का इकबाल मिटटी में मिल गया है ?</p>
<p>सबसे पहले मध्यप्रदेश के मऊगंज की बात करते हैं। मऊगंज में न कोई अबू आजमी है और न किसी औरंगजेब की कब्र ,लेकिन यहां जो बवाल हुआ उसमें एक पुलिस कर्मी की मौत हो गयी और अनेक घायल हो गए। मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के  गड़रा गांव में दो गुटों के बीच झगड़े की कीमत पुलिस को चुकानी पड़ी। पुलिसकर्मियों के झड़प ने ऐसा स्वरूप लिया कि एक एएसआई रामचरण गौतम की जान चली गई। वहीं तहसीलदार समेत कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं।यहां न कोई हिन्दू था और न कोई मुसलमान। पक्षकार आदिवासी थे ,लेकिन वे पुलिस पर भारी पड़े।  मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं।</p>
<p>मध्यप्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुए चार साल हो गए हैं ,हालाँकि पुलिस कमीश्नर प्रणाली केवल भोपाल और इंदौर शहर में लागू है लेकिन प्रदेश में पुलिस का इक़बाल बुलंद नहीं हो पाया। कारण ये है कि  प्रदेश की पुलिस भ्र्ष्ट होने के साथ ही साम्प्रदायिक और नेताओं की कठपुतली बन गयी है। पुलिस में सिपाही से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की पदस्थापना में सियासत का दखल है और नतीजा ये है  कि  लोग अब पुलिस की वर्दी का न सम्मान करते हैं और न पुलिस से खौफ कहते हैं।</p>
<p>अब बात बिहार की कर लेते है।  यहां तो पुलिस न सिर्फ पिटती है बल्कि नेताओं के इशारे पर नाचने के लिए भी मजबूर  की जाती है ,और आखिर में महकमें की प्रताड़ना का शिकार भी पुलिस वाले ही होते हैं। लालू प्रसाद के बेटे तेजप्रताप   के इशारे पार होली के दिन नाचने वाले एक सिपाही को आखिर निलंबित कर दिया गया। बिहार में बेखौफ बदमाश पुलिस पर हमला करने से भी बाज नहीं आ रहे। तीन दिनों पहले अररिया जिला के फुलकाहा थाना में तैनात एएसआई (जमादार) राजीव रंजन मल्ल की धक्का-मुक्की में मौत के बाद फिर मुंगेर में मुफस्सिल थाना के एएसआई संतोष कुमार सिंह की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई।वे 14 मार्च की रात आपसी विवाद की सूचना पर उसे सुलझाने नंदलालपुर गांव गए थे। जहां बदमाशों ने उन पर हमला कर दिया। इसमें एएसआई संतोष गंभीर रूप से घायल हो गए थे, उनके सिर पर चोट लगी थी।</p>
<p>पंजाब में तो हालत और भी ज्यादा खराब हैं।  सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा कि पूरा पुलिस महकमा केजरीवाल की सेवा में लगा हुआ है। पंजाब में कानून व्यवस्था बेहद खराब है।पुलिस के साथ जो व्यवहार मध्यप्रदेश के मऊगंज में हुआ वैसा ही व्यवहार उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में भी हु।  जिले के अजगैन कोतवाली के छेड़ा गांव में 14 मार्च को शराब के नशे में दो भाइयों में विवाद के बाद पथराव हुआ था। पहले आरोपियों के पिता रामस्वरूप की हृदयगति रुकने से मौत हो गई थी। वहीं, पड़ोसी धीरेंद्र की नाक में पत्थर लगने से उसकी मौत हो गई थी।पुलिस आरोपी भाइयों को हिरासत में लेकर जा रही थी तभी कुछ ग्रामीणों ने रास्ता रोक लिया और दोनों आरोपियों को जीप से खींचने का प्रयास किया था।</p>
<p>भारत में पुलिस व्यवस्था बहुत पुरानी है। मुगलों और अंग्रेजों से भी पुरानी।  लेकिन मुगलों और अंग्रेजों ने पुलिस व्यवस्था को और मजबूत किया और इसका इकबाल भी बुलंद किया। कोटवार से लेकर कोतवाल तक और आज सिपाही से लेकर   महानिदेशक तक का इकबाल होता है ,किन्तु आजादी के बाद देशभक्ति -जन सेवा का ध्येय  लेकर बनाई गयी पुलिस या तो जुल्म का पर्याय बन गयी या फिर कालांतर में सत्ता प्रतिष्ठान की कठपुतली। पुलिस बल में समय के साथ सुधार भी हुए लेकिन पुलिस आज भी जनता की जरूरतों से ज्यादा सत्ता प्रतिष्ठान की जरूरतों का ख्याल रखती है।  जनता के मन में पुलिस के लिए कोई आदरभाव नहीं है क्योंकि पुलिस अपराधियों,नेताओं और सत्ता रपतिष्ठं के गठजोड़ का एक हिस्सा बनकर रह गयी है।</p>
<p>आपको बता दूँ कि  संविधान के तहत, पुलिस राज्यों द्वारा शासित एक विषय है। इसलिए, 29 राज्यों में से प्रत्येक के पास अपने स्वयं के पुलिस बल हैं। केंद्र को कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने में राज्यों की सहायता के लिए अपने स्वयं के पुलिस बलों को बनाए रखने की भी अनुमति है। केवल केंद्र शासित क्षेत्रों में पुलिस केंद्र के अधीन होती है ,पुलिस के आधुनिकीकरण पर बेहिसाब खर्च के बावजूद न पुलिस की मानसिकता बदली और न व्यवहार ।  आज भी आम आदमी  पुलिस से डरता है।   आम इंसान यही समझता है कि  पुलिस मतलब समस्या को आमंत्रण देना है। पुलिस के प्रति समाज में घृणा है /पुलिस न खुद क़ानून का पालन करती है और न क़ानून का पालन करा पाती है।</p>
<p>मैंने दुनिया के अनेक देशों में पुलिसिंग देखी है ।  कहीं भारत की पुलिस कुछ आगे है तो कहीं बहुत पीछे ।  हमारी पुलिस न इंग्लैण्ड की पुलिस बन पायी और न अमेरिका की पुलिस। भारत की पुलिस में राजनीति का दखल इतना बढ़ गया है कि  पुलिस अपने विवेक से कोई काम कर ही नहीं सकती। पुलिस नेताओं के हुक्म की गुलाम बनकर रह गयी है और इसका नतीजा है कि  पुलिस पर पूरे देश में हमले हो रहे हैं ,पुलिस कर्मी मारे जा रहे हैं ,लेकिन कोई इसकी जड़ तक नहीं जाना चाहता। सब क्रिया की प्रतिक्रिया तक ही सीमित हैं। पुलिस का इकबाल बुलंद किये बिना पुलिस कर्मियों पर होने वाले हमले रुकने वाले नहीं हैं। पुलिस का व्यवहार बदलना बेहद जरूरी है।</p>
<p>इस समय दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में करीब 21.41 लाख पुलिसकर्मी हैं, लेकिन कुल पुलिस फोर्स में महिलाओं का औसत महज 12 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है। भारत में औसत करीब 646 लोगों पर एक पुलिसकर्मी का बैठता है. हालांकि, इसमें राज्यों के विशेष सशस्त्र पुलिस बल और रिजर्व बटालियन के पुलिसकर्मियों की संख्या भी  शामिल है।  कुछ राज्यों में पुलिस के पास अपना वाहन या स्पीडगन नहीं है तो कुछ पुलिस स्टेशनों में वायरलेस या मोबाइल फोन तक नहीं है।</p>
