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                <title>rahul gandhi congress - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>rahul gandhi congress RSS Feed</description>
                
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                <title>पांच राज्यों के चुनाव में बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173809/changing-equations-in-elections-of-five-states"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और कल्याणकारी योजनाओं के संतुलन पर है, जबकि विपक्षी दल क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक न्याय और लोकल मुद्दों के सहारे मुकाबला कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम में जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने विकास मॉडल, बुनियादी ढांचे के विस्तार और ‘असमिया अस्मिता’ की रक्षा को मुख्य मुद्दा बना रही है, वहीं पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा की रणनीति पूरी तरह अलग और अधिक जटिल दिखाई देती है। असम में भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है और यहां उसका फोकस सत्ता बनाए रखने पर है, जबकि बंगाल और दक्षिण भारत में वह विस्तारवादी रणनीति के तहत नई सामाजिक और राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में मुकाबला मुख्यतः भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच केंद्रित है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने इस बार 103 नए चेहरों को मैदान में उतारकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। फिल्मी सितारों की संख्या घटाकर आम और जमीनी स्तर से जुड़े उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि टीएमसी एंटी-इन्कम्बेंसी को कम करने और नए वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति अपना रही है। इसके जवाब में भाजपा का फोकस ‘परिवर्तन’ के नारे, भ्रष्टाचार के आरोप, केंद्रीय योजनाओं के लाभ और ‘डबल इंजन सरकार’ के वादे पर है। भाजपा बंगाल में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और घोटालों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है, जिससे वह शहरी और मध्यम वर्ग के साथ-साथ युवा मतदाताओं को अपने पक्ष में कर सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल में भाजपा की एक और महत्वपूर्ण रणनीति हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थानीय पहचान के साथ जोड़ने की है, जिसमें धार्मिक स्थलों, परंपराओं और त्योहारों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है। हालांकि यह रणनीति पूरी तरह सफल होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा स्थानीय बंगाली अस्मिता के साथ कितनी सहजता से खुद को जोड़ पाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, लेकिन यहां पार्टी लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। केरल की राजनीति परंपरागत रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच घूमती रही है, लेकिन भाजपा अब इस द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ने की कोशिश में है। भाजपा का फोकस यहां सबरीमाला मंदिर मुद्दा, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण, और केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों को जोड़ने पर है। साथ ही पार्टी ईसाई समुदाय के साथ भी संवाद बढ़ाकर सामाजिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में भाजपा की चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि यहां द्रविड़ राजनीति का गहरा प्रभाव है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बीच पारंपरिक मुकाबले में भाजपा खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। यहां भाजपा का चुनावी विजन ‘संस्कृति बनाम द्रविड़ विचारधारा’ के साथ-साथ विकास और निवेश को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाएं और राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय संदर्भ में प्रस्तुत करना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सभी राज्यों में भाजपा जिन प्रमुख मुद्दों पर जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, उनमें सबसे पहले विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार है। सड़क, रेलवे, डिजिटल कनेक्टिविटी और रोजगार के अवसरों को पार्टी अपने सबसे बड़े उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरा बड़ा मुद्दा ‘डबल इंजन सरकार’ का है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से विकास तेजी से होता है। तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा कल्याणकारी योजनाएं हैं, जैसे मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और पीएम आवास योजना, जिनके लाभार्थियों को भाजपा अपने स्थायी वोट बैंक में बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सख्ती और भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी भाजपा के चुनावी अभियान का हिस्सा हैं। वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भी कई राज्यों में पार्टी के लिए प्रभावी हथियार बने हुए हैं, हालांकि दक्षिण भारत में इसे अधिक सावधानी से इस्तेमाल किया जा रहा है।इस बार के चुनावों में यह भी देखने को मिल रहा है कि भाजपा स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रही है, ताकि यह धारणा खत्म की जा सके कि पार्टी केवल केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर है। साथ ही सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और डेटा आधारित चुनावी रणनीति का भी व्यापक उपयोग किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्षी दल भी अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं। बंगाल में टीएमसी जहां ‘दीदी के 10 संकल्प’ और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं और गरीब वर्ग को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं केरल में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस बदलाव का नारा दे रही है। इन सबके बीच चुनावी मुकाबला केवल नीतियों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और धारणा का भी बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता का संघर्ष नहीं हैं, बल्कि यह भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार, विपक्ष की एकजुटता और भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने वाले हैं। भाजपा जहां विकास, राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर उसे चुनौती दे रहा है। आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि क्या भाजपा अपनी रणनीति में सफल होती है या फिर क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बनाए रखते है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:18:24 +0530</pubDate>
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                <title>आखिर आतंकवादी नंबर एक कौन ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आजकल देश अपने यहां के आतंकी नंबर -1  की तलाश में है। भाजपा और शिवसेना [शिंदे गुट ] ने ये तलाश शायद पूरी कर ली है इसीलिए इन दोनों दलों के नेता देश के आतंकी नबर वन के रूप में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का नाम लेने में गर्व महसूस कर रहे हैं। लेकिन देश में किसका आतंक है और कौन नंबर वन का आतंकी है ये कहने की जरूरत नहीं है। पूरा देश इस हकीकत से भली भाँती वाकिफ है। राहुल गाँधी  को देश का नंबर वन आतंकी बताने वाले भाजपा सरकार के रेल राज्य मंत्री</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/144917/after-all-who-is-terrorist-number-one"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-09/rahul-gandhi.jpg" alt=""></a><br /><p>आजकल देश अपने यहां के आतंकी नंबर -1  की तलाश में है। भाजपा और शिवसेना [शिंदे गुट ] ने ये तलाश शायद पूरी कर ली है इसीलिए इन दोनों दलों के नेता देश के आतंकी नबर वन के रूप में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का नाम लेने में गर्व महसूस कर रहे हैं। लेकिन देश में किसका आतंक है और कौन नंबर वन का आतंकी है ये कहने की जरूरत नहीं है। पूरा देश इस हकीकत से भली भाँती वाकिफ है। राहुल गाँधी  को देश का नंबर वन आतंकी बताने वाले भाजपा सरकार के रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को तो इस खोजपूर्ण काम के लिए आगामी गणतंत्र  दिवस पर पदम् सम्मान से अलंकृत किया जाना चाहिए। कम से कम भाजपा में एक आदमी तो है जो दुनिया का सबसे बड़ा सच कहें या झूठ पूरी जिम्मेदारी से बोल रहा है।</p>
<p> बिट्टू को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं है कि उनके इस आरोप से उनकी सरकार की रेल डिरेल हो सकती है। बिट्टू भाजपा के नए मुल्ले हैं ,इसलिए शायद ज्यादा प्याज खा रहे हैं। उनका कोई दोष भी नहीं है। भाजपा के गुणसूत्रों में ही ऐसा कुछ है कि अच्छा खासा आदमी भी यहां आकर बौरा जाता है। कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्वा शरमा  और ज्योतिरादित्य सिंधिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी को देश का नंबर वन आतंकवादी कहे जाने पर अपना गुस्सा प्रकट किया है। स्वाभाविक है लेकिन कांग्रेसियों ने जिन लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत की है उनके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा? इस देश में जिस तरह की न्याय संहिता है उसमें ऐसे सम्भाषण पर सजा का कोई प्रावधान नहीं है।</p>
