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                <title>Minority Politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वंदे मातरम् पर विवाद: राष्ट्रगीत के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती राजनीत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185453/controversy-over-vande-mataram-politics-cannot-be-bigger-than-respect"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का संकेत दिया। इस आरोप के आधार पर कर्नाटक के मंगलुरु में भाजपा नेता विकास पुत्तूर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई नहीं होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह मामला अभी आरोप और जांच के स्तर पर है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। कांग्रेस की ओर से इस पूरे आरोप को खारिज किया गया है। विवादित दृश्य को लेकर कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी मंच पर लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी लाने का संकेत दे रही थीं, न कि वंदे मातरम् रोकने का। दूसरी ओर भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ते हुए राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लेकिन इस विवाद का एक बड़ा पक्ष केवल 15 अगस्त की घटना तक सीमित नहीं है। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और देश की राजनीति में बहस का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए आज जब राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह समझना भी जरूरी है कि अतीत में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के संबंध में क्या रुख अपनाया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि समय के साथ इसके कुछ अंशों और धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम लीग तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई। 1930 के दशक में यह विषय कांग्रेस के सामने भी आया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1937 में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू अभिलेखागार में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार, 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में थोपने का आरोप लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस को लिखे पत्र में वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ हिस्सों को लेकर चर्चा की। नेहरू ने लिखा कि गीत की ‘आनंदमठ’ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर पैदा हुआ विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। यानी इतिहास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी गीत को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल पर विचार किया और 1937 में यह निर्णय सामने आया कि गीत के उन शुरुआती अंशों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर व्यापक सहमति थी। नेहरू के अपने वक्तव्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने इस विषय पर लंबे विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से आज की राजनीतिक बहस को एक ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस और उसके समर्थक इसे उस समय की सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बताते हैं। इतिहास में दर्ज तथ्यों को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा। इसलिए वंदे मातरम् को केवल एक राजनीतिक दल या विचारधारा से जोड़कर देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रगीत का सम्मान किसी सरकार, पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का हिस्सा है जिसमें असंख्य लोगों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि इसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की अवमानना का आरोप गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आरोप को प्रमाण मान लेने के बजाय निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाती रही है। इसके समर्थन में वह कांग्रेस नेताओं के पुराने बयानों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए 2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ‘सैफ्रन टेररिज्म’ यानी ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने बाद में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के ‘हिंदू आतंकवाद’ संबंधी बयान पर भी विवाद हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने स्वयं को उस शब्दावली से अलग करते हुए कहा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं से यह जरूर स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के बयान समय-समय पर बड़े राजनीतिक विवादों का कारण बने हैं। हालांकि किसी नेता के बयान को पूरे दल की आधिकारिक विचारधारा मान लेना भी उचित नहीं है। राजनीति में बयान आते हैं, उन पर विवाद होता है और कई बार स्वयं दल को सफाई भी देनी पड़ती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् पर वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने की प्रवृत्ति कब समाप्त होगी। भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक दलीलें हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए इससे बड़ा प्रश्न राष्ट्रीय सम्मान का है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के मामले में भी यदि कोई आपत्तिजनक व्यवहार हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप गलत हैं तो यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में न तो किसी नेता को केवल पद के कारण कानून से ऊपर माना जा सकता है और न ही किसी राजनीतिक विरोधी पर बिना प्रमाण आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है।कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी राजनीतिक दल देशभक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं रखता। भारत की आजादी किसी एक परिवार, पार्टी या संगठन की देन नहीं है। करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, बलिदान और त्याग से देश स्वतंत्र हुआ। इसलिए ‘हमने देश आजाद कराया’ जैसी राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठना जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 1937 के निर्णयों और उसके पीछे की परिस्थितियों पर राजनीतिक बहस भी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की आलोचना भी लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम उद्देश्य किसी दल को देशद्रोही साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम् को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर देश की नई पीढ़ी को उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। जो गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभावना जगाता रहा, उसके सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी देश के लोकतांत्रिक संस्कारों के लिए उचित नहीं हो सकती। लेकिन सम्मान के साथ न्याय और तथ्य भी जरूरी हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज शिकायत अब जांच का विषय है। पुलिस और जरूरत पड़ने पर न्यायपालिका यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्या करते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रगीत किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;">        *कांतिलाल मांडोत*</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="WhmR8e"></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 20:08:40 +0530</pubDate>
