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                <title>jay hanuman - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>jay hanuman RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>लरछुट के प्राचीन शिव मंदिर में हुआ सुंदरकांड पाठ।</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>सीखड़ मीरजापुर। </strong></p>
<p><strong>सवादादाता विभूति पांडेय ऊर्फ रतन पाडेय। </strong></p>
<p>मीरजापुर। क्षेत्र के लरछुट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में गोपीनाथ मिश्रा के तत्वावधान में श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पंडित नंदू दूबे एवं सहयोगियों द्वारा विधिवत सुंदरकांड का पाठ किया गया। पाठ के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम और हनुमान जी के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।</p>
<p>इस अवसर पर शीतलेश्वर प्रसाद पाठक,शिवा शर्मा राकेश श्रीवास्तव जितेंद्र श्रीवास्तव रतन पांडेय, अंकित दुबे, सतीश शुक्ला, गुड्डू शुक्ला, सुभाष शुक्ला, मनोज तिवारी, गौरव मिश्रा, सत्येंद्र मिश्रा, नरेंद्र नाथ मिश्रा, गोलू मिश्रा, आशा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180639/sunderkand-recitation-took-place-in-the-ancient-shiva-temple-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260604-wa0182.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>सीखड़ मीरजापुर। </strong></p>
<p><strong>सवादादाता विभूति पांडेय ऊर्फ रतन पाडेय। </strong></p>
<p>मीरजापुर। क्षेत्र के लरछुट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में गोपीनाथ मिश्रा के तत्वावधान में श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पंडित नंदू दूबे एवं सहयोगियों द्वारा विधिवत सुंदरकांड का पाठ किया गया। पाठ के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम और हनुमान जी के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।</p>
<p>इस अवसर पर शीतलेश्वर प्रसाद पाठक,शिवा शर्मा राकेश श्रीवास्तव जितेंद्र श्रीवास्तव रतन पांडेय, अंकित दुबे, सतीश शुक्ला, गुड्डू शुक्ला, सुभाष शुक्ला, मनोज तिवारी, गौरव मिश्रा, सत्येंद्र मिश्रा, नरेंद्र नाथ मिश्रा, गोलू मिश्रा, आशा राम, राजीव मिश्रा, सत्यम मिश्रा सहित काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में प्रसाद वितरण किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:12:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mirzapur Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रूद्रावतार हनुमान: जिनके बिना रामकाज भी अधूरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>    -<span lang="hi" xml:lang="hi">सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"</span>  </strong></p>
<p>_________________________</p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र के ग्यारहवें अवतार पवन पुत्र हनुमान का जन्म पंचागानुसार चैत्र पूर्णिमा के दिन मंगलवार चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। ज्योतिषाचार्यों के गणना अनुसार हनुमान जी का जन्म अंठ्ठावन हजार एक सौ तेरह वर्ष पूर्व त्रेता युग में हुआ था। हनुमान जी ने वानर राज केसरी के यहां एवं माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया था। मित्रों अधिकांशतः लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि हनुमान जी के अलावा उनके पांच</span>    <span lang="hi" xml:lang="hi">सगे भाई और भी थे। अर्थात माता अंजनी और वानरराज केसरी के छह पुत्र थे।</span>    <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी छह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140470/rudravatar-hanuman-without-whom-even-rams-work-is-incomplete"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/सुरेश-सिंह-वैस-सुरेश-सिंह-बैस-शाश्वत.png" alt=""></a><br /><p><strong>  -<span lang="hi" xml:lang="hi">सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"</span> </strong></p>