<p>ऐसे सम्भाषण करने वालों को तो उनकी पार्टी सम्मानित करती है। मुमकिन है कि बिट्टू   सर को प्रधानमंत्री फुल टाइम रेल मंत्री बना दें ,राहुल गांधी को गरियाने के एवज में। राहुल गांधी देश की सियासत में नंबर वन के आतंकवादी हैं या नहीं ये देश की जनता ने 4  जून 2024  को दिए अपने जनादेश के जरिये जता दिया है ,बता दिया है। जनादेश के चलते ही राहुल गांधी आज लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। राहुल को देश का नंबर वन आतंकी कहने का मतलब इस देश का समूचा विपक्ष आतंकी है और विपक्ष के आतंक से सत्ता पक्ष थर-थर काँप रहा है। हालाँकि ये अतिश्योक्ति हो सकती है। इसके ऊपर विवाद भी हो सकता है क्योंकि इस देश में आतंकियों को पहचानने को लेकर हमेशा भ्रम की स्थितियां रहीं हैं। इसी देश में बहुत से लोग हैं जो राहुल की वजाय दूसरे लोगों को आतंकी मानते हैं।</p>
<p>देश में ग्यारहवें साल में किसका आतंक है ये चिन्हित करना आसान काम नहीं है। क्योंकि ये राष्ट्रद्रोह माना जायेगा। और कम से कम मेरे जैसा अदना सा लेखक तो ये जोखिम ले ही नहीं सकता। मुझे न संविधान का संरक्षण हासिल हो पायेगा और न राजनीतिक संरक्षण/ये तो नसीब वालों को ही हासिल है। बिट्टू हों या बिट्टा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दुनिया जानती हैकि राहुल गांधी किस तरह के आतंकवादी हैं? उनकी दादी और उनके पिता गोलियों और बारूद से शायद इसलिए नहीं भूने गए कि वे बहुत बड़े देश सेवक हैं ,बल्कि उनकी हत्या शायद इसीलिए की गयी की वे देश के सबसे बड़े आतंकवादी थे।</p>
<p>यदि इस देश में इस तरह के लोग आतांकवादी माने जायेंगे तो इस देश के सनातनी होने पर कम से कम मुझे तो गर्व नहीं होगा। मै उन लोगों में से नहीं हूं जो उंगली काटकर शहीद होने वालों को अपना नायक मानते हैं। ऊँगली काटकर शहीद होने वालों की संख्या इस समय देश में लगातार बढ़ रही है और सीने पर गोली खाने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है। आपको यह बताना आवश्यक है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के खिलाफ विवादित और धमकी भरे बयान देने के लिए कांग्रेस नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के चार नेताओं के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।</p>
<p>जिन नेताओं के खिलाफ शिकायत दी गई है उनमें रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू भी शामिल हैं। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने बुधवार सुबह दिल्ली के तुगलक रोड थाने में यह शिकायत दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने दिल्ली में पिछले सप्ताह राहुल गांधी को जान से मारने की धमकी दी है। माकन के मुताबिक, भाजपा नेता ने कहा था कि राहुल गांधी संभल जाओ नहीं तो आपका भी वही हाल हुआ होगा जो आपकी दादी का हुआ था।</p>
<p>सवाल ये है कि यदि राहुल गांधी को केंद्र सरकार का एक मंत्री देश का नंबर आंतकी मानता है तो सरकार मौन क्यों है ? क्यों नहीं राहुल गांधी को गिरफ्तार कर जेल भेजती ? और यदि सरकार को अपने मंत्री के बयान पर यकीन नहीं है तो उसे विक्षप्त मानकर फौरन मंत्रिमडल से बाहर क्यों नहीं करती? क्या सरकार नहीं मानती कि रेल राज्य मंत्री के बयान से दुनिया में सरकार के निकम्मेपन को लेकर बदनामी नहीं हुई  होगी। क्या दुनिया ये नहीं सोचेगी कि भारत में कैसी सरकार है जिसके रहते देश की संसद में पतिपक्ष का नेता देश का नंबर वन आतंकी है मुझे पता है और पूरे देश को पता है कि देश कि सियासत में राहुल के लिए सुभाषित वाक्य बोलने वालों का संरक्षक कौन है?</p>
<p>किसने इस तरह कि जहरीली शब्दावली का इस्तेमाल शुरू किया था ।  एक जमाने में कांग्रेस के विद्वानों ने भी देश के प्र्धानमंत्री माननीय मोदी जी के लिए भी इसी तरह के सुभाषित इस्तेमाल किये थे,लेकिन राहुल ने इस पर रोक लगा दी। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंदी रहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ बयानबाजी को बंद कराया था। बिट्टू तो बिट्टू हैं उन्हें कोसने से क्या लाभ ? वे तो वही कर रहे हैं जिससे उनके आका खुश हों ।  उनके  आकाओं ने अभी हाल ही में जमशेदपुर में कांग्रेस ,राजद और झामुमो को झारखंड का दुश्मन कहा था। आकाओं को खुश रखना गुलामों का काम होता ही है। अब बिट्टू कोई राहुल गांधी का स्तुतिगान तो करने से रहे। इसलिए उन्हें माफ़ कर देना चाहिये।</p>
<p>राहुल और उनके परिवार ने तो इंदिरा गाँधी और राहुल गांधी के हत्यारों तक को माफ़ कर दिया था ।  बिट्टू तो बिट्टू है।  उन्होंने अभी तक कोई जघन्य अपराध नहीं किया है सिवाय जुबानी जमाखर्च के। सियासी सुभाषितों का इस्तेमाल करने वालों में  केंद्रीय मंत्री बिट्टू अकेले नहीं हैं। उनके  अलावा दिल्ली के पूर्व भाजपा विधायक, महाराष्ट्र के शिवसेना विधायक और उत्तर प्रदेश के एक मंत्री का नाम भी  है। आपको हैरानी नहीं होना चाहिए कि आने वाले दिनों में सत्तापक्ष के नेता ही नहीं बल्कि उनकी मातृ  संस्था के लोग भी बिट्टू कि तर्ज पर विपक्षी नेताओं के लिए नए-नए प्रतिमान गढ़ने लग जाएँ। नागपुर का इसमें कोई दोष नहीं है।</p>
<p>दोष है नागपुर के शाखामृगों के लिए रचे गए पाठ्यक्रम का। नितिन गडकरी जैसे लोग इस भाषा से कैसे अनभिज्ञ हैं ये हैरानी की बात है। जैसा कि आप जानते हैं कि जिस तरह शिबाबू ] स्वमूत्र ]  के प्रयोग से देश के एक प्रधानमंत्री का स्वास्थ्य ठीक रहता था उसी तरह गालियां खाकर एक और प्रधानमंत्री स्वस्थ्य रहते है।  राहुल गांधी को भी मान लेना चाहिए कि उन्हें  जो उपमाएं दी जा रहीं हैं वे उनके स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद साबित होंगीं ,क्योंकि - ये पब्लिक है ,ये सब जानती है। असली आतंकवादियों  को भी और नकली आतंकवादियों  को भी। इस देश में आतंकवाद  कि फसल पनपती नहीं है  ,फिर चाहे उसकी फसल किसी gurudware  में बोई जाये या किसी मदरसे या मंदिर में।</p>
<p><strong>राकेश अचल </strong></p>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Sep 2024 17:35:24 +0530</pubDate>
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                <title>राहुल विदेश में जाकर भारत के खिलाफ विषवमन क्यों करते हैं? </title>
                                    <description><![CDATA[<div>कांग्रेस नेता एवं लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर से विदेशी धरती पर भारत के खिलाफ जमकर उगला है । वह हाल ही में अमेरिका के दौरे पर थे और  वहां वे भारत के विरोध में बोलते हुए चीन के गुणगान कर रहे थे , जबकि यह सभी जानते हैं कि चीन भारत का कभी भी मित्र नहीं रहा है। अमेरिका में बैठकर राहुल भारत से बेहतर चीन को बता रहे हैं और भाजपा संघ को निशाना बना रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी धरती से भारत के खिलाफ बोला हो,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/144821/why-does-rahul-go-abroad-and-spew-venom-against-india%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-09/fdsgh.webp" alt=""></a><br /><div>कांग्रेस नेता एवं लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर से विदेशी धरती पर भारत के खिलाफ जमकर उगला है । वह हाल ही में अमेरिका के दौरे पर थे और  वहां वे भारत के विरोध में बोलते हुए चीन के गुणगान कर रहे थे , जबकि यह सभी जानते हैं कि चीन भारत का कभी भी मित्र नहीं रहा है। अमेरिका में बैठकर राहुल भारत से बेहतर चीन को बता रहे हैं और भाजपा संघ को निशाना बना रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी धरती से भारत के खिलाफ बोला हो, इससे पहले भी कई बार  अपने विदेशी दौरे के दौरान भारत के खिलाफ बयान बाजी कर चुके हैं। उनके इस रवैए को क्या कहा जाए, क्या यह देशद्रोह नहीं है? क्या उन्हें अपने देश से प्रेम नहीं है। भारत में रहकर सरकार की खिंचाई करना तो समझ में आता है लेकिन विदेशी धरती पर भारत के खिलाफ बोलना कहां तक न्यायसंगत है। भारत में रहकर सरकार की बुराई करते करते वे यह भूल जाते हैं, उन्हें विदेशी धरती पर भारत को लेकर क्या बोलना है। राहुल गांधी अब एक जिम्मेदार नेता है।</div>
<div> </div>
<div>वे सांसद तो हैं ही, साथ ही संसद में विपक्ष के नेता भी हैं। विपक्ष के नेता को यह समझना चाहिए कि उन्हें कब, कहां क्या बोलना है। उनकी इसी हरकत के कारण भारत की जनता उन्हें कई नामों से पुकारती है। जब उन्हें पप्पू कहा जाता है तो उनकी बहन प्रियंका वाड्रा कहती हैं कि वे पप्पू नहीं है। उन्हें पप्पू कहकर उनकी छवि को धूमिल करना बताया जाता है। </div>
<div> राहुल गांधी बार-बार विदेश में जाकर बिना सिर-पैर की बातें करते हैं। ऐसे-ऐसे बयान देते हैं जो देश के खिलाफ तो होता ही है लेकिन साथ ही सचाई से भी दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता। राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं, संसदीय लोकतंत्र में विपथ का प्रथम चेहरा हैं। नेता प्रतिपक्ष के पद पर आसीन होने के बावजूद राहुल गांधी के व्यवहार में संसद के भीतर भी परिपक्वता और जिम्मेदारी भरे व्यवहार की समस्या बनी रहती है लेकिन यह नितान्त असहनीय और गैरजिम्मेदाराना हरकत है कि राहुल गांधी विदेशी दौरे के. दौरान तमाम प्रोटोकाल को दर किनारे कर देश की प्रतिष्ठा को धूमिल करें।</div>
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<div>यह राहुल गांधी की राजनीति है अथवा वह वाकई भारत को कमतर साबित करने पर आमादा रहते हैं, लेकिन यह तय है कि वह अक्सर गलत, भ्रामक और अनावश्यक तथ्य पेश करते हैं। ताजा संदर्भ सिखों का है। अमरीकी प्रवास के दौरान उन्होंने मंच से एक सिख नौजवान का नाम पूछा और फिर आशंका जताई कि सिख भारत में पगड़ी और कड़ा पहन पाएंगे या नहीं। वे गुरुद्वारे में प्रवेश पा सकेंगे या नहीं? राहुल की यह सवालिया आशंका निर्मूल है, क्योंकि भारत में ऐसी स्थिति नहीं है। कहीं भी पगड़ी या फिर सिखों के किसी भी धार्मिक प्रतीकों पर पाबंदी नहीं है। राहुल ने दावा किया कि वह यह लड़ाई लड़ रहे हैं। सवाल है कि किसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि ऐसे हालात ही नहीं हैं। सिखों को भारत में ठीक उतनी ही आजादी और अधिकार हासिल है, जितना किसी दूसरे धर्म के नागरिक को हासिाल है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और इसलिए वहां व्यक्ति को आजादी और अधिकार धर्म देखकर न मिलते हैं और न ही धर्म के आधार पर छिनते हैं। ऐसे राहुल गांधी ऐसे बनान क्यों दे रहे हैं नह समझ से परे है?</div>
<div> </div>
