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                <title>नागरिक समाज - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>नागरिक समाज RSS Feed</description>
                
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                <title>विदेशी अंशदान कानून पर क्यों मचा है घमासान?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाली सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षणिक और जन कल्याणकारी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाला विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम </span>(FCRA) <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। अब विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2026 को लेकर राजनीतिक दलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के बीच बहस तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि विदेशी धन का उपयोग भारत की संप्रभुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर विरोध करने वालों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलाव सरकार को संस्थाओं पर अत्यधिक नियंत्रण</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185113/why-is-there-an-uproar-over-foreign-contribution-law"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/छायाचित्र-(महेन्द्र-तिवारी).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाली सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षणिक और जन कल्याणकारी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाला विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम </span>(FCRA) <span lang="hi" xml:lang="hi">चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। अब विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2026 को लेकर राजनीतिक दलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के बीच बहस तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि विदेशी धन का उपयोग भारत की संप्रभुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर विरोध करने वालों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलाव सरकार को संस्थाओं पर अत्यधिक नियंत्रण का अधिकार दे सकते हैं और नागरिक समाज की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2010 का मूल उद्देश्य विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन के आगमन और उसके उपयोग को नियंत्रित करना है। भारत में अनेक सामाजिक संस्थाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मार्थ संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षणिक संस्थान और अन्य गैर सरकारी संगठन विदेशों से मिलने वाले अनुदान के माध्यम से स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला सशक्तीकरण और अन्य जन कल्याणकारी कार्य करते हैं। कानून यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि विदेशी धन का इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों के लिए न हो जो देश के राष्ट्रीय हित के लिए हानिकारक हों। केंद्रीय गृह मंत्रालय की व्यवस्था के अनुसार विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली पात्र संस्थाओं को पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेनी होती है तथा उन्हें प्राप्त धन और उसके उपयोग का हिसाब रखना पड़ता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कारण विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2026 में प्रस्तावित वह व्यवस्था है जिसके तहत किसी संस्था का विदेशी अंशदान संबंधी प्रमाणपत्र समाप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रद्द या वापस हो जाने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे निर्मित संपत्तियों के संबंध में एक विशेष व्यवस्था लागू होगी। विधेयक में ऐसी संपत्तियों के संरक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रबंधन और निस्तारण के लिए नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। यही प्रावधान विरोध का सबसे बड़ा कारण बन गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आलोचकों का कहना है कि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होने या उसका नवीनीकरण न होने की स्थिति में उसकी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होना गंभीर विषय है। उनके अनुसार किसी संस्था ने यदि वर्षों तक विदेशी और घरेलू दोनों प्रकार के संसाधनों से विद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आश्रयगृह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण केंद्र या अन्य जनसेवा की संपत्तियां खड़ी की हैं तो केवल विदेशी अंशदान संबंधी अनुमति समाप्त होने के कारण उन संपत्तियों पर सरकारी अधिकार का प्रश्न उठना स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है। संसदीय विश्लेषण में भी यह प्रश्न उठाया गया है कि प्रमाणपत्र समाप्त होने के साथ संपत्तियों के अधिकार और उपयोग को लेकर गंभीर कानूनी प्रश्न पैदा हो सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों के संबंध में प्रमाणपत्र समाप्त होने के बाद क्या किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे लेकर पर्याप्त स्पष्ट और व्यवस्थित तंत्र नहीं था। प्रस्तावित कानून इस कमी को दूर करने का प्रयास करता है। सरकार के अनुसार यदि किसी संस्था को विदेशी धन प्राप्त करने की अनुमति नहीं है तो विदेशी धन से निर्मित संपत्तियों को बिना किसी निगरानी के संस्था के पास छोड़ देना उचित नहीं होगा। इसलिए उनके संरक्षण और प्रबंधन के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विरोध का दूसरा महत्वपूर्ण कारण सरकार के अधिकारों के विस्तार से जुड़ा है। आलोचकों का कहना है कि विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं पर पहले से ही अनेक प्रकार की निगरानी और अनुपालन संबंधी शर्तें लागू हैं। वर्ष 2026 में जारी नए नियमों के बाद संस्थाओं से उनकी गतिविधियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्षेत्र और प्रमुख पदाधिकारियों से संबंधित अधिक विस्तृत जानकारी की अपेक्षा की गई है। आलोचकों को आशंका है कि इससे निगरानी केवल धन के स्रोत और उपयोग तक सीमित न रहकर संस्था की सामान्य गतिविधियों तक पहुंच सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां मूल प्रश्न पारदर्शिता और स्वतंत्रता के बीच संतुलन का है। किसी भी देश को यह अधिकार है कि वह विदेश से आने वाले धन की निगरानी करे और यह सुनिश्चित करे कि उसका उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध न हो। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विदेशी धन के माध्यम से राजनीतिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक या सामाजिक प्रभाव डालने की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए विदेशी अंशदान पर नियंत्रण की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार भी इसी आधार पर कड़े प्रावधानों को आवश्यक बताती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दूसरी ओर यह भी महत्वपूर्ण है कि नियम इतने कठोर न हो जाएं कि वास्तविक जनसेवा करने वाली संस्थाओं के लिए काम करना कठिन हो जाए। अनेक संस्थाएं विदेशी सहायता के माध्यम से दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपदा राहत और सामाजिक विकास से जुड़े काम करती हैं। यदि प्रशासनिक नियम अत्यधिक जटिल हो जाएं या छोटी प्रक्रियात्मक भूलों के कारण संस्थाओं पर कठोर कार्रवाई होने लगे तो इसका सीधा प्रभाव उन लोगों पर पड़ सकता है जिन्हें इन संस्थाओं से सहायता मिलती है। इसलिए आलोचक चाहते हैं कि कानून में कार्रवाई और दंड के बीच स्पष्ट अनुपात बना रहे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद का एक पहलू धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से कुछ चर्च संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों के खिलाफ आवाज उठाई है। मिजोरम में विभिन्न चर्च संगठनों ने प्रस्तावित संशोधन के विरोध में प्रदर्शन की घोषणा की है। उनका कहना है कि विदेशी सहायता से चलने वाली अनेक संस्थाएं शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में काम करती हैं और नए प्रावधान उनके काम को प्रभावित कर सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी विधेयक का विरोध तेज कर दिया है। कांग्रेस सहित विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित कानून गैर सरकारी संगठनों को निशाना बनाने और सरकार की आलोचना करने वाली संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। कांग्रेस ने 9 अगस्त 2026 को विधेयक के विरोध को लेकर अपना रुख और स्पष्ट किया तथा इसे जन विरोधी बताते हुए विरोध करने की बात कही। हालांकि ये राजनीतिक दलों के आरोप हैं और इन्हें कानून का प्रमाणित प्रभाव नहीं माना जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधेयक में कुछ ऐसे प्रावधान भी हैं जिन्हें सरकार सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है। उदाहरण के लिए विदेशी अंशदान संबंधी प्रमाणपत्र समाप्त होने के बाद संपत्तियों के प्रबंधन की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त कुछ अपराधों के लिए अधिकतम कारावास की अवधि को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का प्रस्ताव भी है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रस्तावित संशोधन केवल कठोरता बढ़ाने वाला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कानून के कुछ हिस्सों में दंड व्यवस्था को कम करने और प्रशासनिक व्यवस्था को स्पष्ट करने का प्रयास भी करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविक चुनौती यह है कि विदेशी धन के नियमन को राजनीतिक असहमति के नियमन में बदलने से कैसे रोका जाए। किसी संस्था का विदेशी धन प्राप्त करना अपने आप में अपराध नहीं है। यदि वह कानून के अनुसार पंजीकृत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन का हिसाब रखती है और निर्धारित उद्देश्य के लिए उसका उपयोग करती है तो उसे स्वतंत्र रूप से जनसेवा करने का अवसर मिलना चाहिए। वहीं यदि कोई संस्था विदेशी धन का दुरुपयोग करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन छिपाती है या देश के कानूनों का उल्लंघन करती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस दृष्टि से विदेशी अंशदान कानून का विरोध केवल विदेशी धन प्राप्त करने के अधिकार का प्रश्न नहीं है। यह सरकार की नियामक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्थाओं की स्वायत्तता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपत्ति के अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन का प्रश्न भी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल पारदर्शी और समान रूप से हो। कार्रवाई के स्पष्ट आधार हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्था को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिले और संपत्तियों के संबंध में अंतिम निर्णय के लिए न्यायिक संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में मजबूत नागरिक समाज लोकतंत्र की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सामाजिक संस्थाएं सरकार की प्रतिद्वंद्वी नहीं होतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अनेक अवसरों पर वे सरकार के साथ मिलकर समाज के कमजोर वर्गों तक सहायता पहुंचाती हैं। इसलिए विदेशी धन पर निगरानी और नागरिक संस्थाओं की स्वतंत्रता दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी है। विदेशी धन का दुरुपयोग राष्ट्रीय हित के लिए गंभीर खतरा हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नियमों का अत्यधिक विस्तार भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2026 के विवाद को केवल सरकार बनाम विपक्ष या सरकार बनाम गैर सरकारी संगठनों के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि भारत विदेशी प्रभाव से अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हित की रक्षा करते हुए नागरिक समाज की वैध स्वतंत्रता को कैसे सुरक्षित रखता है। पारदर्शिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके साथ निष्पक्षता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायिक निगरानी और संस्थागत स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यदि कानून इन सभी पक्षों के बीच संतुलन स्थापित कर पाता है तो विदेशी अंशदान का नियमन अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> लेकिन यदि नियंत्रण की शक्ति अत्यधिक केंद्रीकृत हो जाती है और उसके दुरुपयोग से बचाव के पर्याप्त उपाय नहीं रहते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विरोध की आवाजें उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि विदेशी अंशदान कानून को लेकर वर्तमान बहस केवल धन के स्रोत की निगरानी की बहस नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत के लोकतांत्रिक और नागरिक जीवन की सीमाओं और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की व्यापक बहस बन गई है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 22:28:11 +0530</pubDate>
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