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                <title>लोकतंत्र - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वन नेशन, वन इलेक्शन: जेपीसी पहुंचेगी पणजी और लखनऊ</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> तथा <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के उद्देश्य से <strong>'एक राष्ट्र, एक चुनाव'</strong> विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) 10 से 15 जुलाई, 2026 तक गोवा की राजधानी पणजी और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अध्ययन दौरा करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति के अध्यक्ष <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">पी. पी. चौधरी</span></span></strong> के नेतृत्व में होने वाले इस दौरे का उद्देश्य प्रस्तावित विधेयकों के देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और शासन व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना तथा विभिन्न हितधारकों से सुझाव प्राप्त</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182820/one-nation-one-election-jpc-will-reach-panaji-and-lucknow"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/image-38-1024x612.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> तथा <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के उद्देश्य से <strong>'एक राष्ट्र, एक चुनाव'</strong> विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) 10 से 15 जुलाई, 2026 तक गोवा की राजधानी पणजी और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अध्ययन दौरा करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति के अध्यक्ष <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">पी. पी. चौधरी</span></span></strong> के नेतृत्व में होने वाले इस दौरे का उद्देश्य प्रस्तावित विधेयकों के देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और शासन व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना तथा विभिन्न हितधारकों से सुझाव प्राप्त करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन दौरे के दौरान समिति क्षेत्रीय स्तर पर संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, राज्य प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों, वित्तीय एवं शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, राज्य बार परिषदों, संबंधित उच्च न्यायालयों के अधिवक्ता संघों, विभिन्न पेशेवर संगठनों तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत परामर्श करेगी। इन बैठकों में चुनाव प्रणाली में संभावित बदलावों, प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय प्रभाव, संवैधानिक पहलुओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति का यह अध्ययन दौरा देशभर में आयोजित किए जा रहे क्षेत्रीय परामर्शों की श्रृंखला का अगला चरण है। इससे पहले समिति मुंबई, देहरादून, चंडीगढ़, शिमला, बेंगलुरु और गांधीनगर में भी इसी प्रकार के अध्ययन दौरे और परामर्श बैठकें आयोजित कर चुकी है। इन बैठकों में विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, राजनीतिक दलों के नेताओं, बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा विभिन्न नियामक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्व में आयोजित इन परामर्श बैठकों में महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, चंडीगढ़ तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के प्रतिनिधियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। इसके अलावा <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारतीय रिज़र्व बैंक</span></span>, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड</span></span> तथा <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक</span></span> जैसी प्रमुख संस्थाओं के अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने भी समिति के समक्ष अपने विचार रखे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति को उम्मीद है कि पणजी और लखनऊ में होने वाले आगामी अध्ययन दौरे के दौरान भी विभिन्न वर्गों से उपयोगी सुझाव प्राप्त होंगे। इन सुझावों के आधार पर समिति प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> और <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> पर अपनी रिपोर्ट को और अधिक व्यापक तथा व्यावहारिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा को लेकर देशभर में विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है। ऐसे में संयुक्त संसदीय समिति का यह अध्ययन दौरा विभिन्न पक्षों की राय को समाहित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 18:17:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लखनऊ घटना के विरोध में प्रयागराज के अधिवक्ताओं का जोरदार प्रदर्शन।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज </strong>में सोमवार को समस्त अधिवक्ताओं ने लखनऊ में अधिवक्ताओं के चेंबरों पर बुलडोजर चलाए जाने तथा प्रदर्शन कर रहे वकीलों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान अधिवक्ताओं ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कानून मंत्री के नाम जिलाधिकारी प्रयागराज के माध्यम से ज्ञापन सौंपा और घटना की कड़ी निंदा की।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ताओं ने कहा कि अधिवक्ता समाज न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार लोकतंत्र तथा न्यायपालिका की गरिमा के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि लखनऊ में अधिवक्ताओं के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179536/strong-demonstration-by-advocates-of-prayagraj-against-the-lucknow-incident"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260518-wa0125.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज </strong>में सोमवार को समस्त अधिवक्ताओं ने लखनऊ में अधिवक्ताओं के चेंबरों पर बुलडोजर चलाए जाने तथा प्रदर्शन कर रहे वकीलों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान अधिवक्ताओं ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कानून मंत्री के नाम जिलाधिकारी प्रयागराज के माध्यम से ज्ञापन सौंपा और घटना की कड़ी निंदा की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ताओं ने कहा कि अधिवक्ता समाज न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार लोकतंत्र तथा न्यायपालिका की गरिमा के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि लखनऊ में अधिवक्ताओं के चेंबरों पर बुलडोजर चलाकर न केवल उनके अधिकारों का हनन किया गया, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध कर रहे अधिवक्ताओं पर लाठीचार्ज कर प्रशासन ने संवेदनहीनता दिखाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अधिवक्ताओं ने कहा कि यह घटना पूरे अधिवक्ता समाज का अपमान है और यदि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। प्रदर्शन के दौरान अधिवक्ताओं ने नारेबाजी करते हुए सरकार से दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की मांग की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन में अधिवक्ताओं ने मांग की कि अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उनके चेंबरों और अधिकारों की रक्षा की जाए तथा भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। साथ ही घटना की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करने की भी मांग की गई।</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 21:52:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘मैं इस्तीफा नहीं दूंगी’:क्या यह  ब्यान संवैधानिक है या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण?”