<div>यही नहीं अमेरिका में उनके साथ गये उनके सलाहकार सैम पित्रोदा भी उनका यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी पप्पू नहीं हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का एजेंडा कुछ बड़े मुद्दे को संबोधित करना है। जो करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए गए भाजपा के विजन से बिल्कुल अलग है। वह उच्च शिक्षित हैं। वह किसी भी विषय पर गहरी सोच रखने वाले रणनीतिकार हैं। सैम पित्रोदा भले ही उनका बचाव करें लेकिन जिस तरह से वे विदेश में जाकर भारत के खिलाफ बोलने लगते हैं, उसे एक परिपक्व नेता का बयान नहीं कहा जा सकता है। इससे एक बार फिर यह सिद्ध होता है कि राहुल गांधी, आज भी देश को बांटने वाले तत्वों के साथ मिले हुए हैं और टुकड़े-टुकड़े गिरोह का नेतृत्व कर रहे हैं। राहुल गांधी चीन के चंदे पर पलने वाले भारत विरोधी एक मोहरे से अधिक और कुछ भी नहीं हैं। इससे यह भी साबित होता है कि वे टुकड़े टुकड़े कहने वाले गैंग के सरगना हैं।</div>
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<div>राहुल गांधी का यह कहना कि भारत में सबकुछ मेड इन चाइना है। यह भारत के उन लोगों का अपमान है जो आज देश को आत्मनिर्भर बनाने में लगे जी जान से जुटे हुए हैं। आज भारत न केवल अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो चुका है बल्कि सैन्य क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर चुका है। भारत के कुशल श्रमिक और कर्मचारी स्वदेशी तरीके से बहुत सी चीजें बना रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी उनका अपमान कर रहे हैं। इससे साबित होता है कि राहुल की जड़ें भारत की मिट्टी से जुड़ी नहीं हैं। उनका भारतीय लोगों, उनकी संस्कृति और परंपराओं से कोई लेना-देना नहीं है। राहुल गांधी को तो इस बात का गर्व होना चाहिए कि भारत आज कई मामलों में आत्मनिर्भर हो चुका है। इसकी उन्हें विदेश में जाकर न केवल प्रचार करना चाहिए बल्कि सीना फुलाकर कहना चाहिए कि आज भारत सभी तरह से संपन्न होता जा रहा है।</div>
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<div>दुनिया की निगाहें भारत की ओर हैं। यूक्रेन और रुस जैसे देश यह मानने लगे हैं कि उनका युद्ध भारत ही खत्म करा सकता है। मोदी के नेतृत्व में आज भारत आत्मनिर्भर' बनने की ओर है और जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।इतना ही नहीं अमेरिका दौरे के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा बंग्लादेश के हिन्दू उत्पीड़न के मामले में एक सवाल पूछने पर राहुल की टीम के लोगों ने जिस तरह एक पत्रकार को आधा घंटा तक एक कमरे में बंद कर प्रताड़ित किया वह भी बहुत शर्मनाक और दंडनीय हरकत है। ऐसे समय में जब कुछ विदेशी ताकतों के विस्तारवाद के कारण भारत की प्रगति उन्हे रास नहीं आ रही है तब राहुल गांधी की इस तरह की हरकत निश्चित रूप से शर्मनाक है। ऐसे नेता को जनता इसी कारण से नकार देती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong> (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Sep 2024 17:12:29 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>राहुल गांधी ने 5 मिनट लंबा मणिपुर दौरे का वीडियो शेयर किया, PM मोदी से यह खास अपील की</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को मणिपुर में राहत शिविरों के अपने दौरे का एक वीडियो 'एक्स' पर पोस्ट किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जातीय हिंसा प्रभावित राज्य का दौरा करने का आग्रह किया। पांच मिनट लंबे वीडियो में कांग्रेस सांसद ने बताया कि मणिपुर अभी भी संकट में है। राहुल गांधी ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, ''घर जल रहे हैं, निर्दोष लोगों की जान खतरे में है और हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।''</p>
<p>मणिपुर के जिरीबाम राहत शिविर की एक महिला वीडियो में कहती है कि उसकी दादी अभी</p></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/143056/rahul-gandhi-shared-a-5-minute-long-video-of-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-07/sdgg1.jpg" alt=""></a><br /><div>
<p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को मणिपुर में राहत शिविरों के अपने दौरे का एक वीडियो 'एक्स' पर पोस्ट किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जातीय हिंसा प्रभावित राज्य का दौरा करने का आग्रह किया। पांच मिनट लंबे वीडियो में कांग्रेस सांसद ने बताया कि मणिपुर अभी भी संकट में है। राहुल गांधी ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, ''घर जल रहे हैं, निर्दोष लोगों की जान खतरे में है और हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।''</p>
<p>मणिपुर के जिरीबाम राहत शिविर की एक महिला वीडियो में कहती है कि उसकी दादी अभी भी संघर्ष वाली जगह पर फंसी हुई है और उन्हें उसके ठिकाने के बारे में नहीं पता है। उन्होंने कहा, ''अगर हम उनसे संपर्क भी करें तो न तो वह यहां आ सकती हैं, न ही हम वहां जा सकते हैं।'' असम के थलाई में एक राहत शिविर में एक महिला ने कहा कि चिकित्सकीय लापरवाही के कारण उसने अपने भाई को खो दिया है। उसने कहा कि उसके भाई की जान इसलिए चली गई क्योंकि सरकार की ओर से पर्याप्त चिकित्सा देखभाल उपलब्ध नहीं थी। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी शिविर में दवाओं के लिए मदद करेगी।</p>
<p>मई 2023 में हिंसा भड़कने के बाद तीसरी बार मणिपुर का दौरा करते हुए, राहुल गांधी ने कहा कि आज भी राज्य दो हिस्सों में बंटा हुआ है और उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी से व्यक्तिगत रूप से राज्य का दौरा करने, लोगों की समस्याएं सुनने और शांति की अपील करने का आग्रह किया। पोस्ट किए गए वीडियो में, राहुल गांधी कई लोगों को सांत्वना दे रहे हैं जो राज्य में जातीय झड़पों के बारे में अपना दुख व्यक्त कर रहे हैं।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने लिखा कि मणिपुर में हिंसा शुरू होने के बाद, मैं तीसरी बार यहां आ चुका हूं, मगर अफसोस स्थिति में कोई सुधार नहीं है - आज भी प्रदेश दो टुकड़ों में बंटा हुआ है। घर जल रहे हैं, मासूम ज़िंदगियां खतरे में हैं और हज़ारों परिवार राहत शिविरों में जीवन काटने पर मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को मणिपुर खुद आ कर प्रदेशवासियों की तकलीफ़ सुनते हुए शांति की अपील करनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी और INDIA मणिपुर में शांति की ज़रूरत को संसद में पूरी शक्ति के साथ उठाकर, सरकार पर इस त्रासदी को खत्म करने का दबाव बनाएंगे।</p>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jul 2024 16:21:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप और कांग्रेस अलग अलग, कांग्रेस ने हाथ से छोडी झाडू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात। एसडी सेठी।</strong> राजधानी दिल्ली के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने गठबंधन कर चुनाव लडा था। दोनों की जुगल जोडी को दिल्ली की सातो लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पडी थी। दोनों ही पार्टियों को एक भी  सीट हाथ नहीं लगी थी।</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-07/screenshot_20240708_164613_gallery.jpg" alt="Screenshot_20240708_164613_Gallery" width="238" height="327" />अब उसी  करारी हार से सबक लेते हुए कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में अकेले दम पर चुनाव लडने का फैंसला किया है। कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि अगले साल  दिल्ली और हरियाणा के होने वाले  विधानसभा चुनावों में आप के साथ गठबंधन की कोई गुंजाइश नही है। लिहाजा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142934/aap-and-congress-separate-in-delhi-assembly-elections-congress-left"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-07/screenshot_20240708_164134_google.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात। एसडी सेठी।</strong> राजधानी दिल्ली के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने गठबंधन कर चुनाव लडा था। दोनों की जुगल जोडी को दिल्ली की सातो लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पडी थी। दोनों ही पार्टियों को एक भी  सीट हाथ नहीं लगी थी।</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-07/screenshot_20240708_164613_gallery.jpg" alt="Screenshot_20240708_164613_Gallery" width="238" height="327"></img>अब उसी  करारी हार से सबक लेते हुए कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में अकेले दम पर चुनाव लडने का फैंसला किया है। कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि अगले साल  दिल्ली और हरियाणा के होने वाले  विधानसभा चुनावों में आप के साथ गठबंधन की कोई गुंजाइश नही है। लिहाजा दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस  एकला चलो की नीति अपनाएगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jul 2024 16:55:35 +0530</pubDate>
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                <title>नीट पेपर से लेकर छतों  तक ' लीक ' ही ' लीक '</title>
                                    <description><![CDATA[<p>हम जब बच्चे थे तब जिस ' लीक ' के बारे में जानते थे,वो आजकल के ' पेपर लीक ' और ' छत लीक '  से एकदम अलग थी ।  अंग्रेजी की ' लीक ' और हिंदी की ' लीक ' में जमीन -आसमान का अंतर होता है ।  अंग्रेजी की ' लीक ' को हमारे यहां हिंदी में ही नहीं बल्कि बुंदेलखंडी में भी ' टपकना '  या ' चूना ' कहते है ।  हमारे यहां ' लीक ' का दूसरा अर्थ  ' पगडण्डी ' भी होता है और एक अर्थ सिर में पड़ने वाले जुओं के बच्चे भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142615/leaks-from-neat-paper-to-rooftops"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/hqdefault.jpg" alt=""></a><br /><p>हम जब बच्चे थे तब जिस ' लीक ' के बारे में जानते थे,वो आजकल के ' पेपर लीक ' और ' छत लीक '  से एकदम अलग थी ।  अंग्रेजी की ' लीक ' और हिंदी की ' लीक ' में जमीन -आसमान का अंतर होता है ।  अंग्रेजी की ' लीक ' को हमारे यहां हिंदी में ही नहीं बल्कि बुंदेलखंडी में भी ' टपकना '  या ' चूना ' कहते है ।  हमारे यहां ' लीक ' का दूसरा अर्थ  ' पगडण्डी ' भी होता है और एक अर्थ सिर में पड़ने वाले जुओं के बच्चे भी होते हैं। ये सफेद रंग के होते हैं। कहावत है कि- लीक लीक गाड़ी चले और लीक चले सपूत,  लीक छोड़ तीन ही चलें सागर, सिंह, कपूत।</p>
