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                <title>Linguistic Identity - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Linguistic Identity RSS Feed</description>
                
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                <title>हमारी भाषाएँ मर रही हैं, हम अंग्रेज़ी में उनका श्राद्ध कर रहे हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट का हालिया प्रश्न</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">—</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अंग्रेज़ी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है</span>?—<span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ न्यायालय का सवाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की भाषाई चेतना पर दस्तक है। यह बहस अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस मानसिकता की है जिसने आज़ादी के आठ दशक बाद भी भाषा को आत्मसम्मान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैसियत का पैमाना बना रखा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आई अंग्रेज़ी आज विश्वविद्यालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक और कॉरपोरेट जगत की प्रमुख भाषा है। करोड़ों भारतीय इसे शिक्षा और रोज़गार का माध्यम बना चुके हैं</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183429/our-languages-are-dying-we-are-paying-tribute-to-them"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट का हालिया प्रश्न</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अंग्रेज़ी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है</span>?—<span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ न्यायालय का सवाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की भाषाई चेतना पर दस्तक है। यह बहस अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस मानसिकता की है जिसने आज़ादी के आठ दशक बाद भी भाषा को आत्मसम्मान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैसियत का पैमाना बना रखा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आई अंग्रेज़ी आज विश्वविद्यालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक और कॉरपोरेट जगत की प्रमुख भाषा है। करोड़ों भारतीय इसे शिक्षा और रोज़गार का माध्यम बना चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इसे पूरी तरह विदेशी कहना यथार्थ से मुंह मोड़ना होगा। पर क्या लंबे उपयोग से कोई भाषा स्वदेशी हो जाती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वदेशी का आधार इतिहास होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति या सुविधा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय आत्मविश्वास का प्रश्न उठाया है। वही आत्मविश्वास जिसने कभी संस्कृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़िया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमिया और सैकड़ों बोलियों के बल पर विश्व को ज्ञान दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज अपने ही देश में स्वयं को सिद्ध करने के लिए विदेशी भाषा का सहारा खोजता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रश्न का सबसे बड़ा कटघरा हमारी न्याय व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद </span>348 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अधिकांश उच्च न्यायालयों की कार्यवाही व निर्णय आज भी अंग्रेज़ी में होते हैं। विडंबना यह है कि न्याय उसी नागरिक के लिए लिखा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी भाषा नहीं समझता। स्वयं न्यायालय भी मान चुका है कि फैसलों और आदेशों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय तभी सार्थक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह जनता की भाषा में पहुंचे। फिर भी अदालतों में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व निर्विवाद है। लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यदि जनता की भाषा से दूर रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो न्याय और नागरिक के बीच दूरी बनी रहेगी। क्या केवल वर्षों के प्रयोग से अंग्रेज़ी स्वदेशी हो जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या न्याय व्यवस्था को भारतीय भाषाओं से जोड़ना ही लोकतांत्रिक सुधार होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय तक समान पहुंच का है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का सबसे कठोर सत्य यह है कि अंग्रेज़ी भारत में केवल भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्गीय शक्ति का प्रतीक बन चुकी है। यही भाषा कुछ के लिए अवसरों का द्वार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लाखों के लिए अदृश्य दीवार। महंगे विद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईआईटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईआईएम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुराष्ट्रीय कंपनियां और वैश्विक संस्थाएं इसे योग्यता की पहली शर्त मानती हैं। वहीं गांव का प्रतिभाशाली विद्यार्थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दलित-बहुजन युवा और मातृभाषा में शिक्षित लाखों छात्र क्षमता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा की बाधा से पीछे छूट जाते हैं। तीन-भाषा नीति पर वर्षों से जारी बहस और दक्षिण भारत का प्रतिरोध इसी भाषाई वर्चस्व की आशंका का संकेत है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी मान लेने से यह असमानता और गहरी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या हम नई गुलामी को ही वैधता नहीं दे रहे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी सत्ता तलवार से चलती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भाषा के प्रमाणपत्र से चलती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास इस बहस का सबसे ईमानदार साक्षी है। </span>1835 <span lang="hi" xml:lang="hi">में लॉर्ड मैकॉले ने स्पष्ट लिखा था कि उसका उद्देश्य ऐसे भारतीय तैयार करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रक्त और रंग से भारतीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचि और बुद्धि से अंग्रेज़ हों। यह केवल शिक्षा नीति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक उपनिवेश की योजना थी। स्वतंत्र भारत ने राजनीतिक आज़ादी तो पा ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भाषाई स्वाधीनता का संघर्ष अधूरा रह गया। समय के साथ अंग्रेज़ी का स्वरूप भी बदला