</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hq720.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा में बहुमत से निर्धारित होती है।यदि किसी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं है, तो वह सरकार बनाने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार खो देता है।ऐसी स्थिति में या तो वैकल्पिक बहुमत सिद्ध किया जाता है या पद छोड़ना पड़ता है।इस दृष्टि से “बहुमत के बिना इस्तीफा न देने” का कथन या यूं कहें बहुमत वाले दल के लिए सक्ता हस्तांतरण हेतु पद न  छोड़ने जैसे वक्तव्य संवैधानिक भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं। भारत में इस तरह का ब्यान शायद अपने आप में पहला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान केवल प्रावधानों का दस्तावेज नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता का भी आधार है।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कितनी ईमानदारी से उसका पालन करते हैं।ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है,क्या इस तरह के ब्यान देने  की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?क्या यह जनादेश का अपमान नहीं है?</div>
<div style="text-align:justify;">ममता दीदी पर मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान महामहिम राष्ट्रपति के प्रदेश आगमन पर उन्हें प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान न देना, केन्द्रीय जांच एजेंसियों को सहयोग न करना, जांच में व्यवधान उत्पन्न करना,सघन मतदाता जांच का विरोध करना, चुनाव आयोग के अधिकारियों के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना, समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाना जैसे बहुत सारे आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। इनमें कितने आरोप संवैधानिक रूप से सही है या नहीं यह न्यायलय का तय करना का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू विपक्षी दलों की ममता दीदी के इस्तीफा न देने वाले ब्यान पर प्रतिक्रिया न आना  है।जहाँ एक ओर समय-समय पर कई विपक्षी दल बार-बार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में “संविधान खतरे में है”, वहीं दूसरी ओर ममता दीदी के इस स्पष्ट बयान पर न तो विपक्षी दलों द्वारा अपेक्षित विरोध किया और न ही कोई  समझाइश दी गई अपितु 100 सीटों की चोरी के आरोप का समर्थन कर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर दिए, जबकि चुनाव में धांधली हुई या नहीं इसको तय करने के लिए न्यायालय, और उसकी शरण में जाना चाहिए यदि किसी प्रकार की आशंका है। चुनाव आयोग की हिंसा रहित निष्पक्ष चुनाव कराने के श्रम पर पानी फेरने से बचना चाहिए।ऐसा मौन समर्थन क्या भारतीय संविधान को खतरे में नहीं डालता? वास्तव में यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है:क्या संविधान की चिंता केवल राजनीतिक सुविधा का विषय है?क्या संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का पैमाना दलगत आधार पर बदल जाता है?यदि एक ओर “संविधान खतरे में” का नरेटिव गढ़ा जाए और दूसरी ओर ऐसे बयानों पर चुप्पी साध ली जाए, तो क्या यह उस नरेटिव की विश्वसनीयता को कमजोर नहीं करता ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों की निरंतरता का नाम है।जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों के लिए एक मानक और अपने सहयोगियों के लिए दूसरा मानक अपनाते हैं तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता है।इस संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि:संविधान की रक्षा का प्रश्न चयनात्मक नहीं हो सकता;लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरा ऐसा मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठा यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।“बहुमत हासिल न करने पर भी मैं इस्तीफा नहीं दूंगी” जैसा कथन-संवैधानिक रूप से संदिग्ध और लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुपयुक्त प्रतीत होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही विपक्ष की चुप्पी यह संकेत देती है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की बजाय सुविधा का प्रभाव बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि-सत्ता या विपक्ष में कोई भी बैठे,सबके लिए संविधान सर्वोपरि रहे, और जनादेश का सम्मान अनिवार्य।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 16:54:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चुनावी भूचाल 2026: बदला नैरेटिव बदली राजनीति और उभरे नए सत्ता समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह भावनाओं रणनीतियों नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों का जटिल मिश्रण है। इस बार के नतीजों ने कई स्थापित धारणाओं को तोड़ा और नए राजनीतिक ट्रेंड्स को जन्म दिया। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वजहों से सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो कुछ साझा फैक्टर ऐसे रहे जिन्होंने इन नतीजों को आकार दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ा बदलाव नैरेटिव के स्तर पर देखने को मिला। चुनाव अब केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178209/election-earthquake-2026-changed-narrative-changed-politics-and-new-power"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/haseen.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह भावनाओं रणनीतियों नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों का जटिल मिश्रण है। इस बार के नतीजों ने कई स्थापित धारणाओं को तोड़ा और नए राजनीतिक ट्रेंड्स को जन्म दिया। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वजहों से सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो कुछ साझा फैक्टर ऐसे रहे जिन्होंने इन नतीजों को आकार दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ा बदलाव नैरेटिव के स्तर पर देखने को मिला। चुनाव अब केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहे बल्कि पहचान संस्कृति और भावनात्मक अपील का प्रभाव बहुत गहरा हो गया। पश्चिम बंगाल में लंबे समय से सत्ता में रही सरकार के खिलाफ माहौल बना लेकिन यह केवल एंटी इनकम्बेंसी का मामला नहीं था। यहां एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया गया जिसमें सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक हथियार बना दिया गया। माछ भात और मां काली जैसे प्रतीकों के जरिए यह संदेश दिया गया कि स्थानीय परंपराओं का सम्मान केवल एक खास राजनीतिक विचारधारा ही कर सकती है। इसने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ध्रुवीकरण इस चुनाव का एक और बड़ा फैक्टर रहा। यह केवल धार्मिक आधार पर नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के स्तर पर भी हुआ। असम में इसका एक अलग रूप देखने को मिला जहां वोटों का बंटवारा निर्णायक साबित हुआ। विपक्षी दलों के बीच तालमेल की कमी और समुदायों के भीतर विभाजन ने सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाया। यह रणनीति नई नहीं थी लेकिन इस बार इसे अधिक व्यवस्थित तरीके से लागू किया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि चुनाव जीतने के लिए केवल अपने वोटबैंक को मजबूत करना ही नहीं बल्कि विरोधी वोटों को विभाजित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा बड़ा फैक्टर प्रशासनिक और संरचनात्मक बदलाव रहे। मतदाता सूचियों में संशोधन और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं का असर सीधे चुनावी परिणामों पर पड़ा। पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का मुद्दा चर्चा में रहा। वहीं असम में परिसीमन