<p>पुलिस अनुसन्धान एवं विकास ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं कि  राज्यों में मिलाकर 27.23 लाख पदों में से कुल 5.82 लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पद खाली हैं।  इनमें सबसे ज्यादा सिविल पुलिस के 18.34 लाख में से 4 लाख पद खाली हैं।  सिविल पुलिस ही थाना क्षेत्रों में गश्त करने, मौका-ए-वारदात पर पहुंचने, किसी केस की छानबीन करने और कानून-व्यवस्था संभालने का का काम करती है।  इसके अलावा, देश में जिला सशस्त्र रिजर्व पुलिस बल के 3.26 लाख पदों में करीब 87 हजार पद खाली हैं. वहीं, राज्य विशेष सशस्त्र बल के 3.95.लाख पदों में से 63 हजार और रिजर्व बटालियन के 1.69 लाख पदों में से 28.5 हजार पद भरे नहीं जा सके। सरकारों का बस चले तो वो पुलिस में भी संविदा पर भर्तियां कर दे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 14:35:29 +0530</pubDate>
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                <title> प्रेम व सद्भाव का प्रतीक बना होली का त्यौहार</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  भारत की सांझी गंगा यमुनी तहज़ीब का दर्शन कराने वाला होली का त्यौहार न केवल शांन्ति  से गुज़र गया बल्कि इस बार की होली प्रेम व सद्भाव की ऐसी मिसाल पेश कर गयी जिसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यह देश सांझी संस्कृति व सांझे त्योहारों का देश है। यह देश अनेकता में एकता की मिसाल पेश करने वाला देश है। यह देश हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदि सभी धर्मों व समुदायों में परस्पर एकता की मिसाल पेश करने वाला देश है। दरअसल इस बार का होली का त्यौहार देश के अमन पसंद लोगों के लिये</div>
<div> </div>
<div>सबसे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149947/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/holi.jpg" alt=""></a><br /><div> भारत की सांझी गंगा यमुनी तहज़ीब का दर्शन कराने वाला होली का त्यौहार न केवल शांन्ति  से गुज़र गया बल्कि इस बार की होली प्रेम व सद्भाव की ऐसी मिसाल पेश कर गयी जिसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यह देश सांझी संस्कृति व सांझे त्योहारों का देश है। यह देश अनेकता में एकता की मिसाल पेश करने वाला देश है। यह देश हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदि सभी धर्मों व समुदायों में परस्पर एकता की मिसाल पेश करने वाला देश है। दरअसल इस बार का होली का त्यौहार देश के अमन पसंद लोगों के लिये कई कारणों से चिंता का सबब बना हुआ था।</div>
<div> </div>
<div>सबसे पहली बात तो यह थी कि केंद्र से लेकर देश के कई महत्वपूर्ण व बड़े राज्यों में उस भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं जिनके अनेक नेता समाज में बेरोकटोक ज़हर घोलते आ रहे हैं। कई नेता ऐसे भी हैं जिन्हें नफ़रत फैलाने के लिये 'पुरस्कार ' स्वरूप मुख्य मंत्री,मंत्री व उपमुख्य मंत्री जैसे पद नवाज़े गये हैं। इससे प्रेरित होकर कई आधारहीन नेता भी अपने 'सफल व उज्जवल ' राजनैतिक भविष्य की ख़ातिर साम्प्रदायिकता का खुला कार्ड खेल रहे हैं।</div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/holi2.jpg" alt="holi2" width="530" height="341"></img></div>
<div>और कोई भी ज़हरीला व विवादित बयान देकर रातों रात सुर्ख़ियों में छा जाते हैं।  दूसरी बात यह कि होली से ठीक पहले जिस तरह औरंगज़ेब व संभल की जुमा मस्जिद विवादित विषयों व उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी के आपत्तिजनक बयान को लेकर देश के आग लगाऊ दलाल मीडिया ने देश के वातावरण में नफ़रत का ज़हर घोलने की कोशिश की और साथ ही उत्तर प्रदेश के उस पुलिस अधिकारी के विवादित बयान को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का समर्थन भी मिला उन सब के मद्देनज़र शांतिप्रिय देशवासियों का चिंतित होना स्वाभाविक था। </div>
<div> </div>
<div>उधर गत 15 मार्च यानी होली के दिन ही मुसलमानों के पवित्र त्यौहार रमज़ान महीने में पड़ने वाले शुक्रवार यानी जुमा का दिन भी था। जुमे की नमाज़ को मुसलमानों में ख़ास अहमियत दी जाती है ख़ासकर रमज़ान माह के जुमे की तो और अधिक अहमियत होती है।</div>
<div> </div>
<div>यह दोनों यानी होली और जुमा (शुक्रवार ) एक साथ पड़ने से लोगों के दिलों में और भी डर बैठा था कि सत्ता से जुड़े नफ़रती चिंटुओं की बदज़ुबानी उनकी गंदी व ज़हरीली मंशा, नफ़रती मीडिया की जुगलबंदी के साथ कहीं देश के ख़ुशनुमा माहौल को साम्प्रदायिकता की भेंट न चढ़ा दे। लोगों में डर था की होली जैसे अबीर व गुलाल उड़ाने के रंग बिरंगे त्यौहार में कहीं रंग की जगह भंग न घुल जाये। और पूरा देश टकटकी लगाये सुबह से शाम तक होली और जुमे के संयुक्त आयोजन पर नज़रें जमाये बैठा रहा। और होली व जुमा जैसे आयोजनों के शांतिपूर्ण तरीक़े से संपन्न होने की दुआयें मांग रहा था।   </div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/holi1.jpg" alt="holi1" width="510" height="377"></img></div>
<div>बावजूद इसके कि शाहजहांपुर,संभल,बरेली,अलीगढ़ व अमरावती जैसी कुछ जगहों से उपद्रवी लोगों द्वारा उकसावे की कुछ कार्रवाई ज़रूर की गयी। मस्जिदों के सामने आपत्ति जनक गाने बजाये गये। परन्तु रोज़दारों ने सहनशीलता का परिचय दिया और शहर दंगों की आग में झुलसने से बच गया। परन्तु देशभर में कुल मिलाकर आख़िरकार देश की सांझी तहज़ीब का परचम लहराया। और जिस होली और जुमे को देश के कई संवेदनशील हिस्सों में हिंसा व दंगे फ़साद की संभावना जताई जा रही थी उसी होली ने इस बार प्रेम सद्भाव व भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की जो शायद पहले कभी नहीं देखी गयी।</div>
<div> </div>
<div>होली व जुमे के बाद दोपहर से ही सोशल मीडिया पर भाईचारे की मिसाल पेश करने वाले जो दृश्य सामने आने शुरू हुये उन दृश्यों ने एक बार फिर यह प्रमाणित कर दिया की नफ़रत के सौदागरों की लाख कोशिशों के बावजूद देश के आम लोग सिर्फ़ अमन शांति सद्भाव व भाईचारा चाहते हैं। बिहार व उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न प्रदेशों के कई शहरों से लेकर गत वर्षों दंगों की शिकार हो चुकी दिल्ली के विभिन्न इलाक़ों के जो दृश्य सामने आये वह हमारी सांझी तहज़ीब व सांप्रदायिक सद्भाव के जीवंत दस्तावेज़ थे।  </div>
<div> </div>
<div> प्रयागराज/इलाहाबाद जहाँ पिछले दिनों कुंभ आयोजन के दौरान मची भगदड़ के बाद स्थानीय मुसलमानों ने अपनी मस्जिदें,मुस्लिम शिक्षण संस्थान,दरगाहों ,इमामबाड़ों व अपने घरों के दरवाज़े परेशानहाल परदेसी कुंभ श्रद्धालुओं के लिये खोल दिए थे। उसी शहर के होली मनाने वाले हिन्दू भाई नमाज़ के दौरान अपना डी जे व व हर्षोल्लास को न केवल विराम देते नज़र आये बल्कि मुस्लिम नमाज़ियों के साथ उनका सुरक्षा कवच बनकर खड़े रहे। जबकि अन्य कई शहरों से मुसलमानों द्वारा होली खेलने वालों रंग बरसाने की ख़बरें आईं।</div>