है। आज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हिंग्लिश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तम्लिश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंग्लिश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी मिश्रित भाषाएं बताती हैं कि भारत हर भाषा को अपना रंग दे सकता है। अंग्रेज़ी भी अब भारतीय अनुभवों से समृद्ध है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह बदलाव हमारी </span>22 <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों की कीमत पर हो रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि नई पीढ़ी मातृभाषा से पहले अंग्रेज़ी में सोचने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल भाषा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का संकेत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया का अनुभव भारत को स्पष्ट संकेत देता है। जापान ने जापानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी ने जर्मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस ने फ़्रांसीसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन ने मंदारिन और इज़राइल ने पुनर्जीवित हिब्रू के बल पर ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान और राष्ट्रीय पहचान को सशक्त बनाया। इन देशों ने अंग्रेज़ी सीखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका उपयोग किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे अपनी पहचान पर हावी नहीं होने दिया। भारत का मार्ग टकराव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलन का होना चाहिए। नई शिक्षा नीति मातृभाषा आधारित शिक्षा पर बल देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियरिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधि की पढ़ाई और बहुभाषी डिजिटल ज्ञान-संसाधन बताते हैं कि ज्ञान अब अंग्रेज़ी की कैद में नहीं है। फिर अंग्रेज़ी को स्वदेशी घोषित करने की जल्दबाज़ी क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असली चुनौती अंग्रेज़ी को हटाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय भाषाओं को उस स्तर तक पहुंचाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ किसी विद्यार्थी का भविष्य उसकी भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा तय करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं सुप्रीम कोर्ट का प्रश्न सबसे अधिक दूरदर्शी बन जाता है। यह हिंदी बनाम अंग्रेज़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर बनाम दक्षिण या किसी भाषा की श्रेष्ठता का विवाद नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस भारत की खोज है जहाँ हर बच्चा मातृभाषा में सोच सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्रीय भाषा से समाज से जुड़े और अंग्रेज़ी के माध्यम से दुनिया से संवाद करे। यही बहुभाषिक भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी कहकर भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोककथाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकविज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्रीय साहित्य और हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियां हाशिए पर चली जाएंगी। लेकिन यदि अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों की भाषा और भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय जीवन की आत्मा बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे प्रतिद्वंद्वी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्पर सहयोगी होंगी। भाषा का भविष्य प्रतिस्पर्धा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व सुरक्षित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे बड़ा भ्रम यही है कि स्वदेशी का अर्थ केवल उत्पत्ति से है। भारत का इतिहास बताता है कि उसने अनेक संस्कृतियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारों और भाषाओं को अपनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपनी आत्मा कभी नहीं खोई। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न महिमामंडन। असली प्रश्न यह है कि निर्णय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान और आने वाली पीढ़ी के सपनों की भाषा कौन होगी। यदि प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोध और तकनीकी शिक्षा भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अंग्रेज़ी कभी चुनौती नहीं बनेगी। लेकिन यदि भारतीय भाषाएं घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविता और उत्सव तक सिमट गईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अंग्रेज़ी सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान व अवसर की भाषा बन गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही मानसिक असमानता लौटेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी नींव औपनिवेशिक शासन ने रखी थी। गुलामी केवल विदेशी शासन से नहीं आती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तब भी आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई समाज अपनी भाषा पर विश्वास खो देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कोई भाषाई निर्णय नहीं दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत के सामने एक मूल प्रश्न रख दिया—क्या भाषा केवल सुविधा का माध्यम होगी या राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों का द्वार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भारत की सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना और सांस्कृतिक चेतना भारतीय भाषाओं में ही जीवित हैं। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न उसे स्वदेशी मानकर भारतीय भाषाओं का विकल्प बनाना। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ न्याय जनता की भाषा में मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा मातृभाषा में विकसित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक हर भारतीय भाषा को समान अवसर दे और अंग्रेज़ी दुनिया से संवाद का सेतु बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभुत्व का नहीं। अंततः यह बहस अंग्रेज़ी की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के भाषाई आत्मविश्वास की है। जो राष्ट्र अपनी भाषाओं को सम्मान देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही अपने ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और भविष्य को भी सुरक्षित रखता है। भारत की वास्तविक भाषाई स्वतंत्रता अंग्रेज़ी को स्वदेशी सिद्ध करने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय जीवन का स्वाभाविक आधार बनाने में है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 21:50:43 +0530</pubDate>
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