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                <title>यूपी का चुनावी मैदान: मुकाबला फिर से भाजपा बनाम सपा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश की सियासत का गणित पिछले </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi">  साल से लगभग तय है। यहाँ सत्ता की चाबी हमेशा दो बड़े खेमों के पास रही है। </span>2027<span lang="hi" xml:lang="hi">  का विधानसभा चुनाव भी इसी स्क्रिप्ट पर आगे बढ़ता दिख रहा है। मैदान में कई दल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर असली सीधी टक्कर भाजपा </span>vs <span lang="hi" xml:lang="hi">सपा के बीच ही होगी। </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi">  के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को पीछे छोड़ दिया था। प्रदेश में भाजपा को </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  जबकि सपा को </span>37<span lang="hi" xml:lang="hi">  सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। लेकिन यह संभव है कि विधानसभा का चुनावी गणित अलग हो।</span>'</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182451/up-electoral-battle-again-between-bjp-vs-sp"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश की सियासत का गणित पिछले </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल से लगभग तय है। यहाँ सत्ता की चाबी हमेशा दो बड़े खेमों के पास रही है। </span>2027<span lang="hi" xml:lang="hi"> का विधानसभा चुनाव भी इसी स्क्रिप्ट पर आगे बढ़ता दिख रहा है। मैदान में कई दल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर असली सीधी टक्कर भाजपा </span>vs <span lang="hi" xml:lang="hi">सपा के बीच ही होगी। </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को पीछे छोड़ दिया था। प्रदेश में भाजपा को </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> जबकि सपा को </span>37<span lang="hi" xml:lang="hi"> सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। लेकिन यह संभव है कि विधानसभा का चुनावी गणित अलग हो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में काफी लोकप्रिय हो चुके हैं खासकर अपने कड़े फैसले को लेकर। इसलिए विधानसभा चुनाव के गणित को अलग तरीकों से देखना होगा। भाजपा: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डबल इंजन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रिपल अटैक</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की तैयारी- भाजपा यूपी में </span>2017<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>2022<span lang="hi" xml:lang="hi"> में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। उसका कोर नैरेटिव </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> चीजों पर टिका है: हिंदुत्व + विकास: अयोध्या में राम मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काशी विश्वनाथ कॉरिडोर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयागराज कुंभ को भाजपा अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। साथ में एक्सप्रेसवे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेट्रो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नोएडा फिल्म सिटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट जैसे विकास प्रोजेक्ट फ्रंट पर हैं। लॉ एंड ऑर्डर: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">माफिया राज खत्म</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बुलडोजर मॉडल</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना है। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक इसे कानून-व्यवस्था की गारंटी के रूप में बेचा जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र + राज्य का तालमेल: मोदी का चेहरा राष्ट्रीय स्तर पर और योगी का चेहरा राज्य स्तर पर। यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">डबल इंजन</span>' 2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोकसभा में कुछ सीटों पर झटका खाने के बाद भी संगठन के लिए सबसे बड़ा भरोसा है। भाजपा की चुनौती: किसानों की नाराजगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और आरक्षण जैसे मुद्दे। </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोकसभा में पिछड़ा-दलित वोट में हुई सेंध को वापस लाना संगठन की प्राथमिकता है। सपा: </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पीडीए</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">फॉर्मूले से वापसी की कोशिश- अखिलेश यादव ने </span>2022<span lang="hi" xml:lang="hi"> के बाद अपनी राजनीति को पूरी तरह रीसेट किया। सपा अब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एम-वाई समीकरण</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">से आगे बढ़कर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पीडीए</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी पिछड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दलित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पसंख्यक के फॉर्मूले पर खेल रही है। सोशल इंजीनियरिंग: भाजपा के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नॉन-यादव </span>OBC + <span lang="hi" xml:lang="hi">नॉन-जाटव दलित</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मॉडल को काटने के लिए सपा ने कुर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निषाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाटव के अलावा मुस्लिम वोट को एकजुट करने की कोशिश की। </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> लोकसभा में इसका असर दिखा भी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार और महंगाई: पेपर लीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निवीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और महंगाई को सपा मुख्य मुद्दा बना रही है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी भत्ता</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और पुरानी पेंशन बहाली जैसे वादे इसी दिशा में हैं। अखिलेश का सॉफ्ट हिंदुत्व: मंदिर जाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कावड़ यात्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और समाजवादी पीडीए पंचायत से सपा उस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तुष्टीकरण</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के टैग को तोड़ने की कोशिश कर रही है जो उसे पहले घेरता था। सपा की चुनौती: संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवारवाद के आरोप से बचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और मुस्लिम+यादव के बाहर दूसरे पिछड़ों को स्थायी तौर पर जोड़ना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाकी दल कहाँ हैं</span>? - <span lang="hi" xml:lang="hi">बसपा: मायावती अभी भी दलित वोट की सबसे बड़ी ध्रुव हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर </span>2022 <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">में उनका वोट बैंक खिसका। अगर वो अकेले लड़ती हैं तो वो भाजपा या सपा में से एक का नुकसान करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर खुद सत्ता की रेस से बाहर दिख रही हैं। कांग्रेस: राहुल-प्रियंका के यूपी फोकस के बाद भी संगठन जमीन पर कमजोर है। वो कुछ सीटों पर सपा को फायदा या नुकसान दे सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मुख्य मुकाबला नहीं। </span>RLD + <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य: जयंत चौधरी </span>NDA <span lang="hi" xml:lang="hi">में हैं। निषाद पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना दल भाजपा के साथ। ओम प्रकाश राजभर भी भाजपा के साथ। ये सब वोट कटवा या वोट ट्रांसफर का काम करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर फ्रेम भाजपा </span>vs <span lang="hi" xml:lang="hi">सपा ही रहेगा। तो फैसला क्या होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यूपी में चुनाव हमेशा जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास और कानून-व्यवस्था के मिश्रण से तय होता है। </span>2027 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी फ्रेम यही रहेगा। भाजपा का दांव: हिंदुत्व + विकास + लॉ एंड ऑर्डर + मोदी-योगी का डबल चेहरा। सपा का दांव : पीडीए एकता + बेरोजगारी-महंगाई + </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">की मोमेंटम। बसपा का वोट जिस तरफ शिफ्ट हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और ब्राह्मण-ठाकुर-बनिया </span>vs OBC-<span lang="hi" xml:lang="hi">दलित-मुस्लिम का ध्रुवीकरण जिस हद तक हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी पर सीटों का गणित बनेगा। जमीन पर चाहे जितने दल पोस्टर लगाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वोटर के दिमाग में लड़ाई दो ही खेमों के बीच है। एक तरफ योगी-मोदी की भाजपा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरफ अखिलेश की सपा। यूपी </span>2027 = <span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा </span>vs <span lang="hi" xml:lang="hi">सपा। बाकी सब असर डालने वाले खिलाड़ी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य खिलाड़ी ये दो ही हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 19:40:05 +0530</pubDate>
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