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                <title>प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183198/steps-towards-natural-farming"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि जल संरक्षण, कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संतुलन और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय ने सौराष्ट्र क्षेत्र के विभिन्न जिलों में मिट्टी के नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्राकृतिक खेती के प्रभावों का अध्ययन किया।  इस शोध में सामने आया कि जिन खेतों में लगातार पांच वर्षों तक प्राकृतिक खेती अपनाई गई, वहां मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा 0.45 प्रतिशत से बढ़कर 0.93 प्रतिशत तक पहुंच गई। किसी भी कृषि भूमि के लिए ऑर्गेनिक कार्बन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यही मिट्टी की उर्वरता, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और पौधों के पोषण का आधार होता है। ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ने का अर्थ है कि मिट्टी अधिक जीवंत, उपजाऊ और दीर्घकाल तक उत्पादन देने में सक्षम हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शोध में यह भी पाया गया कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले खेतों में वर्षा और सिंचाई का पानी पहले की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में मिट्टी के भीतर समा रहा है। पानी के समाने की दर 6.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा से बढ़कर 14.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा हो गई। इससे वर्षा जल का बेहतर संरक्षण संभव हुआ और भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिला। इसी प्रकार मिट्टी की नमी संग्रहण क्षमता 12.75 प्रतिशत से बढ़कर 19.84 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका सीधा लाभ किसानों को सूखे की स्थिति में मिलता है क्योंकि मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है और फसलों को बार-बार सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;">मिट्टी की संरचना में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी की छिद्रता 34.63 प्रतिशत से बढ़कर 41.08 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिलना संभव हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं मिट्टी का घनत्व भी कम हुआ, जिससे भूमि अधिक भुरभुरी और खेती के लिए अनुकूल बनी। ऐसी मिट्टी में जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधे अधिक स्वस्थ रहते हैं। सौराष्ट्र के विभिन्न जिलों में किए गए अध्ययन से यह भी सामने आया कि ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा हर जिले में अलग-अलग है। पोरबंदर की मिट्टी में सबसे अधिक 0.82 प्रतिशत ऑर्गेनिक कार्बन दर्ज किया गया, जबकि गिर सोमनाथ में 0.75 प्रतिशत और जूनागढ़ में 0.72 प्रतिशत पाया गया। दूसरी ओर सुरेंद्रनगर, भावनगर और जामनगर में यह मात्रा अपेक्षाकृत कम रही। पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र का औसत ऑर्गेनिक कार्बन 0.57 प्रतिशत दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती का विस्तार होगा, वहां यह स्तर आने वाले वर्षों में और बेहतर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सीमित उपयोग, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोलों का प्रयोग तथा न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। शोध के अनुसार प्राकृतिक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष चार से आठ टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का जलवायु लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहयोगी बनती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज प्राकृतिक खेती को केवल वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं बल्कि "क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर" के रूप में देखा जा रहा है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और जल संकट जैसी परिस्थितियों में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। कम लागत, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता इसे भविष्य की कृषि व्यवस्था का मजबूत आधार बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में हजारों किसान इस पद्धति को अपना चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारें भी प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं। किसानों के सफल अनुभव दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जो किसान पहले रासायनिक खेती छोड़ने को लेकर आशंकित थे, वे अब प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम देखकर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का आर्थिक पक्ष भी किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और महंगे कृषि रसायनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर, गोमूत्र, जैविक अवशेष और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसके साथ ही प्राकृतिक तरीके से उत्पादित खाद्यान्न, फल और सब्जियों की बाजार में मांग भी बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बन रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी प्राकृतिक खेती का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्यान्न उपभोक्ताओं को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हैं। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के कारण लोग प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे किसानों के लिए नए बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का शोध यह स्पष्ट संदेश देता है कि प्राकृतिक खेती केवल भावनात्मक या पारंपरिक विचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित एक प्रभावी कृषि प्रणाली है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने, खेती की लागत कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे अनेक क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। यदि देश में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ता है, तो यह केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास के राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी नई दिशा देगी। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का यह शोध इसी परिवर्तन की मजबूत वैज्ञानिक पुष्टि है और यह विश्वास जगाता है कि भविष्य की समृद्ध खेती प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:09:50 +0530</pubDate>
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