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                <title>भारतीय न्याय संहिता धारा 152 - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>असहमति पर ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के सार्वजनिक वातावरण को प्रभावित करती है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज और आम जनता की सोच पर असर डालते हैं। इसलिए जब किसी राजनीतिक असहमति, विचारधारा या सरकार की आलोचना के संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता है तो इसे महज राजनीतिक बयान मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इस शब्द के राजनीतिक अर्थ, संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक प्रभाव पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।<br /><br />स्वतंत्रता दिवस के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185965/dissent-labeled-as-mindless-naxal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1001039405.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के सार्वजनिक वातावरण को प्रभावित करती है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज और आम जनता की सोच पर असर डालते हैं। इसलिए जब किसी राजनीतिक असहमति, विचारधारा या सरकार की आलोचना के संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता है तो इसे महज राजनीतिक बयान मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इस शब्द के राजनीतिक अर्थ, संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक प्रभाव पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।<br /><br />स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद देश में राजनीतिक बहस तेज हुई। सत्ता पक्ष की दृष्टि में यह उन वैचारिक प्रवृत्तियों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द है जो देश की एकता, विकास और सुरक्षा के विरुद्ध वातावरण बनाती हैं। विपक्ष और आलोचकों ने इसे सरकार से असहमति रखने वालों को बदनाम करने वाली भाषा बताया। इस विवाद का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत इस समय युवाओं के आंदोलनों, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, कथित प्रश्नपत्र लीक और शासन की जवाबदेही जैसे मुद्दों से भी जूझ रहा है।<br /><br />लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और राष्ट्रविरोधी गतिविधि को एक ही श्रेणी में रखना गंभीर भूल होगी। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, हालांकि ये अधिकार युक्तिसंगत संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन हैं। अर्थात नागरिक को सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाने का अधिकार है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने या देश की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध आपराधिक गतिविधियों की अनुमति नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली कसौटी इसी सीमा को स्पष्ट रखने में है।<br /><br />भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों से संबंधित है। इसमें अलगाववादी गतिविधियों, सशस्त्र विद्रोह तथा ऐसी गतिविधियों को उकसाने वाले कृत्यों को गंभीर अपराध माना गया है। लेकिन कानून की व्याख्या सरकार की नीतियों अथवा प्रशासनिक कदमों की वैधानिक माध्यम से आलोचना को स्वतः इस अपराध की श्रेणी में नहीं रखती। यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार का विरोध करना और देश के विरुद्ध हिंसक गतिविधि करना समान नहीं है।<br /><br />हालिया युवा आंदोलनों ने इस प्रश्न को और प्रासंगिक बनाया है। परीक्षा व्यवस्था, रोजगार और सरकारी जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए। 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के बाद पुलिस कार्रवाई तथा प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोप-प्रत्यारोप सामने आए। मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की। यह कदम इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि विवादित घटनाओं का अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और प्रमाणों से निकाला जाना चाहिए।<br /><br />यदि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, पुलिस पर हमला किया या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि सुरक्षा बलों ने आवश्यकता से अधिक या अनुपातहीन बल का इस्तेमाल किया तो उसकी भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। लोकतंत्र में कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसकी कसौटी व्यक्ति की राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कृत्य और उपलब्ध साक्ष्य हों।<br /><br />समस्या तब गंभीर हो जाती है जब राजनीतिक बहस में व्यक्ति के कृत्य से अधिक उसके विचार और पहचान को निशाना बनाया जाता है। ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द यदि वास्तविक हिंसक उग्रवाद और सामान्य राजनीतिक असहमति के बीच अंतर मिटाने लगे तो सार्वजनिक विमर्श अधिक स्पष्ट होने के बजाय अधिक ध्रुवीकृत हो सकता है। किसी व्यक्ति के विचार सरकार को अप्रिय हो सकते हैं, लेकिन केवल अप्रिय विचार किसी आपराधिक कृत्य का प्रमाण नहीं होते।