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                <title>Bihar Politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>गोपालगंज मे जदयू का तीसरी बार जिला अध्यक्ष बने प्रमोद कुमार पटेल को लोगों ने दिया बधाई एवं शुभकामनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात</strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>गोपालगंज, </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जनता दल यूनाइटेड सांगठनिक चुनाव 2026 संपन्न होने के उपरांत गोपालगंज जिला में जनता दल यूनाइटेड पार्टी जिला अध्यक्ष के पद पर तीसरी बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार के लोकप्रिय विकास पुरुष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  के अनुशंसा पर राज्य निर्वाचन पदाधिकारी अशोक कुमार मुन्ना ने पार्टी के पुराने साथी और 1994 के संस्थापक सदस्य प्रदेश महासचिव रहे प्रमोद कुमार पटेल को जिला अध्यक्ष निर्वाचित करते हुए एक बार फिर श्री पटेल पर विश्वास पार्टी ने जताया है श्री पटेल इसके पूर्व  गोपालगंज में 2016 से 2021 तक जिला अध्यक्ष का कमान संभाल चुके हैं ,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173245/people-congratulated-and-congratulated-pramod-kumar-patel-who-became-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1002699618.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात</strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>गोपालगंज, </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जनता दल यूनाइटेड सांगठनिक चुनाव 2026 संपन्न होने के उपरांत गोपालगंज जिला में जनता दल यूनाइटेड पार्टी जिला अध्यक्ष के पद पर तीसरी बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार के लोकप्रिय विकास पुरुष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  के अनुशंसा पर राज्य निर्वाचन पदाधिकारी अशोक कुमार मुन्ना ने पार्टी के पुराने साथी और 1994 के संस्थापक सदस्य प्रदेश महासचिव रहे प्रमोद कुमार पटेल को जिला अध्यक्ष निर्वाचित करते हुए एक बार फिर श्री पटेल पर विश्वास पार्टी ने जताया है श्री पटेल इसके पूर्व  गोपालगंज में 2016 से 2021 तक जिला अध्यक्ष का कमान संभाल चुके हैं ,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> गोपालगंज जनता दल यूनाइटेड का जिला अध्यक्ष बनने पर कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर है! पार्टी के नेताओं ने खुशी का इजहार करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सह राज्य सभा सांसद संजय कुमार झा, प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक उमेश सिंह कुशवाहा, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष सह सांसद डॉo आलोक कुमार सुमन, बिहार सरकार के मंत्री सुनील कुमार, प्रदेश मुख्यालय प्रभारी अनिल कुमार, वासुदेव कुशवाहा, विधायक सह सचेतक मंजीत कुमार सिंह, पूर्व मंत्री सह विधायक रामसेवक सिंह कुशवाहा,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> विधायक सह प्रश्न एव्ं ध्यानाकर्षण  समिति के सभापति अमरेंद्र कुमार पांडेय, मिथिलेश कुमार तिवारी, इंद्रदेव सिंह पटेल, भीष्म प्रताप सिंह कुशवाहा, विधान पार्षद राजीव कुमार, प्रोo डॉo वीरेंद्र नारायण यादव, पूर्व विधायक रियाजुल हक राजू , छोटेलाल राय, जिला परिषद अध्यक्ष सिवान संगीता यादव, भाजपा जिला अध्यक्ष संदीप कुमार गिरी, जदयू पूर्व जिला अध्यक्ष सदानंद सिंह, आदित्य शंकर शाही , प्रोo अनुजा सिंह, सहित पार्टी एव्ं एनडीए के हजारों नेताओं, पदाधिकारीयो एवं कार्यकर्ताओं ने बधाई एवं शुभकामनाएं दी है! श्री पटेल ने कहा कि संगठन को और धारदार बनाते हुए पुराने साथियों को सम्मानित किया जाएगा और नए साथियों को पार्टी से जोड़ा जाएगा, नीतीश कुमार जी की सरकार मे 20 वर्षों में किए गए विकास योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा!</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 19:37:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>बिहार की राजनीति- निशांत कुमार का राजनीतिक उदय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="en-us" xml:lang="en-us">- महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार की राजनीति आज उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता के गलियारों में बदलाव की सरसराहट नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक युग के अवसान और नए नेतृत्व के अभ्युदय की पदचाप सुनाई दे रही है। पिछले दो दशकों से बिहार की नियति को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक यात्रा के उस पड़ाव पर कदम रखा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से वापसी के रास्ते संगठन की मजबूती और उत्तराधिकार के प्रश्न पर जाकर टिक जाते हैं। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के भीतर लंबे समय से जिस सन्नाटे को महसूस किया जा रहा था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">,</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173025/political-rise-of-nishant-kumar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/mahendra_tiwari.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="en-us" xml:lang="en-us">- महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार की राजनीति आज उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता के गलियारों में बदलाव की सरसराहट नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक युग के अवसान और नए नेतृत्व के अभ्युदय की पदचाप सुनाई दे रही है। पिछले दो दशकों से बिहार की नियति को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक यात्रा के उस पड़ाव पर कदम रखा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से वापसी के रास्ते संगठन की मजबूती और उत्तराधिकार के प्रश्न पर जाकर टिक जाते हैं। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के भीतर लंबे समय से जिस सन्नाटे को महसूस किया जा रहा था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह 8 मार्च 2026 को पटना स्थित पार्टी मुख्यालय में नारों की गूँज के साथ टूट गया। निशांत कुमार का राजनीति में औपचारिक प्रवेश केवल एक व्यक्ति का दल में शामिल होना नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक क्षेत्रीय दल के अस्तित्व को बचाने की उस छटपटाहट का परिणाम है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो अक्सर </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन मैन शो</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वाली पार्टियों में उनके शीर्ष नेता के सक्रिय राजनीति से दूर होने पर दिखाई देती है। नीतीश कुमार ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में जिस समाजवाद और वंशवाद विरोधी विचारधारा का झंडा बुलंद किया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज उनकी पार्टी उसी वंशवाद के छाते तले खुद को सुरक्षित महसूस कर रही है। यह भारतीय राजनीति की एक कड़वी हकीकत है कि क्षेत्रीय दल विचारधारा से ज्यादा एक चेहरे से बंधे होते हैं और जब वह चेहरा धुंधला पड़ने लगता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो कार्यकर्ता किसी ऐसे नाम की तलाश करते हैं जो उस विरासत को संजो सके। निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे एक ऐसे पिता के उत्तराधिकारी बनकर आए हैं जिन्होंने अपनी शर्तों पर राजनीति की है। नीतीश कुमार वह शख्सियत रहे हैं जिन्होंने विधानसभा में संख्या बल कम होने के बावजूद गठबंधन के साथियों को अपनी उंगलियों पर नचाया और चार बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर यह साबित किया कि राजनीति में करिश्मा और चाणक्य नीति का मेल क्या होता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2025 के विधानसभा चुनावों ने नीतीश कुमार की लोकप्रियता पर उठ रहे तमाम सवालों पर विराम लगा दिया था। उनके गिरते स्वास्थ्य और भूलने की बीमारी की चर्चाओं के बीच जब परिणाम आए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे चौंकाने वाले थे। जनता ने उन्हें न केवल वोट दिया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि बिहार के ग्रामीण अंचलों में आज भी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन बाबू</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की धमक बरकरार है। यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी को मिली भारी सफलता के पीछे भी नीतीश कुमार का वह अति पिछड़ा और महिला वोट बैंक सक्रिय था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो खामोशी से उनके पक्ष में लामबंद रहता है। लेकिन अपने राजनीतिक चरमोत्कर्ष पर नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फैसला और पार्टी की बागडोर परोक्ष रूप से निशांत कुमार के हाथों में सौंपने की तैयारी ने कार्यकर्ताओं को हतप्रभ कर दिया है। निशांत के स्वागत में लगे </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत हैं तो निश्चिंत हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के नारे दरअसल कार्यकर्ताओं के उसी भय को दर्शाते हैं जो नीतीश के बिना पार्टी के बिखरने की आशंका से पैदा हुआ है। 40 वर्षीय निशांत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो पेशे से इंजीनियर हैं और अब तक सक्रिय राजनीति की चकाचौंध से दूर रहे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए यह डगर कांटों भरी है। राजनीति कोई इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है जहाँ फार्मूलों से नतीजे निकाले जा सकें</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ समीकरण हर पल बदलते हैं। उनकी पहली और सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के उस मूल आधार—कुर्मी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग—को अपने साथ जोड़े रखने की है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो नीतीश कुमार के व्यक्तित्व के आकर्षण में जेडीयू के साथ रहा है। क्या एक सौम्य और राजनीति से दूर रहा युवा इन वर्गों की आकांक्षाओं को वह स्वर दे पाएगा जो उनके पिता ने दिया था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तेजस्वी यादव और चिराग पासवान जैसे युवा नेता पहले से ही बिहार की मिट्टी में अपनी जड़ें गहरी कर चुके हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री एक ऐसे समय में हुई है जब उनके प्रतिद्वंद्वी राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी बन चुके हैं। तेजस्वी यादव ने जहाँ लालू प्रसाद यादव की विरासत को अपनी मेहनत और संघर्ष से एक नई ऊँचाई दी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं चिराग पासवान ने भी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की छवि से निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। इन दोनों नेताओं के विपरीत निशांत को राजनीति विरासत में मिली तो है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्होंने कभी अपने पिता के साथ धूप-छाँव में संघर्ष नहीं किया। वे नीतीश कुमार के उन राजनीतिक दांव-पेंचों के साक्षी नहीं रहे हैं जिन्होंने जेडीयू को बार-बार संकट से उबारा। ऐसे में पार्टी के भीतर मौजूद </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">घाघ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और पुराने नेताओं के साथ तालमेल बिठाना उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा। जेडीयू के भीतर कई ऐसे दिग्गज नेता हैं जो खुद को नीतीश का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते रहे हैं। राजीव रंजन सिंह और संजय झा जैसे नेताओं की मौजूदगी में निशांत को अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी होगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वरना यह आशंका हमेशा बनी रहेगी कि वे केवल एक </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रबर स्टैंप</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बनकर रह जाएंगे और पार्टी की दूसरी लाइन के नेता उन्हें अपने हितों के लिए इस्तेमाल करेंगे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक और गंभीर चुनौती भारतीय जनता पार्टी के साथ संबंधों को लेकर है। बिहार में बीजेपी अब वह छोटी पार्टी नहीं रही जो नीतीश कुमार के पीछे चलती थी। 