<div> </div>
<div>अनेक जगहों पर नमाज़ियों पर हिन्दू भाइयों द्वारा फूलों की वर्षा कर उन्हें होली से जोड़ने व जुमे की बधाई देने का प्रदर्शन किया गया। और कई जगहों से तो हिन्दू मुसलमानों के एक साथ होली के रंग में सराबोर होने के भी समाचार प्राप्त हुये। इस तरह के चित्र व विडिओ पहले भी आते रहे हैं परन्तु इसबार तो कुछ ज़्यादा ही भाई चारा नज़र आया। इसकी वजह यही थी कि आम लोग नफ़रती सत्ताधीशों के एजेंडे को क़तई स्वीकार नहीं करते। इसमें भी कोई शक नहीं कि देश की जनता के इस अमनपसंद रुख़ को भांप चुकी पुलिस व स्थानीय प्रशासन ने भी शांति व्यवस्था बनाये रखने में अपनी निष्पक्ष व सद्भाव पूर्ण भूमिका निभाई। </div>
<div> </div>
<div> दरअसल यह वह देश है जहां अनेक हिन्दू रमज़ान में रोज़े व मुहर्रम में ताज़िया रखते व मातमदारी करते दिखाई देते हैं,जबकि तमाम मुसलमान गणेशोत्सव मनाते व होली खेलते दिखाई देते हैं। आज देश में अनेक दरगाहें,पीरों फ़क़ीरों की मज़ारें व इमामबाड़े पूरी आस्था के साथ हिन्दुओं की देखरेख में चलाये जा रहे हैं। इसी देश की सांझी तहज़ीब की झलक नज़ीर अकबराबादी की उस शायरी में नज़र आती है जिसमें वह लिखते हैं -गुलज़ार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।</div>
<div> </div>
<div>कपड़ों पर रंग के छींटों से ख़ुश-रंग अजब गुल-कारी हो।। मुंह लाल,गुलाबी आँखें हों,और हाथों में पिचकारी हो। उस रंग-भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।। सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।। और नज़ीर अकबराबादी ही यह भी लिखते हैं कि - 'मियां तू हमसे न रख कुछ ग़ुबार होली में। कि रूठे मिलते हैं आपस में यार होली में। मची है रंग की कैसी बहार होली में। हुआ है ज़ोर-ए-चमन आश्कार होली में। अजब यह हिन्द की देखी बहार होली में॥ इसी तरह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीद और शायर अमीर ख़ुसरो ने सूफ़ियाना परंपरा से बसंत और होली मनाने की शुरूआत की। ख़ुसरो का यह कलाम आज भी  होली के दिन निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार पर पढ़ा जाता है।  आज रंग है, ऐ मा रंग है री, मोरे महबूब के घर रंग है री। मोहे पीर पायो निज़ामुद्दीन औलिया, जब देखो मोरे संग है री।।</div>
<div> </div>
<div>इसतरह के दस्तावेज़ इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय त्यौहार दरअसल धार्मिक कम सामाजिक व भारतीय त्यौहार अधिक हैं। यही वजह है कि इस बार का होली का त्यौहार देश व दुनिया के लिये प्रेम व सद्भाव का प्रतीक बन गया। आशा की जानी चाहिये कि ऐसी ही शांति व सद्भाव हमारे देश में हमेशा बना रहेगा और ज़हरीले बोल बोलने वाले राजनेताओं के मंसूबों पर हमेशा पानी फिरता रहेगा। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 14:08:42 +0530</pubDate>
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                <title>सोना ले  जा रे, चांदी ले जा रे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>दुनिया में सोना और चांदी हिरणी की तरह कुलांचें भर रहा है। कुलांचे इसलिए भर रहा है क्योंकि दुनिया का वातावरण कुलांचें भरने के अनुरूप है। यदि सोना और चांदी जैसी धातुएं कुलांचें भरतीं हैं तो समझ जाइये कि विश्वव्यापी मंदी आपके घर के बाहर दस्तक दे रही है। जो समझदार हैं वे इस दस्तक को पहचानते हैं ,वे संकटकाल के लिए सोना और चांदी जैसी धातुएं ख़रीदकर रख लेते  है। संकट काल में एक सोना और चंडी ही है जो आपकी मदद कर सकता है।</p>
<p>आठवें दशक के आरम्भ में एक फिल्म आयी थी ' मेरा गांव-मेरा देश '।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149946/gold-take-me-and-take-silver"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/gold3.jpg" alt=""></a><br /><p>दुनिया में सोना और चांदी हिरणी की तरह कुलांचें भर रहा है। कुलांचे इसलिए भर रहा है क्योंकि दुनिया का वातावरण कुलांचें भरने के अनुरूप है। यदि सोना और चांदी जैसी धातुएं कुलांचें भरतीं हैं तो समझ जाइये कि विश्वव्यापी मंदी आपके घर के बाहर दस्तक दे रही है। जो समझदार हैं वे इस दस्तक को पहचानते हैं ,वे संकटकाल के लिए सोना और चांदी जैसी धातुएं ख़रीदकर रख लेते  है। संकट काल में एक सोना और चंडी ही है जो आपकी मदद कर सकता है।</p>
<p>आठवें दशक के आरम्भ में एक फिल्म आयी थी ' मेरा गांव-मेरा देश '।   इसी फिल्म का एक गीत था-<br />सोना ले जा रे चाँदी ले जा रे, ओ पैसा ले जा रे ओ दिल कैसे दे दू मै जोगी के बड़ी बदनामी होगी<br />अब दुनिया में योगी की बदनामी तो जो होना थी  ,वो हो ही चुकी है ।  जोगी राज में पहली बार होली पर मस्जिदों को कपडे से ढाँका गया।  लेकिन बात सोने-चांदी की हो रही है। समय सोना और चांदी के भावों में बढ़ोतरी हो रही है. इस कारण दोनों के भावों एक बार फिर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं. विशेषज्ञों  के अनुसार मार्केट में दोनों कीमती धातुओं की मांग पहले के मुकाबले  दो गुना हो गई है।</p>
<p>महंगी धातुओं के दाम तभी बढ़ते हैं जब दुनिया में मंदी की आहटें सुनाई देने लगती हैं। जाहिर है कि इस बार भी सोना-चांदी यही संकेत दे रहा है।  दुनिया ने २० वीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अनेक अवसरों पर विश्वव्यापी मंदी का सामना किया है ,1928  से 1934  की मंदी  हो या 1982 ,1991  और 2008  की विश्वव्यापी मंदी ने दुनिया की कमर तोड़ दी थी और इससे उबरने में वर्षों लग  जाते हैं। मंदी के दौर में वे देश और वे लोग ही टिक पाए जिनके पास सोना और चांदी थी ।</p>
<p>दुनिया में जब-जब मंदी आती है तब-तब फांसीवाद बढ़ता है ,दुनिया युद्ध की आग में झुलसने लगती है। इस समय दुनिया में अनेक देशों में युद्ध चल रहे हैं।  रूस यूक्रेन से लड़ रहा है। इस्राइल फिलिस्तीन और लेबनान से लड़ रहे हैं। अमेरिका हो या रूस या भारत या चीन  सभी देशों में फांसीवाद और पूंजीवाद बढ़ता जा रहा है। मंदी आती है तो अपने पीछे बर्बादी लेकर आती है। औद्योगिक विकास रुक जाता है ,बेरोजगारी बढ़ती है। कृषि उत्पादन घटता है। बैंक दीवालिया होने लगते  हैं। हमारा इतिहास बताता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दुनिया में करोड़ों लोगों कीनौकरी चलाई गयी था। मंदी अपने साथ शस्त्रों की होड़ लेकर आती है।</p>