<br /><br />भारत में विश्वविद्यालयों, मीडिया, नागरिक संगठनों और सामाजिक आंदोलनों की भूमिका इसी कारण महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र केवल चुनाव और संसद तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों में उठने वाले प्रश्न, पत्रकारों की पड़ताल, नागरिक समाज की आलोचना और युवाओं के शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतांत्रिक चेतना के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। युवाओं की प्रत्येक मांग सही हो, यह आवश्यक नहीं; लेकिन उनकी प्रत्येक मांग को सुनना और तथ्यों के आधार पर उत्तर देना शासन की जिम्मेदारी अवश्य है।<br /><br />इसी के साथ आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सुरक्षा बलों पर हमला किसी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं हो सकता। किसी आंदोलन का उद्देश्य कितना भी वैध क्यों न हो, हिंसक रास्ता उसकी नैतिक और लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करता है। इसलिए सरकार को संयम और प्रदर्शनकारियों को अनुशासन—दोनों की आवश्यकता है।<br /><br />संसद की कार्यवाही भी इसी व्यापक संवाद-संकट का संकेत देती है। हालिया मानसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव तथा व्यवधानों के कारण कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपेक्षित चर्चा प्रभावित हुई। संसद का मूल उद्देश्य ही असहमति को बहस में बदलना है। यदि सड़क पर आंदोलन और संसद के भीतर व्यवधान दोनों बढ़ते जाएं तो यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि संस्थागत संवाद की कमजोर होती क्षमता का संकेत भी माना जाना चाहिए।<br /><br />सत्ता पक्ष को समझना होगा कि आलोचना लोकतंत्र की बीमारी नहीं है। सरकार की नीतियों की समीक्षा, प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही मांगना नागरिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। दूसरी ओर विपक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि हर सरकारी निर्णय को लोकतंत्र-विरोधी बताना उतना ही नुकसानदेह है। लोकतांत्रिक राजनीति में आरोप से अधिक महत्वपूर्ण प्रमाण और नारे से अधिक महत्वपूर्ण नीति-विमर्श है।<br /><br />राष्ट्रवाद को भी सरकार और राष्ट्र के बीच अंतर स्पष्ट रखते हुए समझना होगा। राष्ट्र केवल वर्तमान सरकार का नाम नहीं है। राष्ट्र संविधान, नागरिकों, संस्थाओं, विविध भाषाओं-संस्कृतियों और साझा भविष्य का व्यापक रूप है। कोई नागरिक सरकार की किसी नीति का विरोध करते हुए भी देश और संविधान के प्रति पूरी निष्ठा रख सकता है। उसी प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वास्तविक खतरों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। यदि कोई संगठन सचमुच हिंसक उग्रवाद, सशस्त्र विद्रोह या अलगाववादी गतिविधियों में संलिप्त है तो राज्य को कठोर कार्रवाई करनी ही चाहिए। लेकिन ऐसी कार्रवाई का आधार राजनीतिक लेबल नहीं, प्रमाण और कानून होना चाहिए।<br /><br />‘दिमागी नक्सल’ विवाद इसलिए केवल एक शब्द का विवाद नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न से जुड़ा है कि भारत अपने असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहता है। क्या आलोचना का उत्तर तर्क से दिया जाएगा या राजनीतिक ठप्पे से? क्या हिंसक गतिविधि और वैचारिक असहमति के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाएगा? क्या पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारी हिंसा दोनों की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या संसद जनता के असंतोष को लोकतांत्रिक संवाद में बदलने की अपनी भूमिका निभाएगी?<br /><br />लोकतंत्र की शक्ति सर्वसम्मति में नहीं, असहमति को संभालने की क्षमता में होती है। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जिसमें हर नागरिक सत्ता की प्रशंसा करे, बल्कि वह है जिसमें नागरिक कठिन प्रश्न पूछ सकें और सरकार उन प्रश्नों का तथ्यपूर्ण उत्तर देने के लिए तैयार रहे। यदि कोई आरोप गलत है तो तथ्य उसे गलत सिद्ध कर सकते हैं; यदि कोई नीति सही है तो उसके परिणाम उसका बचाव कर सकते हैं; और यदि कोई व्यक्ति वास्तव में कानून तोड़ता है तो न्यायिक प्रक्रिया उसके विरुद्ध कार्रवाई का रास्ता तय कर सकती है।<br /><br />इसलिए भारत को ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता हो, लेकिन शांतिपूर्ण असहमति के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक स्थान भी हो। सरकार को आलोचना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं और नागरिकों को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं। संस्थाओं को निष्पक्ष रहना होगा, संसद को संवाद का मंच बनना होगा और राजनीतिक दलों को शब्दों की जिम्मेदारी समझनी होगी।<br /><br />क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट वह नहीं जब नागरिक सरकार से प्रश्न पूछते हैं। वास्तविक संकट तब शुरू होता है जब नागरिक प्रश्न पूछने से डरने लगते हैं। राजनीतिक ठप्पे क्षणिक प्रभाव पैदा कर सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को स्थायी शक्ति संविधान, स्वतंत्र संस्थाओं, प्रमाण आधारित सार्वजनिक विमर्श और असहमति के सम्मान से मिलती है। भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की रक्षा इसी संतुलन से होगी कि राष्ट्र की सुरक्षा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की आवाज भी।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 20:50:19 +0530</pubDate>
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