के बाद सीटों का स्वरूप बदल गया जिससे कई क्षेत्रों का राजनीतिक संतुलन प्रभावित हुआ। यह बदलाव तकनीकी लग सकते हैं लेकिन इनका असर जमीनी स्तर पर बहुत गहरा होता है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि चुनाव केवल प्रचार और रैलियों से नहीं जीते जाते बल्कि सिस्टम के भीतर होने वाले बदलाव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नेतृत्व का प्रभाव इस बार पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट दिखा। असम में मजबूत और आक्रामक नेतृत्व ने सरकार के खिलाफ संभावित नाराजगी को दबा दिया। वहीं केरल में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नेतृत्व पर सवाल उठने लगे। भ्रष्टाचार के आरोप और थकान का असर साफ दिखा। यह अंतर बताता है कि केवल सत्ता में बने रहना काफी नहीं होता बल्कि जनता के बीच लगातार भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है। जहां यह भरोसा टूटा वहां सत्ता भी हाथ से निकल गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में जो हुआ वह भारतीय राजनीति के लिए एक दिलचस्प मोड़ है। यहां एक फिल्मी सितारे ने अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। यह कोई नई बात नहीं है लेकिन जिस तेजी और पैमाने पर यह बदलाव हुआ उसने सबको चौंका दिया। इसका मतलब यह है कि आज का मतदाता पारंपरिक दलों से हटकर नए विकल्पों को मौका देने के लिए तैयार है। खासकर युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाता ऐसे चेहरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो उन्हें नया और अलग लगता है। यह बदलाव आने वाले समय में अन्य राज्यों में भी देखने को मिल सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं की भूमिका इस चुनाव में निर्णायक रही। पहले उन्हें केवल एक सहायक वोटबैंक माना जाता था लेकिन अब वे खुद एक संगठित और प्रभावशाली वर्ग बन चुकी हैं। अलग अलग राज्यों में महिलाओं को लक्षित करके योजनाएं और वादे किए गए। कहीं नकद सहायता का वादा किया गया तो कहीं सामाजिक सुरक्षा और रोजगार की बात हुई। इसका असर यह हुआ कि महिलाओं ने बड़ी संख्या में मतदान किया और कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित किया। यह ट्रेंड भविष्य की राजनीति को भी दिशा देगा क्योंकि अब कोई भी दल इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सत्ताधारी दलों के पारंपरिक गढ़ भी इस बार सुरक्षित नहीं रहे। पश्चिम बंगाल में जिन सीटों पर एक ही पार्टी का लंबे समय से कब्जा था वहां भी बदलाव देखने को मिला। इसका मतलब यह है कि मतदाता अब केवल परंपरा के आधार पर वोट नहीं दे रहा बल्कि वह विकल्प तलाश रहा है। इसी तरह तमिलनाडु में भी पारंपरिक दो दलों के बीच की राजनीति को एक नए खिलाड़ी ने चुनौती दी। यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती और जनता समय समय पर नए विकल्प तलाशती रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सभी फैक्टर्स को मिलाकर देखा जाए तो यह चुनाव केवल सरकार बदलने का मामला नहीं है बल्कि यह राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत है। अब चुनाव अधिक जटिल हो गए हैं जहां भावनाएं रणनीति नेतृत्व और सामाजिक समीकरण सभी एक साथ काम करते हैं। यह भी स्पष्ट है कि कोई एक फार्मूला सभी राज्यों में काम नहीं करता। हर राज्य की अपनी सामाजिक संरचना और राजनीतिक संस्कृति होती है और उसी के अनुसार रणनीति बनानी पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इन ट्रेंड्स से क्या सीखते हैं। क्या वे केवल ध्रुवीकरण और नैरेटिव पर ध्यान देंगे या फिर विकास और शासन के मुद्दों को भी उतनी ही प्राथमिकता देंगे। मतदाता अब पहले से अधिक जागरूक है और वह केवल वादों से संतुष्ट नहीं होता। उसे परिणाम चाहिए और अगर उसे लगता है कि कोई और विकल्प बेहतर है तो वह बदलाव करने में संकोच नहीं करता।</div>
<div style="text-align:justify;">इस चुनाव ने एक और बात साफ कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। नए खिलाड़ी सामने आ रहे हैं और पुराने दलों को खुद को लगातार अपडेट करना पड़ रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी है क्योंकि इससे जवाबदेही बढ़ती है और जनता को बेहतर विकल्प मिलते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में कहा जा सकता है कि 2026 के चुनाव केवल राजनीतिक घटनाएं नहीं हैं बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत हैं। यहां से जो ट्रेंड्स उभरे हैं वे आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति को नई दिशा देंगे। जो दल इन संकेतों को समझेंगे और समय के अनुसार खुद को ढालेंगे वही भविष्य में सफल होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">      <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 16:31:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकतंत्र की आहुति...!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">चुनाव में कोई हारा है और कोई है जीता,</div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की आहुति में योगदान दें सीखा।</div>
<div style="text-align:justify;">झालमुड़ी का 'करिश्मा' नहीं रहा हैं फीका,</div>
<div style="text-align:justify;">खाई किस-किसने, लगे किसी को तीखा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यहाँ हर कदम पर 'भय' का था वातावरण,</div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं ने बेधड़क किया मतदान वरण।</div>
<div style="text-align:justify;">जिसने दिया भयमुक्त करने का आश्वासन,</div>
<div style="text-align:justify;">वहीं पाएगा कुर्सी, राज्य में अपना शासन।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यूं जनता ने अपना भी फैसला लिख दिया, </div>
<div style="text-align:justify;">निराश न जाने किस-किसको कहाँ किया।</div>
<div style="text-align:justify;">किसी के नेतृत्व ने हारने का रेकार्ड बनाया,</div>
<div style="text-align:justify;">विजय देखों 'वन टाइम' इतिहास लिखाया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यहाँ पे निराश मैंने किसी को भी नहीं किया,</div>
<div style="text-align:justify;">हिमंता को पुनः विकास का जिम्मा दे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178080/sacrifice-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">चुनाव में कोई हारा है और कोई है जीता,</div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की आहुति में योगदान दें सीखा।</div>
<div style="text-align:justify;">झालमुड़ी का 'करिश्मा' नहीं रहा हैं फीका,</div>
<div style="text-align:justify;">खाई किस-किसने, लगे किसी को तीखा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहाँ हर कदम पर 'भय' का था वातावरण,</div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं ने बेधड़क किया मतदान वरण।</div>
<div style="text-align:justify;">जिसने दिया भयमुक्त करने का आश्वासन,</div>
<div style="text-align:justify;">वहीं पाएगा कुर्सी, राज्य में अपना शासन।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यूं जनता ने अपना भी फैसला लिख दिया, </div>
<div style="text-align:justify;">निराश न जाने किस-किसको कहाँ किया।</div>
<div style="text-align:justify;">किसी के नेतृत्व ने हारने का रेकार्ड बनाया,</div>
<div style="text-align:justify;">विजय देखों 'वन टाइम' इतिहास लिखाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहाँ पे निराश मैंने किसी को भी नहीं किया,</div>
<div style="text-align:justify;">हिमंता को पुनः विकास का जिम्मा दे दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">विपक्षी को प्रसाद में केरलम 'उपहार' दिया,</div>