<p> भारतीय परिवार हमेशा से संस्कृति से बंधे रहे हैं और चीनी परिवारों का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा है। और सबसे बड़ी वजह यही है कि ये दोनों देश सोना खपत करने वाले देशों में अकसर अव्वल रहते हैं। एक बार फिर से चीन और भारत सोना खपत करने वाले देशों में टॉप-2 स्थान में रहे हैं।आपको हर घर में तोला-दो तोला सोना तो आसानीसे मिल जाएगा।चीन  में दो साल पहले 630  तन सोना खप गया जबकि इस मामले में भारत दूसरे स्थान पर रहा। भारत में 575  टन तक सोना खप गया था।</p>
<p>सोने की खपत के मामले में दुनिया पर दादागिरी करने वाले अमेरिका का का नंबर तीसरा है। स्वर्ण के प्रति हमारा आकर्षण सनातनी है।  त्रेता में रामचंद्र के बनवास के समय भी सीता  जी ने जिस हिरण की मांग की थी वो भी सोने का ही था। आज भी हर विवाह में सोना-चांदी का आभूषण अनिवार्य है। सगाई भी सोने कि अंगूठी पहनकर होती है।</p>
<p>सोना शक्ति का प्रतीक है। हितोपदेश की कथाओं में कहा गया है की यदि पोटली में रखकर सोना टांग दिया जाये तो चूहा  बार-बर छलांग लगा सकता है। इसलिए मै कहता हूँ की दुनिया मंदी के गर्त में जाती दिखाई दे रही है। ऐसे में आप सोना-चांदी खरीदने का मौक़ा हाथ से न जाने दें।</p>
<p>1980  में जब मेरी शादी हुई थी तब सोने का भाव शायद 1300  रुपया प्रति 10  ग्राम था और जब मेरी बेटी की शादी 2005  में हुई तब सोने का भाव 6000  रूपये  प्रति 10  ग्राम के आसपास था। आज यही सोना 90  हजार रूपये तोला [ 10  ग्राम ] होने को आतुर है ।  यानी दुनिया में पिछले सौ साल में राजनीती में, समाज में ,चरित्र में गिरावट आयी लेकिन सोना  और चांदी लगातार ऊपर की और उठते रहे। तो जाइये ! जितना सोना-चांदी खरीद सकते हैं ,जाकर खरीद लीजिये ,क्योंकि कोई भी सरकार मंदी के दौर में आपकी मदद नहीं कर सकती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 14:04:17 +0530</pubDate>
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                <title>गोबर पहुंचा हरियाणा व‍िधानसभा </title>
                                    <description><![CDATA[<div>पिछले दिनों हरियाणा विधानसभा में सतारूढ दल भाजपा के दो विधायक आपस में ही भिड़ गए। दोनो सिनियर विधायक हैं जिनमें से एक हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री है नाम है डाक्टर अरविंद शर्मा और दूसरे वरिष्ठ विधायक का नाम है रामकुमार गौतम, गोहाना की जलेबी से शुरू हुई बात दस किलो गोबर पीने तक पहुंच गई। अरविंद शर्मा गोहाना के विधायक है, जब रामकुमार गौतम ने गोहाना की जलेबी को कूड़ा और डालडा की बताया तो अरविंद शर्मा चिढ़ गए और जबाब देते हुए बोले कि रामकुमार गौतम तो शर्त लगा कर दस किलो गोबर पी गया था। पलटवार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149945/dung-reached-haryana-legislative-assembly%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(14)2.jpg" alt=""></a><br /><div>पिछले दिनों हरियाणा विधानसभा में सतारूढ दल भाजपा के दो विधायक आपस में ही भिड़ गए। दोनो सिनियर विधायक हैं जिनमें से एक हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री है नाम है डाक्टर अरविंद शर्मा और दूसरे वरिष्ठ विधायक का नाम है रामकुमार गौतम, गोहाना की जलेबी से शुरू हुई बात दस किलो गोबर पीने तक पहुंच गई। अरविंद शर्मा गोहाना के विधायक है, जब रामकुमार गौतम ने गोहाना की जलेबी को कूड़ा और डालडा की बताया तो अरविंद शर्मा चिढ़ गए और जबाब देते हुए बोले कि रामकुमार गौतम तो शर्त लगा कर दस किलो गोबर पी गया था। पलटवार करते हुए रामकुमार गौतम ने अरविंद शर्मा को भ्रष्टाचारी बताते हुए कहा कि अरविंद शर्मा पेट्रोल पम्प दिलाने के नाम पर लोगों से पैसे ठगता है।</div>
<div> </div>
<div>यहां तक कहा कि मेरे रिश्तेदार के पैसे भी खा गया। आखिर यह कैसी मर्यादा है, ये कैसे नेता है। विधानसभा के अंदर निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग करते हुए एक दूसरे पर बच्चों की तरह इल्जाम लगा रहे हैं। भाजपा हाईकमान को इस घटना का संज्ञान लेना चाहिए और दोनो विधायकों को कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा कि कार्यवाही का टी.वी पर सीधा प्रसारण चलता है। इन नेताओ को इतना भी नही पता कि उनका आचरण लोगों पर क्या असर डालेगा।</div>
<div> </div>
<div>जनता खुद को ठगा सा महसूस करती है जब देखती है कि उनके चुने हुए नेता उनके मुद्दों को छोड़ एक दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणियां कर लड़ रहे हैं। जनता भी कहीं ना कहीं दोषी है, वही तो चुनकर भेजती है इनको, बिना सोचे समझे जनता बस चुनवी वादों के चक्कर में ऐसे नेताओं का चरित्र जानते हुए भी उन्हे जितवा विधानसभा और लोकसभा भेजती है। दोनो के दोनो दलबदलू हैं। रामकुमार गौतम और अरविंद शर्मा की कोई विचारधारा नही है। इनकी विचारधारा सिर्फ और सिर्फ कुर्सी है।</div>
<div> </div>
<div>जिधर कुर्सी उधर पलटी मारना इनकी पुरानी आदत है। रामकुमार गौतम पहली बार 2005 में भाजपा की टिकट पर नारनौंद विधानसभा से हरियाणा विधानसभा के लिए चुने गए थे। 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव आते-आते गौतम कांग्रेस में शामिल हो गए और 2009 का चुनाव नारनौंद से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हार गए। 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भी टिकट नही दिया तो नारनौंद से निर्दलीय खड़े हो गए और हार गए।</div>
<div> </div>
<div>पूरी उम्र चौटाला परिवार को कोसते कोसते राजनीति करते रहे परन्तु  2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में चौटाला परिवार के अजय चौटाला और दुष्यंत चौटाला की नवगठित राजनीतिक पार्टी जननायक जनता पार्टी में शामिल हो गए और नारनौंद से हरियाणा विधानसभा के लिए दूसरी बार चुने गए। 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले जजपा की खस्ता हालत देख उनके भी लात मारी और फिर से भाजपा में शामिल हो सफीदो से बमुश्किल चुनाव जीत विधायक बने। दूसरी अरविंद शर्मा की बात करें तो यह भी दलबदल के माहिर और बहुत बड़े खिलाड़ी हैं।</div>
