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                <title>Food Inflation - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Food Inflation RSS Feed</description>
                
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                <title>महंगाई ने खराब किया रसोई का बजट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> महंगाई ने रसोई का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। चीनी, गुड़ और ड्राई फ्रूट्स के दामों में अचानक तेजी आने से आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ गया है। सबसे ज्यादा तेजी चीनी के भाव में आई है। 15 दिन पहले 48 रुपये किलो बिकने वाली चीनी अब 62 रुपये किलो तक पहुंच गई है। पिछले तीन दिनों में ही इसके दाम करीब 10 रुपये किलो बढ़े हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">50 किलो के चीनी कट्टे पर भी तीन दिन में करीब 500 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। चीनी के दाम बढ़ने का असर घर की रसोई से लेकर मिठाई</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186031/inflation-ruined-the-kitchen-budget"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/768-512-15113188-thumbnail-3x2-mahgai.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> महंगाई ने रसोई का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। चीनी, गुड़ और ड्राई फ्रूट्स के दामों में अचानक तेजी आने से आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ गया है। सबसे ज्यादा तेजी चीनी के भाव में आई है। 15 दिन पहले 48 रुपये किलो बिकने वाली चीनी अब 62 रुपये किलो तक पहुंच गई है। पिछले तीन दिनों में ही इसके दाम करीब 10 रुपये किलो बढ़े हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">50 किलो के चीनी कट्टे पर भी तीन दिन में करीब 500 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। चीनी के दाम बढ़ने का असर घर की रसोई से लेकर मिठाई की दुकानों तक दिखाई देने लगा है। चाय, मिठाई और त्योहारों पर बनने वाले पकवानों में चीनी का इस्तेमाल होने के कारण आने वाले दिनों में इसकी मांग और बढ़ने वाली है। उसका ब्लाक क्षेत्र के संत गोपाल, राजन , दीप नारायण, गणेश शुक्ल, राज कुमार आदि ने सरकार से इस बढ़ते महंगाई पर अंकुश लगाने की मांग की है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 21:41:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आरबीआई के लक्ष्य से ऊपर पहुंची खुदरा महंगाई आम आदमी का बजट बिगड़ा खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183358/retail-inflation-reached-above-rbis-target-common-mans-budget-was"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पिछले 17 महीनों में यह पहला अवसर है जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के 4 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर पहुंची है। इससे पहले मई में खुदरा महंगाई 3.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि का परिणाम मानी जा रही है। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट पर दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जून महीने में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.09 प्रतिशत दर्ज की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि गांव और शहर दोनों ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। फल, सब्जियां, दालें, खाद्य तेल, दूध तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने रसोई का खर्च काफी बढ़ा दिया है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए घर का बजट संभालना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हुई वृद्धि भी रही है। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव हर उस वस्तु पर पड़ता है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता है। किराना, फल-सब्जियां, दवाइयां, कपड़े, निर्माण सामग्री और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी परिवहन खर्च बढ़ने के कारण ऊपर चली जाती हैं। जून महीने में माल ढुलाई से जुड़ी सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.70 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो यह बताती है कि परिवहन लागत अब महंगाई का बड़ा कारण बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात पर निर्भर देश पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक परिस्थितियां बिगड़ने पर घरेलू बाजार में भी पेट्रोल और डीजल महंगे हो जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब सीधे आम नागरिक की जेब पर महसूस किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई बढ़ने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के लिए नया आधार वर्ष और नई उपभोक्ता टोकरी लागू होने के बाद यह महंगाई का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। नई उपभोक्ता टोकरी में लोगों की वर्तमान जीवनशैली और खर्च के पैटर्न को अधिक वास्तविक रूप से शामिल किया गया है। इससे महंगाई का आकलन पहले की तुलना में अधिक सटीक माना जा रहा है। हालांकि इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि लोगों के दैनिक खर्च में वास्तविक बढ़ोतरी पहले के अनुमान से अधिक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महंगाई का सबसे अधिक असर निश्चित आय वाले परिवारों पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित है या जिनकी आय में नियमित वृद्धि नहीं होती, उनके लिए बढ़ती कीमतों के बीच खर्चों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वेतनभोगी कर्मचारी, छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर और पेंशनभोगी सभी इस स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। आवश्यक वस्तुओं पर अधिक खर्च होने के कारण लोग अन्य जरूरतों पर खर्च कम करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास को संतुलित बनाए रखना है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई के लिए 4 प्रतिशत का लक्ष्य निर्धारित किया है और 2 से 6 प्रतिशत के दायरे को स्वीकार्य सीमा माना गया है। हालांकि जून में महंगाई लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है, लेकिन यह अभी भी आरबीआई की निर्धारित ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत से नीचे है। इसके बावजूद लगातार बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय बन सकती है। यदि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बना रहता है तो ब्याज दरों को लेकर आरबीआई को अधिक सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि मानसून सामान्य रहता है, कृषि उत्पादन अच्छा होता है और सरकार समय रहते आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाती है तो खाद्य महंगाई में कुछ राहत मिल सकती है। अच्छी फसल से सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे महंगाई पर नियंत्रण रखना है तो दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति भी बनाए रखनी है। इसके लिए खाद्य आपूर्ति को मजबूत करना, जमाखोरी पर सख्ती, परिवहन व्यवस्था को सुचारु रखना और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होगा। यदि आपूर्ति श्रृंखला मजबूत रहती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक जानकारों का मानना है कि महंगाई केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन स्तर से है। जब खाद्य पदार्थ, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होती हैं तो परिवारों की बचत कम होने लगती है। उपभोक्ता खर्च घटता है और इसका प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है। इसलिए महंगाई पर नियंत्रण केवल सरकार या आरबीआई की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उत्पादन, आपूर्ति और बाजार व्यवस्था के बेहतर समन्वय से ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जून महीने के महंगाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल नई चुनौती का सामना कर रही है। पिछले 17 महीनों में पहली बार आरबीआई का लक्ष्य टूटना यह बताता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। यदि आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में सरकार, रिजर्व बैंक और संबंधित एजेंसियों को समन्वित प्रयास करते हुए महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय करने होंगे, ताकि आम नागरिक को राहत मिल सके और अर्थव्यवस्था संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ती रहे।</div>
<div style="text-align:justify;">    <strong>  <em>कांतिलाल मांडोत</em></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 19:57:38 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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