<p>आज दुर्भाग्य से कहिये या सौभाग्य से ' लीक ' यानि लीकेज एक राष्ट्रीय समस्या है ।  सड़क से लेकर संसद तक इस लीक की चर्चा हो रही है। लेकिन संसद में लीक पर चर्चा की इजाजत देने के बजाय बहस की मांग करने वाले विपक्ष के नेता का माइक तक बंद किया जाने  लगा है। अर्थात अभिव्यति की स्वतंत्रता या अधिकार का गला घोंटा जा रहा है। गला घोंटना एक जुलाई से लागू होने वाली भारतीय न्याय संहिता के तहत तहत किस धारा में अपराध होता है ये अभी मुझे पता नहीं ,क्योंकि मैंने जो संहिता अपने पाठ्यक्रम में पढ़ी थी वो भारतीय दंड संहिता थी।</p>
<p>सबसे पहले अयोध्या में नव निर्मित राम मंदिर की छत से होने वाली लीकेज की बात की जाये ।  चूंकि हम अयोध्या से सैकड़ों किमी दूर बैठे हैं इसलिए हमें सच्चाई का पता नहीं है, लेकिन जो तस्वीरें वायरल हुईं हैं उनकी बिना पर हम कह रहे हैं कि  राम जी के मंदिर की छत लीक हो रही है । लेकिन मंदिर के ट्रस्टी कह रहे हैं कि  -ये अफवाह है। अब हम तस्वीरों को सही मानें या ट्रस्टियों की बात को ये भी हमें पता नहीं  है कि  इन दोनों में से कौन सा साक्ष्य नए साक्ष्य संहिता की किस धारा के तहत आता है?</p>
<p>वैसे अयोध्या में राम मंदिर के लीकेज से पहले यहां भाजपा की छत में भी लीकेज हुआ है और राम जी ने इसकी सजा भाजपा को यानी मंदिर निर्माण करने वाली राष्ट्रहितैषी पार्टी को चुनाव हारकर दे दी है। ये बात और है की भाजपा इस सजा को भी राम जी का प्रसाद और अनुकम्पा मानती है।  ये भाजपा की और चम्पत   राय की दरियादिली है। आजकल की अदावत की राजनीति में दरियादिली की सख्त जरूरत है। विपक्ष ने भी लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में मतदान न कराकर दरियादिली का मुजाहिरा किया ही है।</p>
<p>अयोध्या से यदि आप दिल्ली आएं तो यहां अंतर्राष्ट्रीय इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर टर्मिनल -1  की छत लीक हो रही है और पार्किंग  की छत तो टपक ही गयी। मेरा मानना है कि  इसके लिए इंदिरा गाँधी ही जिम्मेदार निकलेंगी। यदि उनके नाम की वजाय  ये हवाई अड्डा किसी भाजपा नेता के नाम पर होता तो शायद न छत लीक होती और न छत टपकती। वैसे पीने के पानी को लेकर हाय ! हाय !! कर रही पूरी दिल्ली ही इस समय लीक हो रही है।  आम आदमी से लेकर ख़ास आदमियों के घर में पानी घुस चुका है ।  सड़कें यमुना की सगी बहनों की तरह सड़कों पर बह रही है।  किसी की क्या मजाल की कोई इस पानी को रोक सके ।  पानी को रोकने के लिए तो कोई स्विच भी नहीं होता अन्यथा सरकार ओम बिरला ने जिस तरह से राहुल गांधी की बोलती बंद कर दी ठीक उसी तरह पानी की बोलती भी बंद करा देती।</p>
<p>लीकेज और टपका-टपकी केवल दिल्ली का ही मसला नहीं है।  हमारे मध्यप्रदेश में जहां डबल इंजिन की सरकार है वहां भी जबलपुर में हवाई अड्डे का पोर्च एक कर के ऊपर आ गिरा। कार का कचूमर निकल गया ठीक उसी तरह जिस तरह देश की जनता का कचूमर पिछले एक दशक  से निकल रहा है और जनता है कि  मुस्कराये जा रही है ,फिर से पुरानी सरकार को सत्तारूढ़ देखकर। अब जबलपुर में हवाई अड्डे का पोर्च टपकने के लिए हमारे पहलवान मुख्यमंत्री डॉमोहन यादव को तो जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता ।  इसके लिए तो पूर्व के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही दोषी माना जाना चाहिए ,लेकिन कर-चोर मौसेरे भाई होते   है। कौन -किसे जिम्मेदार ठहराए इसको लेकर भी विवाद खड़ा हो सकता है।</p>
<p>अब आइये बिहार चलते हैं। यहां नालंदा विश्व विद्यालय  को नव जीवन दिया गया है। यहां से ही नीट  का पेपर लीक हुआ है जो हमारी मोशा सरकार के गले की हड्डी बन गया है।  चूंकि बिहार  सरकार की बैशाखी   पर मोशा की सरकार टिकी है इसलिए नीट पेपर लीक को लेकर सरकार संसद में बहस करने से कन्नी काट रही है। कन्नी होती ही काटने के लिए है। बिहार में पेपर ही लीक नहीं होते बल्कि पूरे के पूरे पुल ही बह जाते है।  अभी  तक तीन-चार पुल तो बह चुके हैं। अब भाजपा और जेडीयू के बीच जो नया पुल बना है वो कितने दिन टिकेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। माननीय गारंटी महोदय भी नहीं। बिहार का और गारंटी का कोई रिश्ता नहीं है।</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-06/40__1719040613.jpg" alt="40__1719040613" width="1200" height="900"></img></p>
<p>बिहार न नीतीश कुमार की गारंटी दे सकता है और न तेजस्वी यादव की। चिराग पासवान हों  या जीतन माझी। कोई भी गारंटी  देने का खतरा मोल  नहीं ले सकते। पता नहीं कब,किसे ,किसके साथ खड़ा होना पड़े ?<br />वैसे लीकेज सचमुच है ही विश्वव्यापी समस्य ।  आपको याद है न कि  एक विकीलीक्स हुआ करती है ,जो दुनिया भर   की सरकारों के बारे में न जाने क्या-क्या लीक करती रहती है। विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे  हैं। वे अक्सर जेल आते-जाते रहते हैं। पिछले दिनों अमेरिका ने उन्हें  अपनी जेल से रिहा कर दिया।  अमेरिकी न्याय विभाग के साथ हुई डील के बाद उन्हें लंदन की हाई सिक्योरिटी जेल से छोड़ दिया गया है। रिहाई के बाद असांजे अपने मूल देश ऑस्ट्रेलिया चले गए। लेकिन हमारे देश में किसी भी लिक्बाज  को न पकड़ा जाता है और न सजा होती है ,क्योंकि हमारे यहां लीक करना एक कुटीर उद्योग है।</p>
<p>ये यूपी,बिहार,मध्यप्रदेश,राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली तक में बाकायदा सरकारी संरक्षण में पनपता है ,भले ही सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की। लीकेज का धंधा बिना सरकारी सांरक्षण के चल ही नहीं पाता ,लेकिन इस हकीकत को हमारी संसद सुनना नहीं छति और सरकार स्वीकार करना नहीं चाहती। मेरा तो मशवरा है कि  न सिर्फ केंद्र में बल्कि राज्य में लीकेज की समस्या को देखते हुए एक पृथक मंत्रालय की स्थापना कर देना चाहिए। एक अलग मंत्री लीकेज के मामले को देखे । रोज-रोक सीबीआई कहाँ तक लीकेज के मामले दिखेगी ? सीबीआई के पास विपक्षियों की धर-पकड़ का इससे ज्यादा महत्वपूर्ण काम पहले से ही है।</p>
<p>मै तो कहता हूँ कि  उन्हें भी लीकेज के मामले में संसद पर बहस करने पर जोर नहीं देना चाहिए,उन्हें सड़कों पर उत्तर कर पीड़ितों के बीच खड़े होकर संसद के बाहर लीक काण्ड पर बहस करना चाहिए। संसद भीतर की बहस से नहीं बल्कि बाहर होने वाली बहस से हिलती है।   भीतर तो उनका माइक सरकार बंद करा सकती है किन्तु बाहर ऐसा करना सरकार के लिए भी मुमकिन नहीं है। आपकी हो या न हो किन्तु मेरी स्पष्ट धारणा है कि  देश की संसद  हो या सरकार ,पुल हो या हवाई अड्डा,परीक्षा हो या चुनाव  सबके सब लीक प्रूफ होना चाहिए। लीकेज को राष्ट्रीय  उद्योग न बनाकर राष्ट्रीय अपराध बनाया जाना चाहिए।</p>
<p>वैसे केंद्र और राज्य  सरकारों ने ऐसे कानून एहतियात के तौर पर बनाये हैं ,सरकार चाहे तो इन लीकबाजों  के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता,भारतीय साक्ष्य संहिता में भी तरमीम कर सकती है और इसके आरोपियों के खिलाफ बुलडोजरों का इस्तेमाल भी कर सकती है ,लेकिन मुझे पता है कि  ऐसा करने के लिए चार सौ पार वाली सरकार चाहिए। 240  पार वाली सरकार ये सब नहीं कर सकती। बहरहाल हम देश के नौजवानों के लिए प्रार्थना ही कर सकते हैं कि  उनकी परीक्षाओं के पेपर लीक न हों ।  हम देश के हवाई अड्डों ,पुलों, मंदिरों और नई नवेली संसद के लिए भी प्रार्थना  ही कर सकते हैं कि  वे न लीक हों और न टपकें और न बहें। हम नहीं जानते कि  प्रार्थनाओं में कितना दम होता है ,लेकिन हमें इसके अलावा कुछ और आता ही कहाँ है ?</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Jun 2024 16:58:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राहुल गांधी की NEET चर्चा बाधित और सत्र स्थगित</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div><strong>सचिन बाजपेई</strong></div>
<div>  </div>
<div><strong>नई दिल्ली</strong> आज संसद में अप्रत्याशित घटनाक्रम में, वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने NEET (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) परीक्षाओं के बारे में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाने का प्रयास किया। हालांकि, उनके प्रयास अचानक रुक गए जब उनका माइक्रोफोन रहस्यमय तरीके से बंद हो गया, जिससे विपक्षी नेता सदन को संबोधित करने में असमर्थ हो गए।</div>
<div>  </div>
<div>यह घटना एक बहुप्रतीक्षित सत्र के दौरान हुई, जहां विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होनी थी। शैक्षिक सुधारों पर अपने मुखर रुख के लिए जाने जाने वाले राहुल गांधी ने NEET परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के सामने आने वाली असमानताओं</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142576/rahul-gandhis-neet-discussion-interrupted-and-session-postponed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/d80adea2435cbf87a717d6ae3b272e071719556717065837_original.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div><strong>सचिन बाजपेई</strong></div>
<div> </div>
<div><strong>नई दिल्ली</strong> आज संसद में अप्रत्याशित घटनाक्रम में, वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने NEET (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) परीक्षाओं के बारे में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाने का प्रयास किया। हालांकि, उनके प्रयास अचानक रुक गए जब उनका माइक्रोफोन रहस्यमय तरीके से बंद हो गया, जिससे विपक्षी नेता सदन को संबोधित करने में असमर्थ हो गए।</div>