<div style="text-align:justify;">वोट की ताकत ने रंग दिखा सबको रिझाया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:37:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भाजपा के लिए बडी चुनौती होगी  टीएमटी नेटवर्क को तोड़ना </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178074/the-big-challenge-for-bjp-will-be-to-break-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को खत्म कर  यहां विकास के रास्ते खोलना एक बड़ी चुनौती होगी। भर्ती घोटालों के लिए बदनाम बंगाल को गंगा  सागर के जल से पवित्र करना  होगा। इस  सबके  लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पिछले 15 साल  से  बंगाल की नसों में इस कदर समाई हुई है कि उसे केवल चुनावी जीत से बेदखल नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए असली चुनौती शपथ ग्रहण के बाद शुरू होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बंगाल में सत्ता का अर्थ केवल सचिवालय (नबन्ना) पर कब्जा करना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पाड़ा</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहल्ले) और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका कैडर-आधारित ढांचा है। पहले यह केडर बेस ढांचा पहले वामपंथियों के पास था</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इसे  ममता बनर्जी ने एक लंबे और हिंसक संघर्ष के बाद अपने पाले में किया। आज टीएमसी का संगठन केवल एक राजनीतिक दल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में एक साधारण ग्रामीण के लिए टीएमसी का स्थानीय नेता ही कानून है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही रोजगार दिलाने वाला है । वही सामाजिक विवादों का निपटारा करने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दादा</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">है। भाजपा के लिए सबसे पहली और बड़ी बाधा इसी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ-स्तर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के संगठन को तोड़ना है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपना आधार तो बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसका ढांचा अभी भी कई जगहों पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर से नीचे</span>'  <span lang="hi" xml:lang="hi">की ओर है। टीएमसी की जगह लेने के लिए भाजपा को ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साल के 365 दिन जनता के सुख-दुख में साथ खड़े रहें।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">टीएमसी की दादागिरी और गुंडागर्दी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद हिस्सा बन चुकी है। यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मसल पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनी पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का ऐसा गठजोड़ है जो विपक्षी कार्यकर्ताओं को पनपने नहीं देता। भाजपा यदि सरकार बना भी लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे एक ऐसी पुलिस व्यवस्था और प्रशासन को पुनर्जीवित करना होगा जो दशकों से राजनीतिक इशारों पर नाचने का आदी हो चुका है। टीएमसी के कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंडिकेट और वसूली के तंत्र से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आसानी से अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। भाजपा को यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कानून के राज</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को बहाल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वह स्वयं उसी हिंसा के चक्र में न फंस जाए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाजपा की सरकार में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण जान का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास बहाली की इस प्रक्रिया में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विकास</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। टीएमसी ने हमेशा भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">बोहिरागोतो) दल के रूप में चित्रित किया है। इस नैरेटिव को काटने के लिए भाजपा को बंगाली संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा और परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक प्रखरता से साबित करना होगा। केवल जय श्री राम के नारे से बंगाल नहीं जीता जा सकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ के लोगों के मन में महाप्रभु चैतन्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामकृष्ण परमहंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद और रबींद्रनाथ टैगोर के प्रति जो अगाध श्रद्धा है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। सुभाष चंद्र बोस उनके आदर्श हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इन सब को उन्हें  अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक बंगाल का सामान्य नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि भाजपा उसकी संस्कृति की संरक्षक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक पूर्ण विश्वास हासिल करना असंभव है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घुंसपेठियों के लिए महफूज पश्चिमी बंगाल से बाहरी देशों के अवैध प्रवासियों को रोकना भी एक चुनौती होगी।  हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती  और बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती से इस अवैध घुसपैंठियों के हौसले काफी कमजोर हैं।इन्हें पूरी तरह तोड़ना  होगा ।अच्छा यह है  कि कभी  सत्ताकाकेंद्र बिदूं  रही माकपा अब पूरी तरह हाशिंए पर चली गई  वरन कभी  उसकी पश्चिमी बंगाल में वही हालत थी तो वहां आज टीएमसी की हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर बंगाल आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उद्योगों का पलायन और युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सोनार बांग्ला</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप देना होगा। सिंडिकेट राज को खत्म करना केवल पुलिसिया कार्रवाई से संभव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। यदि भाजपा बंगाल में बड़े निवेश लाने में सफल रहती है और आईटी से लेकर विनिर्माण क्षेत्र तक में नौकरियां पैदा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो टीएमसी का कैडर जो आज केवल मजबूरी या लालच में सत्ता से चिपका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धीरे-धीरे बिखरने लगेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती राज्य के जनसांख्यिकीय समीकरण हैं। बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक स्थिर सरकार चलाने के लिए उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतना होगा। टीएमसी का आधार केवल गुंडागर्दी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनकी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी भंडार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कन्याश्री</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। इन योजनाओं ने महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ममता बनर्जी के साथ जोड़ा है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह न केवल इन योजनाओं का बेहतर विकल्प दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह टीएमसी के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसे के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में कितनी जल्दी बदल पाती है। संगठन बनाना ईंट-पत्थर जोड़ने जैसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह लोगों के दिलों में जगह बनाने जैसा है। टीएमसी के घर पर