2025 के नतीजों के बाद बीजेपी अब खुद को </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े भाई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की भूमिका में देख रही है। गठबंधन की राजनीति अक्सर क्रूर होती है और हर बड़ी पार्टी अपने छोटे सहयोगी को निगलने या उसे अप्रासंगिक बनाने की कोशिश करती है। बीजेपी की दीर्घकालिक रणनीति बिहार में अपना मुख्यमंत्री लाने की है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद जेडीयू के लिए जूनियर पार्टनर बनकर अपनी स्वायत्तता बचाए रखना लगभग असंभव सा कार्य होगा। बीजेपी चाहेगी कि भविष्य में जेडीयू का उसमें विलय हो जाए या फिर वह इतनी कमजोर हो जाए कि उसका अपना कोई अस्तित्व न बचे। निशांत कुमार को इस </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रवत हमले</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से पार्टी को बचाना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि जेडीयू केवल एक चुनाव जिताने वाली मशीन न बनकर रह जाए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका अपना वैचारिक स्टैंड भी बना रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत के पक्ष में एक बात यह जाती है कि वे शिक्षित हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी है। बिहार की युवा पीढ़ी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर विकास और शिक्षा की बात करती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत में एक उम्मीद देख सकती है। लेकिन राजनीति में केवल शिक्षा और सौम्यता काफी नहीं होती</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ जनमानस से जुड़ने के लिए पसीना बहाना पड़ता है। नीतीश कुमार की अनुपस्थिति में जब वे सदस्यता ले रहे थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसमें एक गहरा संदेश छिपा था। नीतीश ने शायद यह जतलाने की कोशिश की कि वे अभी भी वंशवाद के खिलाफ हैं और निशांत का आना पार्टी की इच्छा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी निजी जिद नहीं। हालांकि</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह संदेश आम जनता तक किस रूप में पहुँचता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखने वाली बात होगी। क्या जनता इसे नीतीश की मजबूरी समझेगी या एक सोची-समझी रणनीति</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जनता के बीच यह संदेश गया कि जेडीयू अब केवल एक परिवार को बचाने की कोशिश कर रही है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो नीतीश कुमार द्वारा दशकों में कमाई गई </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की साख को धक्का लग सकता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जेडीयू की सांगठनिक स्थिति वर्तमान में नाजुक है। 2010 में 115 सीटें जीतने वाली पार्टी 2020 में 45 पर सिमट गई थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि 2025 में उसने फिर से 85 सीटों के साथ वापसी की। यह उतार-चढ़ाव दिखाता है कि पार्टी का जनाधार पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और वह गठबंधन के साथी की मजबूती पर निर्भर करता है। नीतीश कुमार का करिश्मा ही वह गोंद था जो इस गठबंधन को वजन देता था। अब जब गठबंधन की कमान निशांत की ओर झुक रही है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें साबित करना होगा कि वे केवल नीतीश के पुत्र नहीं हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी हैं। उन्हें उन विधायकों और नेताओं को टूटने से रोकना होगा जो सत्ता के नए केंद्रों की तलाश में दूसरी पार्टियों का रुख कर सकते हैं। अटकलें हैं कि उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है या पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष। पद चाहे जो भी मिले</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">असली चुनौती सड़क पर उतरकर कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतने की होगी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत कुमार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने पिता के </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मार्गदर्शन</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का उपयोग किस सीमा तक करते हैं। नीतीश कुमार ने भले ही कह दिया हो कि "मैं हूँ ना"</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दिल्ली की राजनीति और पटना की जमीन के बीच का फासला बहुत बड़ा होता है। गठबंधन की राजनीति में सहयोगी दल अक्सर कमजोर कड़ियों की तलाश में रहते हैं। यदि निशांत ने अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय जल्द नहीं दिया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो जेडीयू का अस्तित्व बीजेपी के बढ़ते प्रभुत्व और तेजस्वी यादव के आक्रामक विपक्ष के बीच सैंडविच बनकर रह सकता है। बिहार की राजनीति में यह एक नए अध्याय की शुरुआत है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें विरासत का बोझ है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिद्वंद्वियों की चुनौती है और एक ऐसी जनता की उम्मीदें हैं जो अब पुराने नारों से आगे निकलना चाहती है। निशांत कुमार को यह समझना होगा कि उनके पिता ने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उन्हें शिखर पर बने रहने के लिए शून्य से शुरुआत करनी है। यह चुनौती किसी भी युद्ध से बड़ी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यहाँ हारने के लिए एक पूरी विरासत है और जीतने के लिए केवल संघर्ष।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निशांत कुमार की राह में सबसे बड़ी बाधा वह </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सूडो-पॉलिटिकल</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ढांचा भी है जिसे उनके पिता ने बड़ी कुशलता से बुना था। नीतीश कुमार ने अधिकारियों के भरोसे शासन चलाया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता अक्सर खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे। यदि निशांत भी इसी रास्ते पर चलते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो कार्यकर्ताओं का उत्साह जल्दी ही ठंडे बस्ते में चला जाएगा। उन्हें पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बहाल करना होगा और उन कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित करना होगा जो अब तक केवल नीतीश के नाम पर वोट मांगते आए हैं। बिहार का भविष्य अब इस बात पर टिका है कि क्या यह नया नेतृत्व सुशासन की उस लौ को जलाए रख पाता है या फिर सत्ता की इस खींचतान में जेडीयू इतिहास के पन्नों में एक और क्षेत्रीय दल के रूप में दर्ज हो जाती है जो अपने नायक के जाने के बाद अपनी पहचान खो बैठा। 