<div> </div>
<div>यह घटना एक बहुप्रतीक्षित सत्र के दौरान हुई, जहां विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होनी थी। शैक्षिक सुधारों पर अपने मुखर रुख के लिए जाने जाने वाले राहुल गांधी ने NEET परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के सामने आने वाली असमानताओं और चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। कांग्रेस पार्टी के करीबी सूत्रों ने संकेत दिया कि गांधी हाशिए के समुदायों के छात्रों पर परीक्षा के प्रभाव और व्यापक सुधार की आवश्यकता से संबंधित चिंताओं को उजागर करना चाहते थे।</div>
<div> </div>
<div>माइक की खराबी ने संसदीय कक्ष के भीतर तत्काल अराजकता पैदा कर दी, विपक्षी सदस्यों ने स्पष्ट तकनीकी गड़बड़ी का जोरदार विरोध किया। विभिन्न राजनीतिक गुटों के वरिष्ठ नेताओं ने व्यवधान पर निराशा व्यक्त की, इसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक चर्चा को रोकने के लिए जानबूझकर किया गया प्रयास बताया।  इसके बाद, तकनीकी कठिनाइयों और खराब उपकरणों को ठीक करने की आवश्यकता का हवाला देते हुए संसदीय सत्र को अचानक स्थगित कर दिया गया।</div>
<div> </div>
<div>इस अप्रत्याशित स्थगन ने अटकलों को हवा दी है और घटना के आसपास की परिस्थितियों के बारे में सवाल उठाए हैं, साथ ही मामले की गहन जांच की मांग की है। इस बीच, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने देश भर के छात्रों और शैक्षिक हितधारकों की चिंताओं को दूर करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए, अगले सत्रों में NEET मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाने की कसम खाई है।</div>
<div> </div>
<div>इस घटना ने चल रहे तनाव को रेखांकित किया है और संसदीय कार्यवाही में दांव को बढ़ा दिया है, जिससे आने वाले दिनों में संभावित रूप से विवादास्पद बहस का मंच तैयार हो गया है। जैसा कि राष्ट्र आगे के घटनाक्रमों की प्रतीक्षा कर रहा है, आज की घटनाओं के नतीजे गूंजते रहते हैं, संसदीय प्रक्रिया पर छाया डालते हैं और लोकतांत्रिक संस्थानों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को तेज करते हैं।</div>
<div> </div>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Jun 2024 16:26:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश है तैयार किसकी बनेगी सरकार </title>
                                    <description><![CDATA[<div>लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की वोटिंग रह गई है और यह 1 जून को होगी। इधर जिन छै चरणों में मतदान हो चुका है वहां मतगणना की सुरक्षा व्यवस्था अन्य व्यवस्थाओं की तैयारियां जिला प्रशासन ने शुरू कर दी हैं। 4 जून को शाम तक यह संकेत मिल जाएगा कि किस गठबंधन की सरकार बन रही है। देश के लोगों में उत्सुकता बढ़ गई है। राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा गणित लगाए जा रहे हैं। वैसे ज्यादातर विश्लेशक एनडीए को पूर्ण बहुमत मिलना बता रहे हैं जब कि कुछ का मानना है कि। भारतीय जनता पार्टी अकेले मुश्किल से बहुमत तक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141759/the-country-is-ready-whose-government-will-be-formed%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/fsdfsd.webp" alt=""></a><br /><div>लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की वोटिंग रह गई है और यह 1 जून को होगी। इधर जिन छै चरणों में मतदान हो चुका है वहां मतगणना की सुरक्षा व्यवस्था अन्य व्यवस्थाओं की तैयारियां जिला प्रशासन ने शुरू कर दी हैं। 4 जून को शाम तक यह संकेत मिल जाएगा कि किस गठबंधन की सरकार बन रही है। देश के लोगों में उत्सुकता बढ़ गई है। राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा गणित लगाए जा रहे हैं। वैसे ज्यादातर विश्लेशक एनडीए को पूर्ण बहुमत मिलना बता रहे हैं जब कि कुछ का मानना है कि। भारतीय जनता पार्टी अकेले मुश्किल से बहुमत तक पहुंचेगी। लेकिन अभी तो ये अनुमान हैं। कई बार अनुमान सही भी साबित हो जाते हैं और कभी कभी नतीजों से बहुत दूर रह जाते हैं। लेकिन देश की जनता का जो भी निर्णय होगा वह सभी को मान्य होगा। जनादेश को कोई नहीं झुठला सकता। भारतीय जनता पार्टी ने इस बार चार सौ पार का नारा दिया है। लेकिन स्तिथि के अनुसार ऐसा होना दिख नहीं रहा है। क्यों कि कुछ राज्यों में भाजपा को कम सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी यह अग्नि परीक्षा होगी।</div>
<div> </div>
<div>2014 के आम चुनावों में यूपीए के हाथों से सत्ता चली गई थी। और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एन डी ए ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। 2014 में नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने थे।  इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मैजिक चला था जिसने तमाम पार्टियों का तो सूपड़ा साफ कर दिया था। तथा कांग्रेस काफी नीचे आ गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से 2019 तक का अपना कार्यकाल बड़े ही अच्छे ढंग से पूरा किया लेकिन इस चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी की राजनीति नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच ही घूमने लगी। इस समय तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेता बन चुके थे। हालांकि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज जैसे नेता अब भी अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के आने के बाद ये नेता दूसरे नंबर पर आ गए। </div>
<div> </div>
<div>मोदी का कद भारतीय जनता पार्टी में इतना ऊंचा हो गया था कि व्यक्ति कोई भी हो भारतीय जनता पार्टी केवल नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही जीत हासिल कर रही थी। अमित शाह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दाहिने हाथ बन गए थे और यह कहना सही होगा कि वह एक कुशल रणनीतिकार बन चुके थे। अमित शाह का हर राजनैतिक मोहरा विपक्ष को मात दे रहा था। कई राज्य सरकारों के पास बहुमत न होते हुए भी अमित शाह ने वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनवा दीं। और विपक्ष के बड़े-बड़े नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। जिसमें गांधी परिवार के खासमखास ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल हैं।‌ मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार चल रही थी, मुख्यमंत्री कमलनाथ थे लेकिन इसी बीच अमित शाह की ऐसी रणनीति कारगर साबित हुई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के 22 विधायकों को लेकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। जिससे कांग्रेस की सरकार अल्पमत में आ गई और भारतीय जनता पार्टी ने वहां शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सरकार का गठन कर लिया। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के कई फैसले चौंकाने वाले भी रहे जिसमें एक मध्य प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने के बाद शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया जाना था। इस बार के लोकसभा चुनावों में अखिलेश यादव से उत्तर प्रदेश में मुकाबला करने के लिए मोहन यादव का उत्तर प्रदेश में काफी प्रयोग किया गया।</div>
<div> </div>
<div>2019 के लोकसभा चुनावों में पहले ही यह स्पष्ट हो गया था कि भारतीय जनता पार्टी से सत्ता कोई नहीं छीन सकता। भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में भी प्रचंड जीत हासिल की। अब तक पार्टी में काफी फेरबदल हो चुका था। और भाजपा में केवल नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह की तिकड़ी ही दिखाई दे रही थी। इस चुनाव में जो सबसे असरदार बात रही वह थी भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा देश के 80 करोड़ लोगों को फ्री राशन उपलब्ध कराना। इस योजना के कारण भारतीय जनता पार्टी को बंपर वोट मिला। इन्हीं योजनाओं को लेकर भारतीय जनता पार्टी 2024 के चुनाव में भी उतरी है लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो वह असर दिखाई नहीं दे रहा जो कि पिछले चुनावों में था। क्यों कि अब राहुल गांधी ने भी एक परिपक्व नेता के रूप में देश में अपनी छवि क़ायम की है। खासकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक की उनकी भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी के कद को बहुत ऊंचा कर दिया। इस बार चुनाव इतना आसान दिख नहीं रहा है। मतदाता खामोश रहा है। वोटिंग प्रतिशत कम रहा है और यह भारतीय जनता पार्टी के लिए नुकसान का संकेत दे रहा है।</div>
<div> </div>
<div>
<div><strong>जितेन्द्र सिंह पत्रकार </strong></div>
<div> </div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 May 2024 16:06:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> अब ''रेवड़ी आवंटन ' में भी प्रतिस्पर्धा ? </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div>  भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे समर्थन देने वाला एक बड़ा वर्ग उन 'लोगों का भी था जिन्हें केंद्र सरकार ने 'प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 'मुफ़्त राशन बांटना शुरू किया था। भाजपा ने ग़रीब मतदाताओं के इस नये वर्ग को 'लाभार्थी वर्ग' के नाम से सम्बोधित किया था। इस योजना में पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी की फ़ोटो छपे मज़बूत थैलों में राशन बांटा गया था। देश में तमाम जगहों पर ढोल बजे व तमाशे के साथ इस योजना के तहत राशन बांटकर देश के ग़रीबों की</div>
