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                <title>केरल - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>केरल RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>चुनावी भूचाल 2026: बदला नैरेटिव बदली राजनीति और उभरे नए सत्ता समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह भावनाओं रणनीतियों नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों का जटिल मिश्रण है। इस बार के नतीजों ने कई स्थापित धारणाओं को तोड़ा और नए राजनीतिक ट्रेंड्स को जन्म दिया। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वजहों से सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो कुछ साझा फैक्टर ऐसे रहे जिन्होंने इन नतीजों को आकार दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ा बदलाव नैरेटिव के स्तर पर देखने को मिला। चुनाव अब केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178209/election-earthquake-2026-changed-narrative-changed-politics-and-new-power"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/haseen.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह भावनाओं रणनीतियों नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों का जटिल मिश्रण है। इस बार के नतीजों ने कई स्थापित धारणाओं को तोड़ा और नए राजनीतिक ट्रेंड्स को जन्म दिया। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वजहों से सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो कुछ साझा फैक्टर ऐसे रहे जिन्होंने इन नतीजों को आकार दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ा बदलाव नैरेटिव के स्तर पर देखने को मिला। चुनाव अब केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहे बल्कि पहचान संस्कृति और भावनात्मक अपील का प्रभाव बहुत गहरा हो गया। पश्चिम बंगाल में लंबे समय से सत्ता में रही सरकार के खिलाफ माहौल बना लेकिन यह केवल एंटी इनकम्बेंसी का मामला नहीं था। यहां एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया गया जिसमें सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक हथियार बना दिया गया। माछ भात और मां काली जैसे प्रतीकों के जरिए यह संदेश दिया गया कि स्थानीय परंपराओं का सम्मान केवल एक खास राजनीतिक विचारधारा ही कर सकती है। इसने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ध्रुवीकरण इस चुनाव का एक और बड़ा फैक्टर रहा। यह केवल धार्मिक आधार पर नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के स्तर पर भी हुआ। असम में इसका एक अलग रूप देखने को मिला जहां वोटों का बंटवारा निर्णायक साबित हुआ। विपक्षी दलों के बीच तालमेल की कमी और समुदायों के भीतर विभाजन ने सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाया। यह रणनीति नई नहीं थी लेकिन इस बार इसे अधिक व्यवस्थित तरीके से लागू किया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि चुनाव जीतने के लिए केवल अपने वोटबैंक को मजबूत करना ही नहीं बल्कि विरोधी वोटों को विभाजित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा बड़ा फैक्टर प्रशासनिक और संरचनात्मक बदलाव रहे। मतदाता सूचियों में संशोधन और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं का असर सीधे चुनावी परिणामों पर पड़ा। पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का मुद्दा चर्चा में रहा। वहीं असम में परिसीमन के बाद सीटों का स्वरूप बदल गया जिससे कई क्षेत्रों का राजनीतिक संतुलन प्रभावित हुआ। यह बदलाव तकनीकी लग सकते हैं लेकिन इनका असर जमीनी स्तर पर बहुत गहरा होता है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि चुनाव केवल प्रचार और रैलियों से नहीं जीते जाते बल्कि सिस्टम के भीतर होने वाले बदलाव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नेतृत्व का प्रभाव इस बार पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट दिखा। असम में मजबूत और आक्रामक नेतृत्व ने सरकार के खिलाफ संभावित नाराजगी को दबा दिया। वहीं केरल में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नेतृत्व पर सवाल उठने लगे। भ्रष्टाचार के आरोप और थकान का असर साफ दिखा। यह अंतर बताता है कि केवल सत्ता में बने रहना काफी नहीं होता बल्कि जनता के बीच लगातार भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है। जहां यह भरोसा टूटा वहां सत्ता भी हाथ से निकल गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में जो हुआ वह भारतीय राजनीति के लिए एक दिलचस्प मोड़ है। यहां एक फिल्मी सितारे ने अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। यह कोई नई बात नहीं है लेकिन जिस तेजी और पैमाने पर यह बदलाव हुआ उसने सबको चौंका दिया। इसका मतलब यह है कि आज का मतदाता पारंपरिक दलों से हटकर नए विकल्पों को मौका देने के लिए तैयार है। खासकर युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाता ऐसे चेहरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो उन्हें नया और अलग लगता है। यह बदलाव आने वाले समय में अन्य राज्यों में भी देखने को मिल सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं की भूमिका इस चुनाव में निर्णायक रही। पहले उन्हें केवल एक सहायक वोटबैंक माना जाता था लेकिन अब वे खुद एक संगठित और प्रभावशाली वर्ग बन चुकी हैं। अलग अलग राज्यों में महिलाओं को