<div> </div>
<div>अरविंद शर्मा ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत 1996 में सोनीपत से स्वतंत्र लोकसभा चुनाव जीत कर की, स्वतंत्र लोकसभा चुनाव जीतना बहुत बड़ी बात है इसमे कोई शक नही परन्तु यह तो आरंभ मात्र था। 1998 का लोकसभा चुनाव शिवसेना के चुनाव चिन्ह पर सोनीपत से लडा और हार गए। शिवसेना छोड़ कांग्रेसी हो गए 2004 और 2009 का लोकसभा चुनाव करनाल से जीते परन्तु 2014 की मोदी लहर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में करनाल से लोकसभा चुनाव हार गए।</div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस छोड़ बहन जी की पार्टी बसपा की ओर से 2014 हरियाणा विधानसभा चुनाव दो सीटों जुलाना और यमुनानगर से लड़ा परन्तु दोनो सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का दामन पकड़कर रोहतक से सांसद बने। 2024 का लोकसभा चुनाव फिर रोहतक से भाजपा की टिकट पर लड़ा परन्तु इस बार असफलता हाथ लगी और हार गए।  2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव गोहाना से कमल के फूल के निशान पर लड़ा और जीत कर सरकार में  जेल एवंम सहकारिता मंत्री पद पर आसीन हुए। </div>
<div> </div>
<div>दोनो ही नेता अतिवरिष्ठ और अतिअनुभवी हैं परन्तु शिष्टाचार के नाम पर जीरो, नेता को लोकसभा, व‍िधानसभा या अन्य किसी हाऊस में लड़ता देख जनता प्रसन्न होती है यदि वो जनता के हक के लिए लड़ रहा हो। ऐसे बेहुदगी की हदें पार कर लड़ता देख जनता के मन में नेता के प्रति सम्मान कम होता है और जनता समय आने पर अपना विरोध दिखा भी देती है। पार्टी के साथ साथ विधानसभा अध्यक्ष को भी इस तरह के विधायकों के खिलाफ सख्त से सख्त एक्शन लेना चाहिए ताकि आने वाले समय में इस तरह की हरकत करने से नेता झिझके।</div>
<div> </div>
<div>जनता इस तरह के नेताओं को चुनावों में सबक सिखाना अच्छे से जानती। इसका सशक्त उदाहरण दिल्ली की जनता एक बड़बोले नेता को लोकसभा और विधानसभा चुनाव हरवाकर दिखा चुकी है। नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि आप को  कुर्सी पर बैठाया है जनता का काम करने और जनता के हक की आवाज उठाने के लिए ना की अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए, जनता को वोट डालते समय नेता के चाल चरित्र पर खुले तौर पर विचार कर के वोट देना चाहिए।  </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 13:58:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भाषा विवाद के तवे पर राजनैतिक रोटियां </title>
                                    <description><![CDATA[<p><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आप बता सकते हैं कि आप किस भाषा में हंसते हैं या किस भाषा में रोते हैं? मनुष्य की ये भावनाएं समस्त पृथ्वी पर एक ही तरह व्यक्त की जाती हैं। आप जिस भाषा को नहीं भी समझते परन्तु सामने वाले मनुष्य को हंसता हुआ या रोता हुआ देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि</span>    <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय उसकी मनोदशा कैसी है। प्राकृतिक रूप से मनुष्य की इन भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु सभी भावनाएं ऐसी नहीं होती कि उन्हें चेहरे के भावों द्वारा व्यक्त किया जा सके। इसीलिए हमें</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149943/political-loaves-on-the-pan-of-language-dispute%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/rajneeti1.jpg" alt=""></a><br /><p><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आप बता सकते हैं कि आप किस भाषा में हंसते हैं या किस भाषा में रोते हैं? मनुष्य की ये भावनाएं समस्त पृथ्वी पर एक ही तरह व्यक्त की जाती हैं। आप जिस भाषा को नहीं भी समझते परन्तु सामने वाले मनुष्य को हंसता हुआ या रोता हुआ देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">उस समय उसकी मनोदशा कैसी है। प्राकृतिक रूप से मनुष्य की इन भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु सभी भावनाएं ऐसी नहीं होती कि उन्हें चेहरे के भावों द्वारा व्यक्त किया जा सके। इसीलिए हमें किसी विशिष्ट भाषा की आवश्यकता पड़ती है।</span> </p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। यह वह साधन है जिसके द्वारा हम बोलकर या लिखकर अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। दूसरों के समक्ष अपनी भावनाएं प्रकट कर सकते हैं तथा दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और समाज के मूल्यों का भी प्रतिबिंब होती है। यह न केवल हमारे अस्तित्व को परिभाषित करती है, बल्कि हमें समाज से जोड़ने का कार्य भी करती है। विभिन्न भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति की विद्वता को दर्शाता है, और इसे एक महान उपलब्धि माना जाता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">हर भाषा का अपना सौंदर्य होता है, जो उसके बोलने वालों और उसे समझने वालों के व्यवहार में झलकता है। किसी भाषा का ज्ञान होना गर्व की बात होती है। जो व्यक्ति जितनी अधिक भाषाओं का ज्ञान रखता है, वह उतना ही बड़ा विद्वान माना जाता है। लेकिन जब भाषा को विवाद या टकराव का माध्यम बना दिया जाता है, तो यह चिंताजनक हो जाता है। भाषा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होता है, न कि उन्हें अलग करना।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वह कौन सा कारण है, जिसके लिए भाषा को विवाद या झगड़े का माध्यम बनाया जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने हिंदी भाषा को लेकर जो विवाद खड़ा किया, वह इसी राजनीति का एक और उदाहरण है। यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में यह विवाद तमिल भाषा के सम्मान की रक्षा के लिए है, या फिर इसके पीछे कोई और उद्देश्य छिपा है? क्यों व्यर्थ में भाषा विवाद को हवा देकर वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने का काम कर रहे हैं? आखिर इससे वे क्या हासिल करना चाहते हैं?