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<div>गोया</div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141598/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/freebies-.webp" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div> भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे समर्थन देने वाला एक बड़ा वर्ग उन 'लोगों का भी था जिन्हें केंद्र सरकार ने 'प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 'मुफ़्त राशन बांटना शुरू किया था। भाजपा ने ग़रीब मतदाताओं के इस नये वर्ग को 'लाभार्थी वर्ग' के नाम से सम्बोधित किया था। इस योजना में पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी की फ़ोटो छपे मज़बूत थैलों में राशन बांटा गया था। देश में तमाम जगहों पर ढोल बजे व तमाशे के साथ इस योजना के तहत राशन बांटकर देश के ग़रीबों की ग़रीबी का न केवल मज़ाक़ उड़ाया जाता था बल्कि इसके बदले में उन ग़रीबों से वोट की उम्मीद भी रखी जाती थी। चुनावों के दौरान कई सत्ताधारी दबंग नेताओं को यह कहते भी सुना गया कि 'खायेंगे मोदी का तो वोट भी मोदी को ही देना होगा'।</div>
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<div>गोया सरकारी मुफ़्त राशन के बदले में वोट पर अधिकार जताने का दावा ? ऐसे ही एक 'राशन वितरण समारोह में मुझे भी मेरे एक परिचित राशन डिपो होल्डर ने ग़रीबों को राशन बांटने के लिये 'मुख्य अतिथि ' के रूप में आमंत्रित किया था। मैंने न केवल जाने से इंकार किया बल्कि उसे ''प्रवचन ' भी दे डाला कि वह अपनी दुकान के लाइसेंस के चक्कर में ग़रीबों की ग़रीबी का मज़ाक़ उड़ाने वालों की पंक्ति में न खड़ा हो तो बेहतर है। परन्तु वह तो एक सुनियोजित सरकारी प्रोपेगंडा मशीनरी का हिस्सा था लिहाज़ा मैं नहीं गया तो उसे राशन बांटने के लिये कोई दूसरा मिल गया। </div>
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<div>बहरहाल, प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना अप्रैल 2020 से प्रारंभ की गयी थी। इसका उद्देश्य देश में कोविड-19 के अचानक फैलने से हुए आर्थिक व्यवधानों के कारण ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को होने वाली कठिनाइयों को दूर करना बताया गया था। जिस समय यह योजना शुरू की गयी थी तभी से यह विपक्षी दलों के निशाने पर थी। परन्तु जैसे जैसे सरकार को जनता की ओर से इसका सकारात्मक फ़ीडबैक मिलता गया,सरकार इस मुफ़्त राशन योजना को आगे बढ़ाती गयी। परन्तु जब किसी राज्य में विपक्षी दाल की सरकार राज्य के नागरिकों को मुफ़्त बिजली,मुफ़्त स्वास्थ्य,मुफ़्त शिक्षा,क़र्ज़ मुआफ़ी या बेरोज़गारी भत्ता आदि देने की बात करती तो उसे स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'मुफ़्त की रेवड़ी ' बांटने का नाम देते।</div>
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<div>जबकि केंद्र सरकार बड़े गर्व के साथ ग़रीबों के वोट बैंक की लालच में छाती ठोककर दावा करती कि केंद्र की मोदी सरकार देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन दे रही है। परन्तु जब इसी दावे के साथ यही सरकार यह दावे भी करती कि हमने करोड़ों लोगों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकाला,यही सरकार जब देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के दावे करती,देश में प्रगति व ख़ुशहाली की बातें करती तब यही विपक्ष केंद्र सरकार के उन्हीं दावों को शस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हुये यह पूछता कि जिस देश में 80 करोड़ लोग राशन ख़रीदने की स्थित में नहीं हैं  उस देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के दावे में भला कैसी सच्चाई ? उस सरकार के करोड़ों लोगों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकालने व देश में प्रगति व खुशहाली के दावों में कितनी सच्चाई ? </div>
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<div>परन्तु आज जब वही विपक्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में एन डी ए ,विशेषकर उसके सबसे बड़े घटक भाजपा से दो दो हाथ कर रहा है तो उसने भी जनता से अनेक लोकलुभावन वादे किये हैं। इण्डिया गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस ने तो 48 पन्नों का एक विस्तृत घोषणापत्र जारी किया है जिसमें 5 न्याय, 25 गारंटी, के साथ जनता से 300 से अधिक वादे किये गए हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी 5 न्याय, व 25 गारंटी की घोषणा उसे चुनाव जीतने की 'गारंटी' देगी। कांग्रेस के घोषणा पत्र में न्यूनतम मज़दूरी 400 रुपए प्रति दिन करने, ग़रीब परिवार की महिला को साल में 1 लाख रुपए देने, MSP को क़ानून बनाने,अग्निवीर योजना को समाप्त करने और जाति जनगणना कराने जैसी बातें तो काफ़ी हद तक ठीक लगती हैं।</div>
<div><span style="font-size:large;"><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/freebies1.jpg" alt="freebies1" width="1521" height="1142"></img></strong></span></div>
<div>परन्तु चुनाव के बीचो बीच जिसतरह इण्डिया गठबंधन व कांग्रेस के अपने चुनाव घोषणा पत्र से अलग हटकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने 15 मई को लखनऊ में यह घोषणा कर डाली कि इण्डिया गठबंधन सत्ता में आने के बाद ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों को मिलने वाले 5 किलो राशन की जगह उससे दो गुना यानी 10 किलो राशन देना शुरू करेगी। इस घोषणा ने दो मायने  में आश्चर्यचकित किया। एक तो यह कि यदि इण्डिया गठबंधन की तरफ़ से यह घोषणा होनी ही थी तो पहले फ़ेस के चुनाव से पूर्व ही इसकी घोषणा क्यों नहीं की गयी ? यदि चुनाव से पूर्व इस 'रेवड़ी वितरण ' को दोगुना किया जाना घोषित हो जाता तो विपक्ष को इसका और अधिक लाभ मिल सकता था। परंतु चूंकि इसकी घोषणा ठीक समय पर नहीं हुई इसका अर्थ यही है कि इण्डिया गठबंधन दलों में इस 'रेवड़ी वितरण ' को लेकर पूर्ण सहमति नहीं थी। </div>
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<div>परन्तु चुनाव के बीच 5 किलो की जगह 10 किलो राशन देने की बात करना वह भी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इसकी घोषणा करना और इस घोषणा के बाद कांग्रेस,अखिलेश यादव की सपा व राष्ट्रीय जनता दाल के तेजस्वी यादव द्वारा इस 'रेवड़ी वितरण ' को दोगुना किये जाने का ज़ोर शोर से प्रचार किया जाना यही दिखाता है कि चूँकि जनता को मुफ़्त की रेवड़ी की आदत डाली जा चुकी है इसलिये क्यों न ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जाये ? भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस व सपा द्वारा इण्डिया गठबंधन की ओर से की गयी इस घोषणा से बौखला गयी है तथा इस वादे को झूठ का पुलिंदा बता रही है। बेशक चुनाव परिणाम निर्धारित करेंगे कि भविष्य में ग़रीबों को पांच किलो मुफ़्त राशन मिलेगा या दस किलो, परन्तु भाजपा व इण्डिया गठबंधन की इस तरह की 'रेवड़ी वितरण ' जैसी घोषणाओं से एक बात तो अब साबित हो ही गयी है कि सत्ता हो या विपक्ष, ''रेवड़ी आवंटन ' में भी अब प्रतिस्पर्धा मची हुई है।</div>
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<div> <span style="font-size:large;"><strong>तनवीर जाफ़री</strong></span></div>
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 15:53:43 +0530</pubDate>
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                <title>यूपी की प्रतिष्ठा वाली सीटों पर क्या होगा </title>
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<div>वैसे तो उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं लेकिन कुछ विशेष सीटें ऐसी हैं जहां राजनेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। कुछ सीटें तो ऐसी हैं जहां मुकाबला न के बराबर है उसमें से एक सीट है वाराणसी की सीट जहां से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी का किसी से कोई मुकाबला नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन कल अजय राय के नेतृत्व में प्रियंका गांधी और डिंपल यादव के रोड में जिस तरह से भीड़ टूटी थी उसके कई मायने हो सकते एक तो बड़े</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141594/what-will-happen-on-the-prestigious-seats-of-up%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/sfsdf.webp" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div>वैसे तो उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं लेकिन कुछ विशेष सीटें ऐसी हैं जहां राजनेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। कुछ सीटें तो ऐसी हैं जहां मुकाबला न के बराबर है उसमें से एक सीट है वाराणसी की सीट जहां से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी का किसी से कोई मुकाबला नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन कल अजय राय के नेतृत्व में प्रियंका गांधी और डिंपल यादव के रोड में जिस तरह से भीड़ टूटी थी उसके कई मायने हो सकते एक तो बड़े नेताओं को देखने की ललक लोगों में दिखाई देती है लेकिन इसको हल्के में लेना भी भूल होगी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन क्या वह प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और उनके द्वारा वाराणसी में कराये गये विकास कार्यों का सामना कर सकेंगे। वैसे तो ऐसा मुश्किल ही लग रहा है। लेकिन अजय राय वहां के स्थानीय नेता हैं और गठबंधन के प्रत्याशी हैं आप बिल्कुल उनको हल्के में नहीं ले सकते और फिर इतिहास गवाह है कि इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा है। लेकिन वाराणसी में ऐसा होना अभी तो असंभव ही लग रहा है।</div>
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<div>वाराणसी के बाद यदि चर्चा में कोई सीट है तो वह है अमेठी और रायबरेली। यहां हम दो सीटों की एक साथ बात इसलिए कर रहे हैं कि आज की परिस्थिति में दोनों का एक दूसरे से परस्पर संबंध है। अमेठी से भारतीय जनता पार्टी से केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी चुनाव लड़ रहीं हैं। जब कि यह सीट गांधी परिवार की परंपरागत सीट है राहुल गांधी यहां से तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं लेकिन 2019 के चुनाव में वह स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए। कांग्रेस ने बड़ी चतुराई से राहुल गांधी को रायबरेली से प्रत्याशी बनाया जब कि स्मृति ईरानी के खिलाफ अपने साधारण कार्यकर्ता को चुनाव मैदान में उतारा।</div>
