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                <title>Anti Naxal Operations - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मुख्यधारा की ओर लौटते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184267/steps-back-towards-mainstream"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1200-675-27246097-thumbnail-16x9-naxal-aspera.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का संकेत भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वालों में एक रीजनल कमेटी सदस्य, दो सब-जोनल कमेटी सदस्य, तीन एरिया कमेटी सदस्य, छह पार्टी सदस्य तथा चार दस्ता सदस्य शामिल हैं। इन सभी ने पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष हथियार डालकर हिंसा का रास्ता छोड़ने की घोषणा की। पुलिस के अनुसार अधिकांश नक्सली पश्चिमी सिंहभूम के कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में सक्रिय थे जबकि दो सदस्य लातेहार क्षेत्र में सक्रिय रहे। यह सभी माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं मिसिर बेसरा उर्फ सागर  तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल के नेटवर्क से जुड़े हुए थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल विरोधी अभियानों ने संगठन की कमर तोड़ दी है। लगातार हो रही मुठभेड़ों, गिरफ्तारी और विकास कार्यों के कारण संगठन का जनाधार कमजोर हुआ है। दूसरी ओर संगठन के भीतर शोषण, संसाधनों की कमी, सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और भविष्य की अनिश्चितता ने भी कई नक्सलियों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार की पुनर्वास नीति उन्हें सम्मानजनक जीवन और रोजगार का अवसर उपलब्ध करा रही है, जिससे उनका भरोसा बढ़ा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को राज्य सरकार की नीति के तहत आर्थिक सहायता, आवास, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा समाज की मुख्यधारा में पुनर्वास की सुविधा दी जाएगी। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप राहत भी दी जाती है। यही कारण है कि अब कई नक्सली संगठन छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने का निर्णय ले रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 93 नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसी अवधि में 45 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है जबकि सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में 22 नक्सली मारे गए हैं। ताजा आत्मसमर्पण के बाद इस वर्ष मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या बढ़कर 61 हो गई है। यह दर्शाता है कि सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि पुनर्वास के माध्यम से स्थायी समाधान की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यदि पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा विभिन्न राज्यों की रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 और वर्ष 2026 के दौरान देशभर में लगभग 1,100 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता चुना है। इनमें सबसे अधिक आत्मसमर्पण छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना में हुए हैं। अकेले झारखंड में भी पिछले दो वर्षों के दौरान सौ से अधिक नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं। यह संख्या बताती है कि माओवादी संगठन के भीतर लगातार असंतोष बढ़ रहा है और उसकी भर्ती तथा संचालन क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2025 में घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव लगभग समाप्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने संयुक्त अभियान चलाए। आधुनिक तकनीक, ड्रोन, बेहतर खुफिया तंत्र, विशेष बलों की तैनाती, सड़कों का निर्माण, मोबाइल नेटवर्क का विस्तार और विकास योजनाओं को तेजी से लागू किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन इलाकों में कभी माओवादी संगठन का मजबूत प्रभाव था वहां अब सरकारी योजनाएं पहुंच रही हैं और स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पेयजल और रोजगार की सुविधाएं पहुंची हैं वहां नक्सलवाद स्वतः कमजोर पड़ा है। आदिवासी युवाओं को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिलने से वे हिंसा के रास्ते से दूर हो रहे हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में पूर्व नक्सली सामान्य जीवन अपनाकर खेती, व्यवसाय, नौकरी और अन्य कार्यों से जुड़ रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र तथा झारखंड के कुछ वन क्षेत्रों में माओवादी संगठन की सीमित मौजूदगी बनी हुई है। संगठन के शीर्ष नेता अभी भी नए सदस्यों की भर्ती और गतिविधियों को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए सुरक्षा बलों की सतर्कता और विकास कार्यों की निरंतरता दोनों आवश्यक हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड में हुए इस ताजा आत्मसमर्पण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हिंसा का रास्ता अंततः विनाश की ओर ले जाता है जबकि लोकतंत्र और विकास का रास्ता सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। जो लोग कभी बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने का सपना देखते थे, वे आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर नए जीवन की शुरुआत करना चाहते हैं। यह परिवर्तन केवल सरकार की सफलता नहीं बल्कि उन परिवारों की भी जीत है जो वर्षों से अपने बच्चों को हिंसा से दूर देखना चाहते थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब बंदूक की जगह शिक्षा होगी, बारूद की जगह विकास होगा और भय की जगह विश्वास का वातावरण बनेगा। झारखंड में लगातार बढ़ते आत्मसमर्पण इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। यदि सुरक्षा अभियान, पुनर्वास नीति और विकास कार्य इसी गति से आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की पहचान हिंसा से नहीं बल्कि विकास, शिक्षा और समृद्धि से होगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और देश के लिए सबसे सकारात्मक संदेश होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:45:24 +0530</pubDate>
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