लक्षित करके योजनाएं और वादे किए गए। कहीं नकद सहायता का वादा किया गया तो कहीं सामाजिक सुरक्षा और रोजगार की बात हुई। इसका असर यह हुआ कि महिलाओं ने बड़ी संख्या में मतदान किया और कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित किया। यह ट्रेंड भविष्य की राजनीति को भी दिशा देगा क्योंकि अब कोई भी दल इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सत्ताधारी दलों के पारंपरिक गढ़ भी इस बार सुरक्षित नहीं रहे। पश्चिम बंगाल में जिन सीटों पर एक ही पार्टी का लंबे समय से कब्जा था वहां भी बदलाव देखने को मिला। इसका मतलब यह है कि मतदाता अब केवल परंपरा के आधार पर वोट नहीं दे रहा बल्कि वह विकल्प तलाश रहा है। इसी तरह तमिलनाडु में भी पारंपरिक दो दलों के बीच की राजनीति को एक नए खिलाड़ी ने चुनौती दी। यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती और जनता समय समय पर नए विकल्प तलाशती रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सभी फैक्टर्स को मिलाकर देखा जाए तो यह चुनाव केवल सरकार बदलने का मामला नहीं है बल्कि यह राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत है। अब चुनाव अधिक जटिल हो गए हैं जहां भावनाएं रणनीति नेतृत्व और सामाजिक समीकरण सभी एक साथ काम करते हैं। यह भी स्पष्ट है कि कोई एक फार्मूला सभी राज्यों में काम नहीं करता। हर राज्य की अपनी सामाजिक संरचना और राजनीतिक संस्कृति होती है और उसी के अनुसार रणनीति बनानी पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इन ट्रेंड्स से क्या सीखते हैं। क्या वे केवल ध्रुवीकरण और नैरेटिव पर ध्यान देंगे या फिर विकास और शासन के मुद्दों को भी उतनी ही प्राथमिकता देंगे। मतदाता अब पहले से अधिक जागरूक है और वह केवल वादों से संतुष्ट नहीं होता। उसे परिणाम चाहिए और अगर उसे लगता है कि कोई और विकल्प बेहतर है तो वह बदलाव करने में संकोच नहीं करता।</div>
<div style="text-align:justify;">इस चुनाव ने एक और बात साफ कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। नए खिलाड़ी सामने आ रहे हैं और पुराने दलों को खुद को लगातार अपडेट करना पड़ रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी है क्योंकि इससे जवाबदेही बढ़ती है और जनता को बेहतर विकल्प मिलते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में कहा जा सकता है कि 2026 के चुनाव केवल राजनीतिक घटनाएं नहीं हैं बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत हैं। यहां से जो ट्रेंड्स उभरे हैं वे आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति को नई दिशा देंगे। जो दल इन संकेतों को समझेंगे और समय के अनुसार खुद को ढालेंगे वही भविष्य में सफल होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">      <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 16:31:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश में फर्जी विश्वविद्यालयों का बढ़ता जाल, 12 राज्यों में सक्रिय 32 संस्थान; UGC ने जारी की चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">देश में शिक्षा के नाम पर चल रहे फर्जी संस्थानों का नेटवर्क तेजी से फैलता जा रहा है। हालात यह हैं कि दो साल पहले जहां ऐसे विश्वविद्यालय केवल आठ राज्यों तक सीमित थे, वहीं अब इनकी पहुंच बढ़कर 12 राज्यों तक हो गई है। इसी अवधि में फर्जी विश्वविद्यालयों की संख्या भी 20 से बढ़कर 32 हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">नए प्रभावित राज्यों में हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं। इस बढ़ते खतरे को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने छात्रों और अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी है और ऐसे संस्थानों में दाखिला न लेने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170438/growing-network-of-fake-universities-in-the-country-32-institutions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/देश-में-फर्जी-विश्वविद्यालयों-का-बढ़ता-जाल,-12-राज्यों-में-सक्रिय-32-संस्थान;-ugc-ने-जारी-की-चेतावनी.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में शिक्षा के नाम पर चल रहे फर्जी संस्थानों का नेटवर्क तेजी से फैलता जा रहा है। हालात यह हैं कि दो साल पहले जहां ऐसे विश्वविद्यालय केवल आठ राज्यों तक सीमित थे, वहीं अब इनकी पहुंच बढ़कर 12 राज्यों तक हो गई है। इसी अवधि में फर्जी विश्वविद्यालयों की संख्या भी 20 से बढ़कर 32 हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">नए प्रभावित राज्यों में हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं। इस बढ़ते खतरे को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने छात्रों और अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी है और ऐसे संस्थानों में दाखिला न लेने की चेतावनी दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में कर्नाटक के बेंगलुरु में “ग्लोबल ह्यूमन पीस यूनिवर्सिटी” नाम से संचालित एक फर्जी संस्थान के मामले में अलर्ट जारी करते हुए यूजीसी ने यह निर्देश दिए।</p>
<hr />