8 मार्च की वह शाम पटना के आकाश में नई उम्मीदें लेकर आई थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन उम्मीदों को हकीकत में बदलना निशांत कुमार के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 21:17:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>राज्यसभा के रास्ते नीतीश कुमार का वानप्रस्थ गमन!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172602/nitish-kumars-last-journey-through-rajya-sabha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/nitish-kumar-5-march-2026-.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अब राज्यसभा का पर्चा भर कर वानप्रस्थ गमन का रास्ता चुन लिया है। पिछले करीब 20 सालों से बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है । सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है, और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा राज्यसभा का नामांकन भरने से  यह बात स्पष्ट हो गयी है कि बिहार की राजनीति से एक युग का अब अवसान होने जा रहा है। बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से यदि किसी एक नेता का सबसे अधिक प्रभाव रहा है, तो वह नाम है नीतीश कुमार। वर्ष 2005 से लेकर अब तक बिहार की सत्ता का केंद्र लगभग लगातार उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। अलग-अलग गठबंधनों, बदलते राजनीतिक समीकरणों और कई चुनावी उतार-चढ़ावों के बावजूद उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अपनी पकड़ बनाए रखी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में नीतीश के द्वारा मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का ऐलान बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव के रुप में देखा जा रहा है। अगर देखा जाए लगभग साढ़े तीन दशकों तक बिहार की राजनीति दो नामों के इर्द-गिर्द भूमती रही, ये दो नाम हैं लालू प्रसाद यादव और नीतीश। इन दोनों नेताओं ने न केवल बिहार की सत्ता को आकार दिया, बल्कि राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा भी तय की। अब जब दोनों ही नेता सक्रिय राजनीति से दूर हो रहे हैं, तब बिहार एक नए दौर के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1990 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, तब बिहार की राजनीति में एक नई सामाजिक चेतना का उदय हुआ। लालू ने 'सामाजिक न्याय' को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक आंदोलन का रूप दिया। पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को उन्होंने केंद्र में रखा। लंबे समय से सत्ता के गलियारों से दूर रहे वर्गों को उन्होंने राजनीतिक पहचान और आवाज दी। सत्ता की भाषा बदली, राजनीतिक चेहरे बदले और शासन के केंद्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई धारा दिखाई देने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें कोई दोमत नहीं है कि जेपी आंदोलन से निकले नेताओं की एक पूरी पीढ़ी ने पिछले तीन दशकों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी। इस पीढ़ी में पुरानी पीड़ी के पीछे हटने का अर्थ है कि बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं को अवसर मिलेगा। इन सबके बीच अगर बात नीतीश की की जाए तो, बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं रही है, बल्कि वे लंबे समय तक राज्य की राजनीति के सर्वमान्य नेता रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोग भी उन्हें स्वीकार करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गठबंधन की राजनीति में कई बार वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने गठबंधन धर्म निभाया और राजनीतिक संतुलन बनाए रखा। उनकी खास पहचान उनकी सामाजिक योजनाओं और प्रशासनिक छवि से बनी। खास तौर पर महिलाओं के बीच उनकी पकड़ काफी मजबूत रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं का समर्थन एनडीए की जीत का एक बड़ा कारण माना गया था। इसी कारण जब तक वह बिहार की राजनीति में सक्रिय थे, तब तक विपक्षी दलों के लिए उन्हें सीधे चुनौती देना आसान नहीं था। हालांकि, इसी दौर में बिहार की छवि पर कई सवाल भी उठे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई और 'जंगलराज' जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए। विकास की रफ्तार धीमी पड़ने और उद्योगों के बंद होने से बिहार की अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई। राज्य से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ और बिहार प्रवासी मजदूरों के प्रदेश के रूप में पहचाना जाने लगा। चीनी मिलों, जूट फैक्ट्रियों और कई छोटे उद्योगों के बंद होने से रोजगार के अवसर घटते गए। इस दौर में बिहार की पहचान सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ-साथ पिछड़ेपन और आर्थिक संकट से भी जुड़ने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2005 में बिहार की राजनीति ने एक बड़ा मोड़ लिया जब नीतीश कुमार सत्ता में आए। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की शुरुआत भी थी। नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय की राजनीति को विकास और प्रशासनिक सुधारों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी और बिहार में सड़कों तथा पुलों का व्यापक जाल बिछाया। राज्य के दूरदराज इलाकों को राजधानी पटना से बेहतर तरीके से जोड़ने का प्रयास किया गया। एक समय ऐसा था जब बिहार के कई जिलों से पटना पहुंचने में पूरा दिन लग जाता था, लेकिन सड़क नेटवर्क के विस्तार के बाद यात्रा का समय काफी कम हो गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह बदलाव केवल भौतिक संरचना का नहीं था, बल्कि राज्य की मानसिकत्ता और विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम था। नीतीश कुमार ने शासन को अधिक प्रशासनिक रूप देने की कोशिश की और कानून-व्यवस्था को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया। उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई कई योजनाओं ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला। छात्राओं के लिए साइकिल योजना ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नया बदलाव लाया। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने से स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन कदमों ने बिहार की सामाजिक संरचना को धीरे-धीरे बदलने में भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश कुमार की छवि 'सुशासन बाबू' के रूप में स्थापित हुई। उन्होंने प्रशासनिक सुधार, कानून-व्यवस्था और बुनियादी विकास को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उनके शासनकाल में बिहार की छवि धीरे-धीरे बदलने लगी। रष्ट्रीय स्तर पर भी बिहार को विकास के नए प्रयासों के संदर्भ में चर्चा मिलने लगी। विहार के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा। बिहार में सड़कों, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में जो बदलाव हुए, उससे राज्य में परिवर्तन आया। मगर भूलना नहीं चाहिए कि राजनीति में बदलाव हमेशा अनिश्चितता लेकर आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीतीश के संभावित फैसले से भी बिहार की राजनीति में कई नए सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या जदयू अपनी पुरानी ताकत बनाए रख पाएगी? क्या भाजपा बिहार में अपना मुख्यमंत्री चनाएगी ? क्या नई पीढ़ी के नेताओं को मौका मिलेगा ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका निभाएंगे ? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि कुमार का यह फैसला केवल एक व्यक्ति के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह बिहार की राजनीति के एक लंबे अध्याय के समापन और एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें नीतीश का राज्यसभा जाना सिर्फ पद का बदलाव नहीं है; यह करीब 5 दशक लंबी राजनीतिक यात्रा का एक नया अध्याय भी हो सकता है। हाल ही में नीतीश कुमार ने खुद कहा है कि अपनी लंबी राजनीतिक जिंदगी में वे बिहार विधानसभा के सदस्य, विधान परिषद के सदस्य और लोकसभा के सांसद रह चुके हैं। अब वे राज्यसभा में भी सेवा देना चाहते हैं। और उसके बाद अगर उन्हें केंद्र सरकार में कोई भूमिका मिली, तो बिहार की राजनीति का यह बड़ा चेहरा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिख सकता है। राजनीति में समय के साथ भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी छाया लंबे समय तक बनी रहती है। नीतीश भी ऐसे ही नेताआ में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका चाहे समाप्त हो जाए, लेकिन बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मौजूदगी आगे भी चर्चा और प्रभाव का विषय बनी रहेगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें 2020 के बाद एनडीए में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। सीटों की संख्या साफ दिखा रही थी कि भाजपा के पास ज्यादा विधायक हैं, फिर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे। आखिर ऐसा क्यों? इसके 2 मुख्य कारण अक्सर बताए जाते हैं। पहला कारण उनकी सामाजिक आधार है। बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों और महिला मतदाताओं से बहुत मजबूत जुड़ाव बनाया है। शराबबंदी जैसी नीतियां और महिलाओं के लिए कल्याण योजनाओं ने उन्हें एक भरोसेमंद और विश्वसनीय नेता की छवि दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 साल की उम्र में स्वास्थ्य कारणों से नीतीश कुमार अब कम मेहनत वाला रोल चुनना चाहते हैं। ऐसे में राज्यसभा उनके लिए एक सम्मानजनक और महत्वपूर्ण मंच हो सकता है। लेकिन बात यहां सिर्फ पद बदलने की नहीं है। यह पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश भी हो सकती है। चर्चा है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार जल्द ही सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं और उन्हें राज्य सरकार में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 18:53:38 +0530</pubDate>
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                <title>लोकप्रिय चेहरों के पर्दे में छुपे विकास के सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[चमक और मुद्दों के बीच फंसा बिहार: जनता किसे चुनेगी?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/157745/questions-of-development-hidden-behind-the-veil-of-popular-faces"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गंगा के किनारे बिहार की मिट्टी में सियासत का बीज बोया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस बार बीज में चमकते सितारों की धूल झोंक दी गई है—भोजपुरी ठुमरियों की लहरों से लेकर आइटम डांस की चकाचौंध तक। कल्पना कीजिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधानसभा का मंच अब सिल्वर स्क्रीन का विस्तार बन गया है—एक तरफ लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सीमा सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजपुरी सिनेमा की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">क्वीन ऑफ आइटम</span>', <span lang="hi" xml:lang="hi">मढ़ौरा की धूल भरी सड़कों पर उतर रही हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरफ भाजपा की मैथिली ठाकुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथिला के मधुर स्वरों की धनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलीनगर के जातिगत जाल में फँसने को तैयार।