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                <title>Middle Class - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>बढ़ती महंगाई और मध्यम वर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक</span></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185515/rising-inflation-and-the-middle-class"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/rajeev-shukla.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">राजीव शुक्ला</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई का सबसे गहरा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित है, लेकिन जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मध्यम वर्ग लंबे समय से आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। यही वर्ग घर बनाता है, बच्चों को पढ़ाता है, बचत करता है, बीमा और ऋण की किश्तें चुकाता है और बाजार में सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति भी रखता है। लेकिन आज इसी मध्यम वर्ग के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या आय बढ़ने के बावजूद उसकी वास्तविक क्रय शक्ति कम होती जा रही है? कागज पर वेतन में बढ़ोतरी दिखाई दे सकती है, रोजगार के नए अवसरों और आर्थिक विकास की तस्वीर भी सामने रखी जा सकती है, लेकिन परिवार का वास्तविक बजट किसी सरकारी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि रसोई, स्कूल की फीस, बिजली के बिल, किराये, ईंधन, इलाज और रोजमर्रा के खर्च से तय होता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">जब इन खर्चों की रफ्तार आय की वृद्धि से तेज हो जाती है तो व्यक्ति को महसूस होने लगता है कि उसकी कमाई बढ़ने के बावजूद उसका जीवन आसान नहीं हुआ। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी आय का बड़ा हिस्सा अनिवार्य खर्चों में चला जाता है। मकान का किराया या होम लोन की किस्त, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा, परिवहन, बिजली-पानी, मोबाइल-इंटरनेट, घरेलू सामान और सामाजिक जिम्मेदारियां—इनमें से अधिकांश खर्च ऐसे हैं जिन्हें आसानी से कम नहीं किया जा सकता। मान लीजिए किसी परिवार की मासिक आय में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, लेकिन इसी अवधि में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य आवश्यक सेवाओं का खर्च उससे अधिक बढ़ जाता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">तब वास्तविक जीवन में उस परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बजाय और दबाव में आ सकती है। यही कारण है कि केवल वेतन या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने को आर्थिक खुशहाली का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि आय बढ़ने के बाद नागरिक कितनी वस्तुएं और सेवाएं खरीद पा रहा है और उसके पास भविष्य के लिए कितनी बचत बच रही है। महंगाई का असली चेहरा रसोई से दिखाई देता है। महंगाई के आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आम नागरिक महंगाई को आंकड़ों में नहीं, बाजार में महसूस करता है। </span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">महीने की शुरुआत में बनाया गया घरेलू बजट महीने के अंत तक अक्सर बिगड़ जाता है। सब्जियां, दाल, दूध, फल, खाद्य तेल, गैस, परिवहन और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर परिवार की जेब पर पड़ता है। मध्यम वर्ग की कठिनाई यह भी है कि वह गरीबों के लिए उपलब्ध अनेक सरकारी सहायता योजनाओं का स्वाभाविक लाभार्थी नहीं होता और दूसरी ओर उसकी आय इतनी अधिक भी नहीं होती कि वह लगातार बढ़ती निजी सेवाओं की कीमतों को आसानी से वहन कर सके। वह दो आर्थिक दबावों के बीच खड़ा दिखाई देता है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">मध्यम वर्ग के बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य का हिस्सा लगातार महत्वपूर्ण होता गया है। माता-पिता बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते </span></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">हैं। इसके लिए स्कूल फीस, किताबें, परिवहन, कोचिंग और उच्च शिक्षा पर बड़ी रकम खर्च होती है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में बढ़ता निजी खर्च परिवार की बचत को प्रभावित करता है। बीमारी केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रह जाती, बल्कि कई बार आर्थिक संकट भी बन जाती है। यही वजह है कि मध्यम वर्ग के लिए महंगाई का अर्थ केवल खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ना नहीं है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास महंगे होते हैं तो भविष्य की सुरक्षा भी महंगी हो जाती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;"> भारत में मध्यम वर्ग की आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण आधार बचत रही है। लेकिन जब आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्च में चला जाता है तो बचत के लिए उपलब्ध रकम घटने लगती है। बचत कम होने का अर्थ केवल आज की सुविधा कम होना नहीं है। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बच्चों की उच्च शिक्षा, घर खरीदना, सेवानिवृत्ति, अचानक आने वाला स्वास्थ्य खर्च या किसी आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यदि किसी परिवार की आय बढ़ती रहे लेकिन उसकी बचत लगातार घटती जाए तो यह आर्थिक मजबूती का संकेत नहीं, बल्कि सावधानी का संकेत है। महंगे मकान, शिक्षा, वाहन और दूसरी आवश्यकताओं के कारण ऋण आज मध्यम वर्ग की आर्थिक जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऋण अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब मासिक आय का बड़ा हिस्सा ईएमआई में जाने लगे तो परिवार की आर्थिक स्वतंत्रता कम होने लगती है। ऐसे परिवारों के लिए ब्याज दरों में बदलाव, नौकरी का संकट या अचानक चिकित्सा खर्च बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि परिवारों की ऋण-निर्भरता कितनी बढ़ रही है और उनकी बचत कितनी सुरक्षित है।</span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:small;">क्या केवल महंगाई को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है?</span></strong></div>