<p>_________________________</p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">रूद्र के ग्यारहवें अवतार पवन पुत्र हनुमान का जन्म पंचागानुसार चैत्र पूर्णिमा के दिन मंगलवार चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। ज्योतिषाचार्यों के गणना अनुसार हनुमान जी का जन्म अंठ्ठावन हजार एक सौ तेरह वर्ष पूर्व त्रेता युग में हुआ था। हनुमान जी ने वानर राज केसरी के यहां एवं माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया था। मित्रों अधिकांशतः लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि हनुमान जी के अलावा उनके पांच</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">सगे भाई और भी थे। अर्थात माता अंजनी और वानरराज केसरी के छह पुत्र थे।</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी छह पुत्रों में हनुमान जी सबसे बड़े हैं। इन सभी भाईयों के नाम इस प्रकार हैं—मतिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रुतिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केतुमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गतिमान और धृतिमान। वैसे महाभारत काल में हस्तिनापुर नरेश महाराज पाण्डु पुत्र भीम को भी हनुमान जी का ही भ्राता माना जाता है।</span></p>
<p> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पृथ्वी पर हिंदू मतानुसार केवल आठ व्यक्तियों को ही अमर माना गया है। इनमें से एक हनुमान जी भी है। इनके अलावा अस्वस्थामा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परशुराम </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराजविभीषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजा महाबलि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद व्यास ऋषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृपाचार्य </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एवं मार्कंडेय ऋषि -</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">ये सभी इस धरा में कहीं ना कहीं विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि जहां-जहां भी राम का नाम लिया जाता है रामायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत कथा कीर्तन कहे जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां वहां हनुमानजी अन्यान्य रूपों में साक्षात विराजमान रहते हैं। हनुमान जी का आज भी गंधमादन पर्वत में निवास माना जाता है। इसी संदर्भ में एक बात</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">कहनी थी पाठकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रायः लोग हनुमान जन्मोत्सव को हनुमान जयंती भी कहते हैं जो कि</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुचित एवं गलत है। जयंती उनके लिए कहा जा सकता है जो इस लोक से</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">इहलीला समाप्त कर परलोक में विराजते हैं । हनुमान जी के जन्मदिवस को जयंती कह दिया जाता है। चूंकि</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान जी तो अमर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे यही इस पृथ्वी पर विराजमान हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उनके जन्मदिवस को जन्मोत्सव ही कहा जाएगा और यही उचित है।</span></p>
<p>       "<span lang="hi" xml:lang="hi">रामचरितमानस" के रचयिता तुलसीदास जी के काल की घटना का वर्णन है कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बार प्रसिद्ध तीर्थ स्थल चित्रकूट से उत्तर दिशा की ओर लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर नांदी गांव के पास गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी जन्मभूमि से रोजाना हनुमान जी की पूजा करने जाते थे। जबकि वह स्थान उनके निवास से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। किंतु फिर भी तुलसीदास जी रोजाना वहां पैदल आकर अपनी आराधना संपूर्ण करते थे। एक रात्रि को हनुमान जी ने तुलसीदास को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि अपने निवास के पास मेरी स्थापना करके मेरी आराधना करो मैं तो मैं वहीं पर दर्शन दूंगा। वहां जाने की आवश्यकता नहीं है। तब तुलसीदास जी ने ठीक वैसा ही किया। उन्होंने स्वप्न के अनुसार गांव के बाहर एक स्थान को पवित्र करके मालवा गिरि चंदन को घिस करके उससे हनुमान जी की मूर्ति उत्कीर्ण की और उनकी आराधना करने लगे। तब हनुमान जी ने वहीं पर उन्हें दर्शन देकर तुलसीदास जी के मनोरथ को सफल किया था।</span> </p>
<p>       <span lang="hi" xml:lang="hi">इस स्थान में एक और अद्भुत चमत्कार सुना जाता है। यहीं पर हनुमान जी की मूर्ति दक्षिणा मुख विराजमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसा कम ही देखने को मिलता है और इस मूर्ति का एक चरण पृथ्वी के अंदर तक प्रविष्ट है। एक बार मुगल बादशाह औरंगजेब ने हनुमान जी के चरण की थाह लेने की इच्छा से वहां खुदाई करवाई। किंतु काफी गहरा खोदने के बाद भी जब चरण का अंत नहीं मिला तो आखिरकार वह थक हार कर खुदाई बंद करवा के वापस चला गया। तभी से इस स्थान की मान्यता और महत्वता और अधिक बढ़ गई।</span></p>