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> ये नाम न सिर्फ टिकटों की सूची में चमक रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य को हिला रहे हैं। एनडीए की </span>243<span lang="hi" xml:lang="hi"> सीटों की पूरी सूची</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> भाजपा-जेडीयू को </span>101-101, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलजेएपी (आरवी) को </span>29,<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ये चेहरे सांस्कृतिक हथियार के रूप में उभरे हैं। विपक्ष महागठबंधन अभी सीटों की बाजीगरी में उलझा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एनडीए की यह चाल साफ संकेत दे रही है— वोटों की जंग अब नीतियों से ज्यादा नाच-गाने की हो चुकी है। सवाल गूंज रहा है—क्या ये स्टार कैंडिडेट्स बिहार के जख्मदारों की आवाज बन पाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर चुनावी तमाशे का एक और अध्याय साबित होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ जीत के बाद चेहरे गायब हो जाते हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह ट्रेंड बिहार की राजनीति का नया अध्याय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पुरानी किताब का दोहराव है। पार्टियाँ ख्याति प्राप्त चेहरों को उतार रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका राजनीति से वास्तविक जुड़ाव कभी न के बराबर रहा। सीमा सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी भोजपुरी फिल्मों में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चोली चिलाता चाहूं चाहूं</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे गाने लाखों दिलों पर छाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब मढ़ौरा से मैदान संभालेंगी। सारण जिले की यह सीट भोजपुरी संस्कृति का गढ़ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ युवा पीढ़ी सिनेमा से अपनी पहचान जोड़ती है। एलजेएपी का दावा है कि सीमा महिलाओं और नौजवानों को जोड़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला सशक्तिकरण और विकास के मुद्दों पर लड़ेंगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> लेकिन उनके राजनीतिक अनुभव का अभाव सवाल खड़ा करता है—क्या स्टेज की लाइट्स विधानसभा की बहसों में बदल पाएंगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्टी ने चार महिलाओं को टिकट देकर लिंग समावेशिता का झंडा लहराया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी हकीकत क्या कहती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैथिली ठाकुर—जिन्होंने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राम भजन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे गीतों से पीएम मोदी का दिल जीता—भाजपा में एक दिन पहले शामिल होकर अलीनगर से टिकट पा लीं। दरभंगा का यह क्षेत्र मैथिली परंपराओं और जाति समीकरणों का केंद्र है। ठाकुर की सॉफ्ट इमेज से पार्टी मिथिला वोटबैंक को मजबूत करना चाहती है। भाजपा की स्टार कैंपेनर्स में पवन सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरहुआ जैसे भोजपुरी सितारे शामिल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रचार की आग को भड़काएंगे। महागठबंधन की ओर से खेसारी लाल यादव जैसे नामों की अफवाहें हैं। लेकिन यह सब उद्देश्यपूर्ण लगता है—सोशल मीडिया के दौर में एक वायरल वीडियो करोड़ों वोट जुटा सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तर्क की नजर से देखें तो यह रणनीति सतही है। बिहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ बेरोजगारी दर </span>14.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाढ़ से हर साल </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से ज्यादा युवा पलायन पर मजबूर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सांस्कृतिक अपील कितनी कारगर</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्टियाँ जानती हैं कि भोजपुरी सिनेमा राज्य की नसों में दौड़ता है—यह गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम और संघर्ष की कहानियाँ बुनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जनता की भावनाओं से गहराई से जुड़ी हैं। सीमा सिंह जैसे कलाकार इन फिल्मों से करोड़ों तक पहुँचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठाकुर मिथिला की लोककथाओं को जीवंत करती हैं। एनडीए का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार फर्स्ट</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">नारा इसी सांस्कृतिक चमक से चमक रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए यह कितना न्यायोचित</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वे वर्षों से गलियों में पसीना बहाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसमस्याएँ सुलझाते हैं—बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क के लिए घर-घर घूमते हैं। एक रात में स्टार कैंडिडेट टिकट लेकर आ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। कार्यकर्ताओं में असंतोष है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सर्वे बताता है कि </span>70<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत से ज्यादा मानते हैं कि सेलिब्रिटी टिकट पार्टी की एकता तोड़ते हैं। इतिहास गवाह है—</span>2010<span lang="hi" xml:lang="hi"> में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नाम आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विधानसभा में स्थायी असर नहीं। प्रीतम शरणू या अन्य भोजपुरी कलाकार जीतकर भी क्षेत्र से गायब हो गए। </span>2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> चुनावों में कई स्टार हारे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीतने वाले भी सुर्खियों से बाहर। उत्तर प्रदेश में गोविंदा की हार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराष्ट्र में रवीना टंडन का छोटा राजनीतिक सफर—ये उदाहरण चेतावनी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस रणनीति के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट है: पारंपरिक प्रचार से ऊबे मतदाताओं को ताजगी देना। युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सिनेमा और संगीत से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वोटिंग में हिस्सा लेंगे। महिलाओं के टिकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनडीए के </span>35, <span lang="hi" xml:lang="hi">से लिंग समानता का संदेश जाता है। सोशल मीडिया पर ये चेहरे वायरल होकर पार्टी की रीच बढ़ाते हैं। लेकिन तर्कसंगत विश्लेषण में खामियाँ साफ हैं। पहला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकप्रियता अस्थायी—चुनाव बाद कैमरे बंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकार स्टूडियो लौट जाते हैं। विधायक का काम बजट पास करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास योजनाएँ लागू करना है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना अनुभव के यह कैसे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जातिगत जोखिम—अलीनगर में मुस्लिम-यादव वोटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठाकुर की मैथिली अपील कैसे काम करेगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मढ़ौरा में यादव-रॉय समुदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष आरजेडी इसका फायदा उठाएगा। तीसरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की गुणवत्ता पर असर—जमीनी नेता स्थानीय मुद्दों से वाकिफ होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टार नहीं। यह अवसरवाद को बढ़ावा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार को आमंत्रित करता है। जमीनी कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी अनदेखी से आधार कमजोर होता है। पार्टियों को चाहिए—स्टार्स को ट्रेनिंग दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुद्दों से जोड़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यकर्ताओं को महत्व दें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक पहलू हैं। यह युवाओं को राजनीति से जोड़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक विविधता को मुख्यधारा में ला सकता है। बिहार का मतदाता अब जागरूक है—वह नाच-गाने पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वादों की सच्चाई पर वोट देगा। सड़कें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार ही असली मुद्दे हैं। अगर सीमा और मैथिली इन पर खरी उतरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्रांति रचेंगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनावी मंच की धूल बनेंगी। बिहार की सियासत को चाहिए संतुलन—चमक के साथ पदार्थ। जमीनी कार्यकर्ताओं की ताकत पहचानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी लोकतंत्र मजबूत होगा। यह चुनाव बिहार के भविष्य का फैसला करेगा—चमक-दमक की कैद से निकलकर विकास की उड़ान भरे। जनता की नजरें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वह कभी धोखा नहीं खाती। बिहार जागेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नया सवेरा होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Oct 2025 17:40:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिहार की जनता की नजर में अब वह सुशासन बाबू काम,बल्कि पलटूराम की छवि से अधिक लैस है,लक्ष्मी सिन्हा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="adn ads">
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<div><strong>बिहार प्रभारी प्रभात कुमार मिश्रा</strong><br /><strong>स्वतंत्र प्रभात</strong><br /><strong>बिहार (पटना) </strong>समाजसेवी श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने कहा कि बिहार में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर जिस तरह कुछ ही घंटे के अंदर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उससे एक बार पुनः यह स्पष्ट हुआ कि उनके लिए राजनीतिक मूल्यों-मर्यादाओं का कोई महत्व नहीं। अपनी सत्ता बचाने और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने राजद से नाता तोड़कर भाजपा से हाथ मिलाया हो। वंह यह काम पहले भी कई बार कर चुके हैं और इस बारे</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138486/in-the-eyes-of-the-people-of-bihar-he-is"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-01/img-20240129-wa0028.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>बिहार प्रभारी प्रभात कुमार मिश्रा</strong><br /><strong>स्वतंत्र प्रभात</strong><br /><strong>बिहार (पटना) </strong>समाजसेवी श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने कहा कि बिहार में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर जिस तरह कुछ ही घंटे के अंदर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उससे एक बार पुनः यह स्पष्ट हुआ कि उनके लिए राजनीतिक मूल्यों-मर्यादाओं का कोई महत्व नहीं। अपनी सत्ता बचाने और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने राजद से नाता तोड़कर भाजपा से हाथ मिलाया हो। वंह यह काम पहले भी कई बार कर चुके हैं और इस बारे में कहना कठिन है कि वह अंतिम बार पाला बदल रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>पिछली बार उन्होंने जब भाजपा से नाता तोड़कर राजद से हाथ मिलाया था तो वह अपने इस फैसले के पीछे कोई ठोस कारण नहीं गिना सके थे। इस बार भी वह यह स्पष्ट  करने में नाकाम रहे की फिर से पाला क्यों बदल रहे हैं। उन्होंने केवल इतना ही  कहा कि कुछ ठीक नहीं चल रहा था। ऐसा लगता है कि वह इससे क्षुब्ध थे कि कांग्रेस ने उन्हें आइएनडईआइए का संयोजक नहीं बनाया। यह मानने के अच्छे- भले कारण है कि वह विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दादा दावेदारी आगे बढ़ना चाहते थे। वह इसके पहले भी प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। कहना कठिन है कि अब वह प्रधानमंत्री पद पाने की अपनी आकांक्षा का परित्याग कर चुके हैं।</div>
<div> </div>
<div>आगे श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने कहा कि नीतीश कुमार ने जिस तरह एक बार फिर पाला बदलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की, उससे उनकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयत को चोट पहुंचाना तय है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कुछ समय में मुख्यमंत्री के रूप में सुशासन बाबू की उनकी छवि कमजोर हुई है। इतना ही नहीं, उनका जनाधार भी काम होते हुए दिखा है। इस समय जदयू संख्या बल के मामले में तीसरे नंबर का दल है, लेकिन बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां कुछ ऐसी है कि वह बार-बार पाला बदल कर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहते हैं।</div>