<div> </div>
<div>अब यह साधारण कार्यकर्ता हैं कौन जिनसे स्मृति को हार का डर सता रहा है। वैसे इस बार अमेठी में चुनाव बड़ा पेचीदा है। कांग्रेस ने गांधी परिवार के खासमखास किशोरी लाल को चुनाव मैदान में उतारा है। किशोरी लाल वहां के स्थानीय निवासी हैं और राहुल गांधी की अनुपस्थिति में वह ही अमेठी का संसदीय कार्य देखते थे। किशोरी लाल वहां काफी लोकप्रिय नेता हैं। यदि स्मृति ईरानी किशोरी लाल से चुनाव हारती हैं तो यह बहुत बड़ी बात होगी। जब कि यदि राहुल गांधी से चुनाव हारती तो कोई बड़ी बात नहीं होती। इसलिए कांग्रेस गठबंधन ने किशोरी लाल को एक रणनीति के तहत वहां से प्रत्याशी बनाया है।</div>
<div> </div>
<div>राहुल गांधी चाहते तो अमेठी से चुनाव लड़ सकते थे लेकिन इसकी पटकथा बहुत पहले से तैयार हो चुकी थी जब सोनिया गांधी जो कि हमेशा से रायबरेली से सांसद रहीं हैं उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए चुनाव न लड़ने का फैसला किया और राज्य सभा के लिए चुन ली गईं। दरअसल यह सीट उन्होंने राहुल गांधी के लिए ही छोड़ी थी। राहुल गांधी को वैसे तो यहां पर कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए लेकिन चुनाव में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसलिए कांग्रेस कार्यकर्ता काफी मेहनत कर रहे हैं। अब हम बात करते हैं कन्नौज लोकसभा क्षेत्र की जहां से पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे हैं उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के नेता वर्तमान सांसद सुब्रत पाठक चुनाव मैदान में हैं। ये वही सुब्रत पाठक हैं जो पहले अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव हार चुके हैं लेकिन 2019 के चुनाव में उन्होंने अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को हरा दिया था। इसलिए सुब्रत पाठक के हौसले बुलंद हैं। वैसे कन्नौज काफी पहले से ही समाजवादियों का गढ़ माना जाता रहा है। यहां से राम मनोहर लोहिया और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता चुनाव जीत कर संसद में पहुंचे हैं।</div>
<div> </div>
<div>कन्नौज में समाजवादी पार्टी ने पहले अपने भतीजे तेज़ प्रताप यादव को चुनाव मैदान में उतारा था लेकिन अंतिम समय में फेरबदल हुआ और तेज प्रताप यादव को हटाकर अखिलेश यादव खुद प्रत्याशी बन गये। अखिलेश यादव की साख यहां दांव पर लगी है। अखिलेश यादव पहली बार कन्नौज से सी सांसद चुने गये थे लेकिन अब पहले से परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। अखिलेश यादव के लिए भी चुनाव इतना आसान नहीं है। और इसीलिए यहां से तेज प्रताप यादव को हटाया गया था। तेज प्रताप यादव एक बार मैनपुरी से सांसद रह चुके हैं। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में कन्नौज में वो सुब्रत पाठक से हल्के पड़ रहे थे क्योंकि इन पांच वर्षों में सांसद रहते सुब्रत पाठक ने अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है लेकिन अखिलेश यादव के सामने शायद वह हल्के नजर आ रहे हैं। क्यों कि अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में वहां बहुत से विकास कार्य कराए हैं। इससे पहले भी मुलायम सिंह यादव ने भी कन्नौज के लिए काफी कुछ किया है। अब देखना है कि कन्नौज की जनता ने किसको आशीर्वाद दिया है। </div>
<div> </div>
<div>मैनपुरी लोकसभा सीट भी भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के लिए प्रतिष्ठित सीट बन गई है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव की मृत्यु के बाद डिंपल यादव मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ी थीं और बहुत ही अच्छे मार्जिन से चुनाव जीतीं थीं। यह भी माना जा सकता है कि उस उपचुनाव में डिंपल यादव को सहानुभूति की लहर मिली होगी लेकिन मैनपुरी लोकसभा सीट का जो जातीय समीकरण है वह समाजवादी पार्टी के ही पक्ष में जाता है। भारतीय जनता पार्टी ने इस बात अपने वर्तमान मैनपुरी विधायक और उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। चुनाव के बाद जयवीर सिंह काफी सहज दिखाई दे रहे हैं। लेकिन मैनपुरी लोकसभा सीट में जसवन्तनगर विधानसभा क्षेत्र करहल विधानसभा क्षेत्र और किशनी विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जो हार जीत का फैसला कर देते हैं। यह एक बहुत बड़ी यादव बैल्ट है लेकिन शाक्य मतदाताओं की संख्या भी यहां कम नहीं है। मैनपुरी से बहुजन समाज पार्टी ने शाक्य उम्मीदवार उतारकर डिंपल यादव के लिए कुछ मुश्किलें खड़ी की हैं। लेकिन वहां समाजवादी पार्टी को हराना इतना आसान नहीं है।</div>
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<div>लखनऊ लोकसभा सीट से केन्द्रीय रक्षामंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। राजनाथ सिंह यदि इस बार चुनाव जीत जाते हैं तो यह उनकी हैट्रिक होगी। समाजवादी पार्टी ने राजनाथ सिंह के खिलाफ रविदास मेहरोत्रा को चुनाव मैदान में उतारा है। रविदास मेहरोत्रा स्थानीय प्रत्याशी हैं और काफी लोकप्रिय भी हैं लेकिन राजनाथ सिंह के सामने कुछ कमजोर ही नजर आ रहे हैं। प्रतापगढ़ लोकसभा सीट और कौशांबी लोकसभा सीट पर राजा भैया की प्रतिष्ठा दांव पर है। हालांकि राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल से कोई भी प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है लेकिन उन्होंने अंदर ही अंदर समाजवादी पार्टी के कैंडिडेट को समर्थन दे दिया है। दरअसल राजा भैया ने राज्यसभा चुनाव में बिना किसी शर्त के भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को समर्थन दिया था और लोग सभा में भी भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन करना चाहते थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उनको एक सीट भी देना उचित नहीं समझा। इसलिए राजा भैया ने अपने समर्थकों से एलान कर दिया कि वह स्वतंत्र हैं और अपना वोट किसी को भी दे सकते हैं। लेकिन जब राजा भैया का यह स्टेटमेंट आया कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान सांसद से जनता खुश नहीं है तो यह निश्चित हो गया कि वह अंदर ही अंदर समाजवादी पार्टी को अपना समर्थन दे चुके हैं। प्रतापगढ़ की समाजवादी पार्टी की रैली में अखिलेश यादव ने भी यह घोषणा कर दी कि कभी-कभी जो हमसे नाराज़ रहते थे वह आज हमारे साथ हैं। उनका सीधा इसारा राजा भैया के समर्थकों पर था।</div>
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<div><strong>जितेन्द्र सिंह पत्रकार </strong></div>
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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 15:43:23 +0530</pubDate>
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                <title>सियासत में शेखचिल्ली की शिनाख्त</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141515/sheikh-chillis-identity-in-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/bjp_sultanpur_maneka_gandhi_on_robert_vadra_rahul_gandhi_varun_lok_sabha_elections_1712833483.jpg" alt=""></a><br /><p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई नहीं लेता। जाहिर है कि यदि राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं तो मेनका जी भी उसी परिवार की बहू हैं जिस परिवार के चश्मों-चिराग को मेनका जी के सबसे बड़े नेता शाहजादा  कहते हैं। जब राहुल शेखचिल्ली हैं तो बिलासुबा उनके चचेरे भाई यानि मेनका जी के पुत्र वरुण  गांधी भी पैदायशी शेखचिल्ली हुए। उनके पिता  भी जाहिर है  शेखचिल्ली ही रहे होंगे। जैसे खग ही खग की भाषा जानता है वैसे ही रक्त संबंधी ही अपने रक्त संबंधी को पहचान लेता है।</p>
<p>शेखचिल्ली होना कोई बुरी बात नहीं है । शेखचिल्ली को गाली या अपशब्द मानने वाले बुरे हैं।  शेखचिल्ली एक ऐसा किरदार है जो हंसी-मजाक करते हुए भी बड़ी से बड़ी गुत्थी को सुलझा देता है । शेख चिल्ली का रिश्ता दुर्भाग्य से गुजरात से नहीं बल्कि हमारे उस हरियाणा से बताया जाता है जहाँ से हमारे मित्र अरुण जैमिनी आते हैं। हरियाणा के डीएनए में शेखचिल्लीपना भरा पड़ा है ।  एक हरियाणवीं ही अपने आप पर हंस सकता है। लेकिन यदि शेखचिल्ली यूपी से है तो भी उसे हंसना -रोना खूब आता है।  आप उसे गंगा किनारे रोते देख सकते हैं ,क्रूज पर इंटरव्यू देते देख सकते हैं , या रायबरेली में हँसते हुए भी।</p>
<p>भारत की सियासत में यदि शेखचिल्ली न हों तो सियासत बेरौनक हो जाये। शायद इसीलिए हर दशक की सियासत में एक न एक शेखचिल्ली हमेशा मौजूद रहता है। देश को आपातकाल का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के जमाने में ठेठ समाजवादी राजनारायण को लोग शेखचिल्ली कहते थे ,लेकिन उन्हीं राजनारायण ने इंदिरा जी का तख्ते ताउस [मयूर सिंहासन ] पलट दिया था। राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी भी अपने जमाने के रंगरेज शेखचिल्ली वीपी सिंह के शिकार बने थे। और तो और 2014  में महान अर्थशास्त्री डॉ मन मोहन सिंह को एक गुजराती शेखचिल्ली ने चारों खाने चित कर दिया था।नेहरू जी के जमाने में प्रख्यात समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया को शेखचिल्ली कहा जाता था।</p>
<p>मुझे लगता है कि मेनका जी अपने भतीजे की शिनाख्त करने में शायद इसीलिए अब तक भय खा रहीं थीं   कि कहीं भाजपा वाले उनका शेखचिल्ली डीएनए देखकर टिकिट न काट दें। दरअसल भाजपा ने मेनका जी को तो टिकिट नारीशक्ति वंदन क़ानून का सम्मान करते हुए दिया है। उनके बेटे का टिकट तो काट ही दिया ,क्योंकि वे शेखचिल्ली परिवार से जो आते हैं।मेनका जी   का शुक्रिया अदा करना चाहिए राहुल गांधी को, लेकिन वे खामोश है।  परिवार कि रिवायतें होतीं है। मेनका जी भले उनके साथ नहीं रहतीं,दूसरे दल में हैं ,लेकिन हैं तो सगी चाची। राहुल के लिए मेनका के लिए शायद उतना ही सम्मान होगा जितना कि अपनी माँ श्रीमती सोनिया गाँधी के लिए है। इसलिए शायद राहुल गाँधी पलटकर जबाब नहीं देंगे। देना भी नहीं चाहिए।</p>