<h6 style="text-align:justify;"><strong>प्रवेश से पहले यूजीसी की वेबसाइट पर जरूर जांचें सूची</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">यूजीसी ने कहा है कि किसी भी विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने से पहले उसकी मान्यता की पुष्टि यूजीसी की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध सूची से अवश्य करें। पिछले कुछ वर्षों में यूजीसी लगातार फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी करता रहा है, लेकिन इसके बावजूद ये संस्थान अलग-अलग नामों से छात्रों को गुमराह कर रहे हैं।ग्रामीण क्षेत्रों तक फैले इन फर्जी विश्वविद्यालयों के जाल में हर साल हजारों छात्र फंस रहे हैं।</p>
<hr />
<h6 style="text-align:justify;"><strong>दिल्ली में सबसे ज्यादा 12 फर्जी विश्वविद्यालय</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">देश के 12 राज्यों में सक्रिय 32 फर्जी विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक 12 दिल्ली में पाए गए हैं। इनमें से कुछ संस्थान यूजीसी मुख्यालय के आसपास ही संचालित हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यों के अनुसार स्थिति इस प्रकार है:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>दिल्ली – 12</p>
</li>
<li>
<p>उत्तर प्रदेश – 4</p>
</li>
<li>
<p>केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक – 2-2</p>
</li>
<li>
<p>हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश – 1-1</p>
</li>
</ul>
<hr />
<h6 style="text-align:justify;"><strong>विदेशी विश्वविद्यालयों के नाम का भी हो रहा दुरुपयोग</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">अब कई फर्जी संस्थान विदेशी विश्वविद्यालयों जैसा नाम अपनाकर छात्रों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे छात्रों के लिए असली और नकली संस्थानों में फर्क करना और भी मुश्किल हो गया है।यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि केवल मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से ही डिग्री लेने पर ही उसका कानूनी महत्व होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 21:53:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>  गोवा के मुख्यमंत्री ने भाजपा की पदयात्रा को दिखाई हरी झंडी </title>
                                    <description><![CDATA[<p>केरल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लोकसभा चुनाव से पहले जमीनी स्तर की तैयारियों के मद्देनजर एक महीने तक राज्यव्यापी पदयात्रा करेगी। गोवा के मुख्यमंत्री डॉ प्रमोद सावंत ने शनिवार को कासरगोड में पदयात्रा को हरी झंडी दिखाई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन पदयात्रा का नेतृत्व करेंगे। पदयात्रा के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता धार्मिक व सामाजिक नेताओं व सांस्कृतिक हस्तियों से मुलाकात करेंगे। केंद्र की मोदी सरकार की योजनाओं से जनता को रूबरू कराया जाएगा। यह पदयात्रा प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र से होकर गुजरेगी। </p>
<p>गोवा के मुख्यमंत्री डॉ प्रमोद सावंत पदयात्रा में शामिल होने के लिए शनिवार को केरल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138448/goa-chief-minister-gives-green-signal-to-bjps-padyatra"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-01/pramod_large_1316_144.webp" alt=""></a><br /><p>केरल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लोकसभा चुनाव से पहले जमीनी स्तर की तैयारियों के मद्देनजर एक महीने तक राज्यव्यापी पदयात्रा करेगी। गोवा के मुख्यमंत्री डॉ प्रमोद सावंत ने शनिवार को कासरगोड में पदयात्रा को हरी झंडी दिखाई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन पदयात्रा का नेतृत्व करेंगे। पदयात्रा के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता धार्मिक व सामाजिक नेताओं व सांस्कृतिक हस्तियों से मुलाकात करेंगे। केंद्र की मोदी सरकार की योजनाओं से जनता को रूबरू कराया जाएगा। यह पदयात्रा प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र से होकर गुजरेगी। </p>
<p>गोवा के मुख्यमंत्री डॉ प्रमोद सावंत पदयात्रा में शामिल होने के लिए शनिवार को केरल पहुंचे। पदयात्रा से पहले उन्होंने अनंतपुरा में विश्व प्रसिद्ध अनंतपद्मनाभ स्वामी मंदिर में पूजा अर्चना की। सावंत ने कासरगोड में आयोजित ‘स्नेह संघम’ में स्थानीय निवासियों से बातचीत की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंत्योदय के संकल्प के साथ, सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के विजन के बारे में विस्तार से बताया। </p>
<p>27 फरवरी तक चलने वाली पदयात्रा के दौरान मोदी की गारंटी से जन-जन को रूबरू कराने के साथ ही, केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद भी किया जाएगा। पदयात्रा के दौरान प्रत्येक बैठक में लोगों को शामिल होने और केंद्र सरकार की विभिन्न विकास पहलों और योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करने हेतु विशेष सहायता डेस्क की व्यवस्था की जाएगी। प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में दो दिनों तक चलने वाली पदयात्रा का मकसद अधिक से अधिक लोगों को भाजपा की विकास परक योजनाओं के बारे में बताना है। इस पदयात्रा में 25 हजार से अधिक लोग शामिल होंगे। पदयात्रा के दौरान प्रत्येक लोकसभा में 1000 नए सदस्य बनाए जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jan 2024 14:14:37 +0530</pubDate>
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