<div> </div>
<div> भले ही उनके समर्थक उनके जय-जयकार कर रहे हों, लेकिन बिहार की जनता को उनका इस इस तरह बार-बार पाला बदलना शायद ही रास आए। बिहार की जनता की नजर में वह सुशासन बाबू काम, बल्कि पलटूराम की छवि से अधिक लैस है। जिस तरह नीतीश कुमार तमाम सवालों से गिरे हैं, उसी तरह कुछ सवाल भाजपा के समक्ष भी है। यह ठीक है कि भाजपा ने यह सोच कर नीतीश कुमार का फिर से साथ देना पसंद किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसे बिहार में अधिकाधिक सीटें हासिल करने में आसानी होगी, लेकिन यदि नीतीश सरकार अपने कामकाज से राज्य की जनता को संतुष्ट नहीं कर सकी तो इसका नुकसान भाजपा को भी उठाना पड़ सकता है। जदयू और भाजपा, दोनों को ही इन सवालों का जवाब देना भी कठिन होगा कि उनकी ओर से बार-बार यह कहने के बाद फिर से हाथ क्यों मिला लिया गया कि अब कभी एक-दूसरे का साथ नहीं लिया जाएगा।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
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<div class="WhmR8e"> </div>
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<div class="gA gt acV">
<div class="gB xu">
<div class="ip iq">
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<table class="cf wS">
<tbody>
<tr>
<td class="amq"><img class="ajn bofPge" src="https://lh3.googleusercontent.com/a/ACg8ocL8DmBpjKdpRr1lQtjMxwiqklqOjeDR2LsFF-wuDuLJuw=s40-p" alt="ACg8ocL8DmBpjKdpRr1lQtjMxwiqklqOjeDR2LsFF-wuDuLJuw=s40-p"></img></td>
<td class="amr">
<div class="nr wR">
<div class="amn"><span class="ams bkH">Reply</span><span class="ams bkI">Reply all</span><span class="ams bkG">Forward</span>
<div class="wrsVRe">
<div class="jWOS7-JX-ano"> </div>
<div class="ne2Ple-oshW8e-J9">You can't react with an emoji to this message</div>
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</td>
</tr>
</tbody>
</table>
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</div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jan 2024 17:42:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> BJP  को भारी पड़ सकता है नीतीश को  NDA में शामिल करना-  प्रशांत किशोर का बड़ा बयान</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Bihar Politics: </strong>बिहार के मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के इस्तीफे देने के बाद देश की राजनीति में खलबली मच गई है। जहां एक तरफ भाजपा के नेता नीतीश कुमार को बधाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के नेता उनपर लगातार हमलावर हैं। इसी बीच जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर  (Prashant Kishore) का भी बयान सामने आया है। </p>
<p><strong>"आज सभी का पलटू राम आया सामने"</strong><br />प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के द्वारा सीएम पद से इस्तीफा देने पर कहा कि आज जो घटना क्रम हुआ है वह हम पहले से कह रहे थे कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138437/including-nitish-in-nda-may-prove-costly-for-bjp"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-01/2024_1image_14_30_415539614djdj-ll.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>Bihar Politics: </strong>बिहार के मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के इस्तीफे देने के बाद देश की राजनीति में खलबली मच गई है। जहां एक तरफ भाजपा के नेता नीतीश कुमार को बधाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के नेता उनपर लगातार हमलावर हैं। इसी बीच जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर  (Prashant Kishore) का भी बयान सामने आया है। </p>
<p><strong>"आज सभी का पलटू राम आया सामने"</strong><br />प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के द्वारा सीएम पद से इस्तीफा देने पर कहा कि आज जो घटना क्रम हुआ है वह हम पहले से कह रहे थे कि यह होगा। नीतीश कुमार पलटू राम थे यह पूरी दुनिया जानती थी लेकिन आज के घटना क्रम में सभी का पलटू राम सामने आया है। नीतीश कुमार के साथ भाजपा और राजद भी पलटू राम है। जो भाजपा नीतीश कुमार को गाली दे रहे थे अब उनको सुशासन दिखेगा और राजद के लोग अब नीतीश को गाली देंगे। उन्होंने कहा कि एनडीए में नीतीश के शामिल होने पर भाजपा को लोकसभा चुनाव में जरूर फायदा होगा लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान होगा यह लिखकर रख लिजिए। </p>
<p><strong>2022 में BJP से नाता तोड़ने के बाद महागठबंधन में शामिल हुए थे नीतीश </strong><br />गौरतलब हो कि अगस्त 2022 में भाजपा से नाता तोड़ने के बाद नीतीश कुमार लालू प्रसाद की पार्टी राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल हो गए थे। उस वक्त नीतीश ने भाजपा पर जद(यू) में विभाजन की कोशिश करने का आरोप लगाया था। नीतीश कुमार ने भाजपा को केंद्र में सत्ता से उखाड फेंकने के लिए देश भर में सभी विपक्षी दलों को एक साथ लाने का अभियान शुरू किया जिसकी परिणति विपक्षी गठबंधन ‘‘इंडिया'' के गठन के रूप में हुई। वहीं अब नीतीश के राजग में लौटने से विपक्षी गठबंधन को भी बड़ा झटका लगेगा। नीतीश ने एक तरह से तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए यह घोषणा की थी कि राजद नेता 2025 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का नेतृत्व करेंगे। नीतीश की इस घोषणा के बाद जद(यू) में नाराजगी फैल गई जिसके कारण उपेन्द्र कुशवाहा जैसे उनके करीबी सहयोगी को पार्टी छोड़नी पड़ी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>विधान सभा चुनाव </category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jan 2024 15:13:10 +0530</pubDate>
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