<p>सोनिया इटली से आतीं हैं लेकिन भारतीय माँ के सारे गुण जानतीं हैं।  उन्होंने शायद एक बार भी अपनी देवरानी या भतीजे के लिए किसी हल्के शब्द का इस्तेमाल नहीं किया ।  कम से कम वरुण गांधी को तो शेखचिल्ली नहीं कहा ,लेकिन मेनका जी ने एक भारतीय माँ होते हुए भी अपनी मर्यादा तोड़ दी। मुमकिन है कि वे मजबूर हों।  उनसे जबरन ये सब कहलाया गया हों ।  मुमकिन है कि उनके मन में राहुल को लेकर कोई कुंठा हो ? लेकिन यदि वे ये सब न भी कहतीं तो उन्हें भारतरत्न नहीं मिलने वाला था। वे भाजपा के लिए एक अतिथि कलाकार से ज्यादा न कल थीं और न आज हैं और न कल रहेंगीं।</p>
<p>भारत के लोग बहुत शिष्ट होते है।  काने को को काना नहीं कहते । वे सम्मान से उसे 'एक नयन ' कहते है।  ' सूरदास ' कहते हैं।  इस समय देश के सबसे बड़े शेखचिल्ली को भी किसी ने आजतक शेखचिल्ली नहीं कहा ।  कांग्रेस ने भी नहीं कहा।  ये शिष्टाचार के खिलाफ है। जनता सब  जानती है कि कौन शेखचिल्ली है और कौन नहीं ? मेनका जी ने खामखां  ये जहमत उठाई और देश को बताया कि उनका भतीजा यानि जेठानी का लड़का शेखचिल्ली है। अब है तो है ।  इसका खंडन कोई नहीं कर सकता। इसका खंडन देश कि जनता कर सकती है ।  देश को 4  जून को ही पता चल पायेगा कि शेखचिल्ली किस दल का बड़ा है ? इस बार के चुनाव लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के साथ ही श्रेष्ठ शेखचिल्ली के चयन के लिए भी हो रहे हैं। </p>
<p>चूंकि आज का मुद्दा शेखचिल्ली हैं इसलिए अपने पाठकों को बताता चलूँ कि असली शेखचिल्ली   मुगल शहजादे दारा शिकोह  के गुरु थे।  शाहजहां खुद उनका बहुत सम्मान करते थे।   मुग़ल बादशाह शाहजहां का बेटा दारा शिकोह शेख चिल्ली का बड़ा प्रशंसक था।  उसने उनसे कई महत्त्वपूर्ण बातें सीखी।  शेखचिल्ली को  अब्दउर्र रहीम, अलैस अब्द उइ करीम, अलैस अब्द उर्र रज्जाक के नाम से भी जाना जाता था।  सत्रहवीं सदी के  लोग शेखचिल्ली को  महान दरवेश  मानते थे। शेखचिल्ली का  मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में है।</p>
<p>धारणा है  कि शेख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान के खानाबदोश कबीले में हुआ था।  वो लगातार घुमक्कड़ी करते थे।  यही घुमक्कड़ी उन्हें भारत ले आई।  वैसे शेखचिल्ली ऐसी कहानियों के नायक हैं, जो आम लोक-जीवन के संघर्षों से बार-बार उबारता  है. बार-बार उन्हीं संघर्षों में जुट जाता है।  उसमें ईमानदारी है, निष्ठा है, मर्यादा है, परिस्थितिजन्य विवेक है।  सबसे बड़ी बात ये भी कि कि वो वर्तमान में जीता है आज के शेखचिल्ली राहुल गांधी की तरह।<br /><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:20:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>  गुलदस्त-ए-हिन्द में फलती फूलती ' विष बेल '</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानी लोकसभा का आम चुनाव अपने समापन की ओर अग्रसर है। देश के चुनावी इतिहास में 2024 का चुनाव हमेशा याद रखा जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके सहयोगी नेताओं ने गोदी मीडिया की जुगलबंदी से इस बार चुनाव प्रचार में जितना ज़हर घोलने व झूठ पर झूठ बोलने का कीर्तिमान स्थापित करने की कोशिश की गयी वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। भारतीय जनता पार्टी ने वैसे तो पिछले दस वर्षों से अपनी सत्ता की पूरी ताक़त इसी में लगा रखी है कि किस तरह अपने विरोधियों को टुकड़े टुकड़े गैंग का</div>
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<div>प्रधानमंत्री</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141421/poison-vine-flourishing-in-guldast-e-hind"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/hate2.jpg" alt=""></a><br /><div> भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानी लोकसभा का आम चुनाव अपने समापन की ओर अग्रसर है। देश के चुनावी इतिहास में 2024 का चुनाव हमेशा याद रखा जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके सहयोगी नेताओं ने गोदी मीडिया की जुगलबंदी से इस बार चुनाव प्रचार में जितना ज़हर घोलने व झूठ पर झूठ बोलने का कीर्तिमान स्थापित करने की कोशिश की गयी वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। भारतीय जनता पार्टी ने वैसे तो पिछले दस वर्षों से अपनी सत्ता की पूरी ताक़त इसी में लगा रखी है कि किस तरह अपने विरोधियों को टुकड़े टुकड़े गैंग का नाम दिया जाये,उन्हें पाकिस्तानी बताया जाये ,देश विरोधी व सेना विरोधी बताया जाये ,भ्रष्ट व निकम्मा बताया जाये ,मुस्लिम परस्त व तुष्टीकरण का पैरोकार साबित किया जाये,पिछले सभी शासन व पूर्व प्रधानमंत्रियों को निकम्मा बताया जाये। और साथ ही स्वयं को 'दैवीय शक्ति ' का स्वामी होने के साथ 'अवतरित' होने वाला एक ऐसा महापुरुष जिसे पहले तो गंगा ने केवल बुलाया था परन्तु अब तो 'गोद ' भी ले लिया है। चुनावी बेला में सत्ता पर क़ब्ज़ा बरक़रार रखने के लिये और अपने विरोधियों को नीचा दिखाने व बदनाम करने के लिये प्रधानमंत्री स्तर पर जिस तरह के ज़हरीले बोल इन दिनों बोले जा रहे हैं ऐसी बातों की कभी कल्पना भी नहीं की गयी।    </div>
<div> </div>
<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के चुनावी दौरे पर सभाओं में फिर कहा है कि -"कांग्रेस व समाजवादी पार्टी अगर सत्ता में आई तो यह लोग रामलला को टेंट में भेज कर मंदिर में बुल्डोज़र चलवा देंगे। कांग्रेस ने तो राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने की तैयारी भी कर ली है।  उन्होंने कहा कि इनके लिए तो उनका परिवार और पावर यही उनका खेल है। सपा, कांग्रेस की ‘राम’ से इतनी दुश्मनी है कि उन्होंने रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया"। प्रधानमंत्री मोदी के उपरोक्त आरोपों से दो अहम सवाल सिर्फ़ मोदी से ही पूछे जाने चाहिये। एक तो यह कि प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की इस सूचना का आख़िर क्या स्रोत है कि  -'सपा-कांग्रेस वाले सरकार में आए तो राम मंदिर पर बुलडोज़र चलवा देंगे'? यदि कोई स्रोत नहीं तो यह सफ़ेद झूठ और लफ़्फ़ाज़ी सिर्फ़ साम्प्रदायिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास नहीं तो और क्या है ?</div>
<div> </div>
<div>और उन्हीं के आरोपों  से जुड़ा दूसरा सवाल यह कि जब सपा व कांग्रेस को उनके अनुसार ‘राम’ से इतनी दुश्मनी है कि उन्होंने रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया और अब मोदी के अनुसार इस पर बुलडोज़र भी चलवा देंगे ? फिर आख़िर ऐसे 'राम विरोधियों ' को निमंत्रण भिजवाया ही क्यों गया ? क्या सिर्फ़ इसलिये नहीं कि उन्हें अंदाज़ा था कि वे राम जन्म भूमि प्राण प्रतिष्ठा को राजनैतिक रंग में रंगने के इस भाजपा व संघ के आयोजन को अस्वीकार करेंगे और तब इन्हें यह मौक़ा मिलेगा जो आज कहते फिर रहे हैं ? मोदी जी रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराने को लेकर उन चारों शंकराचार्यों पर क्यों नहीं बोलते जिन्होंने उनका निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और इस आयोजन को भी विधि विधान के विरुद्ध बताया ? आज भी एक शंकराचार्य वे डंके की चोट पर कह रहे हैं कि प्राण प्रतिष्ठा पुनः की जायेगी,मंदिर निर्माण अभी केवल 30 प्रतिशत हुआ है और अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पूरी तरह अनैतिक व अवैधानिक है। परन्तु शंकराचार्य की इन बातों का कोई जवाब नहीं देता जो ख़ुद 22 जनवरी के इस आयोजन को पूरी तरह राजनैतिक आयोजन बताते रहे हैं ?</div>
<div>
<div> </div>
<div>पिछले दिनों इसी नफ़रती बयानबाज़ियों की एक और बानगी उत्तर पूर्वी दिल्ली के थाना उस्मानपुर इलाक़े के करतार नगर में तब देखने को मिली जब दिल्ली की  जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष और उत्तर पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार कन्हैया कुमार को उन्हें माला पहनाने के बहाने से उनके क़रीब पहुंचे दो लोगों ने उनपर पहले स्याही फेंकी फिर अचानक थप्पड़ों से हमला भी कर दिया । इसी बीच आम आदमी पार्टी की महिला निगम पार्षद के साथ भी हाथापाई की गई। निगम पार्षद का आरोप है कि उनके साथ छेड़छाड़ भी की गई है। इस दौरान चार लोगों को चोट भी आई है । बताया जा रहा है कि कन्हैया कुमार व महिला पार्षद से मारपीट करने वाले लोग गोरक्षा दल से जुड़े हुए हैं। घटना की वीडियो में हमलावर यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि -'भारत के टुकड़े-टुकड़े का नारा लगाने वालों का वह यही हाल करेंगे। देश का अपमान वह किसी क़ीमत पर नहीं सहेंगे'।</div>
<div> </div>
<div>  यहां भी सवाल यह है कि टुकड़े तिकडे गैंग की अवधारणा किसने बनाई व प्रचारित की ? जिस कन्हैया कुमार के पूर्वजों का जन्म भारत में ही हुआ हो ,जिसकी मां ने आंगनवाड़ी में काम कर अपने बच्चों की परवरिश की हो,जिसका भाई फ़ौजी और बाप किसान हो उस पर सिर्फ़ इसलिये टुकड़े टुकड़े गैंग का लेबल लगा दिया जाये क्योंकि वह वैचारिक रूप से सत्ता का मुखर विरोधी है ? इतना ही नहीं बल्कि उस पूरे जे एन यू को ही बदनाम करने का षड्यंत्र रचा जाये जिसमें पढ़े अनेक नेता आज मंत्री सांसद व सचिव स्तर के अधिकारी हैं ? और यह आरोप भी उनके द्वारा लगाए जाएँ जो ख़ुद या तो अनपढ़ हैं या फ़र्ज़ी डिग्रियां रखते  हैं ?</div>
<div> </div>
<div>यह आरोप उनके द्वारा लगाए जाएं जिनके पारिवारिक व राजनैतिक वंशजों का देश के लिये बलिदान देने का कोई इतिहास नहीं है ? यह आरोप उनके द्वारा लगाये जायें जो ख़ुद समाज को धर्म जाति क्षेत्र व भाषा के नाम पर लड़वाकर देश के टुकड़े टुकड़े करना चाह रहे हों और देश को हिंसा व नफ़रत की आग में झोंकने के लिये प्रयासरत हों ? सवाल यह है कि अनेकता में एकता का दर्शन देने वाले गुलदस्त-ए-हिन्द में गत दस वर्षों से सत्ता व सत्ता की दलाल मीडिया द्वारा जिस  'विष बेल ' को नफ़रत,साम्प्रदायिकता,झूठ.पाखंड व पूंजीवाद से सींचा गया है क्या अब वह फलती फूलती दिखाई देने लगी हैं ? </div>
<div> </div>
<div><strong><span style="font-size:large;">तनवीर जाफ़री  </span></strong></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 May 2024 17:27:54 +0530</pubDate>
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