<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">यहां सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। महंगाई पर नियंत्रण केवल कीमतें स्थिर रखने का विषय नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, वेतन वृद्धि, उत्पादकता, कर व्यवस्था, आवास की लागत, स्वास्थ्य और शिक्षा की उपलब्धता—ये सभी मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।</span></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 18:44:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी की 12 वर्षों की सत्ता और आम आदमी: वादे, बदलाव और ज़मीनी हकीकत</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181933/modis-12-years-in-power-and-common-mans-promises-change"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(3).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला। स्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण शौचालय कवरेज को तेज़ी से बढ़ाया। आयुष्मान भारत योजना ने 5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा गरीब परिवारों तक पहुंचाया। जनधन खातों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया और कोविड काल में डीबीटी से करोड़ों लोगों को सीधी मदद मिली। </p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी लाभ के लिए बिचौलियों पर निर्भरता घटी। बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट का दायरा बढ़ा, जिससे UPI आज छोटे दुकानदार से लेकर ठेले वाले तक इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
<p><br />                हम बात करें इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल भारत की तो इसमें भी प्रगति हुई है और कई सुधार अभी भी बाकी हैं। सड़क, रेल, हवाई अड्डे और एक्सप्रेसवे के निर्माण में तेज़ी आई। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, अटल टनल, और नए वंदे भारत ट्रेनें आम यात्रियों के सफर को तेज़ और सुरक्षित बनाने की कोशिश हैं। डिजिटल इंडिया के तहत इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच गांवों तक बढ़ी। इससे शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं मोबाइल पर आ गईं।</p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका फायदा समय की बचत और लागत में कमी के रूप में दिखा। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी इंटरनेट की गुणवत्ता और बिजली की आपूर्ति असमान बनी हुई है। हालांकि कर और अर्थव्यवस्था में बदलाव तो हुआ है लेकिन महंगाई के कारण अभी उतनी राहत महसूस नहीं हुई है । GST लागू होने से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एकजुट हुई। छोटे व्यापारियों के लिए शुरू में जटिलता बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे फाइलिंग आसान हुई। नोटबंदी 2016 का मकसद काला धन और नकली नोट पर चोट था, लेकिन इसका तत्काल असर छोटे कारोबार और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा। महंगाई, बेरोजगारी और निजी निवेश की रफ्तार आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता बनी रही। कोरोना के बाद रिकवरी तेज़ रही, लेकिन असंगठित क्षेत्र में रोज़गार और आय अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं आई है।</p>
<p><br /> राजनीतिक संवाद और छवि की बात की जाये तो इसमें मोदी सरकार का कोई जोड़ नहीं है। मोदी की सरकार ने सीधे संवाद पर ज़ोर दिया। मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिए प्रधानमंत्री खुद जनता से जुड़े रहे। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केंद्र में रहा। विरोधियों का आरोप रहा कि आलोचना को जगह कम मिली और मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा। आम आदमी के लिए इसका असर यह हुआ कि सरकार की योजनाओं की जानकारी तेज़ी से पहुंची, लेकिन विपरीत राय और स्थानीय समस्याएं कई बार राष्ट्रीय बहस में जगह नहीं बना पाईं।</p>
<p><br /> अलग हम इसकी ज़मीनी हकीकत जानें और यह पता करें कि क्या बदला? तो 12 साल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार सीधे नागरिक तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। पहले जहां फाइलों और दफ्तरों में काम अटकता था, अब ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स से काम होता है। गरीबों के लिए रसोई गैस, शौचालय, बिजली और बैंक खाता पहले से ज्यादा सुलभ हुए हैं। दूसरी तरफ, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय और शिक्षा-स्वास्थ्य की गुणवत्ता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती हैं। मध्यम वर्ग टैक्स और जीवनयापन की लागत को लेकर दबाव महसूस करता है। ग्रामीण भारत में कृषि पर निर्भरता और मौसम की मार अब भी जीवन को अनिश्चित रखती है।</p>
<p>मोदी की 12 साल की सत्ता ने आम आदमी की ज़िंदगी में बुनियादी सुविधाओं और डिजिटल पहुंच के मामले में ठोस बदलाव लाए हैं। योजनाओं का लाभ पहले से ज्यादा पारदर्शी हुआ है। लेकिन रोज़गार, महंगाई और असमानता जैसे संरचनात्मक मुद्दे बने हुए हैं। आम आदमी के लिए यह कार्यकाल सुविधाओं में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव दोनों का मिश्रण रहा है। 2026 की सियासत इस बात पर टिकी होगी कि क्या सरकार इन बदलावों को स्थायी रोज़गार और आय में बदल पाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:41:57 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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