</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">हर भाषा अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान को संजोए रखती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में भाषाई विविधता हमारी ताकत है। देश में 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं और सैकड़ों अन्य भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। हिंदी देश की राजभाषा है, लेकिन यह किसी भी अन्य भाषा के अस्तित्व को खतरे में डालने के लिए नहीं बनी है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी प्रावधान किया गया कि राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षित और विकसित करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। </span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में जब हिंदी भाषा को जबरन किसी पर थोपने की बात की जाती है, तो यह एक मिथक ही प्रतीत होता है। सरकारें बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में लागू करने की कोई मंशा नहीं है। इसके बावजूद, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार हिंदी के विरोध में बयान देना केवल राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा लगता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में भाषाई विवाद कोई नई बात नहीं है। 1960 के दशक में जब हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रयास किया गया, तब दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में इसका भारी विरोध हुआ। यह विरोध इतना तीव्र था कि इसने द्रविड़ राजनीति को एक नई दिशा दी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसी पार्टियों ने इस मुद्दे को भुनाकर अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत कीं।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी यही रणनीति अपनाई जा रही है। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का मुद्दा एक भावनात्मक विषय बना दिया गया है। एम.के. स्टालिन इसे समय-समय पर उछालकर अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं। वे हिंदी भाषा के प्रसार को तमिल संस्कृति के लिए खतरा बताकर राज्य के लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं, जिससे उनकी पार्टी को राजनीतिक लाभ मिलता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">एम.के. स्टालिन और उनकी पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार हिंदी को जबरन थोपने का प्रयास कर रही है। लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (</span>NEP) <span lang="hi" xml:lang="hi">में त्रिभाषा सूत्र की बात कही गई है, जिसका अर्थ है कि छात्रों को कम से कम तीन भाषाएँ सीखने का अवसर मिलना चाहिए। इसमें किसी भी भाषा को अनिवार्य नहीं किया गया है। राज्यों को पूरी स्वतंत्रता दी गई है कि वे अपनी क्षेत्रीय भाषा को प्राथमिकता दें।</span> </p>
<p> <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ लोक सेवा आयोग (</span>UPSC) <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाएँ अंग्रेजी और हिंदी दोनों में उपलब्ध हैं, और हाल के वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं में भी इनका विस्तार हुआ है। संविधान के अनुसार कोई भी भारतीय नागरिक अपनी पसंद की भाषा में संवाद कर सकता है। हिंदी केवल राजभाषा है, न कि राष्ट्रीय भाषा।</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में यह दावा करना कि हिंदी को जबरन थोपा जा रहा है, वास्तविकता से परे लगता है।</span> </p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल एक अत्यंत समृद्ध और प्राचीन भाषा है। यह दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषाओं में से एक मानी जाती है और इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा भी प्राप्त है। तमिल साहित्य, संस्कृति और इतिहास अत्यंत गौरवशाली हैं। तमिल भाषा की मजबूत स्थिति को देखते हुए यह कहना कि हिंदी के कारण इसका अस्तित्व खतरे में है, एक अनुचित भय पैदा करने जैसा है।</span> </p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की दुनिया में बहुभाषावाद एक ताकत है। जो व्यक्ति जितनी अधिक भाषाओं का ज्ञान रखता है, उसकी ज्ञान की सीमा उतनी ही विस्तृत होती है। तमिल भाषियों को हिंदी या अन्य भाषाएँ सीखने से परहेज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास में सहायक होगा।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">जब दुनिया वैश्वीकरण की ओर बढ़ रही है, तब भारत में भाषा के नाम पर विभाजन दुर्भाग्यपूर्ण है। हमें यह समझना होगा कि कोई भी भाषा दूसरी भाषा की दुश्मन नहीं होती। भाषाएँ एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। हिंदी का विरोध करने से तमिलनाडु को क्या लाभ मिलेगा? क्या इससे राज्य की प्रगति तेज होगी? क्या इससे बेरोजगारी कम होगी? क्या इससे आर्थिक स्थिति सुधरेगी? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। यह केवल एक भावनात्मक मुद्दा है, जिसका राजनीतिक लाभ उठाया जा रहा है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा विवाद का समाधान टकराव में नहीं, बल्कि समावेशी दृष्टिकोण अपनाने में है। छात्रों को अपनी मातृभाषा में पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन उन्हें अन्य भारतीय भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।</span> </p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र और राज्य सरकारों को भाषा के मुद्दे पर टकराव की बजाय संवाद और सहयोग का रास्ता अपनाना चाहिए। भाषा को राजनीति से अलग रखना होगा। इसे केवल चुनावी लाभ का साधन नहीं बनने देना चाहिए।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की ताकत उसकी विविधता में है, और भाषाई विविधता इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। हिंदी हो या तमिल, दोनों ही भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। किसी भी भाषा का विरोध करना, उसे खतरा बताना या उसके खिलाफ आंदोलन करना देश की एकता और अखंडता के लिए उचित नहीं है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">एम.के. स्टालिन जैसे नेता यदि वास्तव में तमिलनाडु की प्रगति चाहते हैं, तो उन्हें भाषा विवाद से ऊपर उठकर विकास के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, और आर्थिक सुधार जैसे विषय अधिक महत्वपूर्ण हैं। भाषा को विवाद का नहीं, बल्कि सेतु का माध्यम बनाना चाहिए ताकि भारत और अधिक सशक्त हो सके।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 13:50:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ये समाजकंटक अध्यापक अपराधियों से अधिक खतरनाक हैं! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>जीवन में माता-पिता के बाद अध्यापक का ही सर्वोच्च स्थान माना गया है। अध्यापक ही बच्चों को सही शिक्षा देकर ज्ञानवान बनाते हैं, परंतु आज चंद अध्यापक-अध्यापिकाएं अपनी मर्यादा को भूल कर बच्चों पर अमानवीय अत्याचार कर रहे हैं पिछले कुछ दिनों में ऐसी घटनाओं की झड़ी लगी है जिनमें टीचर टीजर बन रहे हैं जो बच्चों के साथ तमाम तरीके से मानसिक शारीरिक शोषण ही नही कर रहे हैं वरन अपराधियों से भी घटिया व्यवहार यहाँ तक कि दुराचार भी करने से बाज नहीं आ रहे है।
