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                <title>GST Relief - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>युद्ध और टैरिफ के तूफान में भी भारत की अर्थव्यवस्था का बजा डंका</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186989/indias-economy-continues-to-thrive-even-in-the-storm-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-09/1002217491.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का प्रदर्शन किया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और नीतिगत स्थिरता का बड़ा संकेत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग 7 प्रतिशत के अनुमान से भी बेहतर रहा। वैश्विक स्तर पर जब अनेक अर्थव्यवस्थाएं युद्ध, महंगाई, ऊर्जा संकट और व्यापारिक तनाव से जूझ रही हैं, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस गति से आगे बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की इस आर्थिक तस्वीर को केवल बाजार की स्वाभाविक ताकत के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे सरकार की लगातार बनाई गई आर्थिक रणनीति और उस रणनीति को जमीन पर लागू करने की कार्यप्रणाली भी महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विकास का आधार केवल तत्काल राहत या उपभोग को नहीं बनाया, बल्कि बुनियादी ढांचे, सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा, रक्षा, विनिर्माण और डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगातार निवेश बढ़ाने पर जोर दिया है। यही पूंजीगत खर्च आज आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहली तिमाही में सरकार के पूंजीगत खर्च में 18.6 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि सरकार आर्थिक दबाव के समय भी विकास खर्च को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाने की नीति पर कायम है। सरकार का यह दृष्टिकोण अर्थव्यवस्था के लिए दोहरा लाभ पैदा करता है। एक ओर बड़े स्तर पर निर्माण और आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं से रोजगार और कारोबार को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी ओर सड़क, रेलवे, बिजली, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक ढांचे में सुधार से आने वाले वर्षों की आर्थिक क्षमता मजबूत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में सरकारी निवेश का असर निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर भी दिखाई देता है। जब सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करती है तो उससे सीमेंट, स्टील, मशीनरी, परिवहन, निर्माण और अनेक दूसरे क्षेत्रों में मांग पैदा होती है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसा घूमता है और निजी क्षेत्र को भी विस्तार का अवसर मिलता है। यही कारण है कि वर्तमान आर्थिक वृद्धि को केवल सरकारी खर्च से जोड़ना उचित नहीं होगा। सरकार द्वारा तैयार किया गया वातावरण निजी निवेश और उपभोग दोनों के लिए आधार तैयार कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम लोगों की खपत भी आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। पिछले वर्ष जीएसटी और आयकर से संबंधित राहतों के कारण लोगों के हाथ में खर्च करने योग्य आय बढ़ी। महंगाई की चुनौतियों के बावजूद उपभोक्ता मांग में अपेक्षित कमजोरी नहीं आई। इसका असर यात्री वाहनों की बिक्री में दिखाई दिया, जहां पहली तिमाही में 25.6 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि घरेलू बाजार में उपभोक्ता विश्वास अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिजली की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बिजली की मांग की वृद्धि दर 1.9 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत तक पहुंचना औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने का संकेत माना जा सकता है। जब उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्माण और घरेलू खपत में गतिविधियां बढ़ती हैं तो ऊर्जा की मांग भी बढ़ती है। इसलिए बिजली की मांग का यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की व्यापक गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;">सकल मूल्य वर्धित यानी जीवीए के आंकड़े भी भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती को रेखांकित करते हैं। पहली तिमाही में वास्तविक जीवीए वृद्धि 8.2 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 7.1 प्रतिशत थी। वहीं नॉमिनल जीवीए वृद्धि 11.5 प्रतिशत दर्ज की गई। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि भी 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 10.3 प्रतिशत हुई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों का विस्तार केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेवा क्षेत्र की मजबूती भी भारत की आर्थिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई 58.6 तक पहुंचना बताता है कि सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। भारत लंबे समय से सेवा क्षेत्र की अपनी क्षमता के लिए दुनिया में पहचान रखता है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, डिजिटल सेवाओं, संचार, व्यापार और अन्य सेवा क्षेत्रों का विस्तार भारतीय अर्थव्यवस्था को लगातार नया आधार दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक गतिविधियों को सामान्य बनाए रखने पर लगातार जोर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा और खाद्य बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आया। बाद में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा और समुद्री व्यापार तथा तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं पैदा हुईं। ऐसे समय में किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आयात लागत और महंगाई को नियंत्रित रखना बड़ी चुनौती होती है। भारत ने ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने के लिए नीतिगत स्तर पर संतुलन साधने की कोशिश की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में आया। भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकियों ने यह आशंका पैदा की कि इसका भारतीय निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। लेकिन भारत ने अपनी आर्थिक रणनीति को केवल किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं रखा। निर्यात बाजारों के विविधीकरण, घरेलू मांग को मजबूत करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विनिर्माण को प्रोत्साहन देने की दिशा में सरकार की नीतियां इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की आर्थिक नीति में आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करना है। सरकार ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ विदेशी निवेश आकर्षित करने, विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और रणनीतिक क्षेत्रों में देश की निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, मोबाइल निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में लगातार क्षमता निर्माण इसी सोच का हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता चाहती हैं। यदि भारत इस अवसर को पूरी तरह भुना पाता है तो आने वाले वर्षों में विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र में उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके लिए सरकार की नीतिगत स्थिरता, तेज निर्णय लेने की क्षमता और परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी समझना जरूरी है कि 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि उत्सव का विषय जरूर है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता। भारत के सामने रोजगार सृजन, ग्रामीण मांग, महंगाई, निर्यात प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए सरकार के सामने आगे भी यही चुनौती रहेगी कि आर्थिक वृद्धि को अधिक व्यापक बनाया जाए और उसका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी वर्तमान आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था ने बाहरी दबावों के सामने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। युद्ध हो, तेल संकट हो, वैश्विक व्यापार में तनाव हो या टैरिफ का दबाव—भारत की आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह पटरी से नहीं उतरीं। इसके पीछे मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता सरकारी पूंजीगत खर्च, सेवा क्षेत्र की क्षमता, सुधारों की निरंतरता और आर्थिक प्रबंधन का महत्वपूर्ण योगदान है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज विश्व शक्ति बनने की दिशा में केवल सामरिक या राजनीतिक आधार पर नहीं बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति किसी भी राष्ट्र की वैश्विक स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि इसी आर्थिक क्षमता का संकेत देती है। सरकार ने जिस तरह बुनियादी ढांचे, सउत्पादन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, निवेश और घरेलू मांग को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की है, उसका परिणाम आर्थिक आंकड़ों में दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने संकटों के बीच अपनी गति बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है और आगे भी अनेक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। लेकिन यदि सरकार इसी तरह वित्तीय अनुशासन, पूंजीगत निवेश, नीतिगत स्थिरता और आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन बनाए रखती है तो भारत की विकास यात्रा और तेज हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि भारत के लिए केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस आर्थिक आत्मविश्वास का संकेत है जिसके आधार पर भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका और मजबूत कर रहा है। युद्ध और टैरिफ के दबाव के बावजूद अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार बताती है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा है। सरकार की कार्यप्रणाली और आर्थिक नीतियों की असली परीक्षा भी यही है कि संकट चाहे कितना बड़ा हो, विकास की गति को थमने न दिया जाए। फिलहाल जीडीपी के आंकड़े यही संदेश दे रहे हैं कि भारत की आर्थिक गाड़ी न केवल चल रही है, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी अपनी रफ्तार बनाए हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>         *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 17:00:19 +0530</pubDate>
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