<p>      <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री राम जो साक्षात ईश्वरावतार हैं। उनका रावण के विरुद्ध महायुद्ध और लंका विजय में ऐसा माना जाता है की हनुमान के बिना असंभव और नामुमकिन होता। निश्चित ही भगवान श्री राम की लंका विजय में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वहन हनुमान ने किया। वे इस युद्ध में श्री राम के साथ ना होते तो रावण के विरुद्ध युद्ध जीतना अत्यंत कठिन हो जाता। राम और रावण के बीच जब महायुद्ध चल रहा था तब हनुमान रावण की नगरी लंका गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां के भेद जानने। भगवान राम ने उन्हें वहां अपना गुप्तचर और दूत बना कर भेजा था। तब हनुमान ने जब वहां के सारे भेद जान लिए। इसके पश्चात वह वहां से वापस लौटने का उपक्रम कर रहे थे तभी रावण के सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया</span>  ,<span lang="hi" xml:lang="hi">और उन्हें रावण के सामने राज दरबार में प्रस्तुत किया। रावण ने हनुमान को सजा के तौर पर उनके पूंछ पर आग लगा देने का आदेश दे दिया। तब हनुमान ने अपनी जलती पूंछ से पूरी लंका को ही जला डाला था। लंका दहन के पश्चात अग्नि की ज्वाला से ज्वलित हनुमान जी ने श्रीराम से अग्नि की ज्वाला को शांत करने के लिए उनसे स्मरण करते हुए निवेदन किया-</span></p>
<p>        --<span lang="hi" xml:lang="hi">हे राघव मेरे पूरे शरीर में जलन व्याप्त है । हे राघव मेरी इस जलन और पीड़ा को शांत करिए। तब श्री राम ने उनकी पूछ के आग बुझाने और जलन की पीड़ा को शांत करने के लिए उपाय बताया और उन्हें पीड़ा से मुक्ति दिलाई। अब जबकि हनुमान जी की पूंछ की बात चल निकली है तो यह जान लें कि हनुमान जी के पूंछ पर माता पार्वती का वास माना जाता हैं। वह इसलिए कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लंका में</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने का महल था जिसमें रावण निवास करता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दरअसल माता पार्वती के द्वारा शिव शंकर सहित अपने निवास के लिए कुबेर से कहकर बनवाया गया था। इस भव्य महल को जब रावण ने देखा तो उसकी नियत डोल गई। रावण ने सोचा ऐसा भव्य महल तो तीनों लोकों में कहीं भी नहीं है। और उसने छल से भगवान शंकर के पास दरिद्र ब्राह्मण का रूप लेकर दान में इस महल को मांग लिया। इस बात की जब माता पार्वती को जानकारी हुईं तो वह रावण पर बहुत कुपित हुई । उन्हें शांत करने के लिए भगवान शंकर ने उन्हें कहा कि-- हे पार्वती त्रेता युग में जब</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">रावण के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रही मानव जाति की रक्षा के लिए श्री हरि विष्णु के अवतार श्री राम के कार्य को सफल करने अर्थात श्रीलंका विजय और रावण के नाश के लिए मैं उनके सहयोगी रूप में वानर अवतार लूंगा। तब तुम उस समय मेरी पूंछ में रहना और रावण को सजा के रूप में उसके इस महल को भस्म कर देना।</span></p>
<p>      <span lang="hi" xml:lang="hi">साथियों प्रायः (हनुमानजी)</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">बजरंगबली की आपने जहां-जहां भी मूर्ति देखी होगी हर जगह सिंदूरी</span>  <span lang="hi" xml:lang="hi">और भगवा रंग में ही देखी होगी। लेकिन सारे विश्व में उनकी लंका दहन के समय की आग से अत्यंत काली पड़ गई मूर्ति जो पूर्ण रूप से काली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दो ही जगह आज देखी जाती है। पहला धनुष्कोटी यानी रामेश्वरम के क्षेत्र में हनुमान जी की काली मूर्ति विराजमान है। दूसरी छत्तीसगढ़ प्रदेश के शिवरीनारायण धाम में हनुमान की काली मूर्ति का दर्शन किया जा सकता है। साथ ही शिवरीनारायण धाम में अगर आप जाते हैं तो वहां भगवान राम और अनुचरों द्वारा निर्मित रामसेतु के रामनामी एक पत्थर का भी दर्शन कर सकते हैं। यह पत्थर पानी के ऊपर तैरता हुआ आज भी शिवरीनारायण में देखा जा सकता है।</span></p>
<p>   </p>
<blockquote class="format1">
<p><strong>"<span lang="hi" xml:lang="hi">राम सिया के काज संवारे</span></strong></p>
<p><strong>   <span lang="hi" xml:lang="hi">दानव दल चुन चुन कर मारे</span></strong></p>
<p><strong>  <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई ना इनसे बलवान शक्तिमान</span></strong></p>
<p><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">बोलो जय जय बालाजी हनुमान"</span></strong></p>
<p> </p>
</blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Apr 2024 19:37:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>त्रेतायुग की अयोध्या का दर्शन? डा0 भरत राज सिंह। </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div><strong>लखनऊ। </strong></div>