<div>  </div>
  आपको बता दें कि 12 फरवरी को 'जोधपुर' (राजस्थान) के प्रताप</div>
<div>18</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149942/these-social-teachers-are-more-dangerous-than-criminals%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi-divas35.jpg" alt=""></a><br /><div>जीवन में माता-पिता के बाद अध्यापक का ही सर्वोच्च स्थान माना गया है। अध्यापक ही बच्चों को सही शिक्षा देकर ज्ञानवान बनाते हैं, परंतु आज चंद अध्यापक-अध्यापिकाएं अपनी मर्यादा को भूल कर बच्चों पर अमानवीय अत्याचार कर रहे हैं पिछले कुछ दिनों में ऐसी घटनाओं की झड़ी लगी है जिनमें टीचर टीजर बन रहे हैं जो बच्चों के साथ तमाम तरीके से मानसिक शारीरिक शोषण ही नही कर रहे हैं वरन अपराधियों से भी घटिया व्यवहार यहाँ तक कि दुराचार भी करने से बाज नहीं आ रहे है।
<div> </div>
 आपको बता दें कि 12 फरवरी को 'जोधपुर' (राजस्थान) के प्रताप नगर में 2 अध्यापकों ने एक 8 वर्षीय मासूम की किसी गलती पर पहले तो उसे गंदा पानी पिलाया और फिर 'बैल्ट' से इतना पीटा कि वह बेहोश हो गया।</div>
<div>18 फरवरी को 'साबरकांठा' (गुजरात) में एक अध्यापक को दसवीं कक्षा की 15 वर्षीय छात्रा को अपने जन्मदिन के बहाने होटल में बुलाकर उससे बलात्कार और मारपीट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।</div>
<div>21 फरवरी को 'सवाई माधोपुर' (राजस्थान) के 'सुखवास' स्थित एक प्राइवेट स्कूल के अध्यापक द्वारा छठी कक्षा के एक छात्र को पीटने और उससे 200 उठक-बैठक लगवाने के आरोप में पीड़ित बच्चे के पिता ने उसके विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई।</div>
<div> </div>
<div>22 फरवरी को 'बठिंडा' (पंजाब) के गुरुनानकपुरा मोहल्ला स्थित सरकारी हाई स्कूल में एक अध्यापक और अध्यापिका ने 10वीं कक्षा के 2 छात्रों को बुरी तरह पीट डाला। एक छात्रा के हाथ में मारे डंडे से गंभीर चोट आई जबकि दूसरे छात्र को इतने जोर से थप्पड़ मारा कि कान में दर्द शुरू हो जाने के कारण उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। 22 फरवरी को ही 'मैनपुरी' (उत्तर प्रदेश) के 'घिरोर' में एक स्कूल के अध्यापक ने कक्षा 2 के छात्र को किसी गलती पर पेड़ से बांध कर पीटा।</div>
<div> </div>
<div> 23 फरवरी को 'पूर्णिया' (बिहार) जिले के 'मोगलाहा प्रसादपुर' गांव में सरकारी प्राइमरी स्कूल में 2 बच्चों के झगड़े में स्कूल की एक अध्यापिका ने एक 9 वर्षीय बच्चे को इतनी बुरी तरह पीटा कि वह बेहोश हो गया।</div>
<div>23 फरवरी को ही नई दिल्ली में 'खजूरीखास' के एक स्कूल में एक 6 वर्षीय बच्चे द्वारा शरारत करने से नाराज अध्यापक ने उसके गाल पर इतने जोर से थप्पड़ मारा कि उसके कान का पर्दा फट गया।</div>
<div> </div>
<div>23 फरवरी को ही बरेली (उत्तर प्रदेश) के 'बिधरी चैनपुर' स्थित एक प्राइवेट स्कूल की अध्यापिका ने एक छात्रा द्वारा उससे ट्यूशन पढ़ने से इंकार करने पर उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि उसके कान का पर्दा फट जाने से उसे सुनाई देना बंद हो गया। शिकायत करने गए बच्ची के पिता के साथ भी स्कूल के प्रबंधक ने दुर्व्यवहार किया।</div>
<div> </div>
<div>24 फरवरी को 'हरदोई' (उत्तर प्रदेश) के 'बिरोरी' गांव में एक प्राइवेट स्कूल के अध्यापक ने पूछे गए प्रश्न का उत्तर न दे पाने पर तीसरी कक्षा के एक छात्र को जातिसूचक गालियां दीं, मुर्गा बनाकर बुरी तरह पीटा और उसकी पीठ पर बैठ गया, जिससे उसके पैर में फ्रैंक्कर हो गया।</div>
<div> </div>
<div>24 फरवरी को ही चेन्नई के 'कुलपोक' स्थित एक स्कूल में तीसरी कक्षा का एक छात्र हिन्दी कविता नहीं सुना पाया तो उसके अध्यापक ने बच्चे को बुरी तरह पीट डाला जिस पर अध्यापक को निलंबित कर दिया गया।</div>
<div>छात्र-छात्राओं पर अध्यापकों के एक वर्ग द्वारा मारपीट के उक्त उदाहरण इस आदर्श व्यवसाय पर एक घिनौना धब्बा है तथा इसके विरुद्ध स्कूलों के प्रबंधकों को दोषी अध्यापकों को समझाना चाहिए और उनसे लिखवा कर लेना चाहिए कि वे भविष्य में ऐसा नहीं करेंगे।</div>
<div> </div>
<div>कानूनी तौर पर अध्यापकों द्वारा बच्चों को शारीरिक दंड देने की मनाही है लेकिन - कानूनी प्रावधानों के बावजूद कुछ अध्यापक व अध्यापिकाएं सारे कायदे-कानून भूल कर और परिणाम पर विचार किए बिना बच्चों पर अत्याचार कर रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>अतः अध्यापकों को नौकरी देते समय उनका इंटरव्यू लेने के साथ-साथ उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण करने के अलावा नौकरी देने के बाद भी नियमित रूप से उनकी काऊंसलिंग की जानी चाहिए तथा छात्रों से दुर्व्यवहार करने वाले अध्यापकों को शिक्षाप्रद सजा दी जाए ताकि उनके द्वारा छात्र-छात्राओं के उत्पीड़न का यह दुष्चक्र रुके।ऐसे अध्यापकों को तत्काल कार्यमुक्त कर जेल भेजा जाए ताकि भविष्य में ऐसी वारदातों की पुनरावृत्ति न हो साथ ही शिक्षा के मंदिरों की शुचिता को. बचाया जा सके। ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/149942/these-social-teachers-are-more-dangerous-than-criminals%C2%A0</link>