कब्जा करने का मतलब उनके कार्यालयों पर झंडा फहराना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस आम बंगाली के मन से डर निकालना है जो आज अपनी राय जाहिर करने से कतराता है। भाजपा को एक ऐसी समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा जहाँ विकास का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी कट-मनी या राजनीतिक भेदभाव के। यदि भाजपा इस परीक्षा में सफल होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी वह बंगाल में एक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला पाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था का नहीं। बंगाल की मिट्टी को शांति और प्रगति की प्यास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो दल इस प्यास को बुझाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सही मायने में बंगाल का भाग्य विधाता बनेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)  </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:27:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक वोट का सम्मान और लोकतंत्र की विराट शक्ति मतदान केंद्र का संदेश जो पूरे देश के लिए प्रेरणा बना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">गीर के घने जंगलों के बीच स्थापित मतदान केंद्र केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का जीवंत उदाहरण है। जब एक ही मतदाता के लिए पूरा मतदान केंद्र बनाया जाता है तो यह स्पष्ट संदेश देता है कि इस देश में हर नागरिक का वोट बराबर महत्व रखता है। बाणेज क्षेत्र में एकमात्र मतदाता हरिदास बापू के लिए चुनाव आयोग द्वारा की गई यह व्यवस्था दिखाती है कि लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं बल्कि अधिकार और सम्मान की भावना है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के इस दूरस्थ इलाके में जहां पहुंचना भी आसान नहीं</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177389/the-message-of-respect-of-one-vote-and-the-great"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/election-3.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">गीर के घने जंगलों के बीच स्थापित मतदान केंद्र केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का जीवंत उदाहरण है। जब एक ही मतदाता के लिए पूरा मतदान केंद्र बनाया जाता है तो यह स्पष्ट संदेश देता है कि इस देश में हर नागरिक का वोट बराबर महत्व रखता है। बाणेज क्षेत्र में एकमात्र मतदाता हरिदास बापू के लिए चुनाव आयोग द्वारा की गई यह व्यवस्था दिखाती है कि लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं बल्कि अधिकार और सम्मान की भावना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के इस दूरस्थ इलाके में जहां पहुंचना भी आसान नहीं है वहां चुनाव कर्मियों का जाना और पूरी प्रक्रिया को निभाना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी और समर्पण का उदाहरण है। यहां न तो भीड़ है और न ही राजनीतिक शोर लेकिन फिर भी मतदान की पूरी प्रक्रिया वैसी ही होती है जैसी किसी बड़े शहर के मतदान केंद्र पर होती है। यह दिखाता है कि भारत का लोकतंत्र हर परिस्थिति में अपने मूल सिद्धांतों को निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह परंपरा नई नहीं है बल्कि कई वर्षों से चली आ रही है। पहले भरतदास बापू इस केंद्र के एकमात्र मतदाता थे और उनके बाद उनके शिष्य हरिदास बापू इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति का मतदान नहीं बल्कि एक परंपरा का निर्वहन है जो यह बताती है कि लोकतंत्र में भागीदारी एक निरंतर प्रक्रिया है। यह प्रेरणा देता है कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों नागरिक को अपने अधिकार का उपयोग करना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">घने जंगलों में वन्यजीवों के बीच मतदान केंद्र स्थापित करना आसान नहीं होता। चुनाव कर्मियों को कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ता है और हर छोटी बड़ी व्यवस्था का ध्यान रखना पड़ता है। फिर भी यह सब केवल एक वोट के लिए किया जाता है। यह उस सोच को दर्शाता है जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार दिया गया है और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हरिदास बापू का यह कहना कि जब सरकार एक व्यक्ति के लिए इतनी व्यवस्था कर सकती है तो हर नागरिक को मतदान करना चाहिए एक गहरी बात है। यह केवल एक बयान नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक संदेश है। अक्सर देखा जाता है कि शहरों में लोग मतदान के दिन घर पर ही रहते हैं या छुट्टी का आनंद लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह उदाहरण एक आईना है जो उन्हें अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुजरात में हुए स्थानीय स्वराज चुनाव भी इस बात का प्रमाण हैं कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोग लोकतंत्र में अपनी आस्था बनाए रखते हैं। भीषण गर्मी के बावजूद लोगों ने मतदान किया और औसतन अच्छा प्रतिशत दर्ज हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में तो उत्साह और भी अधिक देखने को मिला जहां लोगों ने बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का उपयोग किया। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र की जड़ें गांवों में कितनी मजबूत हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महानगरपालिकाओं में अपेक्षाकृत कम मतदान प्रतिशत जरूर चिंता का विषय है लेकिन यह भी एक अवसर है सुधार का। जब एक व्यक्ति जंगल में मतदान कर सकता है तो शहरों में रहने वाले लोगों के लिए मतदान करना और भी आसान होना चाहिए। यह सोचने की जरूरत है कि आखिर क्यों शहरी क्षेत्रों में मतदान के प्रति उदासीनता देखने को मिलती है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव आयोग की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक निष्पक्ष और पारदर्शी संस्था के रूप में उसने बार बार यह साबित किया है कि वह हर परिस्थिति में लोकतंत्र की रक्षा के लिए तैयार है। चाहे वह दूरदराज का इलाका हो या भीड़भाड़ वाला शहर हर जगह एक समान प्रक्रिया का पालन किया जाता है। यही कारण है कि भारत का चुनावी तंत्र विश्व में सबसे बड़ा और सबसे विश्वसनीय माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कई बार राजनीतिक दल चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हैं और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं। लेकिन बाणेज जैसे उदाहरण इन आरोपों का सीधा जवाब देते हैं। जब एक वोट के लिए इतनी मेहनत और संसाधन लगाए जाते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव आयोग अपने कर्तव्य के प्रति कितना गंभीर है। ऐसे में बिना ठोस आधार के आरोप लगाना न केवल संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाता है बल्कि लोकतंत्र के प्रति लोगों के विश्वास को भी कमजोर करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह जरूरी है कि राजनीतिक दल और नेता अपनी जिम्मेदारी को समझें और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करें। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन वह तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होनी चाहिए। निराधार आरोप केवल भ्रम फैलाते हैं और जनता को गुमराह करते हैं। बाणेज का यह उदाहरण बताता है कि सच्चाई क्या है और व्यवस्था कितनी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मतदान केवल अधिकार नहीं बल्कि एक कर्तव्य भी है। यह वह माध्यम है जिसके जरिए नागरिक अपनी सरकार चुनते हैं और अपने भविष्य को आकार देते हैं। जब लोग मतदान नहीं करते तो वे अपने अधिकार को खो देते हैं और दूसरों को निर्णय लेने का मौका दे देते हैं। इसलिए हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि उसका एक वोट कितना महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के समय में जब तकनीक और सुविधा हर जगह उपलब्ध है तब भी अगर लोग मतदान से दूर रहते हैं तो यह चिंताजनक है। बाणेज का मतदान केंद्र हमें यह सिखाता है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने अधिकार का सम्मान करें और हर चुनाव में भाग लें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि गिर के जंगल में स्थापित यह मतदान केंद्र केवल एक स्थान नहीं बल्कि एक विचार है। यह विचार है समानता का अधिकार का और जिम्मेदारी का। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल सरकार का नहीं बल्कि हर नागरिक का है। इसे मजबूत बनाने की जिम्मेदारी हम सभी की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब एक व्यक्ति के लिए पूरा मतदान केंद्र बनाया जा सकता है तो यह हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है। यह संदेश हमें हमेशा याद रखना चाहिए और अपने जीवन में अपनाना चाहिए। तभी हम एक मजबूत और जागरूक समाज का निर्माण कर पाएंगे जहां हर आवाज सुनी जाएगी और हर वोट की कीमत होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:26:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संस्थागत संस्कृति के सामने खड़ा सियासी व्यवहार का प्रश्न</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र केवल चुनावों और सत्ता परिवर्तन की औपचारिक प्रक्रिया का नाम नहीं है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादा और संस्थागत गरिमा की उस सूक्ष्म परंपरा पर आधारित व्यवस्था है जो शासन को स्थायित्व और विश्वसनीयता प्रदान करती है। जब इस परंपरा में जरा-सी भी दरार पड़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कोई सामान्य-सी घटना भी राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन जाती है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से जुड़ा हालिया विवाद इसी प्रकार का प्रसंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या तीव्र होती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संवैधानिक पदों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172873/question-of-political-behavior-facing-institutional-culture"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र केवल चुनावों और सत्ता परिवर्तन की औपचारिक प्रक्रिया का नाम नहीं है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादा और संस्थागत गरिमा की उस सूक्ष्म परंपरा पर आधारित व्यवस्था है जो शासन को स्थायित्व और विश्वसनीयता प्रदान करती है। जब इस परंपरा में जरा-सी भी दरार पड़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कोई सामान्य-सी घटना भी राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन जाती है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से जुड़ा हालिया विवाद इसी प्रकार का प्रसंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या तीव्र होती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संवैधानिक पदों के प्रति सम्मान धीरे-धीरे केवल औपचारिकता बनकर रह गया है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रपति के मंच से व्यक्त हुए कुछ भावुक शब्दों ने पूरे देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि प्रोटोकॉल महज़ नियमों का संकलन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और उसकी गरिमा को सुरक्षित रखने वाला आवश्यक अनुशासन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान की सबसे गहरी शक्ति उसकी संस्थाओं की गरिमा में निहित होती है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और उन संस्थाओं में राष्ट्रपति का पद राष्ट्र की सर्वोच्च मर्यादा और एकता का जीवंत प्रतीक माना जाता है। इसलिए राष्ट्रपति को केवल एक औपचारिक पद के रूप में देखना संविधान की भावना को सीमित कर देना होगा। जब इस पद पर आसीन व्यक्ति सार्वजनिक मंच से यह अनुभव व्यक्त करे कि उसे उसके पद के अनुरूप सम्मान नहीं मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह महज़ व्यक्तिगत असहजता का प्रसंग नहीं रह जाता। यह उस संवैधानिक संस्कृति की परीक्षा बन जाता है जिस पर भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की नींव टिकी है। किसी भी राज्य की सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह किसी भी दल की क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र की संस्थाओं का सम्मान बनाए रखे। क्योंकि जब संस्थाओं के प्रति आदर कम होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी धीरे-धीरे क्षीण पड़ने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आदिवासी समाज की संवेदनशीलता इस घटना का उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष है। भारत के आदिवासी समुदाय सदियों से अपनी पहचान और सांस्कृतिक सम्मान के लिए संघर्ष करते रहे हैं। ऐसे में जब देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति किसी सांस्कृतिक आयोजन में पहुंचती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रतीकात्मक रूप से पूरे समुदाय के आत्मसम्मान का उत्सव बन जाता है। यदि उस अवसर पर किसी प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही या प्रोटोकॉल की कमी का आरोप लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वाभाविक है कि यह पीड़ा अधिक गहरी महसूस होती है। इसलिए राष्ट्रपति के शब्दों में जो भावुकता दिखाई दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस ऐतिहासिक संवेदनशीलता का प्रतिबिंब भी थी जो आदिवासी समाज से जुड़ी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की राजनीति की एक बड़ी विडंबना यह बन गई है कि लगभग हर घटना को तुरंत राजनीतिक दृष्टि से परखा जाने लगता है। राष्ट्रपति की टिप्पणी सामने आते ही राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का तूफान उठना स्वाभाविक था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने इसे गंभीर विषय बताते हुए संवैधानिक गरिमा का प्रश्न बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दूसरी ओर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने इन आरोपों को राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब संवैधानिक संस्थाएं भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनने लगती हैं। तब वास्तविक मुद्दा—संस्थाओं की प्रतिष्ठा—पृष्ठभूमि में चला जाता है और चर्चा केवल दलगत हितों तक सीमित रह जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटोकॉल को अक्सर महज औपचारिकता समझ लिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उसका असली महत्व उसके संदेश में छिपा होता है। जब किसी राज्य में राष्ट्रपति का स्वागत मुख्यमंत्री या वरिष्ठ मंत्री करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह केवल एक स्वागत समारोह नहीं होता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उस राज्य की ओर से राष्ट्र की सर्वोच्च संस्था के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति होता है। यदि यह परंपरा टूटती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनता के मन में यह संदेश जाता है कि राजनीतिक असहमति संस्थागत मर्यादा से भी बड़ी हो गई है। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं कही जा सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जब संस्थाओं के प्रति सम्मान धीरे-धीरे कम होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे विवाद ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है—क्या हमारे लोकतंत्र में संवाद और संवेदनशीलता की जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी प्रशासनिक कारण से कोई कार्यक्रम अपने मूल स्वरूप में आयोजित नहीं हो पाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे स्पष्ट और संयमित संवाद के माध्यम से सहजता से समझाया जा सकता था। लेकिन जब संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो छोटा सा मतभेद भी गहरे विवाद का रूप ले लेता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल लोकतंत्र की असली ताकत इसी में निहित होती है कि वह मतभेदों और असहमतियों के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रखता है। यदि यह रास्ता संकुचित होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो राजनीतिक टकराव अनावश्यक रूप से तीखे और कटु हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसके साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा भी प्रभावित होने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे प्रसंग को केवल एक राजनीतिक विवाद मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। दरअसल इसे उस चेतावनी के रूप में देखना चाहिए जो लोकतंत्र समय-समय पर अपने आचरण के माध्यम से देता है। संविधान की संस्थाएं तभी वास्तव में मजबूत और विश्वसनीय बनती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उनके प्रति व्यवहार में सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयम और संतुलन स्पष्ट दिखाई दे। राष्ट्रपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री या कोई भी संवैधानिक पद— इन सबकी गरिमा केवल संविधान की किताब में नहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वह राजनीतिक आचरण और सार्वजनिक व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होनी चाहिए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि यह आचरण कमजोर पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो धीरे-धीरे संस्थागत विश्वास भी कम होने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल इस घटना से सबक लें और भविष्य में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार व्यवहार का प्रयास करें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की असली कसौटी सत्ता की जीत-हार में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संस्थाओं के प्रति निभाई जाने वाली सामूहिक जिम्मेदारी में छिपी होती है। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संस्थाएं स्थायी होती हैं और उनका सम्मान ही राष्ट्र की स्थिरता का आधार बनता है। पश्चिम बंगाल की यह घटना चाहे जिस कारण से हुई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक पदों की गरिमा से जुड़ी छोटी-सी चूक भी राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए राजनीति की तीखी धूप के बीच भी लोकतंत्र की यह मर्यादा सुरक्षित रहनी चाहिए—क्योंकि जब संस्थाओं का सम्मान अक्षुण्ण रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित और विश्वसनीय बन पाता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 18:25:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मीडिया और लोकतंत्र के बेहतर संतुलन से समाज को नई दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">  मीडिया का भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका हैl लोकतांत्रिक समाज में मीडिया की भूमिका केवल सूचना पहुँचाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह समाज की चेतना को दिशा देने, सत्ता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करने और जनमानस के विवेक को जाग्रत रखने का दायित्व भी निभाता है। मीडिया वस्तुतः वह आईना है, जिसमें समाज स्वयं को देखता है और सरकार अपनी छवि पहचानती है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इन तीनों स्तंभों की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166259/new-direction-to-society-through-better-balance-of-media-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/india-democracy-media-illustration.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"> मीडिया का भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका हैl लोकतांत्रिक समाज में मीडिया की भूमिका केवल सूचना पहुँचाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह समाज की चेतना को दिशा देने, सत्ता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करने और जनमानस के विवेक को जाग्रत रखने का दायित्व भी निभाता है। मीडिया वस्तुतः वह आईना है, जिसमें समाज स्वयं को देखता है और सरकार अपनी छवि पहचानती है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इन तीनों स्तंभों की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मीडिया की भूमिका ऐतिहासिक रही है। राष्ट्रवादी चेतना के निर्माण में अखबारों और पत्रिकाओं ने जो भूमिका निभाई, वह किसी भी राजनीतिक आंदोलन से कम नहीं थी। इसी परंपरा के संवाहक, स्वतंत्रता सेनानी और महान पत्रकार स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ के पुनः प्रकाशन (1925) के अवसर पर जो आत्मसंयम और नैतिकता की बात कही थी।वह आज के मीडिया परिदृश्य में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उन्होंने लिखा था कि “प्रभु करें, इस सेवा में मुझे अपने दोषों का पता रहे और आडंबर, अभियान और आकर्षण मुझे पथ से भटका न पाए।” यह वाक्य आज के मीडिया के लिए नैतिक उद्घोषणा की तरह है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दो तीन दशकों में मीडिया के स्वरूप में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। प्रिंट मीडिया से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिर डिजिटल और सोशल मीडिया तक की यात्रा ने सूचना को अत्यंत सुलभ बना दिया है। टेलीविजन, सिनेमा, इंटरनेट, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे मंच आज गाँव–गाँव तक अपनी पहुँच बना चुके हैं। परिणामस्वरूप समाज के रहन–सहन, भाषा, व्यवहार, सोच और जीवनशैली पर मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ा है। विशेषकर युवा वर्ग, महिलाएँ और बच्चे इस प्रभाव के सबसे संवेदनशील केंद्र बन गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया की शक्ति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह जनमत का निर्माण करने में सक्षम है। जनमत के निर्माण से ही समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है चाहे वह जनक्रांति हो या लोकतांत्रिक सुधार। इतिहास गवाह है कि मीडिया के दबाव और खुलासों के कारण कई देशों में सरकारें बदलीं और सत्ता के समीकरण उलट गए। भारत में भी चारा घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, मैच फिक्सिंग जैसे अनेक मामलों में मीडिया ने भ्रष्टाचार के पर्दे हटाकर सत्ता को जवाबदेह बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">यूरोप के प्रसिद्ध पत्रकार जिम मॉरिसन का कथन—“जनसंचार माध्यमों पर नियंत्रण करना बुद्धि पर नियंत्रण करना है” मीडिया की शक्ति को रेखांकित करता है। इसी तरह नेपोलियन बोनापार्ट का यह कथन भी ऐतिहासिक है कि “मैं लाखों संगीनों की अपेक्षा तीन विरोधी समाचार पत्रों से अधिक डरता हूँ।” ये वक्तव्य सिद्ध करते हैं कि मीडिया केवल सूचना नहीं, बल्कि सत्ता का संतुलन है।</p>