<div>  </div>
<div>राजधानी लखनऊ में अयोध्या की साज-सज्जा व उसके साफ-सफाई को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि 22 जनवरी 2024 की प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात त्रेतायुग के श्रीराम जी के दर्शन होने वाले हैं। अद्भुत व अविष्मरणीय भव्य अयोध्या जिसे देखने के लिये 500 वर्षो के इन्तजार और कितनो ने अपने जीवन को न्योछवर कर दिया है। हम धन्य हैं कि इसको अपने आखो से देखकर त्रेतायुग के श्रीरामजी की अयोध्या की परिकल्पना कर सकते हैं। चौमुखी विकास को देखकर सभी सनातनियो क्या, सम्पूर्ण देशवासी ही नही विश्व की निगाह भारतीय इतिहास को नये कलेवर से अप्ने को धन्य</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138277/darshan-of-ayodhya-of-tretayug-by-dr-bharat-raj-singh"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-01/screenshot_20240118-202906_1.png" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div><strong>लखनऊ। </strong></div>
<div> </div>
<div>राजधानी लखनऊ में अयोध्या की साज-सज्जा व उसके साफ-सफाई को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि 22 जनवरी 2024 की प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात त्रेतायुग के श्रीराम जी के दर्शन होने वाले हैं। अद्भुत व अविष्मरणीय भव्य अयोध्या जिसे देखने के लिये 500 वर्षो के इन्तजार और कितनो ने अपने जीवन को न्योछवर कर दिया है। हम धन्य हैं कि इसको अपने आखो से देखकर त्रेतायुग के श्रीरामजी की अयोध्या की परिकल्पना कर सकते हैं। चौमुखी विकास को देखकर सभी सनातनियो क्या, सम्पूर्ण देशवासी ही नही विश्व की निगाह भारतीय इतिहास को नये कलेवर से अप्ने को धन्य मानने पर मजबूर होगा। कुछ समाचर पत्रो के पढने से यह भाव उभरता है कि क्या यह सब त्रेता युग में था और आज राम मंदिर में भगवान राम जी के दर्शन साथ नई अयोध्या का अब दर्शन होगा।</div>
<div> </div>
<div>मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से जुड़े अनुष्ठान भी कल से शुरू होने के साथ ही मुख्य आयोजन की तैयारियां भी अपने अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। पूरे शहर को सजाने संवारने का काम लगभग पूरा हो चुका है। कमियां ढूंढ-ढूंढ कर दूर कराई जा रही हैं। सुंदर प्रवेश द्वार, म्यूरल पेटिंग, निर्मल सरयू, साफ-सुथरे आकर्षक राम की पैड़ी का सुंदरीकरण, सब कुछ वहां आने बालों को आकर्षित करने के लिए काफी हैं। एक ही पैटर्न बनाई गई दुकानें भी नई अयोध्या दर्शन कराएंगी प्रशासनिक अमला अर्थात अधिकारियों द्वारा तैयारियों का निरंतर निरीक्षण कर इसको और सुंदर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रवेश द्वार से ही नई अयोध्या का अहसास होने के लिये लोग वेवस हो रहे हैं। अयोध्या में घुसते ही चौड़ी सड़क लोगों का स्वागत करती है। किनारे की दीवारों पर भगवान राम के अलग-अलग प्रसंगो से जुडी पेंटिंग और आकृतियाँ लोगों को आकर्षित कर रही हैं।</div>
<div> </div>
<div>अयोध्या की छटा देख लोग हो रहे चकित हो रहे हैं। जन्मभूमि पथ भी संस्कृति से परिचित करा रहा है। राममंदिर तक पहुंचाने वाले जन्मभूमि पथ पर पग-पग पर देश की लोक परम्परा व संस्कृतियों के दर्शन होते है। मंदिर में दर्शन के लिए देश ही नहीं, दुनिया भर से भी लोग आना प्राम्भ हो चुका है। कुछ प्रमुख समाचर पत्रो में अयोध्या की एक दीवार पर राम कथा के आधार पर हनुमानजी के संजीवनी लाने जाने का प्रसंग उकेरा गया है।</div>
<div> </div>
<div>जिसके साथ मंगलवार को फोटो खिंचाते हुये तमाम श्रद्धालु इसे अपने यादोन में सजोना चाहते हैं। यद्यपि कलाकारो की मेहनत और उनका प्रयास अविष्मरनीय और प्रेरणादायक है परन्तु शासन के सांस्कृतिक विभाग को हर ऐसे प्रसंगो से जुडे उकेरी हुई आकृतियो को अपने ग्रंथो में दर्शाये गये उल्लेखो से अवश्य ही मिलान करवा लेना अत्यंत आवश्यक है-छोटी सी भूल हमारे धार्मिक भावनाओ आहत कर सकती है। क्योंकि अयोध्या में प्रवेशद्वार पर हनुमान जी के संजीवनी लाने जाने का प्रसंग उकेरा गया है जिसमे हाथ में गदा नही दिखाया गया है। यह कुबेर भगवान द्वारा दिया गया विशिष्ट अस्त्र है। अतः इसका   सुधार आवश्यक प्रतीत होता है।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
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                                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
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                <pubDate>Thu, 18 Jan 2024 21:04:19 +0530</pubDate>
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