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                <pubDate>Mon, 17 Mar 2025 13:47:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>नशे में लड़खड़ाती नई पीढ़ी।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश में इस बार होली के अवसर पर कई गुना लगातार हो रही ड्रग्स की सप्लाई ने देशभर में अपराधों का इजाफा कर दिया है| इस बार होली में लगा कि पूरा युवा वर्ग नशे में लड़खड़ा कर डोल रहा है। होली के अवसर पर युवा बुजुर्ग यहां तक छोटे-छोटे जवान होते बच्चे भी नशे का शिकार हो चुके हैं और होली में शराब गांजा भांग ड्रग्स जैसे खतरनाक नशीले पदार्थों को लेने का जन्म सिद्ध अधिकार समझ उसका भयानक तरीके से सेवन करने लगे हैंl नशीले पदार्थों की इस बार खपत पिछली बार की तुलना में लगभग दुगनी हो</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149901/new-generation-staggering-drunk"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(10)2.jpg" alt=""></a><br /><div>देश में इस बार होली के अवसर पर कई गुना लगातार हो रही ड्रग्स की सप्लाई ने देशभर में अपराधों का इजाफा कर दिया है| इस बार होली में लगा कि पूरा युवा वर्ग नशे में लड़खड़ा कर डोल रहा है। होली के अवसर पर युवा बुजुर्ग यहां तक छोटे-छोटे जवान होते बच्चे भी नशे का शिकार हो चुके हैं और होली में शराब गांजा भांग ड्रग्स जैसे खतरनाक नशीले पदार्थों को लेने का जन्म सिद्ध अधिकार समझ उसका भयानक तरीके से सेवन करने लगे हैंl नशीले पदार्थों की इस बार खपत पिछली बार की तुलना में लगभग दुगनी हो गई है। नशीले पदार्थों से हुई अपराधिक गतिविधियों में हुई तेजी शासन, प्रशासन तथा पुलिस के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है|</div>
<div> </div>
<div>नशीले पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय, अंतर राज्यीय तस्करी देश तथा विश्व के लिए एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई है| यह चुनौती इसलिए भी है कि पिछले वर्ष में अपराधियों ने सूखे नशे का सेवन कर अपराध की वारदातें की हैं, नशे की लत में आकर अपराधियों में महानगरों मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई में लगातार बलात्कार, लूट, डकैती,और राहगीरों की हत्या को जन्म दिया है| दूसरी तरफ सूखे नशे की लत में स्कूल और कॉलेज के युवा तथा बच्चे अपना भविष्य खराब करने पर आमादा है|</div>
<div> </div>
<div>पिछले कुछ माह में मुंबई नारकोटिक्स इकाई ने ताबड़तोड़ छापेमारी कर बड़ी मात्रा में चरस, कोकीन, गांजा, स्मैक की बड़ी तादाद में जप्त कर कई नामचीन अभिनेता, अभिनेत्रियों को गिरफ्तार कर प्रकरण न्यायालय के हवाले किया है| दूसरी तरफ दिल्ली,बेंगलुरु, कोलकाता में भी पुलिस प्रशासन द्वारा सीधे कड़ी कार्रवाई की हैं|वर्तमान में शराब तो सामाजिक बुराई बना ही हुआ है| साथ-साथ सूखा नशा भी समाज के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है, सुखे नशे के मामले में केंद्र के सर्वोच्च नेतृत्व में यानी प्रधानमंत्री ने भी गंभीरता पूर्वक इसे रोकने के लिए चिंता जताई है देश में न सिर्फ ड्रग्स के नशे का इस्तेमाल किया जा रहा है बल्कि बड़े पैमाने पर इसकी तस्करी कर अवैध कारोबार भी किया जा रहा है ड्रग्स का नशा सामाजिक विडंबना बना हुआ है|</div>
<div> </div>
<div>तब देश में नए वर्ष के आगमन के पूर्व बड़े-बड़े आलीशान होटलों मैं सूखे नशे की पार्टियां आयोजित करने की तैयारी कर ली है, ऐसे में पुलिस के केंद्र सरकार के तथा राज्य सरकार के आला अधिकारी इसे रोकने के लिए हर संभव प्रयास की रणनीति बनाने में जुट गए है और शासन तथा पुलिस प्रशासन अपना पूरा ध्यान सूखे नसे को प्रतिबंधित करने में लगे हुए हैं, मूलतः मुंबई गोवा और पाकिस्तानी सरहद से लगे क्षेत्र और राज्य से सूखे नशे पदार्थों की आवक सभी राज्यों में होती है| निसंदेह इसे गंभीर षड्यंत्र के रूप में लिया जाना चाहिए| मुंबई सूखे नशे का एक बड़ा केंद्र बन चुका है, सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या प्रकरण को लेकर जब पुलिस के आला अधिकारी को नशीले पदार्थों रेकेट हाथ लगा तब राज्य तथा केंद्र के कान खड़े हो गए और तब से पूरे देश में ताबड़तोड़ नशे के विरोध में कार्रवाई की जाने लगी|</div>
<div> </div>
<div>और इसी तारतम्य में देश को यह बात समझ में आई कि सूखे नशे की लत में बड़े शहरों के तमाम पूंजीपति नशे के आदी हो चुके परिस्थितियां बहुत गंभीर एवं चुनौतीपूर्ण है, नए वर्ष के आगमन की सेलिब्रेशन तमाम नशीले पदार्थ की सप्लाई करने वाले तस्कर अपनी तैयारी में जुट गए हैं| देश के सभी राज्यों में नशीले पदार्थों के विरोध में केंद्र के निर्देशन पर लगातार कार्रवाई की जा रही है और युवा वर्ग बच्चों को सोशल मीडिया के द्वारा भी इसकी बुराई के संबंध में लगातार अवगत कराया जा रहा है एवं इस बुराई से दूर रहने का आह्वान किया गया है, देश के बड़े-बड़े रिसोर्ट, जंगल के पिकनिक स्पॉट, देश की मुख्य सड़कों के आसपास ढाबों के संचालकों पर भी नजर रखने की योजना को मूर्त रूप दिया जाना है| </div>
<div> </div>
<div>ताकि अपराधों में कमी आ सके ,शराब से तो अपराध होते ही हैं पर सूखे नशे से अपराधिक ज्यादा उम्र हिंसक और मस्तिष्क शुन्य हो जाते ऐसे में अपराध करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती, और इस तरह वे नशे में अपराधिक कृत्य करने से नहीं चूकते |केंद्र तथा राज्य प्रशासन की चिंता इस बात के लिए तो है ही कि इससे अपराध की संख्या में काफी वृद्धि हुई है पर साथ में इसके तस्करों द्वारा की जा रही ड्रग्स की तस्करी पर एक गंभीर चुनौती बनी हुई है|अंतरराष्ट्रीय सीमा से आने वाला ड्रग्स शारीरिक रूप से भी काफी नुकसानदेह होता है अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने का एक राष्ट्रीय स्तर पर योजना बनाकर उसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है, जितने व्यक्ति नशा करके अपराध करने के लिए दोषी हैं |</div>
<div> </div>
<div>उससे ज्यादा दोषी नशीले पदार्थों के तस्करी करने वाले भी है, तस्कर समूह को चिन्हित कर उस पर बड़ी कार्रवाई करने की देश को गंभीर आवश्यकता है, देश में शराब जहां ग्रामीण क्षेत्रों में एक बड़ी बुराई है उससे ग्रामीण आमजन को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ शारीरिक नुकसान भी बहुत बड़ा होता है, इसी के साथ शहरी क्षेत्रों में खासकर बड़े शहरों में सुखा नशा एक बडी सामाजिक बीमारी की तरह अत्यंत गंभीर चुनौती बन गई है, इसे रोकने के हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए तभी इस सामाजिक गंभीर समस्या पर कुछ राहत और निदान मिल सकता है|</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Mar 2025 16:18:40 +0530</pubDate>
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