<p style="text-align:justify;">परंतु आधुनिक मीडिया का दूसरा पक्ष भी उतना ही चिंताजनक है। ग्लैमर, टीआरपी की होड़, सनसनी और पीत पत्रकारिता ने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। पेड न्यूज़, विज्ञापन आधारित कंटेंट और कॉर्पोरेट स्वामित्व ने मीडिया को कई बार जनहित से दूर कर दिया है। आज भारत के अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों का स्वामित्व बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में है, जिनके व्यावसायिक हित कई बार निष्पक्ष पत्रकारिता के मार्ग में बाधा बनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारें भी मीडिया प्रबंधन पर भारी धनराशि खर्च कर अपनी छवि गढ़ने का प्रयास करती हैं। विज्ञापन, सरकारी प्रचार और सूचना नियंत्रण के माध्यम से मीडिया को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। दूसरी ओर, मीडिया संस्थानों की आर्थिक मजबूरियाँ भी वास्तविक हैं—क्योंकि मीडिया चलाना अत्यधिक पूंजी, तकनीक और मानव संसाधन की माँग करता है। ऐसे में व्यावसायिक दबाव और नैतिक दायित्व के बीच संतुलन बनाना मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बावजूद, मीडिया का दायित्व समाप्त नहीं होता। लोकतंत्र में निष्पक्ष, निर्भीक और जिम्मेदार मीडिया ही जनता का वास्तविक मार्गदर्शक बन सकता है। मीडिया का कार्य केवल मनोरंजन या सनसनी फैलाना नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करना है। चुनाव के समय तो मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि वही जनता को नीतियों, विचारधाराओं और नैतिक मूल्यों से अवगत कराता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज जब समाज तीव्र आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है, तब मीडिया को केवल आधुनिकता का वाहक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का संरक्षक भी बनना होगा। आधुनिकता यदि मानवीय मूल्यों से कट जाए, तो वह केवल उपभोक्तावाद बनकर रह जाती है। मीडिया को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक और सूचना की गति के साथ-साथ विवेक, संवाद और सत्य की गति भी बनी रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">अंततः कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र में स्वतंत्र, सशक्त और उत्तरदायी मीडिया की नितांत आवश्यकता है। मीडिया यदि लोकतंत्र का प्रहरी है, तो उसे स्वयं भी नैतिक अनुशासन और आत्मालोचना के दायरे में रहना होगा। जब मीडिया समाज की आवाज़ बने, सरकार को जवाबदेह बनाए और सत्य के पक्ष में निर्भीकता से खड़ा हो—तभी वह अपने चौथे स्तंभ होने की गरिमा को सार्थक कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 18:09:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Kushinagar : एक दिया लोकतंत्र के नाम .......</title>
                                    <description><![CDATA[विधानसभा कुशीनगर में मतदाता जागरूकता दीपदान कार्यक्रम का किया गया भव्य आयोजन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141700/kushinagar-a-given-in-the-name-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/image_search_1716854060914.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कुशीनगर। </strong>लोकसभा सामान्य निर्वाचन 2024 मतदाता जागरूकता अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत सामान्य प्रेक्षक दीपांकर चौधरी, व्यय प्रेक्षक आसवा मनोज राजगोपाल, जिला निर्वाचन अधिकारी/ जिला अधिकारी उमेश मिश्रा , पुलिस अधीक्षक धवल जायसवाल के अध्यक्षता में विधानसभा कुशीनगर तहसील कसया के अंतर्गत हिरण्यवती नदी घाट (बुद्धा घाट) के समीप भव्य दीपदान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उपस्थित समस्त अधिकारियों , मतदातगणों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर सशक्त लोकतंत्र का निर्माण करने एवं 01 जून अपने अपने बूथ पहुंच कर मतदान करने हेतु प्रेरित किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत मतदाता जागरूकता संबंधी सुंदर एवं आकर्षक रंगोलिया भी बनाई गई तथा स्लोगन भी लिखे गए , जो चीख चीख कर मतदान करने हेतु आम जनमानस को मतदान करने हेतु जागरूक कर रहे थे। हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से अधिकारियों सहित मतदाता गणों, बीएलओ , आदि उपस्थित आम जनमानस ने हस्ताक्षर कर मतदान करने एवं कराने का दृढ़ संकल्प लिया । उपस्थित अधिकारियों के द्वारा मतदाता गणों को आमंत्रण पत्र तथा मतदाता पर्ची का वितरण किया गया।दीपदान कार्यक्रम के अंतर्गत जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा शत प्रतिशत मतदान हेतु मतदाता शपथ भी उपस्थित अधिकारी/ कर्मचारी एवं जनमानस को दिलाई। उन्होंने सभी से अपील किया की लोकतंत्र के महापर्व में  मताधिकार का प्रयोग कर सशक्त लोकतंत्र का निर्माण करें। *एक दिया लोकतंत्र के नाम से नई ज्योति जलाकर आसपास के लोगो को भी जागरूक करें*। मतदान दिवस के दिन घर से निकल कर मतदान अवश्य करें। इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक धवल जायसवाल , मुख्य विकास अधिकारी गुंजन द्विवेदी, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट अंकिता जैन, एएसपी अभिनव त्यागी, तहसीलदार कसया धर्मवीर सिंह, नायब तहसीलदार क्षेत्रीय लेखपाल, कानूनगो सहित बीएलओ अधिकारी/ कर्मचारी उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 May 2024 05:30:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकतंत्र महापर्व की कर ले तैयारी बनवा ले अपनी वोटर आईडी कार्ड</title>
                                    <description><![CDATA[27 अक्टुबर से 3 दिसम्बर तक चलेगा मतदाता जोड़ो अभियान करले तैयारी ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136625/prepare-for-the-festival-of-democracy-and-get-your-voter"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/screenshot_2023-11-03-19-17-39-051_com.whatsapp-edit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कुशीनगर। </strong> भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार वर्तमान में अर्हता तिथि 01 जनवरी 2024 के आधार विधान सभा फोटोयुक्त निर्वाचक नामावलियों के पुनरीक्षण का कार्य 27 अक्टुबर से गतिमान है आयोग के अनुसार तिथियां 04 नवम्बर दिन शनिवार से 05 नवम्बर रविवार, 25 नवम्बर शनिवार 26 नवम्बर रविवार, 02 दिसम्बर, शनिवार से 03 दिसम्बर रविवार को विशेष अभियान की तिथि नियत की गयी है। </p>
<p style="text-align:justify;">उक्त तिथि पर सभी बूथ लेबिल अधिकारी, अपने अपने नियत मतदेय स्थलों पर प्रातः 10 बजे से सांय 04 बजे तक उपस्थित रहेगें तथा दावे एवं आपत्तिया तथा फार्म-6, 7 एवं 8 प्राप्त करेगें।उक्त जानकारी उप जिला निर्वाचन अधिकारी श्री वैभव मिश्र ने दी है उन्होंने बताया कि उपरोक्त विशेष अभियान के दिन समस्त उप जिलाधिकारी एवं निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी एवं उप जिलाधिकारी (न्यायिक) कसया एवं निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी 332 फाजिलनगर विधान सभा तथा समस्त सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, सुपरवाइजर तथा अधोहस्ताक्षरी द्वारा भी बूथों का भ्रमण किया जायेगा। भ्रमण के दौरान यदि बूथ लेवल अधिकारी, अनुपस्थित पाया जाता है तो उसके विरूद्ध लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की सुसंगत धाराओं के अन्तर्गत विविध कार्यवाही की जायेगी उक्त अभियान के दिन जनपद के समस्त शिक्षण संस्थान एवं अन्य संस्थान जहाँ मतदेय स्थल स्थापित है। खुले रहेगें।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्हता तिथि 01 जनवरी 2024 को जिनकी आयु 18 वर्ष पूर्ण हो गयी हो अथवा पूर्ण हो रही हो और उनका नाम अभी तक मतदाता सूची में नाम दर्ज नहीं हो पाया है, वे उक्त तिथि को मतदान केन्द्र पर उपस्थित हो कर निर्वाचक नामावली में अपना नाम समिल्लित कराने हेतु फार्म-6 मतदाता सूची से नाम डिलिट किये जाने हेतु फार्म-7 तथा किसी प्रविष्टि को शुद्ध कराने, डुप्लीकेट मतदाता फोटो पहचान पत्र बनवाने स्थान परिवर्तन के लिए फॉर्म-8 भर कर बी०एल०ओ० के पास जमा कर सकते है अथवा आयोग के वेब साइट https://voters.eci.gov.in तथा voter Helpline App के माध्यम से स्वयं आनलाईन पर आवेदन कर सकते है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Nov 2023 20:20:02 +0530</pubDate>
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